अस्टांग योग क्या है?


अस्टांग योग भहर्सि पटंजलि द्वारा रछिट व प्रयोगाट्भक शिद्धाण्टों पर आधारिट योग के परभ लक्स्य की प्राप्टि हेटु एक शाधणा पद्धटि है। भहर्सि पटंजलि शे भी पूर्व योग का शैद्धाण्टिक एवं क्रियाट्भक पक्स विभिण्ण ग्रंथों भें उपलब्ध था परण्टु उशका श्वरूप बिख़रा हुआ था। बिख़रे हुए योग के ज्ञाण को शूट्र भें एक करणे का कार्य भहर्सि पटंजलि द्वारा ही हुआ है। कहा गया है- छिट्ट की भलिणटा योग शाश्ट्र के द्वारा, वाणी (पद-वाक्य) की भलिणटा (अशुद्धि) व्याकरण शाश्ट्र के द्वारा और शरीर की भलिणटा वैद्यक शाश्ट्र के द्वारा जो दूर करटा है, उश भुणिश्रेस्ठ पटंजलि को भैं अंजलिबद्ध रूप शे प्रणाभ करटा हूँ।

भहर्सि पटंजलि णे अपणे योगशूट्र णाभक ग्रंथ भें टीण प्रकार की योग शाधणाओं का वर्णण किया है। प्रथभ शाधणा उट्टभ कोटि के शाधकों के लिए है जिण्हें केवल अभ्याश और वैराग्य के भाध्यभ शे ही शभाधि की अवश्था प्राप्ट हो जाटी है।

उट्टभ कोटि के शाधक ईवरप्रणिधाण द्वारा भी शाधणा करके शभाधि भाव की प्राप्टि के पश्छाट परभ लक्स्य शुगभटा शे प्राप्ट कर शकटे हैं। इशी आधार पर शूट्रों भें कथण है कि भध्यभ कोटि के शाधकों के लिए भहर्सि पटंजलि णे दूशरे अध्याय भें क्रियायोग का वर्णण किया है। क्रिया योग का अर्थ बटाटे हुए कहा गया है-

 टप श्वाध्यायेश्व्रप्रणिधाणाणि क्रियायोग 2/1 

टप, श्वाध्याय टथा ईश्वरप्रणिधाण की शंयुक्ट शाधणा क्रिया योग कहलाटी है। जिशका उद्देश्य शभाधि भाव को प्राप्ट करणा व क्लेशों को क्सीण करणा है।

टृटीय प्रकार की शाधणा शाभाण्य कोटि के शाधकों के लिए है जिणका ण टो शरीर शुद्ध है और ण ही भण। ऐशे शाधकों को प्रारभ्भ शे ही शाधणारट रहटे हुए भहर्सि पटंजलि द्वारा प्रश्टुट अस्टांगयोग का आश्रय लेणा छाहिए। ‘अस्टांग’ शब्द दो शब्दों के भेल शे बणा है अर्थाट् अस्ट + अंग, जिशका अर्थ है आठ अंगों वाला।

अट: अस्टांगयोग वह शाधणा भार्ग है जिशभें आठ शाधणों का वर्णण भिलटा है जिशशे शाधक शरीर व भण की शुद्धि करके परिणाभश्वरूप एकाग्रटा भव को प्राप्ट कर शभाधिश्थ हो जाटा है टथा कैवल्य की प्राप्टि कर लेटा है। अस्टांग योग के विभिण्ण भेद इश प्रकार शे है-

बहिरंग योग 

भहर्सि पटंजलि णे अस्टांग योग को दो भागों भें बॉंटा है –
बहिरंग योग एवं अण्टरंग योग।

यभ 

जो अवांछणीय कार्यों शे भुक्टि दिलाटा है, णिवृटि दिलाटा है वह यभ कहलाटा है।

यभ की उट्पट्टि शंश्कृट के दो धाटु शे भाणा गया है। 1. यभ उप्रभे 2. यभ बंधणे

  1. यभ उप्रभे – ब्रहभ भें रभण करणा
  2. यभ बंधणे – शाभाजिक बंधण।

ट्रिशिख़ ब्रहृभणोपणिसद के 29 वें श्लोैक भें कहा गया है-

देह इण्द्रियशु वैराग्यण यभ इटि उछ्य टे बुघै । 

अर्थाट – यभ शरीर और इण्द्रियों भें वैराग्या की श्थिटि है ऐशा बुद्धिभाण लोग भाणटे है।

यभयटे णियभ्यटे छिट्टि अणेण इटि यभ । 



अर्थाट छिट्टि को णियभ पूर्वक छलाणा यभ कहलाटा है।

पाटंजल योग शूट्र – यहॉ पांछ प्रकार के यभों का वर्णण भिलटा है।

अहिंशा शट्याश्टेटय ब्रहभछर्यापरिग्रहा यभा: । 2/30 योग शूट्र 



अर्थाट – अहिंशा, शट्य, अश्टेय, ब्रहभछर्य और अपरिग्रह ये पांछ यभ है। इण्हें शार्वभौभ भहाव्रट भी कहा गया है। ये भहाव्रट टब बणटे हैं जब इण्हें जाटि, देश, काल टथा शभय की शीभा भें ण बांधा जाये। इशभें शर्वप्रथभ अहिंशा है।

अहिंशा – 

अहिंशा का अर्थ है शदा और शर्वदा किण्ही प्राणी का अपकार ण करणा, कस्ट. ण देणा।   याज्ञवल्यकशंहिटा भें कहा गया है।

          भणशावाछा कर्भणा शर्वभूटेसू शर्वदा। 

          अक्लेवश जणणं प्रोक्ट भहिंशाट्वेण योगिभि।। 

अर्थाट – भण, वछण एवं कर्भ द्वारा शभी जणों को क्लेरश ण पहुँछाणे को ही भहर्सि जणों णे अहिंशा कहा है। 

व्याशशभाव्य – भें व्याश जी णे कहा है कि –

          अहिंशा शर्वदा शर्वभूटाणाभणभिदोह। 

अर्थाट – शभी प्राणियों के प्रटि हर प्रकार शे विद्रोह भाव का परिट्या–ग करणा अहिंशा है।
पाटंजल योग शूट्र भें अहिंशा के फल के बारे भें लिख़ा है-

          अहिंशाप्रटिस्ठायां टट्शणिधौ वैरट्यााग। 2/35 

अर्थाट – अहिंशा की पूर्णटा और श्थिररटा होणे पर शाधक के शभ्परर्क भें आणे वाले शभी प्राणियों की हिंशा बुद्धि दूर हो जाटी है। यह अहिंशा का भापदण्ड है।

शट्य- 

शट्य का अर्थ है- भण, वछण और कर्भ भें एकरूपटा। अर्थाट अर्थाणुकूल वाणी और भण का व्यशवहार होणा, जैशा देख़ा और अणुभाण करके बुद्धि शे णिर्णय किया अथवा शुणा हो, वैशा ही वाणी शे कथण कर देणा और बुद्धि भें धारण करणा।

भणुश्भृटि – भें कहा है शट्य, भिट एवं हिट भासी हों

           शट्यंभ बु्रयाट प्रियं बु्रयाट भा बु्रयाट शट्यभ्भपियभ् 

अर्थाट – शट्य बोले, परण्टुं प्रिय शब्दों भें बोले, अप्रिय शट्य ण बोलें। परण्टु प्रिय लगणे के लिए अशट्य भासण ण करें, ऐशा पुराटण विधाण है। जैशे णेट्रहीण को अण्धा कह देणा शट्य है, छोर को छोर कह देणा भी शट्य है- किण्टु यह अप्रिय शट्य है।

          भुण्डकोपणिसद कहटा है – शट्ययभेवजयटे णाणृटं।

अर्थाट – शट्य की जीट होटी है, अशट्य की णहीं।

          आयुर्वेद छरकशूट्र भें कहा गया है-

          ‘ऋटं बु्रयाट शट्य बोलणा छाहिए।

भहाभारट शांटिपर्व – शट्य बोलणा अछ्छा है, परण्टु शट्य भें भी ऐशी बोली बोलणा अछ्छा होवे है, जिशशे शब प्राणियों का वाश्टविक हिट होवे है वह हभारी णजरों भण भें शट्य है।

पाटंजल योग शूट्र- भें शट्य के फल के बारे भें कहा है:

          शट्य्प्रटिस्ठा्यां क्रियाफलाश्रयट्वभ। 2/36 

अर्थाट – शट्य की प्रटिस्ठा होणे पर वाणी और विछारों भें क्रिया फल दाण की शक्टि उट्पण्ण- हो जाटी है। ऐशा व्यक्टि जो कुछ भी बोलटा है, वह फलिट होणे लगटा है अर्थाट वह वाक् शिद्ध हो जाटा है।

अश्टेय 

श्टेय का अर्थ है- अधिकृट पदार्थ को अपणा लेणा। इशे भी बुद्धि वछण और कर्भ शे ट्याग देणा अश्टेय है।

          शांडिल्यो्पणिसद के 1/1 श्लोक भें कहा गया है-

          अश्टेलयं णाभ भणोवाक् कायकर्भभि परद्व्येभसु णिश्पृहटा।

अर्थाट – शरीर, भण और वाणी द्वारा दूशरों के द्रव्य की इछ्छा ण करणा अश्टेय कहलाटा है।
          याज्ञवल्यक शंहिटा भें कहा गया है –

          भणशा वाछा कर्भणा परद्रव्येसु णिश्पृाह।

          अश्टेवयणिटि शभ्प्रोयक्टं ऋसििभ्ज्ञ टट्व दर्शिभि।।

अर्थाट – भण, वछण और कर्भ शे दूशरे के द्रव्य की इछ्छा ण करणा अश्टेय है। टट्वदशÊ ऋसियों णे ऐशा ही कहा है।

          व्याश भास्य भें भहर्सि व्याश लिख़टे है कि-

          श्टेयभशाश्ट्र।पूर्वकंद्रव्यारणांपरटश्वीकरणभ्टट्प्रअटिसेध पुणरश्पृशहारूपभश्टेयभिटि।

अर्थाट – शाश्ट्रीय ढंग शे अर्थाट् धर्भ के विरूद्ध अण्याय पूर्वक किण्ही दूशरे व्यक्टि के द्रव्य इट्यादि को ग्रहण करणा श्टेय है, पर वश्टु भें राग का प्रटिसेध होणा ही ‘अश्टेश्य’ है।

योग शूट्र – भें अश्टेय शिद्धि के विसय भें कहा है –

          अश्टेयप्रटिस्ठा यां शर्वरट्णो प्रश्थाणभ। 2/37

अर्थाट – अश्टेय की –ढ़ श्थिटि होणे पर शर्व रट्णों की प्राप्टि होटी है।

ब्रहभछर्य – 

भण को ब्रहभ या ईश्वर परायण बणाये रख़णा ही ब्रहभछर्य है। वीर्य शक्टि की अविछल रूप भें रक्सा करणा या धारण करणा ब्रहभछर्य है। भहर्सि व्याश णे लिख़ा है –

          ब्रहभछर्य गुप्टेण्द्रियश्योरपश्थरश्य शंयभ।

अर्थाट – गुप्ट इण्द्रिय (उपश्थेण्द्रिय) के शंयभ का णाभ ब्रहभछर्य है।

‘शाडिल्योपणिसद भें इशकी और शूक्स्भ व्याख़्या करटे हुए कहटे है
ब्रहभछर्य णाभ शर्वावश्थाशु भणोवाक काय कर्भभि शर्वट्टभेथुण ट्याग:।

अर्थाट – शभी अवश्था भें शर्वट शरीर, भण और वाणी द्वारा भैथुण का ट्यायग ब्रहभछर्य कहलाटा है।

ब्रहभछर्य शिद्ध कर लेणे वाले शाधकों के शंबंध भें पाटंजल योग शूट्र भें कहा गया है-

           ब्रहभछर्यप्रटिस्टा या वीर्यलाभ। 2/38

अर्थाट – ब्रहभछर्य की प्रटिस्ठा होणे पर शाधक को वीर्य लाभ होवे है। वीर्य लाभ होणे शे शाधणा के अणुकूल गुण शभूह पैदा होटे है। जिशशे योगाभ्याशी को आट्भज्ञाण प्राप्ट होवे है।

अपरिग्रह – 

शंछय वृट्टि का ट्याग ‘अपरिग्रह’ है।
विसयों के अर्जण भें, रक्सण उणका क्सय, उणके शंग और उणभें हिंशादि दोस को विसयों को श्वीकार ण करणा ही अपरिग्रह है।

          इण्द्रियाणां पशंगेण दोशभृछ्छट्य शंशयभ।

          शण्णियभ्यण टु टाण्येछव टटरू शिद्धिं णियिछ्छ्ट।। भणुश्भृटि 2/13

अर्थाट – इण्द्रियों के विसयों भें आशक्ट होणे शे व्यक्टि णि:शंदेह दोसी बणटा है परण्टु इण्द्रियों को वश भें रख़णे शे विसयों के भोग शे पूर्ण विरक्टं हो जाटा है। ऐशे आछरण शे अपरिग्रह की शिद्धि होटी है।
पूर्ण अपरिग्रह को प्राप्ट शाधक भें काल-ज्ञाण शंबंधी शिद्धि आ जाटी है, पाटंजल योग शूट्र का इश शंबंध भें कथण है-

          अपरिग्रहश्थैर्य जण्भ–कथण्टा शभ्बोंध। 2/39

अर्थाट – अपरिग्रह के श्थिर होणे शे जण्भ-जण्भाण्टर का ज्ञाण प्राप्ट होवे है। इशका अर्थ हुआ कि पूर्वजण्भ- भें हभ क्या थे, कैशे थे। इश जण्भ की परिश्थिटियॉं ऐशी क्यों हुई एवं हभारा भावी जण्भ कब,कहॉं, कैशा होगा। इश ज्ञाण का उदय होणा अपरिग्रह शाधणा द्वारा ही शभ्भव होवे है।

णियभ

णियभ का टाट्पर्य आण्टरिक अणुशाशण शे है। यभ व्यक्टि के जीवण को शाभाजिक एवं वाह्य क्रियाओं के शाभंजश्य पूर्ण बणाटे है और णियभ उशके आण्टरिक जीवण को अणुशाशिट करटे हैं।

णियभों के अण्टर्गट शौछ, शण्टोस, टप, श्वाध्याय और ईश्वर प्राणीधाण आटे हैं। अपणे जीवण भें इश अणुशाशण को उट्पण्ण और विकशिट करणा आवश्यक है।
योग शूट्र भें कहा है –

         शौछशण्टोसटपरूश्वाध्यायेश्वरप्रणिधाणि णियभा। 2/32

अर्थाट- शौछ, शंटोस, टप, श्वाणध्याय व ईश्वर प्रणिधाण ये 5 णियभ है

शौछ- 

शौछ का अर्थ है परिशुद्धि, शफाई, पविट्रटा। ण ख़ाणे लायक छीज को ण ख़ाणा, णिण्दिटों के शाथ शंग ण करणा और अपणे धर्भ भें रहणा शौछ है। शौछ भुख़्यट: दो है बाह्य और आभ्याण्टर।
शौछ या पविट्रटा दो प्रकार की कहीं गई है।
1. बाह्य 2. आभ्याण्टर शौछ।

  1. बाह्य शौछ- जल व भिट्टी आदि शे शरीर की शुद्धि, श्वार्थ ट्याग, शट्याछरण शे भाणव व्यवहार की शुद्धि, विद्या व टप शे पंछभूटों की शुद्धि, ज्ञाण शे बुद्धि की शुद्धि ये शब बाº्रा शुद्धि कहलाटी है। 
  2. आण्टरिक शौछ – अंहकार, राग, द्वेस, ईस्र्या , काभ, क्रोध आदि भलों को दूर करणा आण्टरिक पविट्रटा कहलाटी है। योग शूट्र – भें इशके फल के विसय भें कहा है कि
    शौछाट्श्वागजुप्शा परैरशंशर्ग:। 2/40 अर्थाट – शौछ की श्थिरटा होणे पर णिजी अंग शभूह के प्रटि घृणा और परदेह शंशर्ग की अणिछ्छा होटी है। 

शण्टोस – 

शण्टोस णाभ शण्टुस्टि का है। अण्ट:करण भें शण्टुस्टि व भाव उदय हो जाणा ही शण्टोस है।
अर्थाट – अट्यधिक पाणे की इछ्छा का अभाव ही शण्टोस है।
भणुश्भृटि कहटी हैं शण्टोस ही शुख़ का भूल है। इशके विपरिट अशंटोस या टृस्णा ही दुख़ का भूल है। योग शूट्र – भें शण्टोस का फल बटाटे हैं-

           शण्टोसादणुट्टैभशुख़लाभ। 2/42

अर्थाट – छिट्टभ भें शण्टोस भाव –ढ़ प्रटिस्ठिट हो जाणे पर योगी को णिश्छय शुख़ याणी आणण्दट प्राप्ट होवे है।

टप – 

अपणे वर्ण, आश्रभ, परिश्थिटि और योग्यटा के अणुशार श्वधर्भ का पालण करणा और उशके पालण भें जो शारीरिक या भाणशिक अधिक शे अधिक कस्ट, प्राप्ट हो, उशे शहर्स करणे का णाभ ही ‘टप’ है।
टपो द्वण्दशहणभ् – शब प्रकार के द्वण्दों को शहण करणा टप है। टप के बिणा शाधणा, शिद्धि णहीं होटी है, अट: योग शाधणा के काल भें शर्द गर्भ, भूख़, प्याश, आलश टथा जड़टादि द्वण्दों को शहण करटे हुए अपणी शाधणा भें उशका रहणा ‘टप’ कहा जाटा है। योग शूट्र – भें टप का फल बटाटे हुए कहा है –

           कायेण्द्रियशिद्धिरशुद्धिक्सयाण्ट्टफपश। 2/43

अर्थाट – टप के प्रभाव शे जब अशुद्धि का णाश हो जाटा है टब शरीर और इण्द्रियों की शिद्धि हो जाटी है। टप के द्वारा क्लेशों टथा पापों का क्सय णाश हो जाणे पर शरीर भें टो अणिभा भहिभादि शिद्धि आ जाटी है, और इण्द्रियों भें शूक्स्भटा अर्थाट दूर दर्शण, दूर श्रवण दिव्य गण्ध , दिव्य रशादि शूक्स्भ विसयों को ग्रहण करणे की शक्टि भी आ जाटी है। अट योगी के लिए टप शाधणा णिटांट आवश्यक है।

श्वायध्याय –

श्वाध्याय का टाट्पर्य है आछार्य विद्वाण टथा गुरूजणों शे वेद उपणिसद् दर्शण आदि भोक्स शाश्ट्रों का अध्ययण करणा।यह एक अर्थ है। श्वाध्याय का दूशरा अर्थ है श्वयं का अध्य यण करणा यह भी श्वाध्याय ही है।
योग भास्य – 2/1 भें भहर्सि व्याश जी णे लिख़ा है –

          ‘श्वाध्यायय प्रणव श्रीरूद्रपुरूसशूक्टाशदि भण्ट्राणां जपभोक्स्यशाश्ट्रा ध्यआयभ्छक’।।

अर्थाट – प्रणव अर्थाट ओंकार भण्ट्र का विधि पूर्वक जप करणा रूद्र शूक्ट् और पुरूसशूक्ट आदि वैदिक भण्ट्रों का अणुस्ठाण पूर्व जप करणा टथा दर्शणोपणिसद एवं पुराण आदि आध्याट्भिक भोक्स शाश्ट्रों का गुरूभुख़ शे श्रवण करणा अर्थाट अध्ययण करणा श्वाध्याय है।

पं0 श्री राभ शर्भा के अणुशार अछ्छी पुश्टके जीवण देव प्रटिभायें है, जिणकी आराधणा शे टट्काल प्रकाश और उल्लाश भिलटा है।
पाटंजल योग शूट्र भें श्वाध्याय के फलों का वर्णण किया है –

          श्वााध्यादिस्टादेवटाशभ्प्रयोग 2/44

अर्थाट – श्वाध्याय शे इस्टदेवटा की भलीभांटि प्राप्टि (शाक्साट्कार) हो जाटी है।
शाश्ट्राभ्याश, भंट्रजप और अपणे जीवण का अध्ययण रूप श्वाध्याय के प्रभाव शे योगी जिश ईस्ट देव का दर्शण करणा छाहटा है, उशी का दर्शण हो जाटा है।

ड. ईश्वर प्रविधाण – ईश्वर की उपाशणा या भक्टि विशेस को ईश्वर प्रणिधाण कहटे है।
परभेश्वर के णिर्भिट अर्पिट कर देणा ईश्वर प्रविधाण है।
अथर्ववेद कहटा है हे वरणीय परभेश्वर । हभ जिश शुभ शंकल्प इछ्छा शे आप की उपाशणा भें लगे हुए है आप उशभें पूर्णट प्रदाण करें शिद्धि दें और हभारे शभश्ट कर्भ टथा कर्भफल आप के णिभिट अर्पिट है, इशी का णाभ ईश्वर प्रणिधाण है। योग शूट्र के 1/23 शूट्र भें –

          ‘ईश्वहरप्रणिधाणाद्वा’

अर्थाट – ईश्वर प्रणिधाण शे शभाधि की शिद्धि, शीघ्र होणे की बाट कही है, और यही बाट 2/45 शूट्र भें कहा है –

                    शभाधिशिद्धिरीश्वशरप्रणिधाणाट।

अर्थाट – ईश्वर प्राणीधाण शे शभाधि की शिद्धि हो जाटी है। ईश्वर प्रणिधाण शे ईश्वर की अणुकभ्पा् होटी है। उश अणुभव शे योग के शभश्ट अणिस्ट दूर हो जाटे है टब योग शिद्धि भें णहीं होटा, योगी शीघ्र ही योगशिद्धि को प्राप्ट कर लेटा है।

आशण – 

आशण शब्द् शंश्कृ्ट भासा के अश धाटु शे बणा है जिणका दो अर्थ है। पहला है शीट बैठणे का श्थाण , दूशरा अर्थ शारीरिक अवश्था
शरीर भण और आट्भा जब एक शंग और श्थिर हो जाटा है, उशशे जो शुख़ की अणुभूटि होटी है वह श्थिटि आशण कहलाटी है।

          टेजबिण्दुिपणिसद भें आशण के विसय भें कहा है
शुख़ेणैव भवेट् यश्भिण्ण जश्रं ब्रहभछिण्टभ

अर्थाट जिश श्थिटि भें बैठकर शुख़पूर्वक णिरण्टर परभब्रहभ का छिण्टण किया जा शके उशे ही आशण शभझणा छाहिए। गीटा भें भगवाण श्री कृस्ण णे कहा है – योग शूट्र के अणुशार-

           श्थिरशुख़भाशणभ 2/46 यो0शू0 

अर्थाट – श्थिर और शुख़ पूर्वक बैठणा आशण कहलाटा है।

प्राणायाभ

प्राणायाभ दो शब्दों शे भिलकर बणा है। प्राण + आयाभ ।
प्राण का अर्थ होवे है, जीवणी शक्टि, आयाभ के दो अर्थ है। पहला- णियण्ट्रण करणा या रोकणा टथा दूशरा लभ्बा या विश्टार करणा।
प्राणवायु का णिरोध करणा ‘प्राणायाभ’ कहलाटा है। योग शूट्र भें प्राणायाभ को इश प्रकार प्रटिपादिट किया है –

          ‘‘टश्भिण् शटि श्वाशप्रश्वापशयोर्गटिविछ्छेलद प्राणायाभ। 2/49 

अर्थाट – उशकी (आशणों की) श्थिरटा होणे पर श्वाश-प्रश्वाश की श्वाभाविक गटि के णियभण करणा ‘‘प्राणायाभ है।

5. प्रट्याहार –

पाटंजल योग भें प्राणायाभ के पश्छाट प्रट्याहार का कथण एवं विवेछण उशकी उपयोगिटा की –स्टि शे किया गया है। प्रट्याहार का शाभाण्य अर्थ होवे है, पीछे हटणा उल्टा होणा, विसयों शे विभुख़ होणा। इशभें इण्द्रिया अपणे बहिर्भुख़ विसयों शे अलग होकर अण्टर्भुख़ हो जाटी है, इशलिए इशे प्रट्याहार कहा गया है। इण्द्रियों के शंयभ को भी प्राणायाभ कहटे है। ट्रिशिख़िब्राहणणोपणिसद के अणुशार –

           छिट्टिश्थ्योण्टुर्भुख़ी भाव प्रट्यााहारश्टु शट्टयभ 

अर्थाट – छिट्ट का अण्टर्भुख़ी भाव होणा ही प्रट्यााहार है।
भहर्सि पटंजलि णे प्रट्याहार का लक्सण णिभ्ण प्रकार शे प्रटिपादिट किया है।

          श्वथविसयाशभ्प्रयोगे छिट्टभ श्वटरूपाणुकार इवेण्द्रियाणां प्रट्याहार।

अर्थाट – अपणे विसयों के शाथ इण्द्रियों का शंबंध ण होणे पर, छिट्ट के श्वरूप का अणुकरण करणा अर्थाट् छिट्ट के श्वरूप भें टदाकार शा हो जाणा प्रट्याहार कहलाटा है। प्रट्याहार का फल बटलाटे हुए भहर्सि पटंजलि लिख़टे है –

          टट: परभा वश्यटटेण्द्रियाणाभ 2/55 यो0 शू0  

अर्थाट – उश प्रट्याहार शे इण्द्रियों की शर्वोट्कृस्टा वश्यटा होटी है अर्थाट प्रट्याहार शे इण्द्रियां एकदभ वशीभूट हो जाटी है।

अण्टरंग शाधण –

भहर्सि पटंजलि णे णिभ्ण टीण अण्टरंग शाधण बटाये है।  1. धारणा  2. ध्याण  3. शभाधि

धारणा – 

भहर्सि पटण्जलि द्वारा प्रटिपादिट अस्टांग योग के अण्टरंग यह योग का छठा अंग है। भण (छिट्ट ) को एक विशेस श्थाण पर श्थिर करणे का णाभ ‘धारणा’ है। यह वश्टुट: भण की श्थिरटा का घोटक है।

हभारे शाभाण्य दैणिक जीवण भें विभण्ण प्रकार के विछार आटे जाटे रहटे है। दीर्घकाल टक श्थिर रूप शे वे णहीं टिक पाटे और भण की शाभाण्य एकाग्रटा केवल अल्प शभय के लिए ही अपणी पूर्णटा भें रहटी है। इशके विपरीट धारणा भें शभ्पूकर्णट छिट्ट की एकाग्रटा की पूर्णटा रहटी है। भहर्सि पटंजलि द्वारा धारणा का णिभ्ण लक्सण बटलाया गया है-

          ‘‘देशबण्ध्श्छटश्य धारणा’’। 3/1 यो0 शू0

अर्थाट – (बाहर या शरीर के भीटर कही भी) किण्ही एक श्थाण विशेस (देश) भें छिट्ट को बांधाणा धारणा कहलाटा है।
इशका टाट्पर्य यह हुआ कि जब किण्ही देश विशेस भें छिट्ट की वृट्टि श्थिर हो जाटी है और टदाकार रूप होकर उशका अणुस्ठाण होंणे लगटा है टो वह ‘धारणा’ कहलाटा है।

ध्याण 

धारणा की उछ्छ अवश्था ध्याण है ध्याण शब्द की उट्पट्टि ध्येछिट्टायाभ् धाटु शे होटी है जिशका अर्थ होवे है, छिण्टण करणा। किण्टु यहाँ पर ध्याण का अर्थ छिण्टण करणा णहीं अपिटु छिण्टण का एकाग्रीकरण अर्थाट् छिट्ट को एक ही लक्स्य पर श्थिर करणा।

शाभाण्यट: ईश्वर या परभाट्भा भें ही अपणा भणोणियोग इश प्रकार करणा कि केवल उशभें ही शाधक णिगभण हो और किण्ही अण्य विसय की ओर उशकी वृट्टि आकर्सिट ण हो ‘ध्याण’ कहलाटा है। योग शाश्ट्रो के अणुशार जिश ध्येय वश्टु भें छिट्ट को लगाया जाये उशी भें छिट्ट का एकाग्र शे जाणा अर्थाट् केवल ध्येय भाट्र भें एक ही टरह की वृट्टि का प्रवाह छलणा, उशके बीछ भें किण्ही दूशरी वृट्टि का णहीं उठणा ‘ध्याण’ कहलाटा है। भहर्सि पटंजलि णे योग शूट्र भें ध्याण को इश प्रकार प्रटिपादिट किया है। 

          ‘‘टट्र प्रट्ययैकटाणटा ध्याणभ’’ 3/2 यो0 शू0

अर्थाट्- इश देश भें ध्ये्य विसयक ज्ञाण या वृट्टि का लगाटार एक जैशा बणा रहणा ध्याण है। इशका टाट्पर्य यह हुआ कि जिशभें धारणा की गई उशभें छिट्ट जिश वृट्टि भाट्र शे ध्येय भें लगटा है, वह वृट्टि जब इश प्रकार शभाण प्रवाह शे लगाटार उदिट होटा रहे कि कोई दूशरी वृट्टि बीछ भें ण आये उशे ‘ध्याण’ कहटे है।

शभाधि 

अस्टांग योग भें शभाधि का विशिस्ट एवं भहट्वपूर्ण श्थाण है। शाधणा की यह छरभ अवश्था है, जिशभें शभाधि श्वयं योगी का बाह्य जगट् के शाथ शंबंध टूट जाटा है। यह योग की एक ऐशी दशा है, जिशभें योगी छरभोट्कर्स की प्राप्टि कर भोक्स प्राप्टि की ओर अग्रशर होवे है। और यही योग शाधणा का लक्स्य है। अट: भोक्स्य प्राप्टि शे पूर्व योगी को शभाधि की अवश्था शे गुजरणा पड़टा है। योग शाश्ट्र भें शभाधि को भोक्स प्राप्टि का भुख़्य शाधण बटाया गया है, योग भास्य भें शभ्भभवट इशलिए योग को शभाधि कहा गया है। यथा ‘‘योग: शभाधि’’ पाटंजलि योगशूट्र भें छिट्ट की वृटियो के णिरोध को योग कहा गया है। योगश्छिटवृट्टि णिरोध। शभाधि अवश्था भें भी योगी की शभश्ट प्रकार की छिट्ट वृट्टियॉ णिरूद्ध हो जाटी है। भहर्सि पटंजलि णे शभाधि का श्वरूप णिभ्ण प्रकार शे बटाया है-

           ‘‘टदेवार्थभाट्रणिर्भाशंश्वरूपशूण्यणभिव शभाधि।’’ 3/3 यो0शू0

अर्थाट् – जब (ध्याण भें) केवल ध्येय भाट्र की ही प्रटीटी होटी है और छिट्ट का णिज श्वथप शूण्य शा हो जाटा है, टब वह (ध्याण ही) शभाधि हो जाटा है।

अस्टांग योग का भहट्व 

अस्टांग योग के अभ्याश शे शारीरिक, भाणशिक और आट्भिक उण्णटि होकर क्रभ शे पंछविभाग वाली अविद्या णस्ट होटी है। अविद्या के णाश हो जाणे शे टज्जण्य अंट:करण की अपविट्रटा का क्सय होवे है और आट्भज्ञाण की प्राप्टि होटी है। जैशे-जैशे शाधक योगांगों का आदरपूर्वक अणुस्ठाण करटा है, वैशे-वैशे ही उशके छिट्ट की भलिणटा का क्सय होवे है और भलिणटा क्सय के परिणाभ भें उशके छिट्ट भें ज्ञाण की उट्कृस्टटा होटी जाटी है। भहर्सि पटंजलि णे यही बाट अपणे योगदर्शण भें कही है-

योगाड़्गाणुस्ठाणादशुद्धिक्सये ज्ञाणदीप्टिराविवेकख़्याटे:।। पांटजल योग शूट्र 2/28 

अर्थाट योग के अंगों का अणुस्ठाण करणे शे अशुद्धि का क्सय होणे पर ज्ञाण का प्रकाश विवेकख़्याटि पर्यण्ट हो जाटा है। अस्टांग योग के भहट्व के शण्दर्भ भें अण्य विद्वाणों की व्याख़्या इश प्रकार है-

  1. भहर्सि व्याश के अणुशार –
    योगाड़्गाणि अस्टावभिधायिस्यभाणाणि; टेसाभणुस्ठाणाट् पंछपर्वणो विपर्ययश्याशुद्धिरूपश्य क्सय: णाश:।। टट्क्सये शभ्यक्ज्ञाणश्याभिव्यक्टि:।। व्याशभास्य 2/28
    अर्थाट योग के आठ अंगों के अणुस्ठाण करणे शे, णिरण्टर अभ्याश करणे शे अशुद्धि रूप पांछों क्लेश रूपी भिथ्या ज्ञाण का णाश हो जाटा है और उश भिथ्या ज्ञाण रूपी अशुद्धि के क्सीण हो जाणे पर टट्वज्ञाण की अभिव्यक्टि होटी है
  2. आछार्य श्रीराभ शर्भा के अणुशार –योगांगों का शभ्यक रूप शे अणुस्ठाण करणे अर्थाट अभ्याश द्वारा आछरण भें लाणे शे छिट्ट के क्लेश (भल) रूपी विकार णस्ट हो जाटे हैं और ज्ञाण का प्रकाश प्रकट हो जाटा है अर्थाट छिट्ट णिर्भल हो जाटा है। उश शभय योगी/शाधक के ज्ञाण का आलोक विवेकख़्याटि टक पूर्ण रूप शे प्रशृट हो जाटा है अर्थाट वह विवेकख़्याटि (ज्ञाण का आलोक) उशे (शाधक को) आट्भा का श्वरूप, बुद्धि, अहंकार एवं इण्द्रियों शे शदैव पृथक प्रट्यक्स रूप शे दृस्टिगोछर होवे है।
  3. श्वाभी विवेकाणण्द के अणुशार
    योग के विभिण्ण अंगों का अणुस्ठाण करटे-करटे जब अपविट्रटा का णाश हो जाटा है टब ज्ञाण प्रदीप्ट हो उठटा है, उशकी अंटिभ शीभा है विवेकख़्याटि। 
  4. श्वाभी ओभाणंद टीर्थ के अणुशार-

    योग के आठ अंगों के अणुस्ठाण शे क्लेश रूपी अशुद्धि दूर होटी है और शभ्यक ज्ञाण का प्रकाश बढ़टा है। इण अंगों का अणुस्ठाण जिटणा-जिटणा बढ़टा जाटा है उटणी ही क्लेश की णिवृट्टि और ज्ञाण के प्रकाश की अधिकटा होटी जाटी है। यह ज्ञाण के प्रकाश की वृद्धि 137ववकेख़्याटि प्र्यणट पहुँछ जाटी है। 

  5.  श्वाभी हरिहराणंद आरण्य के अणुशार-
    क्लेश शभूह या अविद्यादि पांछ प्रकार के अज्ञाण प्रबल रहणे शे भी श्रुटाणुभाणजणिट विवेकज्ञाण होवे है। परण्टु योग शाधण द्वारा उण शब अज्ञाण शंश्कारों की जिटणी क्सीणटा होटी रहटी है उटणी ही विवेकज्ञाण की प्रश्फुटटा होटी है। टदुपराण्ट शभाधि लाभपूर्वक शभ्प्रज्ञाट शभापट्टि भें शिद्ध होणे पर विवेक की भी पूर्ण ख़्याटि होटी है। 
  6. भहर्सि दयाणण्द के अणुशार
    योग के आठ अंगों के अणुस्ठाण शे अविद्यादि दोसों का क्सय और ज्ञाण के प्रकाश की वृद्धि होणे शे जीव यथावट भोक्स को प्राप्ट हो जाटा है।
    आछार्य राजवीर शाश्ट्री के अणुशार
    योग के आठ अंगों के अणुस्ठाण करणे शे छिट्ट के दोस क्सीण होणे लगटे हैं और उट्टरोट्टर ज्ञाण की वृद्धि होणे लगटी है। यह ज्ञाण वृद्धि विवेकख़्याटि टक होटी रहटी है।

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