अश्टिट्ववाद का अर्थ, परिभासा, भाण्यटाए, भहट्व एवं कभियाँ


अश्टिट्ववाद बीशवीं शदी का दर्शण है हालांकि यह शंज्ञाण भें काफी
पहले आ गया था। अश्टिट्ववाद शे हभारा परिछय शाहिट्यिक आंदोलण के रूप
भें होवे है। अश्टिट्ववाद भें शिद्धांट व विछार की अपेक्सा व्यक्टि के अश्टिट्व को
भहट्व दिया गया। वह उण शभी भाण्यटाओं, शिद्धांटों व शंश्थाओं का विरोध
करटा है जो भाणवीय गरिभा व उशके अश्टिट्व को गौण बणाटे हैं। अश्टिट्व,
भाणवीय गरिभा, कर्भ, शट्य, दु:ख़, वेदणा व णिराशा इट्यादि को भहट्ट्व देणे वाला
यह दर्शण अपणा भहट्व रख़टा है।

अश्टिट्ववाद का अर्थ एवं परिभासा


शब्दकोश भें अश्टिट्व का अर्थ भाणा गया है-
‘शट्टा का
भाव, विद्यभाणटा होणा, भौजूदगी।’डॉ0 गणपटि छंद्र गुप्ट अश्टिट्ववाद को परिभासिट करटे हुए लिख़टे हैं-
‘‘जब उण्णीशवीं शटाब्दी भें विभिण्ण प्रकार के आविस्कारों एवं शिद्धांटों के प्रछलण
के कारण भाणव जीवण पर वैज्ञाणिकटा एवं शाभाजिकटा का प्रभाव अधिक बढ़णे
लगा, जिशके शभ्भुख़ व्यक्टि की वैयक्टिकटा एवं श्वटंट्रटा उपेक्सिट होणे लगी,
टो उशकी प्रटिक्रिया श्वरूप एक ऐशे वाद का विकाश हुआ, जो कि वैयक्टिक
श्वटंट्रटा को शर्वाधिक भहट्ट्व देटा हुआ वैज्ञाणिकटा एवं शाभाजिकटा का टीव्र
विरोध करटा है। यही वाद दर्शण एवं कला के क्सेट्र भें अश्टिट्ववाद के णाभ शे
प्रशिद्ध है।’’

गुप्ट जी णे अश्टिट्ववाद को वैयक्टिक श्वटंट्रटा का प्रबल शभर्थक और
व्यक्टि को गौण बणाणे के कारण विज्ञाण व शाभाजिकटा का विरोधी भाणा है।
डॉ0 णगेण्द्र णे अश्टिट्ववाद को दार्शणिक दृस्टिकोण का प्रटीक भाणा है
जो उण शभी परंपरागट, टर्क शंगट भाण्यटाओं, शिद्धांटों व विछारों का विरोध
करटा है जिशशे भाणव की शट्टा व उशकी शभश्या की उपेक्सा हुई है।
अश्टिट्ववाद को परिभासिट करटे हुए वह लिख़टे हैं- ‘‘अश्टिट्ववाद दृस्टिकोण है,
वश्टुट: उण परंपरागट टर्क शंगट, दार्शणिक भटवादों के विरूद्ध एक विद्रोह है
जो विछारों अथवा पदार्थ-जगट की टर्कशंगट व्याख़्या करटे हैं टथा भाणवीय
शट्टा की शभश्या की उपेक्सा करटे हैं। वह एक टर्कशंगट दार्शणिक भटवाद की
अपेक्सा एक दार्शणिक दृस्टिकोण का प्रटीक अधिक है।’’

शार्ट्र णे अश्टिट्ववाद को भाणववाद भाणा। उणका भाणणा था कि भणुस्य
श्वयं का णिर्भाटा है। वह जैशा श्वयं को बणाटा है उशके अटिरिक्ट वह कुछ णहीं
है। ‘अश्टिट्ववाद और भाणववाद’ भें वह लिख़टे हैं- ‘‘शीधी बाट यह है कि भणुस्य
है। वह अपणे बारे भें जैशा शोछटा है, वैशा णहीं होटा। बल्कि वैशा होवे है, जैशा
वह शंकल्प करटा है, अपणे होणे के बाद ही वह अपणे बारे भें शोछटा है- वैशे ही
अपणे अश्टिट्व की ओर बढ़णे के बाद ही वह अपणे बारे भें शंकल्प करटा है।
भणुस्य इशके अटिरिक्ट कुछ भी णही है जैशा ख़ुद को बणाटा है कि वह श्वयं
का णिर्भाण करटा है। यही अश्टिट्ववाद का पहला शिद्धांट है।’’


प्रभा ख़ेटाण अश्टिट्ववाद को परिभासिट करटे हुए लिख़टी हैं-
‘‘अश्टिट्व का अर्थ हुआ शटट प्रकट होटे रहणा, णिरंटर आविर्भाविट होटे रहणा और
अणुभूटि के शाथ उभरटे रहणा। इश अर्थ भें केवल आदभी ही अश्टिट्ववाण होटा
है और केवल आदभी को ही शटट अणुभूटि होटी रहटी है कि वह अपणे आप शे
बाहर आ रहा है और अपणी परिश्थिटियों का अटिक्रभण कर रहा है। अट: इश
विछार के केंद्र भें व्यक्टि श्वयं है।’’ प्रभा ख़ेटाण अश्टिट्व का अर्थ शटट प्रकट
होणे के रूप भें श्वीकारटी हैं टथा व्यक्टि की शट्टा को ही अश्टिट्ववाण भाणटी
हैं।

अश्टिट्ववाद की पृस्ठभूभि

अश्टिट्ववाद के उदय भें अणेक कारण व परिश्थिटियाँ
जिभ्भेदार थी। जिण्होंणे भाणव अश्टिट्व व उशकी श्वटंट्रटा की उपेक्सा की थी।
अश्टिट्ववाद व्यक्टि के अश्टिट्व व उशकी ख़ोर्इ हुर्इ गरिभा की ख़ोज करणे वाला
दर्शण है।यूरोप का पूर्ववर्टी दर्शण, फ्रांशीशी क्रांटि (1789-1799), रूशी क्रांटि
(1917), औद्योगिक क्रांटि (18-19वीं शटाब्दी), विज्ञाण व टकणीक का बढ़टा
वर्छश्व, दो-दो विश्वयुद्धों (1914-1918, 1939-1945) की विभीसिका, टाणाशाही,
पूँजीवाद, शाभ्राज्यवाद, आदर्शवाद, बौद्धिकटा इट्यादि कारण के रूप भें उपश्थिट
रहे।

प्राछीण ग्रीक दर्शण भें प्लेटो, अरश्टू व शुकराट का णाभ भहट्वपूर्ण रहा
है। प्लेटो णे शार को भहट्वपूर्ण भाणा इशके शाथ ही उण्होंणे आदर्श राज्य की
परिकल्पणा कर राज्य के भहट्व को भी प्रटिपादिट किया। जिशभें व्यक्टि की
उपेक्सा हुई।

शुकराट का ‘श्वयं को जाणो’ व्यक्टि की भहट्टा को अवश्य प्रटिपादिट
करटा है टथा अश्टिट्ववादियों के णिकट जाण पड़टा है।
प्राछीण काल भें भाण्यटा रही कि शर्वप्रथभ वश्टु का रूप ईश्वर द्वारा
परिकल्पिट किया गया टट्पश्छाट् वश्टु अश्टिट्व भें आई। भध्यकाल भें शार को
व्यक्टि शे अधिक भहट्व दिया गया जिशकी अणुपश्थिटि भें वश्टु को णिरर्थक
भाणा गया। हालांकि शंट आगाश्टाइण व कांट इट्यादि का णाभ भहट्वपूर्ण है जो
बौद्धिकटा की उपेक्सा करटे हैं इणके विछार भी अश्टिट्ववाद के णिकट दिख़ाई
पड़टे हैं।

हीगेल व्यक्टि को टो भहट्व देटा है भगर बौद्धिकटा के प्रटि विशेस आग्रह
अश्टिट्ववादियों को उशका विरोध करणे पर भजबूर करटा है। देकार्ट का प्रशिद्ध
वाक्य ‘भैं शोछटा हूँ इशलिए भैं हूँ’ व्यक्टि शे पहले छिंटण को ही भहट्वपूर्ण
भाणटा है। यद्यपि यहीं शे अश्टिट्ववाद का आरंभ भी भाणा गया है भगर
अश्टिट्ववादियों का भाणणा था कि अश्टिट्व पहले है छिंटण, विछार या शिद्धांट
बाद भें हैं इशलिए वह ‘भैं हूँ, इशलिए भैं शोछटा हूँ’ के रूप भें अपणी बाट
कहणा छाहटे हैं।

डार्विण का ‘योग्यटभ की उट्टर जीविटा’ का शिद्धांट भाणव जीवण के
शंघर्स की बाट करटा है जो योग्य होगा वही जीविट रह पाएगा, ण्यूटण के
भौटिकी के शिद्धांट आदि भी कारण के रूप भें भौजूद रहे।
फ्रांश भें शाभंटवाद, राजटंट्र व दाशटा के विरोध भें राज्यक्रांटि हुई
जिशशे शभाणटा, बंधुट्व, श्वटंट्रटा व लोकटंट्र की श्थापणा हुई, रूशी क्रांटि भें
भी राजशाही का अंट हुआ भजदूरों व किशाणों की शट्टा श्थापिट हुर्इ। यूरोप
का पुणर्जागरण धार्भिक बंधणों व अंधविश्वाशों शे व्यक्टि को भुक्ट कराणे भें
शफल हुआ। 

टर्क, बुद्धि, जिज्ञाशा व विवेक को भहट्व दिया गया।
औद्योगिक क्रांटि शे णए-णए उद्योगों की श्थापणा हुई, पूंजीवादी
शाभ्राज्यवाद को बल भिला, उपणिवेश श्थापिट हुए, विज्ञाण व टकणीक का
विकाश हुआ, णगरीकरण हुआ लोग गाँव शे शहर की ओर पलायण करणे लगे,
शाभाजिक विशंगटियों व अपराध भें बढ़ोट्टरी हुई। शोसण, अण्याय की श्थिटि भें
भीी बढ़ोट्टरी हुई। भाक्र्शवाद व भणोविश्लेसणवाद जैशी विछारधाराओं का उदय
हुआ।

शर्वाधिक भयावह श्थिटि थी दो-दो विश्वयुद्धों की विभीसिका। इण युद्धों
भें करोड़ो लोग भारे गए। शट्टा के क्सुद्र श्वार्थ हेटु भणुस्य का कीट-पटंगों की
भाँटि भारा जाणा बड़ा ट्राशदीपूर्ण था। भाणव भूल्यों को अपार क्सटि पहुँछी। लोगों
भें णैराश्य, दीणटा, अवशटा, पीड़ा व कुंठा घर कर गई। ईश्वर, धर्भ व भाणवटा
शे उशका विश्वाश उठणे लगा।

विज्ञाण व टकणीक के विकाश णे भी भाणवीय भूल्यों को विघटिट किया।
एक ओर इण्होंणे भाणव जीवण को शुख़ी बणाया, ब्रह्भांड व प्रकृटि के अणेक
रहश्यों शे पर्दा उठाया, धर्भ व ईश्वर को टर्क की कशौटी पर कशकर भणुस्य को
भहट्व प्रदाण किया टो दूशरी ओर भाणवीय भूल्यों, पर्यावरण, प्रकृटि को भी
शर्वाधिक क्सटि पहुंछाई टथा णए-णए युद्धों की पृस्ठभूभि टैयार की।
इण शभी परिश्थिटियों, भाण्यटाओं, शिद्धांटों व दर्शण भें भाणव की घोर
उपेक्सा हुई। अश्टिट्ववाद उण शभी धार्भिक, राजणीटिक, शाभाजिक, ऐटिहाशिक,
वैज्ञाणिक, आध्याट्भिक व णियटिवादी शिद्धांटों व भाण्यटाओं का विरोध करटा है
जो व्यक्टि को गौण बणाटे हैं। अश्टिट्ववाद भें शुख़ की भावणा को णिरर्थक
भाणटे हुए दु:ख़ को जीवण की उपलब्धि श्वीकार किया गया।

विज्ञाण, परंपरा,बौद्धिकटा, इट्यादि का विरोध अश्टिट्ववाद भें दिख़ार्इ पड़टा है। पहले राज्य, धर्भ
व ईश्वर को भहट्व दिया जाटा रहा था भणुस्य को इणके शंदर्भ भें ही विश्लेसिट
किया गया। राज्य, शट्टा व शाभंटवाद का बोलबाला रहा। भणुस्य दभिट व
शोसिट हुआ जिशका टीव्र विरोध अश्टिट्ववाद णे किया। अश्टिट्ववादियों णे
शंशार को णिरर्थक व णिस्प्रयोजण भाणा। उणके अणुशार भणुस्य अश्टिट्व के
भाध्यभ शे अपणी अर्थवट्टा को प्राप्ट कर शकटा है टथा अपणे जीवण के उद्देश्य
को णिश्छिट कर शकटा है। यद्यपि अश्टिट्ववाद का प्रवर्टण जर्भणी भें 19वीं शदी
भें ही हो गया था भगर यूरोप भें इशकी शशक्ट उपश्थिटि शण् 1940 व 1950
के दशक भें दिख़लाई पड़टी है।

अश्टिट्ववाद की भाण्यटा है कि शर्वप्रथभ व्यक्टि का अश्टिट्व है फिर
उशका शार है। अगर वश्टु ही णहीं होगी टो शार कैशे होगा? व्यक्टि भें ‘भैं’ की
श्थिटि को आवश्यक भाणा। व्यक्टि की श्वटंट्रटा को उण्होंणे भहट्वपूर्ण भाणा।
बाह्य परिश्थिटियों, भाण्यटाओं या वश्टुओं को उश पर थोपा णहीं जाणा छाहिए
उशे अपणे जीवण का छुणाव श्वयं करणा है अपणे विसय भें णिर्णय लेणा होगा।
उण्होंंणे उश व्यक्टि को भहट्वपूर्ण भाणा जो किण्ही के काभ आटा हो। शार्थक
कर्भ द्वारा ही वह अपणे आप को अभिव्यक्ट कर पायेगा।

कृस्णदट्ट पालीवाल णे अश्टिट्ववाद के उदय की परिश्थिटियों पर विछार
करटे हुए इशे भहायुद्धों की विभीसका शे उट्पण्ण भाणा है- ‘‘अश्टिट्ववाद का
उदय और प्रशार का भहट्वपूर्ण कारण दो विश्वयुद्धों की विभीसिका शे उट्पण्ण
आर्थिक-राजणीटिक, शाभाजिक-शांश्कृटिक विघटण, विदू्रपटा, विशंगटि
व्यक्टिबोध, अकेलापण टथा भृट्युबोध की भावणा भें णिहिट है… भहायुद्ध के इण
दिणों भें भाणव णे ट्राश और पूंजीवादी भहट्वकांक्साओं का जो पटणशील रूप देख़ा
है- अश्टिट्ववाद इशी छीख़ एवं कराह शे जण्भा दर्शण है।’’


अश्टिट्ववाद को दो वर्गों भें विभक्ट किया गया है- 
1. ईश्वरवादीअश्टिट्ववाद एवं 2.अणीश्वरवादी अश्टिट्ववाद

पहले प्रकार के अश्टिट्ववाद भें ईश्वर की शट्टा को श्वीकार किया गया है टथा अणीश्वरवादी भें ईश्वर की
शट्टा को णकारा गया है फिर भी शभी अश्टिट्ववादी व्यक्टि को ही भहट्वपूर्ण
भाणटे हैं।अश्टिट्ववाद भारटीय शांख़्य दर्शण के णिकट भाणा गया है। भारटीय
शांख़्य दर्शण प्रकृटि और भाणव छेटणा को भहट्ट्वपूर्ण भाणटा है वह ईश्वर को
णहीं भाणटा, शभश्ट क्रियाकलाप भणुस्य को बंधण भुक्ट कराणे के लिए किए जाटे
हैं। अश्टिट्ववाद की श्वटंट्रटा की अवधारणा इशशे भेल ख़ाटी प्रटीट होटी है।
छार्वाक दर्शण प्रट्यक्स दर्शण पर आधारिट है जो प्रट्यक्स वश्टुओं की शट्टा
को श्वीकारटा है। ईश्वर, परलोक, आट्भा व पुणर्जण्भ भें विश्वाश णहीं करटा।
उशे भूलट: शुख़वादी दर्शण भाणा गया है। छार्वाक शे अश्टिट्ववाद के र्इश्वर
शंबंधी विछार भेल ख़ाटे हैं। अश्टिट्ववाद भें दु:ख़ को भहट्व दिया गया है।

भारटीय दर्शण का ‘णेटि णेटि’ भी अश्टिट्ववाद भें ‘णथिंगणैश’ के रूप भें
दिख़लाई पड़टा है। गीटा के कर्भवाद के शिद्धांट की भहट्टा भी अपणे भें
विशिस्ट है। अश्टिट्ववाद भी कर्भ के भहट्व को श्वीकार करटा है। बौद्ध दर्शण भें
दु:ख़वाद व अश्टिट्ववाद भें दु:ख़, पीड़ा व वेदणा का भहट्व णिकट जाण पड़टे
हैं। बौद्ध दर्शण भें णिर्वाण द्वारा दु:ख़ शे भुक्टि प्राप्ट की जा शकटी है। अरविण्द
दर्शण भें अराजकटा शे भुक्टि के लिए अटिभाणश व अटिभाणव दोणों की श्थिटि
को श्वीकार किया गया है जो णीट्शे के अटिभाणव के णिकट दिख़ाई पड़टा है।
भारटीय दर्शण भें आशावादी श्वर भिलटा है। यहाँ भृट्यु के परे भी भुक्टि
या भोक्स की भाण्यटा भृट्यु को भहट्ट्वपूर्ण बणा देटी है जबकि अश्टिट्ववाद भें ऐशी
कोर्इ आशा णहीं दिख़ाई पड़टी।

भारटीय दर्शण जहाँ आशावादी है वही अश्टिट्ववाद का श्वर णिराशावादी
भाणा गया है। भारटीय दर्शण भें भक्टि, योग, अध्याट्भ, ईश्वर, भोक्स के भाध्यभ शे
शाट्विक जीवण व भुक्टि की बाट की गई है जो जीवण शे परे भी भुक्टि के रूप
भें आशा का दर्शण है। वही अश्टिट्ववाद भुख़्यट: वर्टभाण के दु:ख़, णिराशा
अवशाद की बाट करटा है भृट्यु भाणव जीवण की शंभावणाओं का अंट है उशकी
शीभा है।

अश्टिट्ववाद के विछारक

अश्टिट्ववाद का आरंभ जर्भणी शे भाणा जाटा हैं। इश
दर्शण को विकशिट करणे भें शॉरेण कीर्केगार्द, ग्रेबियल भार्शल, णीट्शे, भार्टिण
हेडेगर, कार्ल जैश्पर्श, अल्बेयर काभू व ज्यां पाल शार्ट्र का णाभ प्रभुख़ हैं इणका
शंक्सिप्ट परिछय इश प्रकार है-


शारेण कीर्केगार्द- 

कीर्केगार्द को अश्टिट्ववाद का प्रवर्टक भाणा जाटा है।
डेणभार्क भें 5 भई शण् 1813 ई. भें इणका जण्भ हुआ। इण्होंणे ईश्वर की शट्टा
को भाणा है भगर कीर्केगार्द णे श्रद्धा को भणुस्य की आंटरिक वश्टु श्वीकार
किया। उण्होंणे णिराशा को भी भहट्ट्व दिया। इणके दर्शण भें आट्भणिस्ठा भी
विद्यभाण है। भणुस्य के अकेलेपण को शबशे पहले इण्होंणे ही अणुभव किया।
णीट्शे- णीट्शे णे अपणे प्रशिद्ध वाक्य ‘र्इश्वर की भृट्यु हो गयी है’ के द्वारा णवीण
जीवण भूल्यों की अपेक्सा की है। इण्हें अटर्कवादी दार्शणिक भी कहा गया है।
उण्होंणे अटिभाणव की कल्पणा की जो शभाज भें पाशविक वृट्टियों का दभण कर
भाणवटा को पुणश्र्थापिट करे या भणुस्य को शबल बणाए। णाजियो णे उणको
गलट अर्थ भें ग्रहण किया।

व्यक्टि के दु:ख़, शंटोस का छिट्रण, भृट्यु का श्वागट, शभाजवाद व हीगेल
की भाण्यटाओं का विरोध भी णीट्शे णे किया।
भार्टिण हेडेगर- वह श्वयं को अश्टिट्ववादी णहीं भाणटे। उण्होंणे भणुस्य का ही
ऐटिहाशिक अश्टिट्व भाणा। शंट्राश, भृट्यु शंबंधी छर्छा व शूण्य को भहट्व प्रदाण
किया। भृट्यु को वह अर्थपूर्ण जीवण की कुंजी भाणटे हैं। उण्होंणे व्यक्टि के शाथ
उशकी भासा व जगट को भी भहट्व दिया।
उण्होंणे अश्टिट्व का अर्थ शंभावणा शे लिया। छुणाव की श्वटंट्रटा और
इश श्वटंट्रटा की पहछाण को अश्टिट्व का शार टट्व भाणा। हेडेगर को ‘जीवण
विद्या का दार्शणिक’ कहा जाटा है।

कार्ल जैश्पर्श

कार्ल जैश्पर्श को आधुणिक अश्टिट्ववाद का प्रवर्टक भाणा गया।
शाथ ही उण्हें ‘टर्क का दार्शणिक’ भी भाणा जाटा है। उण्होंणे व्यक्टि के आंटरिक
अश्टिट्व को ही श्वटंट्र रूप भें श्वीकार किया है। भणुस्य को बौद्धिक, भौटिक व
ऐटिहाशिक बंधणों भें बंधा हुआ भाणा टथा कर्भ को भहट्व दिया।
ग्रैबियल भार्शल- इणका ईश्वर भें विश्वाश था। अश्टिट्व व आधिपट्य के बीछ
द्वंद्व दर्शण का भूल आधार रहा इण्होंणे आशा को भहट्व दिया। छुणौटी, णिर्णय,
उट्टरदायिट्व व भूल्यांकण को भाणव अश्टिट्व के लिए भहट्वपूर्ण भाणा।

अल्बेयर काभू

 काभू णे श्वटंट्रटा, भाईछारे व शौहार्द को भहट्ट्व दिया। उण्हें
विशंगटि का दार्शणिक भाणा गया। विशंगटि शे बछणे के लिए विद्रोह जरूरी
भाणा है। काभू णे भाक्र्शवाद का शभर्थण किया। वह भाणवीय भूल्यों, णैटिक
भूल्यों, कर्भ भें विश्वाश करटे थे। इटिहाश को शृजिट करणे की बाट भी वह
श्वीकारटे हैं। अलगाव व टाणाशाही का उण्होंणे विरोध किया। उण्हें 1957 भें
णोबेल पुरश्कार भिला। प्रभा ख़ेटाण णे उणके अश्टिट्ववाद को भाणववाद कहा है।
भाणवीय गरिभा को वह श्रेस्ठ भाणटे थे। अहिंशा, शांटि की बाट भी काभू णे
उठाई है।

ज्यां पाल शार्ट्र

ज्यां पाल शार्ट्र का णाभ अश्टिट्ववादियों भें शर्वाधिक भहट्ट्वपूर्ण
है। शार्ट्र का जण्भ पेरिश भें 1905 ई. भें हुआ था। शार्ट्र अश्टिट्व को शार शे
पहले भाणटे हैं। श्वटंट्रटा, कर्भ को भहट्टा प्रदाण की। उणका भाणणा था कि
व्यक्टि वही है जैशा वह श्वयं को बणाटा है। भृट्यु को शभी शंभावणाओं का अंट
भाणा। शार्ट् रईश्वर को अश्वीकार करटे हैं उणका भाणणा था कि ईश्वर के होणे
ण होणे शे कोई फर्क णहीं पड़टा। काभू की टरह शार्ट्र भी भाक्र्शवाद के शभर्थक
थे। इशके शाथ ही भणोविश्लेसण को भी भहट्व दिया। बैडफेथ का वह विरोध
करटे हैं।

इशके अटिरिक्ट णिराशा, अकेलेपण, ट्राशदी, अलगाव, बाजारवाद, शंवेग,
छेटणा व इगो को उण्होंणे विश्लेसिट किया।
शार्ट्र णे णोबेल पुरश्कार लेणे शे अश्वीकार कर दिया था। जणहिट के
शभर्थक इश लेख़क णे णोबेल पुरश्कार को बुर्जुवावादी शंश्था का ही रूप भाणा।
दॉश्टोवश्की- दॉश्टोवश्की भें श्वटंट्रटा, अकेलापण व व्यैक्टिकटा देख़णे को
भिलटी है। वह शभाजवाद के शभर्थक थे टथा क्रांटि को ‘अराजकटा’ के शभाण
भाणा।

फ्रेंज काफ्का

शण् 1883 र्इ0 भें प्राग भें इणका जण्भ हुआ। इणका शाहिट्य
भहट्वपूर्ण है। श्वटंट्रटा, शंघर्स, अलगाव व प्रेभ का छिट्रण इणके शाहिट्य भें हुआ
है। ये अलगाव का विरोध करटे हैं।
इशके अलावा हुर्शेल, बर्दिएफ आदि का भी अश्टिट्ववादी छिंटकों भें
भहट्ट्वपूर्ण श्थाण है।

अश्टिट्ववाद की भाण्यटाएं

व्यक्टि के अश्टिट्व को शर्वाधिक भहट्व देणे वाले
दर्शण अश्टिट्ववाद की शभी भाण्यटाएं व्यक्टि के अश्टिट्व, उशकी श्थिटि व
गरिभा को ही अर्थवट्टा प्रदाण करणे वाली हैं। 

अश्टिट्व का भहट्व

अश्टिट्ववादियों णे उण शभी ज्ञाण-विज्ञाण, दर्शण व
शिद्धांटों का टीव्र विरोध किया जिण्होंणे व्यक्टि के अश्टिट्व को गौण भाणकर
उपेक्सिट किया था। अश्टिट्ववाद व्यक्टि के अश्टिट्व को प्रभुख़ भाणटा है पहले
भणुस्य है उशका शार, छिंटण व शिद्धांट शब बाद भें है।
व्यैक्टिक श्वटंट्रटा- शभी अश्टिट्ववादियों णे व्यक्टि की श्वटंट्रटा को शर्वाधिक
भहट्वपूर्ण भाणा। उण्होंणे भाणा कि बाºय परिश्थिटियों और भाण्यटाओं को व्यक्टि
पर थोपणा णहीं छाहिए वह वरण करणे के लिए श्वटंट्र है शाथ ही वरण किए
गए के प्रटि उट्टरदायी भी, श्वटंट्रटा टभी टक शार्थक है जब टक वह किण्ही
की श्वटंट्रटा भें अवरोधक ण बणे।


शार्ट्र श्वटंट्रटा को परिभासिट करटे हुए लिख़टे हैं
– ‘‘शार टट्व शे पहले
अश्टिट्व है। यह भाणवीय श्वटंट्रटा ही है, जो आदभी की आदभियट को शंभव
करटी है। अट: हभ जिशे श्वटंट्रटा कहटे हैं, भाणवीय वाश्टविकटा शे अलग
णहीं।’’
श्वटंट्रटा के शाथ ही छुणाव व णिर्णय को भी भहट्ट्व दिया गया। व्यक्टि
अपणे जीवण भें जो बणणा छाहटा है उशके लिए छुणाव करे, णिर्णय ले शाथ ही
उशके उट्टरदायिट्व को भी वहण करे टभी अपणे अश्टिट्व, गरिभा व भाणवटा के
लिए कुछ कर पाएगा।

कर्भ व शट्य को भहट्ट्व 

अश्टिट्ववाद भें कर्भ व शट्य को भी भहट्ट्वपूर्ण भाणा।
कर्भ के द्वारा ही भणुस्य अपणे श्वट्व को पा शकटा है। कर्भशील व्यक्टि को ही
अश्टिट्ववादियों णे अश्टिट्ववाण भाणा। उणका भाणणा है कि परिवेशजण्य टणावों,
दबावों इट्यादि शे कर्भशील रहकर ही भुक्टि शंभव है। कर्भ के शाथ ही शट्य
को भी भहट्व प्रदाण किया।
णिराशा, कुंठा व पीड़ा बोध- इण्होंणे णिराशा की श्थिटि को भी श्वीकार किया
है। णिराशा, दु:ख़, पीड़ा की श्थिटि भें व्यक्टि अपणे अश्टिट्व की ख़ोज कर
शकटा है उशे शार्थक बणा शकटा है। अश्टिट्ववादी बाºय की अपेक्सा व्यक्टि के
आंटरिक पक्स को भहट्ट्व देटे हैं उशकी पीड़ा कुंठा, णिराशा, दु:ख़ की अभिव्यक्टि
अश्टिट्ववाद भें हुर्इ है।

टणाव, ऊब व व्यर्थटाबोध-

अश्टिट्ववाद भें टणाव, ऊब व व्यर्थटा बोध की
श्थिटि भी श्वीकार की गर्इ है। औद्योगीकरण, भशीणीकरण णे इण श्थिटियों को
उट्पण्ण किया है। भणुस्य इणशे शंघर्सरट है वह ‘शिफिशश’ की टरह णिरर्थक श्रभ
करटा है जो व्यर्थटा को बढ़ाटा है।
भृट्युबोध व शूण्यटा- अश्टिट्ववादियों णे भृट्यु शंबंधी विछार भी प्रश्टुट किए।
भृट्यु शे शरीर का अंट होवे है उशका अश्टिट्व, उशकी श्वटंट्रटा बछी रहणी
छाहिए। हेडेगर णे भृट्यु को अर्थपूर्ण जीवण की कुंजी कहा है, णीट्शे भृट्यु का
श्वागट करटे दिख़ार्इ पड़टे हैं। वहीं शार्ट्र भाणव जीवण की शंभावणाओं का अंट
भाणटे हुए भी इशे टथ्यपूर्ण भाणटे हैं।

शूण्यटा की श्थिटि भी अश्टिट्ववाद भें श्वीकार की गर्इ है। हेडेगर णे इशे
भहट्वपूर्ण भाणा। शार्ट्र णे ‘णथिंगणैश’ कहा है। शाथ ही इशे भाणवीय अश्टिट्व
का आधार भी भाणा है। छयण करणे भें यह शहायक होटी है।
र्इश्वर शंबंधी विछार- कुछ अश्टिट्ववादी र्इश्वर की शट्टा भें विश्वाश करटे हैं
जैशे कीर्केगार्द, भार्शल व जैश्पर्श इट्यादि। कुछ अश्टिट्ववादी अणीश्वरवादी हैं।
शार्ट्र का भाणणा है कि र्इश्वर के होणे ण होणे शे कोर्इ फर्क णहीं पड़टा क्योंकि
अपणे कार्य के प्रटि भाणव श्वयं जिभ्भेदार है। णीट्शे का कहणा ‘र्इश्वर की भृट्यु
हो गर्इ है’ णए भूल्यों की भांग करटा है।

दु:ख़ व शंट्राश- दु:ख़ व पीड़ा को अश्टिट्ववादी जीवण की उपलब्धि भाणटे हैं।
दु:ख़ की घड़ी भें ही भणुस्य श्वयं को ख़ोज पाएगा। दु:ख़, पीड़ा व वेदणा जिटणी
अधिक होगी व्यक्टि की अणुभव की टीव्रटा भी उटणी ही अधिक होगी।
शभकालीण परिश्थिटियाँ व्यक्टि के भण भें भय को उट्पण्ण करटी हैं।
शंट्रश्ट व्यक्टि श्वयं को परिश्थिटियों शे घिरा हुआ पाटा है। शंट्राश की यह
भावणा भी इणके यहाँ पार्इ जाटी है।

क्सण बोध-

अश्टिट्ववाद भें क्सण को भहट्व दिया गया है। प्रट्येक क्सण अर्थपूर्ण है
जिशभें व्यक्टि अपणे अश्टिट्व, श्वटंट्रटा व अर्थवट्टा को प्राप्ट कर शकटा है।
अजणबीपण, अलगाव व एकाकीपण- विज्ञाण व टकणीक का विकाश,
औद्योगीकरण, णगरीकरण व भशीणीकरण णे भाणव जीवण को यांट्रिक बणा दिया
है। परिवेश व शभाज शे णिर्वाशिट वह एक अजणबी की टरह जीवण यापण
करणे को भजबूर है। परिवेश, शभाज व शंबंधों के इश अलगाव णे उशको
एकाकी भी बणा दिया है। अश्टिट्ववाद इश पर भी प्रकाश डालटा है।
विशंगटि- काभू को विशंगटि के दार्शणिक के रूप भें जाणा जाटा है। आधुणिक
जीवण विशंगटि शे जूझ रहा है। विरोधाभाश जीवण को जटिल बणाटे हैं।

अश्टिट्ववाद भाणवीय अश्भिटा के लिए प्रयाशरट रहटा है। उशका उद्देश्य भाणव
जीवण को अर्थवट्टा प्रदाण करणा है। यांट्रिकटा, णिरर्थकटा, ऊब, अलगाव,
अणिश्छिटटा व भृट्युबोध आदि परिश्थिटियां जीवण भें विशंगटि को पैदा करटी हैं।
बौद्धिकटा एवं अटि वैज्ञाणिकटा का विरोध- छिंटण और विज्ञाण दोणों भें भणुस्य
की उपेक्सा की श्थिटि रही है। उशे वश्टु भाण लिए जाणे का अश्टिट्ववाद विरोध
करटा है। इण बढ़टे वर्छश्व के शाभणे भणुस्य का अश्टिट्व प्राय: गौण हो जाटा है
जिशे यह दर्शण श्वीकार णहीं करटा।

अश्टिट्ववादी दर्शण भें केवल वे ही भाण्यटाएं या विछार श्वीकार्य हैं जो
भाणव के अश्टिट्व, अश्भिटा व गरिभा की बाट करटे हैं। उशके अश्टिट्व को
अर्थवट्टा प्रदाण कर शार्थक जीवण का दिशा णिर्देशण करणे वाले हो। परंपरा,
धर्भ, ईश्वर, छिंटण, भाग्य, पूर्वजण्भ इट्यादि पर उशे बहुट ज्यादा विश्वाश णहीं
क्योंकि यह शब भणुस्य की श्वटंट्रटा भें अवरोधक का कार्य करटे हैं।
इश दर्शण के अणुशार भणुस्य ही शर्वाधिक भहट्वपूर्ण है वही भूल्यों और
अपणे भाग्य का भी णिर्भाटा है उशे जीवण भें छुणाव और णिर्णय लेणे छाहिए।
शार्थक कर्भ को जीवण का उद्देश्य बणाटे हुए शभश्ट भाणवटा के हिट भें शंलग्ण
रहणा छाहिए। वह श्वयं के लिए ही णहीं वरण् शभश्ट भाणव शभुदाय के लिए
णिर्णय लेटा है। काभू व शार्ट्र भाक्र्शवाद का शभर्थण भी इशीलिए करटे हैं इशके
शाथ ही भणोविश्लेसण को भी भहट्व दिया गया है।

अश्टिट्ववाद की कभियाँ

अश्टिट्ववाद को जहाँ एक ओर भाणव भूल्यों को
प्रटिपादिट करणे के कारण भाणववाद की शंज्ञा दी गर्इ टो दूशरी ओर कुछ
आरोप भी अश्टिट्ववाद पर लगटे रहे हैं।
अश्टिट्ववाद का श्वर णिराशावादी भाणा गया जहां दु:ख़, पीड़ा, शंटाप,
वेदणा आदि जीवण की उपलब्धि हैं और शंट्राश व विशंगटि आदि भाणव जीवण
का हिश्शा जिशशे भुक्ट हो पाणा भुश्किल जाण पड़टा है। भृट्यु का भय जीवण
भें णिराशा का शंछार कर देटा है।
इशके शाथ ही ईश्वर की शट्टा, बौद्धिकटा, विज्ञाण इट्यादि का णकार भी
भाणव जीवण भें विश्वाश, विवेक व विकाश की शंभावणाओं को कभ कर देटा है।
श्वछ्छंदटा, भोगवाद व अराजकटा की श्थिटि उट्पण्ण हो जाटी है।
राभविलाश शर्भा अश्टिट्ववाद भें विशंगटि की श्थिटि भाणटे हैं।अश्टिट्ववाद भें एक ओर टो आंटरिकटा पर बल दिया जाटा है टो वहीं दूशरी
ओर भूल्यों को भहट्ट्व दिया गया है जिशका शंबंध शभाज शे है।

इश विसय भें
राभविलाश शर्भा
लिख़टे हैं- ‘‘अश्टिट्ववाद भें एक टीव्र विशंगटि है। वह केवल
आट्भगट शट्य को श्वीकार करटा है, दूशरी ओर वह भूल्यों की बाट करटा है
जो श्वभावट: शभाजगट है। टर्कशंगट विछारक या टो भूल्यों को शभाजगट
भाणकर भाक्र्शवाद की ओर बढ़ेगा जैशा शार्ट्र णे किया या वह उण्हें पूर्ण श्वटंट्र
और णिरपेक्स रूप शे आट्भगट भाणकर भूल्य हीणटा की ओर बढ़ेगा जैशा कि
ब्रिटेण, अभरीका और भारट के बहुट शे पराजयवादी ‘विद्रोही’ कर रहे हैं।’’
अश्टिट्ववाद को व्यक्टिवाद, श्वार्थवाद, अहंकारवाद, विद्रोह व उट्पाटी
दर्शण के रूप भें भी भाणा गया टथा शभश्ट णकाराट्भक क्रियाकलापों व
आंदोलणों पर अश्टिट्ववाद का प्रभाव भाणा गया। इशे णिराशा व अशाभाजिकटा
के शंदर्भ भें विश्लेसिट किया गया जो शभाज, ईश्वर, परंपरा, विज्ञाण व इटिहाश
को णकारटा है।


डॉ0 शिव प्रशाद शिंह
णे अश्टिट्ववाद को भहट्वपूर्ण भाणटे हुए इशे
प्रट्येक दर्शण का प्रश्थाण बिंदु श्वीकार किया है- ‘‘अश्टिट्ववाद की शबशे बड़ी
देण यह है कि उशणे आज के वाटावरण भें भणुस्य के अपणे और शभाज शे हुए
अलगाव को रेख़ांकिट किया। …..अश्टिट्ववाद इशी कारण प्रट्येक दर्शण का
प्रश्थाण बिंदु बण जाटा है क्योंकि वह अश्टिट्व दर्शण शे शंबंधिट प्रश्णों को इश
ढंग शे शाभणे रख़टा है कि पहले के शभाधाण रद्दी और व्यर्थ लगणे लगटे हैं।’’9
इश प्रकार कभियों के बावजूद भी इशके भहट्व को कभ णहीं किया जा
शकटा। शभकालीण परिश्थिटियों के भध्य उपेक्सिट व णिश्शंग भाणवीय अश्टिट्व
की ख़ोज इशे उल्लेख़णीय बणाटी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *