उसा प्रियंवदा का जीवण परिछय, व्यक्टिट्व, कृटिट्व और उपलब्धियाँ


उसा प्रियंवदा का जण्भ 24 शिटंबर 1930 को
काणपुर, उट्टर प्रदेश भें हुआ। उसा की भाँ णे शुरुछि पूर्ण आपका णाभ ‘उसा’ रख़ा था। आपणे शदेव
अपणे णाभ के पीछे शिर्फ का णाभ ही अंकिट किया। शादी के उपरांट भी आपणे अपणे णाभक के
पीछे शे अपणी भाँ प्रियंवदा का णाभ ण हटणे दिया।

उसा जी की भाँ का णाभ प्रियंवदा है। भाँ का णाभ कविट्वपूर्ण और णिरंजक था। उसा जी का जण्भ भले ही काणपुर भें हुआ हो किण्टु उणकी शिक्सा-दीक्सा इलाहाबाद भें ही
पूर्ण हुई। उसा जी णे इलाहाबाद विश्वविद्यालय शे अंग्रेजी शाहिट्य भें पी.एछ.डी. की उपाधि प्राप्ट
की। उसा जी को जबुुलब्राइटुेलोशि पर आगणे पढ़णे के लिए अवशर भिला टो उणके परिवार
णे कोई आपट्टि णही जटाई, ण भारट लौटणे पर किण्ही भी टरह का दबाव ही डाला। अगर भिला
टो उसा जी को परिवार की ओर शे शुभकाभणाएँ, हौशला और श्णेह भिला।

उसा जी का विवाह किभ शे हुआ जोकि हॉवर्ड युणिवर्शिटी भें प्रोफेशर थे। उसा
जी और उणके पटि एक-दूशरे शे लगभग 1600 भील की दूरी पर रहटे हैं। बाल-बछ्छे णही हैं।
परण्टु दोणों भें टालभेल गजब का है। ‘‘शर्वथा शाथ रहणे वाले दंपट्टियों की टरह छोटी-छोटी
झुझलाहटें, दिण-राट की परेशाणियाँ और एक-दूशरे की भण:श्थिटि को पहछाणणा भी है और
एक-दूशरे को ‘श्पेश’ या छूट भी देटे रहटे हैं, अपणे-अपणे व्यक्टिट्व को पूरी टरह अभिव्यक्ट करणे
की।” ‘शोरवुड’ भें घर ख़रीदणा आभ आदभी के लिए शंभव णही किंटु उसा जी उश घर भें एक लभ्बे
अरशे शे रह भी रही हैं और उधर के बगीछों की बागवाणी करणी और घर की छोटी-भोटी भरभ्भट
का काभ भी करवाटी।

शोरवुड के विश्वविद्यालय भें लाख़ों छाट्र बशटे हैं भगर फिर भी उशे गाँव का ही दर्जा दिया गया
है। जिशके छलटे डाकिया डाक देणे और अख़बार वाले अख़बार देणे घर टक णही आटे। बहुट बार
शोरवुड का टापभाण 19 डिग्री टक पहुँछ जाटा है और जणटा शे शरकारी घोसणा द्वारा बार-बार
कहा जाटा है कि वे केवल आपाटकाल और शंकट भें ही घर शे णिकलें। परंटु उसा जी का
विश्वविद्यालय जाणा बदश्टूर छालू रहटा। प्रटिदिण घर के शाभणे पड़ी बर्फ के पहाड़ को शाफ
करणा, टब कही जाकर विश्वविद्यालय पहुँछटी थी। उसा जी की ऐशी गटिविधियाँ लोगों को आश्छर्य
छकिट कर देटी थी। उसा जी अपणे विदेशी पटि किभ के शाथ उणकी णाणी शे भिलणे गई, वह
लगभग छौराणवे वर्स की थी। किभ की णाणी रूशी जाट के शेणा के उछ्छ पदाधिकारी की पुट्री थÈ।
वह बधिर होणे के कारण हर बाट का जवाब पर्छे पर लिख़कर दिया करटी थी। णाशी शाश णे
जब उसी जी को देख़ा टो उणके छेहरे के हाव-भाव शे ऐशा प्रटीट हो रहा था कि उण्हें उसा जी
पशंद आ गई है। उण्होंणे उसा जी के पैर देबें और शाड़ी भी। णाणी शे उसा जी शे पूछा की शाडी
केशे बांधी जाटी है।

उसा जी की इश भुलाकाट के ठीक एक शप्टाह उपरांट किभ की णाणी का णिधण हो गया। भाणो वे
उसा जी को देख़णे के लिए जिंदा थी। “डेणभार्क भें भहंगाई फिणलैंड शे अधिक है फिर भर किभ णे
उसा जी के लिए कई शप्टाह कोपेणहेगण भें रुकणे के लिए एक फ्लैट भें रहणे का इंटजाभ किया।
यही पर उसा जी णे जर्भणों द्वारा बणाए वह कांशेंट्रेशण केंप के कटीले टार देख़ें। हेलशिंगोर भें
हैभलेट का राजभहल देख़ा। ढेर शारी ख़रीददारी की। पहली बार वे णाइटुेरी लेकर फिणलैंड शे
श्वीडण गयÈ। आधी राट के बाद पट्णी शे णीछे शे दहलाटा हुआ शूरज का गोला देख़ा।”

उसा जी पहली बार अपणी शशुराल जा रही थÈ टब शिकागो शे लंदण जाणे पर उण्हें पटा छला कि
उणका शूटकेश गायब है। उश शूटकेश भें उणकी अणेक शुंदर-शुंदर शाडियाँ और दो केभरे थे।
पीछे दो-टीण भहीणों भें जो कुछ लिख़ा था, वो शब भी छला गया। किभ को जब इश बाट का पटा
छला टो उशी दिण उण्होंणे उसा जी को हेलशिंकी की प्रशिद्ध दुकाण ‘श्टॉकभैण’ शे बहुट शी छीजें
ख़रीदकर दी।

उसा जी णे टीण वर्सों टक दिल्ली के लेडी श्रीराभ कॉलेज भें अध्यापण कार्य करणे के
उपरांटुुलब्राइट श्कॉलरशिप पर अभरीका प्रश्थाण किया। आपणे अभेरिका भें ब्लूंगटण, इिल्याणा भें
दो वर्स पोश्ट डॉक्टरल श्टडी की। उसा जी एक विद्याथÊ श्वरूप अभेरिका अध्ययण के लिए गई थी
किण्टु अपणी योग्यटा और रूझाण के बलबूटे पर वह विश्कांशिण विश्वविद्यालय, भैडीशण भें
दक्सिणेशियाई विभाग भें प्रोफेशर पद पर णियुक्ट की गई टथा इशी पद शे अवकाश प्राप्ट हुई।

उसा जी एक लंबे शभय शे अभेरिका भें रह रही हैं। उणके परिधाण,
श्रृंगार पर ख़ाशटौर पर बिंदी पर टरह-टरह के प्रश्ण किये जाटे थे। इण्हÈ प्रश्णों का उट्टर देटे-देटे
उण्होंणे अपणे भाथे की शोभा बिंदी को लगाणा ही बंद कर दिया। अभेरिका जेशे देश भें दूशरी
दिôट शिकी का शाकाहारी होणा हो शकटा है। उसा जी भी शाकाहारी हैं, जहाँ भी वह जाटी है
अपणे शाथ कॉफी और दो दिण के लायक कुछ ख़ाणे-पीणे की शाभग्री लेकर जाटी हैं। अभेरिका शे
लोगों की भाणशिकटा है कि ख़ाणा बणाणे शे किछण गंदा हो जाटा है इशलिए शणिवार और रविवार
को ही पूरे एक शप्टाह का ख़ाणा बणा कर रख़ लिया जाटा है। उसा जी शे ऐशा णही किया जाटा
क्योंकि भारटीय भाणशिकटा उण्हें टाजे और बाशी ख़ाणे का बोध कराटी रहटी है। वे णए-णए
व्यंजणों शे अटिथि की शेवा भें जुट जाटी है।

उसा जी एक और भहट्ट्वपूर्ण बाट का ख़ुलाशा करटे हुए कहटी हैं कि अभेरिका भें बछ्छों को कॉलेज
और यूणिवर्शिटी भें पढाणे का ख़र्छ लाख़ों भें आटा है। अट: यहाँ पर भध्यवगÊय परिवार अपणे बछ्छों
को पढ़ाणे भें अशभर्थ है। यहाँ पर अभीर शे अभीर बछ्छा दश शाल की उभ्र शे आट्भणिर्भर बणणे के
लिए घाश काटटा है, राश्टों पर शे बर्फ शाफ करटा है, परंटु भारटीय बछ्छे ऐशा णही करटे। भारट
भें दश शाल का बछ्छा ही णही अपिटु शादी शुदा यहाँ टक की शंटाण युक्ट पिटा भी अपणे वृद्ध
भाटा-पिटा पर आश्रिट णजर आटा है।

अभेरिका भें लंबे अरशे शे रहणे पर उण्हें यह भी ज्ञाट हो छुका है कि उधर की यियों की
दिशा-दशा क्या है। अभेरिका भें आज टक (अद्याटण) कोई भहिला रास्ट्रपटि पद के लिए ण टो
णाभांकिट हुई और ण रास्ट्रपटि ही हो पाई है। इटणा ही णही रास्ट्रपटि की पट्णी टक को
श्पस्टवादिटा का अधिकार णही है।

कार्यालयों भें एक शभाण काभ करणे पर भी पुरुसों और भहिलाओं को वेटण एक शभाण णही है।
उसा जी कहटी हैं,”भेरे ही विश्वविद्यालय भें यह बाट लागू होटी है। यह टो भुझे हाल भें ही पटा
छला कि भेरे शाथ के शारे पुरुस शहयोगियों का वेटण भुझशे अधिक है, भले ही योग्यटा और शर्विश
भें वे कभ हों। पहले शरकारी और प्राइवेट शेक्टर भें कही भी भैटर्णिटी लीव वेटण शहिट का विधाण
णही था।”

केलीफोर्णिया विश्वविद्यालय अपणे प्रोफेशरश को अधिक वेटण देटा है। ऊँछे वेटण पाणे वाले प्रोफेशर
की आय का अख़बार भें ख़ुल्लभ ख़ुल्ला ब्यौरा छापा जाटा है। इश टरह की बाट उधर के प्रोफेशर
के लिए प्रेश्टिज की बाट होटी है। उसा जी कहटी हैं-”भेरी पहछाण विश्कांशिण विश्वविद्यालय की
शीणियर प्रोफेशर, हिंदी की लेख़क के बजाए पटि को शभ्पण्णटा और पद श बणटी थी।” उसा जी
की शहयोगिणी णारियों और छाट्रओं का व्यवहार उणके प्रटि टब बदल जाटा है जब वे जाण जाटी
थी कि वे प्रभोशण देणे वाली कभेटी भें हैं।ुेलोशिप कभिटी की अध्यक्स हैं।

अभेरिका भें पुरुसों की भाणशिकटा हैं कि प्रौढ़ पट्णी को छोड ़कर कभ उभ्र की लड़की के शाथ रहणा
आभ बाट है। उसा जी की भैट्री इशीलिए यहाँ की यियों भें पणपी णही। उसा जी णे देश विदेशों का
भ्रभण किया है किंटु अपणी भारटीय शंश्कृटि, परंपराओं को णही बिशूर पाई।

शाहिट्य लेख़ण की प्रेरणा : उसा जी के अध्ययण का क्सेट्र इलाहाबाद रहा इशी कारण उणपर बब्छण
जी की कविटाओं, पंट जी के घर की शाभें, फिराक गोरख़पुरी का अप्रट्याशिट लाड़-दुलार और
श्रीपट जी के लेख़क णे परोक्स रुप शे प्रभाव डाला। श्रीपट जी द्वारा उसा जी को भिलणे वाला
प्रोट्शाहण उणके लिए अविश्भरणीय रहा है। उसा जी के लेख़ण का आरंभ उश दौर छला रहा था।
णई कहाणी के आंदोलण की शुरुआट शण् पछाश के लगभग हुई-’णई कहाणी’ यह णाभ टो उशे
शण् पछपण छप्पण के बाद शे दिया जाणे लगा था। हुआ यूँ कि “श्री पंट राय णे पूछा था कि यह
णिर्भल वर्भा कौण हैं, जिशकी आपणे कहाणी छापी। उण्होंणे उसा जी को प्रेरणा देटे हुए कहा था कि
यदि वह भी कहाणी लिख़कर देंगी टो वे छाप देंगे।”

श्रीपट जी शे प्रोट्शाहण पा कर उण्होंणे कहाणी लिख़णा आरंभ कर दिया और इशी केुलश्वरूप
उणकी आरंभिक कहाणियाँ ‘शरिटा’ भें छपÈ। टट्पश्छाट् उणकी कहाणियों ‘कल्पणा’, ‘कृटि’ आदि
पट्र-पट्रिकाओं भें प्रकाशिट होणे लगी। बाद भें टो वह ‘धर्भयुग’ और ‘शारिका’ की शभ्भाणीय
लेख़िका बण गयी। उसा जी का भाणणा है कि ऐशी भहाण हश्टियाँ उण्हें प्रेरणा ण देटÈ टो वह णये
क्सिटिज शायद ही छूटÈ।

फिराक शाहब के शब्द उण्हें आज भी याद आटे हैं- ‘‘अंग्रेजी पढ़ो अंग्रेजी, णही टो हिंदी वालों की
टरह एक टरफÊ होकर रह जाओगी- बिणा विश्व शाहिट्य पढ़े को अछ्छी लेख़िका णही बण
शकटी।”49 उण्होंणे अपणे लेख़ण और प्रशिद्धी के बारे भें एक श्थाण पर लिख़ा है- ‘‘किटणा बछकाणा
और अशभ्पूर्ण लगटा था। अपणा लेख़ण पर यदि परिवार और प्रशिद्ध लेख़कों, कवियों का प्रोट्शाहण
ण भिला होटा टो शायद शंकोछ भें कहाणीकार दबा ही रह जाटा।”

उसा प्रियंवदा का कृटिट्व

हिण्दी कथा-शाहिट्य के क्सेट्र भें भहिला लेख़िकाओं भें उसा प्रियंवदा का णाभ अपणी आधुणिक भाणव
की विछिट्र भणोदशा टथा उशके टणावों के अद्दुट छिट्रण के कारण ही उल्लेख़णीय है। उण्होंणे अभी
टक लगभग 31 कहाणियों और छार उपण्याश पर अपणी लेख़णी छलाई है।

उपण्याश

हिण्दी कहाणी लेख़ण भें शिद्ध हश्ट उसा जी णे कहाणी विधा के शाथ-शाथ उपण्याश को भी
शशक्ट बणाया है। आपणे अपणे उपण्याशों भें देश-विदेश की णारी श्थिटि टथा भध्यभ वगÊय
पारिवारिक यथार्थ और शभश्याओं शे जूझटे पाट्रों को बड़ी भार्भिकटा शे प्रश्टुट किया है-

  1. पछपण ख़ंभे लाल दीवारें
  2. रूकोगी णही राधिका
  3. शेसयाट्र
  4. अण्टर्वंशी
  5. भया कबीर उदाश

कहाणियाँ

1. ‘जिण्दगी और गुलाब केु फ़ूल’ उणका पहला कहाणी शंग्रह है जिशभें उणकी 12 कहाणियाँ
शंकलिट
हैं।

  1. जाले
  2. छुÍी का दिण
  3. कछ्छे धागे
  4. पूर्टि
  5. कंटीली छाँह
  6. दो अंधेरे
  7. छाँद छलटा रहा
  8. दृस्टि दोस
  9. वापशी
  10. जिण्दगी और गुलाब

2. ‘किटणा बड़ा झूठ’ उणका दूशरा कहाणी शंग्रह है जिशभें उणकी केवल आठ लभ्बी कहाणियाँ हैं-

  1. प्रटिध्वणियाँ
  2. किटणा बड़ा झूठ
  3. ट्रिप
  4.  णÈद
  5. शुरंग
  6. श्वीकृटि
  7. भछलियाँ

3. ‘एक कोई दूशरा’ उणका टीशरा कहाणी शंग्रह है जिशभें कुछ ज्ञाट कहाणियों को शंकलिट
किया गया है-

  1. एक कोई दूशरा
  2. झूठा दर्पण
  3. कोई णही
  4. पिघलटी हुई बर्फ
  5. छाँदणी भें बर्फ पर
  6. टूटे हुए
  7. शागर पार का शंगीट

4. ‘शूण्य टथा अण्य रछणाएँ’ इश ग्रंथ भें उसा जी की छार कहाणियों का शभावेश है।

  1. प्रशंग
  2. शूण्य
  3. आधा शहर
  4. पुणरावृट्टि

उसा प्रियंवदा की उपलब्धियाँ

1989 भें टभिलणाडु के हिण्दी शेवी एवं विद्वाण भोटूरि शट्यणारायण णे पद्भभूसण डॉ. भोटूरि
शट्यणारायण पुरश्कार की शुरूआट की थी। यह पुरश्कार भारटीय भूल के उण हिण्दी विद्वाणों को
दिया जाटा है, जो विदेश भें हिण्दी भासा अथवा शाहिट्य के क्सेट्र भें विशिस्ट योगदाण करटे हैं।
उसा प्रियंवदा जी णे विदेश भें रहटे हुए भी हिण्दी भासा और शाहिट्य के लिए पूरी टरह शभर्पिट रही
और अपणे उछ्छश्टरीय लेख़ण और कौशल केुलश्वरूप 2007 भें ‘पद्भभूसण डॉ. भोटूरि
शट्यणारायण पुरश्कार’ टथा ‘ढÈगराफउण्डेशण-हिण्दी छेटणा के अंटर्रास्ट्रीय शाहिट्य शभ्भाण’ शे
पुरश्कृट की गई।

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