अधीनस्थ न्यायालय क्या है?

By | February 15, 2021


भारत के प्रत्येक जिले में उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ या निम्नस्तरीय
न्यायालय है। अधीनस्थ न्यायालय तीन श्रेणीयो के होते है। इनमें क्रमश: दीवानी
आपराधिक एवं राजस्व संबंधी मामलो की सुनवाई होती है।

दीवानी न्यायालय 

दीवानी न्यायालय माल संबंधी मुकदमों की सुनवाई करते है और उन पर अपना
निर्णय देते है। दीवानी न्यायालयों की  श्रेणियाँ होती है।

  1. जिला न्यायाधीश- यह दीवानी विवादो का सबसे बडा न्यायालय है। यह
    प्रारंभिक व अपीलीय दोनो अभियोगो के मुकदमे सुनता है। 
  2. अतिरिक्त, संयुक्त जिला न्यायाधीश- ज़िला न्यायाधीश का सहायक होता है।
  3. दीवानी न्यायाधीश- 5000 से 20000 तक के मुकदमे सुनने का अधिकार है। 
  4. मुंसिफ मजिस्ट्रेट- 2000 से 5000 तक के मुकदमे सुनने का अधिकार है। 
  5. लघुवाद या खलीफा नयायालय- 3000 तीन हजार रूपये तक के मुक्दमें
    सुनता है। 
  6. न्याय पंचायत- ये दीवानी मुक्दमें सुनती है, इन्हे पाँच सौ रूपये तक के
    मुक्दमें सुनने का अधिकार है। 
    1. फौजदारी न्यायालय 

    फौजदारी न्यायालय मारपीट, चोरी- डकैती, लडाई झगडे, जालसाजी और कत्ल
    आदि से संबधित मुकदमों को सुनते है। फौजदारी न्यायालय की श्रेणियाँ  होती
    है।

    1. सत्र न्यायाधीश- जिला स्तर पर फौजदारी से संबंधित विवादों का सबसे
      बड़ा न्यायालय होता है।
    2. अतिरिक्त, संयुक्त या सहायक सत्र न्यायाधीश- सत्र न्यायाधीश की सहायता
      के लिये ये न्याायाधीश नियुक्त किये जाते है। इन्हे 12 वर्ष तक की सजा
      देने का अधिकार है।
    3. मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी- इनका कार्य फौजदारी से संबंधित मुकदमा
      सुनना तथा ये 7 वर्ष तक कारावास, 5000 रूपये का आर्थिक दंड दे सकते
      है। 
    4. दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी- ये 3 वर्ष का कारावास तथा 5000 रूपये तक
      का आर्थिक दंड दे सकते है। 
    5. दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी- इन्हे अपीलीय अधिकार प्राप्त नही होते। ये 1
      वर्ष तक का कारावास तथा 1000 रूपये तक का आर्थिक दण्ड दे सकते है। 
    6. न्याय पंचायत- इन्हे 250 रूपये तक का जुर्माना करने का अधिकार होता है
      किन्तु कारावास का दण्ड देने का अधिकार नहीं होता है। 
      1. राजस्व न्यायालय 

      राजस्व न्यायालय मालगुजारी, भूमि, उत्तराधिकार से संबंधित मुकदमो को सुनते है।
      राजस्व न्यायालयो की श्रेणियाँ  होती है।

      1. राजस्व परिषद- राजस्व सबंधीं विवादो की सुनवाई का सबसे बडा न्यायालय
        होता है।
      2. आयुक्त- माल गुजारी से संबंधित कार्यो के लिये प्रत्येक राज्य को मण्डलो
        में बाटँ दिया जाता है। पत््रयेक मण्डल का सबसे बड़ा अधिकारी मण्डल
        आयुक्त होता है।
      3. जिलाधीश- मालगुजारी वसूल करने और शांति व्यवस्था बनाये रखने के
        लिये प्रत्येक जिले में एक जिलाधीश होता है। 
      4. अतिरिक्त जिलाधीश- जिलाधीश के कार्यो में सहायता देने के लिये इनकी
        नियुक्तियाँ की जाती है।
      5. परगनाधीश- परगनाधीश, जिलाधीश के अधीन होते है। 
      6. तहसीलदार- मालगुजारी वसूल करने के अतिरिक्त राजस्व संबध्ं ाी विवादों
        की प्रारंभिक सुनवाई करके निर्णय देना। तहसीलदार की सहायता के लिये
        नायब तहसीलदार होते है। नायब तहसीलदार के नीचे काननू गो तथा
        पटवारी या लेखापाल होते है जो तहसील के कार्यों में सहायता करते है। 
        1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता हेतु उपाय 

          न्यायपालिका की स्वतंत्रता का आशय न्यायधीशों की कार्यपालिका और व्यवस्थापिका
          के प्रभावों से पूर्ण स्वतंत्रता से है। न्यायपालिका को कानून की व्याख्या करने और निष्पक्ष
          रूप से न्याय प्रदान करने के लिये स्वतंत्र रूप से बिना किसी दबाव के स्वविवके का प्रयागे
          करने के अवसर प्राप्त होने चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के अभाव में संपूर्ण न्याय
          व्यवस्था निरर्थक हो जाती है।
          न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए उपाय किए जाने चाहिए-

          1. न्यायधीशों की योग्यता-
            इस पद पर सुयोग्य ईमानदार, निष्ठावान, कुशल कानून वेत्ता को ही नियुक्त किया
            जाये। 
          2. नियुक्ति की उचित व्यवस्था-
            इनका निर्वाचन न तो जनता द्वारा हो और न व्यवस्थापिका द्वारा और न राजनीतिक,
            धार्मिक, सामाजिक आधारो पर हो। इनकी नियुक्ति योग्यता व चारित्रिक गुणो के
            आधार पर हो। 
          3. दीर्घकालीन पदावधि-
            इनका कार्यकाल लम्बा होना चाहिए, जिससे ये आजीविका की चिन्ता से मुक्त होकर
            स्वतंत्रतापूर्वक न्यायिक कार्य कर सके। 
          4. पद की सुरक्षा-
            न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये यह भी आवश्यक है कि उन्हे आसानी से पद
            से न हटाया जाये बल्कि पद से हटाने के लिये विशेष प्रक्रिया अपनानी जाय। 
          5. वेतन की पर्याप्तता-
            न्याय पथ से भ्रष्ट न हो इसके लिये न्यायाधीशों की वेतन एव भत्ते पर्याप्त दिया
            जावे।
          6. सेवानिवृत्ति के पश्चात वकालत पर प्रतिबंध-
            सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हे किसी भी न्यायालय में वकालत पर प्रतिबंध होनी
            चाहिए। 
          7. सेवानिवृत्ति के पश्चात राजकीय नियुक्ति पर प्रतिबंध-
            न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये यह भी आवश्यक है कि सेवानिवृि त्त के बाद
            अन्य पदों की प्राप्ति की लालसा में न्यायाधीश अपने कार्यकाल के दौरान कार्यपालिका
            को प्रसन्न करने में लगे रहेंगे। 
          8. कार्यपालिका से पृथककरण-
            न्यायपालिका की निष्पक्षता व स्वतंत्रता के लिये यह भी आवश्यक है कि न्यायपालिका
            का कार्यक्षेत्र कार्यपालिका से बिल्कुल पृथक हो।

          इस प्रकार भारतीय संविधान के द्वारा न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्रता और सुरक्षा
          प्रदान की गयी है जिससे वे अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा एवं निष्पक्ष रूप से कर सकें।

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