कार्ल मार्क्स के सिद्धांत

By | February 15, 2021


मार्क्सवाद प्रकृति तथा समाज के विकास के आम नियमों, समाजवादी क्रांति की विजय, समाजवाद तथा कम्यूनिज्म के निर्माण के रास्तों से सम्बंधित वैज्ञानिक विचारों की एक सुसंबद्ध प्रणाली है। कार्ल मार्क्स के सभी विचार आपस में एक दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े है। कार्ल मार्क्स के विचारधारा के चार आधार स्तम्भ है।

  1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)
  2. इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या
  3. वर्ग-संघर्श का सिद्धांत (Theory of Class-Struggle)
  4. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त (Theory of Surplus Value)

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

कार्ल मार्क्स की विचारधारा द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित है। कार्ल मार्क्स का विचार था कि वास्तविकता द्वन्द्वात्मक तरीके से ही स्वयं को अभिव्यक्त करती है। स्वयं प्रकृति भी द्वन्द्वात्मक तरीके से गतिशील हो रही है। प्रत्येक विज्ञान के विकास में द्वन्द्वात्मक घटनाओं का योगदान दिखाई देता है। लेनिन ने इस सत्य को प्रमाणित करते हुये लिखा है कि गणितशास्त्र दो परस्पर विरोधी तथ्यों ‘धन व ऋण’ पर आधारित है। भौतिकी धनात्मक तथा ऋणात्मक धाराओं पर रसायन शास्त्र परमाणुओं के संयोग तथा वियोग पर आधारित है।
द्वन्द्वात्मक का प्रयोग सर्वप्रथम जर्मन दार्शनिक हीगल ने किया था। हीगेल का तर्क था कि प्रत्येक घटना या अपने से विरोधी घटना या शक्ति को जन्म देती है। इन परस्पर विरोधी शक्तियों के मध्य संघर्ष होता है। इस संघर्ष के द्वारा एक नये तथ्य का विकास होता है। यह नई शक्ति या तथ्य अपने पिछले विरोध को समाप्त कर देती है। उन दोनों ही शक्तियों के गुणों को अपने में सम्मिलित कर लेती है। इसके पश्चात यह नई रचना भी अपना विरोध पैदा कर देती है। यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। 

हीगेल ने द्वन्द्वात्मकता के अन्तर्गत होने वाले बौद्धिक क्रम को अस्तित्व में होना Being ‘अस्तित्व में न होना’ (Non Being) और ‘अस्तित्व में आना’ (Becoming) के रूप में, वाद (Thesis) प्रतिवाद (Antithesis) और संश्लेषण (Synthesis) कहा है। इसी प्रक्रिया से विष्व में प्रगति का क्रम घटित होता है। कार्ल मार्क्स ने अपने ‘पूंजी’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि ‘हीगल के हाथों में द्वन्द्ववाद पर रहस्य का आवरण पड़ जाता है लेकिन इसके बावजूद यह सही है कि हीगल ने ही सबसे पहले विस्तृत और सचेत ढ़ंग से यह बतलाया था कि अपने सामान्य रूप में द्वन्द्ववाद किस प्रकार कार्य करता है।

हीगल ने समूचे द्वन्द्वात्मक विकास का कारण परमात्मा को माना है। यही उनके द्वन्द्ववादी चिन्तन का भाववादी आधार है। हीगल का भाववाद भौतिकवाद का विरोधी है। हीगल यह मानकर चलता है कि सृष्टि का कारण एवं नियामक एक अति प्राकृतिक, अमूर्त एवं अध्यात्मिक तत्त्व है। इस अध्यात्मिक तत्व का आशय ईश्वर से है। हीगल मानता है कि विश्व इसी परमतत्व का परिणाम है। संसार के सभी पदार्थ इसी परमतत्व के अभिव्यक्ति है। परमतत्त्व ही एक शाश्वत सत्ता है। “ोश सभी परिवर्तनशील और अस्थाई है। कार्ल मार्क्स हीगल के भाववाद की आलोचना करता है। भाववाद को काल्पनिक तथा अवैज्ञानिक माना है। कार्ल मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को सृष्टि एवं समाज के विकास नियमों का अध्यन करने वाली एक सर्वोत्कृष्ट पद्धति कहा है। हीगल के दर्शन के भाववादी आवरण को उतारकर मार्क्स ने द्वन्द्ववाद की अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का आधार बनाया।

कार्ल मार्क्स ने यह स्पष्ट कहा है कि परमतत्व की हम कल्पना मात्र कर सकते हैं, उसे न तो हम देख सकते हैं, और न छू सकते है, अत: भाववाद भ्रम पैदा करने वाला तथा गुमराह करने वाला दर्शन है। इसके विपरीत बाहृय जगत सत्य है तथा इसका आधार कोई ठोस वास्तविक वस्तु है न कि परमात्मा जैसी अवास्तविक वस्तु है।

कार्ल मार्क्स कहता है, ‘‘द्वन्द्ववादी पद्धति हीगलवादी पद्धति से न केवल भिन्न है, बल्कि ठीक उल्टी है। हीगल के लिये मानव मस्तिष्क की जीवन-प्रक्रिया, जिसे विचार के नाम से उसने स्वतंत्रकर्त्ता बना डाला है, वास्तविक संसार की सृजनकर्त्ता है और वास्तविक संसार ‘विचार’ का बाहरी, इन्द्रिय-ग्राह्य रूप मात्र है। इसके विपरीत मेरे लिये विचार इसके सिवाय कुछ नहीं कि भौतिक संसार मानव-मस्तिष्क में प्रतिबिम्बित होता है और चिन्तन के रूप में बदल जाता है।

कार्ल मार्क्स को भौतिकवाद की ओर प्रेरित करने वाले विचारक लुडविग फ्यूअरबेक है। फ्यूअरबेक ने ‘‘अपनी दार्शनिक स्थापनाओं द्वारा हीगलीय चिंतन का खण्डन भी किया। हीगल के परम प्रत्यय को उन्होंने पूर्णत: अस्वीकार किया तथा इस तथ्य की स्थापना की कि हम जिस वस्तु जगत में रहते हैं, वह सत्य है। उसका कोई कर्त्ता अति प्राकृतिक परम-पुरूश या परम प्रत्यय नहीं है। इसके बावजूद फ्यूअरबेक का सामाजिक दृष्टिकोण, धर्म और नीतिशास्त्र सम्बन्धी दर्शन कमोवेष भाववाद से जुड़ा रहा। इसके सन्दर्भ में एंगेल्स कहता है, ‘भौतिकतावाद की इतनी सुस्पश्ट वैज्ञानिक व्याख्या के बावजूद फ्यूअरबेक भौतिकवाद नाम से सम्बद्ध अपने कुछ पूर्वाग्रहों को नहीं छोड़ पायें।’

भौतिकवाद के अनुसार यह समस्त ब्रह्माण्ड व जगत भौतिक पदार्थ का ही भिन्न-भिन्न रूप है। भौतिक पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ सत्य नहीं है। भौतिक पदार्थ स्थिर जड़ पदार्थ नहीं है। वह एक गतिशील वास्तविकता है जो एक क्षण पहले था वह अब नहीं है। संसार व प्रकृति प्रतिफल ‘होने’ की प्रक्रिया में होता है, जैसी कोई अवस्था नहीं है। जिसे हम चेतना कहते हैं। वह भी भौतिक तत्वों का एक संयोग मात्र ही है।

कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अनुसार, छोटे से छोटे परिमाणात्मक परिवर्तन से बड़े-बड़े गुणात्मक परिवर्तन भी सम्भव हो सकते हैं। यहाँ पर ध्यान देने की बात है कि वे परिवर्तन या विकास धीरे-धीरे या सरल तरीके से नहीं होते बल्कि शीघ्रता से और एकाएक होते है। मानों, एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पहुँचने के लिये छलांग मारता हो।
मार्क्स द्वन्द्वात्मक के सम्बन्ध में कहते है कि समस्त वस्तुओं और प्रकृति की घटनाओं में आन्तरिक विरोध स्वाभाविक होते है। पक्ष व प्रतिपक्ष की बीच संघर्श की स्थिति हमेषा विद्यमान रहती है। द्वन्द्ववाद के अनुसार विकास आन्तरिक विरोध और संघर्ष के द्वारा ही संचालित होता है।

मार्क्स मानव इतिहास के विकास की व्याख्या भौतिक वस्तुओं की परिवर्तनशील स्वाभाविक प्रकृित्त तथा इनमें पारस्परिक आन्तरिक विरोध के आधार पर करता है। कार्ल मार्क्स का मत है कि भौतिक जगत का विकास क्रमबद्ध न होकर अबाध गति से निरन्तर होता रहता है। इस विकास में वाद, प्रतिवाद तथा सम्वाद का क्रम निरंतर चलता रहता है। इनमें से प्रत्येक अपने पहले का विरोधी होता है तथा संवाद, स्वयं कुछ समय के बाद वाद बन जाता है तथा सम्पूर्ण प्रक्रिया पुन: शुरू हो जाता है। कार्ल मार्क्स अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को निजी सम्पित्त के माध्यम से समझाते है। निजी सम्पित्त पर अधिकार रखने वाले पूंजीपति वर्ग की उत्पत्ति होती है। साथ ही सर्वहारा वर्ग की भी उत्पत्ति होती है। जिसका सम्पित्त पर अधिकार नहीं होता है। सर्वहारा वर्ग के सदस्य केवल श्रम के स्वामी होते हैं जो पूँजीपतियों के कारखानों में कार्य करते हैं। पूंजीपति वर्ग तथा सर्वहारा वर्ग में संघर्श चलता रहता है क्योंकि इनके हित काफी सीमा तक परस्पर विरोधी होते हैं। अन्त में क्रांति द्वारा सामूहिक स्वामित्व की स्थापना होती है। इस प्रक्रिया में वाद पूंजीपति वर्ग है, प्रतिवाद सर्वहारा वर्ग है तथा संवाद सामूहिक स्वामित्व है।

कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषता :-

कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर प्रकाश डालने के उपरान्त इनकी विशेषता हैं-

  1. यह प्रकृति को अचानक एकत्रित की हुई वस्तुओं का संग्रह नहीं मानता है। प्रत्येक पदार्थ एक दूसरे से सम्बद्ध तथा निर्भर है।
  2. मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद मानता है कि प्रकृति एक गतिशील, परिवर्तनशील तथा अस्थिर है। इसमें कुछ वस्तुओं का उद्भव और विकास होता है तो कुछ वस्तुओं का अवनति तथा विनाश।
  3. प्रकृति में परिवर्तन गुणात्मक तथा मात्रात्मक दोनों प्रकार के होते हैं। ये परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं बल्कि शीघ्रता से होते हैं।
  4. प्रत्येक वस्तु में आंतरिक विरोध पाया जाता है।

कार्ल मार्क्स का सम्पूर्ण दर्शन द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर आधारित है। मार्क्स इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं की है। वेबर के अनुसार द्वन्द्वात्मक की धारणा अत्यनत गूढ़ एवं अस्पष्ट है। इसको मार्क्स ने कहीं भी स्पष्ट नहीं किया है। यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया कि पदार्थ किस प्रकार गतिशील होता है। कार्ल मार्क्स कहता है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद सत्य की खोज करने का एक मात्र पद्धति है परन्तु यह उपयुक्त नहीं प्रतीत होता है। कार्ल  मार्क्स के अनुसार प्रत्येक क्रांति का स्पष्टीकरण जीवन की भौतिक दशाओं में निहित है परन्तु बुद्ध, पैगम्बर साहब व ईसा मसीह जैसे अनेक विद्वान ने मानवीय इतिहास को नया मोड़ दिया। इनका विरोध गरीब तथा अमीर दोनों ने किया था। इनके क्रांतिकारी विचार को केवल द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सहारे स्पष्ट नहीं किया जा सकता।

कार्ल मार्क्स की मान्यता है कि पदार्थ चेतनायुक्त नहीं होता। एक आंतरिक आवश्यकता के कारण इसका विकास स्वयं होता है। और अपने विरोधी को जन्म देता है। परन्तु मार्क्स की यही मान्यता उचित नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता है कि पदार्थ अपनी चेतना के कारण अपने विरोधी तत्व को जन्म देते हैं। पदार्थ में परिवर्तन बाहृय शक्तियों के द्वारा होता है। एक विषेश परिस्थिति के अभाव में न तो गेहूँ का बीज पौधे के रूप में परिवर्तित हो सकता है और न पौधे अन्य बीजों में। इसके अतिरिक्त एक पत्थर हमेशा पत्थर ही रहता है। अन्तर्निहित गतिशीलता के कारण परिवर्तन क्यों नहीं होता है।

उपर्युक्त मार्क्सवादी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वह विश्व को सतत् गतिमान एवं परिवर्तनशील मानता है’ ‘‘जितना सत्य विश्व की यह सतत् गतिशील एवं परितर्वनशीलता है, उतना ही सत्य तथ्य यह भी है कि विश्व सतत् विकासशील भी है, गति परिवर्तन और विकास सृष्टि के अन्तनिर्हित नियम है, जिन्हें कोई रोक नहीं सकता है।

स्पष्ट है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एक विकासशील एवं प्रगतिशील विज्ञान है। जो निरन्तर विकास की नई परिथितियों पर प्रयुक्त होकर विकसित होता है। इस सन्दर्भ में बन्र्स कहते हैं कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद वह दृष्टिकोण है जिसके अनुसार वास्तविक जगत अलग-अलग स्वतंत्र टुकड़ों को जोड़ नहीं है, बल्कि उसकी हर वस्तु एक दूसरे पर निर्भर है, यह वास्तविक जगत स्थिर नहीं, बल्कि सदा गतिमान रहता है और उसके कुछ तत्व बढ़ते रहते हैं और कुछ मिटते जाते हैं। इस वास्तविक जगत का यह विकास एक बिन्दु तक धीरे-धीरे होता है, फिर एकाएक क्रम टूट जाता है और नया कोई तत्व पैदा हो जाता है, यह विकास अन्दरूनी संघर्ष के कारण ही होता है और क्रम भंग होने पर विकासोन्मुख तत्व पतनोन्मुख तत्व पर विजय प्राप्त कर लेता है।

कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के अनुसार विश्व का समूचा क्रम कुछ निश्चित नियमों में बधा हुआ है। जिससे विकास होता है यह विकास पक्ष, प्रतिपक्ष तथा संवाद इन तीनों अवस्थाओं द्वारा निर्धारित होता है। परन्तु विकास की यह प्रक्रिया क्रमिक रूप से न होकर आकस्मिक रूप से होती है।

कार्ल मार्क्स का उद्देश्य द्वन्द्वात्मक प्रणाली से कुछ सामाजिक उद्देषयों की पूर्ति करना था। कार्ल मार्क्स इस पद्धति के द्वारा यह सिद्ध करना चाहते थे कि पूँजीवादी व्यवस्था चिरसम्मत् नहीं है। द्वन्द्वात्मक पद्धति के अनुसार यदि सब कुछ गतिशील है, पुराने का विनाश और नवीन का उद्भव ही विकास है तो पूँजीवाद का विनाश अनिवार्य है।

जैसे सामन्ती व्यवस्था के विनाश से पूँजीवादी व्यवस्था का उद्भव हुआ उसी प्रकार पूँजीवादी व्यवस्था के विनाश से साम्यवाद का उद्भव होगा। वर्तमान में मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही एकमात्र प्रगतिवादी दर्शन है, जिससे मानव के शोषण रूपी दीवार पूँजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर सर्वहारा वर्ग के लिये एक नई व्यवस्था का निर्माण करेगा।

इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या –

मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की सहायता से अपने समाजवाद को एक वैज्ञानिक निष्चयात्मकता प्रदान की और उसका प्रयोग ऐतिहासिक तथा सामाजिक विकास की व्याख्या करने में किया। इतिहास की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी व्याख्या को उसने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या का नाम दिया। कार्ल मार्क्स के अनुसार भौतिक वस्तुये जो इतिहास के विकास में निर्णायक तत्व है वे वास्तव में उत्पादन शक्तियाँ है। कार्ल मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का मुख्य तत्व है आर्थिक नियतिवाद अर्थात मनुश्य जो कुछ करता है उसका निर्माण आर्थिक या भौतिक कार्यों द्वारा होता है।

मनुष्य पूर्ण रूप से आर्थिक शक्तियों का दास है। उत्पादन की तीन शक्ति में
तीन वस्तुएँ आती है- (1) प्राकृतिक साधन (2) मशीन यंत्र एवं उत्पादन कला (3) युग विषेश में मनुश्यों की मानसिक एवं नैतिक गुण।

प्रत्येक देष की राजनीतिक संस्थायें उसकी सामाजिक व्यवस्था, व्यापार, उद्योग आदि मानव जीवन के भौतिक अवस्था के द्वारा प्रभावित होती है। जीवन के भौतिक अवस्था से तात्पर्य उत्पादन, वितरण, और विनिमय से है। इस सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक एवं राजनीतिक क्रांतियाँ उत्पादन तथा वितरण के तरीकों में परिवर्तन के कारण होती है। वस्तुत: आर्थिक उत्पादन के प्रत्येक चरण की प्रक्रिया में एक विषेश राजनीतिक स्वरूप तथा वर्ग पाया जाता है। 

कार्ल मार्क्स के इतिहास के भौतिकवाद का विश्लेषण निम्न प्रकार है-

  1. मार्क्स कहता है कि उत्पादन और उत्पादन- शक्ति के विकास का एक निश्चित नियम है। इसकी प्राप्ति द्वन्द्ववाद से होती है। उत्पादन की अवस्था में परिवर्तन चलता रहता है। जब तक उत्पादन की श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त न हो जाये। इस आधार पर मार्क्स कहता है कि विकास की यह प्रक्रिया निश्चित रूप से समाजवाद की ओर उन्मुख है।
  2. जीवन और जीवित रहने के लिये आवश्यक भौतिक वस्तुओं या मूल्यों के उत्पादन और पुन: उत्पादन पर ऐतिहासिक विकास निर्भर करता है। अत: समस्त मानव क्रिया-कलापों की आधारशिला उत्पादन प्रणाली है।
  3. उत्पादन शक्ति- उत्पादन शक्ति के अन्तर्गत उत्पादन के साधन तथा श्रमिक एक साथ आते हैं। मार्क्स कहता है कि सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन शाश्वत सत्य, परमात्मा, न्याय आदि के कारण नहीं होता है। उत्पादन की शक्तियाँ ही अन्तत: समस्तवस्तु का निर्धारण करती है। समाज का तभी विकास होता है जब उत्पादन की शक्ति बढ़ती है। फ्रेडरिक एंगेल्स के शब्दों में, ‘‘इतिहास के प्रत्येक काल में आर्थिक उत्पादन व वितरण की पद्धति तथा तद् जनित सामाजिक संगठन वह आधार स्थापित करते हैं जिस पर उसका निर्माण होता है और केवल इसके द्वारा ही उस युग के राजनीतिक और बौद्धिक जीवन की व्याख्या की जा सकती है।
  4. उत्पादन सम्बन्ध :- वस्तुओं के उत्पादन के समय प्राय: व्यक्ति एक दूसरे के साथ निश्चित संबंधों में बंधे रहते हैं। इन्हें उत्पादन सम्बन्ध कहा गया। इन उत्पादन सम्बन्ध में परिवर्तन होने पर सामाजिक सम्बन्धों में भी परिवर्तन होता है। इस प्रकार हीगेल प्रकृति में समस्त परिवर्तन का कारण आत्मा को मानता है तो मार्क्स सामाजिक संगठन का एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन का कारण उत्पादन के साधन को मानता है। उत्पादन के साधनों के स्वामी के आधार पर ही सामाजिक उत्पादन प्रणाली का निश्चय होता है। प्रत्येक समाज में समय के साथ-साथ उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन होता आया है। 

उत्पादनात्मक सम्बन्धें या आर्थिक दषाओं के आधार पर मार्क्स के इतिहास को पाँच युगों में बाँटा है-

  1. आदिम युग – इस युग को मार्क्स आदिम साम्यवादी की संज्ञा देता है। इस युग में मनुष्य न तो खेती करता था न ही उत्पादन। इस युग में व्यक्तिगत अधिकार की कोई अवधारणा नहीं थी।
  2.  दास युग- मानव कृशि और पशुपालन करना प्रारम्भ किया। जिससे व्यक्तिगत सम्पित्त् की धारणा बनी। सम्पित्त के अधिकारी ने सम्पित्त विहिन व्यक्ति को दास बना लिया। समाज में दो वर्ग का उदय हुआ। मालिक व दास। दास वर्ग के श्रम द्वारा जो उत्पादन होता था उसका उपयोग सम्पित्त्षाली वर्ग करने लगा।
  3. सामंतवादी युग- इस युग में उत्पादन के साधनों पर सामंतों का अधिकार हुआ। इस युग में उत्पादन का साधन भूमि था। भूमिहीन किसान इस सामंतों के अधीन कार्य करते थे। समाज में दो वर्ग सामंतवादी किसान थे।
  4. पूँजीवादी युग – इस औद्यौगिक युग में बड़े-बड़े उद्योग धंधों का विकास हुआ। जिससे छोटे उद्योग नष्ट हो गये। ये उद्योग धंधे धीरे-धीरे उन व्यक्तियों के नियंत्रण में आ गये जिनके पास पूँजी थी। पूँजीपतियों ने पूँजी के आधार पर श्रमिकों के श्रम को खरीदना प्रारंभ किया। इस प्रकार समाज में दो वर्ग पूँजीपति तथा सर्वहारा वर्ग उत्पन्न हुआ। 
  5. समाजवादी युग- इन पूँजीपति व सर्वहारा वर्ग के संघर्ष में सर्वहारा वर्ग की विजय होगी। इस संघर्ष में पूँजीपति वर्ग ‘वाद’ है तथा सर्वहारा वर्ग ‘प्रतिवाद’ है। 
इनके संवाद से एक ‘वर्ग-विहिन’ समाज अस्तित्व में आयेगा। इस स्थिति के आने से पूर्व एक संक्रमणकालीन युग का आविर्भाव होगा। जिसमें सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व होगा। उत्पादन के समस्त साधनों का समाजीकरण कर दिया जायेगा। सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व और निरंकुश शासन तब तक रहेगा जब तक छिपे पूँजीपति तत्वों का पूर्ण विनाश नहीं हो जायेगा। इनके विनाश के साथ ही सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व समाप्त हो जायेगा तथा एक ‘वर्गहीन समाज’ की स्थापना होगी। वर्ग संघर्ष के मिटने के बाद राज्य की कोई आवश्यकता नहीं रह जायेगी। इस वर्ग विहिन तथा राज्य विहिन समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यतानुसार कार्य करेगा तथा आवश्यकतानुसार प्राप्त करेगा।

कार्ल मार्क्स अपने ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या में आर्थिक तथ्य को ही प्रमुखता से स्थान दिया है। समाज में परिवर्तन न्याय, धर्म, कानून आदि से भी होते हैं। वर्तमान समय में मानव पर केवल आर्थिक कारकों का ही प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि मानव पर वातावरणीय, सामाजिक व्यवस्था, अच्छे बुरे विचारों का भी प्रभाव पड़ता है। संसार में अनेक ऐसी घटनायें घटित होती हैं जिनका हम आर्थिक व्याख्या नहीं कर सकते हैं। यदि भारत का विभाजन भी देखा जाये तो यह आर्थिक न होकर धार्मिक कारण था। अत: समाज के व्यवस्था में परिवर्तन का एक मात्र कारण आर्थिक को नहीं माना जा सकता है।

उत्पादन शक्तियों से उत्पादन सम्बन्ध निर्धारित होते हैं। यह समीचीन प्रतीत होता है। वर्तमान समय में रूस और अमेरिका में एक समान यंत्र और तकनीकी आधार होने पर भी उत्पादन के सम्बन्धों में काफी अंतर है। अमेरिका में जहां बड़े-बड़े उद्योग पूँजीपतियों के नियंत्रण में है वहीं रूस में इन पर राज्य का नियंत्रण है। कार्ल 
मार्क्स मानता है कि इतिहास की धारा राज्यविहिन समाज पर आकर रूक जायेगी। परन्तु प्रश्न यह उठता है कि समाज की अन्तिम साम्यवादी अवस्था में क्या पदार्थ के आन्तरिक गुण ‘गतिशीलता- विद्यमान नहीं रहेगी? यदि पदार्थ की गतिशीलता स्वाभाविक गुण है तो वाद, प्रतिवाद व संवाद की प्रक्रिया द्वारा इससे भी परिवर्तन जारी रहेगा।

वर्ग संघर्ष

कार्ल मार्क्स का वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद के फलस्वरूप ही उत्पन्न होती है। मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इतिहास की भौतिक व्याख्या अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त तथा अन्य आर्थिक सिद्धांतों को प्रामाणिक बनाने के लिये वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की खोज की। मार्क्स मानते हैं कि सर्वहारा वर्ग की मुक्ति का एकमात्र उपाय वर्ग-संघर्ष है।
लेनिन ने वर्ग, वर्ग संघर्ष और राज्यों के सम्बन्ध में मार्क्सवादी सिद्धांत को विश्लेषित करते हये लिखा है- वर्ग लोगों के ऐसे बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं, जो सामाजिक उत्पादन का इतिहास द्वारा निर्धारित किसी पद्धति में अपने-अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंध की दृष्टि से, श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका की दृष्टि से, और फलस्वरूप सामाजिक संपदा के जितने हिस्से के वे मौलिक होते हैं। उसके परिणाम तथा उसे प्राप्त करने के तौर-तरीके की दृष्टि से एक दूसरे से भिन्न होते हैं।’’ लेनिन ने किसी वर्ग के चार प्रमुख लक्षण बताये हैं-

  1. सामाजिक उत्पादन की इतिहास द्वारा निर्धारित पद्धति में उसका स्थान
  2. उत्पादन के साधनों के साथ उसका सम्बन्ध
  3. श्रम के सामाजिक संगठन में उसकी भूमिका
  4. सामाजिक संपदा प्राप्त करने के तौर तरीके और उसका परिणाम

उत्पादन के साधन के संबंध के आधार पर लोगों का समूह भिन्न-भिन्न होता है। वर्ग भी अलग-अलग होता है। वर्ग शाश्वत नहीं होते । जब सम्पित्त नहीं था तो वर्ग भी नहीं था।
मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार जिस समूह के व्यक्तियों के आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, उन्हें वर्ग कहते हैं। स्पष्ट है कि जिन व्यक्तियों का जीविकोपार्जन करने का तरीका एक तरह का होता है, वह एक प्रकार का वर्ग होता है। प्रश्न उठता है कि वर्गों की उत्पत्ति क्यों होती है? ‘वर्गों की उत्पत्ति की सम्भावना की जड़े श्रम उत्पादकता की ऐसी वृद्धि में मौजूद होती है जिससे फसल पैदावार मिलती है और आदमियों का शोषण आर्थिक दृश्टि से लाभप्रद होता है।’’ वर्गों के उत्पत्ति की आवश्यकता का फल उनके उत्पादन के विकास में उपस्थित होता है। उत्पादन शक्तियों, श्रम उत्पादकता और पूरे समाज का विकास श्रम विभाजन और विषिश्टिकरण के बिना सम्भव नहीं होता है।

फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा है, ‘‘जब तक सचमुच काम करने वाली आबादी अपने आवश्यक श्रम में इतना अधिक व्यस्त थी कि उसे समाज के सामान्य कार्यों की ओर श्रम के निर्देशन, राजकाल, न्याय-संबंधी मामलों, कला-विज्ञान आदि की ओर ध्यान देने के लिये कोई समय ही नहीं मिलता था, तब तक यह आवश्यक था कि इन तमाम कार्यों का प्रबंध करने के लिये एक ऐसा विषेश वर्ग हमेषा मौजूद रहे, जिसे वास्तविक श्रम से मुक्ति मिली हुई हो, और यह वर्ग स्वयं अपने स्वार्थ की खातिर मेहनत करने वाली जनता पर श्रम का अधिकाधिक बड़ा बोझ लादने में कभी नहीं चूकता था।’’ परिणाम स्वरूप वर्गों की उत्पत्ति श्रम-विभाजन से होती है।

आदिम युग में कोई वर्ग नहीं था। क्योंकि इस युग में उत्पादन का कोई साधन नहीं था। मनुष्य कंद, मूल, फल षिकार आदि के द्वारा अपना जीवन निर्वाह करता था। कालान्तर में मनुष्य ने उत्पात के नवीन साधनों की खोज की। जिससे समाज वर्गों में विभाजित होता गया।

‘‘समाज का विभाजन सबसे पहले जिन दो वर्गों में हुआ, वे दास तथा दास-स्वामी थे। परन्तु पास-प्रथा से सामंती समाज में संक्रमण का मतलब यह नहीं था कि पहले के वर्गों का सीधा-सीधा परिवर्तन नई संरचना के वर्गों में हो गया अर्थात् दास भूदास बन गये, दास स्वामी सामंती जमींदार भूदास बन गये, दास स्वामी सामंती जमींदार बन गये। सामाजिक संरचनाओं के एक के बाद दूसरी के आने का सिलसिला अत्यंत अनूठी और पेचींदा प्रक्रिया है। जिसके दौरान में नई संरचना के वर्गों की स्थापना होती है।’’ मार्क्स के अनुसार उत्पादन के नवीन साधनों के उत्पन्न होने पर सामाजिक संरचना बदल जाती है। इसलिये दास युग में दास और उनके स्वामी थे, सामंती युग में सामन्त तथा दास किसान थे। वर्तमान युग में पूंजीपति और श्रमिक अलग-अलग वर्गों में बँटे हुये है। मार्क्स ने वर्ग का विभाजन आर्थिक आधार पर किया।

समाज कई वर्गों में बंटा होता है। इन वर्गों का भी अपना विषेश हित होता है। जैसे विष्व के सभी पूंजीपति एक वर्ग मे आते है क्योंकि इनके हित व स्वार्थ एक जैसे होते है। इसी प्रकार विश्व के सभी मजदूर एक वर्ग के अन्तर्गत आते है क्योंकि इनके हित व स्वार्थ एक जैसे होते है। अत: समाज हित व समान स्वार्थ के कारण विभिन्न देष के व्यक्ति भी अपने को एक वर्ग के अन्र्तगत मानते है। वर्तमान का युग पूँजीवादी युग है जिमसें दो वर्ग- पूँजीपति तथा सर्वहारा वर्ग आते है। उत्पादन के साधनों पर पूँजीपति वर्ग का अधिकार होता है अत: श्रमिक अपने श्रम को इन पूँजीपतियों को बेचने के लिये विवश होते है।

‘‘उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व ही वह आर्थिक आधार है जिस पर समाज वर्गों में बंट जाता है।, वह आधार जिस पर उत्पादन साधनों के स्वामी मेहनतकश वर्गों का शोषण करते है, वह आधार जिस पर वर्गों के बीच सामाजिक विरोध उत्पन्न होता है।’’ समाज में शोशक व शोशित वर्ग के हित परस्पर विरुद्ध होने के कारण एक-दूसरे से संघर्ष करते है। इस पूँजीवादी युग में यह संघर्ष पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग में चलता रहता है।

मार्क्स द्वन्द्वात्मक पद्धति में विश्वास करते थे। इसके अनुसार वाद में से उसका विरोधी ‘प्रतिवाद’ पैदा होता है, फिर इन दोनों का संवाद उत्पन्न होता है, बाद में यह ‘संवाद’ पुन: वाद का रुप धारण करता है, जिसमें से उसका विरोधी ‘प्रतिवाद’ उत्पन्न होता है। पुन: दोनों का ‘संवाद’ होता है और यह प्रक्रिया समाज में लगातार चलती रहती है। प्रत्येक ‘वाद’ के भीतर कुछ आंतरिक असंगतियां होती है, जिससे प्रतिवाद उत्पन्न हो जाता है। इस सिद्धांत को मार्क्स ने वर्ग पर लागू किया। वर्ग में जो ‘आंतरिक असंगतियां है उन्हीं को मार्क्स ने ‘वर्ग-संघर्ष रखा।27 वर्ग की भाँति ‘वर्ग-संघर्ष’ के अस्तित्व का पता मार्क्स से पहले था। मार्क्सवाद के संस्थापकों में समाज वे वर्गीय ढाँचे और संघर्श सिद्धांत के संदर्भ में समाज-विज्ञान की उपलब्धियों से पर्याप्त लाभ उठाया, लेकिन उन्होंने उसे उसी रुप में ग्रहण न करके, उसे परिकृश्त, संशोधित रुप में प्रस्तुत किया।

कार्ल मार्क्स ने 5 मार्च 1852 को वेडमेयर को लिखें एक पत्र में वर्ग व वर्ग-संघर्ष की विशेषता को बताया है- ‘‘(i) वर्गों का अस्तित्व उत्पादन के विकास के खास ऐतिहासिक दौरों के साथ ही बंधा हुआ है। (ii) वर्ग संघर्ष लाजिमी तौर से सर्वहारा के अधिनायकत्व की दिषा में ले जाता है। (iii) यह अधिनायकत्व स्वयं सभी वर्गो के उन्मूलन तथा वर्गविहीन समाज की ओर संक्रमण मात्र है।’’ वर्ग संघर्ष में दो वर्ग होते है एक शोशक तथा दूसरा शोशित वर्ग। इनमें ही परस्पर वर्ग-संघर्ष होता है। 

कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा है कि ‘‘अब-तक के समाज का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है। स्वतंत्र मनुष्य और दास, अभिजात वर्ग और साधारण प्रजा, सामंत और उसके लामी, शिल्प संघ के मालिक और मजदूर-कारीगर, संक्षेप में “ोशक और शोशित, सदा से एक-दूसरे का विरोध करते आये है। वे कभी छिपे हुये, कभी प्रकट रुप में से, लगातार एक-दूसरे से लड़ते रहे है। ऐसी लड़ाई का अंत हर बार या तो समाज का सारा ढाँचा बदलने में हुआ है या लड़ने वाले दोनो वर्गो की बर्बादी में हुआ है। …….. आधुनिक पूंजीवादी समाज सामंती व्यवस्था के ध्वंस से उत्पन्न हुआ है। उसने समाज के वर्ग-विरोधों को खत्म नहीं किया है। उसने वर्गों के स्थान पर नये वर्ग, पीड़न के पूराने तरीको के बदले नये तरीके और संघर्श के पुराने स्वरूपों की जगह नये स्वरूप खड़े कर दिये है। किन्तु दूसरे युग की तुलना में हमारे युग में पूँजीवादी युग की विशेषता यह है कि वर्ग-विरोधी सीधा-सादा बना दिया है। आज पूरा समाज दिनों-दिन दो विशाल प्रतिस्पध्र्ाी शिविरों में, एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दो विशाल वर्गों में पूंजीपति और मजदूरों में बटता जा रहा है।’’

आज मानव जिस वर्ग में है उसकी प्रबल भावना, प्रबल अनुभूति उसके अन्दर है, इसी को वर्ग चेतना कहते है। अत: स्वाभाविक रुप से पूंजीवादी वर्ग और श्रमिक वर्ग, वर्ग संघर्ष की तीव्र प्रक्रिया से गुजरते रहेंगे। पूंजीवादी व्यवस्था में समाज दो वर्गों में बँटा है- (1) पूंजीपति वर्ग (2) सर्वहारा वर्ग। पूँजीपतिवर्ग उत्पादन के साधन का मालिक होता है जबकि सर्वहारा वर्ग श्रम का मालिक होता है। एक दूसरे के बिना इनके कार्य संचालित नहीं हो सकते है। पूँजीपति वर्ग की इच्छा अधिक से अधिक लाभ कमाने की होती है। इसलिये वह मजदूरों को कम से कम वेतन देना चाहता है। वही मजदूर अपने किये गये श्रम की उचित मजदूरी लेना चाहता है। फलस्वरूप दोनों वर्गों में संघर्ष आरम्भ हो जाता है। इन दोनों वर्गों के हित परस्पर विरोधी होने के कारण कोई समझौता नहीं हो पाता है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीपतियों के साथ संघर्ष के दौरान विवश होकर सर्वहारा अपने को एक वर्ग के रूप में संगठित करने को बाध्य होगा। कार्ल मार्क्स ने स्वीकार किया है कि जिन हथियारों से पूंजीपति वर्ग ने सामंतवाद का अंत किया था, वे ही हथियार आज उनके खिलाफ तन गये है। लेकिन पूंजीपति वर्ग ने न केवल ऐसे हथियारों को ही नहीं गढ़ा है जो उसका अंत कर देंगे, बल्कि उसने ऐसे आदमियों को भी पैदा कर दिया है, जो इन हथियारों को इस्तेमाल करेंगे। वे है, आज के मजदूर वर्ग, सर्वहारा वर्ग के लोग।’’

आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था में आंतरिक विरोध तथा वर्ग-संघर्श दिखाई पड़ता है। कार्ल मार्क्स के इस विचार को फ्रांसिस हब्ल्यू कोकर ने प्रस्तुत करते हुवे कहा, ‘‘सर्वप्रथम पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत प्रवृित्त्ा बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा एकाधिकार की ओर है। इस प्रवृित्त के परिणामस्वरूप, जो भागीदारी, संयुक्त-पूँजी कम्पनी तथा कार्पोरेषन के रूप में दिखाई देती है, सम्पित्त उत्त्ारोत्त्ार कम से कम व्यिक्यों के हाथों में एकत्रित हो जाती है, और इस प्रकार छोटे पूंजीपति अधिकाधिक पूँजीवादी वर्ग से बाहर निकाल दिये जाते हैं और वे सर्वहारा वर्ग में मिल जाते हैं। इस प्रकार पूंजीवाद का विकास होने का परिणाम यह होता है कि संख्या कम होती जाती है तथा श्रमिकों की संख्या बढती जाती है। दूसरा, पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत प्रवृित्त स्थानीय एकत्रीकरण की ओर है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिये एक छोटे से स्थान पर लाखों मजदूरों को एकत्र करना आवश्यक हो जाता है और इस प्रकार परस्पर सम्पर्क से मजदूरों को अपनी सामान्य कठिनाइयों व आवश्यकताओं का अधिक ज्ञान होता है। उनमें वर्ग चेतना शक्तिशाली हो जाती है। तीसरा, पूँजीवादी उत्पादन की प्रवृित्त अधिक से अधिक बाजार प्राप्त करने की होती है। जिससे श्रमिक संसार के अन्य भागों के श्रमिकों से सम्पर्क में आ जाते हैं। चौथा, पूंजीवादी प्रणाली समय-समय पर आर्थिक संकट पैदा करती रहती है। मजदूर ही एक बड़ी संख्या में उपभोक्ता होते हैं। और उन्हें केवल उतना ही वेतन मिलता है जितने में वे अपने उत्पादन का अत्यन्त सीमीत भाग ही खरीद सके। उत्पादित वस्तुयें एकत्र हो जाती हैं और अत्यधिक उत्पादन के कारण आर्थिक संकट उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों पूँजीवाद का विकास होता जाता है। त्यों-त्यों समय-समय पर उत्पन्न होने वाले संकट तीव्रत्त्ार हाते जाते हैं और उनके कारण पूंजीपतियों का आधिपत्य अधिकाधिक असुरक्षित होता जाता है। … अन्त में पूँजीवाद के अन्तर्गत ऐसी प्रवृत्ति भी है जिससे श्रमिकों में अज्ञानता, दु:ख व पराधीनता में वृद्धि होती है जिससे उनमें विद्वेष और असंतोष बढ़ता है।’’

वर्ग संघर्ष के परिणामस्वरूप सर्वहारावर्ग की स्थापना हो जाती है। उत्पादन के साधनों पर श्रमिकों का अधिकार हो जाता है। जब पूँजीपति वर्ग का नाष हो जायेगा तो कुछ समय के लिये श्रमिकों का अधिनायकतंत्र स्थापित रहेगा। जिससे कि बचे हुवे पूँजीपति को नष्ट किया जा सके। इस व्यवस्था के अन्तर्गत समाज तथा राज्य की समस्त शक्ति श्रमिकों के हाथ में रहेगी। सर्वहारा अधिनायक तंत्र स्थाई नहीं रहेगा। यह एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। इसके पष्चात समाजवाद की अवस्था होगी जिसमें राज्य की सत्ता को श्रमिक के बीच सौप दिया जायेगा। दूसरा अवस्था में पूर्ण सामंजस्य होगा तथा न कोई गरीब होगा और न कोई धनी।

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त

मार्क्स अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त के माध्यम से पूँजीवादी शोषण व्यवस्था को उजागर करने का प्रयास करते हैं। इस सिद्धान्त ने सर्वहारावर्ग तथा पूंजीपति वर्ग के बीच के विरोध के आर्थिक आधार को स्पष्ट कर दिया। इस सिद्धान्त का मुख्य उद्देष्य यह प्रकट करना है कि पूंजीपति वर्ग श्रमिक को उसके यथायोग्य पारिश्रमिक नहीं देते। पूँजीपति श्रमिक को उसके श्रम का कम से कम मूल्य मजदूरी के रूप में देना चाहता है तथा उत्पादित वस्तुओं के विक्रय से अधिक से अधिक लाभ वह स्वयं लेना चाहता है। पूँजीपति श्रमिकों द्वारा उत्पादित माल से अधिकतम लाभ किराया, ब्याज व मुनाफे के रूप में प्राप्त कर लेता है यही अतिरिक्त मूल है जिसको प्राप्त करके मजदूरों का शोषण पूंजीपतियों द्वारा किया जाता है।

कार्ल मार्क्स किसी भी नैतिक आदर्श की स्वीकृति को कल्पनावाद की स्वीकृति मानते थे और चूंकि हीगल की भांति वह अपने आदर्शों को अपरिहार्य मानता था, अत: उसने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि द्वन्द्वात्मक आवश्यकता के वशीभूत होकर पूँजीवादी व्यवस्था का पथ प्रशस्त करेगी। उत्पादन के साधनों से पूंजीवादी स्वामी अतिरिक्त मूल्य प्राप्त करेंगे। इसके कारण पूंजीवाद विशाल स्तर के उत्पादन तथा एकाधिकार की ओर बढ़ता है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार श्रम-शक्ति का मूल्य उस शक्ति को कायम रखने या उसे पुन: उत्पन्न करने के लिये आवष्यक श्रम की मात्रा द्वारा निर्धारित होता है। लेकिन इस श्रमशक्ति का प्रयोग मजदूर की क्रियाशक्ति और उसके शारीरिक बल द्वारा सीमित होता है। श्रम की वह मात्रा जो मजदूर की श्रम-शक्ति के मूल्य को सीमित करती है, कदापि श्रम की उस मात्रा को सीमित नहीं करती, जो मजदूर की श्रम शक्ति प्रस्तुत कर सकती है। मजदूर अपनी श्रम मूल्य के अतिरिक्त जो श्रम शक्ति है, वह अतिरिक्त श्रम का घण्टा होगा और यही अतिरिक्त श्रम अतिरिक्त मूल्य और अतिरिक्त उपज के रूप में फलीभूत होगा।

कार्ल मार्क्स मानते है कि इस सिद्धांत के द्वारा सामान्य प्रवृित्त यह होगी कि जनसंख्या का अधिकांश भाग मजदूर बन जायेगा और इसे कठोर दरिद्रता का सामना करना पड़ेगा। कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त वास्तव में मूल्य के श्रम सिद्धान्त का विस्तार मात्र था। बाजार में जिन वस्तुओं का विनिमय होता है, उनमें एक समानता यह पाई जाती है कि वे श्रम की उपज होते हैं।

मूल्य की दो मात्रायें समान नहीं हो सकती है। सेवा नियोजक अपने नियंत्रण और संगठन के द्वारा इस बात का ध्यान रखता है कि जब मजदुरों की श्रम शक्ति चुक जाये तब वे जिस मात्रा का उत्पादन करें वह उस मात्रा से अधिक हो, जिसके लिये उन्हें पारिश्रमिक दिया जाये। प्रयुक्त श्रम शक्ति खपत की गई श्रम-शक्ति के पुनरस्थापन से अधिक मूल्य पैदा करती है। इस अतिरिक्त मूल्य से ही समस्त मुनाफों, ब्याज और किराये की उत्पित्त होती है। इसका कारण यह है श्रम या किसी पदार्थ के विनिमय मात्र से उसका मूल्य नहीं बढ़ता है।

कार्ल मार्क्स के मूल्य सिद्धांत के अनुसार श्रम ही किसी वस्तु का वास्तविक मूल्य निर्धारक हाता है। प्रत्येक वस्तु का असली मूल्य इस बात से निर्धारित होता है कि उसके उत्पादन में सामाजिक दृष्टि से उपयोगी जो व्यय हुआ है। श्रम व्यय हुआ है। श्रम व्यय के अतिरिक्त मूल्यों को लेना ही श्रमिकों का शोषण है। अत: किसी वस्तु पर ब्याज, मुनाफा, व्यक्तिगत भाड़े आदि को समाप्त करना चाहिये। यह केवल समाजवादी व्यवस्था में ही सम्भव है। जिससे व्यक्तिगत पूँजी का स्थान सामूहिक पूँजी ले लेगी।

कार्ल मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त के लिये तीन नियम प्रतिपादित किये थे।

  1. पूँजी का संचय सिद्धान्त- अर्थात पूँजीपति सदैव इस बात की ओर प्रयत्नशील रहते हैं कि मशीनों के अधिकाधिक प्रयोग द्वारा श्रम की बचत और उत्पादन में वृद्धि हो।
  2. पूँजी का केन्द्रीयकरण सिद्धांन्त- इसका आषय है कि पूँजी का केन्द्रीयकरण होगा। जिस पर केवल कुछ व्यक्तियों का एकाधिकार हो जायेगा।
  3. कष्टों की वृद्धि का सिद्धान्त- इसके अनुसार प्रतियोगिता के कारण पूँजीपति वर्ग श्रमिकों का अत्यधिक शोशण करेंगे। जिससे कष्टों में बहुत अधिक वृद्धि हो जायेगी। किन्तु इसके साथ-साथ श्रमिक वर्ग की भी क्रांति होगी। पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिकों की दषा सोचनीय होगी और वे अपनी सुरक्षा के लिये संगठित होकर क्रांति के द्वारा पूँजीवादी व्यवस्था का अंत करने में सफल होंगे।

कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त पूँजीवादी व्यवस्था का मुख्य आधार है। वर्तमान युग में कोई व्यक्ति बिना लाभ के कोई कार्य नहीं करता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी पूंजी से लाभ की आकांक्षा रखता है। यह जो एक निम्न स्तर कार्य पर भी लागू होता है। यदि कोई पूँजीपति किसी राष्ट्र में अपनी पूँजी का निवेश करता है तो वह लाभ अवष्य कमाना चाहेगा। जिसे मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त से समझ सकते हैं। मानव स्वभाव से स्वाथ्र्ाी है। वह बिना लाभ के अपने पूंजी का निवेश नहीं करता है। अर्थात पूंजीपति अपने किये हुवे निवेश पर लाभ प्राप्त करना चाहेगा। जिसके लिये पूंजीपति श्रमिकों से अतिरिक्त समय तक श्रम करवायेगा परन्तु पारिश्रमिक श्रम मूल्य को कम से कम करके देगा। क्योंकि पूंजीपति अपना ही लाभ देखता है। इस अवस्था में वह श्रमिकों का शोषण भी करने लगता है। जिससे श्रमिकों में कुंठा द्वेष की भावना उत्पन्न होती है।

राज्य के सन्दर्भ में कार्ल मार्क्स का विचार :-

कार्ल मार्क्स शोषण रहित तथा वर्ग विहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। वर्तमान में समाज कई वर्गों में बटा हुआ है। जहाँ राज्य की आवश्यकता होती है। मार्क्स मानते है कि राज्य का उद्देश्य कभी भी सर्व-कल्याण का नहीं रहा है। राज्य ऐसे संगठन के रूप में कार्य करता रहा है। जिसमें एक आर्थिक वर्ग दूसरे आर्थिक वर्ग का अपने लाभ के लिये शोषण करता है। समाज में जब तक ये वर्ग रहेंगे तब तक राज्य का अस्तित्व रहेगा।

कार्ल मार्क्स मानता है कि समाज पूँजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग में बँटा हुआ है। इनमें पूंजीपति वर्ग शोशक होता है। दूसरा श्रमिक वर्ग शोशित है। इन दोनों वर्गों मे वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी से श्रमिक वर्ग में वर्ग-चेतना का उद्भव होता है। परन्तु आधुनिक राज्य में पुलिस, सैनिकों आदि के माध्यम से श्रमिकों की चेतना को दबाया जाता है। जिससे ये संघर्श न कर पाये। मार्क्स के वर्ग संघर्ष के द्वारा श्रमिकों का राज्य पर अधिकार हो जाता है। ये श्रमिक राज्य में अधिनायकत्व के रूप में कार्य करते हैं। यह एक संक्रमणकालीन अवस्था होती है। जब पूँजीपतियों का दमन हो जाता है तो सर्वहारा वर्ग द्वारा एक वर्ग विहिन समाज की स्थापना की जाती है।

लेनिन का मानना है कि राज्य वही के लिये आवश्यक है जहाँ वर्ग-विभेद होता है।37 राज्य पूंजीपतियों के प्रयोग का साधन है। जहाँ उच्च वर्ग का उत्पादन के साधन पर नियंत्रण हो तथा श्रमिक वर्ग सिर्फ साधनों का प्रयोग के लिये हो वहां पर ही ‘राज्य’ मजबूत रूप में कार्य करता है। मार्क्स और एंगेल्स ने इसे सशस्त्र और निरंकुशता का प्रतीक माना है। तथा यह वर्ग के महत्व को उत्पन्न करने का साधन है।

समाज का प्रत्येक वर्ग अपने हितों को ध्यान में रखकर राज्य का प्रयोग करना चाहता है। राज्य की स्थापना में व्यक्तिगत हितों का यह ध्यान, समाज में व्याप्त वर्ग-विभेद के कारण होता है। राज्य का हर रूप में विभिन्न वर्ग का उदय होता है चाहे वह लोकतांत्रिक हो, गणतांत्रिक हो या तानाशाही हो। जिससे विभिन्न वर्ग का शोषण होता है। इसीलिए मार्क्स राज्य के स्वरूप को ही समाप्त करना चाहते है और राज्य के स्थान पर एक वर्ग विहिन समाज को महत्व देते हैं। जब वर्ग समाप्त हो जायेंगे। तो ‘राज्य’ नामक संस्था की आवश्यकता नहीं रहेगी। ऐसी स्थिति में समाज का प्रत्येक व्यक्ति शासक होगा।

समाज में शोषण की अवस्था से ही क्रांति का उद्भव होता है। यह क्रांति ही राज्य की समाप्ति का आधार प्रस्तुत करती है। उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण का प्रयास, शक्ति का हस्तानान्तरण ही राज्य की समाप्ति का पहला लक्षण है। एंगेल्स मानता है कि वर्ग विभेद की समाप्ति तथा सामाजिक चेतना के बाद राज्य की आवश्यकता स्वत: ही समाप्त हो जायेगी।

इस वैश्वीकरण के दौर में राज्य द्वारा केवल राष्ट्र के भीतर ही नहीं वरन् के साधन पर स्वामित्व होता है। जिससे ये श्रमिकों का शोषण करते हैं। राष्ट्र के बाहर भी शोषण होता है। पूंजीपतियों का राष्ट्र के भीतर व बाहर उत्पादन का शोषण करते है। यह शोषण का कार्य सामंती युग से चला आ रहा है। मध्य काल में राज्य सामन्तो के लिये शोषण का कार्य करता था। कार्ल मार्क्स मानते है कि राज्य मध्य काल की तरह वर्तमान में भी शोषण कर रहा है। राज्य उन व्यक्तियों के विरूद्ध दमन करता है जो राज्य पर शासन करने वालो के विरूद्ध आवाज उठाते हैं। मध्यकाल में राज्य सामन्तों की बात न मानने पर किसानों के विरूद्ध कार्य करता था। वर्तमान समाज में राज्य पूंजीपतियों को समृद्धषाली और धनी बनाने के लिये, इनके विरूद्ध होने वाले किसी तरह के प्रयास को राज्य दबाने का प्रयास करता है।

आर्थिक समस्यायें –

कार्ल मार्क्स की समस्या उत्पादन के साधनों का असमान वितरण से है। मार्क्स मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को काम का अधिकार मिलना चाहिये। श्रम के अनुपात में श्रमिकों को उनकी मजदूरी मिलनी चाहिये। समाज में सभी व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त हो। श्रमिकों द्वारा किये गये श्रम के अनुपात में उनको पूंजी की प्राप्ति हो। समाज में पूँजी के प्रति लाभ का उद्देश्य न हो।

कार्ल मार्क्स के समय में (यूरोप में) सारा समाज दो वर्गों में बँटा हुआ था। एक शोषण तथा दूसरा शोशित था। शोशक पूंजीपति थे जो श्रमिकों का शोषण करते थे। इसके अतिरिक्त भी पूंजीपति व श्रमिकों का छोटे-छोटे समूह थे। पूँजीपति वर्ग समाज में सिर्फ शोषण का प्रयास करते हैं। इस शोषण की प्रवृित्त के द्वारा वे अपनी पूँजी में अधिक वृद्धि का प्रयास करते हैं। इसी उद्देश्य के लिये पूंजीपति श्रमिकों से अधिक से अधिक श्रम कराते हैं और बदले में वे कम से कम मजदूरी देते हैं। कार्ल मार्क्स मानता है कि समाज में यह स्थिति तब तक रहेगी जब तक श्रमिकों ने स्वचेतना नहीं आती। यह तब होता है जब पूँजीपतियों की संख्या कम तथा श्रमिकों की संख्या अधिक हो जाती। जिससे समाज में वर्ग संघर्ष प्रारम्भ होता है और समाज में सर्वहारा अधिनायकत्व की स्थापना होता है। यही समाज की सर्वोच्च अवस्था है जहाँ समाप्त हो जाती है। और साम्यवाद की स्थापना होती है।

पूँजीवादी व्यवस्था :-

मार्क्सवाद सर्वप्रथम एक वैज्ञानिक भौतिकवादी है जो सृष्टि तथा मानव समाज के विकास के नियमों की वैज्ञानिक शोध करता है। मार्क्स के अनुसार सृष्टि किसी परमात्मा की देन नहीं है, न तो प्रकृित्त में जिस क्रम विकास को हम देख रहे है वे किसी उद्देश्य परक सिद्धांत द्वारा निर्देशित होते है।

मार्क्स सामाजिक परिवर्तन का कारण आर्थिक मानता है। जबकि इससे पहले सामाजिक परिवर्तन का कारण राजनीतिज्ञों, विधायकों, और सामाजिक सुधारकों को माना जाता था। मार्क्स सामाजिक परिवर्तन के लिये दो मूल अवधारणा को कारण स्वरूप मानते है पहला उत्पादन शक्ति तथा दूसरा उत्पादन प्रणाली। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि इन दो उत्पादन पद्धतियों में टकराव ही सामाजिक परिवर्तन का बुनियादी कारण है।

वर्तमान समय में उत्पादन शक्ति व उत्पादन सम्बन्ध में टकराव हड़ताल व विरोध के रूप में दिखाई देता है। जिसके समाधान के लिये प्रत्येक पूँजीवादी अपने कम्पनी में बोडऱ् ऑफ डायरेक्टर व बोर्ड ऑफ मेम्बर की न्युक्ति करता है। ये श्रमिकों के माँगों का निर्धारण करते है। अत: संघर्ष की स्थिति को कम से कम करने का प्रयास किया जाता है। यदि उत्पादन के साधन पर श्रमिकों का अधिकार हो जाये तो वे अत्याधुनिक तकनीकी को ला नहीं पायेंगे। क्योंकि इसके लिए पूँजी की आवष्यकता होगी। कम्पनियां समय-समय पर अपने श्रमिकों को कार्य के लाभ के रूप में बोनस प्रदान करती है। श्रमिकों के स्वास्थ्य सुविधा के लिये हास्पिटल उपलब्ध करवाती है। कम्पनी अपने श्रमिक को समाज में सम्मान पूर्वक जीवन यापन करवाने के लिये सभी मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराती है।

मार्क्स साम्यवाद की स्थापना हिंसा के आधार पर करता है। तोड़ फोड़ एवं विध्वसंक कार्यों द्वारा सामाजिक सम्पित्त को नष्ट कर समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करना। यह एक अविवेकपूर्ण कार्य है। जब कोई व्यवस्था हिंसा के द्वारा स्थापित की जाती है तो इस हिंसा के प्रति प्रति हिंसा भी उत्पन्न होती है। जिससे यह व्यवस्था सुचारू रूप से चल नहीं पायेगी। यह क्रिया निरन्तर चलती रहेगी। एक विवेकपूर्ण समाजवादी व्यवस्था की स्थापना न करके हम समाज को युद्ध की ओर झोंक रहे हैं। क्योंकि क्रांति के कारण समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होती है। जिससे इस क्रांति को नियंत्रित करना आसान नहीं होता है। फ्रांस की राज्य क्रांति को देखे तो क्रांति का हमेषा परिणाम सुखदायी नहीं रहती है। इसकी विभत्सना समाज को भुगतनी पड़ती है।

मार्क्सवादी व्यवस्था साधन की पवित्रता पर भी बल नहीं देते है। महात्मा गांधी मानते हैं कि जैसा हमारा साधन होता है उसी प्रकार के साध्य की प्राप्ति होती है। यदि साधन पवित्र नहीं है तो साध्य भी पवित्र नहीं होगा। अत: साम्यवाद में हिंसा के माध्यम से अधिनायकत्व की स्थापना की जाती है। अत: हिंसा के द्वारा स्थापित यह व्यवस्था हिंसक मूली में ही रहेगी। समाज में हिंसा, लूटपाट, अत्याचार और बढ़ेगा। अत: साम्यवाद में हिंसा को स्थान देना उचित नहीं है।

मार्क्स कम्यूनिश्ट घोषणापत्र में कहता है ‘‘सर्वहारा वर्ग अपना राजनीतिक प्रभुत्व पूंजीपति वर्ग से धीरे-धीरे कर सारी पूँजी छीनने के लिए उत्पादन के सारे औजारों को राज्य अर्थात शासक वर्ग के रूप में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रीकृत करने के लिये तथा समग्र उत्पादक शक्तियों में यथाशीघ्र वृद्धि के लिये इस्तेमाल करेगा। निःसंदेह आंरभ से यह काम स्वामित्व के अधिकारों पर और पूंजीवादी उत्पादन की अवस्थाओं पर निरंकुश हमलों के बिना नहीं हो सकता।

मार्क्स साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना के लिये अधिनायक प्रणाली का सहारा लेते है। वर्तमान समय में इस तानाषाही प्रणाली को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि यह अधिनायकत्व एक संक्रमणकालीन अवस्था होगी। परन्तु मानव एक स्वाथ्र्ाी प्राणी है। यदि अधिनायक की अवस्था को सर्वहारा वर्ग ने बनाये रखा तो यह समाज के अन्य व्यक्तियों के लिये अत्यधिक कश्टकारी होगी। जिससे समाज में समान वितरण, समानता की भावना कभी भी स्थापित नहीं की जा सकेगी।

मार्क्स साम्यवाद की स्थापना के लिये वर्गविहीन समाज की स्थापना करते है। परन्तु कार्यों का निर्धारण करने के लिये हमें वर्ग का निर्धारण करना ही पड़ेगा। समूह के आधार पर ही वर्ग का निर्धारण समूह होता है। यदि किसी समूह का कार्य निर्धारित किया जाता है तो वह एक वर्ग बन जायेगा। क्योंकि इन समूहों के कुछ अधिकार होंगे। अत: बिना वर्ग के हम समाज का निर्धारण नहीं कर सकते हैं। यथा वर्तमान समाज में विभिन्न वर्गों का निर्धारण उनके कार्यों से होता है डाक्टर, इन्जिनियर, सैनिक आदि क्या बिना वर्ग के हम इनकी स्थापना कर पायेंगे। बिना वर्ग के व्यक्ति के कार्यों का निर्धारण नहीं किया जा सकता है।

यह स्पष्ट हो रहा है कि वर्तमान वैज्ञानिक तकनीकी क्रांति तथा सूचना-संचार साधनों के साधारण विकास के युग में समाजवाद समाजवाद का अब तक वर्तमान ढ़ाँचा और सिद्धांत पुराना पड़ गया है। फलस्वरूप समाजवाद में गुणात्मक परिवर्तन और क्रांति की आवश्यकता है और इसे एक बिल्कुल ही नई मंजिल में पहुँचाने की जरूरत है। यह भी दिन के उजाले के समान बिलकुल साफ होता जा रहा है कि भाप की इंजन या बिजली के युग में मार्क्सवाद से काम नहीं चल सकता है। परम्परागत मार्क्सवाद वर्तमान विश्व की पूर्ण व्याख्या करने में असमर्थ है। इसलिये मार्क्सवाद के सिद्धांतों समेत में मूलगामी परिवर्तन की आवश्यकता है जो न्यूक्लियर शक्ति प्रयोग के अनुरूप हो और जो वर्तमान और भविष्य की व्याख्या कर सके। क्योंकि इसका जीवंत उदाहरण 1990-91 का सोबियत संघ का विघटन की घटना है।

सन्दर्भ –

  1. श्री राम वृक्ष बेनीपुरी : स्वाधीनता और समाजवाद, स्वराज प्रकाशन, पृष्ठ सं0-40
  2. मार्क्सवादी-लेकिनवादी शिक्षामाला, पृष्ठ सं0-13
  3. मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिक्षा माला, समाजविज्ञान, पृष्ठ सं0-18
  4. डॉ0 शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन, इतिहास तथा सिद्धांत, पृष्ठ सं0-17
  5. ब्ला0 ई0 लेनिन : मार्क्स एंगेल्स और मार्क्सवाद के सिद्धांत, पृष्ठ सं0-34
  6. डॉ0 शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवादी साहित्य चिंतन, इतिहास तथा सिद्धांत, पृष्ठ सं0-25
  7. शर्मा, डॉ0 प्रभु दत्त, आधुनिक राजनीतिक विचारों का इतिहास पृष्ठ सं0-279
  8. डॉ0 शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवादी साहित्य चिन्तन, इतिहास और सिद्धान्त, पृष्ठ सं0-72
  9. एमिल बन्र्स, मार्क्सवाद क्या है? पृष्ठ सं0-77
  10. मुकर्जी, रवीन्द्र नाथ, उत्कृष्ट समाजशास्त्री परपरायें, पृष्ठ सं0-55
  11. मार्क्सवादी लेनिनवादी शिक्षामाला, समाजविज्ञान, पृश्ठ सं0-88
  12. आधुनिक राजनीतिक विचारों का इतिहास, शर्मा डॉ0 प्रभु दत्त शर्मा, पृष्ठ सं0-283
  13. वर्मा, अशोक कुमार, प्रारम्भिक समाज एवं राजनीति-दर्शन, पृष्ठ सं0-254
  14. वर्मा, अशोक कुमार, आधुनिक राजनीतिक विचारों का इतिहास, पृश्ठ सं0-286
  15. मार्क्सवादी चिंतन, पाण्डेय ब्रजकुमार, पृष्ठ सं0-70
  16. व0 केल्ले और म0 कोवाल जोन : ऐतिहासिक भौतिकवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत की रूपरेखा, पृष्ठ सं0. 118
  17. फ्रेडरिक एंगेल्स : ड्यूहरिंग मत-खण्डन, पृष्ठ सं0-304
  18. पाण्डेय ब्रजकुमार, मार्क्सवादी चिंतन, पृष्ठ सं0-65
  19. व0 केल्ले और म0 कोवाल जोन, ऐतिहासिक भौतिकवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत की रूपरेखा, पृष्ठ सं0. 180 
  20. मुकर्जी, रवीन्द्र नाथ, उत्कृश्ट समाजशास्त्री परपरायें, पृष्ठ सं0-40
  21. व0 केल्ले और म0 कोवाल जोन, ऐतिहासिक भौतिकवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत की रूपरेखा, पृष्ठ सं0.- 175-176
  22. मार्क्स, कार्ल, एंगेल्स : कम्यूनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र, पृष्ठ सं0-35
  23. मार्क्स, एंगेल्स : कम्यूनिश्ट पार्टी की घोषणा पत्र, पृष्ठ सं0-43
  24. मुकर्जी, रविन्द्र नाथ, उत्कृश्ट समाजशास्त्री परम्परायें, पृष्ठ सं0-92
  25. मार्क्स, कार्ल : दास कैपिटल, वाल्यूम, II, पृष्ठ सं0-41
  26. मार्क्स कार्ल : दास कैपिटल, वाल्यूम-II, पृष्ठ सं0-52
  27. शर्मा, डॉ0 प्रभु दत्त, आधुनिक राजनीतिक विचारों का इतिहास, पृश्इ 303
  28. मार्क्स, कार्ल, Wage Labour and Capital’ in karl Marx, Collected Loorks Vol, page 212.
  29. Lenin, Vol. I, “The State”, collected Works, Vol. 29, Page, 479.
  30. Engeles, F : Anti Duhsing Herr Eugen, Dubring’s Revolution in Science, 1959, Page. 389-89.
  31. Marx, K, Wage, Labour and Capital Page- 77-79
  32. लास्की, हेरॉल्ड, जे0 : कम्यूनिस्ट घोषणापत्र, पृष्ठ सं0-102
  33. लास्की, हैरॉल्ड जे0 : कम्यूनिस्ट घोषणापत्र, पृश्ठ-116

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *