आक्षेपणीय विज्ञापन अधिनियम 1954 क्या है?

By | February 15, 2021


भारत में यद्यपि आज शिक्षा का प्रचार प्रसार बहुत हो चुका है और शिक्षा
की दर (Literacy rate) भी बढ़ गया है किन्तु इसके बावजूद अवैज्ञानिक उपचार,
तंत्र-मंत्र, जादू-टोने इत्यादि के प्रति लोगों में अन्धविश्वास की कमी नहीं है। ऐसे
में लोग तमाम लाईलाज रोगों के उपचार के लिये ऐसे उपायों पर आसानी से
विश्वास कर लेते हैं जिनसे उपचार के बजाय और अधिक हानि की गुंजाइश ज्यादा
रहती है। 1954 में जब यह एक्ट बनाया गया था तब अशिक्षा, गरीबी आदि के
कारण हालात और अधिक गम्भीर थे। हालांकि आज भी जहां-तहां नीम-हकीमों,
तांत्रिकों, रहस्यमयी तरीकों से इलाज करने तथा जिन रोगों का को इलाज न भी
हो उन्हें चमत्कारिक तरीके से ठीक कर देने वाले लोगों व इन पर विश्वास करने
वालों की भारी तादाद है। ऐसे उपायों का विज्ञापन करने व उन्हें प्रचारित प्रसारित
करने पर रोक होना आवश्यक है क्योंकि विशेषकर समाचार पत्रों व समाचार
माध्यमों में आने वाले विज्ञापनों पर लोग अधिक विश्वास करते हैं और पढ़े-लिखे
तथा विवेकपूर्ण लोग भी ऐसे विज्ञापनों के झांसे में आ जाते हैं। इस अधिनियम के अनुसार हर प्रकार के दस्तावेज, सूचना, लेबल, प्रकाश या ध्वनि
आदि के माध्यम से दी गई जानकारी इत्यादि को विज्ञापन माना गया है। इसके
तहत इन वस्तुओं को औषधि माना गया है –

  1. मनुष्यों या पशुओं के रोगों के निदान या उपचार के लिये प्रयोग की
    जाने वाली को वस्तु।
  2. मनुष्यों या पशुओं के खाने पीने या बाहरी उपयोग की को वस्तु।
  3. मनुष्यों या पशुओं की संरचना, आकार आदि पर प्रभाव डालने के आशय
    से प्रयुक्त खाद्य पदार्थ के अलावा को अन्य वस्तुएं।
  4. ऐसे किसी पदार्थ को बनाने में प्रयुक्त होने वाले अन्य पदार्थ आदि।
    इसके अतिरिक्त ऐसे उपायों के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले विद्युत चालित
    या अन्य उपकरणों के प्रयोग सम्बन्धी विज्ञापन भी आपत्तिजनक माने जाते
    हैं।

चमत्कारिक उपचार से आशय ऐसे उपचारों से है जो तंत्र-मंत्र,
ताबीज-गंडे या अन्य उपायों से है जो पशुओं या मनुष्यों की शारीरिक
संरचना, आकार इत्यादि पर को प्रभाव डालने का दावा करते हों।
इसके तहत गर्भपात, यौन सुख में वृद्धि करने, महिलाओं सम्बन्धी
कतिपय अन्य समस्याओं का निवारण करने सम्बन्धी औषधियों के विज्ञापन
तथा किसी प्रकार की औषधि तथा चमत्कारिक उपाय के बारे में भ्रम या
विश्वास उत्पन्न करने वाले विज्ञापनों के निषेध का प्राविधान है। इस
अधिनियम के तहत कोढ़, पागलपन, मिर्गी इत्यादि विभिन्न 54 प्रकार के ऐसे
रोगों के इलाज की औषधियों सम्बन्धी विज्ञापन भी प्रतिबन्धित हैं जिनके
उपचार की वैज्ञानिक विधि विकसित नहीं हु है या केवल निर्धारित
वैज्ञानिक प्रक्रिया से ही इनका निदान सम्भावित हो।
साथ ही तंत्र-मंत्र, गंडे, ताबीज आदि तरीकों के उपयोग से
चमत्कारिक रूप से रोगों के उपचार या निदान आदि का दावा करने वाले
विज्ञापन भी निषेधित हैं। इसके अनुसार ऐसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भ्रमित करने वाले
विज्ञापन दण्डनीय अपराध हैं जिनके प्रकाशन के लिये विज्ञापन
प्रकाशित/प्रसारित करने वाले व्यक्ति के अतिरिक्त समाचार पत्र या पत्रिका
आदि का प्रकाशक व मुद्रक भी दोषी माना जाता है।

इस अधिनियम के अनुसार पहली बार ऐसा अपराध किये जाने पर
छह माह के कारावास अथवा जुर्माने या दोनों प्रकार से दंडित किये जाने
का प्रावधान है जबकि इसकी पुनरावृत्ति करने पर एक वर्ष के कारावास
अथवा जुर्माने या दोनों से दंडित किये जाने की व्यवस्था है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि यदि इस प्रकार की बीमारियों
से सम्बन्धित वैज्ञानिक या सामाजिक मान्यता के दृष्टिकोण से समाज को
उचित दिशा दिये जाने के प्रयोजन से को पुस्तक प्रकाशित की जाय या
सरकार से अनुमति प्राप्त करने के उपरान्त किसी औषधि का विज्ञापन
प्रकाशित किया जाय तो वह इस कानून की परिधि में नहीं आते हैं।

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