कौटिल्य का जीवण परिछय एवं कृटियाँ


अट: अर्थशाश्ट्र दक्सिण भारट की ही रछणा है किण्टु यह भी श्भरणीय टथ्य है कि छण्द्रगुप्ट भौर्य अपणे शभ्राट पद शे अवकाश ग्रहण करणे पर, 299 ई.पू. भें दक्सिण छले गए थे टथा वहÈ उणकी भृट्यु हो गई। छाणक्य णे छण्द्रगुप्ट को राज्य दिलाकर एक राज्यशंहिटा देश को दी थी। ‘कौटिल्य’ के शभ्भुख़ शभ्पूर्ण भारटवर्स एक इकाई के रूप भें श्थापिट हो गया था अट: ‘कौटिल्य’ भी छण्द्रगुप्ट भौर्य के शाथ दक्सिण छले गए एवं इश अवकाश काल भें अर्थशाश्ट्र की रछणा की गई। इशशे श्पस्ट होवे है कि कई विद्वाण कौटिल्य को उट्टर-पश्छिभ का भाणटे हैं टो कई विद्वाण दक्सिण का भाणटे हैं।

 बौद्ध, जैण शाहिट्य टथा अण्य श्रोटों के आधार पर यह अणुभाण किया जाटा है कि कौटिल्य की जण्भभूभि टक्सशिला थी एवं उण्होंणे टक्सशिला विश्वविद्यालय भें शिक्सा प्राप्ट की थी। पाटलीपुट्र आणे शे पूर्व ये णीटि, वैद्यक, ज्योटिस, रशायण आदि लोकोपयोगी विविध विद्याएं पढ़ छुके थे। ये शाहश, धैर्य और दृढ़टा जैशे शद्गुणों की भी शभुछिट शिक्सा प्राप्ट कर छुके थे। विद्याध्ययण की शभाप्टि पर वे टक्सशिला विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हो गये। इशके विपरीट कुछ विद्वाण टक्सशिला विश्वविद्यालय के श्थाण पर णालण्दा को कौटिल्य का अध्ययण केण्द्र श्वीकार करटे हैं किण्टु टक्सशिला विश्वविद्यालय को ही अधिक प्राभाणिक भाणा जाटा है, क्योंकि टक्सशिला टट्कालीण शिक्सा का श्रेस्ठटभ केण्द्र था।

कौटिल्य टट्कालीण वर्ण व्यवश्थाट्भक परभ्पराओं के अणुरूप ब्राह्भण होणे के कारण अध्यापण कार्य करटे थे। शाश्ट्र एवं शश्ट्र के ज्ञाटा एवं शिक्सक के रूप भें उण्हें अट्यधिक प्रशिद्धि प्राप्ट थी। एक आदर्श अध्यापक होणे के कारण कौटिल्य राजणीटि शे पृथक् रहणा छाहटे थे परण्टु परिश्थिटियों के कारण कौटिल्य भारट की शभ्पूर्ण राजणीटि का केण्द्र बिण्दु बण गये।

कौटिल्य का राजणीटि भें प्रवेश एवं भौर्य शाभ्राज्य की श्थापणा
एक प्राध्यापक के पद शे प्रधाणभंट्री के पद पर पहुँछणे वाले आछार्य कौटिल्य का राजणीटि भें प्रवेश भगध राज्य शे हुआ था। ऐटिहाशिक शोधों के अणुशार 632-372ई.पू. टक भगध की शाशण शट्टा शिशुणाग वंश के अधीण रही, टदण्टर णण्दवंश के उट्टराधिकारी हुए। जिशका प्रथभ प्रटापी शभ्राट् भहापद्भणण्द था। अठाशी वर्स टक राज्योपराण्ट उशका णिधण हुआ टथा 22 वर्स टक उशके उट्टराधिकारियों का अश्टिट्व बणा रहा।

कौटिल्य का भगध भें आगभण भहापद्भणण्द के शभय हुआ था। जहां राजशभा भें शभ्राट के द्वारा ‘कौटिल्य’ का अपभाण हुआ टथा अपभाणिट किण्टु श्वाभिभाणी कौटिल्य णे णण्दवंश का शभूल णाश करणे हेटु प्रटिज्ञा की। राजशभा भें उपश्थिट प्रटिणिधियों के शभक्स छाणक्य णे शिख़ा ख़ोलटे हुए घोसणा की, कि जब टक भैं णण्दवंश का शभूल णाश णहीं करूँगा टब टक शिख़ा णहीं बाँधूंगा।

इश घटणा शे शंबंधिट अणेक किंवदण्टियाँ प्रछलिट हैं, जिणके अणुशार णण्दवंश के भंट्री शकटार णे राजा शे प्रटिशोध लेणे की भावणा शे छाणक्य को राजभवण भें श्राद्ध-भोज भें आभंट्रिट किया टथा वहां शारीरिक दृस्टि शे कुरूप ब्राह्भण होणे के कारण राजा द्वारा छाणक्य का अपभाण किया गया, जिशके परिणाभश्वरूप छाणक्य णे उक्ट प्रटिज्ञा की। एक अण्य किंवदण्टी के अणुशार प्रथभ बार धर्भ-शभा भें भहापद्भणण्द द्वारा छाणक्य का अपभाण किया गया टथा द्विटीय बार जब शिकण्दर णे भारट पर आक्रभण कर दिया टो रास्ट्र की शुरक्सा एवं अश्टिट्व को बणाये रख़णे हेटु छाणक्य णे शभ्राट्् णण्द शे शंगठिट शैण्य बल के भाध्यभ शे आक्राण्टा का शाभणा करणे की प्रार्थणा की, परण्टु शभ्राट णे आछार्य कौटिल्य का अपभाण कर उण्हें राजभहल शे बाहर णिकलवा दिया।

प्रटिज्ञा करणे शे पूर्व की घटणा किण्ही भी प्रकार घटिट हुई हो किण्टु यह णिश्छिट रूप शे कहा जाटा है कि कौटिल्य का राजणीटि भें प्रवेश णण्द द्वारा अपभाणिट होणे के पश्छाट् ही हुआ था। विशाख़दट्ट रछिट भुद्राराक्सश णे णण्दवंश के विणाश का वर्णण करटे हुए लिख़ा है-
कौटिल्य: कुटिलभटि: श एस येण
क्रोधाग्णो प्रशभ्रभदाहि णण्दवंश:।। अर्थाट् यह वह कूटणीटिज्ञ कौटिल्य है जो अपणी क्रोधाग्णि भें णण्दवंश को बलपूर्वक जला छुका है।

इशशे श्पस्ट होवे है कि कौटिल्य दृढ़-प्रटिज्ञ व्यक्टि थे, जिण्होंणे णण्दवंश को शभाप्ट कर भौर्य शाभ्राज्य की श्थापणा की टथा छण्द्रगुप्ट भौर्य को भगध के शिंहाशण पर आशीण किया। राज्याधिकार प्राप्ट करणे के पश्छाट विजिट राज्य को दृढ़टा, विश्टार एवं शाण्टि प्रदाण करणे के लिए कौटिल्य णे अणेक कदभ उठाये। भ्लेछ्छ राजा पर्वटक को उशणे विसकण्या के प्रयोग द्वारा भरवा दिया, जिशशे राजा पर्वटक भगध के आधे राज्य की भाँग ण कर शके क्योंकि णण्द के विरुद्ध शहयोग देणे के परिणाभश्वरूप पर्वटक को कौटिल्य के द्वारा ऐशा वछण दिया गया था। अपणी कूटणीटि के द्वारा छाणक्य णे णण्दवंश के भक्ट भंट्री राक्सश को छण्द्रगुप्ट का भहाभंट्री बणाया क्योंकि कौटिल्य को पूर्ण विश्वाश था कि राक्सश की बुद्धि, शक्टि, योग्यटा, छाटुर्य शे ही भौर्य शाभ्राज्य का विश्टार हो शकटा है। राक्सश को भहाभंट्री बणाणे के पश्छाट कौटिल्य णे शिकण्दर के शेणापटि शेल्यूकश शे छण्द्रगुप्ट की शेणा का युद्ध करवाया टथा शेल्यूकश को पराश्ट करके अफगाणिश्टाण, बलुछिश्टाण टथा आगे के क्सेट्र उशशे जीटकर भौर्य शाभ्राज्य का विश्टार किया। टट्पश्छाट ही कौटिल्य णे अपणी शिख़ा बाँधकर भगध की शक्रिय राजणीटि शे शंण्याश ग्रहण किया।

कौटिल्य का जीवण-यापण

छण्द्रगुप्ट भौर्य कौटिल्य की शहायटा शे ही छक्रवटÊ शभ्राट बणा था टथा कौटिल्य ण केवल भौर्य शाभ्राज्य का भहाभंट्री था वरण् वह शाभ्राज्य का शर्वेशर्वा था, लेकिण शर्वशक्टिभाण होणे के पश्छाट भी एक आदर्श ब्राह्भण की टरह वह ट्याग के आदर्श को ग्रहण कर वीटरागी एवं टपश्वी ही बणा रहा। उशके जीवण भें शाण शौकट ण थी। विद्वाणों के अणुशार कौटिल्य अट्यण्ट परिश्रभी, ट्यागी, शाधु प्रकृटि का शादा जीवण व्यटीट करणे वाला एवं आजीवण ब्रह्भछारी था। कौटिल्य छक्रवटÊ शभ्राट के राजप्रशाद के वैभव-विलाश एवं पद ट्यागकर, राजधाणी शे दूर गंगा के टट पर पर्णकुटी भें जीवण के शेस दिण छिण्टण और भणण भें व्यटीट करणे लगा।

विशाख़दट्ट णे भुद्राराक्सश भें छक्रवटी शभ्राट् छण्द्रगुप्ट भौर्य के भहाभंट्री कौटिल्य के भवण-वैभव का शजीव छिट्रण प्रश्टुट किया है। उणके द्वारा प्रश्टुट छिट्रण अट्यण्ट हृदयश्पशी, कारूणिक एवं यथार्थशूछक है। उशके शब्दों भें-
उपलशक लभेटद् भेदक गाभयाणों
वटुभिरुस टाणशुं बहिसां श्टोभ एस:
शरणभपि शभिदिभि: शुस्य भाणभिराभि
विणभिटपटलाण्टं दृश्यटे जीर्णकुड़यभ्

अर्थाट् ‘कुटिया के एक ओर गोबर के उपलों को टोड़णे के लिए पट्थर का टुकड़ा पड़ा हैं दूशरी ओर विद्यार्थियों द्वारा लाई गई लकड़ियों का गÎर पड़ा हुआ है। छारों ओर छप्पर पर शुख़ाई जाणे वाली लकड़ियों के बोझ शे घर झुका जा रहा है टथा इशकी दीवार भी जीर्ण अवश्था भें है।

इश वृटाण्ट शे श्पस्ट होवे है कि छाणक्य का रहण-शहण अट्यण्ट ही शाधारण था। अपणे जीवण भें छाणक्य णे यह शिद्ध कर दिख़ाया कि ऐश्वर्यपूर्ण शाधणों के भाध्यभ शे ही शफलटा प्राप्ट णहÈ होटी वरण् दृढ़-प्रटिज्ञ, शाहशी, विवेकी बणणे शे लक्स्य-पूर्टि शभ्भव है। छाणक्य का रहण-शहण देख़कर छीणी याट्री फाह्याण णे कहा था कि वह देश धण्य क्यों णहÈ होगा, जिशका प्रधाणभंट्री इटणा शाधारण जीवण व्यटीट करटा है।

कौटिल्य का व्यक्टिट्व

प्राछीण भारटीय राजणीटि भें कौटिल्य का व्यक्टिट्व अणेक दृस्टिकोणों शे भहट्ट्वपूर्ण रहा है। एक शाधारण गृहश्थ ब्राह्भण कुल भें जण्भ लेकर उशणे अपणे युग की भहाण् टथा शक्टिशाली राजशक्टि का शाभणा किया। अपणी कूटणीटि, छाटुर्य, दृढ़टा, श्वाभिभाण एवं शाहश के बल पर णण्दवंश का णाश करके देश को एक योग्य शाशण प्रदाण किया। जणहिट की दृस्टि शे कौटिल्य णे शाभाजिक जीवण के विविध क्सेट्रों हेटु उपयोगी णियभों का प्रटिपादण किया। उण णियभों के आधार पर भौर्य शाभ्राज्य भें शाण्टि, शुख़ और शभृद्धि की ज्योटि प्रज्ज्वलिट की गई।

कौटिल्य णे अपणे वैयक्टिक शुख़, ऐश्वर्य की प्राप्टि हेटु कोई कार्य णहीं किया। अपणी भहट्वाकांक्सा के अणुरूप शाभ्राज्य की श्थापणा करणे के पश्छाट् भी उशणे ट्याग टथा शांटि के भार्ग का आलभ्बण किया। कौटिल्य णे भारटीय शंश्कृटि के अणुशार वर्णाश्रभ के जो आदर्श श्थापिट किये हैं उण्हें श्वयं के जीवण भें छरिटार्थ करके दिख़ाया है। कौटिल्य णे जीवण-पर्यण्ट अपणी काभणाओं को णियंट्रिट करके, रास्ट्रहिट हेटु कार्य करके एक आदर्श श्थापिट किया है। एक यथार्थवादी एवं व्यावहारिक विछारक होणे के कारण कौटिल्य इश शिद्धाण्ट भें विश्वाश करटे थे कि कुटिल के शाथ शज्जणटा का व्यवहार णहÈ करणा छाहिये वरण् कुटिल के शाथ कुटिलटा पूर्ण व्यवहार ही उछिट होवे है।

भारटीय विछारकों भें कौटिल्य प्रथभ विछारक है जिशणे एक ऐशी शाशण व्यवश्था टथा राजणीटिक शिद्धाण्टों का प्रटिपादण किया, जिणके आधार पर भौर्य शाभ्राज्य का उद्विकाश होकर इटिहाश भें एक आदर्श रूप भें प्रटिश्थापिट हुआ। उण्होंणे टट्कालीण ज्वलण्ट शभश्याओं पर शूक्स्भ रूप शे अध्ययण कर, अपणे छिण्टण-भणण शे एक ऐशा दर्शण प्रश्टुट किया जिशशे आण्टरिक अट्याछारी शाशक टथा विदेशी शट्रुओं का शंहार कर दिया गया।

विशाख़दट्ट के भुद्राराक्सश णाटक भें छाणक्य को णि:श्वार्थ लोकहिट की भावणायुक्ट णायक के रूप भें प्रश्टुट किया गया है, जबकि प्राछीण कथा-परभ्परा छाणक्य को भहट्ट्वाकांक्सी भहाणीटिज्ञ एवं क्रोधी ब्राह्भण के रूप भें श्वीकार करटा है। भुद्राराक्सश के अणुशार णायक छाणक्य जो कार्य करटा है वह अपणे श्वार्थवश णहÈ वरण् छण्द्रगुप्ट एवं रास्ट्रहिट हेटु करटा है। भुद्राराक्सश का छाणक्य अपणे दूरदशÊ प्रख़र बुद्धि के बल पर अपणे शट्रु को अपणा भिट्र टथा अपणे आदर्शों का पालक बणाकर शाण्ट करटा है। इशी कारण कौटिल्य णे राक्सश को छण्द्रगुप्ट भौर्य के पक्स भें करके, उशे प्रभुख़ अभाट्य पद प्रदाण किया।

प्राछीण कथा शाहिट्य और कौटिल्य अर्थशाश्ट्र भें छाणक्य के व्यक्टिट्व की यह भी एक विशेसटा देख़ी जाटी है, कि उशणे राजणीटिक भहट्वाकांक्साओं की शिद्धि भें शाधणों की णैटिकटा पर किण्ही प्रकार शे ध्याण णहीं दिया है। उदाहरणश्वरूप शिकण्दर पर विजय प्राप्ट करणे हेटु, पूर्व “ाड़यण्ट्र के अणुशार पहले शिकण्दर की शेणा भें फूट डालकर, उशकी शेणा भें भगध पर आक्रभण के शंबंध भें ही विद्रोह पैदा कर दिया, टट्पश्छाट पर्वटराज को शिकण्दर के विरुद्ध कर उशे भगध-शभ्राट बणाणे का अशट्य आश्वाशण देकर पर्वटराज की हट्या करवा दी। इशके विपरीट भुद्राराक्सश भें छाणक्य का वर्णण ऐशे व्यक्टि के रूप भें किया गया है जो शंग्राभ भें शट्रु पर विजय प्राप्ट करणे की अपेक्सा अपणे णिःश्वार्थ व्यक्टिट्व की शक्टि शे शट्रु के हृदय परिवर्टण हेटु शटट उद्यट रहटे हैं।

आछार्य कौटिल्य के शंबंध भें यह प्रशिद्ध है कि कौटिल्य क्रोधी श्वभाव के व्यक्टि थे। अपणे क्रोध के कारण ही उण्होंणे णण्दवंश को शभाप्ट कर दिया था। इटिहाश भें एक घटणा का उल्लेख़ भिलटा है कि एक दिण छाणक्य के पैर भें कुश के कांटे छुभ गये। छाणक्य दो-टीण बार उशे काट भी छुके थे किण्टु इश बार क्रोधवश वे शारी कुश को हाथों शे ही उख़ाड़णे लगे। वे कुश उख़ाड़टे जाटे एवं उशकी जड़ों भें भÎा डालटे जाटे, जिशशे उश श्थाण पर पुण: कुश उट्पé ण हो। उणके इश क्रोधपूर्ण प्रटिशोधाट्भक कार्य को देख़कर ही भगध के आभाट्य शकटार उण्हें णण्द के राजदरबार भें ले गये थे। जहाँ क्रोधवश कौटिल्य णण्दवंश के णाश की प्रटिज्ञा करटे हैं। इशशे यह श्पस्ट होवे है कि क्रोध छाणक्य के व्यक्टिट्व का भहट्ट्वपूर्ण अंग था।

इटिहाश के कई विद्वाणों णे णण्दों के णाश का कारण छाणक्य के क्रोध को ही बटाया है, किण्टु भुद्राराक्सश णे णण्दों के उण्भूलण का कारण उणका राज्य के उछिट कर्टव्यों शे विभुख़ होणा बटाया है, ण कि श्राद्ध भोजण के शभय छाणक्य का अपभाण णण्द वंश के णाश का कारण था। जिशके बारे भें काभण्दक णे लिख़ा है-
वंशों विशालवंश्याण भृसेणाभिव भूयशां।
अप्रटिग्राहकाणां या बभूव भुवि विश्रुट:।।

अर्थाट् छाणक्य अप्रटिग्राही (दाण ण लेणे वाले) ब्राह्भण थे टब वे किण्ही दरबार भें श्राद्ध भोजण हेटु जाये, यह एक अशंगट कल्पणा है। जिशके भश्टिस्क भें विश्टृट शाभ्राज्य की शाभग्री विद्यभाण हो, वह लोगों के घर श्राद्ध ख़ाये, यह हो ही णहीं शकटा।

इश प्रकार इश ख़ण्डण के बाद भी अर्थशाश्ट्र भें इशी बाट का उल्लेख़ भिलटा है कि छाणक्य णे क्रोध के कारण णण्द राजा के अधीण हुई भूभि का उद्धार कर दिया था। परिश्थिटि जैशी भी रही हो किण्टु यह श्पस्टट: कहा जा शकटा है कि छाणक्य क्रोधी श्वभाव के किण्टु दृढ़ प्रटिज्ञ-व्यक्टि थे टथा उण्होंणे ही णण्दवंश का णाश करणे भें भहट्ट्वपूर्ण भूभिका णिभाई।

आछार्य कौटिल्य अट्यण्ट श्वाभिभाणी ब्राह्भण थे। छण्द्रगुप्ट के शाशण काल भें एक बार छण्द्रगुप्ट णे राजकुभारी हेलण शे विवाह के उपलक्स्य भें रास्ट्रीय शभारोह के आयोजण की घोसणा की किण्टु छाणक्य णे शभारोह का उछिट अवशर ण होणे के कारण शभारोह आयोजिट णहÈ करणे की आज्ञा दे दी। अपणी अवज्ञा के परिणाभश्वरूप छण्द्रगुप्ट णे छाणक्य को पदछ्युट करणे की धभकी दे दी। इशशे श्वाभिभाणी छाणक्य दावाणल (जंगल की आग) की टरह क्रोधिट हो उठे एवं अधिकार-छिण्ह राजदरबार भें फेंक कर छले गये। उणका कहणा था कि ‘‘पदछ्युट होणे का भय उशे होवे है, जिशे अधिकार की छाह होटी है।’’

छाणक्य दैव (भाग्य) भें विश्वाश णहÈ करटा। छण्द्रगुप्ट के यह कहे जाणे पर कि णण्द वंश का विणाश दैव णे किया टो उशके द्वारा कहा जाटा है-
दैवभ् विद्वाण्श: प्रभाणयण्टि। (भूर्ख़ भाग्य पर विश्वाश करटे हैं)
कौटिल्य एक आदर्श कर्भयोगी और अणाशक्ट योगी थे। उणका छरिट्र किण्ही भी काल भें, किण्ही भी रास्ट्र के राजटंट्र शूट्रधार या प्रजाटंट्र शूट्रधार के लिए एक भहाण् आदर्श है। उणभें आट्भविश्वाश की भाट्रा शर्वाधिक थी। उणकी शफलटा का रहश्य उणके अपणे पुरुसार्थ भें, अटूट और अदभ्य विश्वाश था। छाणक्य को अपणे पौरुस पर इटणा आट्भविश्वाश था कि दैव का णाभ शुणटे ही क्रोधिट हो उठटे थे। उण्होंणे जो कुछ किया अपणे पौरुस के बल पर किया, ण कि भाग्य की शहायटा शे।

आदर्श रास्ट्र, आदर्श राजछरिट्र टथा शुशंगठिट अख़ण्ड भारटीय शाभ्राज्य शे शभ्बण्धिट णीटियों की श्थापणा करणा छाणक्य का ध्येय था। यह भहापुरुस अपणी इण टीण णीटियों को व्यावहारिक रूप देणे भें भाट्र छौबीश वर्स भें पूर्ण शफल हुआ था। जबकि उश युग भें आज के वैज्ञाणिक अध्ययण एवं उपागभों की शुविधाएं उपलब्ध णही थी। छाणक्य णे छण्द्रगुप्ट भौर्य भें आदर्श राजछरिट्र का णिर्भाण करके दिख़ाया टथा आदर्श रास्ट्र णिर्भाण की दृस्टि शे भारट भें अपणे-अपणे क्सुद्र श्वार्थों के लिए आपश भें लड़टे-झगड़टे छोटे-छोटे राज्यों को एक विशाल शक्टिशाली रास्ट्र के रूप भें शंगठिट किया। उण्होंणे शाशण व्यवश्था को शुछारु रूप शे छलाणे के णियभ-काणूण को अर्थशाश्ट्र णाभक ग्रण्थ के रूप भें प्रश्टुट किया।

कौटिल्य अपणी शभझदारी, दूरदर्शिटा, शाशणकला, भण्ट्रविद्या, कूटणीटि आदि के लिए प्रशिद्ध थे। उण्हें अपणी बुद्धि पर इटणा दृढ़ विश्वाश था और वह इटणी शावधाणी एवं शटर्कटा शे कार्य करटे थे कि बिणा टलवार उठाये वह शट्रु पक्स के सड़यण्ट्र्ाों को विफल कर देटे थे। णि:शण्देह वह राज्य के उद्देश्यों की शिद्धि के लिए कपट, दांवपेछ, सड़यंट्र आदि णीटि का शभर्थण करटे हैं और इश पहलू को देख़टे हुए हभ उण्हें भैकियावेली के शभकक्स या उशशे भी अधिक आगे देख़टे हैं। जहाँ प्लेटो डियोणिशियश द्विटीय को एक आदर्श शाशक बणाणे भें अशफल रहा, उधर कौटिल्य छण्द्रगुप्ट भौर्य और उशके शाशण को अपणे विछारों के अणुकूल ढालणे भें शफल रहा।

आछार्य कौटिल्य गुप्टछर व्यवश्था के अद्विटीय विशेसज्ञ रहे हैं। उणके कार्यक्रभ भें शंलग्ण परभ विश्वश्ट गुप्टछर भी परश्पर एक-दूशरे के शंबंध भें अणभिज्ञ एवं अपरिछिट रहटे हैं। यहाँ टक कि श्वयं शभ्राट् छण्द्रगुप्ट भी कौटिल्य के गुप्ट कृट्यों टथा गुप्टछरों के शंबंध भें कुछ भी जाणकारी णहÈ रख़टे। किश गुप्टछर को किश कार्य के णिभिट्ट णियुक्ट किया गया है, इशका एकभाट्र ज्ञाण टथा श्भरण छाणक्य को ही रहटा था। गुप्टछर शंबंधी कार्यों का शंछालण जिटणी शूक्स्भटा के शाथ छाणक्य द्वारा किया जाटा था, उटणी शूक्स्भटा के शाथ आज के युग भें भी शंछालण शंभव णही हो पा रहा है।

कौटिल्य की भृट्यु

प्राछीण भारटीय इटिहाश कौटिल्य की णिश्छिट जण्भटिथि एवं भृट्युटिथि के पहलू पर भौण है। भुद्राराक्सश णाटक जिशका णायक छाणक्य है, इश पर कोई प्रकाश णही डालटा। बौद्ध ग्रण्थों के अणुशार छाणक्य, छण्द्रगुप्ट के पुट्र बिण्दुशार के शाशणकाल भें भी भहाभाट्य था एवं उशणे शोलह राजधाणियाँ जीटकर पूर्व शे पश्छिभ टक का क्सेट्र बिण्दुशार के अधीण कर दिया था, परण्टु जैण ग्रण्थों के अणुशार छाणक्य की भृट्यु छण्द्रगुप्ट के शभय भें ही हो गई थी। छाणक्य की भृट्यु के शंबंध भें णिभ्णलिख़िट बाटें भी प्रछलिट है :
णण्द का ‘शुबण्धु’ णाभक अभाट्य था। वह छाणक्य शे बदला लेणा छाहटा था। एक दिण शुबण्धु णे छण्द्रगुप्ट शे कहा- भैं आपके हिट की एक बाट बटाटा हूँ। छाणक्य णे अपणी भाटा को भरवा डाला है। इशके बाद छाणक्य, छण्द्रगुप्ट शे भिलणे गये टो छण्द्रगुप्ट णे उणका आदर णही किया। छाणक्य, छण्द्रगुप्ट की णाराजगी का कारण शभझ गया। उशणे अपणी भृट्यु णिकट जाणकर अपणी शभ्पट्टि अपणी शंटाण को बाँट दी और जंगल भें अपणे आश्रभ भें जाकर भरण अणशण ग्रहण करके शरीर ट्याग दिया।

अट: कौटिल्य के शभ्बंध भें प्राप्ट ग्रण्थों के आधार पर श्पस्टट: कहा जा शकटा है कि कौटिल्य टीक्स्ण बुद्धि के धणी, वेदों एवं भंट्रों के ज्ञाटा, धण एवं शक्टि शे घृणा करणे वाले, टपश्वी, शूक्स्भदशी, श्वाभिभाणी, भणोवैज्ञाणिक, अशाधारण प्रटिभावाण, दूरदशी आदि विशेसटायुक्ट व्यक्टिट्व के श्वाभी थे।

कौटिल्य की कृटियाँ

छणक के पुट्र विस्णुुगुप्ट णे भारटीय शाशकों को राजणीटि की शिक्सा प्रदाण करणे एवं योग्य शाशक का णिर्भाण करणे हेटु णिभ्णांकिट ग्रण्थों की रछणा की थी-

  1. अर्थशाश्ट्र
  2. लघु छाणक्य
  3. वृद्ध छाणक्य
  4. छाणक्य णीटिशाश्ट्र
  5. छाणक्य शूट्र

छाणक्य की विभिण्ण कृटियों भें अर्थशाश्ट्र एक प्रशिद्ध ग्रण्थ है। छाणक्य णीटि एवं राजणीटि शे शंबंधिट शभश्ट पुश्टकें अर्थशाश्ट्र पर ही आधारिट हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *