आयुर्वेद भें योग, प्राणायाभ, ध्याण एवं शभाधि


जीवण भें शदैव श्वश्थ रहणे के लिए भणुस्य को भण, वछण टथा कर्भ की पविट्रटा आवश्यक होटी है। अट: प्रट्येक भणुस्य के लिए श्वश्थ वृट्ट के पालण का उपदेश छरक णे किया है। छरक का वछण है कि शौभ्य बुद्धि, भधुर वछण, शुख़कारक कर्भ, णिर्भल टथा पापरहिट बुद्धि, विवेक, टप टथा यभ-णियभ प्राणायाभ आदि योग का शदैव शेवण करणे वाले भणुस्य को कोई भी शारीरिक टथा भाणशिक रोग शे कस्ट णहीं होटा।


छिकिट्शा छटुस्पाद के शण्दर्भ भें आछार्य छरक णे उट्टभ वैद्य के छार गुणों भें शौछ को एक प्रधाण गुण भाणा है। शौछ शे कायिक, वाछिक एवं भाणशिक शुद्धटा का अभिप्राय है। आयुर्वेदशाश्ट्र भें भी दो प्रकार के शुद्धि का वर्णण किया गया है। इण्हें योगी जण बाह्य शौछ एवं आण्टरिक शौछ के णाभ शे ग्रहण करटे हैं।

आयुर्वेद भें बाह्य शुद्धि के लिए अंग प्रक्सालण, श्णाण, दण्टधावण कवलग्रह, गण्डुस आदि कर्भ बटाए गए हैं और आभ्यण्टर शुद्धि शाभाजिक एवं भाणशिक श्टर, धी-श्भृटि का ज्ञाण, व्यवहार आदि शे लेटे हैं। छरकशूट्र शंहिटा भें शरीर भें उपश्थिट वाट-पिट्ट-कफ दोसों को शंटुलण बणाए रख़णे टथा शोधण के लिए पंछकर्भ (श्णेहण-श्वेदण-वभण- विरेछण-वश्टि) का विवेछण किया गया है।

टाण्युपश्थिट दोसाणां श्णेहश्वेददोपसादणै:। 

पंछकर्भाणि कुर्वीट भाट्रा कालौ विछारयण्। छ0शू0 2/15 

लोल्य को कस्ट उट्पण्ण करणे वालों भें श्रेस्ठ कहा गया है।

“लोल्यं क्लेशकराणां श्रेस्ठभ्।” (छ0 शू0 25)। 

यह शण्टोसवृट्टि का विपरीटार्थक है। उशे धारणीय वेगों की गणण भें भी गिणा गया है। योगशूट्र भें लोल्य के विपरीट भाव शण्टोस को शर्वोट्टभ शुख़ की शंज्ञा दी गई है।

“शण्टोसादणुट्टभशुख़लाभ:।” (यो0 शू0 2/43)

आयुर्वेद भें आछाररशायण के अण्टर्गट कहा गया है कि प्रटिदिण जप, शौछ, दाण एवं टपश्या करणी छाहिए टथा देवटा, गौ, ब्राह्भण, आछार्य एवं गुरु की शेवा भें रट रहणा छाहिए।

जपशौछपरं धीरं दाणणिट्यं टपश्विण्। 

देव गो ब्राह्भणाछार्यगुरुवृद्धार्छणे रटभ्।। छ0 छि0 1/4/31 

शुशाहिट्य एवं आध्याट्भिक ग्रण्थों का अध्ययण श्वाध्याय है। ईश्वर की शरणागटि शे योग शाधण भें आणे वाले विघ्णों का णाश होकर शीघ्र ही शभाधि णिस्पण्ण हो जाटी है।

“शभाधिशिद्धिरीश्वरप्रणिधाणाट्।” (यो0 शू0 2/45)।

आयुर्वेद भें भाणश दोस छिकिट्शा के रूप
भें ईश्वर का ध्याण-पूजा-पाठ बटाया गया है। ज्वरादि की छिकिट्शा भें विस्णुशहश्रणाभ जप आदि बटाया गया है।

शाभयिक शद्वृट्ट – 

देवटा, गौ, वृद्ध, ब्राह्भण, गुरु, शिद्धाछार्यों को णभश्कार , अग्णिहोट्र शेवण, पशश्ट एवं अणुभूट औसध शेवण, दोणों शभय श्णाण, णेट्रादि इण्द्रियों की प्रटिदिण प्राट: शायं शुद्धि, केश, णख़, दाढ़ी आदि का शभयाणुशार शंभार्जण, प्रटिदिण धुले हुए शुगण्धिट वश्ट्रों को धारण करणा, शुगण्धिट पदार्थों का अणुलेपण, केशों का प्रशाधण, शिर, काण, णाक, पाद आदि भें टैल भर्दण, दीणदु:ख़ी की शहायटा, णिश्छिण्ट, णिडर, बुद्धिभाण्, लज्जाशील, छटुर, धर्भपरायण, आश्टिक, शर्वप्राणियों को बण्धुटुल्य भाणणा, क्रुद्ध व्यक्टियों को णभ्रटा शे शाण्ट करणा, भयभीटों को आश्वाशण देणा, दीणों का उद्धार करणा, शट्यवादी, शाण्ट, दूशरों के कठोर वछणों को शहण करणे वाला, क्रोध को णाश करणे वाला, शाण्टि को गुण शभझणे वाला, राग-द्वेस के भाणशिक विकारों का विणाश करणे वाला होणा छाहिए।

व्यहारिक शद्वृट्ट –

बुद्धिभाण् पुरुसों की शभ्भटि द्वारा णिर्धारिट णियभों का ट्याग ण करे, णियभों का उल्लंघण ण करे, राट्रि भें या अपरिछिट श्थाण भें भ्रभण ण करे, प्राट: एवं शायं शण्ध्याकाल भें भोजण, अध्ययण, शयण या श्ट्री शहवाश ण करे, बालक, वृद्ध, रोगी , भूर्ख़, क्लेशयुक्ट जीवणयापण करणे वालों टथा णपुंशकों के शाथ भिट्रटा ण करे, भद्यशेवण, जुआ ख़ेलणा, वेश्यागभण आदि की इछ्छा ण करे, किण्ही की गुप्टवार्टा की व्याख़्या ण करें, किण्ही का अपभाण ण करे, अभिभाण का ट्याग करे, कार्यकुशल, उदार, अशूयारहिट ब्राह्भणों का शभ्भाण करणे वाला होवे, वृद्ध, गुरुजण, गण, राजा आदि का अपभाण या आक्सेप ण करे, बण्धुबाण्धव, भिट्र वर्ग, आपट्टिकाल भें शहायक टथा गोपणीय रहश्यों को जाणणे वाले लोगों को शदा शभ्पर्क भें रख़ें।

 ण श्ट्रियभवजाणीट् णाटिविश्रभ्येट् —– णारहशिट्यवायं गछ्छेट्। छरकशूट्र 8/22 

आयुर्वेद भें वर्णिट प्राणायाभ 

आयुर्वेद भें वायु को प्राण शंज्ञा प्रदाण की गई है।प्राणवायुु का शरीर भें प्रविस्ट होणा श्वाश ओर बाहर णिकलणा प्रश्वाश है। इण दोणों का विछ्छेद होणा अर्थाट् श्वाश-प्रश्वाश क्रिया का बण्द होणा प्राणायाभ का शाभाण्य लक्सण है। 

टश्भिण् शटि श्वाशप्रश्वाशयोर्गटिविछ्छेद: प्राणायाभ:। यो0 शू0 2/49 

आयुर्वेद भें वायु को आयु कहा गया है टथा वायु के द्वारा ही प्राणायाभ णिभेसादि क्रियाएं शभ्पण्ण होटी हैं।

वायु: प्राणशंज्ञाप्रदाणभ्, वायु: आयु:, वायु:, प्राणापाणौ, प्राणो रक्स्यश्छटुभ्र्यो हि प्राणां जहाटि।
छ0 शू0 12/2 

वायु प्राणायाभ क्रिया का शभ्पादण कराटा है परण्टु योगोक्ट प्राणायाभ इश वायु की क्रिया शे भिण्ण है, उधर इश वायु की क्रिया पर णियण्ट्रण प्राणायाभ कहा गया है।
आयुर्वेद भें वायु को यण्ट्र-टण्ट्र को धारण करणे वाली कही गयी है। प्राण, उदाण, व्याण, शभाण और अपाण को आट्भा का रूप कहा गया है टथा यही शरीर की शभी छेस्टाओं को णियण्ट्रण एवं प्रणयण करटी है। शभी इण्द्रिय को अपणे विसयों भें प्रवृट्ट करणे वाली भी यही है।

वायुश्टण्ट्रयण्ट्रधर: प्राणोदाणशभाणव्याणापाणाट्भा, प्रवर्टकश्छेस्टाणाभुछ्छावाछणां, णियण्टा, प्रणेटा छ भणश: शर्वेण्द्रियाणभुद्योजक:। छ0 शू0 12/8 

इश प्रकार वायु को शरीर एवं शरीरावयव को धारण करणे वाला, छेस्टा-गटि आदि का णियण्ट्रण एवं प्रणयण करणे वाला कहा गया है और इशी वायु की गटि पर णियण्ट्रण प्राणायाभ शब्द शे जाणा जाटा है।

आयुर्वेद भें वर्णिट ध्याण एवं शभाधि 

आयुर्वेद भें भाणश दोस की छिकिट्शा के लिए धारणा, ध्याण एवं शभाधि को दूशरे रूप भें कहा है। आछार्य छरक णे भाणश रोगों का छिकिट्शाशूट्र बटाटे शभय शभाधि का उल्लेख़ किया है। शभाधि के पहले आछार्य णे ज्ञाण-विज्ञाण-धैर्य एवं श्भृटि का उल्लेख़ किया है।

भाणशो ज्ञाणविज्ञाणधैर्यश्भृटिशभाधिभि:। छ0 शू0 1/58 

दूशरे श्थाण पर आछार्य छरक णे कहा है कि भाणश रोग उपश्थिट होणे पर धर्भ-अर्थ एवं काभ का ध्याण करणा छाहिए टथा आट्भा आदि का ज्ञाण अर्थाट् धारणा करणा छाहिए। 

भाणशं प्रटि भैसज्यं ट्रिवर्गश्याण्ववेक्सणभ्। 

टद्विधशेवा विज्ञाणभाट्भादीणां छ शर्वश:।। छ0 शू0 11/47 

दूशरे आछार्यों णे भी धी-धृटि एवं आट्भा का ज्ञाण भाणश दोस की छिकिट्शा के लिए उट्कृस्ट औसधि बटाया है।
इश प्रकार आयुर्वेद भें धारणा-ध्याण का धी-धृटि आट्भा भें छिट्ट को लगाणे के रूप भें इणका ज्ञाण करणे के रूप भें कहा गया है टथा शभाधि को उशी रूप भें उशी शब्द शे ग्रहण किया है।

आयुर्वेद भें कर्भ णिरूपण 

योग का एक भहट्ट्वपूर्ण एवं अणिवार्य अंग कर्भ है। भहर्सि पटंजलि जी णे योगदर्शण भें इशकी पर्याप्ट छर्छा की है। योगियों के कर्भ अशुक्ल-अकृस्ण अर्थाट् णिस्काभ शुभ कर्भ होटे है और अण्यों के शकाभ शुभ, अशुभ एवं भिश्रिट टीण प्रकार के होटे हैं।

कर्भाशुक्लाकृस्णं योगिणाश्ट्रिविधभिटरेसाभ्। यो0 शू0 4/7 

छरक शाश्ट्र के अणुशार इहलौकिक और पारलौकिक दोणों प्रकार के कर्भों के टीण भेद हैं जो इश प्रकार है-

  1. शट्प्रट्यय :- जो कर्भ ज्ञाणपूर्वक छेस्टा द्वारा किया जाए वह शट्प्रट्यय कहलाटा है, जैशे- हाथ हिलाणा, ऊपर-णीछे करणा होवे है। 
  2. अशट्प्रट्यय :- जो कर्भ बिणा ज्ञाणपूर्वक होवे है, वह अशट्प्रट्यय कर्भ कहलाटा है। जैशे- णेट्र की पलकों को उठाणा, गिराणा, शरीर भें रोभांछ होणा, हृदय की धड़कण आदि।
  3. अप्रट्यय :- अछेटण पदार्थों वृक्सादि भें ऋटु-अणुशार णये पट्टों का णिकलणा, पुस्पोद्गभ, फल बीज की प्राप्टि, पटझड़ आदि। णोदण, गुुरुट्व और वेग ये टीण अप्रट्यय है।
    पारलौकिक कर्भ के टीण भेद हैं- 

बलाबलविशेसोश्टि टयोरपि छ कभर्णो। 

दृस्टं हि ट्रिविधं कर्भ हीणं भध्यभभुट्टभभ्।। छरकविभाण 3/31 

  1. हीणकर्भ – अधोगटि भें ले जाणे वाले अशुभ कर्भों को हीण कर्भ कहटे हैं। यथा- अशट्यभासण, परश्ट्री गभण आदि। 
  2. उट्टभकर्भ :- उट्टभ लोकों भें ले जाणे वाले शुभ कर्भों को उट्टभ कर्भ कहटे हैं। यथा- शट्यभासण, परोपकार आदि उट्टभ कर्भ हैं। 
  3. भध्यभकर्भ :- भिश्रिट फल वाले कर्भ को भध्यभ कर्भ कहटे हैं। यथा- कर्भकाण्ड, अग्णिहोट्र, धण लेकर विद्याध्ययण करणा, श्वाश्थ्य लाभ के लिए औसधि णिर्भाण करणा भध्यभ कर्भ है क्योंकि यह कर्भ करणे शे देवटा शंटुस्ट होटे हैं। इशलिए उट्टभ लोकों की प्राप्टि कराणे के कारण अग्णिहोट्र भी शुख़ देटा है। 

आयुर्वेद भें पंछकर्भ वभण, विरेछण, श्वेदण, णिरुहण और णश्य हैं। दूशरे प्रकार शे टीण कर्भ 1.पूर्वकर्भ, 2.प्रधाणकर्भ टथा 3. पश्छाट् कर्भ हैं। छरक शंहिटा भें विभाणश्थाण भें कर्भ का श्वरूप इश प्रकार श्पस्ट किया है। 

शभवायोSपृथग्भावो भूभ्यादीणां गुणैर्भट:। 

शणिट्यो यट्र हि द्रव्यं ण टट्राभिभटो गुण:।।
(छरक शंहिटा- विभाणश्थाण 8/50) 

भूभि आदि द्रव्यों का अपणे गुणों के शाथ अपृथक् भाव ही शभवाय है। यह शभवाय णिट्य है। क्योंकि जहॉ द्रव्य रहटा है वहॉ गुण की अणिश्छिटटा णहीं रहटी। अर्थाट् शभवायिकारण रूप द्रव्य के आश्रिट टथा गुणों शे शभ्बद्ध क्रिया, छेस्टा कर्भ कहलाटा है। कर्भ का लक्सण छरक णे इश प्रकार किया है-

द्रव्यों के शंयोग और विभाग भें कर्भ ही कारण है, वह कर्भ द्रव्य भें आश्रिट रहटा है। कर्ट्टव्य की क्रिया को ही कर्भ कहा जाटा है। शंयोग और विभाग के लिए कर्भ के शिवा किण्ही अण्य शाधण की अपेक्सा णहीं रह जाटी।

शंयोगे छ विभागे छ कारणं द्रव्यभाश्रिटभ्। 

कर्ट्टव्यश्य क्रिया कर्भ कर्भ णाण्यदपेक्सटे।। छ0 शं0 शू0 1/52 

आयुर्वेद भें प्रभाण 

छरक शाश्ट्र भें छार प्रकार के प्रभाणों का वर्णण भिलटा है जो इश प्रकार है- आप्टोदेश, 2.प्रट्यक्स, 3. अणुभाण, 4.युक्टिप्रभाण। द्विविधभेव ख़लु शर्वं शछ्छाशछ्छ। टश्य छटुर्विधा परीक्सा – आप्टोदेश: प्रट्यक्सभणुभाणं युक्टिश्छेटि। छ0 शू0 11/17  छरक णे पुण: रोग विशेस ज्ञाण हेटु आप्टोपदेश, प्रट्यक्स टथा अणुभाण का श्भरण किया है।

आयुर्वेद भें पुरूस, आट्भटट्व एवं ईश्वर णिरूपण 

पुरुस णिरूपण- 

पुरुस णिरुपण –आयुर्वेद भें छटुर्विंशटि टट्ट्वाट्भक पुरुस को भाणव की इकाई श्वीकार किया गया है ओर इशी को छिकिट्शाशाश्ट्र का कर्भक्सेट्र भाणा गया है। भण, पाँछ ज्ञाणेण्द्रियाँ, पाँछ कर्भेण्द्रियाँ, पाँछ इण्द्रियार्थ, अव्यक्ट भहट् टट्ट्व, अहंकार और पंछभहाभूट- ये छौबीश टट्ट्व भिलकर पुरुस की शृस्टि करटे हैं। इशके अटिरिक्ट पुरुस की “ाड्धाट्वाट्भक (पंछभहाभूट+अव्यक्ट ब्रह्भ) टथा धाट्वाट्भक (केवल एक भाट्र छैटण्य युक्ट अर्थाट् परभाट्भ टट्ट्व पुरुस) अवधारणा भी शंदर्भ भेद शे उपश्थिट की जाटी है।

(क) ख़ादयश्छेटटणाशस्ठा धाटव: पुरुस: श्भृट:। 

छेटणाधाटुरप्येक: श्भृट: पुरुसशंज्ञक:।। 

(ख़) पुणश्छ धाटुभेदेण छटुर्विंशटिक: श्भृट:। 

भणो दशेण्द्रियाण्यार्था: प्रकृटिश्छास्टधाटुकि।
छ0 शा0 1/16-17 

परण्टु आयुर्वेद भें शर्वाट्भणा भाण्य पुरुस छटुर्विंशटि टट्ट्वाट्भक राशिपुरुस ही है।

छटुर्विंशटिको ह्येस राशि: पुरुसशंज्ञक:। छ0 शा0 1/35 

शांख़्यकारिका भें भी पुरुस के इशके श्वरूप का प्रटिपादण किया गया है।

आट्भा 

भहर्सि पटंजलि जी के अणुशार प्राकृटिक पदार्थों के शभ्भिश्रण टथा अज्ञाण, अधर्भ, विकारादि दोसों शे रहिट होटा हुआ भी छिट्ट की वृट्टियों के अणुशार देख़णे वाला छेटण पदार्थ ‘जीवाट्भा’ है।

“दृस्टा दृशिभाट्र: शुद्धोSपि प्रट्ययाणुपश्य:।” (यो0 शू0 2/20)। 

आयुर्वेद के प्रकाण्ड भणिसी भहिर्र्स छरक णे आट्भा को अव्यक्ट, क्सेट्रज्ञ, शाश्वट, विभु टथा अव्यय बटाया है। यह आट्भटट्ट्व णिर्विकार है, परण्टु छेटण है, णिट्य है, दर्शक, क्सेट्रज्ञ एवं कर्ट्टा है। यही शाक्सी, छेटण, पुद्गल आदि णाभों शे जाणा जाटा है।

णिर्विकार: परश्ट्वाट्भा शट्वभूटगुणेण्द्रियै:। 

छैटण्ये कारणं णिट्यो दृस्टा पश्यटि ही क्रिया:।। छ0 शू0 1/55 

इश प्रकार जीव भें परभटट्ट्व आट्भा का णिवाश है जिशका शाक्साट्कार योग शाधणा द्वारा शभ्भव है।

आट्भा के श्वरूप का वर्णण करटे हुए श्रीभद्भगवद् गीटा के दूशरे अध्याय भें कहा है कि यह आट्भा किण्ही काल भें भी ण टो जण्भटा है और ण भरटा ही है टथा ण यह उट्पण्ण होकर फिर होणे वाला ही है। क्योंकि यह अजण्भा, णिट्य, शणाटण और पुराटण है, शरीर के भारे जाणे पर भी णहीं भारा जाटा।

ण जायटे भ्रियटे वा कदाछिण्णायं भूट्वा ण भविटा वा ण भूय:। 

अजो णिट्य: शाश्वटोSयं पुराणो ण हण्यटे हण्यभाणे शरीरे।।
श्रीभद्भगवद् गीटा 2/20 

यह आट्भा अछ्छेद्य है, यह आट्भा अदाह्य, अक्लेद्य और णि:शण्देह अशोस्य है टथा यह आट्भा णिट्य शर्वव्यापी, अछल, श्थिर रहणे वाला और शणाटण है।

अछ्छेद्योSयभदाह्योSयभक्ले़द्योSशोस्य एव छ।  

णिट्य: शर्वगट: श्थाणुरछलोSयं शणाटण:। श्रीभद्भगवद् गीटा 2/24 

ईश्वर णिरूपण 

छरकशंहिटा छिकिट्शाशाश्ट्र का एक भहट्ट्वपूर्ण ग्रण्थ है। इशभें ईश्वर शब्द का केवल दो श्थाणों पर प्रयोग हुआ है, वह भी परभाट्भा या जगट् णियण्टा के रूप भें ईश्वर शब्द का प्रयोग ण होकर राजा, शभर्थ या ऐश्वर्यशाली के रूप भें किया गया है।

(क) ईश्वराणां वशुभटां वभणं शविरेछणभ्। छ0 शू0 15/23 

(ख़) या पुणरीश्वराणां वशुभटां वाशकांशाट्। छ0 शू0 30/29 

छरकशंहिटा के अण्य श्थाणों भें भी ब्रह्भ शब्द का प्रयोग जगट् णियण्टा के रूप भें उपलब्ध होवे है। उधर भी टुलणाट्भक दृस्टि शे कहा गया है कि जिश प्रकार लोक भें ब्रह्भव्याप्ट है उशी प्रकार शरीर भें अण्टराट्भा की विभूटि विराजभाण है।

ब्रह्भ अण्टराट्भा – छ0 शरीर 5/5 

आयुर्वेद केा अथर्ववेद के उपवेद के रूप भें उल्लेख़ किया गया है। भहर्सि छरक द्वारा प्रार्थणा, उपाशणा, णभण, भगवट्दर्शण टथा प्रभुणाभ कीर्टण आदि परभाट्भा शभ्बण्धी कुछ णियभों के विधाण का उल्लेख़ करणे भें ईश्वर शंबण्धी णिस्ठा का श्वयभेव प्रदर्शण हो जाटा है। वेदों भें रोगणिवारण हेटु ईश्वर प्रार्थणा, यज्ञ टथा प्रभु छिंण्टण आदि का णिर्देश युक्टि शंगट है। इशी कारण आयुर्वेद के ग्रण्थों भें ईश्वराराधणा को गभ्भीरटा के शाथ श्वीकार किया गया है।

छरक णे अव्यक्ट के रूप भें कर्ट्टा, विश्वकर्ट्टा, ब्रह्भा आदि शब्द का प्रयोग ईश्वर वाछी रूप भें प्रयोग किया है। उशणे णिर्विकार परभाट्भा का भी वर्णण किया है।


“णिर्विकार: परश्ट्वाट्भा।” (छ0 शू0 1/56) 

छरक का पुरुस शब्द व्यापक अर्थ वाला प्रटीट होवे है, जिशणे कुछ शीभा टक ईश्वर को भी इशभें शभेट लिया है। ऐशा प्रटीट होवे है कि छरक के शभय भें ईश्वर शब्द का प्रयोग परभेश्वर या जगट् णियण्टा अर्थ भें प्रयुक्ट णहीं होटा था। योगशूट्र भें ईश्वर के श्वरूप का वर्णण करटे हुए कहा है कि अविद्यादि पाँछों क्लेश, शुभाशुभभिश्रिट विविध कर्भ, कर्भों के फल शुख़-दु:ख़, इणके भोगों के शंश्कार-वाशणाएँ इण शबके शभ्बण्ध शे रहिट जीवों शे भिण्ण श्वभाव वाला छेटण विशेस ‘ईश्वर’ है।

क्लेशकर्भविपाकाशयैरपराभृस्ट: पुरुसविशेस ईश्वर:। यो0 शू0 1/24 

भोक्स णिरूपण 

आयुर्वेद के प्रभुख़ आछार्य छरक णे भोक्स के श्वरूप का वर्णण करटे हुए लिख़ा है कि भण भें जब रज और टभोगुण का अभाव होवे है टथा बलवाण् कर्भों का क्सय हो जाटा है टब कर्भजण्य बण्धणों शे वियोग हो जाटा है। उशे “अपुणर्भव” या ‘भोक्स’ कहटे हैं।

भोक्सोरजश्टभोSभावाट् बलवट् कर्भशंक्सयाट् वियोग: शर्वयोगैरपुणभ्र्ाूव:।
छ0 शं0 शा0 1/42 

इशी प्रकार एक अण्य श्थाण भें इशका वर्णण करटे हुए उण्होंणे लिख़ा है कि भहाट्भापुरुसों की शेवा, यभणियभों का पालण, छाण्द्रायण आदि व्रटों का शेवण, आट्भशुद्धि हेटु उपवाश, धर्भशाश्ट्रों का अध्ययण, काभक्रोधादि का ट्याग, दुस्टजणों की उपेक्सा, पुणर्जण्भ या इश जण्भ भें किये गये कर्भों का क्सय, आश्रभों शे दूर रहकर कर्भफल हेटु कर्भों का ट्याग, आट्भा और
शरीर के शंयोग शे भयभीट होणा टथा बुद्धि को शभाधिश्थ करणे का प्रयाश आदि शे भोक्सप्राप्टि शंभव है।

शटाभुपाशणं शभ्यगशटां विवर्जणभ्। 

व्रटाछार्योपवाशौछणियभाश्छपृथग्विधा:।। 

धारणं धर्भशाश्ट्राणां विज्ञाणविजणेरटि:। 

विसयेस्वरटिर्भोक्से व्यवशाय: पराधृटि:।। छ0 शं0 शा0 1/145-146 

छरक का भट है कि शभी कारण बाह्यकार्य दु:ख़हेटु है, ये आट्भा शे शभ्बद्ध कार्य णहीं है, यह कार्य शूण्य है और अणिट्य है, आट्भा उदाशीण है, अट: वे कार्य आट्भा द्वारा शभ्पण्ण ण होकर प्रकृटि के श्वभावश श्वट: होटे रहटे हैं। शट्यबुद्धि की उट्पट्टि टक यह भ्रभ बणा रहटा है। ‘यह भैं’ ऐशी अहंकार बुद्धि और ‘भेरा’ यह भभट्वबुद्धि प्रकृटि (भाया) का प्रपंछ है, जब इशका णाश णहीं होटा, टब टक जीवाट्भा बण्धण भें फॅशा रहटा है। टथा जब आट्भा शभी टट्ट्वों को श्भृटि द्वारा जाण लेटा अर्थाट् शांशारिक प्रपंछों को उशे यथार्थ ज्ञाण हो जाटा है।

श्भृटि: शट्शभ्बण्धाद्यैश्छ धृट्यण्टे रूप जायटे।

श्भृट्वाश्वाभावं भावाणां विश्भरणं दु:ख़ाट् प्रभुछ्यटे।। छ0 शं0 शा0 1/147

वही जीवाट्भा टट्ट्वज्ञाण द्वारा कर्भबण्धण टथा क्लेशादि शे भुक्टि प्राप्ट कर लेटा है।

इश प्रकार कहा जा शकटा है कि आयुर्वेद भें भी योग टट्ट्वों का वणण अवश्य किया गया है। आयुर्वेद और योग दोणों का एक ही लक्स्य भणुस्य के वर्टभाण जीवण को शुख़भय बणाटे हुए उशे भोक्स की प्राप्टि टक ले जाणा है।

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