अनुवाद एवं भाषाविज्ञान

By | February 15, 2021


अनुवाद एक भाषिक कला है। सामान्य अर्थ में, एक भाषा में कही गई
बात को दूसरी भाषा में कहना ‘अनुवाद’ है। यहाँ कथन या अभिव्यक्ति का
माध्यम है ‘भाषा’। स्पष्ट है कि अनुवाद क्रिया पूर्णत: भाषा पर आधारित है।
कदाचित इसीलिए भोलानाथ तिवारी जी ने अनुवाद को ‘भाषान्तर’ कहा है।
एक भाषिक क्रिया होने के नाते अनुवाद का भाषा से ही नहीं, भाषाविज्ञान से
भी गहरा सम्बन्ध है, क्योंकि भाषाविज्ञान में ‘भाषा’ का वैज्ञानिक अध्ययन होता
है। भाषा की संरचना में ध्वनि, शब्द, रूप, अर्थ, वाक्य आदि कई स्तर होते
हैं। इनके आधार पर भाषाविज्ञान के अन्तर्गत ध्वनिविज्ञान, रूपविज्ञान,
अर्थविज्ञान, वाक्यविज्ञान आदि का विधिवत व वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता
है। अनुवाद में भी ध्वनि, शब्द, रूप आदि की दृष्टि से स्रोत-भाषा और
लक्ष्य-भाषा की तुलना करनी होती है। इन विविध स्तरों पर दो भाषाओं की
प्रकृति, संरचना, शैली आदि में जो अन्तर होते हैं, वे समान प्रतीत होने वाले
प्रसंगों में भी अलग-अलग अर्थ भर देते हैं। अनुवाद में भाषान्तरण के बावजूद
अर्थ की रक्षा अपरिहार्य होती है। अत: अनुवादक को स्रोत-भाषा तथा
लक्ष्य-भाषा की प्रकृति, संरचना, विविध भाषिक तथा व्याकरणिक स्तरों,
विभिन्न शैलियों तथा इन तमाम पक्षों से सम्बद्ध अर्थ व्यंजनाओं का सम्पूर्ण
ज्ञान होना चाहिए।

भाषा का अनुवाद और अनुवाद की भाषा 

भारतवर्ष विभन्न भाषाओं एवं उपभाषाओं रूपी सरिताओं का संगम है।
यहाँ एक ओर संस्कृति की पावन गंगा प्रवाहित है जिसने अमृत वाड़्मय से
समस्त क्षेत्रीय भाषाओं को भी अनुप्राणित किया है, दूसरी ओर हमारी संस्कृति
की अंत:सलिला सरस्वती है जो विविधि वेशभूषा, रीतिरिवाजों के बाह्य भेदों
की विद्यमानता के बावजूद समस्त भारत को रागात्मकता के एक सू़त्र में बाँधे
हुए हैं। भाषा ही वह जीवन-ज्योति है जो मानव को मानव से जोड़ती है।
यह विचारों के आदान-प्रदान में सहायक होने के साथ-साथ परम्पराओं,
संस्कृतियों और मान्यताओं एवं विश्वासों को समझने का सशक्त माध्यम भी
है। किसी भी देश की धड़कन उसकी भाषा में ही निहित होती है। जहाँ भाषा
विचारों की संवाहिका है, वहीं अनुवाद विविध भाषाओं एवं विविध संस्कृतियों
से साक्षात्कार कराने वाला साधन। अनुवादक अपने भागीरथ प्रयास से दो
भिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों, परिवेशों एवं भाषाओं की सौन्दर्य चेतना को
अभिन्न और परिचित बता देता है।

अनुवाद उतना ही प्राचीन है जितनी कि भाषा। हमारा भारत भाषाओं
और उनके बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से यूरोप से बहुत बड़ा है। और
सच तो यह है कि भाषाओं के मामले में हम दुनिया के सिरमौर हैं। दुनिया
की पचास बड़ी भाषाओं में से एक तिहाई भारत की भाषाएँ हैं। अनादि काल
से वे मनुष्य जाति के पारस्परिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम रही हैं।
भाषा और साहित्य हमारी संस्कृति के उद्गाता और संवाहक रही हैं।

भाषा और अनुवाद का भविष्य परस्पर अन्योन्याश्रित है। भाषा का
भविष्य अनुवाद का भी भविष्य है । वर्तमान भाषा के रूप को पहचानते हुए
भविष्य की कल्पना की जाती है। आज कई प्रकार के भाषा-रूप हैं, जैसे
बोलचान की भाषा, साहित्यिक भाषा, माध्यम भाषा, सम्पर्क भाषा, जनसंचार
माध्यम की भाषा इत्यादि। बोलचाल की भाषा में व्याकरण के ज्ञान की
आवश्यकता नहीं, जबकि साहित्यिक भाषा में रचनाधर्मिता प्रकट होने के
कारण व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है। माध्यम भाषा के द्वारा शिक्षण प्राप्त
करते हैं। जनसंचार की भाषा के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दो अलग प्रकार के
माध्यम हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जनता को सूचना देना, प्रशिक्षण, प्रबोधन,
अभिप्रेरण, प्रोत्साहन तथा मनोरंजन करना है। इसी कारण इस माध्यम में
भाषा को रोचक रूप में प्रस्तुत करने का विशेष प्रयास रहता है।

यह अलग बात है कि बाज़ारवाद के चलते आज भाषा का
व्यावसायीकरण हो गया है। इंटरनेट, कंप्यूटर आदि के कारण दैनन्दिन जीवन
की आवश्यकताओं में प्रयोग होने वाली भाषा पर विस्तार देने का प्रयास होने
लगा है। भाषा में दिनोंदिन परिष्कार हो रहा है, जिससे शब्दों में निखार आता
जा रहा है। पहले ‘Public Latrine’ शब्द लिए ‘संडास’ शब्द का प्रयोग
किया जाता था, जो सुनने और बोलने में बड़ा अरुचिकर लगता था, परन्तु
धीरे-धीरे इसके स्थान पर प्रसाधन, सुलभ शौचालय, जनसुविधाएँ आदि शब्द
आए, ये शब्द ज्यादा गरिमा मंडित हैं।

भाषा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहण क्षमता है, जिस भाषा में यह
गुण नहीं, वह भाषा दम तोड़ है। किसी भी भाषा से अनुवाद करते समय
अनुवाद के सरलीकरण का प्रयास रहना चाहिए। यदि अनुवाद को जटिल
बनाने का प्रयास किया गया तो स्थिति बिगड़ने की संभावना रहती है।
संप्रेषण ग्राह्यता जब तक भाषा में नहीं होगी, वह अनुवाद या भाषा
जनसम्पर्क का माध्यम नहीं बन सकती। भाषा भावाभिव्यक्ति के साथ-साथ
चिन्तन का भी माध्यम है। हर शब्द की व्यंजना, प्रकृति, प्रवृत्ति, संस्कृति,
इतिहास अलग होता है। अत: अनुवाद करते समय इसे समझना होगा। भाषा
और शब्द की प्रकृति से भलीभाँति परिचित होना होगा।

अनुवाद और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान 

आधुनिक युग को अनुवाद का युग कहेंगे अतिशयोक्ति न होगी।
क्योंकि अनुवाद-अध्ययन और अनुसंधान आधुनिक युग की पुकार है। दूसरे
शब्दों में, आधुनिक युग में जीवन के अनेक क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ
भाषायी स्तर पर, संप्रेषण-व्यापार हेतु अनुवाद एक अहम् आवश्यकता के रूप
में उभरकर सामने आया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब हम किसी एक भाषा में
अभिव्यक्त भाव या विचारों के लिखित रूप को किसी अन्य भाषा-भाषी
समुदाय के संप्रेषणार्थ, दूसरी भाषा में यथासाध्य मूलनिष्ठ किन्तु बोधगम्य रूप
में परिवर्तित करते हैं तो यह भाव या विचारों के सोद्देश्यपूर्ण भाषान्तर-प्रक्रिया
‘अनुवाद’ कहलाती है।

आधुनिक भाषाविज्ञान में भाषा के अनुप्रायोगिक पक्ष पर भी चिन्तन
हुआ है। ‘भाषा का सैद्धान्तिक विश्लेषण और वाक्य, रूपिम, स्वनिम आदि
उसके व्याकरणिक स्तरों का वैज्ञानिक अध्ययन भाषाविज्ञान का सिद्धान्त
कहलाता है, जबकि सौद्धान्तिक भाषाविज्ञान के नियमों सिद्धान्तों, तथ्यों और
निष्कषोर्ं का किसी अन्य विषय में अनुप्रयोग करने की प्रक्रिया ओर क्रिया
कलाप का विज्ञान ही अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान(Applied Linguistics) है।’
बकौल कृष्णकुमार गोस्वामी अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान प्रायोगिक एवं कार्योन्मुख
एक ऐसी वैज्ञानिक विधा है, जो मानव कार्य-व्यापार में उठने वाली भाषागत
समस्याओं का समाधान ढूँढती है। भाषिक क्षमता एवं भाषिक व्यवहार के
सन्दर्भ में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान का सम्बन्ध प्रत्यक्षत: व्यवहार पक्ष से जुड़ा
हुआ है। यदि भाषाविज्ञान प्रत्येक ‘क्या’ का उत्तर देता है अनुप्रयुक्त
भाषाविज्ञान प्रत्येक ‘कैसे’ तथा ‘क्यों’ का उत्तर देता है। यह उपभोक्ता सापेक्ष
होता है, जिसमें भाषा के उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं द्वारा निर्धारित लक्ष्य
के सन्दर्भ में भाषा-सिद्धान्तों का अनुप्रयोग होता है। वास्तव में भाषा से हम
क्या-क्या काम ले सकते हैं, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान उस दिशा में काम करता
है। इसलिए जैसे-जैसे इसकी उपयोगिता बढ़ती गई, देश एवं काल के
अनुसार उसे भिन्न-भिन्न विधाओं से सम्बद्ध किया जाता रहा है; यथा
भाषा-शिक्षण, अनुवाद, कोशविज्ञान, शैलीविज्ञान, कंप्यूटर भाषाविज्ञान, समाज
भाषाविज्ञान।

सामान्यत: अनुवाद से अभिप्राय एक भाषाई संरचना के प्रतीकों के
द्वारा सम्प्रेष्य अर्थ को दूसरी भाषा की संरचना के प्रतीकों में परिवर्तित करने
से लिया जाता है। डार्टेस्ट ने अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की एक
शाखा के रूप में परिभाषित करते हुए लिखा है कि अनुवाद, अनुप्रयुक्त
भाषाविज्ञान की वह शाखा है जिसमें विशेषत: एक प्रतिमानित प्रतीक समूह से
दूसरे प्रतिमानित प्रतीक समूह में अर्थ को अन्तरित करने की समस्या या तत्
सम्बन्धी तथ्यों पर विचार-विमर्श किया जाता है :

अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अन्तर्गत शामिल करने का
कारण यह है कि अनुवाद कर्म में स्रोत-भाषा से लक्ष्य-भाषा तक पहुँचने में
हम जिन प्रक्रियाओं से होकर गुजरते हैं उसका वैज्ञानिक विश्लेषण
(scientific analysis) किया जा सकता है। भाषा विज्ञानियों का मानना है
कि अनुवाद क्रिया में पहले स्रोत-भाषा का विकोडीकरण (Decoding of
Source Language) होता है जिसका बाद में लक्ष्य-भाषा में पुन:
कोडीकरण (Encoding of Target Language) किया जाता है। क्रम को देखें –

  1. स्रोत-भाषा (Encoding of Source Language ) 
  2. स्रोत-भाषा
    का कोडीकृत संदेश (Encoded message S.L.) 
  3. अन्तरण
    अर्थात् स्रोत-भाषा का विकोडीकरण (Decoding of S.L.) 
  4. लक्ष्य-भाषा का कोडीकृत संदेश (Encoded message of
    Target Language) 
  5. लक्ष्य-भाषा (Encoding of T.L.)

इसे आरेख से सहज ही समझा जा सकता है :

अनुवाद और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के कार्यक्षेत्र का अध्ययन करते हुए उसके
तीन सन्दर्भ बताए हैं :

  1. ज्ञान-क्षेत्र का सन्दर्भ
  2. विधा-क्षेत्र का सन्दर्भ 
  3. भाषा शिक्षण का सन्दर्भ 

ज्ञान-क्षेत्र में भाषाविज्ञान और उसके सिद्धान्तों का अनुप्रयोग ज्ञान के
अन्य क्षेत्रों को स्पष्ट करने के लिए किया जाता है। जैसे मनोभाषाविज्ञान,
समाजभाषाविज्ञान, कंप्यूटर भाषाविज्ञान आदि।

विधा-क्षेत्र में भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों का अनुप्रयोग विशेष विधाओं में
किया जाता है। शैलीविज्ञान, अनुवादविज्ञान, कोशविज्ञान, वाक्चिकित्सा
विज्ञान आदि। 

जहाँ तक भाषा शिक्षण का प्रश्न है, दूसरी भाषा-शिक्षण (Second Language Teaching) अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है।
भाषाविज्ञान के क्षेत्र में दूसरी भाषा’ पद एक पारिभाषिक शब्द के रूप में
प्रयुक्त होता है जिसकी एक निश्चित संकल्पना है। मातृभाषा हमारी प्रथम
भाषा होती है। दूसरी भाषा को सीखने में माध्यम बनती है
मातृभाषा। दूसरी भाषा के रूप में जब वह कोई अन्य भाषा पढ़ता है तब
उसके सोचने-समझने में मातृभाषा उसकी व्यावहारिक भाषा रहती है क्योंकि
वह व्यक्ति की जीवन पद्धति, आचार-विचार और व्यवहार की भाषा होती है।
दूसरी भाषा शिक्षण में अनुवाद की प्रक्रिया को भाषा सीखने की प्रक्रिया के
रूप में अपनाया जाता है। अनुवाद भाषा-शिक्षण की परम्परागत और सिद्ध
पद्धति है। मातृभाषा अथवा प्रथम भाषा का जो संरचनागत ढाँचा व्यक्ति के
मस्तिष्क में व्यावहारिक स्तर पर विद्यमान होता है, उसका उपयोग इस पद्धति
से दूसरी भाषा सिखाने में कर लिया जात है और व्यक्ति धीरे-धीरे
सुविधाजनक ढंग से दूसरी भाषा व्यवहार में दक्षता अर्जित कर लेता है।
अनुवाद-प्रक्रिया की भाँति उसे अपनी भाषा (स्रोत-भाषा) की शब्दावली के
पर्याय उसे दूसरी भाषा में खोजकर याद करने होते हैं, इन शब्दों के विभिन्न
रूपों से परिचय प्राप्त करना होता है तथा भाषा के संरचनागत (व्याकरण
संबंधी) नियमों की जानकारी हासिल करनी होती है। इन शब्दों का प्रयोग
करते हुए वाक्त-रचना करते समय वह नियमों का सतर्कतापूर्वक पालन
करता है। ऐसा करते समय वह अपनी भाषा में सोचता है, फिर उस बात को
उस भाषा में पढ़ता है, उस पाठ के पर्याय अपनी भाषा मे तलाशता है और
कथ्य को दूसरी भाषा(लक्ष्य-भाषा) में प्रस्तुत करता है।
अनुवाद के माध्यम से दूसरी भाषा-शिक्षण दुनिया भर में बहुत समय
से प्रचलित रहा है। सदियों से लोग इस पद्धति से भाषा सीखते रहे हैं।

अनुवाद और भाषाविज्ञान का अन्तर्सम्बन्ध 

भाषाविज्ञान एवं अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान 

भाषा का विधिवत एवं वैज्ञानिक अध्ययन भाषाविज्ञान सिद्धान्त कहलाता
है जबकि सैद्धान्तिक भाषाविज्ञान के नियमों, सिद्धान्तों, तथ्यों और निष्कर्षों का
किसी अन्य विषय में अनुप्रयोग करने की प्रक्रिया और क्रिया-कलाप का
विज्ञान ही अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान है। दूसरे शब्दों में कहें तो, अनुप्रयुक्त
भाषाविज्ञान में भाषाविज्ञान से प्राप्त सैद्धान्तिक जानकारी का विभिन्न क्षेत्रों में
अनुप्रयोग करते हैं। अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञानी अपने ज्ञान भंडार के विवेचनात्मक
परीक्षण के पश्चात् उसका अनुप्रयोग उन क्षेत्रों में करता है जहाँ मानव-भाषा
एक केन्द्रीय घटक होती है जिससे उन क्षेत्रों की कार्यक्षमता का संवर्द्धन
किया जा सकता है।

अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान एक ऐसी प्रायोगिक, कार्योन्मुख वैज्ञानिक विधा
है जो मानव कार्य-व्यापार में उठने वाली भाषागत समस्याओं का समाधान
ढूँढ़ती है। भाषिक क्षमता एवं भाषिक व्यवहार के सन्दर्भ में अनुप्रयुक्त
भाषाविज्ञान का सम्बन्ध प्रत्यक्षत: व्यवहार पक्ष से जुड़ा हुआ है। यदि
भाषाविज्ञान प्रत्येक ‘क्या’ का उत्तर देता है तो अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान प्रत्येक
‘कैसे’ तथा ‘क्यों’ का उत्तर देता है। चूँकि अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान का सम्बन्ध
विशेष विधाओं से है, अत: इसमें भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों का जो अनुप्रयोग
किया जाता है उसका लक्ष्य संक्रियात्मक होता है। संक्रियात्मक रूप में
शैलीविज्ञान, अनुवादविज्ञान, कोशविज्ञान, वाक्चिकित्सा विज्ञान आदि विषयों में
भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तों का अनुप्रयोग अनिवार्यत: होता है। क्योंकि ये मुख्यत:
भाषा से सम्बद्ध हैं। इन विधाओं को एक निश्चित सैद्धान्तिक सन्दर्भ देने में
और उसके अध्ययन-विश्लेषण के लिए एक सुनिश्चित वैज्ञानिक तकनीक
विकसित करने में भाषावैज्ञानिक सिद्धान्त एवं प्रणाली के अनुप्रयोग का
सर्वाधिक योगदान है।

अनुवाद एवं व्यतिरेकी भाषाविज्ञान 

‘व्यतिरेक’ का अर्थ है ‘असमानता’ या ‘विरोध’। ‘व्यतिरेकी भाषाविज्ञान’
में दो भाषाओं की तुलना करके दोनों की असमानताओं का पता लगाया जाता
है। अनुवाद के सन्दर्भ में कहें तो व्यतिरेकी विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य
रूपात्मक तुलनात्मकता और उस तुलानात्मकता के आधार पर स्रोत-भाषा
और लक्ष्य-भाषा में विद्यमान असमानताओं की व्याख्या करना है। इस प्रकार
व्यतिरेकी तकनीक के रूप में अनुवाद में स्रोत-भाषा और लक्ष्य-भाषा के बीच
व्याप्त असमानताओं के प्रति भाषायी सजगता पैदा करना है।

उदाहरण के
लिए हिन्दी में तीन मध्यम पुरुष : तू, तुम, आप हैं जबकि अंग्रेजी में केवल
‘लवन’। इस प्रकार निम्नलिखित वाक्यों में अंग्रेजी के ‘small’ शब्द के
समानान्तर हिन्दी में ‘छोटा’, ‘छोटी’, ‘छोटे’ तीनों का प्रयोग हुआ है।

उदाहरण :
  SmalI boy : छोटा लड़का
  SmalI girl : छोटी लड़की
  SmalI boys : छोटे लड़के

एकाध और उदाहरणों पर विचार करें :
हिन्दी के ‘गानेवाली’ शब्द का अंग्रेजी में अनुवाद सन्दर्भानुसार
‘singer’ और ‘about to sing’ होगा। इस प्रकार ‘टोपीवाला’ का अनुवाद
‘wearing cap’ और ‘cap seller’ होगा। अत: कहा जा सकता है कि अनुवाद
का सीधा सम्बन्ध व्यतिरेकी विश्लेषण से है।

अनुवाद एवं ध्वनिविज्ञान 

‘ध्वनि’ भाषा की मूलभूत इकाई होती है तथा हर भाषा की अपनी
अलग ध्वनि व्यवस्था होती है। दो भाषाओं के बीच कुछ समान, कुछ लगभग
समान और कुछ भिन्न ध्वनियाँ होती हैं। यहाँ अंग्रेजी और हिन्दी भाषा की
समान ध्वनियों की तुलना करते हैं :

हिन्दी : क ग ज ट न प फ ब म र ल व श स 

————————————————-

अंग्रेजी : k g j t n p f b m r l v sh s

तुलना से स्पष्ट है कि अंग्रेजी में हिन्दी की ‘v’ ध्वनि नहीं है तो ‘अ’
और ‘W’ का सूक्ष्म अन्तर हिन्दी में नहीं है। ऐसे और कई उदाहरण ढूँढे जा
सकते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया, भाषा की मूलभूत इकाई है ‘ध्वनि’ और
सार्थक ध्वनियों से ‘शब्द’ का निर्माण होता है। यह शब्द जब वाक्य में प्रयुक्त
होता है तब वह ‘रूप’ बन जाता है। अनुवाद कर्म में हमेशा दो भाषाओं के
बीच स्थित समानार्थक शब्दों की तलाश रहती है। मगर यह ज़रूरी नहीं कि
एक भाषा की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति किसी दूसरी भाषा में उपलब्ध हो। हर भाषा
में कुछ ऐसे शब्द होते हैं जिसके समानार्थक शब्द दूसरी भाषा में उपलब्ध
नहीं होते, जैसे पारिभाषिक शब्द, मिथ-विशेष से जुड़े शब्द, सांस्कृतिक शब्द
आदि। ऐसे में हम मूल शब्द का अनुवाद न कर उसे लक्ष्य-भाषा की लिपि में
परिवर्तित कर ज्यों का त्यों ग्रहण कर लेते हैं। इसके लिए हमें लिप्यंतरण या
Transliteration का सहारा लेना पड़ता है और लिप्यन्तरण में ध्वनिविज्ञान का
महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। कुछ शब्दों का लिप्यन्तरण द्रष्टव्य है :

Bureau. ब्यूरो, Voucher. वाउचर, Macbath. मैकबेथ आदि।

अनुवाद एवं अनुलेखन 

अनुलेखन का अर्थ है स्रोत-भाषा के शब्द की वर्तनी पर ध्यान न
देकर उसके उच्चारण को आधार मान कर लक्ष्य-भाषा में उस उच्चारण के
अनुरूप लिखना। अनुलेखन को प्रतिलेखन भी कहा जाता है। अनुवाद प्रक्रिया
के दौरान अनुद्य सामग्री में हमें दो प्रकार के शब्द मिलते हैं : 1- जिनका
अनुवाद किया जाना है और 2- जिनका अनुवाद न कर थोड़े-बहुत रूपान्तर
के साथ प्राय: मूल रूप में ही लक्ष्य-भाषा में लिख दिया जाता है। अनुलेखन
में स्रोत-भाषा के ऐसे शब्दों को लक्ष्य-भाषा में लिखने की समस्या पर विचार
किया जाता है जिसका सम्बन्ध लिपिविज्ञान से है। भोलानाथ तिवारी इसे
स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि अनुवाद में ऐसी समस्या दो रूपों में आती है।
यदि अनुवादक किसी से कोई बात सुनकर उसका अनुवाद करके लिख रहा
है तो वह स्रोत-भाषा की ध्वनि को पहले लक्ष्य-भाषा की ध्वनि में परिवर्तित
करता है और फिर लक्ष्य-भाषा की उन ध्वनियों को प्रतिनिधि लिपि-चिह्नों में
उन्हें लिखता है-

स्रोत-भाषा ध्वनि →लक्ष्य-भाषा ध्वनि →लक्ष्य-भाषा लिपिचिह्न

किन्तु यदि वह किसी लिखित सामग्री से अनुवाद कर रहा हो तो इस
क्रम में वृद्धि हो जाती है-

1.स्रोत-भाषा लिपि चिह्न→ 2.स्रोत-भाषा ध्वनि
3. लक्ष्य-भाषा ध्वनि 4.लक्ष्य-भाषा लिपिचिह्न

अनुवाद में स्रोत-भाषा लिपि चिह्न से सीधे लक्ष्य-भाषा लिपिचिह्न
तक पहुँचने की प्रक्रिया सही नहीं होती। उदाहरण के लिए यदि लिपि चिह्नों
के आधार पर ‘Jesperson’ का अनुवाद ‘जेस्पर्सन’ कर दिया जाए तो गलत
होगा क्योंकि इसका सही अनुवाद तो ‘येस्पर्सन’ है। ऐसे ही ‘Rousseau’ और
‘Meillet’ का अनुवाद क्रमानुसार ‘रूसो’ और ‘मेइये’ होगा, न कि
‘राउस्सेअउ’ तथा ‘मेइल्लेत’।

अनुवाद एवं रूपविज्ञान 

रूपविज्ञान के अन्तर्गत भाषा की रूप-रचना का अध्ययन होता है।
रूप-रचना में व्याकरणिक नियमों का आकलन एवं निर्धारण किया जाता है।
इसके अध्ययन का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। चूँकि भाषा के रूप-विन्यास पर
ही मूल का आशय छिपा रहता है, इसीलिए अनुवादक को स्रोत-भाषा और
लक्ष्य-भाषा, दोनों की रूप-रचना, व्याकरणिक नियमों आदि से भलीभाँति
परिचित होना चाहिए। उदाहरण के लिए अंग्रेजी के दो वाक्यों का गलत और
सही अनुवाद द्रष्टव्य है :

उदाहरण-1 
Prima has a pair of scissors.
क- प्रीमा के पास एक जोड़ी कैंची हैं। (-गलत अनुवाद)
ख- प्रीमा के पास एक कैंची है। (-सही अनुवाद)

उदाहरण-2 
Her hair is beautiful.
क- उसका सुन्दर बाल है। (-गलत अनुवाद)
ख- उसके बाल सुन्दर हैं । (-सही अनुवाद)

कहने की ज़रूरत नहीं कि अंग्रेजी में ‘a pair of scissors’, ‘a pair of trousers’ आदि का प्रयोग होता है, मगर हिन्दी में उसे ‘एक जोड़ी कैंची’ या
‘एक जोड़ी पायजामा’ न कहकर सिफऱ् ‘एक कैंची’ या ‘एक पायजामा’ कहा
जाता है। ऐसे ही अंग्रेजी में ‘hair’ शब्द एकवचन के रूप में प्रयोग होता है,
जबकि हिन्दी में ‘बाल’ बहुवचन में।

अनुवाद एवं शब्दविज्ञान 

किसी भाषा की सार्थक ध्वनियों के समुच्चय को शब्द कहते हैं।
शब्दविज्ञान में शब्दों को परिभाषित करके विभिन्न आधारों पर उनका
वर्गीकरण किया जाता है। अनुवाद में शब्दों के मूल अर्थ का स्रोत या प्रयोग
सन्दर्भ को जानने के लिए शब्द का वैज्ञानिक विश्लेषण और वर्गीकरण करना
पड़ता है। उदाहरण के लिए ‘पानी’ शब्द को लीजिए :

पानी 

——————————————————————-

1  2  3  4  5  6  7  8  9  10  11  12 

———————————————————————–

जल वारि नीर अम्बु सलिल अंभ तोय उदक घनसार तृसाह प्रजाहित सर 

————————————————————————-

निश्चय ही इन समानाथ्र्ाी शब्दों का प्रयोग भी कुछ हद तक निश्चित
ही है और अनुवादक को सन्दर्भानुसार इन शब्दों में से एक ही प्रतिशब्द को
ग्रहण करना पड़ता है।
जैसे :
क- गंगा जल (गंगा नीर या गंगा पानी नहीं)
ख- पीने का पानी (पीने का नीर या जल नहीं)
ग- नीर ढलना’ (जल या पानी ढलना नहीं)
   (’नीर ढलना = आँसू बहाना)

अनुवाद एवं अर्थविज्ञान 

अर्थविज्ञान में भाषा के अर्थ पक्ष का अध्ययन किया जाता है। चूँकि
अनुवाद में शब्द का नहीं अर्थ का प्रतिस्थापन होता है, इसीलिए अनुवाद में
अर्थविज्ञान की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। साथ ही अनुवाद कर्म में
अनुवादक केवल अभिधार्थ के सहारे आगे नहीं बढ़ता, बल्कि निहितार्थ (लक्षणा
और व्यंजना) को भी बराबर साथ लिए चलता है। उदाहरण के लिए एक पक्षी
के सन्दर्भ में ‘वह उल्लू है’ कहना साधारण अर्थ का बोध कराता है, मगर एक
व्यक्ति के सन्दर्भ में जब ‘वह उल्लू है’ कहा जाता है तो व्यंग्यार्थ का बोध
कराता है। फिर जो ‘उल्लू’ हिन्दी में मूर्ख का प्रतीक है, वही ‘Owl’ अंग्रेजी
में ‘विद्वान’ का प्रतीक है। इतना ही नहीं, कुछ शब्दों के कई अर्थ होते हैं।
जैसे ‘वारि’ शब्द की तीन अर्थ छवियों को देखिए :

वारि

↙↓↘

1- जल   2- सरस्वती   3- हाथी बाँधने की जंजीर 

अनुवादक को सन्दर्भानुसार इन अर्थ छायाओं में से एक अर्थ को ग्रहण
करना पड़ता है।

अनुवाद एवं वाक्यविज्ञान 

अनुवाद में वाक्यविज्ञान की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वाक्यविज्ञान
में भाषा विशेष के सन्दर्भ में वाक्य रचना और इसके विभिन्न पक्षों का
विश्लेषण किया जाता है । अनुवाद में भी लक्ष्य-भाषा की प्रकृति, व्याकरणिक
नियम आदि का ध्यान रखना पड़ता है। उदाहरण के लिए ‘वह भोजन कर
रहा है’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘He is doing meal.’ न होकर ‘भ्म पे जांपदह
उमंसण्’ होगा । यहाँ ‘भोजन करना’ हिन्दी भाषा की प्रकृति के अनुकूल है
और ‘taking meal’ अंग्रेजी भाषा की प्रकृति के। ऐसे ही ‘घोंघा धीरे-धीरे
चल रहा है’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘Snail is slowly slowly creeping.’ न
होकर ‘Snail is creeping slowly’ होगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि हिन्दी
वारि
भाषा की संरचना ‘कर्ता + कर्म + क्रिया विशेषण + क्रिया’ नियम पर
आधारित होती है, जबकि अंग्रेजी भाषा की संरचना ‘कर्ता + कर्म + क्रिया + क्रिया विशेषण’ नियम पर।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुवाद का भाषाविज्ञान, ख़ासकर
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान एवं व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से बहुत गहरा सम्बन्ध है।
हर अनुवादक को भाषविज्ञान के इन नियमों की जानकारी होना ज़रूरी है,
अन्यथा वह सही और सार्थक अनुवाद कर ही नहीं सकता। 

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