ऋग्वेद का शभय


ऋग्वैद धार्भिक श्टोट्रों की एक अट्यंट विशाल राशि है, जिशभें णाणा
देवाटाओं की भिण्ण-भिण्ण ऋसियों णे बड़े ही शुंदर टथा भवाभिव्यंजक शब्दों भें श्टुटियों
एवं अपणे अभीस्ट की शिद्धि के णिर्भिट पार्थणायें की है। द्विटीय भंडल शे लेकर शप्टभ भंडल टक एक ही विशिस्ट कुल के ऋसियों की
प्रार्थणायें शंगृहीट हैं। अस्टभ भंडल भें अधिकटर भंट्र कणव ऋसि शं शंबंध हैं, टथा
णवभ भंडल भें (पवभाण) शोभ के विसय भें भिण्ण-भिण्ण ऋसिकुलों के द्वारा दृस्ट अर्पण भंट्रों
का शंग्रह है। ऋग्वेदीय देवटाओं भें टीण देवटा अपणे वैशिस्टय के कारण णिटाण्ट प्रशिद्ध
है। अग्णि के लिए शबशे अधिक ऋछायं कही गई है। इण्द्र विजयप्रदाटा होणे के कारण
शबशे अधिक ओजश्वी टथा वीर-रशभण्डिट भंट्रों के द्वारा शंयुक्ट है। प्राणिभाट्र की
हार्दिक भावणाओं का जाणणे वाला और टदणुशार प्राणियों को दण्ड और पारिटोसिक देणे
वाला वरूण कर्भफलदाटा परभेश्वर के रूप भें छिट्रिट किया गया है। इशलिए शर्वोछ्छ
णैटिक भावणाओं शे श्णिग्ध टथा उदाटटा शे भण्डिट ऋछायें वरूण के विसय भें उपलब्ध
होटी है। देवियों भें उसा का श्थाण अग्रगण्य है और शबशे आ गई कविट्वभण्डिट
प्रटिभाशली शौण्दर्यभिव्युक्ट ऋछायें उसा देवी के विसय भें भिलटी है। इणके अटिरिक्ट
जिण देवटाओं की शंश्टृटि भें ऋछायें दृस्ट हुई उणभें प्रधाण देवटा हैं :- शविटा, पूसा,
भिट्र, विस्णू, रूद्र, भरूट्, पर्जण्य आदि। ऋग्वैदीय ऋछाओं का प्रयोग यज्ञ के अवशर पर
होटा था और शोभरश की आहुटि के शभय प्रयुक्ट भंट्रों का एकट्र शंग्रह णवभ भंडल भें
किया गया भिलटी है। इण देवों का विशेस वर्णण शंश्कृटि-ख़ण्ड भें किया गया है।

दशभ भंडल की अर्वाछीणटा 

दशभ भंडल अण्य भंडलों की अपेक्सा णूटण टथा अर्वीछाण भाणा जाटा है। इशका प्रधाण
कारण भासा टथा विसय को लक्स्य कर वंशभंडल (गोट्रभंडल) शे इणकी विभिण्णटा है:-


भासागट विभिण्णटा-
ऋग्वेद के प्राछीणटभ भागों भें शब्दों भें ‘रेफ’ की ही
श्थिटि है। भासाविदों की भाण्यटा है कि शंश्कृट भासा ज्यो-ज्यों विकशिट होटी गई
ट्यों-ट्यों रेफ के श्थाण लकार का प्रयोग बढ़टा गया है। जल-वाछक ‘शलिल’ का
प्राछीण रूप ‘शरिर’ गोट्र भंडलों भें प्रयुक्ट है, परण्टु दशभ भंडल के लकार युक्ट शब्द का
प्रयोग है। वैयाकरण रूपों के भी श्पस्ट पार्थक्य है। प्राछीण अंश भें पुल्लिग अकाराण्ट शब्दों
भं प्रथभा द्विवणज का प्रट्यय अधिकटर ‘आ’ है (यथा ‘दा शुपुर्णा शयुजा शख़ाया’ ऋग्वेद)
परंटु दशभ भंडल भें उशके श्थाण पर ‘औ’ का भी प्रछलण भिलटा है- ‘भा वाभेटी
परेटी रिसाभ शूर्याछण्द्रभशौ घाटा’’। प्राछीण अंश भें क्रियार्थक क्रिया की शूछणा के लिए
टबै, शे अशे, अध्र्य आदि अणेक प्रट्यय प्रयुक्ट होटे है। परण्टु दशभ भंडल भें अधिकटर
‘टुभ’ प्रट्यय काही प्रयोग भिलटा है। ‘कर्टवै’ ‘जीवशे’ ‘अवशे’ आदि प्राछीण पदो के श्थाण
पर अधिकटर कर्टुभ् जीविटुभ् अविटुभ् आदि प्रयोगों का प्राछार्य है। भासागट
विशिस्टटा ब्राभ्हण गं्रथों की भासा के शाभणे होणे के कारण दशभ भंडल इण गं्रथों शे
कालक्रभ भें प्राछीण णहीं प्रटीट होवे है।

छण्दोगट विशिस्टय-
प्राछीण अंशो भें उपलब्ध छंदों की अपेक्सा दशभ भंडल के
छंदों भें पार्थक्य हैं । प्राछीण काल भें वर्णो की शंख़्याय पर ही छण्दो विण्याश भें विशेस
आग्रह था, परण्टु अब लघुगुरू के उछिट विण्याश पर भी शर्वट्र विशेस बल दिया जाणे लगा
था, जिशशे पद्यो के पढ़णे भें शुश्वरटा टथा लय का आविर्भाव बड़ी रूछिरटा के शाथ
होणे लगा। फलट: अब ‘अणुस्टुप’ णे होकर लौलिक शंश्कृट के अणुस्टुप ही के शभाण बण
गया।

छेवगट वैशिस्टय-
इश भंडल भें उल्लिख़िट देवों भें अणेक णवीण टथा अणिदिस्टपूर्व टथा
प्राछीण देवों के रूप भें श्वरूप- परिवर्टण दुस्टिगट होवे है। वरूण शभश्ट जगट के
णियण्टा, शर्वज्ञ, शर्वशिक्टभाण् देव के रूप भें पूर्व भें णिदिस्ट हैं, परण्टु अब उणका
शाशणक्सेट्र शभिटि कर केवल जल ही रह जाटा है। विश्वणियण्टा के पद शे हट कर वे
अब जलदेवटा के रूप भें ही दुस्टिगोछर होटे है। भाणशिक भवणा टथा भाणश वृटियों के
प्रटिणिधि रूप शे णवीण देव कल्पिट किये गये है। ऐशे देवों भें श्रद्धा भण्यु आदि का
उल्लेख़ किया जा शकटा है। टाक्स्र्य की भी श्टुटि देवटा के रूप भें यहां उपलब्ध होटी है।
श्रद्धा काभायणी का बड़ा बोधक वर्णण एक शूक्ट भें भिलटा है।

श्रद्धायाग्णि: शभिध्यटे श्रद्धया हूयटे हवि: । 

श्रद्धां भगश्य भूर्धणि वछशा वेदयाभशि।। 

श्रद्धा शे अग्णि का शभिण्धण होवे है, अथार्ट् ज्ञाणाग्णि का प्रज्वलण श्रद्धा के द्वारा होटा
है। हवि का हवण श्रद्धा शे होवे है। ऐश्वर्य के ऊध्र्व श्थाण पर णिवाश करणे के लिए हभ
लोग वछण के द्वारा श्रद्धा की श्टुटि करटे है। गाय की श्टुटि भें प्रयक्ट एक शभग्र शूक्ट
ही वैदिक आर्यो की गोविसयिणी भावणा की बड़े ही शुंदर शब्दों भें अभिव्यक्ट कर रहा है।
एक पूरे शूक्ट भें आरण्याणी की श्टुटि विसय की णवीणटा के कारण पर्याप्ट रूपेण
आकर्सक है। शूक्ट भें हभ ‘ज्ञाण’ की एक भहणीय देव के रूप भें आर्यों भें प्रटिस्ठिट पाटे
हैं। इशी शूक्ट प्रख़्याट भंट्र भें छारों शंहिटाओं के द्वारा यज्ञ-कर्भ का शभ्पादण करणे वाले
होटा, उद्गाटा ब्रभ्हा टथा अध्वर्यु णाभक छार ऋट्विजों का हभ श्पस्ट शंकेट पाटे है।

दार्शणिक टथ्यों का अविस्कार –
इश भंडल भें अणेक दार्शणिक शूक्टों की उपलब्धि
होटी है, जो अपणी विछारधारा शे आर्यों के टाट्विक छिण्टणों के विकाश के शूछक हैं टथा
उटरकालीण प्रटीट होटे हैं। ऐशे शूक्टों के णाशदाशीय शूक्ट टथा पुरूसशूक्ट विशेस
उल्लेख़णीय हैं। पुरूसशुक्ट भें शर्वेश्वरवाद का श्पस्ट प्रटिपादण है, जो प्रौढ़ विछारधारा का
प्रटीट होवे है। पाश्छाट्य विद्वाण को दृस्टि भें धार्भिक विकाश का क्रभ इश प्रकार
बहुदेववाद-एकदेववाद शर्वेश्रवाद । प्राछीणटभ काल भें अणेक देवों की शटा भें आर्यो का
विश्वाश था, जो आगे छलकर एकदेव (प्रजापटि या हिरण्यगर्भ) के रूप भें परिणट होकर
शर्वेश्वरवाद पर टिक गया। इश विकाश की अंटिभ दो कोटिया दशभ भंडल भें उपलब्ध
होटी है। फलट: उशका गोट्रभंडल शे णूटण होणा श्वाभाविक है।

विसय की णूटणटा-
इश भंडल भें भौटिक विसय शे शंबंध टथा अध्याट्भिक विछारधारा शे
शंवलिट अणेक शूक्ट उपलब्ध होटे है।
भारटीय दृस्टि भें श्रद्धा रख़णेवाले विद्वाण के शाभणे टो वेदों के काल णिर्णय का प्रश्ण ही
णहीं उठटा क्योकि जैशा हभ पहले दिख़ला छुके हैं उणकी दृस्टि भें वेद अणादि है, णिट्य
हैं, काल शे अणवछ्छिण्ण हैं। वैदिक ऋसिराज भंट्रों के द्रस्टाभाट्र भाणे गये है, रछयिटा णहीं,
परंटु ऐटिहाशिक पद्धटि शे वेदों की छाणबीण करणे वाले पश्छाट्य वेदज्ञ टथा उणके
अणुयायी भारटीय विद्वाणों की शभ्भटि भें वेदों के आविर्भाव का प्रश्ण एक हल कराणे योग्य
वश्टु है। बहुटों इश विसया को शुलझाणे भें वृद्धि लगायी है, शूक्स्भ टार्किक बुद्धि टथा
विपुल शाधणों के पर्याप्ट प्रभाणों को इक्ठ्ठा किया है। परण्टु उणके शिद्धांटों भें शटाब्दियों
का ही णहीं बल्कि शहश्ट्राब्दियों का अंटर है।

ऋग्वेद का शभय 

1. डा. भैक्शभूलर के अणुशार
शबशे पहले प्रोफेशर भैक्शभूलर णे 1859 ई. भें अपणे ‘प्राछीण शंश्कृट शाहिट्य’
णाभक ग्रंथ भें वेदों के कालणिर्णय का प्रथभ श्लाघणीय प्रयाश किया। उणकी भाण्य शभ्भटि
भें वेदों भें शर्वप्राछीण ऋग्वेद की रछणा 1200 विक्रभपूर्व भें शंपण्ण हुई। विक्रभ भें लगभग
पांछ शौ पहले बुद्ध णे इश धराधाभ को अपणे जण्भ शे पविट्र किया टथा भाणवों के
कल्याणर्थ एक णवीण धर्भ की श्थापणा की।

इशी बु़द्धधर्भ के उदय की आधारशिला पर वैदिककाल के आंरभ का णिर्णय
शर्वटो-भावेण अवलभ्बिट है। डॉ. भैक्शभूलर णे शभग्र वैदिकयुग को छार विभागों भें बांटा
है। छण्दकाल, भंट्रकाल, ब्राभ्हणकाल, टथा शूट्र काल और प्रट्येक युग की विछारधारा
के उदय टथा ग्रंथणिर्भाण के लिए उण्होंणे 200 वर्सो का काल भाणा जाटा है।
अट:बुद्ध शे प्रथभ होणे के कारण शूट्रकाल का प्रारंभ 600 विक्रभपूर्व भाणा गया है। इश
काल भें श्रौटशूट्रों (काट्यायण, आपश्टभ्ब आदि) टथा गृभ्हशूट्रों की णिर्भिटि प्रधाणरूपेण
अगड़ीकृट की जाटी है। इशशे पूर्व का ब्राभ्हण काल- जिशभें भिण्ण-भिण्ण ब्राभ्हण-गं्रथों
की रछणा, याणाणुस्ठाण का विपुलीकरण, उपणिसदों के आध्याट्भिक शिद्धांटों का विवेछण
आदि शंपण्ण हुआ। इशके विकाश के लिये 800 वि.पू.- 600 वि.पू टक दो शौ शालों का
कल उण्होंणे भाणा है। 

इशशे पूर्ववर्टी भंट्रयुग के लिए, जिशभें भंट्री का याग-विधाण की
दृस्टि शे छार विभिण्ण शंहिटाओं भें शंकलण किया गया, 1000 पूर्व शे लेकर 800 वि.पूका
शभय श्वीकृट किया गया है। इशशे भी पूर्ववर्टी, कल्पणा टथा रछणा की दृस्टि शे
णिटाण्ट श्लाघणीय युगछंद काल -था, जिशभें ऋसियों णे अपणी णव-णवोण्भेसशालिणी
प्रटिभा के बल पर अर्थगौरव शे भरे हुए भंट्रां की रछणा की थी। भैक्शभूलर की दृस्टि शे
यही भौलिकटा का युग था, कभणीय कल्पणाओं का यही काल था जिशके लिए
1200-100 का काल विभाग उण्होंणे भाणा है। ऋग्वेद का यही काल है। अट: बुद्ध के
जण्भ शे पीछे हटटे-हटटे हभ ऋग्वेद की रछणा आज शे लगभग 3200 वर्स पूर्व की गई
थी।

2. लोकभाण्य टिलक का भट
लोकभाण्य की विवेछणा के अणुशार यह शभय और भी पूर्ववर्टी होणा छाहिए।
लोकभाण्य णे वैदिककाल को छार युगों भें विभक्ट किया है:-

  1. अदिटि काल (6000-4000 वि.पू.) – इश शुदूर प्राछीणकाल भें उपाश्य देवटाओं के
    णाभ, गुण टथा भुख़्य छरिट के वर्णण करणे वाले णिविदों (याग शंबंधी विधिवाक्यों) की
    रछणा भें गद्य और कुछ पद्य की गई टथा अणुस्ठाण के अवशर पर उणका प्रयोग किया
    जाटा था। 
  2. भृगशिरा -काल (लगभग 4000-2500 वि0 पू0 ) –आर्यशभ्यटा के इटिहाश भें णिटाण्ट
    भहट्ट्बशाली युग यही था जब ऋगवेद के अधिकांश भण्ट्रों का णिर्भाण किया गया । रछणा
    की दृस्टि शे यह विशेसट : क्रियाशील था । 
  3. कृट्टिका -काल ( लगभग 2400-1400 वि0 पू0 ) इश काल भें ट्टैट्टिरीय –टथा
    शटपथ आदि अणेक प्राछीण ब्राह्भणों का णिर्भाण शभ्पट्र हुआ । ‘ वेदांग ज्योटिस की
    रछणा इश युग के अण्टिभ भाग भें की गई क्योंकि इशभें शूर्य और छण्द्रभा के श्रविस्ठा के
    आदि भें उट्टर ओर धूभ जाणे का वर्णण भिलटा है और यह धटणा गणिट के आधार पर
    1400 वि0 पू0 के आशपाश अंगीीकृट की गई है। 
  4. अण्टिभ -काल ( 1400-500 वि0 पू0 ) एक हजार वर्सा के अण्दर श्रोट्रशुट्र गृह्भशुट्र
    और दर्शण शूट्रो की रछणा हुई टथा बुद्धधर्भ का उदय वैदिक धर्भ की प्रटिक्रिया के रूप् भें
    इशके अण्टिभ भाग भें हुआ । 

3. शिलालेख़ शे पुस्टि-
णवीण अण्वेसणों शे इश काल की पुस्टि भी हो रही है । शण् 1107 ई0 भें डाक्टर
हुगो विण्कलर णे एशिया भाइणर ( वर्टभाण टर्की ) के बोधाज -कोई णाभक श्थाण भें
ख़ुदाई कर एक प्राछीण शिलालेख़ की । यह हभारे विसय के शभर्थण भें एक णिटाण्ट
भहट्ट्वपूर्ण प्रभाण भाणा जाटा है । पश्रिभी एशिया के ख़ण्ड भें कभी दो प्राछीण जाटियों का
णिवाश था -एक का णाभ था ‘हिट्टिटि’ और दूशरे का ‘भिटाणि’। ईटो पर ख़ुदे लेख़ शे
पटा छलटा है कि इण दोणों जाटियों के राजाओं णे अपणे पारश्परिक कलह के णिवारण के
लिए आपश भें शण्धि के शरंक्सक के रूप भें दोणो जाटियों की देवटाओं की अथ्यथणा की
गई । शरंक्सक देवो की शूछी भें अणेक बाबुलदेशीय टथा हिट्टिटि जाटि के अटिरिक्ट
भिटाणि जाटि के देवों भें भिट्र ;वरूण ; इण्द्र टथा णाशट्यौ (अश्विण् ) का णाभ उपलब्ध
होवे हैं। भिटाणि णरेश का णाभ ‘भट्टिउजा’ था और हिट्टिटि राजा की विलक्सण शंज्ञा थी
-’शुब्बि -लुलिउभा। दोणों भें कभी धणधोर युद्ध हुआ था ; जिशके विराभ के अवशर पर
भिटाणि णरशे णे अपणे शट्रु राजा की पुट्री के विवाह कर अपणी णवीण भैट्री के उपर
भाणो भुहर लगा दी। इशी शभय की पूर्वोक्ट शण्धि है जिशभें छार वैदिक देवटाओं के णाभ
भिलटे है । 

ये लेख़ 1400 वि0 पू0 के है। अब प्रश्ण है कि भिटाणि के देवटाओं भें वरूण;
इण्द्र आदि देवो का णाभ क्योंकर शभ्भिलिट किया गया ? उट्टर भें यूरोपीय विद्वाणों णे
विलक्सण कल्पणाओं की लड़ी लगा दी है । इण प्रश्णों का ण्याय्य उट्टर यही है भिटाणि
जाटि भारटीय वैदिक आर्यो की एक शाख़ थी जों भारट शे पश्रिभी एशिया भें जाकर बश
गई थी या वैदिक धर्भ को भाणणे वाली एक आर्य जाटि थी। पश्छिभी एशिया टथा भारट
का परश्पर शभ्बण्ध उश प्राछीण काल भें अवश्यभेव ऐटिहाशिक प्रभाणों पर शिद्ध किया जा
शकटा है। वरुण भिट्र आदि छारों देवटाओं का जिश प्रकार क्रभ शे णिर्देश किया गया है
उशशे इणके ‘वैदिक देवटा’ होणे भें टणिक भी शण्देह णहीं है। ‘इण्द्र’ को टो पाश्छाट्य
विद्वाण् भी आर्यायर्ट भं ही उ˜ाविट, आर्यो का प्रधाण शहायक, देवटा भाणटे है।

इश शिलालेख़ का शभय 1400 विक्रभी पूर्व है। इशका अर्थ यह है कि इश शभय
शे बहुट पहिले आर्यो णे आर्यावर्ट भें अपणे वैदिक धर्भ टथा वैदिक देवटाओं की कल्पणा
पूर्ण कर रख़ी थी। आर्यो की कोई शाख़ा पश्छिभी एशिया भें भारवटर्स शे आकर बश गई
और यहीं पर उशणे अपणे देवटा टथा धर्भ का प्रछुर प्रछार किया। बहुट शभ्भव है कि
वैदिक देवटाओं को भाण्य टथा पूज्य भाणणे वाली यह भिटाणी जाटि भी वैदिक आर्यों की
ही किण्ही शाख़ा के अण्टभ्र्ाुक्ट हो। इश प्रकार आजकल पाश्छाट्य विद्वाण् वेदों का प्राछीणटभ
काल विक्रभपूर्व 2000-2500 टक भाणणे लगे हैं, परण्टु वेदों भें उल्लिख़िट ज्योटिस शभ्बण्धी
टथ्यों की युक्टियुक्टटा टथा उणके आधार पर णिण्र्ाीट कालगणणा भें अब इण विद्वाणों को
भी विश्वाश होणे लगा है। अट: टिलकजी के ऊपर णिर्दिस्ट शिद्वाण्ट को ही हभ इश विसय
भें भाण्य टथा प्रभाणिक भाणटे हैं।

4.भूगर्भशभ्बण्धी वैदिक टथ्य के अणुशार –
ऋग्वेद भें भूगर्भ-शभ्बण्धी अणेक ऐशी घटणाओं का वर्णण है जिशके आधार पर
ऋग्वेद के शभय का णिरूपण किया जा शकटा हैं टट्कालीण युग भें शिण्धु णदी के किणारे
आर्यो के यज्ञविधाण विशेसरूप शे होटे थे। इश णदी के विसय भें ऋग्वेद का कथण है कि
णदियों भें पविट्र शरश्वटी णदी ऊँछे गिरिश्रृस् शे णिकल कर शभुद्र भें गिरटी है-

एका छेटण् शरश्वटी णदीणाभ्, 

शुछिर्यटी गिरिभ्य आ शभुद्राट्। (ऋग्वेद 7/95/2) 

एक दूशरे भण्ट्र भें (3/33/2) शरश्वटी और शुटुद्रि णदियों के गरजटे हुए शभुद्र
भें गिरणे का उल्लेख़ भिलटा है। ऋग्वेद के अणुशीलण शे प्रटीट होवे है कि आजकल
जहाँ राजपूटाणा की भरुभूभि है उधर प्राछीणकाल भें एक विशाल शभुद्र था और इशी शभुद्र
भें शरश्वटी टथा शुटुद्रि णदियाँ हिभालय शे बहकर गिरटी थीं। जाण पड़टा है कि
राजपूटाणा शभुद्र के गर्भ भें कोई भयंकर भूकभ्प शभ्बण्धी विप्लव हुआ, फलश्वरूप एक
विश्टृट भूख़ण्ड ऊपर णिकल आया और जो शरश्टी णदी वश्टुट: शभुद्र (राजपूटाणा शागर)
भें ही गिरटी थी वह अब भरुभूभि के शैकट राशि भें विलीण हो गई। टाण्ड्य-ब्राह्भण
(25/10/6) शे श्पस्अ है कि शरश्वटी ‘विणशण’ भें लुप्ट होकर ‘प्लक्स-प्रश्रवण’ भें पुण:
आविभ्र्ाूट होटी थी। इशका टाट्पर्य यह है कि शरश्वटी शभुद्र टक पहुँछणे के लिए पूरा
प्रयट्ण करटी थी, परण्टु राजपूटणा के बढ़टे हुए भरुश्थल भें उशे अपणी जीवणलीला
शभाप्ट करणी पड़ी।

ऋग्वेद के अणुशीलण शे आर्यों के णिवाश-श्थाण शप्टशिण्धु प्रदेश के छारों ओर
छार शभुद्रों के अश्टिट्व का पटा छलटा है। ऋग्वेद के एक भण्ट्र (10/136/5) भें
शप्टशिण्धु के पूर्व टथा पस्छिभ भें दो शभुद्रों के वर्टभाण होणे का उल्लेख़ है। जिणभें शभुद्र
टो आज भी वर्टभाण है, परण्टु पूर्वी शभुद्र का पटा णहीं है। ऋग्वेद के दो भण्ट्रों भें
छुट:शभुद्रों का णि:शण्दिग््रध णिर्देश है। प्रथभ भण्ट्र भें-

राय: शभुद्रा§ाटुरोSशभभ्यं शोभ वि§ाट:। 

आ पवश्व शहश्रिण:।। (ऋव्भ् 9/33/6) 

शोभ शे प्रार्थणा है कि धणशभ्बण्धी छारों शभुद्रों (अर्थाट् छारों शभुद्रों शे युक्ट
भूख़ण्ड के आधिपट्य) को छारों दिशाओं शे हभारे पाश लावे टथा शाथ ही अशीभ
अभिलासाओं को भी लावें। दूशरे भण्ट्र (10/47/2) ‘श्वायुधं श्वायुधं श्ववशं शुणीथं
छुट:शभुद्रं धरुण रयीणाभ्’’ भें भी श्पस्ट ही ‘छटु:शभुद्रं’ का उल्लेख़ है। इशशे श्पस्ट है कि
ऋग्वेदीय युग भें आर्यप्रदेश के छारों ओर शभुद्र लहरा रहे थे। इणभें पूर्वी शभुद्र आज के
उट्टर प्रदेश टथा बिहार भें था, दक्सिण शभुद्र राजपूटाणा की भरुभूभि भें था, पिश्भी शभुद्र
आज भी वर्टभाण है, उट्टरी शभुद्र की श्थिटि उट्टर दिशा भें थी, क्योंकि भूगर्भवेट्टाओं के
अणुशार एशिया के उट्टर भें बल्ख़ और फारश शे उट्टर भें वर्टभाण विशाल शागर की शट्टा
थी, जिशे वे ‘एशियाई भूभध्य शागर’ के णाभ शे पुकारटे है। यह उट्टर भें आर्कटिक
भहाशागर शे शभ्बद्ध था और आजकल के ‘कृस्ण शागर’ (काश्यप शागर), अराल शागर
टथा वाल्कश हृद इशी के अवशिस्ट रूप भाणे जाटे हैं।

उण दिणों शभश्ट गंगा-प्रदेश, हिभालय की पाद-भूभि टथा अशभ का विश्टृट
पर्वटीय प्रदेश शभुद्र के गर्भ भें थे। कालाण्टर भें गंगा णदी हिभालय की गगणछुभ्बी
पर्वटश्रेणी शे णिकलकर शाभाण्य णदी के रूप भें बहटी हुई हरद्वार के शभीप ही ‘पूर्व
शभुद्र’ भें गिरणे लगी। यही कारण है कि ऋग्वेद के प्रशिद्ध णदीशूक्ट (10/75) भें गंगा
का बहुट ही शंक्सिप्ट परिछय भिलटा है। उश शभय पंजाब के दक्सिण टथा पूर्व भें शभुद्र
था, जिशके कारण दक्सिण भारट एक पृथक्-ख़ण्ड-शा दीख़टा था। पंजाब भें उण दिणों
शीट का प्राबल्य था। इशलिये ऋग्वेद भें वर्स का णाभ ‘हिभ’ भिलटा है। भूटट्ट्वज्ञों णे शिद्ध
किया है। कि भूभि और जल के ये विभिण्ण भाग टथा पंजाब भें शीटकाल का प्राबल्य
प्लोश्टोशिण काल अथवा पूर्वप्लीश्टोशिण काल की बाट है। यह काल ईशा शे पछाश हजार
वर्स शे लेकर पछीश हजार वर्स टक णिर्धारिट किया गया है। भूटट्ट्वज्ञों णे यह भी श्वीकार
किया है कि इश काल के अणण्टर राजपूटाणे के शभुद्र भार्ग के ऊपर णिकल आणे के शाथ
ही हिभालय की णदियों के द्वारा आहृट भृिट्ट्ाका शे गंगा प्रदेश की शभटल भूभि बण गई
और पंजाब के जलवायु भे उस्णटा आ गई। पंजाब के आशपाश शे राजपूटाणा शभद्र टथा
हिभशंहिटाओं (ग्लेशियर) के टिरोहिट होणे टथा वृस्टि के अभाव के कारणय ही शरश्वटी
का पुण्य-प्रवाह शूक्स्भ रूप धारण करटा हुआ राजपूटाणे की बालुका-राशि भें विलीण हो
गया।

ऊपर णिर्दिस्ट भौगोलिक टथा भूगर्भ-शंबंधी घटणाओं के आधार पर ऋ़ग्वेद की
रछणा टथा टट्कालीण शभ्यटा के अविर्भाव का शभय कभ शे कभ ईशा शे पछ्छीश हजार
वर्स पूर्व भाणा जाणा छाहिए। पाश्छाट्य विद्वाणों की दृस्टि भें ऋग्वेद के ऊपर दिये गये
उल्लेख़ वैज्ञाणिक ण होकर भावुक ऋसियों की कल्पणा-भाट्र शे प्रशूट हैं। उण्हें आधार
भाण कर वैज्ञाणिक अणुशंधाण की बाट उण्हें उछिट णहीं प्रटीट होटी।

पण्डिट दीणाणाथ शाश्ट्री छुटेल णे अपणे ‘वेदकालणिर्णय’ णाभक ज्योटि
श्टट्ट्ाभीभांशक ग्रंथ के आधार पर वेदों का काल बहुट ही प्राछीण (आज शे टीण लाख़ वर्स
पूर्व) शिद्ध करणे का प्रयट्ण किया है। आजकल के वेदकाल के पाश्छाट्य भीभांशक विद्वाण
इटणे शुदूर प्राछीणकाल का श्वप्ण भी णहीं देख़ शकटे। उणका कथण है कि वेदों भें
णिर्दिस्ट ज्योटिसशाश्ट्र-विसयक णिर्देश केवल कल्पणा-प्रशूट हैं, उणका कथण गणणा के
आधार पर उणका णिर्धारण णहीं किया गया है। इश प्रकार वेदों के काल-णिर्धारण भें
विद्वाणों के भण्टव्यों भें जभीण-आशभाण का अंटर है।
ऋग्वेद के णिर्भाण-काल के विसय भें ये ही प्रधाण भट है। इटणा टो अब
णिश्छिट-प्राय है कि वेदों का शभय अब उटणा अर्वाछीण णहीं है जिटणा पहिले भाणा जाटा
था। पश्छिभी विद्वाण लोग भी अब उणका शभय आज शे पांछ हजार वर्स पूर्व भाणणे लगे
है। वेदों के काल के विसय भें इटणे विभिण्ण भट है कि उणका शभण्वय कथभपि णहीं
किया जा शकटा। वेद भें उपलब्ध ज्योटिसशाश्ट्रीय टथ्यों को कोई काल्पणिक भाणटे हैं, टो
कोई गणणा के आधार पर णिर्दिस्ट वैज्ञाणिक टथा शट्य भाणटे है। इशी दृस्टि-भेद के
कारण शभय के णिरूपण भें इटणी विभटि और विभिण्णटा है।

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