अमेरिकी क्रांति के कारण, घटना एवं प्रभाव

By | February 15, 2021


अमेरिकी क्रांति (1776 ई.) के कारण

1. अमेरिकी उपनिवेशों का विद्राहे व तत्जनित अमेरिकी स्वतंत्रा-युद्ध उन परिस्थितियों का परिणाम
था जो सप्तवर्षीय युद्ध के कारण उपस्थित हुई। 1763 ई. में सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति होने पर
इंग्लैण्ड एक विस्तृत औपनिवेिशक साम्राज्य का अधिपति था। अमेरिका के 13 उपनिवेशों में अंग्रेजों की
प्रधानता थी व वहाँ इंग्लैण्ड जैसी राजनीतिक संस्थाएँ व परंपराएँ प्रचलित थीं। अठारहवीं सदी के
मध्य तक, इंग्लैण्ड की भाँति ही, अमेरिकी उपनिवेशों में अनुकूल वातावरण होने के कारण उपनिवेश
वालों ने इंग्लैण्ड की अपेक्षा काफी महत्वपूर्ण व पग्रतिशील प्रयागे किये। अमेरिकी उपनिवेशों में
क्रांतिकारी राजनीतिक प्रयोग व परिवर्तन इसलिए संभव हो सके क्योंकि अमेरिका में बहुसंख्यक प्यूरिटन
होने से धार्मिक स्थिति अनुकूल थी; अमेरिका की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति भी बड़ी सहायक सिद्ध
हुई व भौगोलिक परिस्थितियों ने भी राजनीतिक परिवर्तनों में काफी योगदान दिया। इंग्लैण्ड की सरकार
द्वारा सुदूरस्थ अमेरिकी उपनिवेशों पर नियंत्रण स्थापित करना सरल न था। इंग्लैण्ड की सरकार
अमेरिकी उपनिवेशों के व्यापार-वाणिज्य के प्रति हस्तक्षेप और नियंत्रण की नीति इस उद्देश्य से अपनाती
थी कि इंग्लैण्ड के आर्थिक, औद्योगिक व व्यापारिक हितों की वृद्धि हो सके। यद्यपि इंग्लैण्ड की सरकार
की नीति अमेरिकी हितों के प्रतिकूल थी, परंतु कई कारणों से अमेरिकी उपनिवेशों ने काफी समय तक
इसे सहन किया क्योंकि काफी समय तक इंग्लैण्ड के नियंत्रण की नीति को पूर्ण रूप से कार्यान्वित नहीं
किया गया; संभावित फ्रांसीसी आक्रमण के विरूद्ध इंग्लैण्ड की सहायता प्राप्त होने के कारण अमेरिकी
उपनिवेशों ने आर्थिक नियंत्रण को सहन किया व काफी समय तक अमेरिकी उपनिवेश अशक्त होने के
कारण इंग्लैण्ड के आश्रित रहे। किन्तु सप्तवर्षीय युद्ध की समाप्ति होने पर 1763 ई. की पेरिस की संधि
से अमेरिकी परिस्थितियाँ पूर्णतया बदल गयीं। अब अमेरिकी उपनिवेशों को फ्रासं ीसियों की ओर से काइेर्
भय न रहा। अत: उन्हें गृह-सरकार पर आश्रित रहने की आवश्यकता नहीं रह गयी। सप्तवर्षीय युद्ध के
काल में अमेरिकी उपनिवेश न केवल धन संपnn व लोकसंख्या में भी संपन्न हो गये थे, वरन् वे काफी
आत्म-निर्भर भी हो गये थे। अत: अब उनहें गृह-सरकार का नियंत्रण असह्य हो गया।

2. 1763 ई. में जॉर्ज ग्रेनविल ने जिस मंत्रिमण्डल की रचना की, उसके विचारानुसार अमेरिकी
उपनिवेशों को गत युद्ध के आर्थिक बाझे व राष्ट्रीय सुरक्षा के दायित्व के भार अपने ऊपर लेना थे
क्योंकि इंग्लैण्ड ने फ्रासीसी आक्रमणों के विरूद्ध अमेरिकी उपनिवेशों की रक्षा की थी, अत: अमेरिकी
उपनिवेशों पर नये कर लगाये जाने चाहिए और इस प्रकार इंग्लैण्ड की भयंकर आर्थिक समस्या का
समाधान होना चाहिए। अत: इंग्लैण्ड के रिक्त कोष की पूर्ति व आर्थिक संकट का सामना करने के
उद्देश्य से ब्रिटिश संसद ने दो महत्वपूर्ण एक्ट पास किये। पहला शुगर एक्ट-1764 ई. व दूसरा स्टाम्प
एक्ट-1765 ई. था, परंतु शीघ्र ही अमेरिकी उपनिवेशों ने इन दोनो एक्टों के विरूद्ध अपना असंतोष
प्रकट किया। उन्होंने वह नारा बुलंद किया कि ‘‘बिना प्रतिनिधित्व के करारोपण अन्याय व अत्याचार हैं’’
व ‘‘बिना प्रतिनिधित्व के करारोपण नहीं हो सकता।’’ क्योंकि स्टाम्प एक्ट ने सभी उपनिवेशों में भयकं र
चिनगारी भर दी अत: अमेरिकी लोगों ने ‘अधिकार की घोषणा’ की, जिनसे दंगे आरंभ हो गये तथा
ब्रिटिश मालों का बहिष्कार किया गया। अत: विविश होकर 1766 ई. में गृह-सरकार ने स्टाम्प एक्ट को
रद्द कर दिया।

3. 1767 ई. में गृह-सरकार ने उपनिवेशों के आयात की कई चीजों पर, जैसे काँच, सीसा, रंग,
कागज, चाय, इत्यादि पर चुँगी लगा दी। इससे तुरंत ही अमेरिकी उपनिवेशों में भयंकर विरोध आरंभ हो
गये और 1770 ई. में बास्े टन नगर में हत्याकाण्ड हो गया। इन घटनाओं से प्रभावित होकर यद्यपि
गृह-सरकार ने अन्य चीजों पर से चुँगी हटा दी, परंतु चार पर चुँगी पूर्ववत् बनी रही। अत: अमेरिकी
उपनिवेशों ने क्रोध में आकर बास्े टन के बंदरगाह पर चाय से लदे हुए एक जहाज में प्रविष्ट होकर चाय
की पेिटयाँ उठा-उठाकर समुद्र में फेंक दी। यह घटना इतिहास में बोस्टन टी पार्टी के नाम से प्रसिद्ध
है। इस घटना के प्रत्युत्तर में 1774 ई. में गृह-सरकार ने पाँच एक्ट पास किये। इनके द्वारा बोस्टन के
बंदरगाह को व्यापार के लिए बिल्कुल बंद कर दिया गया और मैसाचुसेट्स की प्रतिनिधि-संस्थायें तोड़
दी गयी। 1774 ई. में ही फिलाडेलफिया में महाद्वीपीय काग्रेस की बठै क हुई व इसने सम्राट जाजॅर् तृतीय
के पास अपना आवेदन भेजा, परंतु इसका कोई फल न हुआ। अब सम्राट जॉर्ज तृतीय, ब्रिटिश संसद व
अमेरिकी उपनिवेश अपनी-अपनी नीति पर कटिबद्ध हो गये। अब इंग्लैण्ड तथा अमेरिकी उपनिवेशिकों
के बीच समझौते की कोई संभावना नहीं रह गयी। प्रारंभ में करों के विरूद्ध जो विरोध आरंभ हुआ था,
अब वह राजनीतिक विप्लव में परिणत हो गया।

4. इंग्लैण्ड की दमन-नीति से तंग आकर 1779 ई. की 4 जुलाई के दिन अमेरिकी कांग्रेस ने बड़ी
क्रांतिकारी कायर्व ाही आरंभ की अर्थात इसने अमेरिकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता घोषित कर दी, जिसका
अमेरिकी देशभक्तों ने सहर्ष ही स्वागत किया। इंग्लैण्ड में राजा और संसद दोनों ने ही इस स्वतंत्रता की
घोषणा की निंदा व विरोधी उपनिवेशिकों को राजद्रोही की संज्ञा प्रदान की।

अमेरिकी क्रांति (1776 ई.) की घटनाएं

अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध 1774 ई. से 1783 ई. तक चला व प्राय: प्रत्येक उपनिवेश में लड़ाई हुई।
अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध में भाग लेने वालों को सौभाग्य से जॉर्ज वाशिगं टन जैसे दृढ़-संकल्प, शातं और
गंभीर स्वभाव के महान व्यक्ति का कुशल नेतृत्व प्राप्त हुआ। जॉर्ज वाशिगंटन में संतुलित उत्साह व
शक्ति थी, उसमें दृढ़-निश्चय, स्थिरता व एकाग्रता थी। इस युद्ध में फ्रांसीसियों ने गत सप्तवषीर्य युद्ध
की पराजय का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से ग्रेट ब्रिटेन के विरूद्ध अमेरिकी उपनिवेशों की बड़ी सहायता
की। वस्तुत: फ्रांसीसी सहायता ही अमेरिकी सफलता का प्रमुख कारण सिद्ध हुई। स्वतंत्रता की घोषणा
व युद्ध के प्रारंभ होने के पश्चात् उपनिवेशों को शुरू में महान विफलताओं या पराजयों का सामना
करना पड़ा। अंग्रेजों ने न्यूयार्क ओर फिलाडेलफिया पर अधिकार कर लिया, परंतु 1777 ई. के अंत में
स्टे्रटोगा के युद्ध में अमेरिकी उपनिवेशिकों को महान विजय प्राप्त हुई और अंग्रेज सेनापति बुरगोनी को
आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस ब्रिटिश पराजय से प्रोत्साहित होकर फ्रांस व स्पने भी अमेरिकी उपनिवेशों
के सहायतार्थ युद्ध में आ कूदे। परिणामस्वरूप, यह स्वतंत्रता युद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय युद्ध के रूप में
परिणत हो गया। अब हॉलैण्ड ने भी इंग्लैण्ड के विरूद्ध युद्ध घोषित कर दिया। इसी समय से इंग्लैण्ड
को स्थल युद्धों व जल युद्धों में निरंतर भयानक कठिनाइयो व पराजयों का सामना करना पड़ा। 1778
ई. में अंग्रेजों ने फिलाडेलफिया खाली कर दिया और 1781 ई. में अंग्रेज सेनापति ने यॉर्क टाउन में
हथियार डाल दिये। इस प्रकार युद्ध बंद हो गया। 1783 ई. की वर्साई की संधि के अनुसार इंग्लैण्ड ने
अमेरिकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता स्वीकार कर ली और फ्रासं को उसके उपनिवेश वापस कर दिये।

अमेरिकी क्रांति (1776 ई.) का प्रभाव

  1. अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध की वास्तविक महत्ता न तो स्पेन या फ्रांस के प्रादेशिक लाभों, न
    हॉलैण्ड की व्यापारिक क्षतियों तथा इंग्लैण्ड के साम्राज्य की अवनति में ही थी, वरन् इसकी वास्तविक
    महत्ता अमेरिकी क्रांति के सफल संपादन में पायी जाती है। इसने दैवी अधिकार पर आधारित राजतंत्र
    तथा कुलीनतंत्रीय एकाधिकार पर घातक प्रहार किया। 
  2. अमेरिकी स्वतंत्रता के युद्ध द्वारा इंग्लैण्ड में ‘रक्तहीन राज्यक्रांति’ द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का
    और अधिक विकास हुआ। इसने संसद, प्रतिनिधि संस्था, जनता की प्रभुसत्ता व जनतंत्र की प्रतिष्ठा
    स्थापित की, अर्थात् इसने ब्रिटिश जनंतत्र की नींव डाली। 
  3. इस युद्ध का फ्रासं पर भयानक प्रभाव पड़ा। जिन फ्रासीसी सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया
    था, वे अमेरिकी रहन-सहन व शासन पद्धति से बड़े प्रभावित हुए। अत: स्वदेश लौटने पर उन्होंने फ्रांस
    में अमेरिकी संस्थाओं जैसी व्यवस्थाओं की माँग की। इसके फलस्वरूप 1789 ई. में फ्रासीसी राज्य क्रांति
    का प्रारंभ हुआ। इस युद्ध के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गयी। इस आर्थिक स्थिति
    के कारण ही फ्रांस का दिवाला निकल गया और राज्य क्रांति का विस्फोट हुआ। 
  4. इस युद्ध के परिणामस्वरूप एग्लो- सैक्सन साम्राज्य के दो टुकड़े हो गये जिसके फलस्वरूप
    इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के बीच मनमुटाव उत्पन्न हो गया। यह मनमुटाव काफी समय तक चलता रहा। 
  5. यूरोप की राजनीति पर अमेरिकी युद्ध का बड़ा महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अमेरिकी लोगों के
    हृदय में स्वतंत्रता की जो ज्योति जागतृ हइुर् ओर उन्होने जिस प्रकार इंग्लैण्ड से स्वतंत्र होकर एक
    प्रजातंत्र की स्थापना कर ली, इसका फ्रांसीसियों के विचारों और कल्पना पर गहरा प्रभाव पड़ा। अत:
    फ्रांसीसियों ने भी एक प्रजातंत्र की कल्पना कर डाली और फलस्वरूप शीघ्र ही फ्रांस में राज्यक्रांति
    आरंभ हुई। 
  6. आयरलैण्ड पर भी अमेरिकी युद्ध की सफलता का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अमेरिका में अपनी
    पराजय से ब्रिटिश सरकार भयभीत हो गयी थी, अत: उसने आयरिश जनता की माँग पूरी कर दी। इस
    प्रकार 1800 ई. में यंगर पिट ने एक्ट ऑफ यूनियन पास कर ब्रिटिश संसद के साथ आयरिश संसद को
    मिला दिया और इस प्रकार आयरलैण्ड की समस्या का समाधान हो गया। 
  7. अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध के कारण ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक प्रशासकीय तथा
    वैधानिक सुधार किये गये। भारतवर्ष में स्थित ईस्ट इण्डिया कंपनी के कायोर्ं पर विभिन्न प्रकार के
    नियंत्रण रखे गये, जिससे कहीं भारतवर्ष भी अमेरिका की भाँति स्वतंत्रता न प्राप्त कर ले। 
  8. अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध के परिणामस्वरूप ही ब्रिटिश सरकार को कई आर्थिक समस्याओं का
    सामना भी करना पड़ा।

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