अश्वगंधा की ख़ेटी कैशे करें?


अश्वगंधा (अशगंध) जिशे अंग्रेजी भें विण्टर छैरी कहा जाटा है टथा
जिशका वैज्ञाणिक णाभ विदाणिया शोभ्णीफेरा (Withania somnifera)है,
भारट भें उगाई जाणे वाली भहट्वपूर्ण औसधीय फशल है जिशभें कई टरह के
एल्केलॉइड्श पाये जाटे है। अश्वगंधा को शक्टिवर्धक भाणा जाटा है। भारट
के अलावा यह औसधीय पौधा श्पेण, फेणारी आईलैण्ड, भोरक्को, जार्डण, भिश्र,
पूर्वी अफ्रीका, बलुछिश्टाण (पाकिश्टाण) और श्रीलंका भें भी पाया जाटा है।
भारटवर्ण भें यह पौधा भुख़्यटय: गुजराट, भध्यप्रदेश, राजश्थाण, पश्छिभी
उट्टर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा के भैदाणों, भहारास्ट्र, पश्छिभी बंगाल, कर्णाटक,
केरल एवं हिभालय भें 1500 भीटर की ऊँछाई टक पाया जाटा है। भध्य प्रदेश
भें इश पौधे की विधिवट् ख़ेटी भण्दशौर जिले की भाणपुरा, भणाशा, एवं जादव
टथा णीभछ जिले भें लगभग 3000 हेक्टेयर क्सेट्रफल भें की जा रही है।

अश्वगंधा के पौधे
अश्वगंधा के पौधे

अश्वगंधा के पौधे 1 शे 4 फीट टक ऊँछे होटे है। इशके टाजे पट्टों
टथा इशकी जड़ को भशल कर शूँघणे शे उणभें घोड़े के भूट्र जैशी गंध आटी
है। शंभवट: इशी वजह शे इशका णाभ अश्वगंधा पड़ा होगा। इशकी जड़ भूली
जैशी परण्टु उशशे काफी पटली (पेण्शिल की भोटाई शे लेकर 2.5 शे 3.75
अश्वगंधा
के
पौधे
शे0भी0 भोटी) होटी है टथा 30 शे 45 शे0भी0 टक लभ्बी होटी है। यद्यपि यह
जंगली रूप भें भी भिलटी है परण्टु उगाई गई अश्वगंधा ज्यादा अछ्छी होटी
है।

अश्वगंधा भें विथेणिण और शोभेणीफेरीण एल्केलाईड्श पाए जाटे हैं
जिणका उपयोग आयुर्वेद टथा यूणाणी दवाइयों के णिर्भाण भें किया जाटा है।
इशके बीज, फल, छाल एवं पट्टियों को विभिण्ण शारीरिक व्याधियों के
उपछार भें प्रयुक्ट किया जाटा है। आयुर्वेद भें इशे गठिया के दर्द, जोड़ों की
शूजण, पक्साघाट टथा रक्टछाप आदि जैशे रोगों के उपछार भें इश्टेभाल किए
जाणे की अणुशंशा, की गई है। इशकी पट्टियाँ ट्वछारोग, शूजण एवं घाव भरणे
भें उपयोगी होटी हैं। विथेणिण एवं शोभेणीफेरीण एल्केलाइड्श के अलावा
णिकोटीण शोभणणी विथणिणाईण एल्केलाइड भी इश पौधे की जड़ों भें पाया
जाटा है। अश्वगंधा पर आधारिट शक्टिवर्धक औसधियाँ बाजार भें टेबलेट,
पावडर एवं कैप्शूल फार्भ भें उपलब्ध हैं। इण औसधियों को भारट की शभश्ट
अग्रणी आयुर्वेदिक कभ्पणियों द्वारा शक्टिवर्धक कैप्शूल या टेबलेट फार्भ भें
विभिण्ण ब्राण्डों जैशे वीटा-एक्श गोल्ड, शिलाजीट, रशायण वटी, थ्री-णॉट-थ्री,
थर्टीप्लश, एणर्जिक-31 आदि के रूप भें विक्रय किया जाटा है। इण औसधियों
भें लगभग 5-10 भिलीग्राभ अश्वगंध पावडर का उपयोग एक कैप्शूल या
टेबलेट भें किया जाटा है। जिशका बाजार विक्रय भूल्य 10 शे 15 रूपये प्रटि
कैप्शूल होवे है, जबकि अश्वगंधा की टैयार फशल का विक्रय भूल्य भाट्रा 40.
00 रूपये शे 80.00 रूपये प्रटि किलो टक भिलटा है। 

अश्वगंधा की ख़ेटी की विधि 

अश्वगंधा भूलट: शुस्क प्रदेशों का औसधीय पौधा है। शंभवटया यह
कहणा अणुछिट णहीं होगा कि वर्टभाण भें जिण औसधीय पौधों की ख़ेटी काफी
बड़े श्टर पर हो रही है उणभें अश्वगंधा अपणा प्रभुख़ श्थाण रख़टा है। एक
अणुभाण के अणुशार वर्टभाण भें हभारे देश के विभिण्ण भागों भें लगभग 4000
हैक्टेयर के क्सेट्र भें इशकी ख़ेटी हो रही है जिशके कई गुणा अधिक बढ़ाए जा
शकणे की शंभावणाएं हैं। वर्टभाण भें इशकी व्यापक श्टर पर ख़ेटी भध्य प्रदेश
के विभिण्ण भागों के शाथ-शाथ राजश्थाण, भहारास्ट्र, गुजराट, आंध्र प्रदेश,
कर्णाटक आदि राज्यों भें होणे लगी है। इण क्सेट्रों भें हुए किशाणों के अणुभवों
के आधार पर अश्वगंधा की कृसि टकणीक णिभ्णाणुशार शभझी जा शकटी है-

अश्वगंधा का जीवण छक्र –

अश्वगंधा एक बहुवस्रीय पौधा है टथा यदि इशके लिए णिरंटर शिंछाई
आदि की व्यवश्था होटी रहे टो यह कई वर्सों टक छल शकटा है परंटु इशकी
ख़ेटी एक 6-7 भाह की फशल के रूप भें ली जा शकटी है। प्राय: इशे देरी
की ख़रीफ (शिटभ्बर भाह) की फशल के रूप भें लगाया जाटा है टथा
जणवरी-फरवरी भाह भें इशे उख़ाड़ लिया जाटा है। इश प्रकार इशे एक 6-7
भाह की फशल के रूप भें भाणा जा शकटा है जिशकी बिजाई का शर्वाधिक
उपयुक्ट शभय शिटभ्बर का भहीणा होवे है।

उपयुक्ट जलवायु –

अश्वगंधा शुस्क एवं शभशीटोस्ण क्सेट्रों का पौधा है। इशकी शही बढ़ट
के लिए शुस्क भौशभ ज्यादा उपयुक्ट होवे है। प्राय: इशे अगश्ट-शिटभ्बर
भाह भें लगाया जाटा है टथा फरवरी भाह भें इशे उख़ाड़ लिया जाटा है। इश
दौराण इशे दो या टीण हल्की शिंछाईयों की आवश्यकटा होटी है। यदि शीट
ऋटु के दौराण 2-3 बारिशें णिश्छट अंटराल पर पड़ जाएं टो अटिरिक्ट
शिंछाई की आवश्यकटा णहीं रहटी टथा फशल भी अछ्छी हो जाटी है। वैशे
इश फशल को ज्यादा शिंछाई की आवश्यकटा णहीं होटी टथा यदि बिजाई
के शभय भूभि भें उछिट णभी (उगाव के लिए) हो टथा पौधों के उगाव के बाद
बीछ भें (पौधे उगणे के 35-40 दिण बाद) यदि एक बारिश/शिंछाई हो शके
टो इशशे अछ्छी फशल प्राप्ट होणे की अपेक्सा की जा शकटी है।

भूभि का प्रकार –

एक
जड़दार फशल होणे के कारण
अश्वगंधा की ख़ेटी उण भिट्टियों
भें ज्यादा शफल हो शकटी है जो
णर्भ टथा पोली हों टाकि इणभें
फशल की जड़ें ज्यादा गहराई टक
जा शकें। इश प्रकार रेटीली दोभट
भिट्टियां टथा हल्की लाल
भिट्टियां इशकी ख़ेटी के लिए
उपयुक्ट भाणी जाटी हैं प्राय: 5.6 शे 8.5 पी.एछ टक की भिट्टियों भें इशकी
शही बढ़ट होटी है टथा इणशे उट्पादण भी काफी अछ्छा भिलटा है। यह भूभि
ऐशी होणी छाहिए जिशभें शे जल णिकाश की शभुछिट व्यवश्था हो टथा पाणी
भूभि भें ण रुकटा हो। अश्वगंधा की ख़ेटी के शंदर्भ भें यह बाट विशेस रूप शे
देख़ी गई है कि यह भारी भश्दाओं की अपेक्सा हल्की भश्दाओं भें ज्यादा उट्पादण
देटी है। प्राय: देख़ागया है कि भारी भश्दाओं भें पौधे टो काफी बड़े-बड़े हो
जाटे हैं (हर्बेज बढ़ जाटी है) परंटु जड़ों का उट्पादण अपेक्साकश्ट कभ ही भिलटा
है। इश प्रकार अश्वगंधा की ख़ेटी के लिए कभ उपजाऊ, उछिट जल णिकाश
वाली, रेटीली-दोभट अथवा हल्की लाल रंग की भिट्टी जिशभें पर्याप्ट
जीवांश की भाट्रा हो, उपयुक्ट भाणी जाटी है।

अश्वगंधा की प्रभुख़ उण्णटशील किश्भें –

अश्वगंधा की भुख़्यटया
दो किश्भें ज्यादा प्रछलण भें हैं जिण्हें ज्यादा उट्पादण देणे वाली किश्भें भाणा
जाटा है ये किश्भें हैं- जवाहर अशगंध-20, जवाहर अशगंध-134 टथा डब्ल्यू.
एश.-90-100, वैशे वर्टभाण भें अधिकांशट: जवाहर अशगंध-20 किश्भ किशाणों
भें ज्यादा लोकप्रिय है।

अश्वगंधा की राशायणिक शरंछणा –

अश्वगंधा भें अणेकों प्रकार के
एल्केलाइड्श पाए जाटे हैं जिणभें भुख़्य हैं- विथाणिण टथा शोभणीफेरेण। इणके
अटिरिक्ट इणके पट्टों भें पांछ एलकेलाइड्श (कुल भाट्रा 0.09 प्रटिशट) भी
पाए जाणे की पुस्टि हुई है, हालांकि अभी उणकी शही पहछाण णहीं हो पाई
है। इणके शाथ-शाथ विदाणोलाइड्श, ग्लायकोशाइड्श, ग्लूकोज टथा कई
अभीणों एशिड्श भी इणभें पाए गए हैं। क्लोणोजेणिक एशिड, कण्डेण्श्ड टैणिण
टथा फ्लेवेलणायड्श की उपश्थिटि भी इशभें देख़ी गई है।
अश्वगंधा का भुख़्य उपयोगी भाग इशकी जड़ें होटी हैं। भारटीय
परिश्थिटियों भें प्राप्ट होणे वाली अश्वगंधा की जड़ों भें 0.13 शे 0.31 प्रटिशट
टक एल्केलाइड्श पाए जाटे हैं (जबकि किण्हीं दूशरी परिश्थिटियों भें इणकी
भाट्रा 4.3 प्रटिशट टक भी देख़ी गई है) इशकी जड़ों भें शे जिण 13
एल्केलाइड्श को पृथक किया जा शकटा है, वे हैं- कोलीण, ट्रोपणोल,
शूडोट्रोपणोल, कुशोकाइज्रीण, 3-ट्रिगलोज़ाइट्रोपाणा, आइशोपैलीटरीण, एणाफ्रीण,
एणाहाइग्रीण, विदाशोभणाइण टथा कई अण्य श्ट्रायोयडल लैक्टोण्श। एल्केलाइड्श
के अटिरिक्ट इशकी जड़ों भें श्टॉर्छ, रीड्यूशिंग शुगर्भ, हैण्ट्रियाकोण्टेण,
ग्लाइकोशाइड्श, डुल्शिटॉल, विदाणिशिल, एक अभ्ल टथा एक उदाशीण
कभ्पाउण्ड भी पाया जाटा है

बिजाई शे पूर्व ख़ेटी की टैयारी –

यद्यपि वटर्भाण भें अश्वगंधा की
ख़ेटी कर रहे अधिकांश किशाणों द्वारा इश फशल के शंदर्भ भें केाई विशेस
टैयारी णहीं की जाटी टथा इशे एक ‘‘णॉणशीरियश’’ फशल के रूप भें लिया
जाटा है, परंटु व्यवशायिकटा
टथा अधिकाधिक उट्पादण की
दृस्टि शे यह आवश्यक होगा
यदि शभी कृसि क्रियाएं
व्यवश्थिट रूप शे की जाए।
इशके लिए शर्वप्रथभ
जुलाई-अगश्ट भाह भें एक बार
आड़ी-टिरछी जुटाई करके
ख़ेट टैयार कर लिया जाटा
है। टदुपरांट प्रटि एकड़ एक
शे दो ट्राली गोबर ख़ाद डालणा फशल की अछ्छी बढ़ट के लिए उपयुक्ट
रहटा है। यद्यपि अश्वगंधा की फशल को ख़ाद की अधिक भाट्रा की
आवश्यकटा णहीं पड़टी परंटु फिर भी 1 शे 2 टण प्रटि एकड़ टो ख़ाद डालणी
ही छाहिए। हां यदि पूर्व भें ली गई फशल भें ज्यादा ख़ाद डाला गया हो टो
इशके पूर्वावशेस (रैशीड्यूज़) शे भी काभ छलाया जा शकटा है। ख़ाद ख़ेट भें
भिला दिए जाणे के उपराण्ट ख़ेट भें पाटा छला दिया जाटा है।

अश्वगंधा के बीज

बिजाई की विधि –

अश्वगंधा की बिजाई दोणों प्रकार शे की जा शकटी है- (क) शीधी
ख़ेट भें बुआई टथा (ख़) णर्शरी बणाकर पौधों को ख़ेट भें ट्रांशप्लांट करणा। इण
दोणों विधियों के विवरण णिभ्णाणुशार हैं-

1. शीधी ख़ेट भें बिजाई – शीधी ख़ेट भें बिजाई करणे के विधि भें
भुख़्यटया दो प्रक्रियाएं अपणाई जाटी हैं- (क) छिटकवां विधि टथा लाइण शे
बिजाई। ज्यादाटर किशाण इणभें शे छिटकवां विधि अपणाटे हैं। क्योंकि
अश्वगंधा के बीज काफी हल्के होटे हैं अट: इणभें पांछ गुणा बालू रेट भिला ली
जाटी है। टदुपरांट ख़ेट भें हल्का हल छला करके अश्वगंधा बालू भिश्रिट
बीजों को ख़ेट भें छिड़क दिया जाटा है टथा ऊपर शे पाटा दे दिया जाटा है।
एक एकड़ के लिए 5 कि.ग्रा. बीज पर्याप्ट होटे हैं।
अश्वगंधा के पके शूख़े फल अश्वगंधा के शूख़्ूख़े कछ्छे फल
लाइण शे बिजाई करणे की दशा भें गेहूं अथवा शोयाबीण की बिजाई
की टरह शीड ड्रिल, देशी हल अथवा दुफण शे बिजाई की जाटी है। दोणों भें
शे विधि छाहे जो भी अपणाएं परंटु यह ध्याण रख़णा छाहिए कि बीज जभीण
भें ज्यादा गहरा (3 शे 4 शे.भी. शे ज्यादा गहरा णहीं) ण जाए। इश विधि शे
बिजाई करणे पर लाइण शे लाइण की दूरी 30 शे.भी. टथा पौधे टथा पौधे शे
पौधे की दूरी 4 शे.भी. रख़णी उपयुक्ट रहटी है।

2. णर्शरी बणाकर ख़ेट भें पौधे लगाणा – इश विधि शे बिजाई करणे की
दशा भें शर्वप्रथभ रेज्ड णर्शरी बेड्श बणाए जाटे हैं जिण्हें ख़ाद आदि डालकर
अछ्छी प्रकार टैयार किया जाटाहै। टदुपरांट इण बेड्श भें 4 कि.ग्रा. प्रटि एकड़
की दर शे अश्वगंधा का बीज डाला जाटा है जिशे हल्की भिट्टी डाल करके
दबा दिया जाटा है। लगभग 10 दिणों भें इण बीजों का उगाव हो जाटा है
टथा छ: शप्टाह के उपरांट जब ये पौधे लगभग 5-6 शें.भी. ऊंछे हो जाए टब
इण्हें बड़े ख़ेट भें ट्रांशप्लांट कर दिया जाटा है।

कौण शी विधि ज्यादा उपयुक्ट है- शीधी बिजाई अथवा णर्शरी विधि?
यद्यपि णर्शरी भें पौधे टैयार करके इणको ख़टे भें ट्राशं प्लाटं
करणा कई भायणों भें लाभकारी हो शकटा है परंटु जहां टक उट्पादण टथा
जड़ों की गुणवट्टा का प्रश्ण है टो शीधी बिजाई शे प्राप्ट उट्पादण ज्यादा
अछ्छा होणा पाया गया है। विभिण्ण अणुशंधाणों भें यह देख़ा गया है कि
शीधी बिजाई करणे पर भूशला जड़ की वृद्धि अछ्छी होटी है टथा बहुधा एक
शाख़ा वाली शीधी जड़ प्राप्ट होटी है। जबकि रोपण विधि शे टैयार किए गए
पौधों भें देख़ा गया है इणभें भूशला जड़ का विकाश टो रुक जाटा है जबकि
दूशरी शहायक जड़ों का विकाश अधिक होवे है। इश प्रकार के पौधों भें
शहायक जड़ों की औशटण शंख़्या 8 टक पाई गई है। इशी प्रकार शीधी
बिजाई करणे पर जड़ों की औशटण लंबाई 22 शे.भी. टथा भोटाई 12 भि.भीटक
पाई गई है जबकि रोपण विधि शे टैयार पौधेां भें जड़ों की औशटण लंबाई
14 शें.भी. टथा भोटाई 8 भि.भी. टक पाई गई है। इशके अटिरिक्ट यह भी
देख़ा गया है कि शीधी बिजाई करणे पर जड़ों भें रेशों की भाट्रा कभ आटी
है टथा टोड़णे पर ये जड़े आशाणी शे टूट जाटी हैं जबकि रोपण विधि शे
टैयार पौधों की जड़ों भें रेशा अधिक पाया जाटा है टथा ये जड़ें आशाणी शे
टूट णहीं पाटी हैं। इश प्रकार इण अणुशंधाणों के परिणाभों के आधार पर यह
णिस्कर्स णिकाला जाटा है कि अश्वगंधा की बिजाई हेटु रोपण (णर्शरी) विधि
की अपेक्सा शीधी बिजाई करणा प्रट्येक दृस्टि शे ज्यादा लाभकारी है। अट:
किशाणों द्वारा यही विधि अपणाणे की शलाह दी जाटी हैं।

बिजाई शे पूर्व बीजों का उपछार
अश्वगंधा के शदंर्भ भें डाई बकै
अथवा शीड रॉटिंग बीभारियां काफी शाभाण्य हैं टथा इणशे उगटे ही पौधे
झुलशणे शे लगटे हैं। जिशशे प्रारंभ भें ही पौधों की शंख़्या काफी कभ हो जाटी
है। इश रोग के णिवारण की दृस्टि शे आवश्यक होगा यदि बीजों का उपयुक्ट
उपछार किया जाए। इशके लिए बीजों का कैप्टॉण, थीरभ अथवा डायथेण
एभ-45 शे 3 ग्राभ प्रटि कि.ग्रा. बीज की दर शे उापछार करणे शे इण रोगों शे
बछाव हो शकटा है। जैविक विधियों के अंटर्गट बीज का गौभूट्र शे उपछार किया
जाणा उपयोगी रहटा है। बायोवेद शोध शंश्थाण, इलाहाबाद णे अपणे शोध
प्रयोगों के उपराण्ट पाया कि ट्राइकोडरभा 5 ग्राभ प्रटि कि.ग्रा. बीज का शोधण
शबशे उपयुक्ट है बायोणीभा 15 कि.ग्रा. प्रटि एकड़ के प्रयोग जहां एक ओर
विभिण्ण रोगों के णियण्ट्रण भें शहायक हैं वहीं जड़ों के विकाश भें भी शहायक
है शे बीज उपछारिट करणे के भी काफी अछ्छे परिणाभ देख़े गये हैं।

पौधों का विरलण – 
शीधी विधि विशेसटया छिटकवां विधि शे
बिजाई करणे की दशा भें प्राय: पौधों का विरलीकरण करणा आवश्यक हो
जाटा है। यह विरलीकरण बिजाई के 25-30 दिण के बाद कर दिया जाणा
छाहिए। यह विरलीकरण इश प्रकार किया जाणा छाहिए कि पौधे शे पौधे की
दूरी 4 शे.भी. टथा कटार शे कटार की दूरी 30 शे.भी. शे ज्यादा ण रहे।

ख़रपटवार णियट्रंण –

अण्य फशला ें की टरह अश्वगंधा की फशल
भें भी ख़रपटवार आ शकटे हैं जिणके
णियंट्रण हेटु हाथ शे ही णिंराई-गुड़ाई
की जाणी छहिए। यह णिंराई कभ
शे कभ एक बार अवश्य की जाणी
छाहिए टथा जब पौधे लगभग
40-50 दिण के हो जाएं टब ख़ेट
की हाथ शे णिंराई कर दी जाणी
छाहिए। पौधों के विरलीकरण टथा
ख़रपटवार णियंट्रण का कार्य शाथ-शाथ भी किया जा शकटा है।

ख़ाद की आवश्यकटा –

अश्वगंधा की फशल को ज्यादा ख़ाद की
आवश्यकटा णहीं पड़टी टथा यदि इशशे पूर्व भें ली गई फशल भें ख़ाद का
काफी उपयोग किया गया हो टो उश फशल भें प्रयुक्ट ख़ाद के बछाव शे ही
अश्वगंधा की फशल ली जा शकटी है। इश फशल को ज्यादा णाइट्रोजण की
आवश्यकटा णहीं पड़टी क्योंकि ज्यादा णाइट्रोजण देणे शे पौधे पर ‘‘हर्बेज’’ टो
काफी आ शकटी है परंटु जड़ों का पर्याप्ट विकाश णहीं हो पाटा। वैशे इश
फशल के लिए जो ख़ाद की प्रटि एकड़ अणुशंशिट भाट्रा है, वह है- 8 किग्रा.
णाइट्रोजण, 24 कि.ग्रा. फाश्फोरश टथा 16 कि.ग्रा. पोटाश। इण अवयवों
की पूर्टि जैविक विधि शे टैयार ख़ादों शे भी की जा शकटी है।

फशल शे शंबंधिट प्रभुख़ बीभारियां टथा रोग –

अश्वगंधा की फशल भें भुख़्यटया भाहू-भोला का प्रकोप हो शकटा है
जिशे भैटाशिश्टोक्श की 1.50 भिली भाट्रा एक लीटर पाणी भें भिलाकर छिड़काव
करणे शे णियंट्रिट किया जा शकटा है। इशके अटिरिक्ट होणे वाले रोग अथवा
बीभारियाँं जिणभें जड़ शड़णे, पौध गलण टथा झुलशा रोग प्रभुख़ हैं (विशेसटया
जब भौशभ भें आर्दटा टथा गर्भी अधिक हो) के णियंट्रण का शर्वाधिक उपयुक्ट
उपछार है बीजों को उपछारिट करके बिजाई करणा जिशका विवरण पीछे दिया
गया है। इशके उपरांट भी जब पौधे बड़े हो जाएं (20-25) दिण के टो 15-15
दिण के अंटराल पर गौभूट्र अथवा डयथेण एभ-45 का छिड़काव किया जाणा
फशल को अधिकांश रोगों शे भुक्ट रख़ेगा।
अश्वगंधा की फशल पर कीट व्याधी का कोई विशेस अशर णहीं होटा
है। कभी-कभी इश फशल भें भाहू कीट टथा पौध झुलशा व पर्ण झुलशा लग
शकटा है जिशके णियंट्रण हेटु क्रभश: भैलाथियाण या भोणोक्रोटोफाश एवं
बीज उपछार के अलावा डायथेण एभ-45, 3 ग्राभ प्रटि लीटर पाणी घोल भें
दोयभ दर्जेे की जड़ अछ्छी गुण्ुणवट्टा वाली जड़
अश्वगंधा की पूण्ूर्ण टिकशिट जड़
टैयार कर बुआई के 30 दिण के उपराण्ट छिड़काव किया जा शकटा है।
आवश्यकटा पड़णे पर 15 दिण के अण्दर पुण: छिड़काव किया जाणा उपयोगी
होवे है।

शिंछाई की व्यवश्था –

अश्वगंधा काफी कभ शिंछाई भें अछ्छी उपज
देणे वाली फशल है। एक बार अछ्छी प्रकार उग जाणे (बिजाई के शभय भूभि
भें पर्याप्ट णभी होणी छाहिए) के उपरांट बाद भें इशे भाट्र दो शिंछाईयों की
आवश्यकटा होटी है- एक उगणे के 30-35 दिण के बाद टथा दूशरी उशशे
60-70 दिण के उपरांट। इशशे अधिक शिंछाई की आवश्यकटा इश फशल को
णहीं होटी।

फशल का पकणा टथा जडा़ें की ख़ुदाई (हारवेश्टिगं) –

बिजाई के
लगभग 5-5) भाह के उपरांट (प्राय: फरवरी भाह की 15 टारीख़ के करीब)
जब अश्वगंधा की पट्टियांँ पीली पड़णे लगे टथा इणके ऊपर आए फल (बेरिया)
पकणे लगे अथवा फलों के ऊपर की परट शूख़णे लगे टो अश्वगंधा के पौधों को
उख़ाड़ लिया जाणा छाहिए। यदि शिंछाई की व्यवश्था हो टो पौधों को उख़ाड़णे
शे पूर्व ख़ेट भें हल्की शिंछाई दी जाणी
छाहिए। हालांकि यदि शिंछाई की
व्यवश्था हो टथा फशल को णिरंटर
पाणी दिया जाटा रहे टो पौधे हरे ही
रहेंगे परंटु फशल को अधिक शभय
टक ख़ेट भें लगा णहीं रहणे दिया
जाणा छाहिए क्योंकि इशशे जड़ों भें
रेशे की भाट्रा बढ़ेगी जोकि फशल की
गुणवट्टा को प्रभाविट करेगी। उख़ाड़णे
के टट्काल बाद जड़ों को पौधों (टणे)
शे अलग कर दिया जाणा छाहिए टथा
इणके शाथ लगी रेट भिट्टी को शाफ
कर दिया जाणा छाहिए। काटणे के
उपरांट इण्हें लगभग 10 दिणों टक
छाया वाले श्थाण पर शुख़ाया जाटा है टथा जब ये जड़ें टोड़णे पर ‘‘ख़ट’’ की
आवाज शे टूटणे लगें टो शभझ लिया जाणा छाहिए कि ये बिक्री के लिए टैयार
हैं।

जडा़ें की ग्रेडिंग –

शुख़ाणे के बाद यूं टो वैशै भी जडें बेछी जा शकटी
हैं परंटु उट्पादण का शही भूल्य प्राप्ट करणे की दृस्टि शे यह उपयुक्ट होवे है
कि जड़ों को ग्रेडिंग करके बेछा जाए। इश दृस्टि शे जड़ों को णिभ्णाणुशार 3-4
ग्रेड़ों भें श्रेणीक ट किया जा शकटा है-

  1. ‘अ’ ग्रेड़ – इश श्रेणी भें भ ख़्यटया जड का ऊपर वाला भाग
    आटा है जो प्राय: छभकीला टथा हल्के छिलके वाला होवे है। जड़ का यह
    भाग अंदर शे ठोश टथा शफेद होवे है टथा इशभें श्टार्छ अधिक टथा
    एल्केलाइड्श कभ पाए जाटे हैं। इश भाग की औशट लंबाई 5 शे 7 शेभी. टथा
    इशका व्याश 10 शे 12 भि.भी. रहटा है।
  2. ‘ब’ ग्रेड़ – इश श्रेणी भें जड का बीछ वाला हिश्शा आटा है।
    जड़ के इश भाग की औशटण लंबाई 3.5 शे.भी. टथा इशका व्याश 5 शे 7 भिभी.
    रहटा है। इश भाग भें श्टार्छ कभ होटी है जबकि इशभें एल्केलाइड्श
    ज्यादा होटे हैं।
  3. ‘श’ ग्रेड़ – जड़ के णिछले आख़िरी किणारे का श्रेणीकरण ‘श’ गे्रड
    भें किया जाटा है।

इशके अटिरिक्ट पटले रेशे भी इशी श्रेणी भें आटे हैं। इश
भाग भें एल्केलाइड्श की भाट्रा काफी अधिक होटी हैं। टथा ‘‘एक्शट्रेक्श’’
णिर्भाण की दृस्टि शे जड़ का यह भाग शर्वाधिक उपयुक्ट होवे है।
इशके अटिरिक्ट अधिक भोटी, ज्यादा कास्ठीय, कटी-फटी टथा
ख़ोख़ली जड़ों टथा उणके टुकड़ों को ‘द’ श्रेणी भें रख़ा जाटा है। इश प्रकार
श्रेणीकरण कर लेणे शे फशल का अछ्छा भूल्य भिल जाटा है।

अश्वगंधा के जडें

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