आद्रता के प्रकार

By | February 16, 2021


वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प को आद्रता कहते है। वायुमण्डल के संगठन में
जलवाष्प का योग 2 प्रतिशत होता है। परन्तु यह मात्रा स्थान, स्थान पर बदलती रहती है
जो शून्य से लेकर 5 प्रतिशत तक हो सकती है। समस्त जलवाष्प का 50 प्रतिशत भाग
वायुमण्डल के निचले 2000 मीटर (6500 फीट) तक वाले भाग में विद्यमान रहता है
वायु में जल पदार्थ के तीनों रूपो-ठोस (हिमकण) द्रव (जलबिन्दू) तथा गैस
(जलवाष्प) में विद्यमान रह सकता है।जल, सामान्यतया वायु में स्वादरहित, गंध रहित एवं
पारदश्री गैस के रूप में विद्यमान रहता है। इस गैस को ही ‘‘जलवाष्प’’ कहते है। वायुमण्डल
में जलवाष्प के विद्यमान रहने के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ है।
वायुमंड में जलवाष्प की मात्रा, स्थान और समय के अनुसार बड़ी ही परिवर्तनशील
होती हैं जीवन के लिए जलवाष्प अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं जलवाष्प इन कारणों से
महत्वपूर्ण है –

  1. वायुमण्डल में जलवाष्प विकिरण को सोखती है। इसलिए यह पृथ्वी द्वारा
    उष्मा विकिरण का एक सक्रिय नियंत्रक है।
  2. यह गुप्तताप को छोड़कर मौसम में परिवर्तन लाती है
  3. यह वर्षण की क्षमता को निर्धारित करती है
  4. वायुमण्डलीय हवा में मौजूद जलवाष्प की मात्रा मानव शरीर के ठंडा होने
    की दर को प्रभावित करती हैं।
    वायुमण्डल में जलवाष्प महासागरों, झीलों, नदियों, हिमक्षेत्रों तथा हिमानियों से
    होने वाली वाष्पीकरण के द्वारा आता है। इन स्त्रोतो के अतिरिक्त नम धरातल से
    वाष्पीकरण, पौधों से वाष्पोत्सर्जन तथा जानवरों के श्वसन भी वायुमण्डल को जलवाष्प
    प्रदान करते हैं। पवन तथा अन्य वायुमण्डलीय संचरणो के द्वारा विभिन्न स्त्रोतो से वाष्पीकृत जल
    एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचता है। अनुकूल परिस्थितियों में यह जलवाष्प संघनित
    होकर वर्षा, बर्फ तथा ओलो के रूप में पृथ्वी के धरातल पर गिरता है। यदि वृष्टि महासागर
    पर होती है तो एक चक्र पूरा होता है और दूसरा चक्र प्रारंभ होता है। किन्तु जो वृष्टि
    स्थल खण्डो पर होती है। उसे चक्र पूरा करने में देर लगती है स्थल पर होने वाली वृष्टि
    के एक भाग को धरती सोख लेती है इसके कुछ अंश को पौधे भी अवशोषित करते हैं।
    जिसे वे बाद में वाष्पोत्सर्जन के द्वारा पुन: वायुमण्डल में छोड़ देते हैं। बाकी जल जो भूमि
    में प्रवेश कर जाता भूमिगत जल के रूप मे धरातल के नीचे बहता है और अंत में झरनों,
    झीलों या नदियों के रूप में निकल जाता है। 
जब वृष्टि की मात्रा धरती की अवशोषण
क्षमता से अधिक होती है तो अतिरिक्त जल धरातल पर बहता हुआ नदियों या झीलों मे
पहुच जाता है अंतत: जो जल धरती में प्रवेश करता है या धरातल पर बहता है। वह भी
या तो महासागर में वापस पहुँचकर वाष्पीकरण द्वारा फिर वायुमण्डल में जाता है या स्थल
से ही वाष्पित होकर सीधा वायुमंडल में पहॅुच जाता है। महासागरों, वायुमण्डल और महाद्वीपों के बीच जल का आदान-प्रदान वाष्पीकरण,
वाष्पोत्सर्जन संघनन और वर्षण के द्वारा निरंतर होता रहता है। पृथ्वी पर जल के अनंत
संचरण को ‘‘जलीय चक्र’’ कहते हैं।

आद्रता के प्रकार

हम जानते है किसी स्थान पर किसी समय वायु मंडल में गैस के रूप में विद्यमान इस अदृश्य जलवाष्प को वायु की आद्रता कहते हैं वायु में विद्यमान आद्रता को दो प्रकार से व्यक्त किया जाता हैं-

1. निरपेक्ष आद्रता –

हवा के प्रति इका आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आद्रता कहते हैं सामान्यत: इसे ग्राम प्रतिघन मीटर में व्यक्त किया जाता है।वायुमंडल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णत: तापमान पर निर्भर होती है ।हवा की आद्रता स्थान-स्थान पर और समय-समय पर बदलती रहती है ठंडी हवा की अपेक्षा गर्म हवा अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है।उदाहरण के लिए 100 सेल्सियस के तापमान पर एक घनमीटर हवा 11.4 ग्राम जलवाष्प के रूप में धारण कर सकती है। यदि तापमान बढ़कर 210 सेल्सियस हो जाए तो हवा का वही आयतन (एक घनमीटर) 22.2 गा्रम जलवाष्प ग्रहण कर सकेगा।अत: तापमान में वृद्धि हवा की जल धारण क्षमता को बढ़ाती है, जबकि तापमान में गिरावट जलधारण की क्षमता को घटाती है।फिर भी यह एक अटल सिद्धांत के रूप मे पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि तापमान और वायुदाब मे परिवर्तन के साथ ही हवा के इस प्रकार आयतन में भी परिवर्तन होता रहता है और इस प्रकार निरपेक्ष आद्रता भी बदल जाती है।

2. सापेक्ष आद्रता –

किसी निश्चित आयतन की वायु में वास्तविक जलवाष्प की मात्रा तथा उसी वायु के किसी दिए गए तापमान पर अधिकतम आद्रता धारण करने की क्षमता का अनुपात हैं। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है –

       वायु में वाष्प दबाव सापेक्ष 

आद्रता = —————————-X 100 

संतप्त वाष्प दबाव

यदि हवा किसी तापमान पर जितनी आद्रता धारण कर सकती है, उतनी आद्रता धारण कर लेती है तो उसे ‘संतृप्त वायु’ कहते है। इसके बाद उस हवा में आद्रता धारण करने की क्षमता नही रह पाती।इस बिन्दू पर किसी वायु की सापेक्ष आद्रताशत-प्रतिशत होती है।सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि वह तापमान जिस पर एक दी गयी वायु पूर्णतया संतृप्त हो जाती हैं, उसे संतृप्त बिन्दू या ओसांक कहते है।

सापेक्ष आद्रता

सापेक्षिक आद्रता का महत्व – 
सापेक्षिक आद्रता का जलवायु में अधिक महत्व होता है इसी की मात्रा पर वर्षा की संभावना होती हैं ऊॅंचे प्रतिशत पर वर्षा की संभावना तथा कम प्रतिशत पर शुष्क मौसम की भविष्यवाणी की जाती है सापेक्षिक आद्रता पर ही वाष्पीकरण की मात्रा निर्भर करती है। अधिक सापेक्षिक आद्रता होने पर वाष्पीकरण कम तथा कम होने पर वाष्पीकरण अधिक होता हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *