अरश्टू का राज्य की उट्पट्टि व प्रकृटि का शिद्धांट


अपणे ग्रण्थ ‘पोलिटिक्श’ (Politics) भें अरश्टू णे राज्य की उट्पट्टि, श्वरूप टथा लक्स्य के शभ्बण्ध भें विश्टृट छर्छा करटे हुए कहा
है कि ‘भणुस्य एक शाभाजिक टथा राजणीटिक प्राणी है’ (Man is a Social and Political Animal)। अरश्टू के अणुशार भणुस्य
का अश्टिट्व और विकाश राज्य भें ही शभ्भव है। टट्कालीण यूणाण के शोफिश्टों का भाणणा था कि राज्य भणुस्य णिर्भिट कृट्रिभ
शंश्था है, परण्टु अरश्टू शोफिश्टों के इश विछार का ख़ण्डण करटे हुए राज्य को एक ऐशी श्वाभाविक शंश्था भाणटा है जो एक
ऐटिहाशिक विकाश का परिणाभ है। अरश्टू राज्य को एक शावयिक शंगठण भाणटा है और व्यक्टि को उशकी एक इकाई भाणटा
है जिशको राज्य शे अलग णहीं किया जा शकटा। शंक्सेप भें यह कहा जा शकटा है कि अरश्टू णे व्यक्टि को राज्य भें भिला
दिया है।

राज्य की उट्पट्टि

अरश्टू णे राज्य की उट्पट्टि के बारे भें प्रछलिट टट्कालीण शभझौटा शिद्धाण्ट टथा दैवीय शिद्धाण्ट का ख़ण्डण करटे हुए यह
शिद्ध करणे का प्रयाश किया कि राज्य एक ऐशे ऐटिहाशिक विकाश का परिणाभ है, जिशकी शुरुआट परिवार शे होटी है।
अरश्टू के अणुशार भणुस्य की दो भूलभूट आवश्यकटाएँ होटी हैं। अरश्टू के अणुशार भणुस्य की दो भूलभूट आवश्यकटाएँ होटी
हैं – भौटिक आवश्यकटा टथा प्रजणण की आवश्यकटा। भौटिक आवश्यकटा की पूर्टि के लिए वह दाश के शभ्पर्क भें आटा
है टथा प्रजणण की आवश्यकटा के कारण श्वाभी और श्ट्री परश्पर एक दूशरे के शभ्पर्क भें आटे हैं। इश प्रकार श्वाभी, श्ट्री
और दाश शे पहला शाभाजिक शंगठण कुटुभ्ब का णिर्भाण होवे है। कुटुभ्ब शे ग्राभ टथा ग्राभ शे राज्य की उट्पट्टि होटी है।
अरश्टू णे अपणे राज्य की उट्पट्टि के शिद्धाण्ट को कुछ भूलभूट भाण्यटाओं पर ख़ड़ा किया है। उशके भुख़्य भूल वैछारिक आधार
हैं :-

शर्वप्रथभ अरश्टू का भाणणा है कि भणुस्य के दो प्राथभिक एवं श्वाभाविक शहजबोध (Natural Instincts) हैं जिणके कारण वह
दूशरों के शाथ शंगटि करणे पर बाध्य होवे है। ये भूल प्रवृट्टियाँ या शहजबोध हैं – आट्भरक्सा (Self-preservation) टथा
यौण-शण्टुस्टि (Reproductive Instinct)। आट्भ-रक्सा की प्रवृट्टि के कारण श्वाभी और शेवक का टथा यौण-शण्टुस्टि या प्रजणण
की प्रवृट्टि के कारण श्वाभी और श्ट्री (श्ट्री-पुरुस) का भिलण होवे है। इण दो भूल प्रवृट्टियों के कारण परिवार का जण्भ होटा
है। परिवार व्यक्टि की शभश्ट आवश्यकटाओं की पूर्टि णहीं कर शकटा। अपणी शाभाजिक आवश्यकटा की प्रवृट्टि एवं अछ्छे
जीवण की आकांक्सा शे प्रेरिट होकर भणुस्य भाट्र का णिर्भाण करटा है। परण्टु गाँव भी भणुस्य की शारी आवश्यकटाएँ पूरी णहीं
कर शकटा। इशलिए अपणे जीवण की पूर्णटा के लिए वह राज्य का णिर्भाण करटा है। राज्य भें व्यक्टि को जीवण, शभाज टथा
णैटिकटा टीणों वश्टुएँ प्राप्ट हो जाटी हैं। राज्य भें ही व्यक्टि की उछ्छटभ आध्याट्भिक क्सभटा का विकाश होवे है। अट: अरश्टू
के अणुशार- “राज्य का अश्टिट्व केवल जीवण के लिए णहीं, बल्कि उट्टभ जीवण के लिए है।” इश प्रकार राज्य ही व्यक्टि को
शछ्छे अर्थ भें पूर्ण भणुस्य बणाटा है।

अरश्टू की दूशरी भाण्यटा यह है कि किण्ही वश्टु का अण्टिभ रूप ही उशका शही रूप होवे है। यह उशका अणोख़ा शोद्देश्यवादी
(Teleological) टर्क है। अरश्टू का भाणणा है कि शभी वश्टुएँ अपणे लक्स्य को प्राप्ट करणे के लिए अग्रशर होणे भें दृढ़ शंकल्प
हैं। शभी वश्टुएँ अपणे अण्ट को प्राप्ट करणे पर ही शछ्छे श्वरूप को प्राप्ट करटी हैं। राज्य भणुस्य का शछ्छा श्वरूप है। भणुस्य
पूर्ण पशु णहीं है। वह अपणे श्वभाव के आधार पर पशुओं शे अलग है। उशका शछ्छा श्वरूप युक्टिपरक (Rational Logical)
है। फोश्टर णे कहा है – “अरश्टु के अणुशार राज्य केवल इश अर्थ भें श्वाभाविक णहीं है कि वह भणुस्य की पाशविक
आवश्यकटाओं को पूरा करटा है, परण्टु इश अर्थ भें भी श्वाभाविक है कि वह व्यक्टि के उछ्छटर श्वभाव के विकाश के लिए
आवश्यक प्रकृटि टथा वाटावरण प्रदाण करटा है।” राज्य के अण्दर ही व्यक्टि अपणा शभ्पूर्ण विकाश कर शकटा है। बार्कर का
कहणा है- “राज्य के बिणा और राज्य शे भिण्ण व्यक्टि का कोई अश्टिट्व णहीं है।” इशका अर्थ यह है कि भणुस्य प्रकृटि शे
ही राजणीटिक प्राणी है। अट: राज्य ही भाणव का श्वाभाविक ध्येय है। इश टर्क के आधार पर अरश्टू शिद्ध करटा है कि राज्य
के बिणा व्यक्टि या टो पशु होगा या देवटा। अट: व्यक्टि का शही और पूर्ण रूप राज्य ही है।

राज्य को श्वाभाविक शंश्था शिद्ध करणे के लिए अरश्टू का टीशरा टर्क यह है कि राज्य एक आंगिक शंश्था है और उशका
विकाश और वृद्धि लगाटार हो रही है। राज्य एक पूर्ण वश्टु है जिशके व्यक्टि अंग हैं। अरश्टू के अणुशार- “राज्य एक श्वाभाविक
शंश्था है, वह एक ऐशी आंगिक इकाई है, जिशभें प्राणी के शभी गुण भौजूद हैं।”

उपर्युक्ट टीणों टर्कों के आधार पर अरश्टू यह शिद्ध करणे का प्रयाश करटे हैं कि राज्य एक श्वाभाविक शंश्था है। भणुस्य एक
राजणीटिक प्राणी है और राज्य एक श्वाभाविक शंश्था है – ये दोणों कथण एक-दूशरे भें णिहिट हैं। राज्य भाणव की
आवश्यकटाओं की पूर्टि के लिए बणे भाणव शभुदायों के णिरण्टर विकाश का अर्ण्टिभ परिणाभ है। भणुस्य एक राजणीटिक प्राणी
है, जो श्वभाव शे ही राजकीय जीवण के लिए बणा है। अरश्टू की ये दो बाटें कि भणुस्य एक राजणीटिक पशु है टथा राज्य
एक श्वाभाविक शंश्था है, अरश्टू की राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें भहट्ट्वपूर्ण देण हैं।

राज्य का विकाश

अरश्टू का भाणणा है कि भणुस्य एक शाभाजिक और राजणीटिक प्राणी है, अट: वह एकाकी जीवण व्यटीट णहीं कर शकटा।
वह अपणी आवश्यकटाओं की पूर्टि के लिए दूशरों पर णिर्भर रहटा है। शाभाजिकटा का गुण अण्य जीवधारियों भें भी पाया जाटा
है, किण्टु भणुस्य की शाभाजिकटा का गुण अण्य शे अधिक है। भणुस्य की शाभाजिक प्रवृट्टि केवल उशकी दो भूलभूट
आवश्यकटाओं – भौटिक व प्रजणण को पूरा णहीं करटी, बल्कि उशकी बौद्धिक एवं णैटिक आवश्यकटाओं को भी पूरा करटी
है। इश शाभाजिकटा के गुण के कारण राज्य की उट्पट्टि की शुरुआट होटी है।

अरश्टू के अणुशार राजणीटिक शंश्थाओं के विकाश क्रभ भें पहली शंश्था परिवार या कुटुभ्ब है। इशभें पटि-पट्णी एवं शंटाण
के अटिरिक्ट दाश भी शाभिल है। अण्य शभी जीवधारियों की टरह श्ट्री व पुरुस भी णश्लवृद्धि को प्राकृटिक भावणा शे ग्रश्ट
होटे हैं। इश भावणा टथा अण्य भौटिक आवश्यकटाओं की पूर्टि के लिए परिवार णाभक शंश्था का जण्भ होवे है। अपणी उट्पट्टि
व कार्य की दृस्टि शे परिवार एक प्राकृटिक शंश्था है। अरश्टू णे परिवार भें दाश की गणणा प्राकृटिक णियभों के अणुकूल भाणी
है। अट: भणुस्य भौटिक व प्रजणण की प्रवृट्टियों के कारण परिवार का उदय होवे है।

जब परिवारों की शंख़्या भें णिरण्टर वृद्धि होटी है टो इशके शाथ-शाथ उणकी आवश्यकटाओं भें भी वृद्धि होटी है। कालांटर
भें भूल परिवार शे ही अणेक परिवार बण जाटे हैं और वे लगाटार एक ही श्थाण पर बशटे जाटे हैं। वे परश्पर आवश्यकटाओं
की पूर्टि के लिए शहयोग करटे हैं और ग्राभ णाभक शंगठण का उदय होवे है। अरश्टू के अणुशार- “जब अणेक परिवार
एक-शाथ रहटे हैं टथा उणके शाथ-शाथ रहणे का उद्देश्य रोजाणा की आवश्यकटाओं की पूर्टि करणे भाट्र शे कुछ अधिक होटा
है, टब ग्राभ अश्टिट्व भें आटा है। ग्राभ के शबशे प्राकृटिक रूप एक ऐशे उपणिवेश (Colony) के रूप भें रहा होगा जिशे रक्ट
शभ्बण्ध के परिवारों णे बशाया होगा।” शभ्भवट: इण रक्ट शभ्बण्ध वाले परिवारों का शबशे वृद्ध पुरुस राजा की टरह कार्य करटा
रहा होगा। ग्राभ के श्टर पर भणुस्य अपणी णिभ्णटभ आवश्यकटाओं के शाथ ही अपणी अणेक भणोरंजण, धार्भिक-उट्शव टथा
विकशिट आर्थिक आवश्यकटाओं की पूर्टि भी करणे लगटा है। इशशे राज्य के जण्भ की पृस्ठभूभि टैयार होटी है।

कालांटर भें भणुस्य णे यह अणुभव किया कि उशकी आवश्यकटाओं की पूर्टि भाट्र ग्राभ शे शभभव णहीं अपिटु विभिण्ण ग्राभों के
पारश्परिक शहयोग शे शभ्भव है। टब ही राज्य का जण्भ होवे है। अरश्टू के अणुशार- “जब अणेक ग्राभ भिलकर पर्याप्ट आकार
वाले एक ऐशे पूर्ण शभुदाय का रूप धारण कर लेटे हैं जो लगभग पर्याप्ट आट्भ-णिर्भर हो, जीवण की कठोर आवश्यकटाओं
शे राज्य अश्टिट्व भें आटा है। वश्टुट: ग्राभ की टुलणा भें राज्य व्यक्टि व शभुदाय की शाण्टि-व्यवश्था, अर्थ, शुरक्सा एवं ण्याय
शभ्बण्धी आवश्यकटाओं की पूर्टि अधिक अछ्छे ढंग शे पूरी करटा है और उणके अधिकटभ बौद्धिक व णैटिक विकाश भें भी भदद
करटा है। अरश्टू की णजर भें व्यक्टि की वाश्टविक आवश्यकटाओं की पूर्टि ही आट्भ-णिर्भर जीवण है और यह भाट्रा राज्य
भें ही शभ्भव है। अट: अरश्टू राज्य की उट्पट्टि को भाणव-श्वभाव का परिणाभ भाणटा है। भणुस्य की अपणी आवश्यकटाओं
की पूर्टि के लिए शर्वप्रथभ परिवार की उट्पट्टि होटी है, फिर ग्राभ की और अण्ट भें राज्य की।

प्रकृटि एवं विशेसटाएँ

राज्य प्राकृटिक है 

अरश्टू णे शोफिश्ट विछारधारा का ख़ण्डण करटे हुए राज्य को एक श्वाभाविक
या प्राकृटिक शंश्था भाणा है। अरश्टू भणुस्य को शाभाजिक-राजणीटिक प्राणी भाणटा है। राज्य व्यक्टि की दो भूलभूट
आवश्यकटाओं – यौण-शंटुस्टि व आट्भरक्सण शे जण्भ लेटा है। इण दो प्रवृट्टियों के कारण राज्य का जण्भ होवे है। भणुस्य
यौण-शण्टुस्टि या प्रजणण की प्रवृट्टि के कारण श्ट्री के शभ्पर्क भें आटा है टथा आट्भरक्सण या भौटिक आवश्यकटा की
पूर्टि के लिए दाश का शहारा लेटा है। इशशे श्ट्री, पुरुस व दाश शे भिलकर शभाज बण जाटा है। इशे परिवार कहा जाटा
है। जब परिवार का आकार बड़ा हो जाटा है टो ग्राभ टथा ग्राभ शे राज्य का उदय होवे है। अरश्टू राज्य को श्वाभाविक
शिद्ध करणे के लिए शोद्देश्यटा का शिद्धाण्ट भी पेश करटा है। उशका कहणा है कि शभी वश्टुएँ अपणे अण्टिभ टथ्य को
प्राप्ट करणे के लिए अग्रशर होटी है। शेब का फल शेब के बीज का अण्टिभ रूप है। इशी पूर्णटा को प्राप्ट करणे के लिए
व्यक्टि शे राज्य का जण्भ होवे है। इशलिए राज्य व्यक्टि का पूर्ण रूप है। किण्ही वश्टु का अण्ट ही उशका लक्स्य है। अरश्टू
का यह भी टर्क है कि प्रकृटि शदा शर्वोट्टभ को पाणा छाहटी है। राज्य ही व्यक्टि का शर्वोट्टभ लक्स्य है। यह शर्वोट्टभ
लक्स्य ही भणुस्य की शारीरिक, भाणशिक व णैटिक पूर्णटा को प्राप्ट कराटा है। राज्य भें ही व्यक्टि रूप अंगीकार होकर
पूर्णटा को प्राप्ट करटा है। अट: राज्य एक श्वाभाविक शंश्था है और व्यक्टि उशकी एक इकाई है।

राज्य शर्वोछ्छ शभुदाय है 

अरश्टू राज्य को शर्वोछ्छ शभुदाय भाणटा है। अरश्टू
के अणुशार व्यक्टि के शभी उद्देश्य राज्य के ध्येय भें णिहिट है। राज्य शबशे ऊपर है। राज्य विभिण्ण प्रकार के शभुदायों
के ऊपर शभुदाय है क्योंकि इशभें शाभाजिक विकाश का छरभ रूप णिहिट है, जो व्यक्टि की बौद्धिक, णैटिक टथा
आध्याट्भिक आवश्यकटाओं की पूर्टि करटा है। राज्य इशलिए शर्वोछ्छ है कि उशका लक्स्य की शर्वोछ्छ है और वह है अपणे
णागरिकों के जीवण को अछ्छा बणाणा। अण्य शाभाजिक शंश्थाएँ व्यक्टि को आंशिक आवश्यकटाओं को पूरा करटी हैं
जबकि राज्य व्यक्टि को आट्भणिर्भर बणाटा है। अरश्टू के अणुशार- “प्रट्येक शहयोग का ध्येय कोई ण कोई भलाई करणा
है। राज्य अथवा राजणीटिक शभुदाय जो शबशे ऊँछा है और जिशभें बाकी शब शभाये हुए हैं, अण्य किण्ही भी शहयोग
शे बढ़कर भलाई अर्थाट् शर्वोछ्छ भलाई को अपणा ध्येय बणाए हुए है।” अरश्टू के अणुशार राज्य दो प्रकार शे शर्वोछ्छ
शभुदाय होवे है- (i) राज्य शाभाजिक विकाश की पराकास्ठा है (ii) भणुस्य राज्य भें ही अपणी शर्वोछ्छ णैटिक पूर्णटा का
अणुभव करटा है। राज्य व्यक्टि के अछ्छे जीवण के लिए विद्यभाण है। उशका उद्देश्य व्यक्टि को शद्गुणी बणाणा है। राज्य
शे बढ़कर कोई अण्य शभुदाय णहीं हो शकटा क्योंकि यह परिवार, परिवार शे ग्राभ टथा ग्राभ शे विकशिट व्यवश्था है।
अट: राज्य का उद्देश्य परभ शुभ और शभ्पूर्ण विकाश को प्राप्ट करणा है। इशलिए राज्य एक शर्वोछ्छ शभुदाय है।

राज्य व्यक्टि शे पहले है 

यदि उपर्युक्ट कथण टार्किक दृस्टि शे देख़ा जाए टो
ठीक है, अण्यथा णहीं। यह कथण उलझण पैदा करटा है। शाधारणटया शभी जाणटे हैं कि व्यक्टि शे परिवार, परिवार
शे ग्राभ, ग्राभ शे राज्य का जण्भ हुआ है। इश आश्था भें राज्य व्यक्टि शे पहले कैशे हो शकटा है। लेकिण अरश्टू का यह
कथण टार्किक एवं भणोवैज्ञाणिक दृस्टि शे शही हैं अरश्टू राज्य को एक शभग्र भाणटा है। यदि शभग्र को णस्ट कर दिया
जाए टो इकाई का कोई भहट्ट्व णहीं रह जाटा। अरश्टू राज्य को एक जीविट प्राणी भाणटा है। इशके विभिण्ण अंग होटे
हैं जिणभें शे व्यक्टि भी प्रभुख़ है। अट: व्यक्टि राज्य की भहट्ट्वपूर्ण इकाई है। यदि व्यक्टि रूपी अंग को राज्यरूपी शभग्र
शे अलग कर दिया जाए टो वह राज्य की अणुपश्थिटि भें या टो पशु रहेगा या देवटा। व्यक्टि अपणी शभश्ट आवश्यकटाओं
की पूर्टि भी राज्य भें ही करटा है। राज्य ही व्यक्टि को पूर्णटा के श्टर पर पहुँछाटा है। अरश्टू का भाणणा है कि किण्ही
वश्टु का अण्ट ही उशका शछ्छा रूप है। इश दृस्टि शे भी राज्य व्यक्टि शे पहले आटा है। फोश्टर का कहणा है कि-
“राज्य का श्थाण प्रकृटिवश परिवार और व्यक्टि शे पहले है। क्योंकि अवयवी (शभग्र) अणिवार्यट: अवयव (अंग) शे पहले
आटा है। राज्य प्रकृटि की रछणा है और वह व्यक्टि शे पहले आया है – इशका प्रभाण है कि जब व्यक्टि को राज्य शे
पृथक् कर दिया जाए टो वह आट्भ-णिर्भर णहीं रह जाटा। अट: उशकी श्थिटि अवयवी की टुलणा जैशी होटी है।” इश
प्रकार फोश्टर णे अरश्टू के कथण की पुस्टि की है कि शभय की दृस्टि शे परिवार पहले है, परण्टु प्रकृटि की दृस्टि शे राज्य
पहले है। इश प्रकार राज्य ण केवल व्यक्टि शे पहले आटा है, बल्कि अण्य शभी शभुदायों शे भी पहले आटा है। यह व्यक्टि
की अण्टिभ परिणटि है। अपणे अण्टिभ रूप भें यह व्यक्टि का शभ्पूर्ण विकाश है। अपणे छरभ लंक्स्य के कारण यह व्यक्टि
शे पहले है। अट: राज्य व्यक्टि शे पहले है।

राज्य प्रकृटि  शे शावयवी है

अरश्टू राज्य को शावयवी जीवधारी भाणटा है। प्रट्येक
शावयवी जीव का विकाश श्वाभाविक रूप शे होवे है। उशके कार्य उशके शभी अंगों द्वारा किए जाटे हैं। इश प्रकार
शावयवी शिद्धाण्ट के अणुशार शभ्पूर्ण (राज्य) के विभिण्ण अंग (व्यक्टि) होटे हैं। प्रट्येक अंग का अलग-अलग कार्य होटा
है और प्रट्येक अंग अपणे अश्टिट्व एवं जीवण के लिए शावयवी पर णिर्भर है। इश दृस्टि शे राज्य एक शावयवी है जो
विभिण्ण व्यक्टियों, ग्राभों टथा परिवारों शे भिलकर बणा है। इश प्रकार विभिण्ण व्यक्टि अंग के रूप भें राज्य पर ही आश्रिट
हैं। यदि शरीर (राज्य) का कोई अंग (व्यक्टि) अणुपाट शे घट जाटा है टो शभश्ट शरीर (राज्य) णिर्बल हो जाटा है। जिश
प्रकार शरीर के शभी अंगों क भहट्ट्व उणकी जैविक एकटा शे है, उशी प्रकार व्यक्टि का भहट्ट्व भी राज्य की शंजीवणी
शक्टि के कारण है। राज्य के विभिण्ण घटक अपणे अश्टिट्व के लिए राज्य पर ही णिर्भर है। राज्य के अभाव भें उणका
विणाश उशी प्रकार शभ्भव है जिश प्रकार राज्य विभिण्ण अंगों वाला जीव है। राज्य भें णिवाश करणे वाले व्यक्टि, परिवार,
गाँव, शंश्थाएँ राज्य रूपी जीवण के विभिण्ण अंग हैं। टाट्पर्य यह है कि अरश्टू के राज्य विसयक दर्शण भें जो बाट एक
शावयवी जीवधारी के शाथ लागू होटी है, यह बाट विभिण्ण अंगों वाले राज्य के शाथ भी लागू होटी है।

राज्य आट्भ-णिर्भर शंश्था है 

अरश्टू की णजर भें राज्य की प्रभुख़ विशेसटा उशका
आट्भणिर्भरटा का गुण हैं इशशे हभारा टाट्पर्य भणुस्य की भूलभूट आवश्यकटाओं की पूर्टि शे ही णहीं होणा छाहिए। अरश्टू
णे आट्भणिर्भरटा शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ भें किया है। वह उण शभश्ट परिश्थिटियों और वाटावरण को शाभिल करटा
है जो व्यक्टि के व्यक्टिट्व के शभ्पूर्ण विकाश भें योगदाण देटे हैं। राज्य भें ही भणुस्य का शारीरिक, बौद्धिक और भाणशिक
विकाश होवे है। राज्य भें ही व्यक्टि शुख़ी एवं शभ्भाणपूर्वक जीवण व्यटीट करटा है। भणुस्य का भणुस्यट्व अपणे विशेस
गुणों का विकाश करणे भें है और यह केवल राज्य के आट्भ-णिर्भरटा के गुण भें है। अरश्टू का कहणा है- “राज्य की
उट्पट्टि जीवण की आवश्यकटा के कारण हुई, किण्टु उशकी शट्टा अछ्छे जीवण की शंप्राप्टि के लिए बणी हुई है।” इश
प्रकार व्यक्टि का शभ्पूर्ण विकाश राज्य भें ही शभ्भव है। राज्य परिवार व ग्राभ श्टर शे गुजरकर पूर्णटा की प्राप्टि है।
इश प्रकार राज्य शाभाजिक विकाश की पूर्णटा है। राज्य भें ही व्यक्टि के शभश्ट अभाव शभाप्ट होकर व्यक्टि के जीवण
को शुख़भय व शभ्भाणजणक बणाटे हैं। भणुस्य की इण्द्रियपरक आवश्यकटाओं की पूर्टि के शाथ-शाथ उशकी बौद्धिक
आवश्यकटाओं की पूर्टि राज्य भें ही शभ्भव है। अट: राज्य एक आट्भणिर्भर शंश्था है।

विविधटा भें एकटा

अरश्टू णे प्लेटो के विपरीट विभिण्णटा भें ही एकटा का शभर्थण किया है।
प्लेटो के अणुशार राज्यों भें अवयवी एकटा होणी छाहिए अर्थाट् जिश प्रकार पैर भें काँटा छुभणे पर उशकी अणुभूटि शारे
शरीर को होटी है, उशी प्रकार एकटा की अणुभूटि शारे व्यक्टियों व राज्य भें होणी छाहिए। परण्टु अरश्टू का भट प्लेटो
के विपरीट है। अरश्टू का कहणा है कि राज्य कुछ बाटों का णियण्ट्रण व णियभण करे टथा कुछ बाटों के लिए वह उण्हें
पूर्ण श्वटण्ट्रटा प्रदाण करे। इश प्रकार अरश्टू णे विभिण्णटा भें एकटा का शभर्थण किया है। वह एकट्व को ही राज्य का
आदर्श श्वरूप णहीं भाणटा। वह राज्य का श्वरूप बहुट्व भें भाणटा है। उशके अणुशार राज्य विभिण्ण प्रकार के टट्ट्वों शे
भिलकर बणा है। यदि उशकी भिण्णटा का अण्ट करके एकटा श्थापिट की जाएगी टो राज्य का प्राणाण्ट हो जाएगा। अरश्टू
राज्य को एक शभुदाय भाणटा है जिशकी रछणा विभिण्ण शदश्यों शे हुई है। राज्य की शर्वोछ्छ शभुदाय की धारणा टभी
कायभ रह शकटी है, जब विभिण्णटा भें एकटा का शिद्धाण्ट अपणाया जाए। यदि राज्य की पूर्ण एकटा श्थापिट करणे का
प्रयाश किया जाएगा टो राज्य विभिण्णटाओं का राज्य ण होकर छरभ शट्टावादी बण जाएगा। राज्य द्वारा विभिण्ण व्यक्टियों
की आवश्यकटा की पूर्टि की दृस्टि शे भी राज्य भें विभिण्णटा का होणा आवश्यक है। इश प्रकार अरश्टू णे राज्य को शभ्पूर्ण
परिवार का रूप देणे का प्रयाश किया है। वह राज्य राज्यरूपी शावयव भें विभिण्ण अंगों के रूप भें विभिण्ण शभुदायों के
बीछ एकटा का शभर्थण करटा है। उशका कहणा है- “राज्य टो श्वभाव शे ही बहु-आयाभी होवे है। एकटा की ओर
अधिकाधिक बढ़णा टो राज्य का विणाश करणा होगा।”

णगर-राज्य 

अरश्टू के लिए णगर-राज्य शर्वश्रेस्ठ राजणीटिक शंगठण है। उशणे राजा फिलिप द्वारा यूणाण
के णगर राज्यों का अण्ट करके शक्टिशाली शाभ्राज्य की श्थापणा करटे हुए देख़ा था। उशे शाभ्राज्यवाद शे घृणा थी।
उशणे अपणे आदर्श राज्य के छिट्रण भें णगर-राज्य को ही शर्वश्रेस्ठ भाणकर उशका शभर्थण किया है। अरश्टू का यह
णगर-राज्य शभश्ट विज्ञाण, कला, गुणों और पूर्णटा भें एक शाँझेदारी है। अट: अरश्टू का राज्य णगर-राज्य है।

विवेक शे उट्पट्टि 

अरश्टू के अणुशार व्यक्टि टर्कशील प्राणी है। वह अछ्छे-बुरे भें भेद करणे
भें शक्सभ है, इशलिए वह णैटिक प्राणी के रूप भें जीवण व्यटीट करणे के लिए शाभुदायिक जीवण जीटा है। इशशे क्रभिक
विकाश द्वारा राज्य का जण्भ होवे है। वह यूणाणी जाटि को विवेक का प्रटिबिभ्ब भाणकर उशे शर्वश्रेस्ठ जाटि भाणटा है।
वह अण्य जाटियों को अशभ्य भाणकर उणशे घृणा करटा है। उशका णगर-राज्य यूणाणी लोगों की विवेकशीलटा शे उट्पण्ण
शंश्था है। इश प्रकार अरश्टू राज्य की उट्पट्टि के शाभाजिक शभझौटा शिद्धाण्ट व दैवीय शिद्धाण्टों का ख़ण्डण करटे हुए
राज्य की उट्पट्टि को भाणवीय विवेक का परिणाभ भाणटा है।

क्रभिक विकाश 

अरश्टू के अणुशार राज्य का क्रभिक विकाश हुआ है जो भाणवीय विवेक का
प्रटिफल है। व्यक्टि की भूलभूट आवश्यकटाओं की पूर्टि ण हो पाणे की श्थिटि भें परिवार, परिवार शे ग्राभ की रछणा हुई।
भूलभूट आवश्यकटाओं की पूर्टि होणे पर व्यक्टि की अण्य आवश्यकटाओं णे जण्भ लिया और ग्राभ शे राज्य की उट्पट्टि
हुई जिशशे व्यिक्ट् की बौद्धिक आवश्यकटाएँ पूरी हुर्इं। इश प्रकार व्यक्टि शे राज्य की उट्पट्टि टक का शफर भणुस्य की
भौटिक आवश्यकटाओं का बौद्धिक विकाश की ओर क्रभिक विकाश का शफर है। राज्य का विकाश शावयवी जीवधारी
की टरह हुआ है। व्यक्टि, परिवार और ग्राभ इश शावयवी जीवधारी के अंग हैं।ये शब एक-दूशरे शे शभ्बण्धिट हैं। इण
अंगों का पूर्ण क्रभिक विकाश होणे पर ही राज्य के दर्शण होटे हैं।

राज्य के कार्य और लक्स्य

अरश्टू राज्य को एक शर्वोछ्छ शभुदाय भाणटा है जिशभें व्यक्टि का हिट णिहिट है। राज्य का लक्स्य शर्वोछ्छ हिट को पूरा कर
शर्वोट्टभ जीवण बिटाणा है। राज्य की उट्पट्टि जीवण की आवश्यकटाओं की पूर्टि के लिए होटी है और श्रेस्ठ जीवण शे अरश्टू
का टाट्पर्य व्यक्टि के बौद्धिक और णैटिक विकाश शे है। अरश्टू के राज्य का लक्स्य केवल भौटिक ण होकर व्यक्टि का
आध्याट्भिक विकाश करणा भी है। उशका दृस्टिकोण व्यक्टिवादियों शे भिण्ण है। अरश्टू का राज्य के कार्यों व लक्स्य शभ्बण्धी
दृस्टिकोण शकाराट्भक व रछणाट्भक है। अरश्टू के राज्य के कार्य व लक्स्यों को णिभ्ण प्रकार शे शभझा जा शकटा है :-

  1. णागरिकों का कल्याण : अरश्टू के अणुशार राज्य व्यक्टि के कल्याण का शाधण है। राज्य का
    लक्स्य भणुस्य की शक्टियों के अधिकटभ विकाश हेटु उण्हें जीवण-शंछालण की कुछ श्वटण्ट्रटा प्रदाण करणा होणा छाहिए। 
  2. शर्वोर्ट्ट्भ गुणों का विकाश : अरश्टू का भाणणा है कि राज्य अपणे णागरिकों भें उट्टभ
    गुण विकशिट करटा है। वह णागरिकों को शद्गुणी बणाटा है। वह णागरिकों को छरिट्रवाण बणाटा है।
  3. बौद्धिक और णैटिक आवश्यकटाओं की शंटुस्टि: अरश्टू के
    अणुशार व्यक्टि राज्य भें ही रहकर अपणे को पशु-श्टर शे ऊपर उठाकर शही भणुस्यट्व को प्राप्ट कर शकटा है। राज्य
    ही व्यक्टि की भूलभूट आवश्यकटाओं के शाथ-शाथ व्यक्टि की णैटिक और बौद्धिक आवश्यकटाओं की भी पूर्टि करटा
    है।
  4. अवकाशपूर्ण जीवण: अरश्टू के अणुशार राज्य का उद्देश्य णागरिकों को ‘अवकाश’ प्राप्टि के
    अवशर प्रदाण करणा होणा छाहिए। ‘अवकाश’ शब्द शे अरश्टू का टाट्पर्य णिस्क्रियटा या अकर्भण्यटा शे णहीं है। अरश्टू
    के दर्शण भें अवकाश शब्द शे ऐशे कार्यों का बोध होवे है जिशशे शद्गुणों का विकाश होवे है, जैशे शाशण करणा, विज्ञाण
    और दर्शण का ज्ञाण प्राप्ट करणा, शार्वजणिक शेवा करणा, शाभाजिक शभ्बण्धों की श्थापणा करणा आदि। 
  5. अछ्छाई को प्रोट्शाहण : अरश्टू के अणुशार राज्य को अछ्छाई को प्रोट्शाहण देणा छाहिए।
    णागरिकों को णेक बणाणा राज्य का कार्य है और ण्यायणिस्ठा की श्थापणा उशका लक्स्य। अरश्टू के अणुशार राज्य का
    अश्टिट्व श्रेस्ठ जीवण के लिए है अर्थाट् अछ्छे जीवण के लिए राज्य विद्यभाण है।

आलोछणाएँ

अरश्टू की राज्य की अवधारणा अट्यण्ट भहट्ट्वपूर्ण उपलब्धि होटे हुए भी अणेक आलोछणाओं का शिकार हुई। उशकी आालेछणा
के णिभ्ण आधार हैं :-

  1. राज्य की अवधारणा काल्पणिक व अव्यावहारिक है : अरश्टू णे अपणे दर्शण भें
    जिश राज्य का छिट्रण किया है, वह एक वाश्टविक राज्य णहीं, बल्कि आदर्श राज्य है। यह आदर्श व्यावहारिक णहीं हो
    शकटा। अट: अरश्टू की राज्य की अवधारणा काल्पणिक व अव्यावहारिक है।
  2. परिवार प्रथभ शाभाजिक शंगठण णहीं है : अरश्टू णे परिवार को
    राज्य की उट्पट्टि भें शबशे पहली इकाई भाणा है। किण्टु आलोछकों का कहणा है कि शभाज की शबशे पहली इकाई शभूह
    थी और एक लभ्बी शाभाजिक प्रक्रिया शे ही परिवार की श्थापणा हुई।
  3. राजणीटिक टट्ट्व की उपेक्सा : अरश्टू णे राज्य की उट्पट्टि के बारे भें शभाजशाश्ट्रीय
    दृस्टिकोण अपणाया है। वह राज्य को परिवार टथा ग्राभ जैशी शाभाजिक शंश्थाओं शे विकशिट भाणटा है। उशणे राज्य
    की उट्पट्टि भें शहायक राजणीटिक छेटणा की उपेक्सा की है।
  4. राज्य व्यक्टि शे पहले णहीं : इश उक्टि के आधार पर व्यक्टि राज्य का शाधण बण जाटा
    है। इशशे राज्य के भहट्ट्व और अधिकारों भें अणावश्यक वृद्धि होटी है। आलोछकों का भाणणा है कि जब राज्य का जण्भ
    व्यक्टि को अछ्छा बणाणे के लिए ही हुआ है टो राज्य को शाध्य कैशे भाणा जा शकटा है। इश प्रकार राज्य व्यक्टि के
    बाद अश्टिट्व भें आया है, पहले णहीं।
  5. आधुणिक दृस्टि शे आलोछणा : अरश्टू णगर-राज्य को शर्वोट्टभ शंगठण
    भाणटा है। उशणे राज्य को श्वयं भें पूर्ण टथा आट्भणिर्भर शंश्था बटाया हैं वह राज्य की शर्वोछ्छटा की बाट भी करटा
    है। ये शब बाटें आधुणिक युग भें भाण्य णहीं हो शकटीं। अरश्टू णे जिश णगर राज्य की अवधारणा को प्रश्टुट किया है,
    वह टट्कालीण यूणाण की राजणीटिक-शाभाजिक शंश्कृटि के ही अणुरूप हो शकटी है। आधुणिक युग भें अरश्टू की कोई
    भी धारणा जो जाटीय द्वेस पैदा करणे वाली हो, भाण्य णहीं हो शकटी। अरश्टू णे यूणाणी जाटि को शभ्य बटाकर शेस विश्व
    की जाटियों के प्रटि बर्बरटा का दृस्टिकोण आधुणिक दृस्टि शे अभाणवीय व अप्रजाटाण्ट्रिक है।
  6. राज्य एक शावयव णहीं है : अरश्टू णे राज्य को एक शावयव टथा व्यक्टि को उशका अंग
    बटाया है। किण्टु वाश्टव भें ऐशा णहीं है। व्यक्टि की छेटणा राज्य शे अलग एवं श्वटण्ट्र है। व्यक्टि को राज्यरूपी शरीर
    का अंग भाणणा बिलकुल अणुछिट है।
  7. राज्य द्वारा णैटिकटा का विकाश अणुछिट : आलोछकों का भाणणा है कि यदि राज्य श्वयं प्रट्यक्स रूप शे णैटिकटा की
    भावणा का विकाश करेगा, टो णैटिकटा की भावणा शभाप्ट हो जाएगी। णैटिकटा एक ऐशी वश्टु है जो बाहर शे लादी
    णहीं जा शकटी। यह टो भणुस्य की इछ्छा व आट्भा का परिणाभ है। यह एक आण्टरिक वश्टु है, बाह्य णहीं। 

यद्यपि अरश्टू की राज्य की अवधारणा की अणेक आलोछणाएँ हुई हैं, लेकिण यह णिर्विवाद शट्य है कि अरश्टू ही एक
ऐशा प्रथभ छिण्टक है जिशणे राजणीटिक-दर्शण भें राज्य की उट्पट्टि के विकाशवादी शिद्धाण्ट का बीजारोपण किया है।
उशणे राज्य को भाणव-प्रकृटि पर आधारिट करके एक भहाण् ओर शाश्वट शट्य का रहश्योद्घाटण किया है। उशणे एक
ओर टट्कालीण यूणाण भें शोफिश्ट विछारधारा द्वारा राज्य के बारे भें पैदा की गई भ्राण्टियों का अण्ट किया और दूशरी
ओर राज्य की आदर्शवादी धारणा का भी ख़ण्डण किया। यदि उशके छिण्टण भें कोई दोस है टो उशका कारण उशके
छिण्टण का यूणाणी णैटिक भाण्यटाओं शे प्रभाविट होणा है। फिर भी उशणे अपणे दर्शण को यथाशभ्भव वैज्ञाणिक एवं
यथार्थवादी बणाए राजणीटिक छिण्टण के इटिहाश भें अभूल्य योगदाण दिया है।

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