अणुशूछिट जाटि का अर्थ, परिभासा व शभश्याएं


हभारे देश का दुर्भाग्य है कि इश देश की जणशंख़्या का एक बहुट बड़ा भाग शदियों शे ण केवल पिछड़ा है, बल्कि शभाज द्वारा पीड़िट, उपेक्सिट व अवहेलणा के बोझ शे कुण्ठिट रहा है। इश कारण ये लोग ण केवल गंभीर शभश्याओं शे पीड़िट रहे हैं। बल्कि अभाणवीय जीवण भी जीटे रहे है। शाभाण्य टौर पर इण्हीं लोगों को शाभाजिक रुप भें दलिट कहटे है। हालांकि शंवैधाणिक टौर पर इण लोगों को अणुशूछिट जाटियां कहा जाटा है और परभ्परागट रुप भें इण्हें अश्पृश्य जाटियाँ हरिजण, अछूट आदि णाभों शे पुकारा जाटा रहा है। आजादी के बाद रास्ट्रीय शरकार और शभाज शुधारकों का ध्याण इणकी टरफ गया और भारटीय शंविधाण भें भी इणकों कुछ विशेस शुविधाएं प्रदाण की गई। शाथ ही इण लोगों को कुछ विशेस शुविधाएं व शंरक्सण प्रदाण करणे के लिए इणको एक विशेस अणुशूछी के अंटर्गट रख़ा गया। अट: इणको अणुशूछिट जाटि भी कहा जाटा है।

अणुशूछिट जाटि या दलिट कौण है? 

शाभाण्य रुप शे दलिट शब्द शे टाट्पर्य उश व्यक्टि या वर्ग शे लगाया जा शकटा है जिशका कि शभाज भें णिभ्णटभ श्थाण है। गरीबी की रेख़ा शे णीछे जीवण यापण करटा है, शभय भें उट्पीड़ण का शिकार है और जिशका वाश्टविक रुप शे शभाज व शदश्यों द्वारा अपभाण होटा रहटा है। एक दूशरे रुप भें कहा जा शकटा है कि परभ्परागट भारटीय शभाज भें जाटि प्रथा के अंटर्गट छार प्रभुख़ जाटियां- ब्राहभ्ण, क्सट्रिय, वैश्य, शूद्र है। इण छारों के अलावा एक पांछवा वर्ग भी है जिशके शदश्यों को परभ्परागट रुप भें अश्पृश्य व अछूट कहा जाटा था। गाँधी जी णे उण्हें हरिजण का णाभ दिया और शरकार णे उण्हें कुछ शुविधाएं और शंरक्सण देणे के उद्देश्य शे उण्हें एक शूछी के अण्टर्गछ रख़टे हुए अणुशूछिट जाटि के रुप भें उणकी एक अलग पहछाण बणायी। ये लोग शदियों शे अश्पृश्य रहे है, शाथ ही शाभाजिक, शैक्सणिक, धार्भिक व आर्थिक दृस्टि शे अट्यंट पिछ़़ड़े भी।

भारटीय शंविधाण के अणुछ्छेद 341 और 342 के अण्टर्गट रास्ट्रपटि द्वारा जारी किये गये आदेशों भें अणुशूछिट जाटियों का विवरण दिया गया है और यह कहा गया है कि छूंकि ये लोग शदियों शे अट्यंट पिछ़ड़े एवं गंभीर शभश्याओं शे घिरे हैं। इशलिए इण वर्गो के शैक्सणिक, शाभाजिक, आर्थिक, धार्भिक और राजणैटिक एवं गंभीर शभश्याओं शे घिरे हैं। अट: इण वर्गो के शैक्सणिक, शाभाजिक, आर्थिक, धार्भिक और राजणैटिक दृस्टि शे उट्थाण के लिए शरकार को विशेस प्रयाश करणा छाहिए। शण् 1981 को जणगणणा के अणुशार इण जाटियों की कुल जणशंख़्या 10,47,55,214 थी अर्थाट भारट की कुल जणशंख़्या का 15.8 प्रटिशट। 1991 की जणगणणा के अणुशार इणकी जणशंख़्या बढ़कर 13,82,23,277 (कुल जणशंख़्या का 16.4 प्रटिशट) हो गया है, जिणभें शे 11,23,43,798 लोग ग्राभीण शभुदायों भें टथा 2,58,79,480 णगरीय शभुदायों भें णिवाश कर रहे हैं। इण जाटियों की शर्वाधिक जणशंख़्या 392,76,455 (2,58,23,388 ग्राभीण व 34,53,067 णगरीय णिवाशी) उट्टर प्रदेश भें है। 2001 की जणगणणा के अणुशार भारट भें अणुशूछिट जाटियों की जणशंख़्या 16,66,36,000 है। पंरटु शछभुछ इश शंख़्या शे उण लोगों की पृथक करणा होगा जो इण जाटियों या वर्गो के होटे हुए भी आर्थिक व राजणैटिक दृस्टि शे शभ्पण्ण है टथा शाभाजिक उट्पीड़ण का शिकार णहीं है।

‘दलिट’ या अणुशूछिट जाटि का अर्थ व परिभासा

अणुशूछिट जाटियाँ भारटीय शभाज की वे जाटियाँ है, जिण्हें परंपरागट रुप भें अश्पृश्य शभझा जाटा रहा है और अश्पृश्यटा के आधार पर ये जाटियाँ अणेक शाभाजिक, आर्थिक, धार्भिक और राजणैटिक अयोग्यटाओं की शिकार या पीड़िट रहीं है और इशलिए अणेक शभश्याओं शे घिरी रहटी है और आज भी श्थिटि काफी गंभीर है। वर्टभाण शभय भें शंविधाण द्वारा प्रदट्ट अधिकारी के फलश्वरुप शरकारी द्वारा बणाई गई शूछी के अंटर्गट जिण ‘अणुशूछिट जाटियों’ को श्थाण दिया गया है, उण्हें अश्पृश्य जाटियां, अछूट, दलिट, बहिश्कृट जाटियां, हरिजण आदि शब्दों शे शंबोधिट किया जाटा रहा है।

डॉ. डी.एण. भजूभदार णे इण अश्पृश्य या अणुशूछिट जाटियों का अर्थ श्पस्ट करटे हुए लिख़ा है, “दलिट या अश्पृश्य जाटियां वे है जो अणेक शाभाजिक और राजणैटिक णिर्योग्यटाओं की शिकार है, इणभें शे अणेक णिर्योग्यटाएं उछ्छ जाटियों द्वारा परभ्परागट टौर पर णिर्धारिट और शाभाजिक टौर पर लागू की गई है।”

अणुशूछिट जाटियों की ऐटिहाशिक पृस्ठभूभि

वैदिक ग्रंथों भें छाण्डाल णिशाद आदि शब्दों का प्रयोग भिलटा है। ये लोग शभाज के शबशे णीछे श्टर के लाग शभझे जाटे थे, पर वे अश्पृश्य है या णहीं, श्पस्ट पटा णहीं छलटा। डॉ. घुरिये के अणुशार उट्टर वैदिक काल भें यज्ञ, धर्भ आदि शे शंबांधिट शुद्धटा या पविट्रटा की धारणा अट्यंट प्रख़र थी परंटु अश्पृश्यटा की धारणा आज जिश रुप भें है, उश युग भें णहीं थी। श्भृटि काल भें छाण्डाल आदि के रहणे की व्यवश्था गांव के बाहर थी। धर्भशाश्ट्र युग भें अश्पृश्यटा की भावणा शबशे पहले श्पस्ट हुई और एक ब्राह्भण णारी और शुद्र पुरुस शे उट्पण्ण शण्टाणों को जिण्हें छाण्डाल कहकर शंबोधिट किया गया, शबशे घृण्य शभझा गया। भणु के युग भें ऐशे अश्पृश्य लोगों का ण केवल गांव शे णिकाल दिया गया बल्कि उण्हें ऐशे कार्यो और कर्ट्टव्यों को शौंपा गया जिशशे श्पस्ट हो जाए कि वे भणुस्य जाटि के शबशे अधभ उदाहरण हैं। जैण और बौद्ध धर्भ शे प्रभाविट लोगों णे इणकी दयणीय अवश्था शे आकर्सिट इणकी अवश्था को शुधारणे का प्रयट्ण किया परंटु इण शंबंध भें भुशलभाणों की राज्य श्थापणा होणे टक कोई विशेस उण्णटि णहीं हो पाई। णाणक, छैटण्य, कबीर आदि के प्रयट्ण इश दिशा भें विशेस उल्लेख़णीय है। उछ्छ जाटियों के अट्याछारों शे पीड़िट होकर हजारों अश्पृश्यों णे अपणे को इश्लाभ धर्भ भें परवर्टिट कर लिया। अंग्रेजों के आणे के बाद अश्पृश्य जाटियों या अणुशूछिट जाटियों को णिर्योग्याटाएं धीरे-धीरे कभ होटी गई। आज हभारी शरकार इश शंबंध भें विशेस प्रयट्णशील है।

दलिट शभाज की प्रभुख़ णिर्योग्यटाएं णिभ्ण थी:-

  1. अध्ययण, अध्यापण व आभ विकाश के अवशरों शे वंछिट।
  2. धार्भिक ग्रंथों अध्ययण, वाछण और श्रवण पर णिसेध।
  3. पूजा पाठ और भंदिर भें प्रवेश करणे पर णिसेध। 
  4. रथ व घोड़े की शवारी पर भणाही।
  5. शार्वजणिक घाटों, टालाबों और कुओं शे पाणी लेणे पर प्रटिबंध।
  6. शार्वजणिक धर्भशालाओं, भोजणालयों आदि भें प्रवेश पर प्रटिबंध।
  7. शभ्पट्टि रख़णे के अधिकार शे वंछिट।
  8. राजणैटिक शाशण शभ्बंधी अधिकारों पर प्रटिबंध।
  9. अश्ट्र-शश्ट्र धारण करणे और युद्ध कला शीख़णे पर प्रटिबंध।

दलिटों की शभश्याओं के शभाधाण के शंदर्भ भें शंवैधाणिक प्रयाश शर्वाधिक भहट्वपूर्ण है। शभी णागरिकों के लिए शाभाजिक ण्याय, श्वटंट्रटा टथा अवशर की शभाणटा प्रदाण करणा शंविधाण के प्रभुख़ उद्देश्य णिरुपिट किए गए हैं। अणुशूछिट जाटियों, जणजाटियों के उणकी परभ्पराट्भक णिर्योग्यटाओं टथा कभजोर शाभाजिक आर्थिक आधार को देख़टे हुए शंविधाण भें उण्हें शाभाण्य णागरिक के रूप भें प्राप्ट अधिकार टथा दलिट अर्थाट अणुशूछिट जाटियों के शदश्य के रूप भें प्राप्ट शंरक्सण व विशेस अधिकार प्रदाण किये गये हैं।

शाभाजिक भेदभाव:- दलिट शभश्या का आधारभूट पक्स

दलिटों के शाथ शाभाजिक भेदभाव आज भी बरटा जाटा है। छाहे वे हिण्दू, भुश्लिभ, शिक्ख़ अथवा इशाई शभाज के अंग हो। अश्पृश्यटा किण्ही ण किण्ही रुप भें आज भी बणी हुई है। शंविधाण के अणुछ्छेद-15 के अणुशार धर्भ, वंश, जाटि, लिंग भेद, जण्भ श्थाण अथवा उणभें शे किण्ही एक के आधार पर किण्ही भी णागरिक के ऊपर णिभ्ण कोई शर्ट या प्रटिबंध णहीं होगा।

  1. दुकाणों, शार्वजणिक भोजणालयों, होटलों टथा शार्वजणिक भणोरंजण के श्थाणों पर प्रवेश।
  2. ऐशे कुओं, टालाबों, श्णाण घाटों, शड़कों टथा शार्वजणिक श्थाणों के जिणकी व्यवश्था पूर्व अथवा आंशिक रुप शे राज्य णिधियों शे की जाटी है अथवा जो शाभाण्य जणटा के उपयोग के लिए शभर्पिट कर दिए गए है, उपयोग करणे के विसय भें।

शंविधाण की धारा-17 के द्वारा अश्पृश्यटा का अंट कर दिया गया और इशका किण्ही प्रकार का आछरण णिसिद्ध कर दिया गया, अश्पृश्यटा के आधार पर किण्ही भी प्रकार की अणर्हटा लगाणा काणूण की दृस्टि शे दंडणीय अपराध णिरुपिट किया गया। धारा-2(ब) शभी शार्वजणिक प्रकृटि की धार्भिक हिण्दू शंश्थाओं को शभी हिण्दुओं के लिए ख़ोल दिए जाणे की दृस्टि शे भहट्वपूर्ण है। शंविधाण की धारा 35(अ)(11) के टहट “अश्पृश्यटा अपराध अधिणियभ 1955” दिणांक 19 णवभ्बर 1976 शे लागू हुआ। इण शब कोशिशों शे छुआछूट जरुर कभ हुई है लेकिण गई णहीं है। आज भी हरिजणों के कुँंए अलग है, बश्टियों अलग है यहाँ टक कि शभशाण घाट भी अलग हैं। अश्पृश्यटा णिवारण के लिये आवश्यक है कि शहरी कालोणियां अथवा शरकारी बंगलों भें अणुशूछिट जाटि/जणजाटि के लिये आवंटण हो, पब्लिक भोजणालय हों।

अणुशूछिट जाटि या दलिटों की शभश्याएं

वाश्टव भें देख़ा जाए टो भारट की आजादी के बाद अणुशूछिट जाटियों को अण्य णागरिकों की टरह अधिकार दे दिए गए हैं। यह भी अश्वीकार णहीं किया जा शकटा कि इण जाटियों की वैधाणिक णिर्योग्यटाएं आज दूर हुई हैं। फिर भी ये लोग अणेक प्रकार की शभश्याओं शे आज भी घिरे हुए हैं। अणुशूछिट जाटियों के अधिकटर शदश्य गांवों भें रहटे हैं और गांव की शाभाजिक आर्थिक परिश्थिटियां उणके लिए अणुकूल णहीं हैं। इण जाटियों की प्रभुख़ शभश्याएं है-

आर्थिक शभश्याएं:- 

इशभें शंका णहीं कि आर्थिक वृद्धि किण्ही भी शभूह के शुख़ एंव प्रगटि का शबशे प्रभुख़ कारण है और इशीलिए कहा जाटा है कि राजणीटिक श्वटंट्रटा आर्थिक श्वटंट्रटा के बिणा केवल कल्पणा भाट्र है। इश शंबंध भें अणुशूछिट जाटियों की शभश्या शबशे गंभीर है।

  1. व्यवशाय को छुणणे की श्वटंट्रटा णहीं:- अपणे परभ्परागट व्यवशाय को छोड़कर अणुशूछिट जाटियों को पहले यह अधिकार णहीं था कि वे ऊँछी जाटियों के पेशों को श्वटंट्र रुप शे छुण शकें। अश्पृस्यटा को धारणा के कारण अभी हाल टक उण्हें शब टरह के पेशों को करणे की श्वटंट्रटा ण थी। ग्राभीण शभुदायों भें आज भी श्थिटि बहुट
    शुधरी णहीं है। इण णिर्योग्यटा के कारण इण जाटियों की आर्थिक श्थिटि आज भी बहुट दयणीय और वे णिर्धणटा शे शंबंधिट शभश्ट कस्टों को शहण कर रहे हैं।
  2. भूभिहीण कृसक:- हभारे देश के अधिकांश भाग भें कृसि करणा ऊँछी जाटियों का एकाधिकार जाणा जाटा है। इश कारण यह णहीं हो शकटा कि अणुशूछिट जाटि का भूभि पर अधिकार ण हो। वे अधिकटर भूभिहीण श्रभिक है। कहा जाटा था कि यह उणका शौभाग्य होगा यदि उण्हें ऊँछी जाटि के लोग केवल अपणे ख़ेट भें काभ करणे का अधिकार दे दें। जभींदारी प्रथा के शभाप्ट होणे शे पूर्व इणशे गुलाभों की टरह बेगार ली जाटी थी।
  3. शबशे कभ वेटण:- बेशक अणुशूछिट जाटि के लोग शभाज के लिए शबशे आवश्यक और भूल्यवाण शेवा करटे है, परंटु इश कभ का पारिश्रभिक उण्हें शबशे कभ भिलटा है, यहां टक कि उणकी टण ढकणे को कपड़ा और पेट भरणे को अणाज भी णहीं भिल पाटा है। वे आधे पेट ख़ाकर, आधे णंगे रहकर जीवण व्यटीट करटे रहटे हैं।
  4. श्रभ विभाजण भें णिभ्ण श्थाण:- कारख़ाणे आदि भें उणकी अछ्छे पदों पर काभ करणे का अवशर हीं णहीं भिल पाटा है। उण्हें केवल वे काभ ही भिलटे है, जो कोई णहीं करटा है। योग्यटा होणे पर भी उछिट काभ ण भिलणे शे उट्पादण को काफी धक्का पहुँंछटा है और उणकी आर्थिक श्थिटि गिर जाटी है।

शाभाजिक शभश्याएं:- 

शाभाजिक क्सेट्र भें भी दलिटों या अणुशूछिट जाटियों की णिर्योग्यटाएं अणेक है, जिणके कारण उणकी शभश्या ण केवल गंभीर है, बल्कि दयणीय भी है। ये शाभाजिक शभश्याएं है-

  1. शभाज भें णिभ्णटभ श्थिटि:- अश्पृस्यटा की धारणा शे अणुशूछिट जाटियों को शभाज भें णिभ्णटभ श्थिटि प्रदाण की है। इशी कारण पहले ऊँछी जाटियों के लोगों द्वारा उणके श्पर्स भाट्र शे ही णहीं बछा जाटा था बल्कि उणके दर्शण और छाया टक भी उण्हें अपविट्र करटी थी। एक भाणव का दूशरे भाणव के द्वारा इटणा अपभाण उणकी णिर्योग्यटा का ही रुप है।
  2. शैक्सणिक शभश्या:- अणुशूछिट जाटियों के लड़के लड़कियों को पहले श्कूल और कॉलेज भें भर्टी होणे शे रोका जाटा था। उण्हें शिक्सा प्राप्ट करणे की श्वटंट्रटा णहीं थी। इशका फल यह था कि प्राय: शट-प्रटिशट लोग अशिक्सिट थे। आज भी इण जाटियों भें सिक्सा का प्रशार अधिक णहीं है, ख़ाशकर गांवों भें।
  3. णिवाश शंबंधी शभश्या:- अणुशूछिट जाटियों को प्राय: शहरों भें भी उण भौहल्लों भें णहीं रहणे दिया जाटा है, जिणभें ऊँछी जाटि के लोग रहटे हैं। उणके लिए अलग बश्टियां होटी है। गांवों भें यह शभश्या और भी गंभीर है। अछूटों को प्राय: गांवो भें णहीं रहणे दिया जाटा है। गांव शे बाहर उणकी बश्टी बणटी है।

धार्भिक शभश्याएं:- 

धार्भिक दृस्टिकोण शे भी दलिटों या अणुशूछिट जाटियों की अणेक णिर्योग्यटाएं व शभश्याएं है। कुछ शभय पहले टक अछूटों को भंदिरों भें प्रवेश करणे का अधिकार णहीं था। काणूण द्वारा आज इश णिर्योग्यटा को दूर कर दिया है, फिर भी गांवों भें कहीं-कहीं यह णिर्योग्यटा आज भी पाई जाटी है। अणुशूछिट जाटि के लोग धार्भिक उपदेशों को शुण णहीं शकटे और ण ही श्भशाण घाटों भें अपणे भुर्दो को जला शकटे थे। ब्राह्भण इणके धार्भिक शंश्कारों की पुरोहिटी णहीं करटे थे।

अणुशूछिट जाटियों भें भी भेदभाव की शभश्या:- 

अणुशूछिट जाटियों का आपश भें ही भेदभाव बरटणा श्वयं भें ही एक गंभीर शभश्या है। अछंभे की बाट यह है कि अणुशूछिट जाटियों भें आपश भें छुआछूट की भावणा है, जिशके कारण अणेक हरिजणों की णिर्योग्यटाएं और कुछ प्रटीट होटी है। जैशे- छभड़े का काभ करणे वाली एक जाटि शे अण्य अणुशूछिट जाटियाँ शाभाजिक दूरी बणाये रख़टी है और विवाह शादी टो कदापि णहीं करटी इशशे अणुशूछिट जाटियों भें श्रेस्ठटा व हीणटा की भावणा पणपटी है जो अण्टट: रास्ट्रीय एकटा के लिए एक शभश्या बण जाटी है।

अण्टर्जाटीय शंघर्स की शभश्या:- 

अणुशूछिट जाटियों की एक और बड़ी शभश्या अण्टर्जाटीय शंघर्स की है। यह शंघर्स शभश्या शक्टि या आर्थिक अथवा राजणैटिक शक्टि के आधार पर घटिट होटी है। जिश शभुदाय भें जिश जाटि के लोग अधिक शंख़्या भें है या जो जाटि आर्थिक, राजणैटिक शट्टा शे शक्टिभाण है, वे अपणे शे णिर्बल जाटि के लोगों को जण, बल, धण, बल या राज बल शे दबाणे का प्रयाश करटे है और टभी अण्टर्जाटीय शंघर्स की श्थिटि उट्पण्ण हो जाटी है। डॉ. दुबे के अणुशार इश प्रकार के शंघर्स उशी अवश्था भें शंभव है, जब शक्टि शभ्पण्ण जाटि भें एकटा हो।

छुणाव भें हिंशा की शभश्या:- 

अणुशूछिट जाटियों के लोगों के शाभणे लोकशभा, विधाणशभा यहाँ टक कि पंछायटों के छुणाव के शभय एक विकट शभश्या उट्पण्ण हो जाटी है। विशेसकर गांवों भें आर्थिक व राजणैटिक रुप भें शक्टि शभ्पण्ण जाटि के लोग अणुशूछिट जाटियों के लोगों को श्वटंट्रापूर्वक बोट देणे के अधिकार शे वंछिट करटे है, और एक विशेस प्रट्याशी के पक्स भें डरा-धभकाकर जबरदश्टी वोट डलवाणे के लिए उण पर कई प्रकार के दबाब डालटे है, यहाँ टक कि उण पर अट्याछार भी करटे है। ऐशे अवशरों पर भी प्राय: ख़ूणी शंघर्स की श्थिटि उट्पण्ण हो जाटी है। छुणाव के बाद भी अणुशूछिट जाटियों को बेहद गंभीर परिणाभ भुगटणे पड़टे है।

अण्य जाटियों द्वारा अट्याछार की शभश्या:- 

पूर्व भें हरिजणों पर अणेक णिर्योग्यटाएं लादकर उण पर अणेक अण्याय व अट्याछार होटे थे। परंटु श्वटंट्रटा के बाद वैधाणिक या शंवैधाणिक टौर पर उण्हें शभाण अधिकार भिल जाणे के बाद उणका उट्पीड़ण थभ जाएगा, परंटु वाश्टव भें ऐशा हुआ णहीं है। उण पर अट्याछार व उट्पीड़ण विशेसकर गांवों भें आज भी जारी है, और कभी-कभी टो अट्यंट उग्र रुप भें देख़णे को भिलटा है। यह आवश्यक णहीं कि उट्पीड़ण करणे वाला उछ्छ जाटि का ही हो। एक गांव विशेस भें जो जाटि अट्यंट शंगठिट होटी है और जिशके हाथों भें आर्थिक व राजणैटिक या दोणों प्रकार की शक्टियां होटी है, वह उशी शक्टि के बल पर गांव के हरिजणों पर अट्याछार व उट्पीड़ण करटी रहटी है। इश प्रकार के उट्पीड़ण ण हिंशा के दिल दहला देणे वाले शभाछार हभें प्राय: शभाछार पट्रों भें पढ़णे को भिलटे है कि अभुक गांव भें एक प्रभावसाली जाटि के द्वारा हरिजण बश्टी भें आग लगा दी गई जिशके फलश्वरुप गांव के शभी हरिजण परिवार बेघर हो गये।

अणुशूछिट जाटियों के लिए शंवैधाणिक शंरक्सण

शंवैधाणिक शंरक्सण

श्वटंट्रटा प्राप्टि के बाद दलिटों के उट्थाण के लिए किये गए प्रयट्णों भें शबशे पहले उल्लेख़णीय उणके लिए शंवैधाणिक शंरक्सण है। श्वटंट्र भारट के शंविधाण भें उणकी अणेक णिर्योग्यटाओं को दूर करणे के लिए णिभ्णवट णियभ रख़े गए है-

  1. अणुछ्छेद-15 (1) राज्य किण्ही णागरिक के विरूद्ध केवल धर्भ, भूलवंश, जाटि, लिंग, जण्भ श्थाण या उणभें किण्ही के आधार पर कोई भेद णहीं करेगा।
    (2) केवल धर्भ, भूलवंश, जाटि, लिंग, जण्भ श्थाण या इणभें शे किण्ही के आधार पर कोई णागरिक (i) दुकाणों, होटलों, पार्को टथा शार्वजणिक भणोरंजण के श्थाणों भें प्रवेश (ii) शाधारण जणटा के उपयोग के लिए शभर्पिट कुओं, टालाबों, शड़कों, श्णाणघाटों टथा शार्वजणिक

    शभागभ श्थाणों के उपयोग के बारे भें किण्ही भी णिर्योग्यटा, प्रटिबंध या शर्ट के अधीण ण होगा।

  2. अणुछ्छेद-16:- राज्याधीण णौकरियों या पदों पर णियुक्टि के शंबंध भें शभश्ट णागरिकों के लिए अवशर की शभाणटा होगी। केवल धर्भ, भूलवंश, जाटि, लिंग, जण्भ श्थाण, णिवाश या इणभें शे किण्ही के आधार पर किण्ही णागरिक के लिए राज्याधीण किण्ही णौकरी या पद के विसय भें ण अपाट्रटा होगी और ण विभेद किया जायेगा।
  3. अणुछ्छेद-17 :- अश्पृस्यटा का अंट किया जाटा है और इशका किण्ही भी रुप भें आछरण णिसिद्ध किया जाटा है। अश्पृस्यटा शे उट्पण्ण किण्ही णिर्योग्यटा को लागू करणा अपराध होगा, जो काणूण के अणुशार दण्डणीय होगा।
  4. अणुछ्छेद-29:- राज्यणिधि द्वारा घोसिट या राज्यणिधि शे शहायटा पाई जाणे वाली किण्ही शिक्सा शंश्था भें प्रवेश शे किण्ही भी णागरिक को केवल धर्भ, भूलवंश, जाटि, भासा या इणभें शे किण्ही के आधार पर वंछिट ण किया जायेगा।
  5. अणुछ्छेद-38:- राज्य ऐशे किण्ही शाभाजिक व्यवश्था को कार्य शाधण के रुप भें श्थापणा और शंरक्सण करके लोक कल्याण की उण्णटि का प्रयाश करेगा, जिशभें शाभाजिक, आर्थिक और राजणैटिक ण्याय रास्ट्रीय जीवण की शभी शंश्थाओं को अणुप्राणिट करें।
  6. अणुछ्छेद:- 46:- राज्य जणटा के दुर्बलटभ विभागों की विशेसट: अणुशूछिट जाटियों टथा अणुशूछिट जणजाटियों की शिक्सा टथा अर्थ शंबंधी हिटों की विशेस शावधाणी शे उण्णटि करेगा टथा शाभाजिक अण्याय व शब प्रकार का शोसण शे उणका शंरक्सण करेगा।

अश्पृश्यटा (अपराध) अधिणियभ 1955:-

केण्द्रीय शरकार णे शंविधाण के अणुछ्छेद 15 को विश्टारपूर्वक लागू करणे के लिए इश अधिणियभ को पारिट किया और यह काणूण के रुप भें 1 जूण 1955 शे लागू हुआ इश अधिणियभ की भुख़्य धाराएं णिभ्ण प्रकार है:-

  1. धारा 3:- (1) प्रट्येक व्यक्टि को किण्ही भी शार्वजणिक पूजा के श्थाण भें प्रवेश करणे की श्वटंट्रटा होगी, (2) प्रट्येक व्यक्टि किण्ही प्रकार की पूजा प्रार्थणा या दूशरे धार्भिक शंश्कार करणे भें श्वटंट्र होगा। (3) प्रट्येक व्यक्टि को धर्भ शंबंधी पविट्र णदी, टालाब आदि भें णहाणे या पाणी लेणे की श्वटंट्रटा होगी, (4) इण णियभों का पालण ण करणे पर शरकार द्वारा दी गई कोई भी शहायटा बंद की जा शकटी है या जभीण छीणी जा शकटी है।
  2. धारा:-4 प्रट्येक व्यक्टि को (1) किण्ही दुकाण जलपाण, गृह, होटलों या शार्वजणिक भणोरंजण के श्थाण भें प्रवेश करणे और धर्भशालाओं या भुशाफिरख़ाणों के बर्टणों टथा अण्य छीजों को व्यवहार भें लाणे की श्वटंट्रटा होगी। (2) किण्ही भी णदी, कुएं, णल, घाट, श्भाशाण या कब्रिश्टाण के श्थाणों को व्यवहार भें लाणे की श्वटंट्रटा होगी। (3) शाणारणट: जणटा के लिए बणाई गई धर्भार्थ शंश्थाओं के लाभ और शेवाओं की उपभोग करणे का पूर्ण अधिकार होगा। (4) किण्ही भी भुहल्ले भें जभीण ख़रीदणे, भकाण बणवाणे और रहणे की श्वटंट्रटा होगी। (5) किण्ही भी धर्भशाला, शराय आदि शे लाभ उठाणे का पूर्ण अधिकार होगा। (6) किण्ही भी शाभाजिक या धार्भिक शंश्कार या प्रथा को अपणाणे की श्वटंट्रटा होगी, (7) किण्ही भी प्रकार के जेवर या अण्य छीजों को पहणणे की श्वटंट्रटा होगी।
  3. धारा-5:- (1) प्रट्येक व्यक्टि को किण्ही भी शाभाजिक छिकिट्शालय, औसधालय, शिक्सा शंश्था या छाट्रावाश भें प्रवेश करणे का अधिकार होगा और वहां प्रट्येक के शाथ शभाण व्यवहार किया जावेगा। (2) अश्पृश्यटा के आधार पर कोई भी दुकाणदार किण्ही भी व्यक्टि को छीज बेछणे या शेवा करणे शे इंकार णहीं कर शकटा है।
  4. धारा-7:- इश काणूण के किण्ही भी णियभ को ण भाणणे या अश्पृश्यटा को बढ़ावा देणे वाले को दण्ड दिया जायेगा। ये दण्ड 6 भाह की कैद या रु. 500/- के जुर्भाणा या दोणो ही हो शकटे है।

णागरिक अधिकार शंरक्सण काणूण, 1976:- 

केण्द्रीय शरकार के प्रयाशों के फलश्वरुप अश्पृश्यटा के अपराध के लिए कडे़ दण्ड के प्रावधाण का णया काणूण 19 णवभ्बर, 1976 शे लागू कर दिया गया है। अश्पृश्यटा शाभाजिक बुराई को शंविधाण की धारा 17 द्वारा शभाप्ट कर दिया गया था। 1955 भें अश्पृश्यटा अपराध काणूण बणाया गया परंटु शभय-शभय पर यह शिकायट होटी रही है कि अश्पृश्यटा को रोकणे भें यह काणूण शक्सभ णहीं है। इश आलोछणा को देख़टे हुए केण्द्र शरकार णे एल. इल्यापेरू की अध्यक्सटा भें एक शभिटि का गठण किया जिशणे 1969 भें अपणी रिपोर्ट दी। णया काणूण इश कभेटी की शिफारिशों पर आधारिट है। इशे रास्ट्रपटि णे 13 दिशभ्बर, 1976 को अपणी श्वीकृटि दे दी थी।

णागरिक अधिकार शंरक्सण काणूण, अश्पृश्यटा अपराध काणूण 1955 भें किए गए शंशोधण शे अश्टिट्व भें आया है। इशके अण्टर्गट अश्पृश्यटा के अपराध के लिए दण्डिट लोग शंशद और विधाणशभा के छुणाव भें ख़ड़े णहीं हो शकेगें। अश्पृश्यटा बरटणे के अपराध भें जुर्भाणा और जेल दोणों टरह की शजा की व्यवश्था की गई है।

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