गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

By | December 17, 2018

गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

(ii) पुस्तपाल पुस्तपाल का कार्य अक्षपटलिक की सहायता में रहते हुए राज्य के आदेशों का लेखा रखना था।
(iii) गाप – यह गाँव की आय व्यय का हिसाब रखता था ।
(iv) गौल्पिक – यह वन विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत था।
(v) शौकिक – इसका कार्य चुंगी वसूल करना था।
(vi) कर्णिक – यह आधुनिक रजिस्ट्रार के समान होता था।
डॉ. सेल्टोर के अनुसार “ऊपर से नीचे तक गुप्त प्रशासन के सभी कर्मचारी अपना प्रशासनिक कार्य एक अधिकरण में करते थे। जिसे एक कार्यालय या न्यायालय कहा जाता था। भंडागार, दण्ड पाशिक और उपरिक का अपना अपना अधिकरण होता था। नगर न्यायालय (अधिकरण मण्डप) में भूमि का भाव किया जाता था तथा न्यायिक प्रश्नों का भी निर्णय होता था। राजधानी का एक न्यायालय जहाँ सम्राट भी उपस्थित होता था धर्म स्थान कहलाता था।”

गुप्त साम्राज्य की न्याय प्रणाली – 

गुप्त कालीन नारद स्मृति के अनुसार चार प्रकार के न्यायालय होते थे।
(1) कुल (2) श्रेणी (3) गण तथा (4) राजकीय |
प्रथम तीन प्रकार के न्यायालय जनता के थे। राजा के हाथ में न्याय का अन्तिम अधिकार था। पहले के समय की तुलना में गुप्त काल में न्याय प्रणाली अधिक विकसित थी। इस काल में अनेक विधि पुस्तकें संकलित की गई। पहली बार दीवानी एवं फौजदारी अपराधों से सम्बन्धित कानूनों को परिभाषित किया गया । चोरी, पर स्त्रीगमन इत्यादि फौजदारी कानून के अन्तर्गत आ गये। विभिन्न प्रकार की सम्पत्ति से सम्बन्धित झगड़े दीवानी कानून के अन्तर्गत हो गये। उत्तराधिकार के सम्बन्ध में स्पष्ट और विस्तृत कानून बनाये गये। इस काल में कानून वर्ण- विभेदों पर भी आधारित हो गये । कानून की मर्यादा बनाये रखना राज्य का उत्तरदायित्व था। लेकिन अब भी प्रायः सम्राट मुकदमों का निर्णय ब्राह्मण- पुरोहितों की सहायता से करता था।

विनय स्थिति स्थापक

न्याय विभाग के प्रमुख अधिकारी को वैशाली मुद्रा लेख के अनुसार विनय स्थिति स्थापक कहा जाता था। फाह्यान के विवरण के अनुसार इस युग में अपराध कम थे और दण्ड विधान अधिक कठोर नहीं था। प्राण दण्ड नहीं दिया जाता था। बार बार अपराध करने वाले का दाहिना हाथ काट दिया जाता था। परन्तु चीनी यात्री का यह मत स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उस समय मृत्यु दण्ड प्रचलित नहीं था। साक्ष्यों से विदित होता है कि गुप्त काल में मृत्यु दण्ड प्रचलित था। कालिदास की प्रसिद्ध कृति अभिज्ञान शाकुन्तलम् के अनुसार चोर को रक्षिण नामक प्रहरियों को सौंपकर उसकी जाँच की जाती थी। प्रश्नोत्तर काल में उसे नगर द्वार के निकट रखा जाता था। राजा को सचित करने के बाद जब उसे मृत्युदण्ड दिया जाता था तो पहले उसके गले में पुष्पों की माला पहनाई जाती थी फिर या तो उसे शिकारी कुत्तों के सामने छोड़ दिया जाता था या गिद्दों के आगे फेंक दिया जाता था। मुद्रा राक्षस नामक नाटक में प्राणदण्ड प्राप्त व्यक्ति को एक जुलूस में फाँसी लगाने के स्थान पर उसके अपराध की घोषणा करते हुए ले जाने का वर्णन है।

गुप्त साम्राज्य की दंड व्यवस्था

इस तरह गुप्त काल में मृत्यु दण्ड का अत्यन्त क्रूर ढंग हाथियों से कुचलवा देना, आँखें निकलवा देना। डॉ. विधाधर महाजन, प्राचीन भारत का इतिहास पृष्ठ संख्या 441 पर लिखते हैं कि “राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचने वाले उच्च अधिकारियों को भी नहीं छोड़ा जाता था। दण्डी के अनुसार द्रोह का अर्थ राज्य करने वाले सम्राट को जहर देना । राजा के विरुद्ध षडयन्त्र करना और राजा की हत्या से राज्य कर्मचारियों की गुप्त भेंट करना है।
किसी भी व्यक्ति को निर्दोषी या दोषी सिद्ध करने के लिए चार प्रकार की परीक्षायें भी ली जाती थी, जल परीक्षा, तौल परीक्षा, विष परीक्षा और अग्निपरीक्षा । न्यायालयों में शपथ ग्रहण करने की प्रथा भी प्रचलित थी । ब्राह्मण को सत्य, क्षत्रिय को वाहन या आयुध, वैश्य को गाय-बीज व सुवर्ण तथा शूद्र को सब पापों की शपथ लेनी पड़ती थी । शिल्पियों, व्यापारियों तथा अन्य लोगों की श्रेणियाँ (Guilds) अपने नियमों द्वारा शासित होती थी । वैशाली तथा इलाहाबाद के निकटवर्ती भीटा से प्राप्त मुहरें इस बात की ओर संकेत करती हैं। कि गुप्त काल में श्रेणियाँ नियमों को कठोरतापूर्वक लागू करने के कारण ही भली भाँति पनप सकी थी।

गुप्त साम्राज्य की प्रान्तीय शासन – 

गुप्त सम्राटों ने शासन की सुविधा के लिए अपने साम्राज्य को अनेक इकाइयों में विभाजित कर रखा था। सबसे बड़ी इकाई प्रान्त था जिसे देश अथवा मुक्ति कहते थे। सौराष्ट्र, मन्दसौर, मगध कौशाम्बी, पुण्डूवर्धन, श्रावस्ती और अहिच्छत्र आदि अनेक मुक्ति थे। प्रत्येक देश या मुक्ति के शासक को उपरिक, भौगिक, भोगपति, गोप्ता, अथवा राजस्थानीय कहा जाता था । प्रान्तीय शासकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी । प्रायः प्रान्तीय शासकों के पद पर राजकुमारों को ही नियुक्त किया जाता था। लेकिन अन्य योग्यतम व्यक्ति भी प्रान्तपतियों के पद पर नियुक्त किये जाते थे। प्रत्येक प्रान्तपाल की सहायता और परामर्श के लिए एक सभा का भी गठन किया जाता था। इस सभा का गठन सभापति स्वयं करता था। प्रजापति की सहायता और परामर्श के लिए नियुक्त कर्मचारियों में बलाधिकरण,महादण्डनायक, विनयस्थिति स्थापक, भटाश्वपति, महापीलुपति, साधनिक आदि महत्त्वपूर्ण होते थे। प्रान्तपति अपने प्रान्तों को विभिन्न विपत्तियों से सुरक्षित रखने हेतु उत्तरदायी थे, ये विपत्तियाँ बाह्य आक्रमण एवं आन्तरिक विद्रोह के रूप में आती रहती थी । इस स्थिति में प्रान्तपति आन्तरिक विद्रोहों को कुचलने एवं बाह्य आक्रमणों का साहसपूर्ण मुकाबला कर प्रान्त में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए जिम्मेदार होते थे।

गुप्त साम्राज्य की प्रान्तीय व्यवस्था

प्रान्तपतियों की जिम्मेदारी केवल विपत्तियों का मुकाबला करने तक ही सीमित नहीं था। वह अपने प्रान्त में प्रजाजनों की समृद्धि एवं खुशहाली के लिए जन कल्याण के कार्य भी करते थे। जूनागढ़ अभिलेख से विदित होता है कि स्कन्द गुप्त के समय में सौराष्ट्र के प्रान्तपति पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने गिरनार पर्वत स्थिति सुदर्शन झील के बाँध की मरम्मत कराकर जनता को भीषण कष्ट से बचाया। ऐसे प्रान्त जो साम्राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाते थे अथवा उस प्रान्त की सीमायें असुरक्षित समझी जाती थी, वहाँ सुरक्षा एवं निपुण प्रशासन हेतु योग्य एवं अनुभवी प्रान्तपतियों की नियुक्ति की जाती थी । स्कन्द गुप्त ने हूणों के आक्रमण से पीड़ित सौराष्ट्र प्रान्त में काफी दूरदर्शी नीति एवं सोच विचार के पश्चात् पर्णदत्त नामक व्यक्ति को प्रान्तपति नियुक्त किया था । गुप्त शासन में सामन्तों का भी विशिष्ट स्थान था । इन सामन्तों को उनकी शक्ति के अनुसार अधिकार प्राप्त थे। समुद्र गुप्त के शासन काल में सीमान्त प्रदेशों के राजा सम्राट को कर देते उसकी आज्ञा का पालन करते और राज्य सभा में उपस्थित होते थे। गुप्त सम्राट दूरवर्ती प्रान्तों के शासकों से अपनी अधीनता (औपचारिक रूप में स्वीकार कराके उनसे वार्षिक कर एवं भेंट लेकर ही सन्तुष्ट थे। उन्होंने उनके आन्तरिक शासन में “हस्तक्षेप करके केन्द्रीय शासन के उत्तरदायित्व को बढ़ाने की चेष्टा नहीं की। सामन्तों की शक्ति काफी बढ़ गई थी।

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