आयुर्वेद का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

By | February 15, 2021


आयु का मान

पुरुष की प्रकृति, विकृति धातु, मांस, मज्ज़, अस्थि आदि से शरीर की बनावट,
अनुकूलता, मन:स्थिति, आहार-शक्ति, व्यायाम-शक्ति देखकर उसके दीर्घायु या अल्पायु
होने का आकलन किया जाता है। सामान्यत: घृत, दुग्ध, तैल, मांसरस के नित्य सेवन
से व्यक्ति बलवान् होता है।

कफ, पित्त, वात और मध्यायु से युक्त वाले व्यक्ति अल्पायु होते हैं। रोगी एवं
निरोगी व्यक्तियों में विकृति लक्षणों को देखकर उनके आयु की परीक्षा की जाती है कि
वह कितने वर्श, मास, पक्ष, सप्ताह, दिन या घण्टे तक जीवित रहेगा। इन्द्रियों में,
इन्द्रियार्थों के प्रति अर्थात् शब्द, स्पर्ष, रुप, रस, गन्ध आदि के विशय में मन, बुद्धि एवं
चेश्टाओं की विकृतियों को देखकर भी आयु के प्रमाण को जाना जाता है, जिसका
वर्णन अरिश्ट के प्रकरण संहिताओं में किया गया है।

इस प्रकार आयुर्वेद शास्त्र के द्वारा आयु का स्वरुप, जिन साधनों से उसकी
रक्षा का ज्ञान होता है, वह सब जाना जाता है। इन सब बातों को जानकर हितकर
आहार-विहार एवं आचरण से आयु में स्थिरता आती है, अन्यथा अज्ञानता पूर्वक
असावधानी करने एवं स्वास्थ्यकर नियमों की अवहेलना करने से आयु का विनाष होता
है। आयुर्वेद आयु की रक्षा के साधनों का उपदेष करने वाला शास्त्र है।

वेद शब्द का अर्थ

वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। संस्कृत के विद् धातु से वेद शब्द बना है। विद्
धातु का प्रयोग चार अर्थों में किया जाता है। ये विद् धातु के अर्थ होते हैं – 1-सत्ता
अर्थात् अस्तित्व 2-ज्ञान, 3-विचार 4-प्राप्ति। अर्थात् –

  1. जिससे अस्तित्व का बोध हो – विद्यते, अस्ति।
  2. जिससे जाना जाये – वेत्ति, ज्ञायते।
  3. जिससे आयु के विशय में विचार किया जाये – विन्ते, विचार्यते और
  4. जिससे आयु को प्राप्त किया जाये – विन्दते, विन्दति लभ्यते। इन्हीं चारों अर्थों में
    विद् धातु प्रयुक्त होती है।

आयुर्वेद शब्द का अर्थ

इस प्रकार आयु और वेद इन दोनों शब्दों की व्याख्या के पश्चात सुगमता से
आयुर्वेद शब्द का अर्थ बुद्धिगम्य हो जाता है एवं जिस शास्त्र में आयु का अस्तित्व हो,
जिससे आयु का ज्ञान हो, जिसमें आयु सम्बन्धी विचार हो और जिससे आयु की प्राप्ति
हो, उस शास्त्र को ‘आयुर्वेद’ कहते हैं अर्थात् आयुर्वेद आयु की रक्षा के साधनों का
उपदेष करने वाला शास्त्र है। आयुर्वेद शाखा, विद्या, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और
तन्त्र ये शब्द एक अर्थ के बोधक हैं। अर्थात्

  1. जिस शास्त्र के द्वारा आयु का अस्तित्त्व बना रहे।
  2. जिसके द्वारा आयु की प्राप्ति या लाभ हो।
  3. जिसके द्वारा आयु का ज्ञान हो और
  4. जिसके द्वारा आयु पर विचार किया जाय, उस शास्त्र का नाम आयुर्वेद है।

आयुर्वेद
शाश्वत, नित्य और पवित्र है, यह स्वर्गदायक, सुखदायक, यश, आयु, का वर्धक तथा
वृत्ति अर्थात् जीविका का संचालक है।

आयुर्वेद की परिभाषा एवं प्रकार

जिस शास्त्र में हितायु, अहितायु, सुखायु और दु:खायु इन चार प्रकार की आयु
के लिए हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण एवं कर्म के प्रमाण का विवेचन और जिसमें
आयुओं के स्वरुप का वर्णन किया गया हो उसे ‘आयुर्वेद’ कहते हैं।6 आयुर्वेद शास्त्र
आयु की व्याख्या करता है, दीर्घ और आरोग्यमय जीवन की प्राप्ति का मार्ग निर्दिश्ट
करता है। आयु की स्थिरता, स्वास्थ्य-संरक्षण और व्याधि-परिमोक्षण का शास्त्र है।

1-सुखायु –

जो व्यक्ति शारीरिक या मानसिक रोगों से ग्रसित नहीं हैं, वे युवावस्था-संपन्न
हैं, बल, वीर्य, यश, पौरुष एवं पराक्रम युक्त हैं, जो शास्त्रज्ञ तथा व्यवहारज्ञ हैं जिसकी
इन्द्रियाँ प्रसन्न एवं सन्तुश्ट हैं, जो समृद्धि सुन्दर उपभोग-संपन्न हैं, जिसको प्रत्येक
कार्य में सफलता प्राप्त है और जो यथेश्ट विचाराषील है, उसकी आयु सुखायु कही
जाती है।

2-दु:खायु –

सुखाय के विपरीत स्थिति दु:खायु कही जाती है।

3-हितायु –

जो व्यक्ति सबका हितैषी है, दूसरे के धन का लोभ नहीं करता एवं सत्य
बोलता है, शान्त प्रकृति का है, सोच-समझकर कदम उठाने वाला है, सावधान रहता
है, धर्म, अर्थ तथा काम का विरोध रहित रूप से प्रयोग करता है, पूज्यजनों की पूजा
करता है ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न है, शान्ति प्रधान है, वृद्धजनों की सेवा करता है, राग,
द्वेश, ईर्ष्या, मद, और मान के वेगों को नियन्त्रित रखता है, दानशील है, तपस्या, ज्ञान
और शान्ति का प्रेमी है, आध्यात्मविद् है, लोक और परलोक का विचार कर कार्य करने
वाला है और स्मृतिमान् है, उसकी आयु ‘हितायु’ कहलाती है।

4-अहितायु –

हिताय के विपरीत स्थिति को ‘अहितायु’ कहते हैं। इस प्रकार आयु का हिताहित विवेचन आयुर्वेद का प्रतिपाद्य विषय है। अनेक
दृष्टिकोणों से आयु के हित और अहित का विचार ही आयुर्वेद में किया गया है।

आयुर्वेद का स्वरूप

आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है, इसलिए जीवन अर्थात् आयु के विषय में जो भी
ज्ञान उपलब्ध हो, वह सब आयुर्वेद की सीमा में आता है। जिस विद्या से रोगियों का
रोग दूर हो और प्राणियों का जीवन आरोग्यमय तथा दीर्घायुश्य सम्पन्न हो, वह सब
‘विद्या’ आयुर्वेद है।

पुराणामित्येव नसाधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। 

सन्त: परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढ़: परप्रत्ययनेयबुद्धि:।।

अर्थात् पुराना होने से न कोई ज्ञान उत्तम कहा जाता है, न तो नया होने के
कारण कोई ज्ञान दोषपूर्ण समझा जाता है। इसलिए विद्वान लोग अपने विवेक के
अनुसार ग्राह्य वस्तु का चयन करते हैं। वे मूर्ख एवं विवेकहीन हैं, जो बाबावाक्यं प्रमाण
के आधार पर दूसरों के कथनानुसार चलते हैं। इस सूक्ति के अनुसार
नीर-क्षीरविवेकिनी बुद्धि से, परिश्रम-पूर्ण अनुसंधान और धैर्य से चिकित्सा-जगत् में
उपलब्ध चिन्तन, ज्ञान तथा आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत ज्ञान की समीक्षा कर
उसे आयुर्वेदीय सिद्धान्तों के अनुरूप आयुर्वेद में समाहित करना चाहिए।

आयुर्वेद एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। विज्ञान सार्वभौम होता है, उस पर किसी एक
वर्ग का अधिकार नहीं होता है। जो कल तक अज्ञात था, वह आज जान लिया गया
है। जो कार्य पूर्वजों ने नहीं किया, वह कार्य उनकी सन्तानें कर रही हैं – कृतानि
पुत्रैरकृतानि पूर्वे:। जो अविदित है, उसे कल जाना जा सकता है। इसलिए विद्वान् और
बुद्धि का सीमांकन करना उचित नहीं है। विज्ञान के क्षेत्र में अहर्निश गवेशणा हो रही
है। अत: प्राच्य और नवीन चिकित्सा-विज्ञान के सांमजस्य का द्वार खुला रखना चाहिए
तथा उपादेयता के आधार पर परस्पर आदान-प्रदान स्थापित करने में रूढ़िग्रस्तता एवं
हिचक दूर रखना चाहिए। युगानुरूप प्रगति करते रहने के कारण ही आयुर्वेद के क्षेत्र
का समुचित विकास हो पाया है। चरक एवं सुश्रुत के काल में चिकित्सा-प्रक्रिया का
विकास हुआ है। औषधियों के प्रयोग के ढ़ंग एवं चिकित्सा-विधि के प्रकार में परिवर्तन
हुआ है। नये-नये योग और प्रयोग प्रचलित हुए हैं।

संहिता-काल की चिकित्सा में भी आगे चलकर परिवर्तन हुआ है। निदान एवं
चिकित्सा के नवीन ढंग अपनाए गये हैं। रसशास्त्र के विकास ने चिकित्सा जगत् में
चमत्कार दिखलाया। अल्प मात्रा में, अरूचि रहित एवं शीघ्र लाभ होने के कारण इसका
बहुत प्रचार हुआ। वानस्पतिक द्रव्यों के स्थान पर रस, उपरस, लौहादि धातुओं के भस्म
एवं विश-उपविश आदि का प्रयोग प्रचुर रूप में किया जाने लगा। बदलते हुए समय के
परिवेष में यूनानी चिकित्सा के स्पर्धा युग में चोपचीनी, पारसीकयवानी आदि अनेक
यूनानी द्रव्यों का प्रयोग करना वैद्यों ने प्रारम्भ कर दिया। जब भारतीय भू-भाग पर
विदेशी पुर्तगीज व्यापारीजनों ने पद-विन्यास रखा, तो उनके समागम से अनेक अंगों
के स्पर्श तथा उनकी स्त्रियों के साथ सहवास करने से ‘फिरंग’ नामक नये रोग ने
जन्म लिया। आयुर्वेद के चिकित्सकों ने अपने संग्रह ग्रन्थों में उस रोग का उल्लेख
किया और उसके आयुर्वेदीय निदान एवं चिकित्सा का प्राविधान किया।

आयुर्वेद के विद्वानों ने कभी भी संकुचित दृष्टिकोण नहीं अपनाया। उन्होंने ज्ञान
के संवर्धन तथा ऊहापोह, तर्क-वितर्क के लिए सदैव प्रेरणा दी है। ओषध वही श्रेष्ठ
है, जिससे आरोग्य लाभ हो और वही चिकित्सक श्रेश्ठ है, जो रोगी को रोग से मुक्त
करें, ये विचार आचार्य चरक के हैं जिनमें कहीं भी लेषमात्र भी रूढ़िवादिता या
पक्षपात की भावना नहीं है।

आयुर्वेद मात्र चिकित्सा शास्त्र नहीं है, अपितु यह एक दर्षन है, जो स्वस्थ
व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण और रुग्ण व्यक्ति के रोग की मुक्ति तो करता ही है,
साथ ही सांसारिक सर्वोच्च सुख एवं पारमार्थिक सर्वोच्च आनन्द की उपलब्धि के लिए
निभर््रान्त मार्गदर्षन भी करता है। आयुर्वेद की एक महती विषेशता यह है कि यह
चतुर्विंषतितत्त्वात्मक समस्त पुरूश की चिकित्सा करता है, जब कि अन्य
चिकित्सा-पद्धतियाँ रोगी के किसी खास अंग की चिकित्सा करती हैं। सम्प्रति
विषेशज्ञता के नाम पर एक-एक शरीरांग को बाँटकर चिकित्सा करने वाले चिकित्सकों
की भरमार है।

आयुर्वेद में धर्म, कला, साहित्य, दर्षन और विज्ञान आदि सभी तरह के ज्ञान की
उपयोगिता है। चरकाचार्य ने कहा है कि संसार के यावत् पदार्थ ओशध है –
नानौशधिभूतं जगति किंचिंद द्रव्यमुपलभामहे। आज के औद्योगिक युग में विविध प्रकार
की यान्त्रिक सुविधाएँ उपलब्ध है, जिनकी सहायता से बहुकाल साध्य कार्य स्वल्पकाल
में ही सम्पन्न हो जाते हैं।

आयुर्वेद के विकास के लिए उन यान्त्रिक प्रक्रियाओं को अपना कर आयुर्वेद का
विकास करना चाहिए। आयुर्वेद के सिद्धान्तों के आधार पर नये योगों के प्रयोग का
मार्ग अवरूद्ध नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद अपार है। इसलिए सावधानी के साथ इसके
ज्ञान के लिए तैयार रहना चाहिए। दूसरों के अच्छे गुणों को ग्रहण करने में संकोच
नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान् व्यक्ति के लिए सारा संसार उसका गुरु है और मूर्खो के
लिए सम्पूर्ण जगत् शत्रु है। इसलिए बुद्धिमानी की बात यह है कि शत्रु भी यदि
हितकर, आयुश्यकर एवं कल्याणकारी मार्ग का निर्देष करता है, तो उसकी बातें ध्यान
पूर्वक सुनें और विवेक पूर्वक उसका पालन करें – न चैव ह्यस्ति सुतरामायुर्वेदस्य
पारम्। तस्मादप्रमत्त: शाष्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत्, एतच्च कार्यम्, एवं भूयष्च
वृत्तसौश्ठवमनसूयता च परेभ्योSप्यागमयितव्यम्, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्य:
शत्रुष्चाबुद्धिमताम्, अतष्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताSमित्रस्यापि धन्यं यषस्यं आयुश्यं पौश्टिकं
लौक्यमभ्युपदिषतो वच: श्रोतव्यमनु विधातत्यष्च।

स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग, संक्रामक रोग तथा सांघातिक व्याधियों के
प्रतीकार के क्षेत्र में अपनी पूरी जिम्मेदारी के साथ जागरूक रहकर, अपने कर्त्तव्य का
पालन करके ही आयुर्वेद के गौरव को बढ़ाया जा सकता है। आयुर्वेद का भविष्य
सुन्दर है। विश्व के लोगों को आयुर्वेद से बड़ी आकांक्षाएँ हैं।

आयुर्वेद का अवतरण –

प्राणिमात्र की सर्वप्रथम कामना है-सुखमय, दीर्घ जीवन की प्राप्ति। यद्यपि सभी
शास्त्र मनुष्य को आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीन प्रकार के सन्तापों
से मुक्त करने का मार्ग निर्देश करते हैं, किन्तु उनमें बतलाये गये विधानों का पालन
करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य तथा आरोग्य अत्यन्त अपेक्षित है। स्वास्थ्य-संरक्षण और
रोग-मुक्ति का शास्त्र आयुर्वेद ही है। इसलिए आयुर्वेद सभी शास्त्रों का आधार होने के
कारण सर्वाधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण शास्त्र है। यह सुखमय दीर्घ जीवन देने वाला
शास्त्र है।

आध्यात्मिक या भौतिक, लौकिक या पारलौकिक, सांस्कृतिक, सामाजिक या
आर्थिक, किसी भी प्रकार के चिन्तन का मूलमंत्र है। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
की उत्तमता है। नीरोग एवं स्वस्थ्य व्यक्ति के उत्तम उपायों का अवलम्बन कर
परिष्कृत मार्ग पर चलता हुआ अभीश्ट स्थान से पहुँच जाता है, किन्तु रोगी या
अस्वस्थ्य व्यक्ति विविध प्रयत्नों के वावजूद भी अपने कार्य को सिद्ध करने में सफल
नहीं हो पाता है।

शरीर नाना प्रकार के स्थूल और सूक्ष्मतम अवयवों और उनकी गहन क्रियाओं
द्वारा परिचालित एक रहस्यमय यन्त्र के समान है। शरीर में होने वाली किसी भी प्रकार
की विकृति, न केवल शरीर को अपितु शरीराधिश्ठित आत्मा, मन, बुद्धि और इन्द्रियों में
भी वैकलव्य उत्पन्न कर देती है। रोग ग्रसित शरीर वाला व्यक्ति शरीर और मन की
ग्लानि से अवसाद की स्थिति में दु:खों का बसेरा बन जाता है अथवा किंकर्तव्यविमूढ़
हो जाता है और अपनी समस्याओं के कण्टकमय अर्गला में आबद्ध होकर कथम•िप
दु:खों से छुटकारा नहीं पाता।

मन और शरीर की रूग्णता की स्थिति में जप-तप, ध्यान-धारणा, एकाग्रता,
तीर्थांटन, देवोपासना, परोपकार आदि धार्मिक कर्म, षिल्प, वाणिज्य, कृशि, व्यापार,
देषान्तर-गमन आदि आर्थिक प्रयत्न मनोवांछित आहार-विहार, विशयोपभोग, रतिप्रयोग
एवं मानसिक विकारों (लोभ, शोक, मोह, मद, मात्सर्य, ईश्र्या, द्वेश, भय, चिन्ता आदि) का
दमन, इन्द्रियनिग्रह, ईष्वर-भजन आदि मोक्ष के उपायों का भी सम्यक् प्रकार से
उपयोग नहीं हो सकता। प्राणी जब पूर्णत: स्वस्थ और रोगमुक्त होता है, तभी उसमें
उत्तम फूल और फल लगते हैं।

इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि जीवन को आरोग्यभय, दीर्घायुश्य-संपन्न
और शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्त रखा जाये। शारीरिक दु:ख, मानसिक
दु:ख तथा सभी प्रकार की आधि-व्याधि को दूर करने के लिए कल्याणमय हितकर
आयुश्य की उपलब्धि हेतु अधिक उपयोगी, ज्ञान-विज्ञान को आयुर्वेद-विज्ञान कहा
जाता है।

आयुर्वेद-विज्ञान केवल किसी व्यक्ति, जाति, समाज, प्रदेष या देष की उन्नति
का साधक नहीं है, अपितु यह सार्वभौम है। इसका क्षेत्र समस्त प्राणिजगत् है। यह
विष्वजनीन है। अत: प्रत्येक हितेच्छु व्यक्ति का यह पुनीत और इसके प्रचार-प्रसार एवं
उपदेष को बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय तथा लोकानुकम्पाय अधिकाधिक विस्तृत
करें। प्राणिमात्र के प्रति दया-भाव से करूणादर््र-हृदय ऋशियों ने इसका उद्बोधन
किया है। जीवन-दान सबसे बड़ा दान है। स्वस्थ ही सबसे बड़ा सुख है। इसलिए
आयुर्वेद के उपदेषों का अक्षरष: पालन करना चाहिए और आर्तजनों की सेवा के क्षेत्र
का विस्तार कर पुण्य और यश का अर्जन करना चाहिए।

आयुर्वेद के आठ अंग

वैदिक ग्रन्थ में आयुर्वेद के अंगों का यत्र-तत्र वर्णन प्राप्त होता है, परन्तु आठ
अंगों का कहीं पर भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि आयुर्वेद
का आठ अंगों में विभाजन परकालीन चिन्तन है चरक, सुश्रुत और अश्टांगहृदय में इन
आठ अंगों का कुछ नामोल्लेख प्राप्त होता है। सुश्रुत ने आयुर्वेद के आठ अंगों का
नामोल्लेख किया है – 


(1)-कायचिकित्सा –
सम्पूर्ण शरीर की चिकित्सा अर्थात् शरीर के सभी अंगों के रोगों
की चिकित्सा कायचिकित्सा है। काय का अर्थ जाठराग्नि भी कहॉं गया है, इसलिए
इसका अर्थ होगा – जठर (पेट) सम्बन्घी अग्नि की चिकित्सा।


(2)-बालचिकित्सा –
इसे कौमारभृत्य भी कहते हैं। कौमारभृत्य अर्थात् बालकों का
भरण-पोशण और उनके रोगों की चिकित्सा से है। इसे Science of Paediatrics कहते हैं। 

(3)-ग्रहचिकित्सा – इसे भूतविद्या भी कहते हैं इसमें दैवीय विपत्तियों एवं ग्रहों के
कु-प्रभाव को दूर करने के लिए शान्ति कर्म आदि का विधान है। इसे
emonolgy कहते हैं।


(4)-ऊध्र्वांग चिकित्सा –
इसे शालाक्य चिकित्सा भी कहते हैं। इसमें गले से ऊपर के
सभी अंगों अर्थात् आँख, नाक, कान तथा गले आदि रोगों की चिकित्सा का समावेष
है। इसे कायचिकित्सा का ही अंग माना जाता है।


(5)-षल्यचिकित्सा –
इसे शल्यतन्त्र भी कहते हैं। इसमें तीक्ष्ण औजारों आदि के द्वारा
चीर-फाड़ आदि का कार्य किया जाता है और दूशित तत्त्वों को निकाला जाता है, इसे
Surgery कहते हैं।


(6)-विशचिकित्सा –
इसे अगदतंत्र, दंश्टाचिकित्सा, विशगर-वैरोधिक-प्रषमन भी कहते
हैं। इसमें सर्प आदि के विश को दूर करने का विधान है। इसे Toxicology कहते
हैं।


(7)-रसायनतन्त्र –
इसे रसायन या जराचिकित्सा भी कहते हैं। इसमें युवावस्था को
अधिक समय तक बनाए रखने, बुढ़ापे के प्रभाव को दूर करने और शारीरिक शक्तियों
को बढ़ाने के उपायों का वर्णन प्राप्त होता है।


(8) वाजीकरण तन्त्र –
इसे वृशचिकित्सा भी कहते हैं। शुक्ररहित को शुक्रयुक्त बनाने
की विधि को वाजीकरण कहते हैं। इस चिकित्सा के द्वारा वीर्यहीन को भी वीर्ययुक्त
बनाया जाता है। इन्हें ही आयुर्वेद अश्टांग कहते हैं। दिवोदास ने षिश्यों से
पूछा-आपको मैं किस तन्त्र का उपदेष बताऊ? षिश्यों ने कहा-आप हमें
शल्यतन्त्र-प्रधान आयुर्वेद का उपदेष बतावें।

ब्रह्मा ने आयुर्वेद का प्रवचन किया था, जिसे प्रजापति ने प्राप्त किया, उसके
बाद अष्विनीकुमारों ने प्राप्त किया, अष्विनीकुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया और इन्द्र से
मैंने इस शास्त्र को प्राप्त किया और मेरा यह पवित्र कर्तव्य है कि मैं विद्यार्थियों को
आयुर्वेद का उपदेष दूँ, क्योंकि मैं आदिदेव धन्वन्तरि हूँ। मैंने ही देवताओं की चिकित्सा
कर जरा, रूजा और मृत्यु से मुक्त किया। अब अन्य आयुर्वेदांग के साथ प्रमुख रूप से
शल्यप्रधान आयुर्वेद का उपदेष करने के लिए इस भूमण्डल पर अवतरित हुआ हूँ।

चरक और सुश्रुत संहिता में यह अन्तर है कि आत्रेय के स्थान पर धन्वन्तरि का
नाम आया है। धन्वन्तरि ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर अपने सुश्रुत प्रभृति
षिश्यों को शल्यप्रधान आयुर्वेद का उपदेष दिया। काष्यपसंहिता में भी प्राय: इसी प्रकार
का वृतान्त मिलता है। काष्यपसंहिता को विमानस्थान भी कहते हैं। काष्यपसंहिता में
लिखा गया है कि ब्रह्मा ने सृष्टि-रचना के पूर्व ही आयुर्वेद की रचना की थी। आयुर्वेद
का ज्ञान क्रमष: ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, दक्ष प्रजापति से अष्विनीकुमारों और
अष्विनीकुमारों से इन्द्र को प्राप्त हुआ। कष्यप, वसिश्ठ, अत्रि और भृगु महर्शि ने इन्द्र
से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। फिर अपने पुत्रों और षिश्यों को पढ़ाया। अश्टांगसंग्रह
अर्थात् सूत्रस्थान में आत्रेय को अग्रणी बनाकर धन्वन्तरि, भरद्वाज, निमि, काष्यप, आदि
महर्षियों ने इन्द्र के पास जाकर आयुर्वेद का ज्ञान, प्राप्त करने की बात कही गई है।
चरक, सुश्रुत तथा वाग्भट् पार्थक्य हैं। अश्टांगहृदय और भावप्रकाष में आत्रेय को इन्द्र
से ज्ञान प्राप्ति की बात कही गई है। आत्रेय ने पुन: अपने षिश्यों को आयुर्वेद का
उपदेष देकर इस शास्त्र का विस्तार किया।

इस प्रकार से आयुर्वेद में वर्णित आयुर्वेदीय परम्परा का पर्यालोचन करने पर
चरक की परम्परा में ‘आत्रेय-सम्प्रदाय’ तथा सुश्रुत की परम्परा में धन्वन्तरि-सम्प्रदाय
नामक दो सम्प्रदाय सामने आते हैं, किन्तु इनके साथ ही एक और भी पौराणिक
परम्परा है, जिसे भास्कर-सम्प्रदाय कहते हैं।

ब्रह्मवैवर्त में यह उल्लेख है कि प्रजापति ने चारों वेदों को देखकर उनके अर्थों
का चिन्तन कर आयुर्वेद नाम का पंच्चम वेद बनाकर उसे भास्कर को दिया। उसके
आधार पर भास्कर ने अपनी स्वतन्त्र संहिता बनायी जिसे भास्करसंहिता कहतें हैं।
भास्कर ने अपने 16 षिश्यों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया और उन्होंने भी
अपनी-अपनी संहिताओं की रचना की।

भास्कर के शिष्यऔर उनके ग्रन्थ –

  • 1-धन्वन्तरि-चिकित्सातत्वविज्ञान,
  • 2-दिवोदास-चिकित्सादर्पण,
  • 3-काषिराज-चिकित्साकौमुदी,
  • 4-अष्विनीकुमार-चिकित्सारतन्त्र,
  • 5-नकुल-वैद्यकसर्वस्व,
  • 6-सहदेव-व्याधिसिन्धुविमर्दन्,
  • 7-यम-ज्ञानार्णव,
  • 8-च्यवन-जीवदान,
  • 9-जनक-वैद्यसन्देहभंजन,
  • 10-बुध-सर्वसार,
  • 11-जाबाल-तन्त्रसार,
  • 12-जाजलि-वेदांगसार,
  • 13-पैल-निदान,
  • 14-कवथ-सर्वधर,
  • 15-अगस्त्य-द्वैधनिर्णयतन्त्र।

आयुर्वेद अनादि और शाष्वत है, इसका ज्ञान सदैव रहा है। जब ब्रह्मा को
आयुर्वेद का बोध हुआ तब क्रमष: देवलोक से मत्र्यलोक तक आयुर्वेद का प्रसार हुआ।
ऋषियों की स्वाध्याय-परम्परा में अध्ययन की चार अवस्थाएँ थीं-अधीति, बोध, आचरण
और प्रचारण। इन चार स्तरों से ज्ञान परिपक्व होता है। शास्त्रज्ञान, अर्थज्ञान, कर्मज्ञान
और आचरण, इन चारों में परिपक्व ज्ञान संपन्न व्यक्ति ही प्राणाभिसर कहलाता था।
ऋषियों ने ज्ञानार्जन के पश्चात उस ज्ञान का प्रयोग स्वयं किया और षिश्य-प्रषिश्यों
की परम्परा द्वारा उस ज्ञान का उपबृंहण किया। इन्द्र ने भरद्वाज को आयुर्वेद त्रिसूत्र
का उपेदष किया था, जो कालक्रम से बढ़ता हुआ अनेक संहिता एवं संग्रह ग्रन्थों में
विस्तारपूर्वक वर्णित है। आयुर्वेद की ज्ञानगंगा सतत् प्रवाहयुक्त रही है और विभिन्न
स्रोतों से इसमें ज्ञानवारि की धारा का सम्मिश्रण हुआ है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में
सफलता तभी हस्तगत हो सकती है, जब सुन्दर स्वास्थ्य तथा नीरोग जीवन हो।
इसलिए आयुर्वेद का ज्ञान सर्वाधिक उपयोगी है।

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