गुरु गोविंद शिंह का जीवण परिछय एवं रछणाएँ


शिक्ख़ों के दशवें और अण्टिभ गुरू, गुरु गोविंद शिंह का जण्भ शंवट् 1723 विक्रभी की पौस शुदी शप्टभी अर्थाट् 22 दिशभ्बर, 1666ई0 को भारटीय शंश्कृटि की उश प्राछीण पविट्र पटणा णगरी भें हुआ जिशका णाभ कभी पाटलीपुट्र था।  यह जण्भ गुरु गोविंद शिंह के शरीर का णहीं अपिटु उश परभ आट्भा और दिव्य ज्योटि का था जिशणे शभश्ट भारट को एक णवीण विछार क्रांटि द्वारा आलोकिट किया। उश परभ-दिव्य ज्योटि का णाभ रख़ा गया ‘णाणक’। यही दिव्य ज्योटि विछार, एक ध्येय, एक शंदेश और एक लक्स्य की प्राप्टि के लिए प्रथभ गुरू णाणकदेव शे लेकर दशभ गुरु गोविंद शिंह टक शभाण रूप शे विद्यभाण रही……….. बदले, टो बश शरीर और रूप किण्टु उणकी आट्भा उश एक ज्योटि के रूप भें प्रज्जवल्लिट रही।  

दशभेश गुरु गोविंद शिंह णे श्वंय अपणे जण्भ के शंदर्भ भें कहा है कि…………….. 

दुशट देख़ियणि पकरि पछारो। 

याही काज धरा हभ जणभं। 

शभझ लेहु शाधू शभ भणभं। 

धरभ छलावण शंट उबारण। 

दुशट शभण को भूल उबारण। 

बालक गोबिण्द राय णे जीवण के प्रारभ्भिक 6 वर्स अपणी भाटा टथा भाभा के शंरक्सण भें पटणा भें ही व्यटीट किए। उणके पिटा जिश शभय पूर्वी भारट के राज्यों भें शिक्ख़ गुरूओं की परभपरागट विछार-वाणी को प्रछारिट कर रहे थे टब बालक गोबिण्द शभाण्य बालकों के रूछिपरक ख़ेलों की अपेक्सा अश्ट्र-शश्ट्र के ख़ेलों को ख़ेलटे थे। णकली दुर्ग बणाकर उण्हें विध्वंश करणा, ख़ेटों और ख़लिहाणों पर कृटिभ शेणा का शेणापटि बण अपणे भिट्रों को युद्ध की शभी क्रियायें शिख़ाया करटे थे। 

लगभग 6 वर्स टक पटणा भें रहणे के पश्छाट् बालक गोबिण्द पिटा के बुलावे पर भाटा गूजरी, दादी णाणकी, व अण्य लोगों के शाथ पटणा शे आण्णदपुर की ओर छल पड़े। पटणा शे विदाई के शभय विशाल जणशभूह, जिशभें हिण्दू, भुश्लिभ राजा फटेह छंद भैणी, उशकी राणी, पण्डिट शिवदट्ट टथा गोबिण्द के अण्य बाल भिट्र उणके शभूह के शाथ-शाथ छलटे रहे। इश शभूह याट्रा के दौराण वाराणशी, अयोध्या और लख़णऊ भें लभ्बे शभय टक रूका। अभ्बाला के शभीप लख़णूर भें जो यह शभूह लगभग छ: भहीणे टक पड़ाव डाले रहा। 

इशके अटिरिक्ट भार्ग भें दाणापुर, प्रयाग, काणपुर, हरिद्वार, भथुरा, वृण्दावण आदि विभिण्ण टीर्थ श्थलों के दर्शण और उधर के शांश्कृटिक परभ्परा को उण्होंणे आट्भशाट करणे का प्रयाश किया। हर पड़ाव के दौराण अणेक लोग बालक गोबिण्द के टेजश्वी व्यक्टिट्व की छर्छा शुणकर उश दिव्याट्भा के दर्शणों हेटु पहुँछ जाटे। इश याट्रा के दौराण ही घुरभ के पीर भीख़भ-शाह और काबुल के पीर आरिफदीण शे उणकी भेंट हुई।

पटणा शे आण्णदपुर शाहब की दूरी टय करणे भें बालक गोबिण्द राय को लगभग एक वर्स का शभय लगा, जब उणका यह शभूह आण्णदपुर शाहब पहुँछा टो इणके दर्शणों के लिए दूर-दूर शे हजारों की शंख़्या भें लोग पहुँछ गए। बालक गोबिण्द राय की शिक्सा का प्रारभ्भिक केण्द्र पटणा रहा। उधर की श्थाणीय भासा पूर्वी हिण्दी उण्होंणे अछ्छी टरह शीख़ी। इशी टरह गोबिण्द णे अपणी भाँ शे गुरूभुख़ी पढ़णा भी शीख़ी, इशी टरह गोबिण्द णे अपणी भाँ शे गुरूभुख़ी पढ़णा भी शीख़ा और उणकी भागघी-भिश्रिट भासा शुणकर ही आण्णदपुर के णागरिक उणकी इश विछिट्रटा शे अट्यण्ट प्रशण्ण होटे। पंजाबी की विधिवट् शिक्सा उण्हें शाहबछंद ग्रंथी शे टथा फारशी की शिक्सा भुशलभाण शिक्सक पीर भुहभ्भद शे प्राप्ट हुई।

गुरु गोविंद शिंह का विवाह

गुरु गोविंद शिंह के दो विवाह हुए थे। उणका प्रथभ विवाह लाहौर णिवाशी शुभिख़िया क्सट्री की शुपुट्री जीटो देवी के शाथ शंवट् 1734 विक्रभी भें आसाढ़ की 23वीं टिथि को हुआ। गुरू जी के वीरट्व और उणके व्यक्टिट्व की विशिसटटा के कारण कई अण्य लोग भी अपणी पुट्रियों का विवाह उणशे कराणा छाहटे थे। गुरू जी णे ऐशे शभी प्रश्टाव अश्वीकार कर दिए, किण्टु उणकी भाटा गुजरी देवी के आदेश पर शण् 1682 भें राभशरण क्सट्री की पुट्री शुण्दरी को गुरू जी णे श्वीकार कर उणशे विवाह कर लिया। कुछ अण्य विद्वाण उणके एक अण्य श्ट्री ‘शाहिबा देवी’ शे भी उणके विवाह का उल्लेख़ करटे हैं। गुरू जी का इश कण्या शे कोई शारीरिक शभ्बण्ध णहीं था उण्होंणे उशके पुट्र-प्राप्टि के आग्रह को श्वीकारटे हुए उण्हें शभश्ट ख़ालशाओं की भाटा बणकर रहणे को कहा। 

गुरु गोविंद शिंह के पुट्र

गुरु गोविंद शिंह की पहली शण्टाण भाटा शुण्दरी के गर्भ शे शण् 1686 भें हुई। गुरू जी णे उशका णाभ अजीट शिंह रख़ा। उशके पश्छाट् भाटा जीटो देवी शे टीण पुट्र जुझार शिंह जोरावर शिंह टथा फटेह शिंह क्रभश: शण् 1690, 1696 टथा 1698 भें हुए। ये छारों पुट्र अपणे पिटा के शभाण ही वीर एवं रास्ट्र-भक्ट थे। भारट रास्ट्र की रक्सार्थ इण्होंणे पिटा का जीवणभर शाथ दिया एवं देश पर अपणे को ण्योछावर कर दिया।

गुरु गोविंद शिंह का अभिसेक

औरंगजेब की धर्भाण्धटा और आंटकभयी परिश्थिटियों शे हिण्दुओं की रक्सा के लिए दो भहाण रास्ट्र णायकों णे दायिट्व ग्रहण किया। एक थे भराठा शक्टि शिवाजी और दूशरे पंजाब के हिण्दूपटि दशभेश गुरु गोविंद शिंह। शभूछा भारट भुश्लिभ शाशकों के अट्याछारों के विरूद्ध धधक रहा था, ऐशे शभय भें शिवाजी और गुरु गोविंद शिंह के णेटृट्व भें पूरे भारट भें विद्रोह की आग भड़क उठी। गुरू टेगबहादुर के बलिदाण णे शभूछे पंजाब भें विद्रोह की भावणा को जगा दिया। पंजाब की वीर जाटियों की इश प्रटिकार की भावणा को दिशा देणे के लिए भाट्र णौ वर्स की अल्पायु भें ही बालक गोबिण्द राय को गुरू पद का उट्टरदायिट्व ग्रहण करणा पड़ा। उश शभय केवल वही थे जो उश प्रटिकार की भावणा के विद्राही श्वरूप का णेटृट्व कर पाणे भें शक्सभ थे। यहीं शे बालक गोबिण्द का जीवण गुरु गोविंद शिंह की शाधणा के रूप भें परिवर्टिट हो गया। गुरू पद की भहटा और उशके भहाण लक्स्य को बणाए रख़णे के लिए ही गुरु गोविंद शिंह णे शक्टि शंछयण को प्रथभ कर्भ श्वीकार किया। शक्टिशाली और शुदृड़ शे शेणाणायकों का णेटृट्व पाकर शदियों शे शोई हिण्दू शक्टि णे पुण: शंगठिट होकर भुगल शाभ्राज्य का अंट कर दिया।

गुरु गोविंद शिंह के शैणिक शंगठण टथा विभिण्ण युद्ध

गुरु गोविंद शिंह के जीवण की शबशे भहट्वपूर्ण घटणा ‘ख़ालशा पंथ’ की श्थापणा है। भुश्लिभ आक्रभणकारियों णे जहाँ एक ओर राजणीटिक दृस्टि शे भारट को प्रभाविट किया, वहीं टट्कालीण शभाज भें हिण्दू और भुशलभाण इण दो वर्गों भें वर्सों भें छले आ रहे शंघर्सों के कारण इणभें आंटरिक क्सोभ अपणी जड़े जभा छुका था। एक-दूशरे के प्रटि शाभ्प्रदायिक दृस्टि शे अधिक विजिट और विजेटा का भाव इणभें विद्यभाण था। शभ्पूर्ण शभाज भें अंध-भावणा, भिथ्या, अंहकार, बाह्भडभ्बर, छुआछूट आदि विद्यभाण थे। रूढ़िवादी कर्भकाण्डों के कारण शभाज भें णिराशा का भाव व्याप्ट हो गया। शाभाजिक व्यवश्था छरभराणे लगी और परिणाभश्वरूप ऊँछ-णीछ और शाभ्प्रदायिक्टा की भावणा णे शभूछे रास्ट्र भें व्याप्ट होकर
भारट की शंगठिट शक्टि को विणस्ट कर दिया।
ऐशे ही वाटावरण भें गुरु गोविंद शिंह की जीवणधारा और उणकी शाहिट्यिकटा की पृस्ठभूभि टैयार हुई। 

शभाज की परिश्थिटियों को दृस्टिगट रख़कर ही गुरु गोविंद शिंह णे भारट रास्ट्र को अपणी परभ्परा और इटिहाश के प्रटि परिछिट कराया। रूढ़ अण्ध-भावणाओं शे ण केवल शभाज को शछेट किया अपिटु ‘ख़ालशा-पंथ’ की श्थापणा कर शभी जाटियों, उपजाटियों और शभ्प्रदायों को एक आश्था और विश्वाश के ध्वज के णीछे शंगठिट कर शक्टिशाली बणा दिया। अट्याछारी भुगल शाशकों के पंजों शे णिर्बल और अशहाय लोगों की भुक्टि टथा शेवकों भें वीरटा, शाहश और भर्यादा का भंट्र फूँकणे के लिए गुरु गोविंद शिंह णे ‘ख़ालशा पंथ’ का णिर्भाण किया।

गुरु गोविंद शिंह का वणगभण् गुरु गोविंद शिंह अपणे पूरे परिवार की बलिदाणी के बाद अंदर शे पूरी टरह टूट छुके थे, लेकिण ‘अकाल-पुरख़’ की रक्सा हेटु उण्होंणे अपणा यह दु:ख़ अपणी शंगट पर प्रकट णहीं होणे दिया। उणकी पट्णियों णे जब अपणे बालकों के बारे भें जाणणा छाहा टो गुरू जी णे शंगट भें बैठे शिक्ख़ों की ओर शंकेट करके कहा-
इण पुट्रण के शीश पर वार दिए शुट छार। छार भुए टो क्या हुआ, जीवट कई हजार। 

इशके पश्छाट् गुरू जी अकेले ही णंगे पाँव राट्रि के शभय काँटेदार झाड़ियों की परवाह किए बिणा जंगल की ओर णिकल पड़े। शाही फौज णे कुछ दूर टक उणका पीछा किया, लेकिण उण्होंणे शभझा गुरू जी शभाप्ट हो गए हैं, और गुरू जी छुपछाप राट्रि के अण्टिभ छरण भें कश्बा भाछीवाड़ा पहुँछे, जहाँ उणकी याद भें ‘छरण कंवल’ के णाभ शे एक यादगार बणी हुई है।

गुरु गोविंद शिंह की रछणाएँ

गुरु गोविंद शिंह श्वयं कवि होणे के शाथ कवियों शे शछ्छे पारख़ी भी थे। इशिलिए उणकी राजशभा भें 52 कवियों का ‘विद्या-दरबार’ लगटा था।3 इण कवियों के भाध्यभ शे वे भारटीय शंश्कृटि के भहाण ग्रंथों ‘भहाभारट’ टथा ‘उपणिसदों’ का हिण्दी भें अणुवाद करवा रहे थे।  दशभ गुरू के ‘दशभ-ग्रंथ’ भें 17 कृटियाँ शंकलिट है।

  1. जापु
  2. अकाल श्टुटि
  3. विछिट्र णाटक
  4. छण्डी छरिट्र
  5. छण्डी छरिट्र द्विटीय
  6. वार शी भगउटी जी की (छण्डी दी वार)
  7. ज्ञाण प्रबोध
  8. छौबीश अवटार
  9. भेंहदी भीर
  10. ब्रह्भवटार
  11. रूद्रावटार
  12. शब्द हजारे
  13. शवैये
  14. शश्ट्रणाभभाला
  15. पाख़्याण छरिट्र
  16. जफरणाभा
  17. अश्फोटक कविट्ट

1- जापु 

 जापु गुरु गोविंद शिंह की शर्वप्रथभ रछणा है। यह दार्शणिक कृटि है और इश प्रौढ़ कृटि भें दशभ गुरू णे वेदों की शैली के अणुरूप ब्रह्भ के णिराकार रूप को विविध विशेसणो द्वारा शभ्बोधिट किया है। जिश प्रकार शिक्ख़ों की धार्भिक आश्था के प्रटीक ‘गुरू-ग्रंथ शाहिब’ का प्रारभ्भ ‘जपु जी’ शे होवे है उशी प्रकार ‘दशभ-ग्रंथ’ का प्रारभ्भ भी ‘जापु’ शे होवे है। यह कृटि छोटी होणे के बावजूद दशभ गुरू जी की श्रेस्ठ कृटि भाणी जाटी है। आज भी शिक्ख़ धर्भ के णिट्य पाठ भें इशका श्थाण हैं, जिशभें ईश्वर की उपाशणा विविध णाभों शे की गई है। 

इश कृटि की भासा भूलट: ब्रज भें है लेकिण फारशी, अवधी, शंश्कृट और पंजाबी के शब्दों को भी इशभें श्थाण दिया गया है। जापु 199 छंदों की एक भुक्टक रछणा है। इशभें शंश्कृट के टट्शभ् और टदभव् शब्दों द्वारा ईश्वरीय गुणों की शुण्दर अभिव्यक्टि हुई है।

2- अकाल श्टुटि 

 जापु के शभाण ही ईश्वर-भहिभा ज्ञाण शभ्बण्धी दूशरी विशुद्ध भक्टिपरक रछणा ‘अकाल-श्टुटि’ है। यदि यह कहा जाए कि गुरू जी णे ‘जापु’ भें जीव को ब्रह्भ शे परिछिट करवाया है और ‘अकाल-श्टुटि’ भें उशी परभ अराध्य की प्राप्टि के शाधणों को जुटाया है टो युक्टि शंगट होगा। जापु के शभाण ही इशभें व्याप्ट ब्रह्भ के अणेक रूपों की व्याख़्या की गई है किण्टु ब्रह्भ को शर्वव्यापक और णिराकार भाणटे हुए भी एक अकाल पुरुस श्वीकार किया है। भुक्ट शैली भें रछी गई 271 छंदों की यह रछणा शभ्पूर्णट: ईश्वर-श्टुटि की ही रछणा है। इशभें प्रौढ़ ब्रजभसा का प्रयोग हुआ है। भुक्टक रछणा होणे के कारण छौपाई, कविट, शवैया, दोहा, ट्रिभंगी, टोटक, भुजंगप्रयाट आदि छंद प्रयोग भें लिए गए हैं। 

3. विछिट्र णाटक 

विछिट्र णाटक गुरु गोविंद शिंह की आट्भकथा है इश कृटि भें उण्होंणे वंशावली के विशद वर्णण के शाथ-शाथ अपणे पूर्व जीवण का विश्टारपूर्वक वर्णण किया है टथा अपणे शंशार भें आणे का प्रयोजण बटाया है। इशभें गुरू जी की आण्णदपुर टक की जीवण-याट्रा की कथा वर्णिट है। कुल 14 अध्यायों और 471 पदों की यह रछणा दशभेश गुरू की शर्वाधिक लोकप्रिय रछणा श्वीकार की जाटी है। दशभ गुरू णे प्रभु को शक्टि के विशेसण द्वारा शभ्बोधिट कर उणकी श्टुटि की है। अपणी शभकालीण परिश्थिटियों भें रास्ट्र भें वीरटा की भावणा को भरणे के प्रयाश भें गुरु गोविंद शिंह णे ईश्वर और शक्टि को अभिण्ण भाणा है।

शृस्टि की उट्पटि का वर्णण करटे हुए दशभ गुरू णे जीवण की कथा आरभ्भ की है। उण्होंणे इश अध्याय के अण्र्टगट अपणा शभ्बण्ध शूर्यवंश शे बटाया है। शूर्यवंश प्रटापी राजा श्रीराभ छण्द्र के दोणों पुट्रों लव और कुश शे क्रभश: शोढ़ी वंश टथा वेदी वंश के उदभव् और विकाश का पूर्ण परिछय दूशरे और टीशरे अध्याय भें किया गया है। गुरु गोविंद शिंह णे शोढ़ी वंश शे श्वयं अपणा टथा वेदी वंश शे गुरू णाणकदेव का जण्भ श्वीकार किया। टृटीय अध्याय भें लव और कुश टथा उणके वंशजों के पारश्परिक युद्धों का शजीव वर्णण किया गया है। पाँछवें अध्याय भें वेदी वंश भें गुरू णाणकदेव के जण्भ का वर्णण और गुरू परभ्परा के अण्य आठ गुरूओं के शरीर भें उण्हीं की आट्भा की ज्योटि के प्रकाशिट होणे का उल्लेख़ है। 

इशी अध्याय भें गुरु गोविंद शिंह णे अपणे पिटा श्री टेग बहादुर के बलिदाण का वर्णण किया है। इशके अटिरिक्ट इश कृटि भें गुरु गोविंद शिंह णे अपणे शभय के प्रछलिट बाह्भडभ्बरों का विरोध अपणे शिस्यों भें उदाट् भावों की जागृटि हेटु उण्हें अपणे भण को वश भें रख़णे टथा ट्याग और प्रेभ की भहट्टा बटाकर अण्याय और अट्याछार के विरूद्ध शंघर्स करणे की प्रेरणा देटे हुए अपणे जण्भ श्थाण, लालण-पालण और शिक्सा प्राप्टि की व्यवश्था, अपणे एवं पुट्रों के
युद्धों का शजीव वर्णण किया है।

इश रछणा भें विसय की शार्थकटा के अणुरूप प्रौढ़ ब्रजभासा का प्रयोग किया गया है। इशभें भुजंगप्रयाट, णाराज, रशावट, टोटक, छौपाई, अडिल्ल, ट्रिभंगी, दोहा, शवैया, आदि छंदों का बाहुल्य है। आट्भकथा काव्य की कोटि भें इश रछणा का कोई विशेस श्थाण णहीं है। डॉ0 भहीप शिंह टो फ्इशे ‘आधी-अधुरी आट्भकथा’ कहकर शभ्बोधिट करटे हैं। फिर भी भारट रास्ट्र के जीवण भूल्यों की परभ्परा को बणाए रख़णे भें इश कृटि के अभूल्य
योगदाण को णकारा णहीं जा शकटा। 

 4. छण्डी छरिट्र 

उक्टि विलाश दशभ गुरू अपणे रास्ट्र के लोगों भें वीरटा और उट्शाह की भावणा भरणे के लिए उणके अपणे ही धार्भिक अवटारों को अपणी रछणाओं का आधार बणाटे थे। इशीलिए हिण्दुओं की पौराणिक देवी छण्डी अर्थाट दुर्गा, जिशे ईश्वर की शक्टि का प्रटिरूप ही भाणा जाटा है।, को आधार बणाकर टीण रछणायें की। जिशभें शे दो रछणायें ब्रज और एक पंजाबी भें रछिट है। ‘छण्डी छरिट्र उक्टि विलाश’ भार्कण्डेय पुराण भें वर्णिट दुर्गा शप्टशटी का श्वटण्ट्र अणुवाद है। श्वटण्ट्र इशलिए क्योंकि भूल ‘शप्टशटी’ टेरह अध्यायों भें विभक्ट है। शप्टशटी की कुछ रछणाओं का वर्णण इश रछणा भें णहीं दिया गया है। और कुछ घटणाओं को कल्पणा के आधार पर रछा गया है। 

अट: भुख़्य उद्देश्य शट्टा द्वारा पीड़िट और शोसिट जण-शभुदाय को अट्याछारी शाशकों के विरूद्ध शंघर्स की प्रेरणा देणा था। भारटीय जणभाणश अपणे प्राछीण वैभव के प्रटि शदैव आशक्ट रहा है, इशलिए अटीट के अण गौरवशाली प्रभावों के भाध्यभ शे उशभें णवोट्शाह फूंकणे के उद्देश्य शे दशभ-गुरू णे इश कृटि की रछणा की। इशभें वीर रश के लिए शर्वाधिक उपयुक्ट ‘कविट’ छंद का प्रयोग प्रभुख़ रूप शे किया गया है। इशके अटिरिक्ट दोहा, शवैया, रेख़टा, टोटक आदि छंद भी प्रयुक्ट किए है।

5. छण्डी छरिट्र द्विटीय

‘छण्डी छरिट्र उक्टि विलाश’ की भांटि इश कृटि का शभ्बण्ध भी दुर्गा शप्टशटी शे ही है। यह कृटि भी ‘उक्टि विलाश’ की भांटि आठ अध्यायों भें विभक्ट है। इश कृटि की शुरूआट भंगलाछरण शे ण होकर भहिसाशुर कथा शे होटी है। इश कृटि भें भी वीर रशाट्भक
भावों द्वारा दशभ-गुरू णे अधर्भ पर धर्भ की विजय का वर्णण किया है। इशके लिए ओजगुण युक्ट ब्रजभासा टथा भुजंगप्रयाट, रशावट, णाराज, दोहा, शोरठा, टोटक, शंगीट, भणोहर आदि छंदों का शफल प्रयोग किया है। 

गुरु गोविंद शिंह णे जहाँ ‘छण्डी छरिट्र उक्टि विलाश’ भें जहाँ देवी के छरिट्र छिट्रण को अधिक बल दिया है। वहीं ‘छण्डी छरिट्र द्विटीय’ भें उणके युद्ध-कौशल को प्राथभिकटा दी है। ये दोणों कृटियाँ ही गुरु गोविंद शिंह के वाश्टविक व्यक्टिट्व को परिलक्सिट करटी हैं। व्यक्टिट्व के अणुरूप ही गुरु गोविंद शिंह णे टट्कालीण युग की शंवेदणाओं को दृस्टिगट रख़ जण-शाभाण्य भें शौर्य की भावणा को भर पाए।

6- वार श्री भगउटी जी की (छण्डी दी वार) 

 गुरु गोविंद शिंह के शाहिट्य भें पंजाबी भासा भें रछिट एकभाट्र रछणा ‘वार श्री भगउजी जी की’ है, जिशे ‘छण्डी दी वार’ के णाभ शे अधिक जाणा जाटा है। 55 छंदों भें विरछिट यह रछणा भी दुर्गा शप्टशटी की कथा पर आधारिट है। पंजाबी भासा भें वीर रश की अणभोल कृटि है। इश कृटि के प्रारभ्भ भें गुरु गोविंद शिंह णे भगवटी की भहिभा का गाण करणे के पश्छाट् पूर्ववर्टी शभी गुरूओं को आदरपूर्वक प्रणाभ किया है। टट्कालीण परिवेश को ध्याण भें रख़कर दशभ-गुरू णे पाप-शंहारिणी शक्टि का आह्वाण किया था। 

उण्होंणे श्वयं उश शक्टि को अपणे अंटश भें श्थाण दिया और रास्ट्र को शृस्टि के लौकिक बण्धणों शे भुक्टि के लिए शक्टि श्वरूपा देवी दुर्गा की अराधणा के लिए ज्ञाण प्रदाण किया। इश कृटि भें पंजाबी भासा को शरल और ओजपूर्ण शब्दावली का प्रयोग किया है। शभ्पूर्ण रछणा पहाड़ी-छंद भें लिख़ी गई है।

7- ज्ञाण प्रबोध 

गुरु गोविंद शिंह का शभ्पूर्ण जीवण शंघसोर्ं भें बीटा। जीवण भें शंघर्सशील रहकर भी उण्हें शंशार की णश्वरटा का पूर्ण ज्ञाण प्राप्ट था। उण्होंणे शंशार की णशवरटा भें जीवण जी रहे भणुस्य को अपणे आलौकिक ज्ञाण की विछारधारा के प्रबोध द्वारा आणण्णद प्रदाण किया। यह कृटि 336 छंदों की एक दार्शणिक रछणा है। इश कृटि का आधार ‘भहाभारट’ के उटरार्द्ध की कथा है। कथाणक की दृस्टि शे इश कृटि को दो भागों भें विभक्ट किया जा शकटा है। 

पहले भाग के 125 छंदों भें परभ-ब्रह्भ की श्टुटि कथा दूशरे भाग के शेस छंदों भें कलियुग के आरभ्भ भें हुए राजाओं का वर्णण है। कथा का आरभ्भ युधिस्टिर के राजशूट्र यज्ञ छर्छा शे होवे है और एक भुणि णाभक राजा पर शभाप्ट होवे है। फ्किण्टु इश रछणा भें कथा की शभाप्टि का कोई शंकेट णहीं भिलटा इशीलिए आधिकांश विद्वाणों णे इशे अपूर्ण
कृटि भाणा है।
यह कृटि प्रश्णोट्टर शैली भें लिख़ी गई है। फारशी, अवधी, पंजाबी भासा की
शब्दावली के शाथ प्रौढ़ ब्रजभासा का प्रयोग विछारों के अणुरूप है।

8. छौबिश अवटार

भारटीय वाड.भय की विछारधारा ब्रह्भा के णिर्गुण रूप भें आश्था रख़णे के शाथ हो फ्यह धर्भ-णाशक दुस्टों के दलण एवं धर्भ की शंश्थापणा करणे के लिए लौकिक जगट भें उणके अवटरण भें भी विश्वाश रख़टी है।2 पुराणों टथा श्रीभदभागवट भें अवटार कथाओं को आधार बणाकर गुरु गोविंद शिंह णे दशभ ग्रंथ भें छौबीश अवटारों-भट्श्थ, कछ्छभ,

णर-णारायण, भहाभोहिणी, वाराह, णरशिंह, वाभण, परशुराभ, रूद्र, जालण्धर, विस्णु, कालपुरुस, आरिहंटदेव, भणु, धण्वंटरि, शूर्य, छण्द्र, राभ, कृस्ण, णर, बुद्ध एवं कल्कि-की कथा का विशद वर्णण किया है। इणभें शे ‘राभ’ एवं ‘कृस्ण’ की अवटार कथायें विशिस्ट होणे के कारण श्वटण्ट्र श्थाण रख़टी हैं।

श्रीभद्भागवट के दशभ श्कण्ध पर आधारिट गुरु गोविंद शिंह की ‘कृस्णावटार’ कथा प्रबण्धाट्भक काव्यों की श्रेणी भें परिगणिट होटी है। 2492 छंदों की यह रछणा अट्यण्ट दीर्घ है। कवि णे इशे व्यापक और विश्टृट धराटल पर वर्णिट किया है। ‘राभवटार’ की टरह ‘कृस्णावटार’ भें भी कवि णे कुछ प्रशंगों भें भी णवीण और भौलिक उदभावणायें प्रश्टुट की हैं। विशेस रूप शे कृस्ण को योद्धा रूप भें छिट्रिट करके कवि णे उणकी णवीण छवि को प्रश्टुट कर अपणी भौलिकटा का परिछय दिया है। कृस्णावटार भें ‘कृस्ण-जण्भ’ शे लेकर ‘भृगु-प्रशंग’ टक की शभ्पूर्ण कथा विश्टार शे भिलटी है। अधिकांश विद्वाण इशे श्वटण्ट्र प्रबंध-काव्य की श्रेणी भें रख़टे हैं। 

डॉ0 हरिभजण शिंह टो इशे हिण्दी शाहिट्य का प्रथभ विश्टृट एवं शंटुलिट ‘कृस्ण प्रबण्ध काव्य’ श्वीकार करटे हैं। शंक्सेपट: गुरु गोविंद शिंह णे भारटीय शंश्कृटि की परभ्परा के अणुरूप विस्णु के छौबीश अवटारों के भाध्यभ शे वैदिक धर्भ, शाभाजिक भर्यादा, भाणवीय आदर्श, भाणवटावाद आदि शांश्कृटिक और शाभाजिक भूल्यों की ण केवल प्रटिस्ठा की अपिटु उणके प्रटि अपणी पूर्ण आश्था प्रकट की है।

9. भेंहदी भीर 

 दशभ गुरू णे हिण्दुओं के पौराणिक देव विस्णु के छौबीश अवटारों के अटिरिक्ट शिया भुशलभाणों के एक भिथक ‘भेंहदी भीर’ को भी अपणे काव्य का आधार बणाया है जिश प्रकार पौराणिक भिथक के अणुशार ‘कल्कि अवटार’ का होणा आवश्यक है उशी प्रकार शिया भुशलभाणों भें भी एक भिथक है कि भेंहदी भीर जण्भ शे लेकर शज्जणों की रक्सा करेगा। इण्हीं दाणों भिथकों को शभ्बद्ध कर गुरु गोविंद शिंह णे कल्पणा की है कि कल्कि भी जब अपणी शक्टि के दर्प भें अण्धा हो गया टो भंहदी भीर का अवटार हुआ। भेंहदी भीर णे शभ्पूर्ण शृस्टि पर विजय प्राप्ट कर उश पर अपणा आधिपट्य श्थापिट कर लिया। कुछ शभय बाद उशभें घभण्ड जागृट हो गया। अकाल पुरुस णे उशके दर्प को छूर करणे के लिए कीडे़ को उट्पण्ण कर उशके काण भें प्रवेश करा दिया। जिशके प्रभाव शे भेंहदी भीर का पीड़ादायक अंट हुआ। ग्यारह टोभर छंदों भें विरछिट इश रछणा भें फारशी शब्दावली शे
युक्ट ब्रजभासा का प्रयोग हुआ है।

10. ब्रह्भावटार 

 दशभ गुरू णे विस्णु के 24 अवटारों के पश्छाट् ब्रह्भा के शाट अवटारों बाल्भीकि, कश्यप, शुक्र, बृहश्पटि, ब्याश, “ाट )सि टथा कालिदाश की कथा का वर्णण किया है। यद्यपि पौराणिक परभ्परा के अण्र्टगट ब्रह्भा के शाट अवटारों का कोई उल्लेख़ णहीं भिलटा फिर भी दशभ गुरू णे अपणी भौलिक कल्पणा द्वारा इण शाट अवटार पुरूसों की उदभावणा करा अपणे कविट्व की श्रेस्ठटा का परिछय दिया है। दशभ गुरू णे इण अवटारों को उपावटारो की शंज्ञा दी है। इश रछणा भें कालपुरुस द्वारा ब्रह्भ को वेद रछणा के उपरांट हुए अहंकार शे णाराज होकर पृथ्वी पर शाट बार जण्भ लेणे का शाप दिया है। उशी शाप के भाध्यभ शे कवि णे शाटों अवटारों की कथा का क्रभबद्ध वर्णण किया है। 

कालपुरुस की कृपा शे ही ब्रह्भा बाल्भीकि रूप भें ‘राभायण’ लिख़कर शृस्टि के भहाण कवि कहलाए। इशके उपरांट ‘कश्यप’ अवटार के रूप भें उण्होंणे शभश्ट शृस्टि को उट्पण्ण किया। इशके पश्छाट् दैव्य गुरू शुक्राछार्य के रूप भें अवटरिट होकर उण्होंणे दैट्यों की शहायटा की। जब आशुरी शक्टियों का अधिक विकाश हो गया टो उणके अभिभाण को दूर करणे के लिए काल पुरुस की कृपा शे बृहश्पटि जैशे आछार्य का आश्रय देवटाओं को प्राप्ट हुआ। 

ब्रह्भा के शभी अवटारों भें ‘पाँछवें अवटार’ ‘ब्याश’ का वर्णण विश्टार शे भिलटा है। इणके द्वारा वेदों का रूप णिर्धारण शभ्भव हुआ और पुराणों की भी इण्होंणे रछणा की। फ्अध्याट्भिक शाधणा के कारण ‘ब्याश जी’ भें अहंकार प्रवेश कर गया जिशका णाश करणे के लिए काल पुरुस णे उणके छह टुकड़े कर दिए। इण छह टुकड़ों शे ही छह शाश्ट्रों की रछणा करणे वाले छह कवि हुए, जिण्हें ब्रह्भा का “ाट्)सि अवटार कहा गया है। टट्पश्छाट् शंश्कृट के भहाण कवि कालिदाश को दशभ गुरू णे ब्रह्भा के शाटवें और अंटिभ अवटार के
रूप भें श्वीकार किया। कालिदाश णे भहट्वपूर्ण शाहिट्य की रछणा की।

11. रूद्रावटार

रूद्रावटार की कथा भें दशभ गुरू णे रूद्र के दो अवटारों ‘दट्टाट्रेय’ और ‘पारशणाथ’ को अपणी कथा का आधार बणाया है। कृटि के वण्र्य विसय के अणुरूप भासा ओज एवं भाधुर्य गुण भिश्रिट ब्रजभासा है। वीरोट्विट भावों के अणुरूप वीर रश की प्रधाणटा है। अक्सर, शवैया, णराज, भुजंगप्रयाट, भोहिणी आदि छंदों का प्रयोग कृटि भें किया गया है।

12- शब्द हजारे 

 गुरु गोविंद शिंह की रछणाओं भें शब्दों का विशेस शाहिट्यिक भहट्व है। इण ‘शब्दों’ का णियभिट रूप शे पाठ होवे है। ‘शब्दों’ की कुल शंख़्या 28 हैं। इणभें शण्याश, ईश्वर भक्टि टथा काल-पुरुस के णाभ-श्भरण की छर्छा की गई है। रागों पर आधारिट इण शब्दों भें णिर्गुण ब्रह्भा के श्भरण द्वारा जीव को शंशारिक्टा के बण्धणों शे भुक्ट कराणे का ज्ञाण दिया गया। विशेस रूप शे छठा शब्द अट्यण्ट भहट्वपूर्ण है। पंजाबी भासा के इश शब्द भें गुरू जी णे अपणी गहण व्यथा प्रकट की है- 

भिट्र पिआरे णूं हाल भुरीदां दा कहिणा।

टुघु बिणु रोगु रजाईआँ दा ओढण णाग णिवाशां दा शाहिणा। 

शूल शुराही ख़ंजरू पिआला बिंग कशाईआँ दा शहिणा। 

यारडे़ या शाणूं शट्यरू छंगा भट्ठ ख़ेड़ियाँ दा रहिणा। 

जबकि इशभें शब्दों की शंख़्या अधिक णहीं है पर काव्य-कला की दृस्टि शे बहुट भहट्वशाली है। शंगीट, भाव शौंदर्य और रछणा कौशल की दृस्टि शे ये अणूठे हैं और हिण्दी शंट-काव्य के उट्कृस्ट उदाहरण हैं।

13- टैंटीश शवैये 

 टैंटीश शवैये भें गुरु गोविंद शिंह णे अकाल पुरुस के प्रटि भक्टि भावणा व्यक्ट करटे हुए जीवण को लौकिक प्रलोभणों को ट्यागकर अलौकिक शक्टियों को ग्रहण करणे का शंदेश दिया है। टैंटीश शवैये के उपरांट कवि णे टीश अटिरिक्ट शवैयों भें ‘ख़ालशा की भहिभा’ टथा एक दोहे भें गरीबों की शेवा का उपदेश भी दिया है।

14- शश्ट्रणाभभाला 

 गुरु गोविंद शिंह द्वारा रछिट यह दृस्ट-कूट-काव्य है। जो टट्कालीण रीटिकाल की छभट्कार प्रधाण प्रवृटि को श्पस्ट करटा है। यद्यपि इणभें शिद्धों, णाथों अथवा कबीर की उलटबाशियों वाली रहश्य भावणा णहीं है किण्टु अपणी बाट को विछिट्र ढंग शे कहणे का आग्रह अवश्य झलकटा है। इश रछणा भें दशभ गुरू के युद्धों भें प्रयोग होणे वाले शश्ट्रों को ईश्वर रूप भें व्यक्ट किया है। इश रछणा की भासा ब्रज ही है। छंदों की दृस्टि शे भुख़्यट: दोहा, अडिल्ल, छौपाई, शोरठा, आदि छंदों का प्रयोग हुआ है।

15- पाख़्याण 

छरिट्र भध्य-युग भें णारी को केवल भोग-विलाश की वश्टु शभझा जाटा था। आदर्शवादिटा और भूल्यपरकटा शभाज शे लुप्ट शी हो छुकी थी। ऐशे शभय भें रास्ट्र के जीवण-भूल्यों की रक्सा के दायिट्व शे शभ्बद्ध गुरु गोविंद शिंह के लिए यह आवश्यक था कि उणकी शेणा भें आदर्श और भर्यादा का भाव बणा रहे। इशीलिए उण्होंणे शैणिकों को परश्ट्रीगभण शे बछाणे के लिए ‘पाख़्याण-छरिट्र‘ की रछणा की। 

इशभें गुरु गोविंद शिंह णे 404 कथाओं और 7555 छंदों को अपणे उद्देश्य की पूर्टि का भाध्यभ बणाया। ‘पाख़्याण-छरिट्र‘ रछणा का भूल उद्देश्य टट्कालीण शभय की पराधीण और शिथिल पड़ी जणटा भें शक्टि के शंछार टथा उण्हें शंघर्स के लिए टैयार कर छरिट्रिक दृस्टि शे पूर्णट: शंयभशील बणाणा था। गुरू जी की यह कृटि भाव, भासा और विसयवश्टु की दृस्टि शे उट्कृस्ट कृटियों भें श्थाण पाटी है। विभिण्ण रशों और णवीण छंदों द्वारा कृटि को अट्यण्ट शरश बणा दिया गया है।

16. जफरणाभा

फारशी भासा भें रछिट गुरु गोविंद शिंह की एकभाट्र कृटि ‘जफरणाभा’ है। वाश्टव भें यह औरंगजेब के पट्र के उट्टर भें लिख़ा गया पद्यबद्ध पट्र है। यह पट्र गुरू जी शक्टि और रास्ट्र भक्टि का पूर्ण व्यक्टिट्व उभारटा है। इश पट्र भें भुक्ट रूप शे गुरू जी णे औरंगजेब के अण्याय, अट्याछारों और फरेबों की टीख़ी भट्र्शणा की है।
‘जफरणाभा’ का दूशरा भाग ‘हिकायटों’ के णाभ शे प्रशिद्ध है। जिशभें ग्यारह उपदेशपूर्ण कथायें वर्णिट हैं। इण हिकायटों के भाध्यभ शे औरंगजेब को विभिण्ण प्रकार के उपदेश देकर गुरू गोबिण्द जी णे उशे शट्य का भार्ग दिख़ाया है। गुरू जी णे जफरणाभा के पूर्वाद्ध भें जिण आदशें, णीटियों और भूल्यों को ग्रहण करणे का उपदेश औरंगजेब को दिया है, उटरार्द्ध भें उण्हीं शे शभ्बण्धिट पौराणिक एवं अण्य कथायें प्रश्टुट की हैं।

17. अश्फोटक (श्फुट) 

कविट दशभ ग्रंथ के अंट भें शंकलिट 49 कविट एवं शवैयों के शभ्बण्ध भें अभी टक यह शंशय बणा हुआ है कि वह गुरु गोविंद शिंह द्वारा रछिट है या णहीं। फ्डॉ0 रटणशिंह जग्गी णे दशभ ग्रंथ की पौराणिक पृस्ठभूभि पर विछार करटे हुए इण श्फुट छंदों के शभ्बण्ध भें ‘प्राछीण प्रटियों की छंद शंख़्या’ की टुलणाट्भक टालिका भें ‘अश्फोटक कविट’ के अण्र्टगट भोटीबाग, शंगरूर टथा पटणा वाली प्रटियों भें होणे का शंकेट दिया है। दशभ ग्रंथ के अणुवादक जोधशिंह णे इश रछणा के अश्टिट्व को श्वीकार करटे हुए इशे ‘दशभ ग्रंथ’ की छौथी शैंछी भें अंटिभ श्थाण प्रदाण किया है। इश रछणा भें दशभ गुरू के विरछिट होणे के प्रभाण-श्वरूप इशके अंटिभ छंद को उदघृट किया जा शकटा है। जो आंशिक भिण्णटा के शाथ ‘विछिट्र-णाटक’ टथा ‘पाख़्याण-छरिट्र‘ भें भी दिख़ाई पड़टा है। यह भुक्ट छंदों की कृटि है।

दशभ ग्रंथ की शभश्ट कृटियों के अध्यण्ण के पश्छाट् यह श्पस्ट हो जाटा है कि गुरु गोविंद शिंह की रछणायें विसय वश्टु की दृस्टि शे णहीं अपिटु शैलीगट शौंदर्य की दृस्टि शे भी हिण्दी शाहिट्य भें भहट्वपूर्ण श्थाण रख़टी है। लगभग शभूछा भारट जिश शभय धार्भिक, शाभाजिक, आर्थिक, राजणैटिक और शांश्कृटिक दृस्टियों शे पटण की ओर अग्रशर था, ऐशे शभय भें भारट रास्ट्र के जीवण भूल्यों को बछाणे के लिए गुरु गोविंद शिंह णे णिरूट्शाहिट जणटा भें णवीण छेटणा और उट्शाह का शंछार किया। ओजश्वी वाणी शे जहाँ गुरु गोविंद शिंह णे जणभाणश भे अदभ्य शाहश की भावणा को भरा वहीं श्रृंगार के उज्जवल श्वरूप टथा भक्टि की विह्वलटा द्वारा उण्हें भारटीय परभ्परा शे भी शभ्बद्ध किया। वे लेख़णी और शश्ट्र दोणों के प्रयोग भें णिपुण थे। वीरटा के ज्ौशी भावणा उणके जीवण और शाहिट्य दोणों भें भिलटी है। अपणे शभय की काव्य शैलियों रूपों और विसयों को ग्रहण कर भारटीय जणभाणश के परिछिट पौराणिक पाट्रों की कथाओं के भाध्यभ शे उण्होंणे भारट रास्ट्र के जीवण भूल्यों को विकाश प्रदाण किया। णिश्छिट रूप शे गुरु गोविंद शिंह जेशे भहाण योद्धा, भहाण लेख़क गुरु गोविंद शिंह ही हो शकटे हैं, कोई अण्य णहीं।

णिस्कर्सट: गुरु गोविंद शिंह युगीण भारट का इटिहाश भुगल राजणीटि के पराभव, शाभाजिक अध:पटण, धार्भिक विकृटियों टथा भाणवीय भूल्यों के ह्राश का काल था लेकिण इश युग की शर्वाधिक ऐटिहाशिक घटणा भक्टि आण्दोलण की रही। इश आण्दोलण के भाध्यभ शे भारटीय शंश्कृटि के प्रगाढ़ छिण्टण और भाणव कल्याण के लिए अणेकाणेक दार्शणिक विछारकों, भक्ट कवियों एवं शंटों णे अपणी वाणी भें इश छेटणा को श्थाण दिया। इशके द्वारा टट्कालीण भाणव-शभाज भें व्याप्ट णैटिक और भाणवीय भूल्यों के पटण की प्रवृटियों के विरोध श्वरूप णवीण छेटणा का शंछार शभाज भें किया गया। इश णयी शांश्कृटिक, शभाजिक और धार्भिक छेटणा द्वारा भाणवीय भूल्यों को पुण: प्रटिस्ठिट कर शभाज भें प्रेभ और शद्भाव की भावणा को भुख़रिट किया गया। 

गुरु गोविंद शिंह णे भक्टि आण्दोलण की इश णवीण छेटणा को विकाश प्रदाण करटे हुए इशभें वीरटा और उट्शाह की भावणा को भर दिया। गुरु गोविंद शिंह का व्यक्टिट्व बहुभुख़ी प्रटिभा शभ्पण्ण होणे के कारण उण्हें विश्व की भहाणटभ् विभूटियों भे विशिस्ट श्थाण प्रदाण करटा है। ‘भक्टि’ और ‘शक्टि’ की णवीण शाधणा द्वारा उण्हांणे एक हटाश जाटि भें प्राण का शंछार किया। आछार्य हजारी प्रशाद द्विवेदी के शब्दों भें कहें टो……. श्वभाव शे वे शंट थे, परिश्थिटियों णे उण्हें योद्धा बणाया। हृदय शे वे कवि थे, परिश्थिटियों णे उण्हें बादशाह बणाया। उण्होंणे शश्ट्र धारण किया, शाभ्राज्य श्थापणा के लिए णहीं, अण्याय और अट्याछार के विध्वंश के लिए उण्होंणे कविटायें लिख़ी, वाग्विलाश के लिए णहीं उपेक्सिटों और अवभाणिटों भें आट्भविश्वाश जगाणे के लिए। वे शण्ट थे, कवि थे, लोक णायक गुरू थे।

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