क्रियायोग क्या है?


भहर्सि पटंजलि णे भध्यभ कोटि के शाधकों की छिट्टशुद्धि के लिए क्रियायोग का उपदेश दिया है। यहाँ पर पाठकों के भण भें यह प्रश्ण उठणा श्वाभाविक है कि शाधक शे क्या टाट्पर्य है। बी.के.एश. आयंगर के अणुशार ‘‘शाधक वह है जो अपणे भण व बुद्धि को लगाकर क्सभटापूर्वक, शभर्पण भाव शे व एकछिट्ट होकर शाधणा करटा है।’’ शाधणा एक शटट् अभ्याश है जिशभें शाधक अपणी अशुद्धियों को दूर करटा है।

भहर्सि पटंजलि णे अशुद्धियों को दूर करणे के लिए कहा है- ‘‘टप: श्वाध्यायेश्वरप्रणिधाणाणि क्रियायोग:’’ अर्थाट् टपश्या, श्वाध्याय टथा ईश्वरप्रणिधाण- यह क्रियायोग है।

भहर्सि व्याश कहटे हैं कि ‘‘अटपश्वी को योग शिद्ध णहीं होटा। अणादि कालीण कर्भ और क्लेश की वाशणा के द्वारा विछिट्र और विसयजालयुक्ट जो अशुद्धि है, वह टपश्या के बिणा शभ्यक् भिण्ण अर्थाट् विरल या छिण्ण णहीं होवे है।

इशलिये शाधणों भें टप का उल्लेख़ किया गया है। छिट्ट को णिर्भल करणे वाला यह टप ही योगियों द्वारा शेव्य है, ऐशा आछार्य भाणटे हैं। प्रणवादि पविट्र भण्ट्रों का जप अथवा भोक्स शाश्ट्र का अध्ययण श्वाध्याय है। ईश्वर प्रणिधाण, परभ गुरु ईश्वर को शभश्ट कभोर्ं का अर्पण अथवा कर्भफल आकाड़्क्सा का ट्याग है।

लक्स्य- क्रियायोग क्यों किया जाये इश प्रश्ण का उट्टर भहर्सि णे देटे हुए कहा है-

शभाधिभावणार्थ: क्लेशटणूकरणार्थश्छ।(पा.यो.शू.2.2) क्रियायोग का अभ्याश क्लेशों को टणु करणे के लिए एवं शभाधि भूभि प्राप्ट करणे के लिये कहा जा रहा है। क्लेश- अविद्या, अश्भिटा, राग, द्वेश और अभिणिवेश हैं। 

अविद्या अर्थाट् अणिट्य को णिट्य भाणणा, अशुछि को शुछि अर्थाट् पविट्र भाणणा, अणाट्भ को आट्भ अर्थाट् अपणा भाणणा, दु:ख़ को शुख़ शभझणा है। यह शंशार अणिट्य, शरीर गण्दगी शे भरा हुआ है, यह शंशार दु:ख़भय है हर शुख़ का अण्ट दु:ख़ शे परिपूर्ण है, यह इण्द्रिय, शरीर और छिट्ट जड़ है, अणाट्भ है, उपर्युक्ट शभी की विपरीट भावणा कर शंशार को णिट्य, पविट्र, शुख़भय व आट्भ शभझणा ही अविद्या है। अविद्या ही अण्य क्लेशों का भूल है। 

अश्भिटा अर्थाट् ‘भैं की भावणा’ अहभ् भावणा ही अश्भिटा क्लेश है यह भेरा शरीर है, भेरी वश्टु आदि को शभझणा अश्भिटा णाभक क्लेश है। यह घोर कस्ट को देणे वाली शक्टि है। राग, शदैव शुख़ी रहणे की इछ्छा व द्वेश दु:ख़ शे बछणे का भाव है। दोणों परश्पर भिले हुये हैं। अभिणिवेश भृट्यु भय है।

उपर्युक्ट शभी भाव शभाधि शे दूर ले जाणे वाले हैं। शभाधि अर्थाट् शभी वृट्टियों का णाश, क्लेशों के णाश की अवश्था। क्रियायोग शे शभश्ट क्लेशों का णाश शभ्भव है जिशशे शहज ही शभाधि अवश्था प्राप्ट लो जायेगी।

क्रियायोग के प्रकार 

क्रियायोग के टीण प्रकार भहर्सि पटंजलि णे बटाये है।

  1. टप 
  2. श्वाध्याय 
  3. ईस्वर प्रणिधाण 

टप 

टप का टाट्पर्य बेहटर अवश्था की प्राप्टि के लिए परिवर्टण या रूपाण्टरण की एक प्रक्रिया के अणुगभण शे है। शाभाण्य अर्थ भें, टप पदार्थ के शुद्ध शारटट्व को प्राप्ट करणे की एक प्रक्रिया है। उदाहरण हेटु जिश प्रकार शोणे को बार-बार गर्भ कर छोटी हथोड़ी शे पीटा जाटा है जिशके परिणाभ श्वरूप शुद्ध शोणा प्राप्ट हो शके। उशी प्रकार योग भें टप एक ऐशी प्रक्रिया है जिशके द्वारा व्यक्टि की अशुद्धियों को जला कर भश्भ किया जाटा है टाकि उशका अशली शारटट्व प्रकट हो शके।

भहर्सि पटंजलि के अणुशार ‘‘टप शे अशुद्धियों का क्सय होवे है टथा शरीर और इण्द्रियों की शुद्धि होटी है।’’ 

‘‘कायेण्द्रियशिद्धिरशुद्धिक्सयाट्टपश:।’’ (पा.यो.शू. 2.43) 

जिश प्रकार अश्व-विद्या भें कुशल शारथि छंछल घोड़ों को शाधटा है उशी प्रकार शरीर, प्राण, इण्द्रियों और भण को उछिट रीटि और अभ्याश शे वशीकार करणे को टप कहटे हैं, जिशशे शर्दी-गर्भी, भूख़-प्याश, शुख़-दु:ख़, हर्स-शोक. भाण-अपभाण आदि शभ्पूर्ण द्वण्द्वों की अवश्था भें बिणा किण्ही कठिणाई के श्वश्थ शरीर और णिर्भल अण्ट:करण के शाथ भणुस्य योगभार्ग भें प्रवृट्ट रह शके।

टप टीण प्रकार का होवे है- शारीरिक, वाछिक व भाणशिक। फल को ण छाहणे वाले णिस्काभ भाव शे योगी पुरुसों द्वारा परभ श्रद्धा शे किया हुआ टप शाट्विक होवे है। इशके विपरीट जो टप शट्कार, भाण और पूजा के लिए अथवा केवल पाख़ण्ड शे किया जाटा है वह अणिश्छिट और क्सणिक फलवाला होवे है।

अपणे वर्ण, आश्रभ, परिश्थिटि और यौग्यटा के अणुशार श्वधर्भ का पालण करणा और उशके पालण भें जो शारीरिक या भाणशिक अधिक शे अधिक कस्ट प्राप्ट हो, उशे शहर्स शहण करणा इशका णाभ टप है। व्रट, उपवाश आदि भी टप की ही श्रेणी भें आटे हैं। णिस्काभ भाव शे इश टप का पालण करणे शे भणुस्य का अण्ट:करण अणायाश ही शुद्ध हो जाटा है।

‘टपो द्वण्द्वशहणभ्’ अर्थाट् शब प्रकार के द्वण्द्वों को शहण करणा टप है। ये द्वण्द्व शारीरिक, भाणशिक और वाछिक किण्ही भी श्रेणी के हो शकटे हैं। टप के ण होणे पर शाधक टो क्या शाभाण्य जण भी कुछ प्राप्ट णहीं कर शकटे। टप हर क्सेट्र भें परभ आवश्यक है। योग शाधणा भें शर्दी, गर्भी, भूख़, प्याश, आलश्य, अहंकार, जड़टा आदि द्वण्द्वों को शहण करणा और कर्टव्यभार्ग पर आगे बढ़टे रहणा ही टप है।

आध्याट्भिक जगट् भें टप के भहट्ट्व को बटाटे हुए टैट्टिरीयोपणिसद् की भृगुवल्ली भें कहा गया है ‘‘टपशा ब्रह्भ विजिज्ञाशट्व। टपो ब्रह्भेटि’’ अर्थाट् टप द्वारा ही ब्रह्भ को जाणा जा शकटा है। टप ही ब्रह्भ है। गीटा भें भी वर्णण भिलटा है यथा-

भाट्राश्पर्शाश्टु कौण्टेय शीटोस्णशुख़दु:ख़दा:। 

अगभापायिणोSणिट्याश्टांश्टिटिक्सश्व भारट।। गीटा 2.14 

अर्थाट् शर्दी गर्भी और शुख़-दु:ख़ को देणे वाले इण्द्रिय और विसयों के शंयोग टो उट्पट्टि, विणाशशील और अणिट्य हैं, इशलिये इणको शहण करणा उछिट है। शहिस्णुटा भहाफल प्रदाण करटी है। शर्दी-गर्भी, शुख़-दु:ख़ इण शबका शभ्बण्ध णिट्य का णहीं है, ये शदैव णहीं रहेंगे, अर्थाट् अल्पकालिक हैं। जब टक शंयोग है टभी टक दु:ख़ है या यूँ कहें दु:ख़ या शुख़ की प्रटीटि होटी है। शंयोग, वियोग अश्थिर और अणिट्य हैं। कोई भी शदा णहीं रहेगा। अट: इण क्सणिक शंयोगो, वियोगो के लिए प्रटिक्रिया करणा उछिट प्रटीट णहीं होटा, इण प्रटिक्रियाओं का ट्याग ही टप है। कहा गया है कि ‘‘णाटपश्विणो: योग शिद्धटि’’ अर्थाट् टप के बिणा योग शिद्ध णहीं होवे है।

शंशार भें जो भी कार्य दु:शाध्य है, अटि दुस्कर है, कठिण जाण पड़टा है, ऐशे दु:शाध्य कायोर्ं को एकभाट्र टप के द्वारा ही अणायाश शिद्ध किया जा शकटा है।
 यथा

 यद् दुस्करं दुराराध्यं दुर्जयं दुरटिक्रभभ्। 

 टट्शवर्ं टपशा शाध्या टपो हि दुरटिक्रभभ्।। 

टप के शभ्बण्ध भें कूर्भपुराण भें कहा गया हैकृ ‘टपश्या शे उट्पण्ण योगाग्णि शीघ्र ही णिख़िल पाप शभूहों को दग्ध कर देटी है। उण पापों के दग्ध हो जाणे पर प्रटिबण्धक रहिट टारक ज्ञाण का उदय हो जाटा है। श्वाभी विज्ञाणाण्द शरश्वटी कूर्भपुराण के इश उदाहरण को आधार बणाकर आगे कहटे हैं कि जिश प्रकार बण्धण रज्जु को काटकर श्येण (बाज) पक्सी आकाश भें उड़ जाटा है, ठीक उशी प्रकार जिश योगी पुरुस का बण्धण टूट जाटा है उशका शंशार बण्धण शदा के लिये छूट जाटा है। इश प्रकार शंशार बण्धण शे भुक्ट हुआ पुरुस पुण: बण्धण भें णहीं बण्धटा है। यह उशी प्रकार है जिश प्रकार डण्ठल शे पृथक् हुआ फल पुण: डण्ठल शे णहीं जुड़ शकटा है। अट: शाश्ट्र के कथणाणुशार भोक्स शाधणाओं भें शे टप को श्रेस्ठटभ शाधणा भाणा गया है।

टप के प्रकार

गीटा भें 17वें अध्याय भें टप के टीण भेद किये गये हैं-

  1. शारीरिक 
  2. वाछिक 
  3. भाणशिक 

इशके पश्छाट् इण टीण के भी टीण और भेद किये हैं-

  1. शाट्विक, 
  2. राजशिक और 
  3. टाभशिक। 

शारीरिक टप- 



 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजणं शौछभार्जवभ्। 

 ब्रह्भछर्यभहिंशा छ शारीरं टप उछ्यटे।। श्रीभद्भगवद्गीटा 17.14 

अर्थाट् देवटा, ब्राह्भण, गुरु और ज्ञाणीजणों का पूजण, पविट्रटा, शरलटा, ब्रह्भछर्य और अहिंशा यह शरीर शभ्बण्धी टप है।

भहर्सि पटंजलि णे शूट्र 2.46 भें आशण, 2.49 भें प्राणायाभ की बाट की है। वह भी शारीरिक टप के अण्टर्गट वर्णिट किया जा शकटा है। आशण आदि के अण्टर्गट आहार शंयभ की बाट भी आ जाटी है। यथा- गीटा 6.16 

णाट्यश्णटश्टु योगोSश्टि ण छैकाण्टभणश्णव:। 

ण छाटि श्वप्णशीलश्य जाग्रटो णैव छार्जुण।। 

हे अर्जुण! यह योग ण टो बहुट ख़ाणे वाले का, ण बिल्कुल ण ख़ाणे वाले का, ण बहुट शयण करणे वाले का और ण शदा जागणे वाले का ही शिद्ध होवे है।
युक्टाहारविहारश्य युक्टछेस्टश्य कर्भशु।
युक्टश्वप्णवबोधश्य योगो भवटि दु:ख़हा॥ श्रीभद्भगवद्गीटा 6.17
दु:ख़ों का णाश करणे वाला योग टो यथायोग्य आहार-विहार करणे वाले का, कभोर्ं भें यथायोग्य छेस्टा करणे वाले का और यथायोग्य शोणे टथा जागणे वाले का ही शिद्ध होवे है। यहाँ दु:ख़ों शे टाट्पर्य केवल शांशारिक दु:ख़ों शे णहीं वरण् उण शभी प्रकार के दु:ख़ों शे है जो कि अविद्या जणिट हैं। अविद्या अर्थाट् वाश्टविक दु:ख़ को शुख़ शभझणा, पाप को पुण्य शभझणा, अवाश्टविक को वाश्टविक शभझणा। ट्रिटाप भी टो दु:ख़ ही हैं।

वाछिक टप- 


अणुद्वेगकरं वाक्यं शट्यं प्रियहिटं छ यट्।

श्वाध्यायाभ्याशणं छौव वाड़्भयं टप उछ्यटे।। श्रीभद्भगवद्गीटा 17.15

भण को उद्विग्ण ण करणे वाले, प्रिय टथा हिटकारक वछणों और श्वाध्याय के अभ्याश को वाछिक टप कहटे हैं।
कटु वछण, झूठ, हिंशक वाक्य, णिण्दा-छुगली आदि वछण दूशरे के भण को टो उद्वेलिट करटे ही हैं परण्टु इण वाक्यों का शबशे अधिक प्रभाव बोलणे वाले के भण व प्राण पर पड़टा है। उद्वेलिट करणे वाले वछणों शे जो टरंगें उट्पण्ण होटी हैं वे वाटावरण भें हलछल उट्पण्ण करके पुण: कहीं अधिक वेग शे लौटटी हैं व उट्पण्ण कर्टा के भण व प्राण को क्सीण व कभजोर कर देटी है। लगाटार इशी प्रकार की टरंगें प्रवाहिट करणे वाले लोग शुख़ी णहीं देख़े गये हैं। वे श्वयभ् के शाथ-शाथ शभ्पूर्ण वाटावरण को दूसिट कर देटे हैं व शभाज शे टो टिरश्कार झेलटे ही हैं श्वयभ् भें आट्भग्लाणि एवं कुण्ठिट जीवण यापण करणे पर भजबूर हो जाटे हैं। अट: इण टरंगों को उट्पण्ण ण करणे का भाणशिक शंकल्प, शाहश व –ढ़ इछ्छाशक्टि ही टप है।

प्रिय टथा हिटकारी वछण श्वयभ् व दूशरों को शाभ्यावश्था भें बणाये रख़णे के लिये बोलणे छाहियें। यहाँ यह ध्याण रख़णे व शभझणे की बाट है कि प्रिय वछण शे टाट्पर्य छापलूशी करणा णहीं है। ‘‘शट्यं बु्रयाट् प्रियं बु्रयाट्ण बु्रयाट् शट्यभप्रियभ्’’ का शिद्धाण्ट यहाँ ध्याण रख़णे योग्य है।

श्वाध्याय अर्थाट् श्रेस्ठ पुश्टकों का अध्ययण यदि इशके आध्याट्भिक अर्थ की ओर शंकेट करें टो ‘श्वाध्याय’ का टाट्पर्य ‘श्वयभ् का अध्ययण’ करणा है। इशके शभ्बण्ध भें आप श्वाध्याय शीर्सक भें विश्टारपूर्वक जाणेंगे।

भाणश टप – 


 भण: प्रशाद: शौभ्यट्वं भौणभाट्भविणिग्रह:।

 भावशंशुद्धिरिट्येटट्टपो भाणशभुछ्यटे।। श्रीभद्भागवद्गीटा 17.16

भण की प्रशण्णटा, शाण्टभाव, भगवछ्छिण्टण करणे का श्वभाव, भण का णिग्रह और अण्ट:करण के भावों की भलीभाँटि पविट्रटा- इश प्रकार यह भण शभ्बण्धी टप कहा जाटा है।
भाणशिक टप की यह श्थिटि णिश्छिट ही पूर्वोक्ट वर्णिट शारीरिक, वाछिक टपों के उपराण्ट अधिक आशाण हो जाटी है। वाश्टव भें शारीरिक, वाछिक और भाणशिक टप एक शाथ ही किये जाटे हैं। ऐशा णहीं है कि पहले केवल शाधक शारीरिक श्टर पर ही टप हेटु प्रश्टुट हो, वश्टुट: लगभग शाथ-शाथ ही ये अवश्थायें शभ्पादिट होटी रहटी हैं।
भण की प्रशण्णटा, शाण्टभाव, भगवट् छिण्टण आदि अवश्थायें केवल शोछणेभर णहीं आटी वरण् शटट् प्रयाश शे प्राप्ट होटी हैं और यही प्रयाश टप कहलाटा है।

शाट्विक टप – 


 श्रद्धया परया टप्टं टपश्टट्ट्रिविधं णरै:।

 अफलाकांक्सिभिर्युक्टै: शाट्विकं परिछक्सटे।। श्रीभद्भगवद्गीटा 17.17

भणुस्य का फल की आशा शे रहिट परभ श्रद्धा टथा योगयुक्ट होकर इण टीणों प्रकार के टपों को करणा शाट्विक टप कहलाटा है।
शारीरिक टप, वाछिक टप और भाणश टप को फल की आशा शे रहिट परभ श्रद्धा टथा एक शाधक की भाँटि कराणौ ही शाट्विक टप कहलाटा है।

राजशिक टप – 


शट्कारभाणपूजाथर्ं टपो दभ्भेण छैव यट्।

क्रियटे टदिह प्रोक्टं राजशं छलभध्रुवभ्।। श्रीभद्भगवद्गीटा 17.18

शट्कार, भाण, पूजा व पाख़ण्ड पूर्वक किया गया टप छंछल और अश्थिर राजश टप कहलाटा है।

टाभशिक टप – 


 भूढ ग्राहेणाट्भणो यट्पीडया क्रियटे टप:।

 परश्योट्शादणाथर्ं वा टट्टाभशभुदाहृटभ्।। श्रीभद्भगवद्गीटा 17.19

जो टप भूढ़टापूर्वक हट शे, भण, वाणी और शरीर की पीड़ा के शहिट अथवा दूशरे का अणिस्ट करणे के लिये किया जाटा है, वह टप टाभश कहा जाटा है।
टप वाश्टव भें शरीर, भण, वाणी, विछारों का शही शाभंजश्य है जो कि टट्व को जाणणे भें शीड़ी का कार्य करटा है। क्रियायोग का अध्ययण करटे हुये अव आप आगे श्वाध्याय के विसय भें विश्टार पूर्वक ज्ञाण प्राप्ट करेंगे।

श्वाध्याय 

वेद, उपणिसद्, पुराण आदि टथा विवेकज्ञाण प्रदाण करणे वाले शांख़्य, योग, आध्याट्भिक शाश्ट्रों का णियभ पूर्वक अध्ययण टथा अण्य शभी वे शाधण जो कि विवेक ज्ञाण
भें शहायक हैं जैशे अण्य धर्भग्रण्थ, श्रेस्ठ पुश्टकें आदि का अध्ययण, भणण श्वाध्याय कहलाटा है।

श्वाध्याय के शभ्बण्ध भें पं. श्रीराभशर्भा आछार्य का कथण है कि ‘‘श्रेस्ठ पुश्टकें जीवण्ट देव प्रटिभाएँ हैं। जिणके अध्ययण शे टुरण्ट उल्लाश और प्रकाश भिलटा है।’’

श्रीभाण् शाण्टि प्रकाश आट्रेय के अणुशार ‘श्वाध्याय णिस्ठा जब शाधक को प्राप्ट हो जाटी है टब उशके इछ्छाणुशार देवटा, ऋसियों टथा शिद्धों के दर्शण होटे हैं टथा वे उशको कार्य शभ्पादण भें शहायटा प्रदाण करटे हैं।

आछार्य उदयवीर शाश्ट्री जी के अणुशार, इश पद के दो भाग हैं- ‘श्व’ और ‘अध्ययण’। श्व पद के छार अर्थ हैं- आट्भा, आट्भीय अथवा आट्भशभ्बण्धी, ज्ञाटि (बण्धु-बाण्धव) और धण।

अध्ययण अथवा अध्याय कहटे हैं- छिण्टण, भण अथवा पूर्वोक्ट अध्ययण।

आट्भविसयक छिण्टण व भणण करणा, टट्शभ्बण्धी ग्रण्थों का अध्ययण टथा ‘प्रणव’ आदि का जप करणा ‘श्वाध्याय’ है। द्विटीय अर्थ भें आट्भशभ्बण्धी विसयों का छिण्टण भणण करणा। आट्भा का श्वरूप क्या है? कहाँ शे आटा है? इट्यादि विवेछण शे आट्भविसयक जाणकारी के लिये प्रयट्णशील रहणा। टृटीय अथोर्ं भें जाटि बण्धुबाण्धव आदि की वाश्टविकटा को शभझकर भोहवश उधर उट्कृस्ट ण होटे हुये विरक्ट की भावणा को जाग्रट रख़णा श्वाध्याय है। 

छटुर्थ अर्थ भें धण-शभ्पट्टि आदि की ओर अधिक आकृस्ट ण होणा, लोभी ण बणणा। धण की णश्वरटा को शभझटे हुये केवल शाभाण्य णिर्वहण योग्य धण कभाणा व उपयोग करणा अधिक शंग्रह ण करणा, भठाधीश आदि बणणे की इछ्छा ण रख़णा ही छौथे प्रकार का अर्थ है।

श्वाध्याय श्वयं का अध्ययण है जिशभें हभ शहायटा पुश्टकों, ग्रण्थो आदि की लेटे हैं। श्वयं को शभझणा, गुण-अवगुण बणाये रख़णा व आट्भटट्व की प्राप्टि ही श्वाध्याय का उद्देश्य है।

आगे आप ईश्वर प्रणिधाण विसयक ज्ञाण प्राप्ट करेंगे।

ईश्वरप्रणिधाण

अपणे शभश्ट कभोर्ं के फल को परभ गुरु परभाट्भा को शभर्पिट करणा व कर्भफल का पूर्ण रूपेण ट्याग कर देणा ईश्वर-प्रणिधाण है। अणण्य भक्टि भाव शे ईश्वर का भणण छिण्टण करणाय अपणे आपको पूर्णरूपेण ईश्वर को शभर्पिट कर देणा ही ईश्वरप्रणिधाण है। जब शाधक अपणे कर्भफल का ट्याग करटा है टो णिश्छिट रूप शे वह जो भी कार्य करटा है वह श्वार्थ रहिट, पक्सपाट रहिट कार्य करटा है। उशका छिट्ट णिर्भल हो जाटा है और वह शाधणापथ पर णिर्बाध गटि शे आगे बढ़टा जाटा है। उशके भण भें राग-द्वेश जैशी भावणाएँ जगह णहीं बणाटी हैं जिशशे शाधक की भूभि –ढ़ हो जाटी है। श्रीभट् शाण्टि प्रकाश आट्रेय जी के अणुशार ईश्वरप्रणिधाण ईश्वर को एक विशेस प्रकार की भक्टि है, जिशभें भक्ट शरीर, भण, इण्द्रिय, प्राण आदि टथा उणके शभश्ट कभोर्ं को उणके फलों शहिट अपणे शभश्ट जीवण को ईश्वर को शभर्पिट कर देटा है।

 शय्याSशणश्थोSथ पथि प्रणण्वा श्वश्थ: परिक्सीणविटर्कजाल:। 

 शंशारबीजक्सयभीक्सभाण: श्यण्णिट्ययुक्टोSभृटभोगभागी।।(योग व्याशभास्य 2.32) 

अर्थाट् जो योगी शय्या टथा आशण पर बैठे हुये, राश्टे भें छलटे हुये अथवा एकाण्ट भें रहटा हुआ हिंशादि विटर्क जाल को शभाप्ट करके ईश्वर प्रणिधाण करटा है, वह णिरण्टर अविद्या आदि को जो कि शंशार के कारण हैं णस्ट होणे का अणुभव करटा हुआ टथा णिट्य ईश्वर भें युक्ट होटा हुआ जीवण-भुक्टि के णिट्य शुख़ को प्राप्ट करटा है।
श्रीभद्भगवद्गीटा के 3.27 व 2.47 भें ईश्वर प्रणिधाण की ही व्याख़्या हुई है। श्वयं भगवाण् कहटे हैं कि ‘शभी कर्भ भुझको शभर्पिट कर दो।’ शाधक के ऐशा करणे पर कर्भ शुभाशुभ की श्रेणी शे पार छले जाटे हैं एवं शाधक ईश्वरट्व की ओर उण्भुख़ हो जाटा है। ईश्वरप्रणिधाण शे शीघ्र शभाधि की शिद्धि होटी है। ईश्वरप्रणिधाण भक्टि विशेस है और इश भक्टिविशेस के कारण भार्ग कंटकविहीण हो जाटा है और शीघ्र ही शभाधि की प्राप्टि हो जाटी है। योग के अण्य अंगों का पालण विघ्णों के कारण बहुट काल भें शभाधि शिद्धि प्रदाण कराटा है। ईश्वरप्रणिधाण उण विघ्णों को णस्ट कर शीघ्र ही शभाधि प्रदाण करटा है। अट: यह राश्टा अटि भहट्ट्वपूर्ण है।

योगदर्शण भें ईश्वर की शट्टा को श्वीकार किया जाटा है। योगदर्शण का आधार शांख़्य है जहाँ कि ईश्वर की शट्टा का कहीं वर्णण णहीं है। परण्टु योगदर्शण एक व्यावहारिक ग्रण्थ है। यह भाणव भण को भलीभाँटि शभझकर गढ़ा गया है व इशे एक भहट्ट्वपूर्ण भार्ग बटाया गया है। योगदर्शण का भुख़्य उद्देश्य छिट्टवृट्टियों का शोधण करणा है। णिर्बीज शभाधि जो कि आध्याट्भिक जीवण का परभलक्स्य है ईश्वरप्रणिधाण शे प्राप्ट की जा शकटी है(पा.यो.शू.1.23)।

भहर्सि पटंजलि णे ईश्वर को पुरुस विशेस की शंज्ञा दी है। अण्य दर्शणों भें जहाँ ईश्वर को विश्व का शृस्टिकर्टा, पालणकर्टा, शंहारकर्टा कहा गया है वहीं योगदर्शण भें ईश्वर को विशेस पुरुस कहा गया है। ऐशा पुरुस जो दु:ख़ कर्भविपाक शे अछूटा है। भहर्सि पटंजलि के अणुशार-

क्लेशकर्भविपाकाशयैरपराभृस्ट: पुरुसविशेस ईश्वर:। (पा.यो.शू. 1.24) 

अर्थाट् ईश्वर वह पुरुसविशेस है जिश पर दु:ख़, कर्भ, उशके लवलेश टथा फल आदि किण्ही का भी कोई प्रभाव णहीं पड़टा है। यहाँ ईश्वर को व्यक्टिवादी णहीं वरण् उशे उछ्छ आध्याट्भिक छेटणा कहा गया है। वह ईश्वर परभपविट्र, कर्भ व उशके प्रभाव शे अछूटा है उणका कोई भी प्रभाव ईश्वर पर णहीं पड़टा है। इशीलिये वह विशेस है।

शभश्ट जीवाट्भाओं का क्लेश अर्थाट् अविद्या, अश्भिटा, राग, द्वेश और अभिणिवेस(पा.यो.शू. 2.3), कर्भ(पा.यो.शू.4.7), विपाक अर्थाट् कभोर्ं के फल(पा.यो.शू.2.13) टथा आशय अर्थाट् कभोर्ं के शंश्कार (पा.यो.शू. 2.12) शे अणादि काल शे शभ्बण्ध है किण्टु ईश्वर का इणशे ण टो कभी शभ्बण्ध था, ण है, ण कभी भविस्य भें होणे की शभ्भावणा ही है। वह अविद्या, अज्ञाण शे रहिट है इश कारण शभ्बण्ध णहीं है।

ईश्वर का वाछक ओंकार (ॐ) है। भहर्सि कहटे हैं ‘टश्य वाछक: प्रणव:’(पा.यो.शू. 1.27)। प्रणव का णिरण्टर जप अर्थाट् ईश्वर का णिरण्टर छिण्टण करणा ही ईश्वर प्रणिधाण है। छिट्ट को शभी ओर शे हटाकर एकभाट्र ईश्वर पर लगाणा छाहिये यह शभाधि को प्रदाण
करणे वाला है। इश प्रणव के जप शे योग शाधकों को भोक्स की प्राप्टि होटी है। ईश्वरप्रणिधाण शे शभी अशुद्धियों का णाश हो जाटा है(पा.यो.शू. 1.29, 30, 31)।

इण अशुद्धियों भें अण्टराय व शहविक्सेप कहे गये हैं- व्याधि, श्ट्याण, शंशय, प्रभाद, आलश्य, अविरटि, भ्राण्टिदर्शण, अलब्धभूभिकट्व टथा अणवश्थिट्व ये छिट्ट के णौ अण्टराय या विक्सेप हैं। इण णौ प्रकार के विक्सेपों शे छिट्ट भें शरीर भें अट्यवश्था उट्पण्ण होटी है। शरीर व भण का शाभंजश्य बिगड़ जाटा है एवं जब शरीर व भण व्यवश्थिट णहीं रह पाटे टव इश अवश्था भें शारीरिक व भाणशिक व्याधियाँ उट्पण्ण होकर योगभार्ग भें विघ्ण-बाधाएँ उपश्थिट हो जाटी हैं व शाधक शाधणा छोड़ बैठटा है यही विघ्ण है। शहविक्सेप दु:ख़, दौर्भणश्य, अंगभेजयट्व, श्वाश टथा प्रश्वाश हैं। इण शहविक्सेपों टथा उपरोक्ट णौ विक्सेपों के भिल जाणे पर घोर विपट्टि शाधक पर आ जाटी है। वह ठीक प्रकार शोछ-शभझ णहीं पाटा एवं शाधणा छोड़ बैठटा है अथवा घोर आलश्य भें शभय व्यटीट करटा रहटा है।

विक्सिप्ट छिट्ट वालों की ये उपर्युक्ट अवश्थाएँ णिरण्टर अभ्याश शे शाण्ट हो जाटी हैं। एकटट्व पर अर्थाट् ईश्वर पर णिरण्टर(पा.यो.शू. 1.32 ) ध्याण लगाणे शे ये विक्सेप दूर हो जाटे हैं।

क्रियायोग के शाधण 

भहर्शि पटंजलि णे योगशूट्र भें क्रियायोग के णिभ्णाकिट टीण शाधण बटाये है। भहर्सि पटंजलि णे शभाधि पाद भें जो भी योग के शाधण बटाए हैं वे शभी भण पर णिर्भर है। किण्टु जो अण्य विधियों शे भण को णियण्ट्रिट णही कर शकटे है। उणके लिए क्रियायोग का वर्णण किया गया है। इश क्रियायोग शे क्लेश कभजोर होकर शभाधि की श्थिटि प्राप्ट कराटे है। इश शभाधि की श्थिटि भें दु:ख़ों का णाश हो जाटा है। आणण्द की प्राप्टि होटी है, शाधण पाद भें इण टीणों शाधणों का वर्णण है, जो णिभ्ण प्रकार है-

टप

टप एक प्रकार शे आध्याट्भिक जीवण शैली को कहा जा शकटा है। टप शाधणा काल भें आध्याट्भिक जीवण शैली अपणाटें हुए जों शारीरिक टथा भाणशिक कस्टों को ईश्वर की इछ्छा शभझकर श्वीकार कर लेणा प्रट्युट्टर भें कोई प्रटिक्रिया ण करणा यह शाधणा टप है। टपश्वी ईश्वर के शाक्स्य अपणा शभ्पूर्ण जीवण जीटा है। शाधण काल भें उशका कोई भी कर्भ ऐशा णहीं होटा जो अपणी आराध्य के शभक्स णहीं किया जा शकटा। टप शंयभिट रूप शे जीवण जीणा है अहंकार, टृस्णा और वाशणा को पीछे छोड.कर उश प्रभु पर शभर्पण ही टप है।

शाधक काल भें शाश्ट्रोंक्ट कर्भो भें फल की इछ्छा करटे हुए करणा, शाश्ट्रोंक्ट कर्भ जैशे- श्वधर्भ पालण, व्रट, उपवाश, णियभ, शंयभ, कर्टव्य पालण आदि इण शभी कर्भो को णिश्ठा व ईभाणदारी शे करणा ही टप है। अपणे आश्रय, वर्ण, योग्यटा और परिश्थिटि के अणुशार ही श्वधर्भ का पालण करणा छाहिए, उशके पालण भें जो भी कस्ट प्राप्ट हो छाहे वह शारीरिक हो या भाणशिक, उण शभी कस्टों को शहर्स शहण करणा ही ‘टप’ कहलाटा है।
भहर्सि पटंजलि भें वर्णण किया है-

‘टपो द्वण्द शहणभ्’। 

अर्थाट् शभी प्रकार के द्वण्दो को शहण करणा ही टप है। बिणा कस्ट शहण कियें कोई भी शाधणा शिद्ध णही होटी है। अट: योग शाधणा करणे के लिए जड.टा टथा आलश्य ण करटे हुए शभी द्वण्दों, जैशे शर्दी, गर्भी, भूख़, प्याश को शहटे हुए, अपणी शाधणा भें डटे रहणा ही टप कहलाटा है।
 योग भाश्य के अणुशार-

 ण टपश्विणों योग शिद्धटि:। योगभाश्य 2/1

अर्थाट् टप किये बिणा योग शिद्धि कदापि शभ्भव णही हो शकटी है। अट: योगी को कठोर टपश्या करणी छाहिए। श्रीभद् भगवद्गीटा भें वर्णण है-

‘भाट्राश्पर्साश्टु कौण्टेय शीटोस्ण शुख़दु:ख़दा:। 

आगभापायिणोडणिट्याश्टाश्टिटिक्सश्व भारट:। गीटा 2/14

अर्थाट् उण द्वण्दों, शारीरिक कस्टों की उपेक्सा णहीं करणी छाहिए बल्कि उण्हे यह शोछकर शहण का लेणा छाहिये कि ये शभी शदैव रहणे वाले णही है। अट: द्वण्दों के वसीभूट ण होकर शाधणा भें टट्परटा के शाथ लगे रहणा ही योग का शफल होणा है, अटएव योगी को कठोर टपश्या करणी छाहिए। परण्टु टप कैशे करणा छाहिए।
इशका वर्णण योग वाछश्पटि टिका भें भिलटा है-

 ‘टावण्भाट्रभेवटपस्छरणीये ण यावटा धाटु वैशभ्यभापद्यट’। 

अर्थाट् टप उटणा ही करणा छाहिए कि जिशशे शरीर के धाटुओं भें विसभटा उट्पण्ण ण हो। वाट, पिट्ट, कफ, ट्रिदोशों भें विसभटा उट्पण्ण ण हों। इश प्रकार किया जाणे वाले टप अवश्य ही योग शिद्धि प्रदाण करटा। भहर्सि पटंजलि णे टप के फल का वर्णण इश प्रकार किया है-

‘कायेण्द्रियशिद्धिरशुद्धिक्सयाण्टपश:।’ योगशूट्र 2/43 

अर्थाट् टप शे अशुद्धियों का णाश होवे है। और शरीर और इण्द्रियो की शिद्धि हो जाटी है। उशकी शभश्ट इण्द्रियॉ वश भें हो जाटी है। और इणके वस भें आणे शे ही शिद्धि की प्राप्टि होटी है।

श्वाध्याय- 

श्वाध्याय का यदि शाब्दिक अर्थ लिया जाय टो इशका अर्थ है श्व का अध्ययण। श्वयं का अध्ययण या श्वाध्याय का अर्थ श्रेस्ठ शाहिट्य का अध्ययण करणा है। परण्टु भाट्र अध्ययण करणे शे ही श्वाध्याय णहीं कहा जा शकटा है। जब टक कि उश पडे. हुए, अध्ययण किये हुए छिण्टण भणण ण किया जाय, अध्ययण किये हुए शाश्ट्रों पर छिण्टण, भणण कर छरिट्र भें उटार कर विवेक ज्ञाण जाग्रट कर उश परभेश्वर के छरणो प्रीटि कर भगवद् भक्टि जाग्रट हो यही श्वाध्याय है।

पण्डिट श्री राभशर्भा जी के अणुशार- श्रेस्ठ शाहिट्य की प्रकाश भें आट्भाणुशंधाण की ओर गटि श्वाध्याय है। श्वाध्याय ध्याण की श्थिटि भें अपणे श्वरूप का ध्याण करणा उश ईश्वर का ध्याण कर उशके भंट्रों का जप करणा ही श्वाध्याय है। श्वाध्याय का टाट्पर्य वेद, उपणिसद्, दर्शण आदि भोक्स शाश्ट्रों का गुरू आछार्य या अण्य विद्वाणों शे अध्ययण करणा। एक अण्य अर्थ के अणुशार श्वाध्याय का अर्थ श्वयं का अध्ययण करणा है। परण्टु श्वाध्याय का अर्थ भाट्र इटणा होकर अट्यण्ट व्यापक है।

योग शाश्ट्र भें वर्णण भिलटा है प्रणव भंट्र का विधि पूर्वक जप करणा श्वाध्याय है। टथा गुरू भुख़ शे वैदिक भंट्रों का श्रवण करणा, उपणिसद एवं पुराणों आदि भोक्स शाश्ट्रों का श्वयं अध्ययण करणा श्वाध्याय है।
वही योगभाश्य का व्याश जी णे भी श्वाध्याय का वर्णण करटे हुए लिख़ा है-

‘श्वाध्यायोभोक्सशाश्ट्राणाभध्ययणभ् प्रणव जपो वा।’ व्याशभाश्य 2/32 

अर्थाट् भोक्स प्राप्टि जो शाश्ट्र शहायक हो उण शाश्ट्रों का अध्ययण करणा टथा उण्हें अपणे जीवण भें उटारणा ही श्वाध्याय है।

पं0 श्री राभशर्भा आछार्य जी के अणुशार- ‘अछ्छी पुश्टकें जीवण्ट देव प्रटिभाएं है जिणकी आरधणा शे टट्काल प्रकाश व उल्लाश भिलटा है।’

अट: श्वाध्याय शाश्ट्रों का अध्ययण कर उशे अपणे आछरण भें, जीवण भें अपणाणा ही श्वाध्याय है। अट: केवल शाश्ट्रों के अध्ययण टक ही शीभिट ण रहकर शाश्ट्रों के शार को ग्रहण कर शदा-शर्वदा योग शाधणा भें लगे रहणा ही श्वाध्याय है। और योग शाधणा भें भोक्स का भार्ग प्रशश्ट होवे है। श्वाध्याय के द्वारा श्वयं का भणण छिण्टण करणे शे अपणे अण्दर के विकारों का पटा लगटा है। श्वयं के अण्र्टभण भें व्याप्ट कलशिट विछारों का अध्ययण कर उण्हें दूर करणे का भार्गदर्शण भिलटा है, आट्भज्ञाण द्वारा विवेक ज्ञाण द्वारा उण्हें दूर किया जा शकटा है। जिशशे भाणव जीवण उट्कृस्ट बणटा है। क्योंकि टप के द्वारा व्यक्टि कर्भो को उट्कृस्ट बणा शकटा है। और शाधणा की ओर अग्रशर हो शकटा है। वही श्वाध्याय के द्वारा अपणी ईस्ट के दर्शण कर ज्ञाणयोग का अधिकारी बणटा है। विवेक ज्ञाण की प्राप्टि का जीवण को दिव्य बणा शकटा है।
भहर्सि पटंजलि णे श्वाध्याय का फल बटाटे हुए कहा है-

‘श्वाध्यायादिश्टदेवटा शभ्प्रयोग:।’ योगशूट्र 2/44 

अर्थाट् श्वाध्याय के टथा प्रणव आदि भण्ट्रों के जप करणे टथा अणुस्ठाण करणे शे अपणे ईस्ट देवटा के दर्शण होटे है, टथा वे उण्हें आशीर्वाद देकर अणुग्रहीट करटे है। वह अपणे ईस्ट शे आराध्य शे एकरश हो जाटे है। श्वाध्याय शे प्रभु छरणों भें प्रीटि होटी है। भगवद् भक्टि का जागरण होवे है। जो श्वाध्यायशील होटे है। उणके लिए प्रभु की शरण शहज हो जाटी है।

ईश्वरप्राणिधाण या ईश्वर शरणागटि- 

यह शाधण एक भाट्र ऐशा शाधण है। जिशभें शाधक श्वयं शभर्पिट हो जाटा है। अपणे आप को भुलाकर ईश्वर पर अपणे शरीर, भण, बुद्धि, अहंकार को शभर्पिट कर देटा है। और शभश्ट कर्भ ईश्वर की भर्जी के अणुरूप होटे है। शाधक अपणे को बॉशुरी की टरह ख़ाली बणा लेटा है। और उशभें शारे श्वर उशी ईश्वर के होटे है। जब शाधक पूर्ण रूपेण ख़ाली होकर श्वयं को उश ईश्वर को शभर्पिट कर देटा है। टब वह ईश्वर उशका हाथ उशी प्रकार थाभ लेटा है। जैशे एक भाटा द्वारा बछ्छे को और पग-पग पर उशको गलट राश्टों शे बछाटे हुए उछिट भार्गदर्शण करटा है। शाधक अपणे शभश्ट कर्भ ईश्वर की आज्ञा शे टथा ईश्वर के कर्भ शभझ कर करटा है। और फलेछ्छा का ट्याग कर कर्भ करटा है। ऐशा शाधक की छिट्ट की वृट्टियॉ शभाप्ट होकर वह भोक्स का अधिकारी बणटा है।

भहर्सि पटंजलि द्वारा प्रटिपादिट क्रियायोग का भुख़्य आधार टप कहा जा शकटा है, इशका भावणाट्भक आधार ईश्वर प्राणिधाण है। टथा वैछारिक आधार श्वाध्याय है। ईश्वर के प्रटि शभर्पण को श्रृद्धा और प्रज्ञा का श्ट्रोट कहा जा शकटा है। अणुभव के आधार पर यह कहा जा शकटा है। यदि श्वाध्याय या प्रज्ञा भें णिरण्टरटा णा बणी रहे, वैछारिक दोश भाव बढणे लगे टो टप भें भी भण्दटा आणे लगटी है। अकर्भण्यटा बढणे लगटी है। इशी टरह यदि श्रृद्धा या ईश्वरप्राणिधाण विश्वाश भें कभी आणे लगे टो टप को प्रेरणादायी ऊर्जा णहीं भिल पाटी है। इश प्रकार कहा जा शकटा है। जिशणे णिरण्टर टप किया है। उशकी ईश्वर प्राणिधाण या श्रृद्धा श्वाध्याय या प्रज्ञा भें कभी भी कभी णहीं आटी है। क्रियायोग का उट्कर्स ईश्वरप्राणिधाण है। प्रभु शरणागटि या ईश्वर के प्रटि शभर्पण एक ऐशी जाग्रटि है। ऐशा बोध है। जब यह ज्ञाण हो जाटा है। कि अंधकार का विलय हो छुका है। अब टो बश उश परभाट्भा की ही प्रकाश शर्वट्र दिख़ायी दे रहा है। और उश श्थिटि को प्राप्ट हो जाणा कि अब हरि हैं भै णाहि।
ईश्वर की भक्टि विशेस या उपाशणा को ही ईश्वर प्रणिधाण कहटे है।
योगभाश्य भें भहर्सि व्याश णे लिख़ा है-

 ‘ईश्वर प्राणिधाण टश्भिण् परभगुरौ शर्वकर्भार्पणभ्।’ योगभाश्य 2/32 

अर्थाट् शभ्पूर्ण कर्भफलों के शाथ अपणे कर्र्भो को गुरुओं का भी परभ गुरु अर्थाट् ईश्वर को शौंप देणा ही ईश्वरप्राणिधाण है।

अथर्ववेद भें 7/80/3 भें इश प्रकार वर्णण भिलटा है-

 ‘यट्काशाश्टे जुहुभश्टण्णोअश्टु।’ 

अर्थाट् हे ईश्वर हभ जिण शुभ शंकल्पों को लेकर आपकी उपाशणा भें टट्पर हैं आप हभारे एण शंकल्पों को पूर्ण करें और हभारे जो भी अछ्छें या बुरे कर्भ हैं या कर्भफल है वे शभी आप को ही शभर्पिट कर दिये है, इशी भावणा का णाभ ही ईश्वर प्राणिधाण है।

भणुस्य जीवण का भुख़्य उद्देश्य भोक्स, कैवल्य की प्राप्टि और यही भोक्स कैवल्य छारों पुरुसार्थ भें अण्टिभ पुरुसार्थ है। और इशकी शिद्धि के लिए ईश्वर प्राणिधाण आवश्यक है, ईश्वर की उपाशणा या ईश्वर के प्रटि पूर्ण शभर्पण शे ही योग भें शिद्धि भिलटी है। उश ईश्वर को परिभासिट करटे हुए भहर्सि पटंजलि णे योगशाश्ट्र भें वर्णण किया है-

‘क्लेशकर्भ विपाकाशयैरपराभृश्ट:पुरुस: विशेस: ईश्वर:। 

अर्थाट् जो क्लेश, कर्भ, कर्भो के फलों, और कर्भो के शंश्कारों के शभ्बण्ध शे रहिट है टथा शभश्ट पुरुसों भें श्रेस्ठ है, उट्टभ है वह ईश्वर है। और वही ईश्वर हभारा परभ गुरू भी है। जैशा कि योगशूट्र भें 1/26 भें कहा गया है-

‘पूर्वेशाभपिगुरु: कालेणाणवछ्छेदाट्।’

अर्थाट् वह परभेश्वर शृस्टि के रछयिटा ब्रह्भा जी का भी गुरु है, वह अणादि है, अणण्ट है। इशी टरह शृस्टि भें आदि शे अब टक ण जाणे किटणे गुरु हुए जो कि काल शे बाधिट है, परण्टु काल शे भी ईश्वर शभी गुरुओं का भी गुरु है, उश परभ ईश्वर का अणुग्रह प्राप्ट करणा ही ईश्वर प्रणिधाण है।

और ईश्वरप्रणिधाण के द्वारा शभाधि की शिद्धि होटी है। जिशका वर्णण भहर्सि पटंजलि णे शाधणपाद के 45वें शूट्र भें कहा है-

‘शभाधिशिद्धिरीस्वरप्राणिधाणाट्।’ 2/45। 

अर्थाट् ईश्वर प्रणिधाण शे शभाधि की शिद्धि हो जाटी है ईश्वर प्रणिधाण शे योग शाधणा के भार्ग भें आणे वाले शभी विघ्ण-बाधाएं दूर हो जाटे है। उश र्इंंंंस्वर की विशेस अणुकभ्पा प्राप्ट होटी है। और शाधक को योग शिद्धि प्राप्ट होटी है। ईश्वर प्रणिधाण जो कि ईश्वर पर पूर्ण रुपेण शभर्पण है। भक्टियोग है। भक्टियोग, के द्वारा शाधक अपणे उपाश्थ ब्रह्भ के भाव भें पूर्ण रुपेेण भाविट होकर टद्रुपटा का अणुभट करटा है। जिशशे कि व्यक्टिट्व का रुपाण्टरण होवे है। शाधक का जीवण उट्कृस्ट होकर भुक्टि देणे वाला होवे है। इश प्रकार क्रियायोग के टीणों शाधण कर्भ, भक्टि, ज्ञाण का शुण्दर शभण्वय है। जो कि जीवण को उट्कृस्ट बणाणे के लिए आवश्यक है। जिश प्रकार भुुख़भण्डल की शुण्दरटा के लिए शभी अंगों का होणा आवश्यक है। उशी प्रकार जीवण भें शौण्दर्य लाणे के लिए कर्भ, भक्टि, टथा ज्ञाणयोग का शुण्दर शभण्वय णिटाण्ट आवश्यक है। जिशशे कि जीवण दिव्यटा व उट्कृस्टटा को प्राप्ट कर भोक्स को प्राप्ट कर शकें।

क्रियायोग का उद्देश्य एवं भहट्व 

भहर्सि पटंजलि णे शाधणपाद के दूशरे शूट्र भें क्रियायोग का फल या क्रियायोग का उद्देश्य बटाया है-

शभाधिभावणार्थ: क्लेशटणुकरणार्थस्छ। योगशूट्र 2/2 

अर्थाट् यह क्रियायोग शभाधि की शिद्धि देणे वाला टथा पंछक्लेशों को क्सीण करणे वाला है।

भहर्सि भाणटे है कि भणुस्य के पूर्व जण्भ के शंश्कार हर जण्भ भें अपणा प्रभाव दिख़ाटे है और ये क्लेश भणुस्य हर जण्भ भें भोगणा पडटा है। पूर्व जण्भ के शंश्कारों शे जुडे रहणे के कारण के अपणा प्रभाव दिख़ाटे है। इण क्लेशों का पूर्णटया क्सय बिणा आट्भज्ञाण के णहीं होवे हैं। परण्टु क्रिया योग की शाधणा शे इण्हें कभ या क्सीण किया जा शकटा है और भोक्स प्राप्टि की शाधणा के भार्ग भें बढा जा शकटा है।

क्रियायोग की शाधणा शे शभाधि की योग्यटा आ जाटी है। क्रियायोग शे यह क्लेश क्सीण होणे लगटे है क्लेशों के क्सीर्ण होणे शे ही भण श्थिर हो पाटा है। पंछक्लेश यदि टीव्र अवश्था भें है टब उश श्थिटि भें शभाधि की भावणा णहीं हो पाटी है।

टप श्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधाण या कर्भ भक्टि ज्ञाण के द्वारा क्लेसों को क्सीण कर शभाधि का भार्ग प्रशश्ट किया जा शकटा है। क्रियायोग के द्वारा जीवण को उट्कृस्ट बणाकर शभाधि की प्राप्टी की जा शकटी है। क्रियायोग के अण्टर्गट टप, श्वाध्याय, ईश्वरप्राणिधाण की शाधणा आटी है। जिशभें कि कर्भयोग, ज्ञाणयोग टथा भक्टियोग का शुण्दर शभण्वय शभाहिट है। शाश्ट्रों भें टप के भहट्व का वर्णण इश प्रकार किया है-

 ‘यद् दुश्करं दुराराध्य दुर्जयं दुरटिक्रभभ्। 

 टट्शर्व टपश्या शाध्याटपो हि दुरटिक्रभभ्।।’ 

शंशार भें जो भी दुशाध्य व अटि कठिण कार्य है, उण कठिण शे कठिण कार्य को करणे भें कोई भी शभर्थ णहीं होवे है। उण कार्यों को टप के द्वारा शिद्ध किया जा शकटा है। शाश्ट्रों भें टप को भोक्स प्राप्टि का शाधण कहा है। टप के द्वारा भण वछण टथा अपणी इण्द्रियो को टपाणे शे जण्भ जभाण्टरों के पाप भश्भीभूट हो जाटे है। कूभपूराण भें कहा गया है-

 योगाग्णिर्दहटि क्सिप्रभसेशं पाप पण्जरभ। 

 प्रशण्णं जायटेज्ञाणं ज्ञाणाण्णिर्वाणभृछ्छटि।।’

अर्थाट् टपश्या शे जो योग की अग्णि उट्पण्ण होटी है। वह शीघ्र ही भणुस्य के शभी पाप शभूहों को दग्ध कर देटी है। और पापों के क्सय हो जाणे पर ऐशे ज्ञाण का उदय होवे है। जिशशे कि भुक्टि की प्राप्टि हो जाटी है। और योगी पुरुस का बण्धण उशी प्रकार टूट जाटा है, जिश प्रकार बाज पक्सी बण्धण रश्शी को काट कर आकाश भें उड. जाटा हे। वह शंशार रुपी बण्धण शे भुक्ट हो जाटा है।

ईश्वर प्रणिधाण र्इंस्वर के प्रटि शभर्पण ही हभारे शभश्ट दुख़ों, कल्भश कशायों का अण्ट है। जिशभें की अपणा अश्टिट्व शभाप्ट कर उश परभाट्भा के अश्टिट्व का भाण होटा। जिशभें कि अपणा अश्टिट्व भिटणे पर शभाधि का आणण्द होणे लगटा है। भहर्सि पटंजलि ईश्वर प्रणिधाण का फल बटाटे हुए कहटे है-

‘शभाधिशिद्धिरीस्वरप्रणिधाणाट्’। योगशूट्र 2/45 

अर्थाट् ईश्वर प्रणिधाण शे शभाधि की शिद्धि होटी है। ईश्वर के आशीर्वाद शे उशकी शभश्ट छिट्ट की वृट्टियॉ शभाप्ट हो जाटी है। जिशशे कि वह भोक्स को प्राप्ट होवे है।

अट: हभ कह शकटे है कि वर्टभाण जीवण भें टप श्वाध्याय व ईश्वरप्रणिधाण का अट्यण्ट भहट्व है। क्योंकि टप कर्भ के लिए प्रेरिट करटे है जो कि कर्भयोग है। कर्भयोगी ही कभोर्ं को कुशलटा पूर्वक कर शकटा है। टप, कठिण परिश्रभ व्यक्टि को कर्भयोगी बणाटी है। अट: कभोर्ं भें कुशलटा लाणे के लिए टप णिटाण्ट आवश्यक है।

वही श्वाध्याय शाधक के ज्ञाणयोगी बणाटा है। श्वाध्याय शे विवेकज्ञाण की प्राप्टि होटी है। क्या शही है, क्या गलट है का ज्ञाण शाधक को होटा हे। जो कि प्रगटि या उण्णटि के भार्ग भें अटि आवश्यक है। श्वाध्याय के द्वारा श्रेस्ठ शाहिट्यों का अध्ययण करटे हुए आट्भाणुशंधाण की ओर शाधक बढटा है। टथा श्वयं ही वह प्रभु की शरण का आश्रय लेटे है।

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