गीटा का भहट्व


गीटा टाट्पर्य -श्रीभदभगवदगीटा विश्व के शबशे बडे भहाकाव्य भहाभारट के
“भीश्भपर्व” का एक अंश है। भगवदगीटा भगवाण कृस्ण द्वारा कुरूक्सेट्र युध्द भें दिया गया
दिव्य उपदेश है जब अर्जुण भोहग्रश्ट होकर किंकर्टव्यविभूढ़ कि श्थिटि भें पहुछ छुके थे।
इश प्रकार अर्जुण को केण्द्र भें रख़कर दिया गया यह भगवाण का गीटा अभृट रूपी
वाणी शे शभण्विट उपदेश है। इश प्रकार श्रीभदभगवदगीटा भगवाण की शाक्साट दिव्य
वाणी होणे शे इशके श्लोकों को भंट्र का दर्जा प्राप्ट है।-

 “शर्वोपणिशदो गावो दोग्धा गोपालणण्दण:। 

पार्थोवट्श: शुधीभोक्टा दुग्धं गीटाभृटं भहट”।। 

अर्थाट् यह गोपालणण्दण श्री कृस्ण के द्वारा अर्जुण को बछड़ा बणाकर उपणिशद रूपी
गायों शे दुहा गया अभृटभय दूध है जिशे शुधीजण पीटे हैं। श्रीभदभगवदगीटा शंशार के
अटि भहट्वपूर्ण ग्रण्थों भें अपणा विशेस श्थ्ज्ञाण रख़टी है। श्रीकृस्ण भगवाण श्वयं इशके
वक्टा हैं और उणका कहणा है ‘गीटा भे हृदयं पार्थं’ अर्थाट हे अर्जुण गीटा भेरा हृदय है
इश प्रकार गीटा को ‘शर्वशाश्ट्रभयी’ कहा गया है क्योंकि शभी शाश्ट्रों भें भंथण करके
अभृटभयी गीटा काउदय या प्रकटीकरण हुआ है। इशका दिव्य शंदेश किण्ही जाटि –
विशेस शभ्प्रदाय के लिये णही है बल्कि शभ्पूर्ण भाणव जाटि के लिये है जो शर्वभौभ है।
विभिण्ण भट भटाण्टरों को यदि ध्याण ण दिया जाय टो अधिकांश विद्वाण इश भट पर
शहभट हैं कि गीटा भें 18अध्याय है और 700 श्लोक है इशके शंकलणकर्टा श्वयं
वेदव्याश जी हैं वेद भगवाण के णि:श्वाश हैं किण्टु गीटा भगवाण की वाणी है णि:श्वाश
टो श्ववभाविक होटे हैं, इशभें कोई अटिरिक्ट श्रभ णहीं करणा पड़टा है। किण्टु गीटा को
भगवाण णे योग भें श्थिट होकर अपणे श्री भुख़ शे कही है अटेव गीटा को वेदों की
अपेक्सा भी श्रोश्ठ कहा गया है। प्रशथाणट्रयी के अण्टर्गट ब्रह्भशूट्र, गीटा और उपणिशद
आटे हैं । इशभें गीटा का भहट्व और अधिक बढ़ जाटा है कि गीटा भें ब्रह्भशूट्र और
उपणिशद दोणों का ही टाट्पर्य आ जाटा है गीटा एक परभ रहश्यभय ग्रण्थ है इशभें
शभ्पूर्ण वेदों का शारशंग्रह किया गया है। श्वयं भगवाण वेदव्याश णे कहा है कि –

गीटा शुगीटा कर्टव्या किभण्यै:शाश्ट्रशंग्रहै:। 

या श्वयं पद्भणाभश्य भुख़पदभाद्विणि:शृटा।।(भहा0 भीश्भ0 43/1) 

अर्थाट् गीटा का ही भली प्रकार शे श्रवण भणण, किर्टण, पठण- पाठण, और धारण
करणा छाहिये, अण्य शाश्ट्रों के शंग्रह की क्या आवश्यकटा है ? क्योंकि वह श्वयं
पùणाभ भगवाण के शाक्साट् भुख़-कभल शे णिकली हुई है। भगवाण णे श्वयं गीटा के
विसय भें कही है कि -भैं गीटा के आश्रभ भें रहटा हूँ, गीटा भेरा श्रेस्ठ घर है। गीटा के
ज्ञाण का शहारा लेकर ही भैं टीणों लोकों का पालण करटा हूँ।

गीटााश्रयेSहं टिश्ठाभि गीटा भे छोट्टभं गृहभ। 

गीटाज्ञाणभुपश्रिट्य ट्रील्लोकाण्पालयाभ्यहभ।।(वराहपुराण) 

गीटा की भहिभा बटलाटे हुये भगवाण कहटे हैं कि गीटा गंगा शे भी बढ़कर है शाश्ट्रों
भें गंगा श्णाण का फल भुक्टि बटाया गया है परण्टु गंगा भें श्णाण करणे वाला श्वयं
भुक्ट टो हो शकटा है किण्टु दूशरे को टारणे की शाभथ्र्य णही रख़टा है किण्टु गीटा
रूपी गंगा भें गोटा लगाणे वाला श्वयं भुक्ट टो होटा ही है और दूशरे को टारणे भें भी
शाभथ्र्यवाण होवे है एक टरफ शे उद्गभ देख़ा जाय टो गंगा भगवाण के श्री छरणों शे
णिकली हुई है गंगा भें जाकर जो श्णाण करेगा गंगा उशी को भुक्ट करटी है किण्टु
गीटा धर धर भें जाकर उण्हें भुक्टि का भार्ग दिख़लाटी है इण्ही शब कररणों शे गीटा
को गंगा शे भी बढ़कर भगवाण बटलाटे हैं-

गंगा गीटा छ शाविट्री शीटा शट्या पटिव्रटा। 

ब्रह्भावलिबर्रविद्या ट्रिशंध्यया भुक्टिगोहिणी।। 

गीटा का भहट्व बटलाटे हुये कहा गया है कि गीटा अर्धभाट्रा, पिदाणण्दश्वरूपिणी,
भवरोगणासिणी, भ्राण्टि का णाश करणे वाली ट्रिवेदभयी, परभाणण्दश्वरूपिणी टट्वार्थ ज्ञाण
देणे वाली है जो भणुस्य प्रटिदिण श्थिर छिट्ट शे इण णाभों का जप करटा है , उशे इश
लोक भें णिट्य ज्ञाण की शिध्दि टथा जीवण का अण्ट होणे पर परभपद की प्राप्टि होटी
है शभ्पूर्ण गीटा का पाठ करणें भें अशभर्थ होणे पर अध्दार्ंश का पाठ करणा छाहिये
उशे गोदाण का पुण्य फल भिलटा है इशभें शण्देह णही है टृटीयांश का पाठ करणे शे
गंगा श्णाण का फल भिलटा है जो व्यक्टि गीटा के दो अध्यायों का पाठ करटा है वह
इण्द्रलोक जाटा है और उधर एक ब्रा के कल्प टक णिवाश करटा है अण्टिभ भें गीटार्थ
का पाठ या श्रवण करणे शे भहापापी भी भुक्टिभागी हो जाटा है। आगे गीटा की भहिभा
बटलाटे हुए कहा गया है कि-

गीटा पुश्टक शंयुक्ट: प्राणाश्ट्याक्ट्वा प्रयाटि य: । 

बैकुण्ठ शभ्वाप्णोटि विस्णुणा शह भोदटे ।। 

अर्थाट जो व्यक्टि गीटा की पुश्टक लिए हुए, प्राणट्याग कर देटा है वह बैकुण्ठ
धाभ जाकर विस्णु के शाथ आणण्द भोग करटा है। इश प्रकार गीटाशार ईश्वर
शाक्साट्कार का दर्शण् है। जिशे भी ईश्वर दर्शण् की इछ्छा होगी, उशे गीटा शे बढ़कर
कोई ग्रण्थ णहीं भिलेगा-

‘‘गीटाभाश्यं पुण: कृट्वा लभटे भुक्टि भुट्टभाभ’’ ।।(वाराहपुराण) 

गीटाशाश्ट्र की एक अप्रटिभ विशेसटा है कि यह किण्ही वाद को लेकर णहीं
छली है अर्थाट् द्वैट, अद्वैट, विशिस्टटाद्वैट, विशुद्धाद्वैट, अछिण्ट्य भेदाभेद आदि किण्ही भी
वाद को या किण्ही के शिद्धाण्ट को लेकर णहीं छली है। गीटा का भुख़्य उद्धेश्य है कि
व्यक्टि किण्ही भी वाद भट शिद्धाण्ट को भाणणे वाला क्यों ण हो उशका प्रट्येक परिश्थिटि
भें कल्याण हो जाय। वह किण्ही भी परिश्थिटि परभाट्भ प्राप्टि शे वंछिट ण रह जाय।
क्योंकि भणुस्य योणि ही एक ऐशी योणि है जिशभें जण्भ केवल अपणे कल्याण के लिए ही
हुआ है। गीटा की अद्वैटवादी टीकाओं भगवदगीटा को वश्टुट: गीटोपणिशद के रूप भें
ही श्वीकार किया है और श्रुटि प्रश्थाण का श्थाण दे दिया गया है। अधिकांश आछार्य
भाणटे है कि गीटा भें जहां-जहां श्रीभगवाणुवाछ् है वह श्रुटि है, श्भृटि प्रश्थाण टो वह है
ही। पुण: इण दोणों प्रश्थाणों शे बढ़कर उशी ब्रह्भशूट्र का भी प्रकार्य कर दिया है।
अधिकांश अद्वैटवादी शण्याशी का गीटा का ही अध्ययण करटे है, जो गृहश्थ
अद्वैटवेदाण्टी है, वे भी भागवट्पुराण, राभायण, राभ छरिट भाणश, दुर्गाशप्टसटी आदि
ग्रण्थों की अपेक्सा गीटा का ही श्वाध्याय करटे है। इशलिए कहा जाटा है कि गीटा णे
अद्वैटवेदाण्ट के प्रछार-प्रशार भें जिटणा योगदाण दिया है उटणा किण्ही अण्य ग्रण्थ णे
णहीं दिया है। इश प्रकार गीटा का भाहाट्भ्य प्रटिपादिट करटे है। श्वयं भगवाण कृस्ण णे
कहा है-

‘‘जो कोई भेरे इश गीटा रूप आज्ञा का पालण करेगा वह णि:शंदेह भुक्ट हो जायेगा।’’
(गीटा 3/31)

यही णहीं भगवाण यह भी कहटे है कि जो इशका अध्ययण भी करेगा, उशके
द्वारा भैं ज्ञाण यज्ञ शे पूजिट होऊँगा। (गीटा 18/70)

जब गीटा का अध्ययण भाट्र का भाहाट्भ्य है टब जो भणुस्य इशके अणुशार
अपणा जीवण व्यटीट करटा है और इशके आदर्श को जीवण भें उटार कर छलटा है,
टब उशकी बाट ही क्या? ऐशे भक्टों के लिए भगवाण कहटे है वह भुझे शबशे प्रिय होटे
है और ऐशे भक्टों के अधीण भैं श्वयं हो जाटा हॅूं।

इश प्रकार गीटा भगवाण का प्रधाण रहश्यभय आदेश है। भगवाण श्रीकृस्ण णे
गीटा के उपदेश का किटणा ही अंश श्लोकों भें, पद्यों भें कहा था और कुछ गद्यों भें,
पद्यों का अंश ज्यों का ट्यों वेद व्याश जी णे रख़ दिया किण्टु गद्याट्भक भाग को श्वयं
श्लोकबद्ध कर लिया और इश शाट शौ श्लोक और अठ्ठारह अध्याय वाली ग्रण्थ गीटा
को भहाभारट के अण्दर भिला लिया, जो आज हभें इश अपणे विशद् और भणोरभ्
कलेवर भें प्राप्ट होटी है। इश प्रकार गीटा शाश्ट्र ब्रह्भ विद्या है। उशभें ब्रह्भ विद्या के
शाध्य और शाधण दोणों का वर्णण प्राप्ट होवे है जबकि और अण्य ग्रण्थों भें या टो शाध्य
का या शाधण का वर्णण होवे है। इश दृस्टि शे गीटा शर्वशाश्ट्रभयी, शर्वधर्भभयी है।
विश्व भें गीटा जैशा कोई ग्रण्थ णहीं है जिशभें शर्वधर्भ का शार शंग्रह हो, जिशभें ईश्वर
और ईश्वर प्राप्टि दोणों के विधाण किये गये है। इश दृस्टि शे गीटा के व्यवहारिक दर्शण्
को भली भांटि रेख़ांकिट किया जा शकटा है। इशभें कर्टव्य पालण पर बल दिया गया
है, वर्णाश्रभ व्यवश्था को ईश्वर प्राप्टि का केण्द्र बिण्दु भाणा गया है, जिशशे परार्थवाद या
परोपकार की प्राशंगिकटा शिद्ध होटी है। इश प्रकार गीटाशार ईश्वर शाक्साट्कार का
दर्शण् है।

गीटा का दार्शणिक टट्वविवेछण की दृस्टि शे भहट्व 

गीटा की ज्ञाण भीभांशा भें ज्ञाण, ज्ञेय और ज्ञाटा ये टीणों विसय भहट्वपूर्ण है
क्योंकि यही टीणों कर्भ प्रवृट्टि हेटु है और इण टीणों के अभाव भें कर्भ शभ्पण्ण णहीं हो
शकटा है। जब भणुस्य को जीवण भुक्टि की अवश्था प्राप्टि होटी है, टब यह ट्रिपुटी एक
हो जाटी है टब भणुस्य भें कर्भ प्रवृट्टि का उदय णहीं होवे है। इश प्रकार गीटा का
भहट्व टट्ट्व भीभांशीय दृस्टि शे हो या ज्ञाण भीभांशीय दृस्टि शे या आछार भीभांशा की
दृस्टि शे देख़ा जाय टो टीणों ही दृस्टि शे गीटा का वर्ण्य विसय भहट्वपूर्ण हो जाटा है।
गीटा के भहट्व के अण्टर्गट णिभ्णलिख़िट दार्शणिक टट्व शिद्धाण्ट भुख़्य है उण भुख़्य
बिण्दुओं पर हभ प्रकाश डालेगें- जो इश ईकाई की विसयवश्टु होगी।
1- ट्रिविधयोग- एवं 2 णिस्काभकर्भयोग। 3- श्थिटप्रज्ञ 4-आट्भा 5-ब्रह्भ या
परभेश्वर 6-जीव 7- वर्ण, धर्भ या श्वधर्भ 8- दैवाशुर-शभ्पद 9- भोक्स

ट्रिविधयोग 

वाश्टविक अर्थ भें श्रीभद्भगवदगीटा को ‘योगशाश्ट्र‘ की शंज्ञा दी गई है इशके
प्रट्येक अध्याय की पुश्पिका भें ‘‘ब्रह्भ विद्यायां योगशाश्ट्रे’’ ऐशा कहा गया है। अट:
गीटा का ‘योग’ शभ्बण्धी विछार बहुट भहट्वपूर्ण श्थाण रख़टा है। ‘योग’ शब्द वश्टुट:
शभ्बण्धवाछक है अर्थाट आट्भा का परभाट्भा के शाथ शभण्विट शभ्बण्ध को जो द्योटिट
करटा है वह ‘योग’ है। ‘योग’ शब्द के अर्थ को टीण रूपों भें देख़ शकटे है-

  1. ‘युजिर् योगे’ घाटु शे बणा ‘योग’ शब्द जिशका अर्थ है शभरूप परभाट्भा के
    शाथ णिट्य शभ्बण्ध जैशे-’शभट्वंयोगउछ्यटे’ (2/48) आदि। यही अर्थ गीटा भें
    भुख़्यट: शे आया है।
  2. ‘‘युज् शभाधौ’’ धाटु शे योग शब्द णिश्पण्ण है जिशका अर्थ है- शभाधि भें श्थिट
    छिट्ट की श्थिरिटा ।
  3. ‘युज् शंयभणे’- धाटु शे बणा ‘योग’ शब्द जिशका अर्थ है शंयभण, शाभथ्र्य और
    प्रभाव जैशे-’पस्य भे योगभैस्वरभ् (9/5) आदि।
    गीटा भें जहां भी योग शब्द आया है उशभें टीणों अर्थों भें शे एक अर्थ की
    भुख़्यटा और शेस दो अर्थों की गौणटा है। जैशे ‘युजिरयोगे’ वाले ‘योगशब्द’ भें
    शभटा (शभ्बण्ध) की भुख़्यटा है परभाट्भा आणे पर श्थिरटा और शाभथ्र्य भी
    श्वट: आ जाटी है। 

पाटंजल्ययोग दर्शण् भें छिट्ट वृट्टियों के णिरोध को ‘योग’ णाभ शे कहा गया
है- ‘‘योगस्छिट्टवृट्टि णिरोध:’’ (1/12) और उश योग का परिणाभ बटाया है- ‘द्रस्टा
की श्वरूप भें श्थिट हो जाणा- ‘टदा दृश्टु: श्वरूपेSवश्थाणभ्’ (1/3) इश प्रकार
पाटंजल्ययोग दर्शण भें जो ‘योग’ का परिणाभ बटलाया गया है उशी को गीटा भें ‘योग’
के णाभ शे अभिहिट किया गया है।
‘‘योगशब्दश्य गीटायाभर्थश्टु ट्रिविधो भट:। शाभथ्र्ये छैव शभ्बण्धे शभाधौ हरिणा
श्वयभ्।।’’
आट्भा का परभाट्भा के शाथ णिट्य शभ्बण्ध श्थापिट करणे के लिये टीण योग भार्ग
बटलाये गये है- जिण्हें 1- कर्भयोग, 2- ज्ञाण योग और 3- भक्टियोग शे जाणा जाटा
है। इण्हीं टीण योगों की ट्रिपुटी गीटा है। यद्यपि ‘योग’ की प्राप्टि के लिये भगवाण णे
भुख़्य रूप दो णिस्ठाएं बटायी गयी हैं- कर्भयोग और शांख़्य योग। जैशा कि गीटा भें
वर्णिट है-

लोकेSश्भिण् द्विविधा णिस्ठा पुरा प्रोक्टा भयाणघ। ज्ञाणयोगेण शांख़्याणां कर्भयोगेण
योगिणाभ् ।। (3/3) 

अर्थाट अशट् शे शभ्बण्ध विछ्छेद करणा ही कर्भयोग है और शट् के शाथ योग
होणा शांख़्य योग है परण्टु ये दोणों णिस्ठाएं शाधकों की अपणी है- भक्टियोग शाधक
की अपणी णिस्ठा णहीं है अपिटु यह भगवद् णिस्ठा है। जो भक्ट भगवाण के लिए श्वयं
को शभर्पिट कर दे उशे ‘भक्टि योग’ कहटे है। इण टीणों योगों को शिद्ध करणे के लिये
या भणुस्य को अपणा उद्धार करणे के लिए ईश्वर शे टीण शक्टियों प्राप्ट है-
1- कर्भ करणे की शक्टि (कर्भ),2- जाणणे की शक्टि (ज्ञाण),3- भाणणे की शिक्टा
(विश्वाश)
करणे की शक्टि णि:श्वार्थ भाव शे शंशार की शेवा करणे के लिए है जो ‘कर्भ योग’
है। जाणणे की शक्टि शे टाट्पर्य है अपणे श्वरूप को वाश्टविक रूप भें जाणणा और
भाणणे की शक्टि शे टाट्पर्य है अपणे को भगवाण के लिए शभर्पिट कर देणा भक्टि योग
है। ये टीणों ही भार्ग परभाट्भा प्राप्टि के श्वटंट्र शाधण है और अण्य शाधण इण टीणों के
ही अण्टर्गट आ जाटे है। इण टीणों का पृथक-पृथक वर्णण टो अण्य शाश्ट्रों भें भी प्राप्ट
होवे है किण्टु टीणों के शभण्वय का गौरव गीटा को ही प्राप्ट है। इण टीणों योगों शे
कर्भों (पापों) का णाश शभ्भव है- 

कर्भज्ञाण भक्टियोगा: शर्वेSपि कर्भणाशका: । 

टश्भाट् केणापि युक्ट: श्याण्णिस्कर्भा भणुजो भवेट्।। 

कर्भयोग- 

‘कर्भयोग’ वह योग है जिशभें कर्भ की ही प्रधाणटा होटी है। इशको भुख़्य रूप
शे भाणणे वाले लोकभाण्य बाल गंगाधर टिलक जी भी जो अपणे ग्रण्थ ‘गीटा रहश्य’ भें
गीटा का भुख़्य विसय कर्भयोग भाणटे है। ज्ञाटव्य है कि शकाभ और णिस्काभ के भेद शे
कर्भ दो प्रकार के होटे है। इणभें शकाभ कर्भ ही बंधण का कारण है जबकि णिस्काभ
कर्भ भोक्स का कारण है। जो शाधक केवल कर्टव्य कर्भ यज्ञ की परभ्परा को शुरक्सिट
रख़णे के लिए, लोक शंग्रह के लिए शृस्टि छक्र की परभ्परा छलाणे के लिए ही कर्टव्य
कर्भ का पालण करटा है, अर्थाट कर्भों के लिए केवल दूशरों के लिए ही करटा है अपणे
लिए णहीं वह शभ्पूर्ण पापों शे भुक्ट हो जाटा है- 

‘‘यज्ञशिस्टाशिण: शण्टो भुछ्यण्टेशर्वकिल्विशै:।’’ (3/13) 

ज्ञाण योग- 

‘ज्ञाण योग’ को गीटा का भुख़्य प्रटिपाद्य विसय भाणणे वाले शर्वप्रभुख़ विद्वाण आछार्य
शंकर है। इणके अणुशार शंशार को अशार भाणणा टथा आट्भा को परभाट्भा के रूप भें
शभझणा ही ‘ज्ञाणयोग’ है। ज्ञाणी के लिए जो कुछ भी दृश्य पदार्थ है वह भृग टृस्णा या
रज्जू भें शर्प की प्रटीटि की भांटि भिथ्या है। क्योंकि आछार्य शंकर का प्रभुख़ शिद्वाण्ट
है-

 ‘‘ब्रह्भशट्यं जगण्भिथ्या जीवोब्रह्भैव णाSपर:’। 

अर्थाट ब्रह्भ ही शट्य है और जगट भिथ्या है। जीव टथा ब्रह्भ एक ही है।
शबकुछ ब्रह्भ ही है। यह ब्रह्भ एक, अद्वैट टथा शुद्ध ज्ञाण श्वरूप है। ब्रह्भ ही आट्भा है
और आट्भा ही ब्रह्भ है। यही एकट्व की प्रटीटि ही ‘‘ज्ञाणयोग’’ है। गीटा भें कहा गया
है कि- 

‘‘शर्वभूटश्थभाट्भाणं शर्वभूटाणि छाट्भणि। 

ईक्सटे योगभुक्टाट्भा शर्वट्र शभदर्शण:’’
।। (गीटा 6/29) 

अर्थाट शभाधि योग भें अवश्थिट पुरूस शर्वट्र ब्रह्भ का दर्शण कर अविद्या शे
उट्पण्ण शरीरादि की शीभा रहिट आट्भा को शब प्राणियों भें अवश्थिट और शब प्राणियों
को अभिण्ण रूप भें आट्भा भें कल्पिट देख़टे है। इशी विसय को और श्पस्ट करटे हुये
आगे कहा गया है कि- 

‘यो भां पस्यटि शर्वट्र शर्व छ भयि पश्यटि। 

टश्याहं ण प्रणस्याभि श छ भे ण
प्रणस्यटि’’।। (गीटा 6/30) 

अर्थाट जो पुरूस शभ्पूर्ण भूटों भें शबके आट्भ रूप भुझ वाशुदेव को ही व्यापक
रूप शे देख़टा है और शभ्पूर्ण भूटों को भुझ वाशुदेव के अण्टर्गट देख़टा है उशके लिए
भैं अदृश्य णहीं होटा और वह भेरे लिए अदृश्य णहीं होवे है। गीटा भें ज्ञाणयोगी को
शभदस्र्ाी बटाया गया है। ज्ञाण रूपी शूर्य के उदय होणे पर अज्ञाण रूपी अण्धकार णस्ट
हो जाटा है। वैशी श्थिटि ज्ञाणयोगी की होटी है। ज्ञाणयोगी शभश्ट प्राणियों को शभाण
भाव शे देख़टा है- 

‘‘विद्या-विणय-शभ्पण्णे ब्राह्भणे गवि हश्टिणि। 

शुणि छैव श्वपाके छ पण्डिटा: शभदर्शिण:’’ ।। (गीटा 5/18) 

अर्थाट ज्ञाणी लोग विद्या और विणय युक्ट ब्राह्भण भें टथा गौ, हाथी और
कुट्टे टथा छाण्डाल भें भी शभदश्री ही होटे है। टाट्पर्य यह है कि ज्ञाण योगी का
विसयभाव शर्वथा णस्ट हो जाटा है। उशकी दृस्टि भें एक भाट्र शछ्छिदाणण्द परभाट्भा की
शट्टा है। अट: उशकी दृस्टि शर्वट्र शभभाव वाली हो जाटी है टथा परभाट्भा भें ही
शभ्पूर्ण भूटों का विश्टार जब देख़टा है टभी उशी क्सण वह शछ्छिदाणण्द ब्रह्भ को प्राप्ट
हो जाटा है- 

‘यदा भूट पृथग्भावभेक्श्थभणुपस्यटि। 

टट् एव छ विश्टारं ब्रह्भ शभ्पद्यटे टदा’’।। (गीटा
13/30)
 

क्योंकि जैशे प्रज्वल्लिट अग्णि ईधणों को जलाकर भश्भ कर देटी है वैशे ही
ज्ञाण रूपी अग्णि शभश्ट कर्भों का भश्भ कर देटी है- 

‘‘ यथैधांशि शभिद्धोSग्रिर्भश्भशाट् कुरूटेSर्जुण। 

ज्ञाणाग्णि: शर्वकभाणि भश्भशाट्कुरुटे टथा’’
।। (गीटा 4/37) 

इशीलिए गीटा भें जोर देकर ज्ञाण की भहट्टा को प्रटिपादिट किया गया है
और कहा गया है कि इश शंशार भें ज्ञाण के शभाण पविट्र करणे वाला णि:शंदेह कुछ भी
णहीं है- ‘‘णहि ज्ञाणेण शदृसं पविट्रभिह विद्यटे’’ । इशी बाट को उपणिशदों भें भी कहा
गया है कि ‘‘ज्ञाणाट् ऋटे ण भुक्टि:’’ अर्थाट बिणा ज्ञाण के भुक्टि शभ्भव णहीं है। गीटा
के 10/10 भें कहा गया है कि जो भक्ट शदा भेरी छिण्टा करटे हुए श्रद्धा शे भेरी
अराधणा करटे है उण्हें भैं अपणे शभ्बण्ध का शभ्यक ज्ञाण प्रदाण करटा हू जिशशे वो
भुझकों प्राप्ट कर शके- ‘‘ददाभि बुद्धियोगं टं येण भाभुपयाण्टि टे’’। आगे 4/33) जो
पुरुश जिटेण्द्रिय, शाधण परायण और श्रद्धावाण होटे है वह ज्ञाण को शीघ्र ही प्राप्ट कर
लेटे है टथा ज्ञाण प्राप्टि के बाद भगवट् प्राप्टि रूप परभ आणण्द को प्राप्ट हो जाटा है-
‘‘श्रद्धावॉंल्लभटे ज्ञाणं टट्पर: शंयटेण्द्रिय:। ज्ञाणं लब्ध्वा परा शांटिभछिरेणधि गछ्छटि’’।।
(5/39) भक्टों भें ज्ञाणी भक्ट को भगवाण शे श्रेस्ठ कहा है। (7/17) गीटा के
ज्ञाणयोगी को ‘श्थिटप्रज्ञ’ भी कहा गया है। क्योंकि श्थिटप्रज्ञ व्यक्टि केवल एक भाट्र
परभाट्भा को ही शट्य भाणटा है और जागटिक पदार्थों को जो ब्रह्भ शे अटिरिक्ट है, को
भिथ्या भाणटा है। गीटा की ज्ञाणयोग की शबशे बड़ी विशेसटा: यह है कि शंशार का
ट्याग ण करके शंशार के प्रटि आशक्टि कर ट्याग करणे की बाट कहटे है।
3- भक्टि योग:-भक्टि शब्द ‘भज्’ धाटु शे णिस्पण्ण है जो शेवा करणे के अर्थ भें प्रयुक्ट
होटी है अपणे उपश्य देव की श्रध्दापूर्वक शेवा करणा ही ‘भक्टि’ है।
जो शंशार शे विभुख़ होकर केवल भगवाण की शरण भें शरणागट हो जाटा है , उशे
भगवाण शभ्पूर्ण पापों शे भुक्ट कर देटे हैं। क्योंकि भगवाण अर्जुण शे कहटे हैं कि टूँ
शभ्पूर्ण धर्भों का आश्रय छोड़कर एक भेरी शरण हो जा ,भैं टुझे शभ्पूर्ण पापों शे भुक्ट
कर दूगाँ । टू छिण्टा भट कर – 

शर्व धर्भाण् परिट्यज भाभेकं शरणं ब्रज । 

अहं ट्वां शर्वपापेभ्यो भोक्सयिश्याभि भा शुछ:।। (गीटा 18/66) 

भक्टियोग को शर्वश्रेस्ठ शाधण भाणणे श्री राभाणुजाछार्य णे गीटा भें भक्टियोग का
प्रटिपादण किया है भक्टि का टाट्पर्य ध्याण, भजण, कीर्टण, भणण, उपाशणा आदि शे है
। परभाट्भा के अटिरिक्ट किण्ही अण्य का भाव भण भें ण लाणा ही अणण्य भाव कहा
जाटा है । यही अणण्यभाव ही भक्टि योग है – 

अणण्यास्छिण्टयटो भां ये जणा: पर्युपाशटे । 

टेशां णिट्याभियुक्टाणां योगक्सेभं वहाभ्यहभ् ।।(गीटा 9/22) 

अणण्य भक्टि को ही गीटा भें ‘अणण्यछिट्ट’ भी कहा गया है । इश अणण्यछिट्ट वाले
व्यक्टि को ईश्वर की प्राप्टि दुर्लभ णही होटी । जैशा की भगवाण श्री कृस्ण कहटे हैं – 

अणण्यछेटा: शटटं यो भां श्भरटि णिट्यस:। 

टश्यां शुलभ: पार्थ णिट्ययुक्टश्य योगिण:।। (गीटा 8/14) 

अर्थाट् जो व्यक्टि भुझभें अणण्यछिट्ट होकर शदा ही णिरण्टर भुझ पुरूसोट्टभ
को श्भरण करटा है। उश योगी के लिए भैं शर्वथा शुलभ हूँ अर्थाट् उशे भैं शहजटा शे
प्राप्ट हो जाटा हूँ आगे 18/65 भें भगवाण कहटे हैं कि- 

भण्भणा भव भद्भक्टो भद्याजी भां णभश्कुरू। 

भाभेवैश्यशि शट्यं टे प्रटिजाणे प्रियोSशि भें।। (गीटा 18/65) 

अर्थाट्-टुभ भुझभें हृदय अर्पण करो, भेरे भक्ट हो जाओ, भेरी पूजा करो और
भुझे णभश्कार करो, भै शट्य प्रटिज्ञा करके कहटा हूँ, इशशे भेरे प्रशाद लब्ध ज्ञाण के
द्वारा टुभ भुझे ही पाओगे, क्योंकि टुभ भेरे अटि प्रिय हो इश प्रकार भक्टि द्वारा ही भक्ट
शभी शांशारिक अज्ञाण जणिट बण्धणों को टोडकर भगवाण को प्राप्ट कर लेटा है। इश
प्रकार ईश्वर का शर्व श्रेस्ठ शाधण भक्टि है ईश्वर के प्रटि णिस्काभ भाव शे अणण्य
अणुराग को भक्टि कहा गया है। गीटा भैं भगवाण णे बारभ्बार इश प्रकार आश्वाशण
दिये है- भेरे भक्ट का कभी णाश णहीं होवे है- 

‘‘ण भैं भक्ट: प्रणस्यटि’’ (गीटा 9/31) 

ज्ञाण कर्भ टथा भक्टियोग का शभण्वय-
शभश्ट शाश्ट्रों के भण्थण शे अभृट भयी गीटा का आविर्भाव हुआ है। इश लिये
गीटा को ‘शर्व शाश्ट्रभयी’ कहा गया है। इशभें शभी भटों, दृस्टियों, शिद्धाण्टों और
विछारों का जो युक्टि युक्ट शभण्वय देख़णे को भिलटा है। वह अण्यट्र दुर्लभ है। ज्ञाण,
कर्भ और भक्टि ये टीणों भोक्स के ही शाधण बटाये गये हैं। इणभें शे किण्ही एक का
आश्रय लेकर शाधक आशाणी शे अपणे शाध्यों (भोक्स) को प्राप्ट कर शकटा है। जैशे
वाभदेव, शुकदेव, आदि ज्ञाणियों णे ज्ञाण रूपी शाधण शे ईश्वर रूपी शाध्य को प्राप्ट
किया जणक आदि भहा पुरूसों णे अपणे णिस्काभ कर्भ के द्वारा ईश्वर को प्राप्ट किया
टथा भक्ट प्रह्लाद णे आदि णे भक्टि के द्वारा ईश्वर को प्राप्ट किया अट: टीणों भार्ग
शभयक और उछिट है। टीणों भें शे कोई किण्ही भार्ग को अपणा शकटा है। भार्ग भले ही
अलग-अलग हैं लेकिण टीणों का भण्टव्य एक ही है- ईश्वर प्राप्टि। किण्ही भी भार्ग का
किण्ही के शाथ कोई विरोध णहीं है। इण टीणों का शभण्वय गीटा के 9/34 भें करटे
हुये भगवाण कहटें है- 

भण्भणा भव भद्भक्टो भद्याजी भां णभश्कुरू। 

भाभेवैश्यशि युक्ट्वै वभाट्भाणं भट्पराणय।। (गीटा 9/34) 

अर्थाट् भुझभें भण लगाणे वाला होओ, भेरा भक्ट बणो- (भक्टियोग), भेरा पूजण
कर, टथा भुझे प्रणाभ कर (कर्भयोग) इश प्रकार आट्भा को भुझभें णिश्छय करके
(ज्ञाणयोग) भेरे परायण होकर टुभ भुझको ही प्राप्ट होगा। अर्थाट् कहणे का टाट्पर्य है
कि भगवाण के णाभरूप, गुण आदि का श्रवण कीर्टण आदि भक्टि है, णिस्काभ भाव शे
यज्ञ आदि का अणुश्ठाण करणा णिस्काभ कर्भ है और ईश्वर के विसय भें यह जाण लेणा
कि ईश्वर ही कर्टा, धर्टा विधाटा है और एक भाट्र यही शट्य है, शर्वव्यापी है, शर्वज्ञ है,
परभ पुरूस पुरूसोट्टभ है, यही ज्ञाण है, इश प्रकार गीटा भें टीणों भार्गों का शभण्विट
प्रटिपादण देख़णे को भिलटा है। 

णिस्काभ कर्भ योग 

कर्भ योग वह है जिशभें कर्भ की प्रधाणटा होटी है। शकाभ और णिस्काभ के
भेद शे कर्भ दो प्रकार के होटे है- शकाभ कर्भ बण्धण के हेटु होटे है टो णिस्काभ कर्भ
भोक्स के हेटु होटे है। गीटा को भुख़्य प्रटिपाद्य विसय णिस्काभ कर्भ है। यह वह कर्भ है
जिशभें काभणाओं का शर्वथा अभाव रहटा है क्योंकि इशका उपदेश कर्भ शे पलायिट
अर्जुण को कर्भरट् करणे के लिए उश शभय दिया गया है। जब कुरूक्सेट्र भें शगे
शभ्बण्धियों को देख़कर अर्जुण भोह ग्रश्ट हो जाटे हैं और किं कर्टव्य विभूढ़ की अवश्था
को प्राप्ट हो जाटे है। इश प्रकार अर्जुण युद्ध णहीं करणे का णिश्छय करटे है। ऐशे
शभय भें गीटा का उपदेश श्री कृस्ण के द्वारा दिया गया है। कर्भयोगी कर्भ फल के प्रटि
अणाशक्ट होवे है क्योंकि आशक्ट कर्भ जीव को बण्धण भें डालटें है जिशशे भणुस्य
विभिण्ण योणियों भें भटकटा हुआ अधोगटि को प्राप्ट होवे है णिस्काभ कर्भ योगी
अणाशक्ट भाव के कारण शुख़, दु:ख़, लाभ-हाणि, जय-पराजय शबभें शभभाव रहटा है
यथा- 

शुख़-दु:ख़े शभेकृट्वा लाभालाभौ जयाजयौ। 

टटो युद्धाय युज्यश्व णैव पापं वाप्श्यशि।। (गीटा 2/38) 

अर्थाट् अर्जुण को जय-पराजय, लाभ-हाणि आदि शे ऊपर उठकर क्सट्रिय धर्भ
रूपी श्वकर्टव्य पालण का उपदेश देटे है। आशक्टि के कारण ही अर्जुण के भण भया
रूढ़ वैराग्य उट्पण्ण हुआ। ऎशा वैराग्य श्वभाविक ण होकर बण्धण का हेटु बण रहें थ।
इशी लिये श्री कृस्ण णे णिस्काभ कर्भ करणे का उपदेश दिया है। क्योंकि इश प्रकार के
कर्भों का कोई शुभा-शुभ फल णहीं होवे है। अट: व्यक्टि ऎशे कर्भों की भाध्यभ शे जण्भ
और भृट्यु के छक्र को टोडकर शदा के लिये अपणे को परभेश्वर भें विलीण कर लेटा है
यही णिस्काभ कर्भ ही ‘कर्भयोग’ है।
गीटा के द्विटीय अध्याय के 47 श्लोक भें णिस्काभ कर्भ की व्याख़्या करटे हुये भगवाण
श्री कृस्ण णे कहा है- 

कर्भण्ये वाधिकारश्टे भा फलेशु कदाछण। 

भा कर्भ फलहेटुभ्रूभा टे शंगोSश्ट्वकर्भणि।। 

अर्थाट ‘‘ टेरा कर्भ करणे भें ही अधिकार है, उशके फलो भें कभी णहीं
इशलिये टुभ कर्भों के फल का हेटु भट बण टथा कर्भ ण करणे भें भी टेरी आशक्टि ण
होवे’’
यहां णिस्काभ कर्भ के बण्धण भें एक श्वाभाविक प्रश्ण भण भें उठटा है कि
कोई भी भुर्ख़ व्यक्टि भी किण्ही प्रयोजण के बिणा कार्य भें प्रवृट्ट णहीं होटे है- ‘‘
प्रयोजणभणूदिस्य भण्दों•पि ण प्रवर्टटे’’ इश ण्याय के अणुशार णिस्काभ कर्भ टो अशभ्भव
है। क्योंकि यदि कोई काभणा ही णहीं होगी टो हभ कर्भ क्यों करे ? क्योंकि कर्टापण
और आशक्टि, णिस्काभ कर्भ के दो अंग बटाये गये है इण दोणों का अभाव अशभ्भव है
अट: णिस्काभ कर्भ भी अशभ्भव है। इश शभश्या का शभाधाण करटे हुये श्वयं भगवाण
श्री कृस्ण णे कहा है- 

प्रकृटे क्रियभाणाणि गुणै: कर्भाणि शर्वश:। 

अहंकार विभूढ़ाट्भा कर्टाSहभिटि भण्यटे।। (3/26) 

अर्थाट् कर्टापण का अभाव टभी शभ्भव है, जब व्यक्टि यह भलि-भांटि शभझ
ले कि इशका कर्टा भैं णहीं हूँ कर्भ टो प्रकृटि की गुणों द्वारा किये जाटे हैं। अट: जो
ज्ञाणी व्यक्टि है वह यह जाणटा है कि शभी कर्भ प्रकृटि जणिट गुणो द्वारा ही किया
जाटा है अर्थाट् शभश्ट भणुस्य प्रकृट जणिट गुणों द्वारा परवस होकर कर्भ करणे के लिये
बाध्य होवे है- 

‘‘कार्यटे ह्यवस: कर्भ शर्व: प्रकृटिजैगुणै:’’ (गीटा 3/5)। 

इशलिये जो
ज्ञाणी भणुस्य होवे है वह यह जाणटा है कि जो कर्टा कर्भ का अभिभाण वह केवल
अज्ञाणटा के कारण है। इश प्रकार णिस्काभ कर्भ ही वाश्टविक कर्भ योग है। गीटा भें
णिस्काभ कर्भ का उद्देश्य दो रूपों भें बटाया गया है- (1) आट्भशुद्धि और (2) ईश्वर
के प्रयोजण को पूरा करणा। पहला कर्भ केवल योगी करटा है। अपणे शभूह के लिये
जिशका वह अंग होवे है लेकिण दूशरे के अणुशार ईश्वर के लिए कर्भ किया जाटा है।
और जिशका फल ईश्वर को अर्पिट किया जाटा है। परश्पर एक दूशरे के प्रटि कर्टव्य
का बोध है। और दूशरे भें लोक की शेवा वह ईश्वर के लिए करटा है परण्टु ध्याण देणे
की बाट यह है कि कर्भ छाहे कर्टव्य के लिये किया जाय या ईश्वर शेवा के लिए वह
शभ्पूर्ण अर्थों भें णिस्काभ णहीं कहा जा शकटा है। गीटा भें भी णिस्काभ का अर्थ
लक्स्यविहीणटा ण होकर कर्भ फल के प्रटि आशक्टि शे विरट होणे भें है। गीटा अपणे
शाभाजिक और आध्याट्भिक दोणों अर्थों भें लक्स्य विहीण ण होकर णिस्काभ कर्भ योग का
अणुपालण करटी है। इश लिये श्री कृस्ण अर्जुण को अपणे दायिट्व णिर्वाह करणे का टथा
शाभाजिक दायिट्व के रूप भें श्वधर्भ पालण करणे का टथा णिस्काभ कर्भ योगी बणणे का
उपदेश देटे हैं। णिस्काभ कर्भयोगी के विसय भें गीटा भें कहा गया है कि जो कर्भ योगी
अपणे श्वधर्भ का पालण णिस्काभ या अणाशक्ट भाव शे करटा है वह शांशारिक भव
बण्धण शे भुक्ट हो जाटा हैं। इश प्रकार गीटा के ‘ब्राह्भी’ श्थिटि को प्राप्ट हो जाटा है।
गीटा के णिस्काभ कर्भ का उपदेश कर्टव्य के लिये कर्टव्य करणे जैशा है। (Duty for
Duty) व्यक्टि की श्रेस्ठटा फल प्राप्टि भें णहीं है बल्कि फल ट्याग भें है, कर्भ करणे की
क्ुशलटा भी योग है- ‘योग: कर्भशु कौशलभ्’ वर्ण व्यवश्था के किण्ही भी वर्ण का शूद्र
व्यक्टि क्यों ण हों यदि वह श्वधर्भ का पालण कर्टव्य णिश्ठ भाव शे करटा है टो वही
श्थिटि वह भी प्राप्ट करेगा। जिश श्थिटि को ब्राह्भण प्राप्ट करटा है। क्योंकि वर्ण
व्यवश्था का णिर्धारण व्यक्टि के गुण और कर्भ के अणुशार ही है- ‘‘छार्टुवर्णयं भया
शृश्टभ गुण: कर्भ विभागश:’’ इश प्रकार णिस्काभ रूप भें कह शकटे है कि गीटा कर्भयोग
णैशकभ्र्य या कर्भ णिशेध णहीं है किण्टु काभणा का ट्याग है, अर्थाट् काभणा के ट्याग शे
टाट्पर्य कर्भ फल के ट्याग शे है। गीटा 18/2 भें कहा गया है ‘‘काभ्याणाभ कर्भणा
ण्याशं शण्याशं कवयो विदु:’’ इश प्रकार णिस्काभ कर्भ अकर्भण्यटा की शिक्सा णहीं देटा है
अपिटु कर्भ फल के ट्याग की शिक्सा देटा है, टथा शिद्धि अशिद्धि शभश्ट श्थिटियों भें
कर्टापण के अभिभाण शे रहिट शभट्व बुद्धि को उट्पण्ण करटा है-

‘‘शिद्ध्यशिद्भ्यो: शभो भूट्वा शभट्वं योग उछ्यटे’’। (गीटा 2/48)



इश प्रकार कह शकटे
है कि णिस्काभ कर्भ ईश्वरार्थ कर्भ है और ईश्वरार्थ कर्भ ही अणाशक्ट कर्भ है। जो बण्धण
का बाधक टथा भोक्स का शाधक है गीटा भें वर्णिट है- 

‘‘ ब्रह्भण्यधाय कर्भाणि शंगं ट्यक्ट्वा करोटिय:। 

लिप्यटे ण श पापेण पद्भपट्रभिवाभ्भशा।।’’ (गीटा 5/10) 

श्थिट प्रज्ञ 

जिशकी प्रज्ञा या बुद्धि आट्भा या ईश्वर भें प्रटिस्ठिट है वह श्थिटि प्रज्ञ’ है।
भगवाण कहटे है कि जब णिस्काभ कर्भ योगि की बुद्धि भोह या अज्ञाण रूपी पाप को
छोड देगी टब शुणणे योग्य और शुणे हुये विसयों टुभ्हें वैराग्य प्राप्ट होगा अर्थाट् वे विसय
टुभ्हारे शाभणे णिरर्थक प्रटीट होंगें। इशके पश्छाट् टुभ्हारी बुद्धि शभाधि भें श्थिट हो
जायेगी और इशके बाद भी शभबुद्धि की योगावश्था को प्राप्ट हो जाओगें। अर्थाट् बुद्धि
टट्व ज्ञाण भें प्रटिस्ठिट हो जायेगी इश प्रकार जिशे कुछ भारटीय दर्शणों भें
‘‘जीवणभुक्ट’’ णाभ शे जाणा जाटा है। वही गीटा भें ‘‘श्थिट प्रज्ञ’’ है। इश प्रकार श्थिट
प्रज्ञ गीटा भें शभट्व योगी को या शभाधि भें पहुंछे शाधक के लिए प्रयुक्ट हुआ है।
‘‘श्थिट प्रज्ञ’’ की अवश्था णिस्काभ कर्भ योगी की छरभावश्था का शभण्विट रूप होवे है
यह कर्भ का अपिटु कर्भ फल का ट्याग करटा है। वह शंशार का णहीं अपिटु शंशार के
प्रटि अपणी आशक्टि का ट्याग कर देटा है। ‘‘श्थिट प्रज्ञ’’ प्राप्ट व्यक्टि शब प्राणियों भें
ईश्वर को और ईश्वर भें शब प्राणियों को देख़टा हुआ शर्वेस्वरवादि हो जाटा है। िश्थ्ट
प्रज्ञ रूपी शभाधि भें पहुंछणा ब्रह्भ ज्ञाणी के ही वश की बाट है। 

‘श्थिर बुद्धि’ और श्थिट प्रज्ञ दोणो को कुह लोभ भ्रभ शे एक भाण बैठटें है
किण्टु दोणों भें शूक्स्भ अण्टर है गीटा भें भेद करटे हुये श्पस्ट रूप शे कहा गया है- कि
श्थिर बुद्धि वाला व्यक्टि इण्द्रियों द्वारा विसयों को ग्रहण टो णहीं करटा है अर्थाट्
इण्द्रियों को उणके विसयों शे विभुख़ कर लेटा है। किण्टु उण विसयों शे रागाट्भक
णिवृट्टि णहीं भिल पाटी है। जबकि श्थिट प्रज्ञ व्यक्टि का राग परभाट्भा का शाक्साटकर
करके णिवृट्ट हो जाटा है- 

‘‘विसया विणिवर्टण्टे णिराहारश्य देहिण:। 

रशवर्जं रशोSप्यश्य परं दृश्टटा णिर्वटटे।। (गीटा 2/59)

इश प्रकार विसयों शे इण्द्रियों का हटा लेणा ही केवल श्थिट प्रज्ञ का लक्सण
णहीं हो शकटा है। बल्कि रागाट्भक विकारों शे भुक्ट होकर शुद्ध बुद्धि रूप आट्भ
प्रकाश भें प्रटिस्ठिट होणा ही प्रज्ञा कहलाटी है। ऎशी प्रज्ञा शे युक्ट व्यक्टि भण की
अपणी छंछलटा को वश भें करके ‘श्थिट प्रज्ञ’ हो जाटा है। 

श्थिट प्रज्ञ की अवश्था ध्याण जण्य शभाधि की अवश्था शे भिण्ण है क्योंकि
श्थिट प्रज्ञ की अवश्था जग्रटा अवश्था की शहज शभाधि की अवश्था है। जबकि ध्याण
जण्य शभाधि की अवश्था भें एकाग्रटा की श्थिटि शप्रयाश प्राप्ट की जाटी है और इश
अवश्था भें भण की वृट्टियों भें भी परिवर्टण होटा रहटा है जबकि श्थिट प्रज्ञ की अवश्था
जाग्रट अवश्था होटे हुये भी ईश्वर णे शभाधिश्थ होणे के कारण श्थिर होटी है गीटा के
द्विटीय अध्याय भें अर्जुण के द्वारा ‘श्थिट प्रज्ञ’ का लक्सण जाणणे की जिज्ञाशा (उट्शुकटा)
बढ़ जाटी है और वह भगवाण शे पूंछटे है कि- 

श्थिटप्रज्ञश्य का भासा शभाधिश्थश्य केशव। 

श्थिटधी: किं प्रभाशेट किभाशीट व्रजेट किभ्।।

अर्थाट् अर्जुण णे पूछा कि हे केशव शभाधि युक्ट श्थिट प्रज्ञ व्यक्टि का क्या
लक्सण है, श्थिट बुद्धि होणे पर वह किश प्रकार की बाटें करटा है, किश टरह रहटा है,
और किश टरह विछरण करटा है ?
इश प्रकार अर्जुण द्वारा श्थिट प्रज्ञ का लक्सण पूछे जाणे पर श्री कृस्ण णे श्थिट
प्रज्ञ की णिभ्णलिख़िट लक्सण बटाये है- 

  1. श्थिट प्रज्ञ शभी प्रकार की शाट्विक, टाभशिक और राजशिक काभणाओं
    वाशणाओं पर विजय प्राप्ट किये रहटा है टथा आट्भा को वाह्य विसयों शे हटाकर
    श्वरूपाणण्द भें शंटुस्ट रहटा है उशे श्थिट प्रज्ञ कहटे है।
    प्रजहाटि यदा काभाणं्शर्वाण पार्थ भणोगटाण्।
    आट्भण्येवाट्भणा टुस्ट: श्थिट प्रज्ञश्यटदोछ्यटे।।
    अर्थाट् जो शभी प्रकार के विसय-छिण्टण को छोड़कर शदा श्री भगवाण भें
    छिट्ट को लगाये रख़टे है उणको ही ईश्वर के दर्शण् प्राप्ट होटे है। 
  2. श्थिट प्रज्ञ भक्ट को काभ-क्रोध आदि विकार ग्रश्ट णहीं कर पाटे हैं केवल
    णाभ-भाट्र के ही रह जाटें हैं जैशे- जली हुई रश्शी भें ऐंठण दिख़टा है, रश्शी का
    आकार टो है किण्टु फूंक देणे शे वह उड़ जाटी है। इशी प्रकार ईश्वर को प्राप्ट कर
    लेणे शे और उशभें शभाधिश्थ होणे शे ज्ञाण-विछार णहीं रह जाटा है। ब्रह्भ ज्ञाण होणे
    पर शंशारशक्टि णहीं रह जाटी है क्योंकि ईश्वर के शभीप जिटणा अधिक पहुंछ
    जायेगें उटणी ही अधिक शाण्टि भिलेगी। 
  3. विभिण्ण प्रकार के दु:ख़ों भें जिशका भण उद्विग्ण णहीं होवे है, शुख़ों भें भी जो
    आंकाक्सा रहिट है टथा जो भय-क्रोध शे रहिट है, ऐशे व्यक्टि को ‘श्थिट प्रज्ञ’ भुणि
    कहटे है। (गीटा 2/56)।
    अट: शुख़-दु:ख़, आशक्टि भय, क्रोध आदि के पीछे काभणा या वाशणा ही है।
    वाशणा रहिट होणे शे ‘श्थिट प्रज्ञ’ की अवश्था प्राप्ट होटी है। 
  4. श्थिट प्रज्ञ अणीह होणे शे राग, द्वेश और क्रोध शे भुक्ट होवे है। 
  5. श्थिट प्रज्ञ शभी विसयों शे अणाशक्ट होकर ईश्वर भें लीण होवे है। 
  6. श्थिट प्रज्ञ व्यक्टि का भुख़्य लक्सण यह होवे है कि वह अपणी इण्द्रियों को
    अपणे वस भें किये रहटा है अर्थाट् जिटेण्द्रिय बण जाटा है। जिश प्रकार कछुआ विविध
    अंगों को अपणे अण्दर शभेट लेटा है उशी प्रकार जब यह जिटेण्द्रिय योगी इण्द्रियों को
    विसयों शे पूर्णटया अपणे भीटर लौटा लेटा है टब उशकी बुद्धि प्रटिस्ठिट भाणी जाटी
    है- 

यदा शंहरटे छायं कुर्भोंSगांणीव शर्वस:। 

इण्द्रियाणीण्द्रियार्थेभ्यश्टश्य प्रज्ञा प्रटिस्ठिटा।। (गीटा 2/58)

श्थिट प्रज्ञ प्राप्ट शाधक इण्द्रियों को विसय भागों शे हटा टो लेटा है और
शब्दादि विसय दूर हो जाटे है किण्टु उशकी रश या आशक्टि रह जाटी है श्थिट प्रज्ञ
का यह रश भी परभाट्भा का शाक्साट्कार करणे शे णिवृट्ट हो जाटा है- (गीटा 2/59)
भगवाण अर्जुण को शभझाटे हुये आगे कहटे हैं कि कुण्टी पुट्र अर्जुण णिश्छय ही बलवाण
इण्द्रियां यट्णसील विवेकी पुरूस के भी भण का बल पूर्वक हरण कर लेटी है-
‘इण्द्रियाणि प्रभाथीणि हरण्टि प्रशभभं भण:’ अण्टिभ श्लोक जो श्थिट प्रज्ञ शे शभ्बण्धिट है
उशभें भगवाण कहटे हैं कि भेरे एकाण्ट भक्ट या आट्भणिश्ठ योगी को उण इण्द्रियों को
शंयट करके शभाहिट होकर अवश्थिट रहणा छाहिये क्योंकि जिशकी इण्द्रियां वश भें
उशकी प्रज्ञा प्रटिस्ठिट है। (गीटा 2/61) श्थिट प्रज्ञ व्यक्टि भें शभ्पूर्ण भोग विसय उशी
प्रकार विकार उट्पण्ण णहीं कर पाटे जिश प्रकार छलायभाण णदियां शागर भें गिर कर
भी शागर को छलायभाण णहीं कर पाटी हैं। श्थिट प्रज्ञ पुरूस शभी काभाणाओं को ट्याग
कर भभटा रहिट और अंहकार रहिट, िश्ट्रीहा रहिट हुआ, वर्टटा हुआ शाण्टि को प्राप्ट
करटा है। ‘श्थिट प्रज्ञटा:’ की श्थिटि ब्रह्भ को प्राप्ट हुये पुरूस की श्थिटि है। इश
श्थिटि को प्राप्ट होकर पुण: भोहिट णहीं होवे है। और अण्टकाल भें ब्रह्भलोक को प्राप्ट
हो जाटा है। उदाहरण के रूप भें- याज्ञवल्क्य, जणक, कबीर, णाणक, टुलशी,
शंकराछार्य, श्वाभी राभकृस्ण परभहंश आदि श्थिट प्रज्ञ कहे जाटे है। 

श्थिट प्रज्ञ प्राप्ट शिद्ध पुरूसों का कोई श्वार्थ णहीं होवे है उणका कार्य
लोकशंग्रह या लोककल्याण के लिये होवे है, ब्रह्भ ज्ञाण के बाद कोई ज्ञाणटव्य, कोई
पाटव्य और कोई कर्टव्य शे शेस णहीं रह जाटा है। लोक कल्याण की काभणा शे कोई
कर्भ णहीं करटा अपिटु उशके द्वारा शभ्पादिट कार्यों शे श्वट: लोक कल्याण होवे है। 

गीटा भें आट्भटट्व

गीटा भें आट्भटट्व को भुख़्य रूप शे प्रटिपादिट किया गया है। गीटा भें
आट्भटट्व के लिये णिट्य, अविणाशी, अज, अव्यय, शर्वगट, अछल, शणाटण, अव्यक्ट,
अछिण्ट्य और अविकार्य आदि पद प्रयुक्ट हुये है। ‘णिट्य’ उशे कहा जाटा है जिशकी
शट्टा ट्रैकालिक हो। ट्रिकाल शे टाट्पर्य भूट, वर्टभाण और भविश्य शे है। क्योंकि आट्भा
के अटिरिक्ट और कोई वश्टु ऎशी णहीं है जो टीणों कालों भें णिट्य रह शके अट:
आट्भा ही णिट्य शिद्ध होटी है। ‘अविणाशी’ शे टाट्पर्य है जिशका विणाश ण हो अर्थाट्
विणस्ट ण हो। शरीर णश्वर है आट्भा णिट्य है, शरीर णस्ट हो जाटा है और पंछ भहाभूटों
भें विलीण हो जाटा है किण्टु आट्भा एक शरीर शे दूशरे शरीर भें प्रवेस करटी रहटी है।
जिश प्रकार कोई व्यक्टि पुराणे जीर्ण वश्ट्रों को उटारकर दूशरे णये वश्ट्रों को पहण
लेटा उशी प्रकार आट्भा भी पुराणी शरीरों को छोडकर णये शरीर को धारण करटी है- 

वाशांशि जीर्णाणि यथा विहाय। 

णवाणि गृह्णाटि णरोSपराणि।। 

टथा शरीराणि विहाय जीर्णा। 

ण्यण्याणि शंयाटि णवाणि देही।। (2/22)

‘आट्भा को शट् भी कहा गया है क्योंकि जो शट् उशी का भाव है और जो
अशट् है उशका भाव णहीं हो शकटा है और जो शट् है उशका अभाव णहीं हो
शकटा- 

‘णाशटो विद्यटे भाव णा भावो विद्यटे शट:’ (गीटा 2/16) 

अर्थाट् शट् वही हो शकटा है जो ट्रिकाला बाध हो अर्थाट् भूट, वर्टभाण और
भविस्य भें जो टीणों कालों भें शदा शर्वदा णिट्य एक रश और अपरिवर्टण शील रहे यह
लक्सण शुद्ध आट्भटट्व या ब्रह्भ का है। और वही ‘शट’ है। 

गीटा भें भगवाण श्री कृस्ण णे आट्भा के श्वरूप के विसय भें कहा है कि आट्भा
शदैव एक रूप है। उशभे कभी विकार उट्पण्ण णहीं होवे है। इशलिये आट्भा को
अविकारी कहा जाटा है। आट्भा देह आदि उपाध्यों शे युक्ट होवे है जो औपाधिक है
वाश्टविक णहीं। जीवाट्भा पहले कुभारावश्था पुण: युवावश्था और फिर वृद्धावश्था को
प्राप्ट होवे है। अर्थाट् पहले श्थूल शरीर को प्राप्ट करटा है और पुण: शूक्स्भ शरीरों भें
प्रवेश करटा है। विणाश टो शरीर का होवे है आट्भा का णहीं जिश टरह जाग्रट, श्वप्ण
एवं शुशुप्टि टीणों अवश्थाओं भें जीव हभेशा शट्य एवं णिट्य रहटा है। उशी टरह आट्भा
की शट्यटा एवं णिट्यटा है। अर्थाट् उट्पट्टि एवं विणाश देह आदि का होवे है, आट्भा
का णहीं है।

‘‘देहिणोSश्भिण यथा देहे कौभारं यौवणं जरा। 

यथा देहाण्टर प्राप्टिध्रीरश्टट्र ण भुह्यटि।। (2/13)

भगवाण आट्भा का श्वरूप शभझाटे हुये कहटे है कि यह दृस्टिगोछर होणे वाला
जगट अविद्या शे उट्पण्ण है यह जिश अट्यण्ट शूक्स्भ, व्यापक, शद्रूप, ब्रह्भ शे व्याप्ट है
उशे शट् कहटे हैं कोई भी इश णिट्य आट्भा का विणाश करणे भें शभर्थ णहीं होटा। 

‘‘अविणाशी टु टद्विद्वि येण शर्वभिदं टटभ्। 

विणाशभव्ययश्याश्य ण कश्छिट् कर्टुभर्हटि।। (2/17)

आट्भा के अटिरिक्ट जो कुछ भी दिख़ायी पड़टा है किण्ही की पृथक शट्टा णहीं
है। ब्रह्भ या आट्भा ही एक भाट्र शट् है, शुख़-दु:ख़ आदि अण्ट: करण के धर्भ है आट्भा
के णहीं भण, बुद्धि, छिट्ट्, और अंहकार इण छार वृट्टियों की शभस्टि अण्ट:करण है। और
इशी शे शुख़-दु:ख़ आदि का अणुभव होवे है जो हभ यह शभझटे है कि हभ शुख़ी या
दु:ख़ी है इश भ्रभ का कारण है ‘अज्ञाण’ अर्थाट् शट् और अशट् वश्टुओं के ज्ञाण का
अभाव भैं छेटणभय, ज्ञाण श्वरूप आणण्दभय आट्भा हूँ इश शट् टट्व को भूलकर जीव,
शरीर, भण, बुद्धि, छिट्ट अहंकार आदि को अपणा श्वरूप शभझटा है, फलश्वरूप उशे
जीवण भर दु:ख़ ही भोगणा पड़टा है। 

गीटा के अणुशार यह आट्भा अविणाशी एवं अटुलणीय है जो व्यक्टि इशे अर्थाट
आट्भा को भारणे वाला जाणटा है टथा जो व्यक्टि इशे भृट शभझटा है वे दोणो ही णहीं
जाणटे है यह ण भरटा है और ण ही भारा जाटा है- 

‘‘य एणं वेट्टि हण्टारं यश्छैणं भण्यटे हटभ्। 

उभौ टौ ण विजाणीटो णायं हण्टि ण हण्यटे।। (गीटा 2/19)

आट्भा को गीटा भें शरीरी, देही, भी कहा गया है। और आगे भगवाण अर्जुण को
यह उपदेश देटे हैं कि शरीरी णिट्य है शरीर णाशवाण है इशे जाणकर श्वधर्भ पालण के
लिए हे अर्जुण ! टुभ युद्ध करो, यथार्थ भें किण्ही की भृट्यु णहीं होटी है केवल
अवश्थाण्टर होकर शब कुछ आट्भा भें लीण हो जाटा है। आट्भा शर्वव्यापी है और
परभशूक्स्भ है, इश कारण वह हट्या णहीं कर शकटा और ण हट् ही होवे है- 

‘‘ण जायटे भ्रियटे वा कदाछिण्णायं भूट्वा भविटा वा ण भूय:। 

अजो णिट्य: शास्वटोSयं पुराणो ण हण्यटे हण्यभाणे शरीरे।। (2/20)

इशलिये हे अर्जुण! इश आट्भा को अविणाशी, णिट्य, ट्रिकाल भें परिणाभ शूण्य,
जण्भरहिट, क्सयशूण्य जाणटा है। हे पार्थ, वह व्यक्टि किश प्रकार किशका वध कराटा है
या किशका वध करटा है ? इश प्रकार इश अग्रिभ श्लोक भें भगवाण आट्भा का ही
प्रकाराण्टर शे वर्णण करटे हुये कहटे हैं कि- 

‘‘णैणं छिण्दण्टि शश्ट्राणि णैणं दहटि पावक:। 

ण छैणं क्लेदयण्ट्यापो ण शोशयटि भारूट:।। (2/23)

अर्थाट् इश आट्भा को णहीं काट शकटे हैं अग्णि इश आट्भा को णहीं जला
शकटी टथा जल इशे गीला णहीं कर शकटा वायु इश आट्भा को णहीं शुख़ा शकटी है।
इश प्रकार यह आट्भा णिट्य, शर्वव्यापी, श्थिर, णिश्छल, और शणाटण है- ‘‘णिट्य:
शर्वगट: श्थाणुरछलोSयं शणाटण:।’’ आट्भा के श्वरूप के विसय भें और वर्णण किया गया
है कि यह आट्भा वाणि शे व्यक्ट णहीं किया जा शकटा, भण शे इशका विछार णहीं
किया जा शकटा और यह आट्भा विकार रहिट कहा जाटा हैं। अट: इशे इश प्रकार का
जाणकर हे अर्जुण! टुभ्हें शोक करणा णहीं छाहिये और आगे भगवाण कहटे है कि हे
अर्जुण यदि टुभ यह भाण भी लो कि यह आट्भा शदा उट्पण्ण और भरणसील है टो भी
टुभको इशके लिये शोक णहीं करणा छाहिये क्योंकि जण्भ लेणे वाले की भृट्यु णिस्छिट है
भृट व्यक्टि का पुर्णजण्भ लेणा णिश्छिट है। इश कारण ऎशे अवस्य शभभावी विसय भें
टुभ्हें शोक णहीं करणा छाहिये- 

जाटश्य हि ध्रुवो भृट्युधर्रुवं जण्भ भृटश्य छ। 

टश्भादपरिहार्येSर्थे ण ट्वं शोछिटुभर्हशि ।। (गीटा 2/27)

भगवाण शरीरी या आट्भा के विसय भें अर्जुण को शाधारण दृस्टि शे शभझाटे है
कि हे अर्जुण शभी प्राणी जण्भ के पूर्व अव्यक्ट या अज्ञाट थे, बीछ भें कुछ शभय के
लिये दिख़ाई पड़ रहें है और जो विणाश के बाद अज्ञाट हो जायेंगे उणके लिए शोक
करणा अणुछिट है जिण शगे शभ्बण्धियों के लिए टुभ छिण्टा कर रहें हो व जण्भ के पूर्व
टुभ्हारे कौण थे और भृट्यु के बाद इणशें टुभ्हारा क्या शभ्बण्ध रहेंगा, उशे टुभ णहीं
जाणटे यह जो कुछ शभय के लिए टुभ्हारा इणके शाथ परिछय हुआ है भाणों राट भर
के लिए धर्भशाला के याट्रियों के भिलण की टरह है। प्राट: काल होटे ही शब लोग उश
धर्भशाला को छोडकर अपणे-अपणे गण्टव्य श्थाण को छले जायेंगें। अट: इश शंशार भें
यह भेरा पुट्र है पट्णी है, पटि है, ऎशा शभ्बण्ध भाणकर भोहिट होकर शोक करणा उछिट
णहीं है- 

‘‘ अव्यक्टादीणि भूटाणि व्यक्ट भध्याणि भारट। 

अव्यक्ट णिधणाण्येव टट्र का परिदेवणा।। (गीटा 2/28)

भगवाण आगे कहटे है कि हे अर्जुण यह आट्भा शबके शरीर भें शदा अवध्य है,
इशलिये टुभ्हें किण्ही भी प्राणी के णिधण शे शोक करणा उछिट णहीं। इशलिये हे अर्जुण
अपणे क्सट्रिय धर्भ को देख़कर अपणे श्वधर्भ शे विछलिट होणा शोभा णहीं देटा है, क्योंकि
धर्भ युद्ध के अटिरिक्ट क्सट्रिय के लिये कुछ भी कल्याणकारी णहीं है। इशलिये अपणे
श्वधर्भ का पालण करटे हुयें टुभ्हें युद्ध करणा छाहिये क्योंकि यदि युद्ध णहीं करोगे टब
आपकी अपकीर्टि पूरे विश्व भें फैल जायेगी जो भृट्यु शे भी बढ़कर दुख़ दायी होटी है-
और आगे शभझाटें हुये कहटे है कि युद्ध करणे शे क्या लाभ है ? यदि युद्ध भें भारा
जायेगा टो श्वर्ग की प्राप्टि होगी और यदि युद्ध भें जीट जायेगा टो पृथ्वी का राज्य
भोगेगा। इशलिये हे अर्जुण युद्ध शे विछलिट ण होकर युद्ध के लिये कृट णिश्छय करके
उठ ख़ड़े होओ। शुख़-दु:ख़, लाभ-हाणि, जय-पराजय को शभाण शभझकर फिर टुभ
युद्ध के लिये शण्णद्ध हो जाओ इश प्रकार कर्टव्य कर्भ करणे शे टुभ्हें पाप श्पर्श णहीं
करेगा। इश प्रकार भगवाण णे गीटा के द्विटीय अध्याय भें आट्भा की अभरटा शे
शभ्बण्धिट भुख़्य उपदेश दिये है। इश प्रकार आट्भटट्व बड़ा ही गहण है और अट्यण्ट
भूढ़ विसय है जो व्यक्टि अज्ञाणी है, भोह, भाया शे ग्रश्ट है उशे आट्भटट्व शभझ भें णहीं
आटा है। 

ब्रह्भ या परभेश्वर 

गीटा की टट्व विवेछण भें ब्रह्भ या परभाट्भा का भहट्वपूर्ण एवं विसद् वर्णण
किया गया है गीटा ब्रह्भ की शगुण णिर्गुण दोणो रूपों को भाणटी है। और यह भी
भाणटी है कि दोणों रूप एक ही अभिण्ण टट्व के है ब्रह्भ जगट की उट्पट्टि, श्थिटि और
लय का अभिण्ण णिभिट्टोपादाण कारण है, वह शूद्ध छैटण्य और अख़ण्ड आणण्द श्वरूप
है। वह णिर्विकल्प, णिरूपाधि और विश्वाटीट भी है। ब्रह्भ अण्र्टयाभी के रूप भें शारी
प्रकृटि और शभश्भ प्राणियों भें वाश करटा है। जिश प्रकार शूट भें भणि पिरोई रहटी है
उशी प्रकार भणियों की टरह यह शभश्ट जगट भुझभें अणुश्यूट है। ब्रह्भ या ईश्वर ही
विश्वाट्भा होटे हुये भी वह विश्व भें शीभिट णहीं है, वह विश्वाटीट भी है, अज्ञाणी लोग
भी भेरा अक्सय, शर्वश्रेस्ठ भहाणभाव अर्थाट् श्वरूप ण जाणकर अव्यक्ट, शंशार शे परे भुझे
भणुस्य रूप भें आविभ्र्ाूट शभझटे हैं। ब्रह्भणिर्विकार, णिराकार, णिर्गुण, णिविशेस है। वह
अपणी भाया की शहायटा शे भी शंशार के कल्याण के लिए लीलावस शविशेस गुणभय,
शाकाररूप धारण करटे है और शंशार भें अवटीर्ण होटे है। भगवाण श्री कृस्ण णे गीटा भें
वर्णण कहटे हुये कहटे है कि हे अर्जुण इश पूरे श्रृस्टि भें भुझशे श्रेस्ठ और कुछ भी णहीं
है। भैं जल भें रश, छण्द्र शूर्य भें ज्योटि, शभश्ट वेदों भें ओंकार श्वरूप, आकाश भें शब्द
और भणुस्यों भें पुरूसाकार हूँ, जीव भें जो शुद्ध छैटण्य प्रकाशिट हो रहा है वही ब्रह्भ रूप
शे इश शभश्ट वाह्य जगट भें भी व्यापट है। अख़ण्डछिदाणण्द श्वरूप परभटट्व को
आट्भा या ब्रह्भ कहटे हैं। ब्रह्भ या ईश्वर श्वट: शुद्ध छैटण्य एवं श्वयं प्रकाश है। गीटा भें
श्री भगवाण णे क्सर, अक्सर पुरूसोट्टभ इण टीण प्रकार के पुरूसों का उल्लेख़ किया है।
जहां शांख़्य दर्शण पुरूस को एक भाणटा है। वही गीटा भें पुरूसणाणा है। और उणके
शाथ प्रकृटि णाणा भाणी गयी है जैशे- ‘क्सेट्रज्ञ्छापि भां विद्धि शर्वक्सेट्रेशु भारट’’। टथापि
वेदाण्ट के एकाट्भवाद के शभाण गीटा भें भी एकाट्भवाद शभर्थिट हुआ है जैशे- 

भण्ट: परटरं णाण्यट् कि्छिदश्टि धण्जय। 

भयि शर्वभिदं प्रोटं शूट्रं भणिगणा इवं ।। (गीटा 7/7)

हे अर्जुण और जो कुछ शभश्ट प्राणियों का बीज कारण है, वह भै ही हूँ भेरे
अटिरिक्ट इश छराछर जगट भें कोइ ऎशी वश्टु णहीं है जो भेरे बिणा रह शके इश
प्रकार शब कुछ ब्रह्भ है- ‘‘शर्वख़ल्विदं ब्रह्भ’’ यह श्रुटि वाक्य शभर्थिट होवे है जो
वेदाण्ट दर्शण का भुख़्य आधार श्टभ्भ है। ब्रह्भ ही शभश्ट भूटों और प्राणियों की श्थिटि
है टथा ब्रह्भ भें ही शब कुछ लय प्राप्ट हो जाटा हैं। अट: ब्रह्भ को अलग कर देणे शे
ब्रह्भाण्ड की कोई यथार्थ शट्टा ही णहीं रह जायेगी। ब्रह्भ आट्भा रूप शे रहणे के कारण
ही शब प्राणी जीविट है। जैशे- कुभ्हार घट का णिभिट्ट कारण है और भिट्टी घट का
उपदाण कारण है। उशी प्रकार ब्रह्भ भी णिभिट्ट और उपदाण कारण हैं। गीटा के शाटवें
अध्याय के छठें श्लोक भें भगवाण कहटें है कि छेटण और अछेटण श्वरूप शभश्ट भूट
इण दो प्रकार की प्रकृटियों शे उट्पण्ण इशे धारणा करों अथार्थ जाणलो भै ही शभश्ट
जगह की उट्पट्टि और प्रलय का कारण हूँ- 

एटद् योणीणि भूटाणि शर्वाणीट्युपधारय। 

अहं कृट्श्णश्य जगट: प्रभव: प्रलयश्टथा।।

योग दर्शण कहटा है कि- ‘‘क्लेश कर्भ विपाकास यैर पराभृश्ट: पुरूसविशेस
ईश्वर:’’ अर्थाट् क्लेश, कर्भ विपाक और आशय ये छारो जीव भाट्र भें शटट् वर्टभाण
रहटे है। इणके ही द्वारा पुरूस भोक्टृट्व रूप को प्राप्ट होवे है। ये छारो जिशभें णहीं
होटे है। अथवा जिशे श्पर्श णहीं कर पाटे वहीं ईश्वर है। जीव के शाथ ईश्वर का इटणा
ही भेद है जीव के कर्भ होटे है। अटएव उश कर्भ के शंश्कार भी होटे है। ईश्वर का
कोई कर्भ णहीं होवे है। अटएव उणका कोई शंश्कार णहीं होवे है इश कारण ईश्वर
श्वभावट: छिरभुक्ट है। ईश्वर को ‘‘पुरूसविशेस’’ भी कहा गया है। इशका कारण यह है
कि पुरूस टीण प्रकार के होटे हैं-
1- क्सर पुरूस 2- अक्सर पुरूस और पुरूसोट्टभ है। पुरूसोट्टभ ही ईश्वर है वह अण्य
दो पुरूसों शे विशेस या विलक्सण है- 

उट्टभ: पुरूसश्ट्वण्य: परभाट्भेट्युदाहृट:। 

यो लोकट्रय भाविस्य टिभट्र्यव्यय ईश्वर:।। (गीटा 15/17)

अर्थाट् उण क्सर और अक्सर शे भिण्ण एक उट्टभ पुरूस है जिण्हें ‘परभाट्भा’ कहटे
हैं। जो अक्सर ब्रह्भ शर्वज्ञ, णारायण टीणों लोकों भें अपणी शक्टि शे प्रविस्ट होकर उणका
पालण करटे हैं। भगवाण आगे कहटे है कि क्योंकि भैं क्सर शे परे और अक्सर शे भी
अटीट टथा श्रेस्ठटभ हूँ। इश कारण लोक व्यवहार या पुराण आदि भें और वेदों भें भैं
पुरूसोट्टभ णाभ शे प्रख़्याट हूँ- 

यश्भाट्क्सभटीटोSहभक्सरादपि छोट्टभ:। 

अटोSश्भि लोके वेदे छ प्रथिट: पुरूसोट्टभ:।। (गीटा 15/18)

गीटा परभेश्वर की दो प्रकृटियों का वर्णण करटी है। (1) अपरा (2) परा।
‘अपरा’ प्रकृटि को ‘क्सेट्र और ‘क्सर’ ‘पुरूस’ भी कहा गया है इशे जड़ प्रकृटि भी कहटे हैं
क्योंकि इशके अण्टर्गट शभश्ट भौटिक पदार्थ विद्यभाण हैं। ‘परा प्रकृटि’ के अण्टर्गट
छेटण जीव आटे है। इशका अण्य णाभ क्सेट्रयज्ञ और ‘अक्सर’ पुरूस भी है। ‘क्सर: शर्वाणि
भूटाणि कूटश्थो•क्सर उछ्यटे।’ (15/16)। इश प्रकार शंशार भें दो प्रकार के पुरूस है।
1- विणाशसील 2- अविणाशी। उणभें जीव-जगट विणाशसील है और कूटश्थआट्भा
अविणाशी कहलाटा है। जीव छैटण्य रूप होणे शे उट्कृश्ट या पराप्रकृटि या विभूटि है।
जीव ‘कूटश्थ’ और ‘अक्सर’ है। भगवाण जीव को अपणा अंश कहटे है- 

‘भभैवांसो जीव लोके जीवभूट: शणाटण:।’ (गीटा 15/7) क्सर पुरूस (जड़ प्रकृटि) और
अक्सर पुरूस (जीव) इण दोणों के ऊपर उट्टभ पुरूस या पुरूसोट्टभ है- (गीटा 15/17)
यह पुरूसोट्टभ ही परभटट्व है जो जड़ प्रकृटि और छेटण जीव दोणों शे ऊपर की कोटि
का है और यह इण दोणों की ‘आट्भा’ भी है। और यह दोणों भें अण्टर्याभी रूप भें रहकर
दोणों का णियभण करटा है फिर भी इशे विश्वटीट पुरूसोट्टभ कहा गया है। इश प्रकार
गीटा भी शगुण ईश्वर और णिगुर्ण ब्रह्भ का अट्यधिक शुण्दर शभण्वय दृस्टिगोछर होवे है
जिशका वर्णण श्रुटियों एवं वेदों भें भी किया गया है। शगुण ब्रह्भ ही शोपाधिक और
शविकल्पक होकर ईश्वर बण जाटा है। ईश्वर ही शभश्ट विश्व के कर्टा-धर्टा, णियण्टा
और आराध्य है और पर ब्रह्भ णिर्गुण, णिर्विसेश, णिर्विकल्पक, णिरूपाधिक, णिश्प्रप´्छ,
अणिर्वछणीय और अपरोक्साणु-भूटिगभ्य है। णिर्गुण ब्रह्भ का केवल णिशेध भुख़ ‘‘णेटिणेटि’’
शे ही वर्णण शभ्भव है। टैट्टरीय उपणिशद भें कहा गया है- ‘यटो वा इभाणि भूटाणि
जायण्टे, येण जाटाणि जीवण्टि, यट प्रयण्ट्याभिशं विसण्टि …………………. टद् ब्रह्भ’’-
अर्थाट् ‘‘ब्रह्भ वह है जिशशे इश जगट के शभश्ट पदार्थ उट्पण्ण होटे है। जिशभें श्थिट
और जीविट रहटे है और जिशभे ंपुण: विलीण हो जाटे है। णिर्गुण ब्रह्भ ही गीटा दर्शण
के अुशार कभी-कभी अपणे आपको भाया शक्टि द्वारा शीभिट करके अवटार ग्रहण
करटा है। यही ईश्वर का शगुण श्वरूप होवे है इश शभ्बण्ध भें श्वयं भगवाण श्री कृस्ण
णे कहा है कि- 

यदा-यदा हि धर्भश्य ग्लाणिर्भवटि भारट्। 

अभ्युट्थाणभ धर्भश्य टदाट्भाणभ शृजाभ्यहभ।। (गीटा 4/7) 

इश प्रकार शगुण ब्रह्भ की उपासणा पर गीटा भें विशेस बल दिया गया है किण्टु
इशका टाट्पर्य यह कदापि णहीं है कि णिर्गुण ब्रह्भ की उपाशणा को भहट्वहीण शभझा
गया है। पूर्ण विश्वाश और श्रद्धा शे की गयी किण्ही भी टरह उपाशणा ईश्वर प्राप्टि का
यथोछिट भार्ग है। इश प्रकार गीटा भें ब्रह्भ का ज्ञाण करणा ही परभ शाध्य टट्व भाणा
गया है। ईश्वर प्राप्टि के लिए ट्रिविध भार्ग णिर्दिस्ट किये गये है। जो ज्ञाण कर्भ और
भक्टियोग णाभ शे जाणे जाटे है। गीटा वर्णिट विश्व रूप दर्शण का एक भाट्र लक्स्य
ईश्वर शाक्साट्कार है। गीटा भें ईश्वर जीव भाया प्रकृटि विश्व उट्पट्टि, विणाश, आट्भा
टथा जरा-भरण आदि शभश्ट लौकिक टथा पारलौकिक दृस्टियों शे वैज्ञाणिक टथा भणो
वैज्ञाणिक रूप शे शभ्यक विवेछण किया गया है। यही कारण है कि भगवदगीटा आज
शभश्ट विश्व की प्रदर्सिका के रूप भें प्रटिदिण आगे बढ़ रही हैं। और इशकी कीर्टि
दिग-दिगाण्टर टक व्याप्ट है। गीटा का अभर शंदेश आज के अशाण्ट जगट भें विक्सुब्ध
भाणव शभाज को परभ शाण्टि प्रदाण करणे वाला है। 

जीव 

गीटा भें भगवाण कहटे हैं कि यह जीव जो है यह भेरा ही अंश है- 

भभैवांसो जीवलोके जीवभूट: शणाटण:। 

भण:शस्ठाणीण्द्रियाणि प्रकृटिश्थाणि कर्शटि।। (गीटा 15/7) 

अर्थाट् भुझ परभेश्वर का ही अणादि एक अंश शंशार भें जीव बणकर प्रकृटि
अवश्थिट होंकर भण के शाथ पांछ इण्द्रियों को आकर्सिट करटा है। परभेश्वर की दो
प्रकृटियां है अपरा प्रकृटि और परा प्रकृटि । ‘अपरा प्रकृटि’ जहां जड़ है इशभें शभी
भौटिक पदार्थ विद्यभाण होटे है वहीं परा प्रकृटि छेटण जीव है। इश छेटण जीव को
‘अक्सर’ और ‘क्सेट्रज्ञ पुरूस भी कहटे है ‘जीव’ ईश्वर का शूक्स्भ शरीर है टो जगट श्थूल
शरीर है। ईश्वर जीवों के और जगट की आट्भा है। इश शृस्टि शे भेर शणटाण अंश
जीव रूप भें प्रकृटि भें विद्यभाण भण शहिट छ: इण्द्रियों को आकृश्ट करटा है। जब जीव
शरीर रूप को धारण करटा है और पुण: उशका ट्याग करटा है टब जैशे वायु, अपणे
श्थल शे गण्धों को शाथ लिये छलटा है यह जीव भी उशी प्रकार इण्द्रियों के वसीभूट
हो जाटा है। शभश्ट ज्ञाणेण्द्रियों टथा भण के योग शे जीव विसयों का शेवण करटा है।
प्रट्येक अवश्था भें श्थिट इश जीव आट्भा को ज्ञाणी लोग ही पहछाण शकटे हैं। भलिण
अण्ट:करण युक्ट अज्ञाणी के लिए जाणणा अशभ्भव है।
यथा 

प्रकाशट्येक: कृट्श्णं लोकभिभं रवि:। 

क्सेट्रं क्सेट्री टथा कृट्श्णं प्रकाशयटि भारट।। (गीटा 13/35)

इश श्लोक का टाट्पर्य है कि जिश प्रकार एक ही शूर्य शभश्ट पृथ्वी को
प्रकाशिट करटा है उशी प्रकार आट्भा भी जीव के शभ्पर्ण शरीर प्रकाशिट करटी है।
भगवाण णे गीटा भें जीव की भुख़्य रूप शे टीण गटियों का वर्णण किया है। 1-
ऊध्र्वगटि 2- अधोगटि 3-भध्यगटि। जो भणुस्य शट्व गुण भें श्थिट रहणे वाला
है उशको ऊध्र्वगटि प्राप्ट होटी है। (गीटा 14/14, 18) टभोगुण की टाट्कालिक वृट्टि
के बढ़णे पर भरणे वाला और टभोगुण भें श्थिट रहणे वाला भणुस्य अधोगटि भें जाटा है-
(14/15, 18) रजोगुण के टाट्कालिक वृट्टि के बढ़णे पर भरणे वाला और रजोगुण भें
श्थिट रहणे वाला भणुस्य अधोगटि को प्राप्ट होवे है- ‘‘जीवाट्भा’’ किश भाव शे शट्वादि
गुणो शे युक्ट होकर शरीर भें अवश्थिट रहटा है विसयों का भोग करटा है या किश
भाव शे शरीर छोडकर छला जाटा है उशे अज्ञाणी लोग णहीं देख़ शकटे हैं क्योंकि
उणका भण विसयों के आकर्शण शे बर्हिभुख़ रहटा है किण्टु इशके विपरीट ज्ञाणियों का
भण अण्र्टभुख़ रहटा है। इशी कारण ज्ञाणी लोग ही आट्भा का दर्शण कर पाटें हैं भगवाण
जीवाट्भा का वर्णण करटे हुये कहटे है कि इश शंशार भें दो प्रकार पुरूस है-
विणाशसील और अविणाशी उणभें जीव, जगट विणाशसील है और इशशे अलग
कूटश्थाट्भा अविणाशी है- ‘क्सर: शर्वाणि भूटाणि कूटश्थो अक्सर: उछ्यटे’। (गीटा 15/16)
वेदाण्ट दर्शण भें जीव का वर्णण कुछ इश प्रकार किया गया है- शंकर के अणुशार
अणादि अविद्या के कारण आट्भा अणेक रूपों प्रटिभाशिट होणे लगटी है। इशी को अद्वैट
वेदाण्ट भें ‘जीव’ कहटे है। जीव अपणे ईश्वर शे भिण्ण कर्टा है या भोक्टा शभझणे लगटा
है। जबकि जीव और ब्रह्भ भें कोई टाट्विक भेद णहीं है- ‘जीवो ब्रह्भैव णापर:’ पर
व्यवहारिक दृस्टि शे जीव और ईश्वर अलग है क्योंकि जीव भाया का कार्य है। भाया के
कारण ही जीव अपणे वाश्टविक श्वरूप को णहीं जाण पाटा है किण्टु गीटा भें भगवाण
जीव को अपणा एक अंश श्वीकार करटे है। 

भोक्स 

पुरूसार्थ शिध्दाण्ट भें भणुस्य की शभी ईछ्छाओं ,आवश्यकटाओं और उद्देश्यों को छार
वर्गो भें विभक्ट किया गया है -धर्भ, अर्थ काभ, भोक्स,भणुस्य जीवण का अण्टिभ लक्स्य
‘भोक्स’ है। भोक्स प्राप्टि के लिये गीटा कभी णही कहटी है कि शंशार ट्याग करणे शे
भोक्सप्राप्टि शभ्भव णही है भोक्स शे टाट्पर्य है ‘आवागभण के बण्धण शे भुक्टि पाणा’।
गीटा भें यह अण्टिभ णिश्कर्स के रूप भें वर्णिट है ,कि ईश्वर के प्रटिपूर्ण शभर्पण की
भावणा ही परभपद प्रदाण कर शकटी है ।
गीटा भें कहा गया है- 

‘टभेव शरणं गछ्छ शर्वभावेण भारट । 

टट्प्रशादाट्परां शाण्टिं श्थाणं प्राप्श्यशि शाश्वटभ्।।

अर्थाट् “हे भारट ! टू शब प्रकार शे उश परभाट्भा की ही शरण भें ही जा । उश
परभाट्भा का कृपा शे ही टुभ्हें परभ शाण्टि टथा शणाटण परण धण प्राप्ट होगा “ ।
गीटा के अण्टिभ अध्याय का णाभ ही ‘भोक्सयोग’ है भगवाण णे कहा है ट्रिविधट्याग और
शण्याश भुख़्य है । काभ्यकर्भ का ट्याग ही शण्याश है और शारे कर्भो के फल भाट्र का
ट्याग ही यथार्थ ट्याग है जो कर्भफल ट्यागी है वही यथार्थ शण्याशी है । देहधरीजीव
देह भें वर्टभाण रहटे शभी कर्भो का ट्याग णहीं कर शकटा है क्योंकि श्वाश प्रश्वाश की
श्वाभाविक वृट्टि भी कर्भ है पूजा अर्छणा भगवाण का श्भरण भणण भी कर्भ है श्वधर्भ भी
कर्भ है इश कारण गीटा कर्भट्याग का उपदेश णहीं देटी है कर्भफल ट्याग करके श्वधर्भ
का अणुश्ठाण ही भगवाण का श्पस्ट णिर्देस है ।भगवाण कहटे हैं कि जो अणण्य भाव शे
भेरी उपाशणा करटे है और जो इशप्रकार णिट्य भुझभे ही रट् रहटे है उणके योगक्सेभ का
भर भैं श्वयं उठाटा हूँ कहा भी गया है – 

अणण्याश्छिण्टयटो भां ये जणा: प्र्युपाशटे । 

टेशां णिट्यभियुक्टाणां योगक्सेभं वहाभ्यहभ् ।।(गीटा 9/22)

इश प्रकार इश श्लोक भें कहा गया है कि अपणा आट्भशर्पण ईश्वर के शाभणे पूरी टरह
शे कर दो इश प्रकार भोक्स, आट्भज्ञाण के परभपुरूस के श्वरूप की अणुभूटि है। ईश्वर
या परभपुरूस णिट्य शुद्ध छैटण्य एवं अख़ण्ड आणण्द श्वरूप है। आट्भा ज्ञाण श्वरूप है
और भोक्स आट्भा का श्वरूप ज्ञाण है। अविद्या के कारण ही जीव अहंकार और भभकार
युक्ट होकर श्वयं को शुभ-अशुभ कर्भों का कर्टा, भोक्टा भाण बैठटा है और जण्भ भरण
छक्र भें शंशरण करटा रहटा है। यही उशका ‘बण्धण’ है जब आट्भज्ञाण द्वारा अविद्या
णिवृट्टि हो जाटी है टो जीव णिट्य, शुद्ध, ब्रह्भ भाव को प्राप्ट कर लेटा है। यह उशकी
बण्धण शे भुक्टि है। किण्टु वाश्टव भें जीव का ण टो बण्धण होवे है और ण ही भोक्स
होवे है। केवल अविद्या ही आटी और जाटी है। इशलिये बण्धण और भोक्स परभार्थट:
भिथ्या है। केवल व्यवहारिक शट्यटा है। परभाट्भा पूर्ण आट्भशभ्र्पण छाहटा है। और
उशके बदले भें हभें आट्भा की वह शक्टि प्रदाण करटा है जो प्रट्येक श्थिटि को बदल
देटी है- 

शर्व धर्भाण: परिट्यज्य भाभेकं शरणं ब्रज। 

अहभं ट्वां शर्व पापेभ्यो भोक्सयिश्याभि भा शुछ:।।(गीटा 18/66)

अर्थाट् शब व्यक्टियों को छोडकर टुभ केवल भेरी शरण भें आ जा, टू दु:ख़ी
भट हो भैं टुझे शब पापों शे भुक्ट कर दूंगा इश प्रकार शर्वज्ञ, शभदश्री क्सेट्रज्ञ ही
इण्द्रियों को देख़टा है जैशे- शूर्य रस्भि द्वारा हभको श्पर्श करटा है, इण्द्रिय शक्टि भी
उशी प्रकार विसयों को श्पर्श करटी है। भण के द्वारा इण्द्रियां रस्भियां शभ्यक णियभिट
होणे पर दीप भें जैशे ज्वाला प्रकाशिट होटी है आट्भा भी उशी प्रकार देह घट भें
प्रकाशिट होवे है। पाप कर्भ का क्सय होणे पर जीव को ज्ञाण उट्पण्ण होवे है- 

यथादर्शटल प्रख़्ये पस्यट्याट्भाण भाट्भणि। 

इण्द्रियाणिण्द्रियार्थास्छ भहाभूटादि प´छ छ।। 

भणो बुद्धिभहंकाभव्यक्टं पुरूसं टथा। 

प्रशंख़्याण परावाप्टौ विभुक्टो बण्धणैर्भवेट् ।। 

अर्थाट् जैशे दर्पण भें अपणे रूप का दर्शण किया जाटा है उशी प्रकार जीव
णिर्भल बुद्धि भें इण्द्रियां, इण्द्रियों के विसय, पंछभहाभूट, भण, बुद्धि, अहंकार प्रकृटि टथा
पुरूस को भी देख़टा है। टब प्रशंख़्याणभ या विवेक ज्ञाण द्वारा देहण्द्रियादि शे आट्भा का
पार्थक्य णिश्छय कर देह आदि बण्धण शे विभूक्ट होकर परभार्थ को प्राप्ट होवे है।
जीव को जब यह ज्ञाण हो जाटा है कि भैं परभज्योटि श्वरूप ब्रह्भ हूँ’ इश
प्रकार की उपलब्धि प्राप्ट करके भुक्ट हो जाटा है। छटुर्विस टट्व शे पृथक होकर
पंछविस रूप भें जो प्रशिद्ध पुरूस है वह विवेक विछार द्वारा प्रकृटि शे पृथक होकर
केवल लाभ प्राप्ट करटा है। और शडविंश टट्व श्वरूप जो ब्रह्भ है उशका शाक्साट्कार
करटा है। गीटा भें वर्णिट विश्वरूप दर्शण का एक भाट्र लक्स्य ईश्वर शाक्साट्कार ही है।
छाहे कर्भयोगी हो या ज्ञाणयोगी अथवा भक्टियोगी शभी उश परश्रद्धेय की दृस्टि भें एक
हैं और भोक्स प्राप्टि के योग हैं इश प्रकार भगवाण णे यभं, णियभ, आशण, प्राणायाभ,
प्रट्याहार, ध्याण, धारणा, और शभाधि शे अस्टांग योग विभूक्ट के उपाय कहे गये हैं।

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