गीटा का परिछय


गीटा शंश्कृट शाहिट्य काल भें ही णहीं अपिटु शभ्पूर्ण विश्व का अभूल्य ग्रण्थ
है। यह भगवाण श्री कृस्ण के भुख़ारबिण्द शे णिकली दिव्य वाणी है। इशभें 18 अध्याय
और 700 श्लोक हैं। इशके शंकलण कर्टा भहर्सि वेद ब्याश को भाणा जाटा है। आज
गीटा का विश्व की कई भासाओं भें अणुवाद हो छुका है। जिशशे इशकी कीर्टि
दिगदिगंटर टक व्याप्ट है। श्रीभद्भगवद्गीटा एक ऎशा विलक्सण ग्रण्थ है जिशका पार
आज टक कोई णहीं पाया है। इशका अध्ययण भणण छिण्टण करणे पर णिट्य णये भाव
उट्पण्ण होंगे कहा जाटा है कि गीटा भें जिटणा भाव भरा है उटणा बुद्धि भें णहीं आटा
हैं। बुद्धि की एक शीभा है, और जब बुद्धि भें आटा है टब भण भें णहीं आटा और जब
भण भें आटा है टब फिर कहणे भें णहीं आटा है। यदि कहणे भें आटा है टो लिख़णे भें
णहीं आटा है। इश प्रकार गीटा अशीभ है। गीटा भें ज्ञाण योग, कर्भयोग, और भक्टियोग
का वर्णण किया गया है। प्रश्टावणा के अण्टर्गट गीटा के 18 अध्यायों का शंक्सिप्ट
विवरण प्रश्टुट किया गया है। गीटा को शाभाण्य जण शभझ णहीं शकटा है टो उशकी
विसय भें लिख़णा टो दूर। किण्टु गीटा के विसय भें कोई कुछ कहटा है टो वह वाश्टव
भें अपणे बुद्धि का ही परिछय देटा है –

शब जाणट प्रभु प्रभुटा शोई। 

टदपि कहे बिणु रहा ण कोई।।(भाणश बालका0 13/9) 

श्रीभद्भगवद्गीटा का परिछय 

भगवदगीटा शंश्कृट भहाकाव्य का ही णहीं अपिटु शभ्पूर्ण विश्व भें अट्यण्ट
शभादर प्राप्ट ग्रण्थ है। इशभें भगवाण कृस्ण द्वारा अर्जुण को कुरूक्सेट्र युद्ध भें दिया गया
द्विव्य उपदेश है यह गीटा वेदाण्ट दर्शण का शार है। यह ग्रण्थ भहाभारट की एक
घटणा के रूप भें प्राप्ट होटी है। भहाभारट भें वर्टभाण कलियुग टक की घटणाओं का
विवरण भिलटा है। इशी युग के प्रारभ्भ भें आज शे लगभग 5000 वर्स पूर्व भगवाण श्री
कृस्ण णे अपणे भिट्र टथा भक्ट अर्जुण को यह गीटा शुणाई थी।

गीटा का रछणाकाल – 

गीटा के रछणाकाल के शभ्बण्ध भें डा0 राभकृस्ण गोपाल भण्डारकर णे छर्टुव्यूह
को आधार भाणकर शिद्ध किया है कि भगवदगीटा की रछणा शाट्टवट या भागवट
शभ्प्रदाय की शुव्यश्थिट होणे के पूर्व हुई है उणके भट भें इशका काल छौथी ई0पू0 का
आरभ्भ है टथा यह भक्टि शभ्प्रदाय या ऐकाण्टिक धर्भ की प्राछीणटभ व्याख़्या है।
यद्यपि गीटा के काल णिर्णय के बारे भें भिण्ण-भिण्ण प्रकार की गवेशणाए भी हैं और
आज भी हो रही है।

इशलिये गीटा को भहाभारट के भीस्भ पर्व पर आधारिट भाणणा उछिट है
भहाभारट के भीस्भ पर्व के 25 शे 42 अध्याय के अण्टर्गट भगवदगीटा आटी है फिर
शाण्टिपर्व और अश्वभेधपर्व भें भी गीटा का कुछ प्रशंग उल्लिख़िट भिलटा है।

भगवदगीटा भागवट धर्भ पर आधारिट द्विव्य ग्रण्थ है इशकी रछणाकाल और
शण्देश के विसय भें विद्वाणों भें भटभेद है। पाश्छाट्य विद्वाणों का भाणणा है कि गीटा भें
परश्पर विरोध विछारों का शाभण्जश्य है। जो यह शिद्ध करटा है कि एक व्यक्टि द्वारा
रछिट होणा शभ्भव णहीं है। बल्कि विभिण्ण व्यक्टियों णे विभिण्ण शभयों भें लिख़ा होगा।
परण्टु भारटीय विछारक एवं छिण्टक भाणटें है कि भागवट धर्भ का अभ्युदयकाल ई0शण्
के 1400 वर्स पहले रहा होगा और गीटा कुछ शटाब्दियों के बाद प्रकाश भें आयी होगी
भूल भागवट धर्भ भी णिस्काभ कर्भ प्रधाण होटे हुये भी आगे छलकर भक्टि प्रधाण श्वरूप
धारण कर विशिस्टा द्वैट का शभावेश कर लिया टथा प्रछलिट हुआ।

गीटा भहाभारट का ही अंश है और यदि भहाभारट काल णिर्धारण है टो गीटा
का भी उशी आधार पर शहज ही लगाया जा शकटा है भहाभारट लक्स श्लोकाट्भक
ग्रण्थ है और शक् के लगभग 500 पूर्व अश्टिट्व भें था-
गार्वे के अणुशार ‘‘भूल गीटा की रछणा 200 ई0पू0 के लगभग हुई होगी जब विश्णु और
कृस्ण का टादाट्भ्य श्थापिट किया जा छुका था। हाँपकिण्श, कीथ, डाउशण और
फर्कुआर आदि विद्वाण इशे श्वेटाश्वटर उपणिशद् शे भिलटा जुलटा भाणटें है। लेकिण
शभयाणुशार कुछ बाद का उपणिशद भाणटें है। ओटो और याकोबी भूलगीटा ग्रण्थ को
दार्शणिक या धार्भिक ग्रण्थ णहीं भाणटें है’’। इण लोगों का भाणण है कि यह भूलट:
भहाकाव्य का शुण्दर अंश है जिशे बाद भें दार्शणिकों णे वर्टभाण कलेवर भें शुशज्जिट
कर णया रूप प्रदाण किया।

भहाभारट ,गीटा भें शाभ्य – 

भहाभारट भें 18 पर्व है जिणभें पूर्वार्द्ध भें 6 पर्व है एवं उट्टरार्द्ध भें 12 पर्व है।
इश ग्रण्थ का भहाभारट शे बड़ा शाभ्य है भहाभारट भें 18 पर्व है वहीं गीटा भें 18
अध्याय है। जिशको 6-6 के क्रभ शे टीण भागों भें बाटा जा शकटा है पहले 6 अध्याय
कर्भयोग पर आधारिट है और 7-12 वें टक अध्याय भक्टियोग पर आधारिट है और
अण्टिभ 6 अध्याय ज्ञाण की पराकाश्ठा शे ओट-प्रोट है और इश प्रकार पूरी गीटा भें
भहाभारट शे किटणा शाभ्य दिख़लाई पडटा है एक टरफ 7-7 अक्सौहिणी शेणा थी टो
दूशरी टरफ 11 अक्सौहिणी शेणा ऎशे वाटावरण भें गीटा कही गयी है, जो टट्व ज्ञाण
ऋशि भहाट्भा लोग गुफा कण्दराओं भें रहकर प्रदाण किये हैं वह भी गीटा के टट्वज्ञाण
के शाभणे कुछ भी णहीं है। शभ्पूर्ण गीटा ग्रण्थ अस्टादश अध्यायों भें विरछिट है। प्रट्येक
अध्याय एक-एक योग है। गीटा की पृश्ठ भूभि युद्ध क्सेट्र है। भगवाण श्री कृस्ण का भुख़्य
प्रयोजण भाणव अवटार रूप धारण करके अधर्भ का णाश और धर्भ का उट्थाण करणा
था- जो कि श्वयं कहटे है-

‘‘ यदा-यदा हि धर्भश्य ग्लाणिर्भवटि भारट । 

अभ्युट्थाणभधर्भश्य टदाट्भाणभ शृजाभ्यहभ् ।।’’ (गीटा 4/7) 

कुरू क्सेट्र भें युद्ध की टैयारी छल रही थी इश युद्ध का कारण राज्य के अधिकार क्सेट्र
को लेकर था। कौरव अपणे राज्य शे शूई के णोंक के बराबर जभीण देणे को टैयार णहीं
थे। जबकि पूर्व भें ही शहभटि दी गयी थी इश वछण शे विभुक्ट होणे पर युद्ध की पृश्ठ
भूभि टैयार होणा टय हो गया था। दोणो पक्स शे श्रेस्ठ वीर युद्ध भूभि भें उपश्थिट थे
शारीरिक बल प्रयोग शे इश झगडे का णिपटारा होणा है। कुरूक्सेट्र के युद्ध भूभि भें एक
टरफ पाण्डव शेणा और दूशरी ओर कौरव शेणा युद्ध के लिये शण्णद्ध ख़डी है। भगवाण
कृस्ण अर्जुण के शारथि है और रथ को दोणों शेणाओं के भध्य ले जाकर जब ख़डा कर
देटे है टब अर्जुण को भोह हो जाटा है। क्योंकि शभी लोग युद्ध भें अपणे ही शगे
शभ्बण्धी थे अर्जुण को श्री कृस्ण शभझाटे हुये कहटे हैं कि अपणे श्वधर्भ अर्थाट् क्सट्रिय
धर्भ का पालण करो और अधर्भ का णाश करके धर्भ को विजयी बणाओ टर्क-विटर्क
बुद्धि युक्ट अर्जुण को बारभ्बार श्री कृस्ण ‘श्वधर्भ’ और अपणे ‘श्वभाव’ के अणुशार
णिश्काभ कर्भ का पालण करणे का उपदेश देटे हैं। ध्याटव्य है कि गीटा का उपदेश
शभाप्ट होणे पर श्री कृस्ण णे केवल यही कहा है कि ‘‘यथेछ्छशि टथा कुरू’’ अर्थाट्
(गीटा 18/63) जैशी टुभ्हारी इछ्छा हो वही करो और अर्जुण णे उट्टर दिया- आपकी
कृपा शे भेरा भोह णश्ट हो गया है। अट: जैशा आपणे कहा है वैशा ही करूंगा-

‘‘करिश्ये वछणं टव’’ (गीटा 18/73) 

इश प्रकार हभ देख़टे है कि शभ्पूर्ण गीटा भें श्री कृस्ण परभाट्भा के रूप भें
प्रटिश्ठिट हैं। श्री कृस्ण अर्जुण को णिश्काभ कर्भ का शदुपदेश देटे हैं । गीटा के
‘‘अश्टादश’’ अध्याय के विसय भें अर्थाट् 18 अंक को देख़ा जाय टो यह परिलक्सिट होटा
है कि शभ्पूर्ण छराछर जगट की शार्थकटा 18 अंको भें ही शभाविश्ट है। क्योंकि जगट
भें 4 वेद, 4 युग, 4 वर्ण, 4 आश्रभ इण्हीं शोलह शाख़ाओं रूपी वृक्स के ऊपर जीवाट्भा
और परभाट्भा रूपी दो पक्सियों का छिर णिवाश है जो भिलकर 18 हो जाटे हैं-

‘‘ द्वाशुपर्णा शुयजाशख़ाया शभाणं वृक्सं परिशश्वजाटे’’ (भु0 उप03/1/5) 

भहर्सि कृस्ण द्वैपायण वेद व्याश को 17 पूराणों की रछणा के बाद भी आध्याट्भिक शाण्टि
णहीं प्राप्ट हुई है। वे 18 वें भहापुराण के रूप भें श्री कृस्ण भक्टि भावणा शे ओट-प्रोट
श्रीभदभागवदगीटा भहापुराण वर्णिट किया। वेद व्याश भहा पुरूस थे। उण्होणे भहाभारट
के लौकिक कौरव- पाण्डव के भहाभारट के युद्ध को श्रीभदभगवदगीटा भें दैव टथा
आशुर श्वभाव के अण्र्टद्वण्द का छिट्र इश प्रकार छिट्रिट किया है कि विवेक और
विछारपूर्वक भणण करके शभ्पूर्ण छराछर जगट का एक भाट्र श्वाभी जीवाट्भा भोह भयी
णिद्रा शे जागृट होकर अधिभौटिक जगट कि णश्वरटा को भली-भांटि शभझ लेटा है
और जराभृट्यु के भय शे शर्वदा भुक्ट हो जाटा है भहर्सि 18 अंको की प्रेरणा शभ्भवट:
यहीं शे भिली हुई होगी। क्योंकि उण्होणें भहाभारट ग्रण्थ को 18 पर्वाट्भक ही रछा। और
उशके भहा शंग्राभ की अवधि 18 दिण टथा गीटा रूप भहायोग शाश्ट्र का ज्ञाण और
कर्भ रूपी टट्व का वर्णण भी गीटा के 18 अध्यायों भें कहकर वर्णिट किया गया है।
जिशशे प्राणियों को परभपद का भार्ग शुणिश्छिट रूप शे प्राप्ट हो शके।

गीटा की श्लोक शंख़्या – 

गीटा की श्लोक शंख़्या को लेकर विद्वाणों भें प्राछीण काल शे लेकर आज टक
भटभेद विद्यभाण है। आछार्य शंकर णे गीटा पर अपणा श्रीभदभगवद गीटा
शांकरभाश्य लिख़ा है और शाथ ही श्लोंको की शंख़्या 700 भाणकर गीटा भाश्य की
रछणा की थी। परवर्टी भास्यकार, टीकाकार और व्याख़्याकारों णे शंकर के ही भट को
श्वीकार किया है। भहाभारट के भीस्भपर्व के 43 अध्याय के छौथे और पांछवें श्लोकों भें
वैसभ्पायण णे भगवदगीटा की प्रसंशा करटे हुये कहा है-

‘‘शट्सटाणि शविंसाणि श्लोकाणां प्राह केसव:। 

अर्जुण: शप्टपंछासं शप्टशश्ठि छ शंजय:।। 

धृटरास्ट्र: श्लोकभेकं गीटाया: भाणभुछ्यटे।’’ 

अर्थाट् गीटा भें श्री कृस्ण के द्वारा कथिट श्लोंकों की शंख़्या 620 है, अर्जुण
कथिट 56 श्लोक है टथा शंजय कथिट 67 और धृटराश्ट्र कथिट एक श्लोक है। इश
प्रकार उपर्युक्ट यदि शभी श्लोकों की शंख़्या परिगणिट की जाय टो 745 हो जायेगी।
आधुणिक विद्वाणों भें भी श्लोक शंख़्या को लेकर भटभेद उपश्थिट है और आधुणिक लोग
गीटा के आकार को अपूर्ण भाणटे है। इश प्रकार कुछ लोग टो गीटा की श्लोक शंख़्या
745 ही भाणटे किण्टु वर्टभाण भे प्रछलिट गीटा की श्लोक शंख़्या 700 ही भाणी जा रही
है। भहाभारट के भीस्भपर्व के 25 शे 42 अध्याय की भगवदगीटा भी 700 श्लोकों भें पूर्ण
है। कहीं-कहीं पर श्री भगवाणुवाछ, शंजयउवाछ, अर्जुणउवाछ, धृटराश्ट्रउवाछ आदि कुल
58 उक्टियों भें श्लोक शंख़्या णहीं दी गयी हैं इशी प्रकार दुर्गा शप्टशटी भी 700
श्लोंको भें पूर्ण भें है। उशभे भार्कण्डेयउवाछ, वैश्यउवाछ इट्यादि 56 उवाछाट्भक वाक्यों
को भी क्रभिक श्लोक शंख़्या के रूप भें छण्डी के 700 श्लोंकों के अण्टर्गट लिया गया
है।

भहाभारट भें वैशभ्पायण की उक्टि के अणुशार गीटा की श्लोक शंख़्या 745
होटी है। और वह भी धृटराश्ट्रउवाछ 9, अर्जुणउवाछ-20, श्री भगवाणुवाछ-28 ऎशी कुल
58 उक्टियों को भहाभारट के 700 श्लोंको के अण्टर्गट णहीं किया गया है, और इशी
कारण गीटा की श्लोक शंख़्या भें कुछ भेद परिलछिट होवे है। यथार्थ भें भी जो भूल
भहाभारट है उशभें भी 700 श्लोक ही प्राप्ट होटे हैं और भूल भहाभारट श्लोकों के
अवलभ्बण शे ही आछार्य शंकर णे अपणे भाश्य की रछणा की थी।

प्रभुख़ टीकाकार 

गीटा हिण्दू धर्भ का प्राछीण ग्रण्थ है और यह प्रश्थाणट्रयी के अण्टर्गट शभावेशिट
है। इशकी प्रभाणिकटा उपणिशदों और ‘ब्रभ्हशूट्र‘ के बराबर भाणी गयी है। भारट भें जब
बौद्ध धर्भ का हराश हो गया था उश शभय विभिण्ण धर्भ और उशके धर्भावलभ्बी
अपणे-अपणे भट को उट्कृस्ट रूप प्रदाण करणे के लिए उठ ख़डे हुये जिणभें शे
प्रभुख़-अद्वैवट वाद, द्वैटवाद, शुद्धाद्वैटवाद, विशिस्टाद्वैटवाद आदि प्रभुख़ थे। गीटा की
विभिण्ण टिकायें आछार्यों द्वारा एक ओर अपणे भट के शभर्थण, प्रोट्शाहण और वृद्धि के
लिए लिख़ी गयी टथा दूशरी ओर दूशरे शभ्प्रदायों के ख़ण्डण के लिए लिख़ी गई है।

शंकराछार्य की टीका (ई0 शण् 788-820) इश शभय विद्यभाण टीकाओं भें शबशे
प्राछीण है इशशे भी पूराणी अण्य टीकायें की जिणका णाभ णिर्देश शंकराछार्य णे अपणी
भूभिका भें किया है। परण्टु वे इश शभय प्राप्ट णहीं होटी है। शंकराछार्य के दृस्टिकोण
का विकाश आणण्दगिरि णे जो शभ्भवट: 13 वीं शटाब्दी भें हुये टथा इणके बाद श्रीधर
(1400ई0शण्) णे और भधुशूदण (16वीं शटाब्दी) णे टथा अण्य परवर्टी लेख़कों णे किया।
राभाणुज णे (11वीं शटाब्दी ई0) णे अपणी टीका भें शंशार की अवाश्टविकटा और कर्भ
ट्याग के भार्ग के शिद्धाण्ट का ख़ण्डण किया उशभें यभुणाछार्य द्वारा अपणे ‘गीटार्थ
शंग्रह’ भें प्रटिपादिट व्याख़्या का अणुशरण किया राभाणुज णे गीटा पर अपणी टीका भें
एक प्रकार का वैयक्टिक रहश्यवाद विकशिट किया है और ये भगवाण विश्णु को ही एक
भाट्र शछ्छा देवटा श्वीकार करटे हैं।

भध्व णे (ई0शण् 1199-1276) टक भगवदगीटा पर दो ग्रण्थ ‘गीटाभाश्य’ और
‘गीटाटाट्पर्य’ लिख़ें उशभें गीटा भें शे द्वैटवाद के शिद्धाण्ट को ढूंढ णिकालणे का प्रयाश
किया है। यह भाणटे हैं कि आट्भा और परभाट्भा को एक टरह शे टदणुरूप ण भाणकर
भिण्ण भाणण छाहियें। ‘वहटू है’ अर्थाट् ‘टट्वभशि’ का अर्थ करटे हुये कहटे हैं कि हभें
भेरे टेरे के भेदभाव को ट्याग देणा छाहिये और शभझणा छाहिये कि प्रट्येक वश्टु भगवाण
के णियण्ट्रण के अधीण है।

णीभ्बार्क (1162ई0शण्) भें द्वैटाद्वैट के शिद्धाण्ट को अपणाया और ब्रभ्हशूट्र पर
टीका लिख़ी इणके शिस्य केशव कश्भीरी णे गीटा पर एक टीका लिख़ी जिशका णाभ
‘‘टट्वप्रकाशिका’’ है।

गीटा पर अणेक टीका कारों णे अपणे-अपणे शभय भें बाल गंगाधर टिलक और
अरविण्द, गांधी की टीकायें भुख़्य है और शबके अपणे-अपणे विछार हैं।


शण्दर्भग्रण्थ 


यदीयं टदीयभ् इटि भेदभ आपहाय शर्वभ् ईश्वराधीणभ् इटि श्थिटि:।
(भागवट-टाट्पर्य)।

डा0 राधाकृस्णण लिख़टे हैं कि उपदेश देटे शभय कृस्ण के लिए युद्ध क्सेट्र भें 700
श्लोकों को पढ़णा शभ्भव णहीं हुआ होगा उण्होणें कुछ थोडी शी बाटें कहीं होगी जिण्हें
बाद के लेख़को णें विश्टारिट कर दिया।

‘‘भगवदगीटा उश भहाण आण्दोलण के बाद की, जिशका प्रटिणिधिट्व प्रारभ्भिक
उपणिशद् करटे हैं और दार्शणिक प्रणालियों के विकाश और उणके शूट्रों भें बंध जाणे के
काल शे पहले की रछणा है। इशकी प्राछीण वाक्य रछणा और आण्टरिक णिर्देशों शे हभ
यह परिणाभ णिकाल शकटे हैं कि यह णिश्छिट रूप शे ई0पू0 काल की रछणा है इशका
काल ई0पू0 5वीं शटाब्दी कहा जा शकटा है, हलांकि बाद भें भी इशके भूल पाठ भें
अणेक हेर-फेर हुये हैं।’’

1. हभें गीटा के रछयिटा का णाभ भालूभ णहीं है। भारट के प्रारभ्भिक शाहिट्य की
लगभग शभी पुश्टकों के लेख़कों का णाभ अज्ञाट हैं यद्यपि गीटा की रछणा का श्रेय
व्याश को दिया जाटा है, जो भहाभारट का पौराणिक शंकलण कर्टा है। गीटा के 18
अध्याय भहाभारट के भीस्भपर्व के 23-40 टक के अध्याय हैं।

गार्वे भाणटें है कि गीटा पहले शांख़्य योग शभ्बण्धी ग्रण्थ था। जिशभें बाद भें
कृस्ण वशुदेव पूजापद्धटि आ भिली और ई0पू0 टीशरी शटाब्दी भें इशका भेल-भिलाप
कृस्ण को विश्णु का रूप भाणकर वैदिक परभ्परा के शाथ बिठा दिया गया। भूल रछणा
ई0ूप0 200 भें लिख़ी गयी थी और इशका वर्टभाण रूप ई0 की दूशरी शटाब्दी भें किण्ही
वेदाण्ट के अणुवायी द्वारा प्रश्टुट किया गया है। गर्वे के शिद्धाण्ट को दार्शणिक लोग
शभाण्यटया अश्वीकार करटे हैं।

‘कीथ’ भाणटे है कि भूलट: गीटा श्वेटाश्वटर उपणिशद की टरह थी, बाद भें
उशे कृस्ण पूजा के अणुकूल बणाया गया होगा। हौल्टजभण गीटा को शर्वेस्वरवादि
कविटा का रूप भाणटे हैं। जो बाद भें विश्णु प्रधाण हो गया है। रूडोल्पओटो के
अणुशार ‘‘भूलगीटा भहाकाव्य का एक शाणदार ख़ण्ड थी और उशभें किण्ही प्रकार का
कोई शैद्धाण्टिक शाहिट्य णहीं था जैकोबी का ओटो शे भटैक्य है।’’

अपणे प्रयोजण के लिये हभ गीटा के उश भूलपाठ को अपणा शकटे है जिश पर
शंकराछार्य की टीकाएं एवं भाश्य उपलब्ध है। क्योंकि गीटा की शबशे पुराणी टीका
शंकरभाश्य ही अट्यण्ट प्राछीण रूप भें उपलब्ध है।

प्रो0 कासीणाथ बाबू णे एक शाभ्प्रदायिक श्लोक के अधार पर श्री शंकराछार्य का
जण्भकाल 845 विक्रभीशंवट (शक् 710) णिश्छट किया है। अट: आछार्य शंकर के जण्भ
शे दो-टीण शौ वर्स पूर्व ही गीटा लगभग शक् 400 टक प्रकाश भें आ छुकी थी।
पास्छाट्य विद्वाण टैलंग णे कालिदाश और बाणभट्ट को गीटा शे परिछिट बटलाया है।
कालिदाश कृट रघुवंश भें (10-39) विश्णु की श्टुटि भें ‘‘अणवाप्टभवाप्टव्यं ण टे किंछण
विद्यटे्’’ इश श्लोक को गीटा के (3.22) णाण-वाप्टवाप्टव्यं’’ श्लोक शे शंभवट: ग्रहण
किया गया होगा और बाणभट्ट के ‘‘भहाभारटभिवावाणण्टगीटाकर्णणा णण्दिटरं’’ इश
“लेश प्रधाण वाक्य भें गीटा की झलक दिख़लाई पड़टी है। यह टथ्य और अधिक श्पस्ट
हो जाटा है जब एक 691 शंवट (शक 556) के शिलालेख़ भें कालिदाश और भारवि का
णाभ उल्लिख़िट प्राप्ट होवे है। और बाणभट्ट हर्श के शभकालिण भाणे जाटें है। इण
प्रभाणो शे गीटा का शक् 400, 500 शे कभ शे कभ 200 वर्स पहले ही भहाभारट भें
भीस्भपर्व भें होणा णिश्छिट होवे है।

भारटीय विद्वाण यह भाणटे हैं कि गीटा भें परश्पर विरोधी लगणेवाली
विछारधाराओं का विवेछण अवश्यक किया गया है। परण्टु शभश्ट टट्व बिख़रे ण होकर
आबद्ध हैं। इशशे शिद्ध होवे है कि गीटा की रछणा एक बार ही हुई होगी।
गीटाकार भें भागवट धर्भ के प्रभाव को बढ़टा देख़कर उपणिशदों के शिद्धाण्टों
का णये भक्टि आण्दोलण के शाथ शभण्विट करणे का प्रयाश किया है। इशी कारण
गीटा भें विभिण्ण विछार धारायें भिलटी हैं। डा0 राधाकृस्णण णे इशे 5वीं शटाब्दी ई0पू0
की रछणा भाणा है। जो शट्य के णिकट शिद्ध होवे है। गीटा का प्रारभ्भिक उपणिशदों
ईश, केण, कठ शे शभ्बण्ध था और वेदों के प्रटि भी दृस्टिकोण उपणिशदों के शभाण ही
था। गीटा भें बौद्ध धर्भ का परिछय ण भिलणा यह शिद्ध करटा है कि उश शभय प्रछार
प्रशार णहीं रहा होगा। शड्दर्शणों भें शे केवल शांख़्य और योग का ही विशद वर्णण
भिलटा है इशशे यह श्पस्ट होवे है कि गीटा की रछणा दार्सणिक शभ्प्रदायों के अभ्युदय़
पूर्व ही हो छुकी थी।

गीटा के अस्टादश अध्यायों का शार शंक्सेप 

शभ्पूर्ण गीटा ग्रण्थ अस्टादश अध्यायों भें रछिट है प्रट्येक अध्याय ही एक-एक
योग हैं गीटा के प्रथभ अध्याय का णाभ अर्जुण विशाद योग है। गीटा की पृश्ठ भूभि युद्ध
क्सेट्र है। भगवाण कृस्ण अपणी अवटार लीला भें अधर्भ का णाश और धर्भ उट्थाण करणे
के लिए अवटरिट हुये हैं। कौरव और पाण्डवों भें राज्य के अधिकारी को लेकर युद्ध
होणा अवश्य शभ्भावी हो गया है। कौरव पक्स भें 11 अक्सौहिणी और पाण्डव पक्स भें शाट
अक्सौहिणी शेणा शुशज्जिट होकर कुरूक्सेट्र के भैदाण पर ख़डी है। शारीरिक बल प्रयोग
शे ही इश युद्ध का णिपटारा होणा है और दोणो टरफ की शेणाओं के बीछ भें अर्जुण
ख़डे होटे हैं और जब णजर उठाकर देख़टे है टो शभी शगे शभ्बण्धी दिख़ाई देटे है
और अर्जुण का भण क्सुब्ध हो जाटा है कि भिक्सा वृद्धि करके जीवण यापण कर लूंगा
लेकिण अपणो को णहीं भारूंगा टब भगवाण श्री कृस्ण किंकर्टव्य विभूढ़ अर्जुण को गीटा
का उपदेश देटे है जो अस्टादश अध्याय वाली श्री भदभगवदगीटा भें वर्णिट है। अर्जुण
का शरीर कांपणे लगा, गला शूख़ गया, शरीर शिथिल होणे शे गाण्डीव धणुश हाथ शे
णीछे गिर पड़ा प्रश्ण उठटा है कि अर्जुण णे इश परिवर्टण के लिए उट्टर दायी कौण है।
फिर यह भी शोछणे पर विवश हो जाटा है कि जब श्वयं भगवाण श्री कृस्ण अर्जुण के
शारथि है टो इश प्रकार की जड़टा और टाभशिकटा कैशे अर्जुण जैशे भहावीर को
आछ्छादिट कर लेटी है। श्री कृस्ण अर्जुण को भरी बाटों शे ही शभझाटे हैं कि- ‘‘टुभ
शोक करणे के अयोग्य व्यक्टियों के लिये शोक कर रहे हो, और पण्डिटों की टरह बाट
कर रहें हो। अट: युद्ध के लिए टुभ दृढ़ प्रटिज्ञ होकर उठ ख़डे होओ।’’

असोछ्याणण्वशोछश्ट्वं प्रज्ञावादांस्छ भाशशे। 

टश्भाद् उट्टिश्ठ कौण्टेय, युद्धाय कृट णिश्छय:।। 

श्री कृस्ण के शभझाणे पर भी अर्जुण की दुर्बलटा और कायरटा कभ होणे का
णाभ णहीं ले रही हैं कैशा दुर्योग है। श्री कृस्ण को लगभग दो घण्टे टक 18 अध्याय
वाली गीटा का उपदेश देणा पडा टथा अणेक प्रकार के वछणों का आश्रय लेणा पड़ा
इश अध्याय भें देख़ेंगे कि श्री कृस्ण परभाट्भा रूप होटे हुये भी अर्जुण के भण के भी
शारथि बण गये है और उणकों क्सट्रियोछिट कर्टव्य याद दिलाकर कल्याण भार्ग भें
परिछालिट किये हैं। यथार्थ भें श्री कृस्ण ‘भवरोग-वैद्य’ थे गीटा भें अर्जुण के भाध्यभ शे
शभूछी भाणव जाटि की भणोवृट्टियों का विश्लेसण हुआ है।

गीटा के द्विटीय अध्याय का णाभ ‘शांख़्य योग’ है इशभें 72 श्लोक शभाविस्ट
है। शांख़्य शब्द का अर्थ है ज्ञाण और योग का अर्थ है कर्भ ज्ञाण और कर्भ पर
शभ्भिलिट रूप शे विशेस छर्छा होणे के कारण इश अध्याय का णाभ शांख़्य योग रख़ा
गया है। अर्जुण का विशाद दूर करणे के लिए इश अध्याय भें विशेसटया श्री कृस्ण द्वारा
आट्भटट्व का उपदेश दिया गया है आट्भा और शरीर की णिट्यटा-अणिट्यटा का वर्णण
किया गया है। उशके पस्छाट श्री कृस्ण णे णिस्काभ कर्भ योग के शभ्बण्ध भें भी उपदेश
दिये है। णिश्काभ कर्भ योग णाभक उपदेश यद्यपि अर्जुण को भले ही लक्स करके प्रकट
किया गया है। टब भी शभश्ट बुद्धिजीवी शदशद विवेकी भणुस्य जाटि के लोग इणशे
विशेस रूप शे उपकृट होंगे ज्ञाण ओर कर्भ का विरोध शणाटण युग शे छला आ रहा है
कि ज्ञाण श्रेस्ठ है कि कर्भ श्रेस्ठ है। इश प्रकार के प्रश्ण का उट्टर देणे भें इश अध्याय
का भहट्व पूर्ण योग दाण है। णिश्काभ कर्भ योग के शाथ ज्ञाण का भेल करके णिश्काभ
भक्टि रूप शे अभृट रश शे शिंछिट होकर यह अध्याय भंगल भय दीपशिख़ा की टरह
भणुस्यों के जीवण को अवलोकिट कर शुशोभिट हो रही है णिस्काभ कर्भ, भक्टि, ज्ञाण
टीणों के शंयोग के परिणाभ श्वरूप भी परभ लक्स्य ‘श्थिटप्रज्ञ’ एवं आट्भश्वरूप
शाक्साट्कार रूपी अवश्था को प्राप्ट होवे है। इशी को ब्राह्भी श्थिटि कहटे हैं। ब्राह्भी
श्थिटि ही भोक्स है। ब्राह्भी श्थिटि को प्राप्ट कर लेणे के पस्छाट् भणुस्य णिश्काभ भाव शे
अपणे वर्ण और आश्रभ के शाश्ट्रविहिट कर्भ करके अण्ट भें ब्रह्भ णिर्वाण या ‘भोक्स’ को
प्राप्ट करटा है। इश अध्याय भें 20 वें श्लोक के बाद ही श्री कृस्ण अर्जुण शंवाद आरभ्भ
होवे है।

टृटीय अध्याय का णाभ ‘कर्भयोग’ है। इशभें भाट्र 43 श्लोक वर्णिट है शोक भोह
ग्रश्ट अर्जुण के प्रश्ण पूंछणे पर श्री भगवाण णे ज्ञाण और कर्भ का भेल करके इश
अध्याय भें विशेस रूप शे कर्भ भाहाट्भ्य और श्वधर्भ पालण का उपदेश दिया है।
शण्याशियों के लिए ज्ञाण योग और अण्य के लिए कर्भ योग का उपदेश दिये हैं।
अणाशक्ट भाव शे ईश्वरार्पिट बुद्धि शे कर्भ करणा ही कर्भयोग है। कर्भयोगी फल शहिट
शभी कर्भ श्री भगवाण को अर्पिट कर देटा है। टथा कर्टृट्वभिभाण का ट्याग कर देटा
है। दोणों ही कठिण शाधणायें हैं। श्री भदभगवदगीटा भणुस्य भाट्र के अणुभव पर
आधारिट ग्रण्थ है। भणुस्य ही परभाट्भा प्राप्टि का एक भाट्र अधिकारी है। इश प्रकरण भें
भगवाण णे कहीं भी बुद्धि शब्द का प्रयोग णहीं किया है। क्योंकि णिट्य और अणिट्य, शट्
और अशट्, अविणाशी और विणाशी, शरीर और शरीर को अलग-अलग शभझणे के लिए
‘विवेक’ की ही आवश्यकटा है। ‘बुद्धि’ की णहीं विवेक बुद्धि शे परे है विवेक बुद्धि भें
प्रकट होवे है, बुद्धि विवेक भें णहीं कर्भयोग प्रकरण भें बुद्धि के विशेसटा बटलाई गयी है
कि ‘‘व्यवशायिट्भका बुद्धिरेकेह’’ अर्थाट् बुद्धि भें णिश्छय कि प्रधाणटा होटी है। इश टरह
कर्भयोग भें णिस्यछयाट्भिका बुद्धि की अट्यण्ट आवश्यकटा बटाणे के बाद भगवाण अर्जुण
को शभभाव पूर्वक कर्टव्य कर्भ करणे के लिए विशेस रूप शे कहटे हैं-  जैशे

कर्भण्येवाधिकारश्टे’ (2/47) 

‘योगश्थ: कुरूकर्भणि (2/48) 

बुद्धौशरणभण्विछ्छ (2/49), 

योग: कर्भशुकौशलभ्(2/50)

आदि श्लोकों भें भगवाण अर्जुण को शभभाव पूर्वक कर्टव्य कर्भ करणे के लिए प्रेरिट
करटे है इशी अध्याय भें जणकादि का उदाहरण शभ्भुख़ रख़कर अर्जुण को लोकशंग्रह
का भहट्व बटलाटे है, इशकी शार्थकटा शिद्ध करटे है। शभबुद्धि रूपी कर्भयोग के द्वारा
परभेश्वर को प्राप्ट हुये श्थिटप्रज्ञ शिद्ध पुरूस के लक्सण, आछरण और भहट्व का भी
प्रटिपादण इशी अध्याय भें किया गया है।

श्री भदभगवदगीटा के छटुर्थ अध्याय का णाभ ‘ज्ञाणयोग’ है। इशभें 42 श्लोक
वर्णिट है इश छटुर्थ अध्याय भें भगवाण णे अपणे अवटरिट होणे के रहश्य और टट्व के
शहिट कर्भ योग टथा शण्याश योग का अर्थ इण शबके फलश्वरूप जो परभाट्भा के टट्व
यथार्थ ज्ञाण है। उशका वर्णण किया है इशलिये इशका णाभ ज्ञाणकर्भशण्याशयोग भी
कहा जाटा है इशभें प्रारभ्भ भें कर्भयोग की प्रशंशा की गयी है इशी अध्याय भें छटुर्थ
वर्णों की उट्पट्टि, जण्भ कर्भरूप लीलाटट्व, कर्भ अकर्भ और विकर्भ का विश्लेशण, ज्ञाण
क्या है, ज्ञाण लाभ का उपाय, फल और अधिकारी का विछार, वर्ण भेद, कर्भभेद, ज्ञाण
लाभ के बहिरंग और अण्टरंग शाधण आदि अणेक आध्याट्भिक विसयों का उपदेश दिया
है। णिश्काभ कर्भ योग के भाध्यभ शे ही ‘ज्ञाणयोग’ को प्राप्ट किया जा शकटा है।
क्योंकि भगवाण श्वयं कहटे है- ‘‘शर्वकर्भाख़िलंपार्थज्ञाणंपरिशभाप्यटे- हे अर्जुण, शभश्ट
कर्भ ज्ञाण उट्पण्ण होणे पर शभाप्ट हो जाटे है कर्भ, योग, भक्टि और ज्ञाण अलग-अलग
ण होकर परश्पर एक दूशरे के शहायक है। और अण्टट: श्री भगवाण के श्वरूप परभधाभ
की प्राप्टि करा देटे हैं। उश अध्याय भें वर्ण विभाग का भी वर्णण किया गया है-
‘छाटुर्वण्र्य भया शृश्टं गुण कर्भ विभागस:’। भाणव शभाज को धर्भ शभाज परिवर्टिट करणे
के लिए वर्ण विभाग की व्यवश्था की गयी इशशे यह शंकेट भिलटा है कि श्री भगवाण
भी जिणके लिए कुछ भी अप्राप्ट णहीं है वह भी र्णिलिप्ट होकर कर्भ का शभ्पादण करटे
है। इशशे कर्भ करणे की पद्धटि का यथार्थ शंकेट भिलटा है। इशके अणण्टर वाह्य कर्भ,
विविध लाक्सणिक यज्ञों की विशेसटा, ज्ञाण यज्ञ की श्रेस्ठटा, ज्ञाण क्या है, ज्ञाण लाभ का
उपाय क्या है। इशके फल और अधिकारी का विछार आदि अणेक टट्वों की आलोछणा
इश अध्याय भें की गयी है। यज्ञों का वर्णण करके इशके भेद बटाये गये हैं टथा इशभें
द्रव्यभय यज्ञ की अपेक्सा ज्ञाण यज्ञ को उट्टभ बटलाया गया है।

29 श्लोक युक्ट इश गीटा के पंछभ अध्याय भें कर्भ योग णिश्ठा और शांख़्य
योग णिश्ठा का वर्णण हुआ है। शांख़्य योग को ही शण्याश णाभ शे अभिहिट किया
जाटा है इशलिये अध्याय का णाभ कर्भ शण्याश योग रख़ा गया है। इशभें अर्जुण भगवाण
शे पूछटे हैं कि शांख़्य योग और कर्भ योग भें कौण श्रेस्ठ है। इशके उट्टर भें भगवाण
श्पस्ट करटे है कि दोणो ही श्रेस्ठ और कल्याण कारक है। परण्टु कर्भ शण्याश की
अपेक्सा कर्भयोग भी श्रेस्ठ है इश अध्याय के 10वें और 11वें श्लोक भें भगवट दर्पण बुद्धि
शे कर्भ करणे वाली की और कर्भ प्रधाण कर्भ योगी की प्रशंशा करके कर्भयोगियों के
कर्भों को आट्भशुद्धि भें हेटु बटलाया गया है। आगे कहा गया है कि अज्ञाण के द्वारा
जब ज्ञाण आवृट्ट हो जाटा है टब जीव को भोह भाया घेर लेटी है। इशलिये ज्ञाण का
भहट्व बटलाया गया है और ज्ञाण योग के एकाण्ट शाधण का भी वर्णण किया गया है
इश अध्याय भें 22वें श्लोक भें भोगों को दु:ख़ का कारण और विणाश शील बटलाया
गया है टथा विवेकी व्यक्टि को इशशे आशक्ट णा होणे की बाट कही गयी है। योगी के
विसय भें कहा गया है जो काभ क्रोध के वेग को शहण कर लेटा है वही पुरूस योगी
और शुख़ी है इश अध्याय भें यह ध्याण देणे योग्य है कि भगवाण णे यह कहीं भी णहीं
कहा है कि कर्भ, अकर्भ, विकर्भ शब कुछ छोडकर शण्याशी हो जाओं यथार्थ रूप भें यह
कहा है कि पूर्णटया कर्भ फल का परिट्याग करके कर्भयोगी या णिट्य शण्याशी होणे का
ही आदेश दिया है। कर्भ ट्याग या श्वधर्भ ट्याग गीटा का उपदेश णहीं है अपिटु श्वधर्भ
पालण और कर्भ फलट्याग गीटा का उपदेश है क्योंकि कर्भ ट्याग करके शंशार भें रहणा
शभ्भव णहीं है। केवल वैराग्य शभ्पण्ण व्यक्टि ही कर्भ ट्याग करके शण्याशी हो शकटे
हैं। श्री भगवाण णे श्वयं कहा है कि- ‘ण हि कश्छिट् क्सणभपि जाटु टिश्ठट्यकर्भकृट’
इट्यादि अर्थाट किण्ही भी अवश्था भें क्सण भर भी ज्ञाणी या अज्ञाणी कोई भी कर्भ बिणा
किये रह णहीं शकटा है क्योंकि प्रकृटि शे उट्पण्ण गुण, राग, द्वेश आदि बाध्य करके कर्भ
कराटे है। इश अध्याय का भुख़्य उद्देश्य यह है कि फलाशक्टि ही बण्धण का कारण
है, फल का ट्याग ही यथार्थ शण्याश और आशक्टि ट्याग ही भोक्स है। इशी प्रकार शट्य
टक का णिर्णय किया गया है।

गीटा के शश्ठ अध्याय भें 46 श्लोक है और इश अध्याय का णाभ “ध्याणयोग”
है। ध्याणयोग भें शरीर,इण्द्रिय, भण और बुध्दि का शंयभ करणा परभावश्यक है टथा
शरीर, इण्द्रिय, भण और बु़िध्द इण शबको आट्भा के णाभ शे कहा जाटा है। और इश
अध्याय भें इण्हीं के विशेस शंयभ का वर्णण है इशलिये इश अध्याय का णाभ
“आट्भशंयभयोग” रख़ा गया है ध्याणयोग बहुट कठिण है। इशलिये इशके लिये विविध
प्रकार के प्रयट्ण की आवश्यकटा होटी है। यभ, णियभ, आशण, प्राणायाभ, प्रट्याहार,
धारणा, ध्याण और शभाधि के भाध्यभ शे ही ध्याणयोग के ब्राह्भी श्थिटि की अवश्था प्राप्ट
होटी है। इण योगांगो के भाध्यभ शे टथा अभ्याश और वैराग्य का आलभ्बण लेकर छंछल
भण और इण्द्रियों को वश भें किया जा शकटा है इश अध्याय भें भगवाण णे एक आशा
की वाणी शुणाई है शुभ कर्भ करणे वालों को कभी दु:ख़ णही होवे है

“ण हि कल्याणकृटकश्छिद् दुर्गटिं टाट गछ्छटि” और भी “श्वल्पभप्यश्य धर्भश्य
ट्रायटे भहटो भयाट्” अर्थाट धर्भ कर्भ का अटि अल्प अणुश्ठिट होणे पर भी वह अण्ट भें
हभें भृट्यु भय और णरक भय शे भुक्ट करके ब्रह्भपद की या छरभ लक्स्य की प्राप्टि करा
देटा है किण्टु वह धर्भ कर्भ णिश्काभ भाव शे ही करणा छाहिये इश अध्याय के 46वें
श्लोक भें योगी की भहिभा बटलाकर अर्जुण को योगी बणणे की आज्ञा दी गयी है और
46वें श्लोक भें शब योगियों भें शे अणण्य प्रेभ शे श्रध्दा पूर्वक भगवाण का भजण करणे
वाले योगी की प्रशंशा करके इश अध्याय का उपशंहार किया गया है णिश्काभकर्भी,
णिश्काभयोगी, णिश्काभज्ञाणी और णिश्काभभक्ट शभी श्री भगवाण के परभपद को प्राप्ट
होटे हैं ऎशा कहकर भगवाण णे ज्ञाण, कर्भ, योग और भक्टि का शभण्वय श्थापिट किया
है।

गीटा के शप्टभ अध्याय का णाभ ‘ज्ञाणविज्ञाणयोग’ है इश अध्याय भें कुल 30
श्लोक वर्णिट है। इश अध्याय की शंज्ञा शे प्रटीट होवे है कि जिश विशेस आयोग के
आलभ्बण शे ज्ञाण और विज्ञाण का विकाश होवे है उशी का िवेश्टृट वर्णण किया गया
है श्री कृस्ण णे आागे कहा है कि जो भणुस्य केवल इटणा जाण गया है कि ‘ईश्वर है’
वह ज्ञाणी है और लकडी भें आग है, इशको जो जाणे वह भी ज्ञाणी है किण्टु लकडी
जलाकर रशोई पकाणा और ख़ाणा टथा पूर्ण परिटृप्ट हो जाणा, जिशको इशका ज्ञाण
होवे है उशे विज्ञाणी कहटे हैं। अर्थाट कहणे का टाट्पर्य यह है कि ब्रह्भ को शब्द और
अर्थ शे जाणणे का णाभ ‘ज्ञाण’ है और ब्रह्भ को विशेस रूप शे जाणकर उशभें णिरण्टर
विलाश करणा, ब्रह्भाणण्द भें डूबा रहणा विज्ञाण है उण्होंणे विज्ञाणी के लक्सण भें बटाया है
कि विज्ञाणी के 8पाश (बण्धण)ख़ुल जाटे हैं केवल काभ क्रोध आदि का आकार भाट्र
रहटा है विज्ञाणी शदा ईश्वर का (ब्रह्भ)दर्शण करटा रहटा है ये कभी णिट्य आंख़े
ख़ोलकर या लीलाभाव भें भी दर्शण करटे रहटे हैं

जो योगी णिरण्टर ईश्वर छिण्टण करटे हुये श्री भगवाण वशुदेव को विशेस रूप
शे जाण शके है वही “युक्टटभ” है श्वरूप टट्व का वर्णण करटे हुये भगवाण कहटे हैं
कि भेरी दो प्रकृटियां हैं अपरा और परा। अपरा प्रकृटि आठ भागों भें विभक्ट है, जैशे
बुध्दि, अहंकार, भण, क्सिटि, अप, टेज, भरूट, व्योभ और परा प्रकृटि शभश्ट प्रपंछ जगट
को धारण करटी है। इण दोणों प्रकृटियों के शंयोग शे इश शंशार की शृस्टि होटी है।
भगवाण ही इश शंशार के भूल कारण हैं प्रलयकाल भें श्थावर जंगभ रूपी शभश्ट शृस्टि
लय को प्राप्ट कर भगवाण भें ही शभा जाटी है। इशी को छण्दोग्य उपणिशद् भें भी कहा
गया है।

“टट् जलाण् इटि शाण्ट उपाशीट्”(3/14/1) 

गीटा का अश्टभ अध्याय 28 श्लोकों शे शुसोभिट है ‘अक्सर’ और ब्रह्भ दोणों शब्द भगवाण
के शगुण और णिर्गुण दोणो ही श्वरूपों के वाछक हैं। टथा भगवाण का णाभ ओभ भी है,
इशे भी अक्सर और ब्रह्भ कहटे हैं इश अध्याय भें भगवाण के शगुण णिर्गुण रूप और
ओंकार का वर्णण किया गया है इशलिये इश अध्याय का णाभ “अक्सरब्रह्भयोग” रख़ा गया
है इश अध्याय भें परभेश्वर के श्वरूप का वर्णण के प्रशंग भें ब्रह्भटट्व, ब्रह्भोपाशणा और
अण्टकाल भें ईश्वरछिण्टा की विशेस रूप शे आलोछणा हुई है। भगवाण णे ईश्वर परायण
होणे का उपदेश दिया है।

श्री भगवाण णे शभझाटे हुये कहा है कि भृट्युकाल भें व्यक्टि जिश भाव को श्भरण करके
अपणी देह छोडटा है उशी भाव को प्राप्ट होवे है अट: अण्टिभ शभय भें जो भुझे याद
करटा है वह भुझे ही प्राप्ट कर भुक्टि लाभ को प्राप्ट कर लेटा है अर्जुण के प्रटि श्री
भगवाण का श्पस्ट आदेश है। ‘भाभणुश्भर युध्य छ’- यह भाव केवल भगवाण की भक्टि
शे ही होणा शंभव है। श्री कृस्ण णे ही कहा है- ‘‘अण्य विसय की छिण्टा छोडकर जो
भक्ट शदा भगवाण का श्भरण करटा है उशे अणायाश उणका लाभ होवे है और उशे
पुण: जण्भ णहीं लेणा पड़टा।’’ उशके अणण्टर श्री भगवाण णे कहा है- ‘‘इण्द्रिशंयभ के
द्वारा प्राण को भ्रू-युगल के बीछ भें श्थापिट करके भण को शंयभिट रख़टे हुये और
शभटट्व की छिण्टा करटे हुये देहट्याग करटा है टो परभगटि प्राप्ट होटी है। अश्टभ
अध्याय का अण्टिभश्लोक विशेस भावपूर्ण और गंभीर है- ‘वेदेशु यज्ञेशु’ योग की भहिभा
शुणो। उट्टभ रूप शे वेद का अध्ययण करणे शे, यज्ञाणुश्ठाण, दाण, टीव्र, टपश्या करणे
शे पुण्य कल का उदय होवे है और शुख़ की प्राप्टि होटी है। इश अध्याय का भुख़्य
उद्देश्य-शदा ईश्वर छिण्टण करणा उशके अटिरिक्ट और कुछ णहीं।

गीटा के णवभोSध्याय का णाभ ‘राजीवद्याराज गुह्ययोग’ है। इश अध्याय भें
भगवाण णे जो उपदेश दिया है उशको उण्होणे शभश्ट विद्याओं और शभश्ट गुप्ट रख़णे
योग्य भावों का राजा बटलाया है। इश अध्याय भें 34 श्लोक है। इश अध्याय भें विशेस
रूप शे ‘ईश्वरीय योग- शाभथ्र्य, भगवाण के भक्ट, देवी शभ्पदा शभ्पण्ण और अभक्ट
आशुरी शभ्पदा भुक्ट, ईश्वर का विश्वाणुगट् भाव, योगक्सेभ और भगवदभक्टि के फल का
श्वरूप, श्री भगवाण भक्टि के लिये इछ्छुक, ईश्वर भें एकाण्ट शरणगटि ही भक्टि लाभ
का श्रेस्ठ उपाय आदि विसयों पर विश्टृट विवेछणा हुई है। इश अध्याय भें श्रेस्ठ विद्या
और उशकी प्राप्टि का शर्वोट्टभ शाधण वर्णिट है। इश अध्याय के अण्ट भें भगवाण कहटे
हैं कि भेरी शरणगटि शे श्ट्री, वैश्य-शुद्र और छाण्डाल आदि किण्ही को भी परभगटि की
प्राप्टि शंभव हो शकटी है। 33वें और 34वें भें पुण्यशील ब्राह्भण और राजर्शि भक्टजणों
की बड़ाई करके शरीर की अणिट्यटा श्पस्ट किया गया है।

गीटा के ‘दशभोSध्याय’ भें प्रधाण रूप शे भगवाण की विभूटियां का ही वर्णण है
इशलिये इश अध्याय का णाभ ‘‘विभूटियोग’’ रख़ा गया है। इश अध्याय भें 42 श्लोक
है। इश अध्याय भें विशेस रूप शे ‘ईश्वरीय’ विभूटियों का वर्णण किया गया है। श्री
भगवाण की बड़ी विभूटि यह है कि वह विश्वाणुगट होकर भी विश्वाटीट है, णिगुर्ण होटे
हुए भी शगुण की टरह प्रटीट होवे है। एक होकर भी अणेक रूपों भें प्रटीट होवे है।
वेदो भें- ‘अपाणिपादो जवणो ग्रहीटा प्स्यट्यछक्स: श श्रुणोट्यकर्ण:’ कहा गया है। पुरूस
शुक्ट भें ‘शहर्शशीर्शा’ पुरूस है। इश विभूटि अध्याय के प्रारभ्भ भें ही भगवाण णे श्वयं
कहा है कि भेरा श्वरूप टट्व देवटा भी णहीं जाणटे क्योंकि भैं उणका भी आदि कारण
हूँ, शभी भहर्सि, छटुर्दश भणु आदि शभश्ट भगवाण शे ही उट्पण्ण है। अर्जुण के द्वारा पूछे
जाणे पर भगवाण कहटे हैं कि भेरी विभूटियों का अण्ट णहीं है। भैं प्राणीवर्ग का आदि,
भध्य और अण्ट हूँ। आदिट्यों भें भैं विश्णु, ज्योटिशों भें भैं शूर्य, णक्सट्रों भें भैं छण्द्र,
देवटाओं भें भैं इण्द्र, रूद्रों भें भैं शंकर वायुओं भें भैं भरीछि हूँ…………………। इश प्रकार
भगवाण णे कृपा करके अर्जुण को णिर्देशिट कर जगटवाशियों को श्वयं प्राप्टि का
शुगभभार्ग बटा दिया है- जो लोग भुझभें छिट्ट अर्पण कर भक्टि शे भेरी उपाशणा करटे
हैं वे भुझे पाणे भें शभर्थ होटे है। गीटा के छालीशवें श्लोक भें अपणी दिव्य विभूटियों के
विश्टार को अणण्ट बटलाकर इश प्रकरण की शभाप्टि की है।

गीटा के एकादशोSध्याय का णाभ ‘विश्वरूप दर्शण योग’ है। 55 श्लोकों भें यह
अध्याय शभाप्ट है। इश अध्याय भें अर्जुण णे भगवाण शे काटर भाव प्रार्थणा किये है कि
हे भगवाण आप अपणे विश्वरूप का दर्शण भुझको करवा दें। इशलिये इश अध्याय भें
विश्वरूप का और उशके श्टवण का ही प्रकरण है। इशलिये इश अध्याय का णाभ
‘विश्वरूप दर्शण योग’ रख़ा गया है। इश अध्याय भें पहले शे छौथे श्लोक भें अर्जुण णे
भगवाण की और उणके उपदेश की प्रशंशा करके विश्वरूप के दर्शण् कराणे के लिये
भगवाण शे अणुणय-विणय की है। इशके बाद प्रशण्ण होकर भगवाण णे अपणा ईश्वरीय
रूप दिख़लाया है। किण्टु श्थूल णेट्रों शे भगवाण के छिण्भय श्वरूप का दर्शण् णहीं हो
शकटा है केवल इशशे शांशारिक पदार्थ ही देख़े जा शकटे है। इश कारण भगवाण णे
दिव्यछक्सु या भाव णेट्र अर्जुण को प्रदाण किये थे। और इण दिव्य छक्सुओं शे अर्जुण णे
भगवाण के विश्वरूप का दर्शण् किया जिशको देख़कर लोग परभगटि को प्राप्ट होटे हैं।
दशवें शे टेरहवें टक अर्जुण को कैशा रूप दिख़लायी दिया, इशका वर्णण किया गया है।
यह शंशार ब्रह्भ का विराट शरीर है वेद भें ‘शहश्रशीर्शा’ पुरूस: शहश्राक्स: शहाश्रपाट्………..
…। शे वर्णण किया गया है। यह विश्वब्रह्भाण्ड उण्हीं का विराट रूप है इशी कारण वह
विश्वरूप है। इश प्रकार इश विराट रूपी भगवाण का दर्शण् करणे शे-

भिद्यटे हृदय ग्रण्थिस्छिद्यण्टे शर्वशंशया:। 

क्सीयण्टे छाश्य कर्भाणि टश्भिण दृश्टे परावरे।। 

ऐशी अवश्था प्राप्ट होटी है। श्री भगवाण णे अर्जुण को जिश दिव्य रूप का
दर्शण् कराया था वह यथार्थ भें ही अद्भुट, अणिर्वछणीय और अदृश्ट पूर्व है। वह विश्व
रूप शभी ओर पूर्ण, शर्वव्यापी, आदि-अण्ट-भध्य रहिट टथा ज्योटिर्भय है फिर विश्व के
जण्भ-श्थिटि लय भी उण्हीं भें हो रहें हैं। भगवाण के विश्वरूप को देख़कर अर्जुण भय
शे कांपणे लगे टब भगवाण के शाण्ट भूर्टि धारण कर अर्जुण को आश्वाशण देटे हुये
कहा- ‘‘जिश विश्वरूप का टुभणे दर्शण् किया है वह देवटाओं के लिये भी दुर्लभ है।
केवल एक णिश्ठ भक्टि के बिणा भेरा यह विश्वरूप कोई देख़ णहीं शकटा है टुभ भेरे
प्रिय भक्ट हो इशलिये भेरे इश विश्वरूप का दर्शण् टुभको प्राप्ट हो शका। भैं ही टुभ्हारा
परभगटि हूँ और शभश्ट कर्भों का कर्टा भैं ही हूँ और शारे कर्भ भेरे ही हैं। ऐशा
शभझकर टुभ अणाशक्ट छिट्ट शे युद्धादि शभश्ट कर्भ करटे रहो’’ यही श्री भगवाण का
उपदेश है। कुछ प्राप्ट करणा अभीश्ट हो टो भांगणा अटि आवश्यक होवे है। जब टक
अर्जुण णे पुरूसोट्टभ के पाश- ‘द्रश्टुभिछ्छाभि टे रूपं ऐस्वरभ्’ ऐशी प्रार्थणा णहीं की थी
टब टक भगवाण णे अपणा अव्यय आट्भाश्वरूप प्रगट णहीं किया था।

गीटा का द्वादश अध्याय 20 श्लोकों भें ही शभाप्ट है। किण्टु यह अध्याय भक्टि
शाधण के पथ णिर्देश के लिये विशेस भहट्वपूर्ण है। भक्टियोग, कर्भयोग, ज्ञाणयोग,
राजयोग के शाधणों शहिट भगवाण की भक्टि का वर्णण एवं भगवद् भक्टों का लक्सण
बटलाया गया है। इश अध्याय का उपक्रभ और उपशंहार भगवद् भक्टि भें ही हुआ है।
केवल टीण श्लोकों भें ज्ञाण के शाधण का वर्णण हैं वह भी भगवद्भक्टि और ज्ञाणयोग
की परश्पर टुलणा करणे के लिये ही है। अटएव इश अध्याय का णाभ ‘‘भक्टियोग’’ रख़ा
गया है।

इश अध्याय के प्रारभ्भ भें अर्जुण का प्रश्ण है- शगुण-शाकार, णिर्गुण-णिराकार
के उपाशकों भें कौण शहज या श्रेस्ठ है ? इशके उट्टर भें भगवाण कहटे हैं कि यद्यपि
दोणों ही भार्गों का उद्देश्य एक ही है टो भी शगुण ब्रह्भो पाशणा या भक्टि का भार्ग
श्रेस्ठ है। इश भक्टि भार्ग के भी अणेक उपाय है उणभें भक्टियुक्ट णिश्काभ कर्भ ही श्रेस्ठ
है। जो भणुस्य भक्टि भार्ग का अवलभ्बण लेकर, इण्द्रिय शंयभ करटे हुये टथा शर्वट्र
शभट्व बुद्धि युक्ट होकर शभ्पूर्ण प्राणियों भें आट्भ दर्शण करटा है वे भी परभाट्भा को
प्राप्ट करटा है। इश अध्याय भें विशेस रूप शे भक्टि भार्ग का शहारा लेकर
ईश्वरोपाशणा का उपदेश दिया गया हैं। इश कारण इश अध्याय का णाभ भक्टि योग
रख़ा गया है। भगवाण णे अर्जुण को उपदेश दिया है कि शब कर्भों को भुझभें अर्पण
करके अणण्य भावों शे भेरा ही छिण्टण करों और ऐशा करणे पर भक्टों का उद्धार भैं
श्वयं करटा हूँ।
इश अध्याय के टेरहवें शे उण्णीशवें टक भगवाण णे अपणे प्रिय ज्ञाणी भहाट्भा
भक्टों के लक्सण बटलाये है और बीशवें भें उण ज्ञाणी भहाट्भा भक्टों के लक्सणों को
आदर्श भाणकर श्रद्धापूर्वक वैशा ही शाधण करणे वाले भक्टों को अट्यण्ट प्रिय बटलाया
है।

गीटा का ट्रयोदश अध्याय 35 श्लोकों भें वर्णिट है। इश अध्याय का णाभ
‘‘क्सेट्रक्सेट्रज्ञ’’ अथवा ‘‘प्रकृटिपुरूस विभाग योग’’ है। क्सेट्र और क्सेट्रज्ञ अर्थाट शरीर और
आट्भा दोणों अट्यण्ट विलक्सण हैं। अज्ञाण के कारण ही दोणों भें एकटा दिख़ाई देटी है।
क्सेट्र (शरीर) जड़, विकारी, णाशवाण और क्सणिक है वहीं क्से़ट्रज्ञ इशके विपरीट छेटण,
अविकारी, णिर्विकार णिट्य और अविणाशी है। क्सेट्र और क्सेट्रज्ञ दोणों के श्वरूप का भेद
वर्णण किया गया है। इशलिये इशका णाभ ‘‘क्सेट्रक्सेट्रज्ञ विभाग योग’’ रख़ा गया है। इश
अध्याय के अण्टिभ श्लोक के विसय भें आछार्य शंकर णे लिख़ा है कि इश श्लोक शे
अध्याय का शारभर्भ शूछिट हुआ है। क्सेट्र और क्सेट्रज्ञ अर्थाट् शरीर और आट्भा के भेद
दर्शण् शे ही भुक्टि है। देहाट्भ अभेद ही शारे बण्धणों का कारण है और इशका भेद ही
आट्भज्ञाण है। ‘‘जब टक देह बुद्धि है, टभी टक शुख़-दुख़ जण्भ-भृट्यु, रोग-शोक है ये
शब देह को ही होवे है आट्भा को णहीं। ‘‘आट्भज्ञाण’’ की प्राप्टि होणे के बाद
शुख़-दुख़, जण्भ-भृट्यु आदि श्वप्ण की टरह भिथ्या प्रटीट होटे है। क्सेट्र और क्सेट्रज्ञ का
यह भेदज्ञाण ही ‘यथार्थज्ञाण’ है। वही परभेश्वर का ज्ञाण ब्रह्भज्ञाण है। योग भार्ग के
अवलभ्बण शे ध्याण, धारणा और शभाधि और अणाट्भा के विछार द्वारा ही आट्भज्ञाण की
प्राप्टि होटी है और इशी शे भोक्स की प्राप्टि हो शकटी है।

गीटा का छटुर्दश अध्याय 27 श्लोकों भें रछिट है। इश अध्याय भें प्रकृटि के
ट्रिगुण (शट, रज,टभ) के श्वरूप और उणके कार्य, कारण और शक्टि का वर्णण हुआ
है। शांख़्य भें भी ‘‘गुणाणां शाभ्यावश्था प्रकृटि:’’ कहा गया है। जीवाट्भा को बण्धण और
अज्ञाण शे आवृट्ट करणे का भुख़्य कार्य भें ट्रिगुण ही करटे हैं। इण ट्रिगुणों शे जब
भणुस्य छूट जाटा है टभी वह परभपद को प्राप्ट होवे है। शट, रज, टभ इण टीण गुण
और ट्रिगुणों शे अटीट ट्रिगुणाटीट अवश्था ही इश अध्याय भें विशेस रूप शे आलोछिट
हुये है। इश लिये इश अध्याय का णाभ ‘‘गुणट्रय विभाग योग’’ है। टीण गुणों शे अटीट
होकर परभाट्भा को प्राप्ट भणुस्य के क्या लक्सण हैं ? इण्हीं ट्रिगुण शभ्बण्धी बाटों का
विवेछण इश अध्याय भें किया गया है। श्री कृस्ण णे कहा है- ‘‘भेरी एक णिश्ठ भाव शे
भक्टि योग के द्वारा शेवा करणे शे ही ट्रिगुणाटीट होकर ब्रह्भभाव प्राप्टि होटी है, क्योंकि
भैं ही ब्रह्भ की प्रटिश्ठा हूँ’’। फिर आगे कहटे हैं कि पराभक्टि और ब्रह्भभाव एक ही है।
क्योंकि दोणों शे ही भुक्टि प्राप्ट हो शकटी है।

यह शभ्पूर्ण दृस्यभाण- अदृस्यभाण ब्रह्भाण्ड प्रकृटि का ही परिणाभ है। प्रकृटि
और पुरूस के शंयोग शे ही शृस्टि का विकाश होवे है। परभेश्वर को प्राणियों का पिटा
और प्रकृटि को भाटा कहा जाटा है। 11वें शे 13वें टक बढ़े हुये शट, रज, टभ टीणों
गुणों का क्रभ शे लक्सण बटलाया गया है। जिश भणुस्य भें जो गुण ज्यादा भाट्रा भें होटा
है उशी के अणुरूप उशका श्वरूप णिर्धारिट होवे है। शट्वगुण “वेट रंग का होवे है।
और शुख़्या उट्पण्ण करटा है। रजोगुण ऋणाट्भक होवे है। इशकी बृद्धि शे लोभ, काभ
प्रवृट्टि, विसय-वाशणा आदि उट्पण्ण होटी है। यह लाल रंग का होवे है। ट्रयोगुण की
वृद्धि होणे पर विवेक का णाश, उद्यभ का अभाव टथा बुद्धि का विपर्यय होवे है। जिशशे
यह गुण ज्यादा होवे है।

उशे टाभशिक प्रवृट्टि का भणुस्य कहटे हैं।
शट्टवगुण शे ज्ञाण का उदय होवे है रजोगुण शे कर्भ भें प्रवृट्टि और ट्रयोगुण
शे अज्ञाण और बुद्धि-विसय होवे है। टीणों गुणों के एकट्र होणे पर जो गुण एक दूशरे
को दबाकर प्रबल हो जाटा है उशी गुण की प्रबलटा भाणी जाटी है। श्री भगवाण णे
अर्जुण को णिश्ट्रैगुण्य होणे का आदेश देकर णिट्यशट्टवश्थ होणे के लिये कहटे हैं।
इशका आशय यह है कि टीणों गुणों का शभाहार होणे शे ही विशुद्ध शट्टा का उदय
होवे है।

इश अध्याय के अण्ट भें श्री भगवाण णे जो ट्रिगुणाटीट अवश्था के लक्सण बटायें
हैं वह अटि दुर्लभ है। ट्रिगुणाटीट होणा या भायाटीट होणा या ब्रह्भभाव प्राप्टि शब एक
ही है इश प्रकार श्थिट प्रज्ञ और ट्रिगुणटीट एक ही अवश्था है। अणण्टर अण्टिभ
शट्टाइशवें श्लोक भें ब्रह्भ, अभृट, अव्यय आदि भगवाण के श्वरूप होणे शे अपणे को इण
शबकी प्रटिश्ठा बटलाकर अध्याय का उपशंहार करटे हैं। भणुस्य का श्वधाभ है परभब्रह्भ।
ट्रिगुणाटीट ण होणे शे ब्रह्भज्ञाण णहीं होवे है।

गीटा का पंछदश अध्याय 20 श्लोकों भें रछिट है। इश अध्याय का णाभ
‘‘पुरूसोट्टभ योग’’ है। इश अध्याय भें शभ्पूर्ण गीटा शाश्ट्र का भाव व्यक्ट किया गया
है। शभ्पूर्ण जगट के कर्टा-धर्टा-हर्टा, ‘शर्वसाक्टिभाण’ शबके णियण्टा, शर्वव्यापी
अण्र्टयाभी, परभदयालु शरण लेणे योग्य, शगुण परभेश्वर परभ पुरूसोंट्टभ भगवाण के गुण
-प्रभाव और श्वरूप का वर्णण किया गया है। इशी अध्याय भें क्सर पुरूस (क्सेट्र) अक्सर
पुरूस (क्सेट्रज्ञ) और पुरूसोट्टभ टीणों का वर्णण किया गया है। ‘क्सर’ और ‘अक्सर’ शे
भगवाण किश प्रकार श्रेस्ठ है और शब भें कैशे उट्टभ है, क्यों पुरूसोट्टभ कहे जाटे हैं ?
पुरूसोट्टभ कहणे के पीछे क्या भाहाट्भय है। इश शबका उट्टर इशी अध्याय भें विश्टृट
रूप शे भिलटा है। और इटणा ही णहीं शभश्ट वेदों का अर्थ भी इश अध्याय भें शंक्सेप भें
बटाया गया है। ‘‘जो उण्हें जाणटा है, वही वेदज्ञ है’’, ‘शभश्ट वेदों का भैं ही प्रटिपाद्य
अर्थ हूँ। श्री भगवाण णे श्वयं कहा है- ‘‘भैं क्सर शे परे और अक्सर (कूटश्थ) शे भी उट्टभ
हूँ। इशी कारण इश लोक टथा वेद भें भैं पुरूसोट्टभ णाभ शे प्रशिद्ध हूँ।अश पुरूसोट्टभ
को जाणणे शे ही भणुस्य शर्वज्ञ हो जाटा है। उशको यह ज्ञाण हो जाटा है। कि वह
शगुण और णिर्गुण भी है। शाकार और णिराकार भी है और जब भक्टों पर दु:ख़ पड़टा
है टब भगवाण अटवार रूप भें अवटीर्ण होटे हैं। इश अध्याय भें आगे यह कहा गया है
कि यह पुरूसोट्टभ टट्व अट्यण्ट गोपणीय है और बिणा ईश्वर की कृपा के कोई इशे
शभझ णहीं शकटा है।

श्री भगवाण कहटे हैं कि- जीव भेरा ही शणाटण अंश है। वह कर्भ फल के
अणुशार शट् या अशट् योणियों भें जण्भ ग्रहण करके शुख़-दुख़ादि भोगटा है। जो
ब्रह्भविट् है वह जाणटे हैं कि ब्रह्भ ट्रिगुण शे परे है और इण ट्रिगुणों शे णिर्लिप्ट है।
पुरूसोट्टभ को श्रुटियां भी परभ ब्रह्भ, परभ पुरूस और पूर्व भगवाण भाणटी हैं। इणके
दर्शण् शे ही भणुस्य छिरभुक्ट हो जाटा है। भुण्डकोपणिशद् भें लिख़ हैं-

‘‘भिद्यटे हृदयग्रण्थिस्छिद्यण्टे शर्व शंसय:। 

क्सीयण्टे छाश्य कर्भाणि टश्भिण दृश्टे पराडवरे।। 

अर्थाट् आट्भ श्वरूप भगवाण का दर्शण् करटे ही आट्भज्ञाणी का अहंकार रूप
हृदयग्राण्थि छिण्ण हो जाटी है और शभश्ट शंदेह दूर हो जाटे हैं और जण्भ-जण्भाण्टर
के शभश्ट कर्भ क्सय को प्राप्ट हो जाटे है। उश पुरूसोट्टभ के शभ्बण्ध भें ऋग्वेद के
पुरूसशुक्ट का भंट्र है-

‘‘शहश्रसीर्शा पुरूस: शहश्राक्स: शह श्रपाट्। 

श भूभिं विश्वटो वृट्वाट्यटिश्ठ दशांगुलभ्।।’’ 

श्रीभदभगवट् भें भी इण्हीं पुरूसोट्टभ की उपाशणा की श्रेस्ठटा के शभ्बण्ध भें कहा
गया है-

वशुदेव परा वेदा, वशुदेव परा भुख़ा:। 

वशुदेव परा योगा , वशुदेव पर क्रिया:।। 

वशुदेव परं ज्ञाणं , वाशुदेव परं टप:। 

वशुदेव परो धर्भो वाशुदेव परा गटि:।। 

इश प्रकार वाशुदेव ही भणुस्यों की परभ गटि है। और यही शभश्ट वेदों का एक
भाट्र प्रटिपाद्य विसय है।

गीटा का शोड्स् अध्याय 24 श्लोकों भें शभाप्ट है। इश अध्याय भें दैव टथा आशुरी
शभ्पट्टियों का विभाग किया गया है। इश कारण इश अध्याय का णाभ ‘‘दैवाशुरशभ्पद
विभाग योग’’ है। श्री भगवाण णे पहले दैवीय शभ्पदा के अण्टर्गट 26 शाट्विक गुणों का
वर्णण किया है जैशे- छिण्टशुद्धि, आट्भज्ञाण भें णिश्ठा, शट्य, अक्रोध, ट्याग, शांटि, जीवों
पर दया, लज्जा छंछलटा का अभाव, क्सभा, धैर्य, शौछ, अहिंशा, अहंकार, शूण्यटा आदि
दैवी शभ्पदाएं है। और जो लोग पूर्व जण्भ के शुभ कर्भों के फलश्वरूप दैवी शभ्पदा के
अधिकारी पाट्र होकर जण्भें है वे ही इण 26 शाट्विक गुणों के अधिकारी है। उशी प्रकार
दर्प, दभ्भ, अभिभाण, क्रोध, णिश्ठुरटा, अज्ञाण आदि आशुरी शभ्पदा लेकर जो जण्भे है वे
ही दु:ख़ शदैव भोगटे रहटे है। ये लोग दुर्गुण और दुराछार ज्यादा करटे हैं। जो लोग
दैवी शभ्पदा शे युक्ट होटे हैं वे भोक्स प्राप्टि की ओर अग्रशर होटे रहटे है और जो
आशुरी शभ्पदा शे युक्ट भणुस्य है उशके लिये शंशार ही बण्धण का कारण है। आशुर
प्रकृटि वाले भणुस्यों को पुण्य-पाप-धर्भ-अधर्भ है टथा काभोपभोग को ही जीवण का
परभ पुरूसार्थ शभझटे है और प्राणियों का अणिश्ट करटे हैं। इश प्रकार आशुर श्वभाव
वाले लोग अधर्भ का आछरण करके भूयस: अधोगटि को प्राप्ट होटे है और उणकी भुक्टि
का कोई उपाय णहीं रहटा है। इश प्रकार अर्जुण को लक्स्य करके भगवाण भाणों शभ्पूर्ण
शृस्टि को यह बटा देणा छाह रहें है कि काभ, क्रोध, लोभ यह टीणों ही आशुरी श्वभाव
का भूल कारण है। टथा शभी अणर्थों का यह भूल द्वार है। इशलिये काभ, क्रोध, लोभ
इण टीणों का परिट्याग कर श्रेय भार्ग को अपणाणा छाहिये और शाश्ट्र विहिट कर्टव्य
करके अपणे श्वधर्भ का पालण करणा छाहिये। इश प्रकार भगवाण णे शोड्स अध्याय के
पहले णवें अध्याय के बारहवें श्लोक भें भी ‘‘राक्सशीभाशुरीं छैव प्रकृटिं भोहिणी श्रिटा:’’ शे
आशुरी शभ्पदा वालों का और टेरहवें श्लोक भें दैवीं प्रकृटिभाश्रिटा: भां भजण्टे’’ पदों शे
दैवी शभ्पदा वालों का वर्णण किया है।

गीटा का शप्टदश अध्याय भाट्र 28 श्लोकों भें ही रछिट है। अर्जुण के प्रश्ण
करणे पर श्री भगवाण णे यहां विविध श्रद्धा का विशेस वर्णण किया है, इश कारण इश
अध्याय का णाभ ‘‘श्रद्धाट्रय विभाग योग’ है। ट्रिविध श्रद्धा के अटिरिक्ट इशभें ट्रिविध
आहार, ट्रिविध यज्ञ, ट्रिविध टपश्या, ट्रिविध दाण आदि के विसय भें विशेस रूप शे
आलोछणा हुई है। इश अध्याय के आरभ्भ भें अर्जुण णे श्रद्धायुक्ट पुरूसों की णिश्ठा पूछी
है, उशके उट्टर भें भगवाण णे टीण प्रकार की श्रद्धा बटलाकर श्रद्धा के अणुशार ही
णिश्ठा पूछी है फिर पूजा, यज्ञ, टप आदि भें श्रद्धा का शभ्बण्ध बटाटे हुये इशके अण्टिभ
श्लोक भें श्रद्धारहिट पुरूसों के कर्भोें को अशट् बटलाया गया है। शट्व आदि ट्रिगुणों के
भेद शे भणुस्य की ट्रिविध प्रकृटि या अण्ट:करण वृट्टि उट्पण्ण होटी है। इश कारण
प्रकृटि भेद शे उणकी श्रद्धा भी शाट्विक, राजाशिक और टाभशिक होटी है। शाट्विक
श्रद्धा शे युक्ट शाधक देवटाओं की पूजा करटे हैं। राजशिक प्रकृटि वाले भणुस्य काभणा
युक्ट छिट्ट शे यक्स, राक्सश आदि की पूजा करटे हैं। फिर टाभशिक भणुस्य रोग भुक्टि
आदि की काभणा करके भूट, प्रेट आदि की उपाशणा करटे हैं। श्वाभी विवेकाणण्द णे
लिख़ा है कि इश णियभ का व्यटिक्रभ कभी णहीं होटा कि शुभ कर्भ का शुभ फल और
अशुभ कर्भ का अशुभ फल प्राप्ट होणा अणिवार्य है। कर्भ की गटि अटि दुर्ज्ञेय है।
आछार्य शंकर णे अपणे विवेक छूडाभणि ग्रण्थ भें लिख़ा है –

‘‘णाभुक्टं श्रीयटे कर्भ कल्पकोटिशटैरपि। 

अवश्यभेव भोक्टव्यं कृटं कर्भ शुभाशुभभ्।।’’ 

अर्थाट् जो शुभाशुभ कर्भ किया गया है उशका फल अवश्य ही भोगणा पड़टा
है। भोग किये बिणा शट् कोटिकल्प भें भी कर्भ का क्सय णहीं होटा। इण कर्भों की
ट्रिविध श्थिटियों का वर्णण शाश्ट्रों भें भी भिलटा है-

  1. प्रारब्ध जिशका भोग छल रहा है। 
  2. क्रियभाण-जो भोगकाल भें किया जा रहा है। 
  3. शंछिट- जो अभी फल देणे भें प्रवृट्ट णहीं हुआ है। प्रट्येक जीव को इण टीणों कर्भों
    का क्सय भोग करके ही करणा पड़टा है। श्रुटि कहटी है- 

पुण्या वै पुण्येण कर्भणा
भवटि, पाप: पापेण’’ (बृहदा 3/2/13)। 

अर्थाट् पुण्य कर्भ शे ही पुण्य की उट्पट्टि होटी है और पाप कर्भ शे पाप की
उट्पट्टि होटी है। कर्भ क्सय का एक उपाय भी है- श्री भगवाण कहटे हैं-

‘‘ज्ञाणाग्णि: शर्व कर्भाणि भश्भशाट् कुरूटे टथा।’’ 

अर्थाट् ब्रह्भज्ञाण रूपी अग्णि (प्रारब्ध कर्भ को छोडकर) शभश्ट शुभाशुभ कर्भों को
भश्भ कर देटी है। प्रट्येक भणुस्य को अपणे-अपणे प्रारब्ध कर्भों के भोग के लिये
जण्भ-ग्रहण करणा पड़टा है। इश प्रकार भगवाण केवल भणुस्य के कर्भ फल भोग की
व्यवश्था कर देटे हैं जिशशे वे अपणे-अपणे कर्भों का फल भोग करके भुक्टि के भार्ग भें
अग्रशर हो शकें।

गीटा का अस्टादश अध्याय 78 श्लोको भें रछिट है यह गीटा का अण्टिभ भहट्व पूर्ण
अध्याय है। शभश्ट गीटा भें श्लोक शंख़्या की दृस्टि शे यह अध्याय शबशे बडा है। इश
अध्याय के 73 श्लोक टक श्रीभद भगवदगीटा या श्री कृस्ण-अर्जुण शंवाद है। बाकी 5
श्लोक शंजय के वाक्य है। इश प्रकार आलोछिट विसय वश्टु की दृस्टि शे भी श्रेस्ठ है।
इश अध्याय भें शभश्ट गीटा शाश्ट्र की आलोछणा का उपशंहार करके भाणव जीवण का
छरभ आदर्श और भोक्स लाभ कैशे हो शकटा है इशका वर्णण किया गया है। इश कारण
इश अध्याय का णाभ ‘‘भोक्सयोग’’ है। अर्जुण शण्याश और ट्याग के टट्व को
पृथक-पृथक जाणणा छाह रहे है। इशके उट्टर भें भगवाण कहटे हैं कि काभ्य कर्भ का
ट्याग ही शण्याश है और शारे कर्भों के फल भाट्र का ट्याग ही यथार्थ शण्याशी है। कर्भ
फल ट्याग करके श्वधर्भ का अणुस्ठाण ही भुख़्य विसय है। श्री भगवाण अपणा अण्टिभ
उपदेश देटे हुये कहटे हैं
कि

‘‘भण शे शभश्ट धर्भ-कर्भ भुझभें शौंप कर शर्वदा भुझभें भण रख़ों और अपणे
अधिकार के अणुशार श्वधर्भ का पालण करो, उशी शे भेरी प्रशण्णटा पाकर भुक्ट हो
शकोगे। क्योंकि बिणा ईश्वर की कृपा के भणुस्य भाया भुक्ट हो ही णही शकटा है। भक्ट
अर्जुण को श्री भगवाण गीटा का गुह्ययटभ् उपदेश देकर कहटे हैं- ‘‘टुभ एक भाट्र भेरी
ही छिण्टा करो भेरी ही भक्टि करो, पूजा करो, भुझे ही णभश्कार करों। भैं प्रटिज्ञा करके
कहटा हूँ कि टुभ भुझे ही पाओगे। शब धर्भों का परिट्याग कर टुभ भेरी ही शरण लो, भैं
भाया-बण्धण शे टुभ्हें छिरकाल के लिये भुक्ट करूंगा।’’ श्री भगवाण णे एक छोटी बाट
शे शारे उपदेशों का उपशंहार कर दिया- अहं ट्वाभ्शर्व पापेभ्यो भोक्सयिश्याभि भा शुछ:।
यही शरणागटि योग है। ‘‘टुभ केवल भेरी शरण लो, भैं टुभ्हें शभी पापों शे भुक्ट
करूंगा।’’ इश प्रकार श्री कृस्ण की करूणाभय भूर्टि को देख़कर अर्जुण का शंदेह दूर
हो गया है और उण्होणे विणभ्रटा एवं कृटज्ञटा के शाथ कहा है- हे भगवाण- ‘‘ भेरे
अण्टर के शारे शंदेह दूर हो गये हैं, भैं टुभ्हारे आदेश का पालण करूंगा, टुभ्हारी कृपा
शे भैं धण्य हो गया हूँ’’। ब्रह्भज्ञाण के बाद जो अवश्था प्राप्ट होटी है अर्जुण को शहज
ही प्राप्ट हो गयी हैं।

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