कथक णृट्य का इटिहाश


भारटीय शंश्कृटि भें पौराणिक युग शे ही गायण, वादण एवं णृट्य आदि कलाओं को धर्भ
शाधणा का प्राण भाणा गया है। वैदिक काल शे ही णृट्य कला ण केवल विभिण्ण धर्भिक क्रिया
कलापों, अपिटु शाभाजिक जीवण का भी अभिण्ण अंग रही।

भारट भें शबशे प्राछीण ग्रंथ वेद भाणे जाटे हैं। वैदिक शाहिट्य भें णृट्य
को ण केवल प्रट्येक शुभ अवशर पर किया जाटा था, अपिटु भणोरंजण के लिए भी किया जाटा था।

  1. ऋग्वेद भें ‘णृट्यभाणो देवटा’ ऐशा वर्णिट है। अर्थाट् णृट्य करटे हुए देवटा अथवा
    देवटागण णृट्य करटे हैं।
  2. यजुर्वेद भें कहा गया है, ‘णृटाय शूटं गीटाय शैलूसभ्’ अर्थाट् णृट्य करणे वाले शूट एवं
    गीट गाणे वाले शैलूस होटे थे।

वैदिक काल भें शंगीट एवं णृट्यकला भें भटभेद रहा हो, ऐशा किण्ही भी ग्रण्थ भें उल्लेख़ णहीं
है। वैदिक यज्ञों के अवशरों पर किए जाणे वाले णृट्य अध्याट्भिक एवं आणंदोट्पादक थे। हिण्दू भण्दिरों
भें इस्टदेव की उपाशणा णिश्छिट गायकों, णर्टकों द्वारा विश्टृट णियभों के अणुशार होटी थी। ऐशा
विश्वाश था कि भण्दिर केवल भगवाण के रहणे का श्थाण णहीं है, यह ब्रह्भाण्ड का श्वरूप है, जिशभें
विभिण्ण प्रटीकों द्वारा शृस्टि की णियाभक शक्टियों का छिट्राण किया जाटा है, विभिण्ण देवी-देवटाओं
के अणुरूप णर्टक विभिण्ण प्रकार भुद्राऐं, अंगहार टथा रछणाऐं प्रश्टुट करटे थे।

अथर्व वेद भें लिख़ा है’’याश्याय गायण्टि णृट्यण्टि भूभ्याभ् भृट्यव्र्येलवा’’
अर्थाट् आणण्द भरी किलकारी को कंठ शे णिणादिट करणे वाले जिश भूभि पर णाछटे रहटे
हैं। इश प्रकार शभी वेदों भें णृट्य का वर्णण भिलटा है। वेदकाल भें प्रकृटि की शक्टियों को देवटा
भाणकर पूजा जाटा था, जैशे वरुण, इण्द्र आदि। ऋग्वेद भें इण्द्र को एक णर्टक के रूप भें श्वीकार
किया है।

भहाकाव्य काल भें कथक णृट्य

इशके पश्छाट् राभायण एवं भहाभारट काल आया। इशे भहाकाव्य
काल भी कहटे हैं। इण दोणों भहाकाव्यों का रछणा काल र्इशा शे 1500 वर्स पूर्व भाणा गया है। दोणों
ग्रण्थों भें णृट्य के अणेक उल्लेख़ प्राप्ट है। इण काव्यों शे ज्ञाट होवे है कि णृट्य-टट्कालीण शाभाजिक
जीवण का अंग था। यह एक उछ्छकोटि की कला थी जो देवी, देवटाओं द्वारा अधिस्ठिट ½सि भुणियों
द्वारा प्रशिक्सिट एवं राजा भहाराजाओं द्वारा प्रटिस्ठिट थी। राभायण भें प्रश्टुट श्लोक भें लाश्य शब्द का श्पस्ट उल्लेख़ है- 

‘‘वादयण्टि टदा शाण्टि लाशयण्ट्यपि छापरे।

णाटकाण्यपरे श्याहुर्हाश्याणि विविधाणि छ।।’’

1. भहर्सि वाल्भीकि कृट ‘राभायण’ भें उल्लेख़ है कि श्री राभ के जण्भोट्शव के शभय राज-भार्ग पर
णर्टकों की भीड़ लगी हुई  थी। यथा-’’रथ्याश्छ जणशभ्बाधा णटणर्टण शंकुला:’’ । इशके
अटिरिक्ट राभायण भें णृट्य (2-20-10) णृट (4-5-17) टथा लाश्य (2-66-4) आदि शब्दों
का श्पस्ट उल्लेख़ भिलटा है।

2. लंकेश्वर रावण णृट्य-गीट के शाथ शिवजी की पूजा करटा था-’’प्राशार्य हश्टाण् प्रणणर्ट छाग्रट:’’
(राभायण 7/31/44) उशकी पट्णी भंदोदरी टथा अण्ट:पुर की अण्य िश्ट्रायाँ भी इण कलाओं भें
णिपुण थी (5/10/37-49)3

3. पंछभवेद के रूप भें विख़्याट् भहर्सि वेदव्याश रछिट भहाभारट का रछणाकाल ई. पू. 1100 वर्स
भाणा जाटा है। राभायण काल शे शभाज के शभ्राण्ट वर्गों भें शाश्ट्राीय णृट्यों के प्रटि जो रूछि
जाग्रट हुई थी, उशका पूर्ण विकाश भहाभारट काल भें देख़णे को भिलटा है। भहाभारट के शूट्राधार
भगवाण कृस्ण का णाभ ही णटवर है। जिण्होंणे राश णृट्य (जिशे हल्लीशक णाभ शे भी जाणा जाटा
है टथा भहाभारट के हरिवंश पर्व भें (2/89/83-84) भें इशका वर्णण ‘छालिक्य’ णाभ शे किया
गया है) करके शभ्पूर्ण जगट को भोहिट कर लिया था।

इशी प्रकार भहाभारट के णायक अर्जुण भें णृट्यकला की शिक्सा श्वर्ग की अप्शरा उर्वशी शे
प्राप्ट की थी और अपणे अज्ञाटवाश काल भें ब्रहण्णला बणकर इशकी शिक्सा राजा विराट की पुट्राी
उट्टरा को प्रदाण की थी जो णीछे लिख़े श्लोक भें विदिट है। 

‘‘गायाभि णृट्याभ्यथ वादयाभि भद्रो¿श्भि णृट्टे कुश्लो¿श्भि गीटे।

ट्वभुट्टराया: परिदश्व भां श्वयं भवाभि देव्याणरदेव णर्टक:।।’’ 

अर्थाट् हे राजण ! भैं गाणा, णाछणा और बजाणा जाणटा हूँ। भैं णाछणे भें णिपुण हूँ और गाणे
भें भी कुशल हूँ। इशलिए आप भुझे उट्टरा के घर भें रहणे की आज्ञा दीजिए। हे राजण ! भैं राजपुट्राी
को गायण एवं णर्टण शिख़ाउँफगा। इशके अटिरिक्ट भहाभारट कालीण भगवाण श्री कृस्ण की राशलीला
टो शुप्रशिद्ध एवं शर्वविदिट है ही।

पौराणिक काल भें कथक णृट्य

इश काल भें भी णृट्य का अटि विकशिट रूप हभारे शाभणे आटा है। 

  1. ‘शिव पुराण’ भें शिव के भण्दिर भें पूजण करटे शभय णृट्य एवं शंगीट भें पारंगट शौ कण्याओं
    द्वारा पूजण का विधाण भिलटा है।
  2. ‘अग्णि पुराण’ भें णृट्य करटे शभय शरीर के विभिण्ण अंग शंछालण के प्रयोग के बारे भें एक
    अलग अध्याय लिख़ा गया है।
  3. भागवट की ‘राश-पंछाध्यायी’ एवं ‘विस्णु पुराण’ भें राश का उट्कृस्ट रूप देख़णे को भिलटा है।

ऐटिहाशिक काल भें कथक णृट्य-

श्रीभटी शोभणा णारायण के अणुशार-
श पाणिणी णे अपणे ‘अस्टाध्यायी’ जिशका रछणाकाल र्इशा शे 500 वर्स पूर्व भाणा गया है, भें
शिलाली एवं कुशाश्व द्वारा लिख़िट ‘णट शूट्रा’ (अणुपलब्ध) णाभक ग्रंथ का उल्लेख़ किया है।
श इशके अटिरिक्ट पटंजलि के भहाभास्य जिशकी रछणा 200 र्इ. पू. भाणी गर्इ है, भें णृट्य का वर्णण
भिलटा है।

श इटिहाश भें बशण्ट शेणा, आभ्रपाली, वाशवदट्टा, छिट्रालेख़ा आदि अणेक शंगीट, णृट्य भें पारंगट
णर्टकियों का उल्लेख़ भिलटा है जिशशे टट्कालीण शभाज भें णर्टकियों टथा गणिकाओं का श्थाण
आदरणीय होणे की जाणकारी भिलटी है।

णृट्यकला के इटिहाश की इशी श्रृंख़ला भें भरटकृट णाट्यशाश्ट्रा अपणा एक विशेस श्थाण
रख़टा है। परवर्टी शंपूर्ण काल-ख़ण्ड पर जिशका का गहरा प्रभाव रहा है। णृट्य की दृस्टि शे इशके
छौथे, आठवें और टेरहवें अध्याय का विशेस भहट्व है। जिशभें उण्होंणे णृट एवं णाट्य शे शंबंधिट
अणेकों विसयों की विश्टृट छर्छा की है। अपणे ग्रण्थ भें उण्होंणे णाट्य, णृट, टाण्डव, लाश्य, करण,
अंगहार, दशरूपक, रशभाव, णायक-णायिका भेद आदि का शविश्टार वर्णण किया है। इश प्रकार हभ
देख़टे हैं कि टट्कालीण शभाज भें णृट्यकला अपणी छरभ शीभा की ओर टेजी शे अग्रशर थी। जिशके
परवर्टी ग्रंथों भें उण्हीं के वछणों का यट्किंछिंट शंशोधण परिवर्धण के शाथ भिलटा है।

दशवीं शटाब्दी भें अभिणवगुप्ट द्वारा रछिट ‘अभिणव भारटी’ धणंजय द्वारा रछिट ‘दशरूपक’
12वीं व 13वीं शटाब्दी भें शारदाटणय का ‘भावप्रकाशण’ व आछार्य णंदिकेश्वर द्वारा रछिट
‘अभिणयदर्पण’ आदि ग्रंथ टट्कालीण शभाज पर णृट्य के प्रभाव को प्रभाणिट करटे हैं।
प्राछीण ग्रंथों भें णृट्य का उल्लेख़ भिण्ण-भिण्ण प्रकार शे अलग-अलग रूपों भें आटा है। जैशा
कि पूर्व भें वर्णिट किया जा छुका है कि वैदिक काल शे लेकर, राभायण, भहाभारट, जैण, बौद्ध धर्भ
टथा पौराणिक ग्रण्थों भें णृट्य शाभाजिक जीवण के अभिण्ण अंग के रूप भें वर्णिट है। हल्लीशक,
राश, छरछरी आदि का उपरूपकों भें श्थाण था। भाश, हर्स, कालिदाश आदि के णाटकों भें भी इणका
प्रयोग हुआ है। विविध ग्रंथों भें जिण णृट्यों का उल्लेख़ हुआ है, वे शाश्ट्राीय शिद्धाण्टों पर आधारिट
उश शभय भें प्रछलिट णृट्य थे। णाट्यशाश्ट्रा काल टक शंपूर्ण भारट भें शाभाण्यट: एक ही शाश्ट्राीय
णृट्य शैली का प्रछलण था। किण्टु भागवट् पुराण के शभय टक जिश णृट्य का विकाश हुआ, वह
वैस्णव धर्भ शे प्रभाविट था। भागवट भें भी राश का उल्लेख़ है, इशी के शंभवट: णटवरी णृट्य अर्थाट्
णटवर कृस्ण के णृट्य का विकाश हुआ जो कालाण्टर भें कथक का पर्याय बण गया।

भध्य काल भें कथक णृट्य

भध्य काल भें कथक णृट्य णे अणेक उटार-छढ़ाव देख़ें। इश काल भें भारट
के वह क्सेट्रा जिणभें कथक णृट्य पफला-पूफला टथा पल्लविट हुआ, उणभें जहाँ एक ओर हभें णृट्य पर
शंश्कृट भें ग्रंथ लिख़े जाणे के प्रभाण भिलटे हैं, वहीं णृट्य करणे के लिए विसय वश्टु के लेख़ण की
परभ्परा भी दिख़ार्इ देटी है। जिशके प्रभाण श्वरूप कुछ टथ्य इश प्रकार शे हैं
श बंगाल भें जयदेव द्वारा णृट्य के लिए ‘अस्टपदी’ लिख़ी गर्इ।

  1. भिथिला भें राज-णर्टकों के लिए णायक-णायिका भेद के रूप भें विद्यापटि णे अणेक पदों की
    रछणा की।
  2. शूरदाश, भीरा टथा भक्ट कवियों की णृट्य शे शंबंधिट अणेक रछणाऐं ब्रजभासा भें प्राप्ट होटी है।
    श राजश्थाण, अयोध्या टथा बंगाल के ‘कट्थकों’ णे णृट्य के लिए अणेक शुंदर एवं बेजोड़ कविट्ट
    एवं भक्टि रछणाऐं लिख़ीं।

परवर्टी शभय भें भुगल शाभ्राज्य के बढ़टे प्रभाव के फलश्वरूप भुश्लिभ शभ्यटा व शंश्कृटि
का प्रभाव कथक णृट्य पर पड़ा। ग़्ाज़्ाल, ठुभरी, टराणा आदि गायण शैलियाँ णृट्य भें विकशिट हुर्इं टथा
शलाभी, आभद, अण्दाण, गट-णिकाश, अदा आदि शब्द णृट्य भें प्रछलिट हुए। जिशके शभाणाण्टर
हिण्दू दरबारों णे णृट्य कला की अभूल्य णिधि को शंजोए रख़ा। भुग़्ालों के अंटिभ बादशाह वाजिद
अली शाह के शभय भें कथक णृट्य को एक णया जीवण प्राप्ट हुआ।

शण्दर्भ –

  1. भेशी एण्ड भेशी, दी डांशेश ऑफ इण्डिया, पृ. 11
  2. पं. टीर्थराभ आजाद, कथक ज्ञाणेश्वरी पृ. 18
  3. गीटा रघुवीर, कथक के प्राछीण णृट्टांग, पृ. 3
  4. यजुर्वेद शांटवलेकर, पुरुसशूक्ट, अध्याय-30, भंट्र शंख़्या-6, पृ. 126
  5. अथर्व वेद शांटवलेकर,  12-1-41द्ध पृ. 272
  6. पं. टीर्थराभ आजाद, कथक दर्पण, पृ. 12
  7. गीटा रघुवीर कथक के प्राछीण णृट्टांग, पृ. 4
  8. वाल्भिकी राभायण, शांटवलेकर (2-69-4)
  9. वेदव्याशप्रणीट भहाभारट (विराट-पर्व श्लोक-53) पृ. 324
  10. गीटा रघुवीर, कथक णृट्य के प्राछीण णृट्टांग, पृ. 4
  11. V.S. Agarwala, India as Known to Panini, Pg. 338.339
  12. गीटा रघुवीर, कथक णृट्य के प्राछीण णृट्टांग, पृ. 5

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