जयशंकर प्रसाद की रचनाएं

By | February 15, 2021


जयशंकर प्रसाद-युग-प्रर्वतक महाकवि हैं। वे बहुमुखी, प्रतिभा-सम्पन्न
एवं छायावाद के जनक (प्रवर्तक) हैं। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में रचना
की है। निबन्ध, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, मुक्तक, खण्डकाव्य, महाकाव्य-सभी
क्षेत्रों में उनकी प्रतिभा अद्वितीय सिद्ध हुई है। छायावाद के उद्भावक तथा समग्र-भावुकता एवं चिन्तन का एक साथ
वर्णन करने वाले इस महाकवि का जन्म काषी के सुँघनी साहू परिवार में
सन् 1889 में हुआ। उन्होंने स्थानीय क्वींस कालेज में छठवीं कक्षा तक अध्ययन
किया। उसके बाद उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत के परम्परागत विद्वानों से
घर पर ही काव्य और साहित्य की ठोस प्रारम्भिक शिक्षा पाई। बाल्यावस्था से
ही कवियों और मनीशियों के आत्मीय सत्संग से उनकी नैसर्गिक प्रतिभा
विकसित हो चली। 

9 वर्ष की अवस्था में जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी कवि प्रतिभा का
परिचय दे दिया था। किन्तु सन् 1901 में इनके पिता का देहान्त हुआ और सन्
1904 में इनकी माता भी परलोक सिधार गयीं तथा सन् 1906 में इनके अग्रज
भी चल बसे। इस प्रकार सत्रह वर्ष की अवस्था होते-होते परिवार तथा व्यवसाय
के उत्तरदायित्व का बोझ आ पड़ा। अपनी व्यावसायिक यही नारियल बाजार
वाली सूँघनी साहू की दुकान पर अविदित भाव से उन्होंने चुपचाप काव्य-साधना
को अग्रसर किया। वि. संवत् 1963 में ‘भारतेन्दु’ में पहली बार उनकी रचना
प्रकाशित हुई। इसी वर्ष उन्होंने ‘उर्वषी चम्पू’ ओर ‘प्रेमराज्य’ के प्रणयन किये,
जिनका प्रकाशन सं0 1966 में हुआ। 

इसमें तीन लम्बी कवितायें,
बाईस छोटी तथा चालीस कवित्त तथा सवैया एवं पद हैं। कथा-रूप में निबद्ध
‘उर्वषी’ और ‘बभ्रुवाहन’ तथा नाट्यरूप से रचित ‘प्रायश्चित्त’ और ‘सज्जन’ के
बीच-बीच में कवि ने अनेक दोहों, सवैयों एवं पदों की योजना की है। इस
रचना में भाव की दृष्टि से अनेक नये प्रयोग मिलते हैं। कल्पनाओं का सौंदर्य
भी बरबस अपनी ओर आकृष्ट करता है।

2. कानन-कुसुम –

खड़ी-बोली में लिखित जयशंकर प्रसाद की कविताओं का प्रथम-संग्रह
‘कानन-कुसुम’ ही है। इन रचनाओं में कवि का भावगत सौन्दर्य तथा कला की
प्रौढ़ता आकर्षक है।

इसका प्रथम प्रकाशन 1912 ई. में माना जाता है। उस संस्करण में
चालीस स्फुट रचनायें तथा बीस-पचीस कवित्त, सवैये, पद आदि थे। उनका
द्वितीय संस्करण ‘चित्राधार’ प्रथम संस्करण, 1918 ई. के अंतर्गत एक भाग के
रूप में प्रस्तुत हुआ। इसमें कुछ और रचनायें जोड़ी गयीं। तीसरा संस्करण
1929 ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें पर्याप्त परिवर्तन, परिवर्द्धन एवं संशोधन किया
गया। ‘कानन-कुसुम’ की कविताओं का काल-आयाम विस्तृत है।

‘कानन-कुसुम’ में दो प्रकार की रचनायें हैं- विषय-प्रधान एवं
भाव-प्रधान। विषय की दृष्टि से भी चार प्रकार की कवितायें हैं- प्रकृति-परक,
भक्ति और विनयपरक, आख्यानक तथा स्फुट। भावप्रधान कविताओं में भावों की
स्वाभाविकता, सरलता एवं गम्भीरता मन को द्रवित कर लेती है। प्रकृति को
उन्होंने आलम्बन, उद्दीपन, रहस्य, प्रतीक, अलंकरण आदि अनेक रूपों में प्रस्तुत
किया है। भाषा में अलंकृति एवं ग्रामीण प्रयोग भी दृष्टिगोचर होते हैं। विषय एवं
छन्द की दृष्टि से नवीन प्रयोग मिलते हैं। प्रकृति के एकान्त सौन्दर्य से कवि
का मन उल्लसित है। कवि ने प्रमुखत: प्रकृति के कोमल पक्ष को अपनाया है।
भक्ति-विषयक कविताओं में रहस्यात्मक तथा दार्षनिकता के तत्व लक्षित होते
हैं।

‘पतित-पावन’ में उनका कथन है कि मनुष्य, जन्म या कर्म, किसी से भी
कितना अधिक पतित क्यों न हो, किंतु उसके हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम होने
से वह पावन हो जाता है। ‘तुम्हारा स्मरण’ में ईश्वर के प्रति समर्पण-भाव है।

‘विरह’ प्रियतमों मिल जाओ गले, हृदय-वेदना, आदि रचनाओं में
विरह-जन्य-उपालम्भ, तन्मयता, आत्मनिवेदन, आकांक्षा आदि भावों की
अभिव्यंजना हुई है। समग्रत: इन रचनाओं में भक्त-कवि का स्वर न होकर एक
श्रद्धालु-कवि की विनय-भावना मुखरित हुई है। जिसकी प्रेरणा उसे भक्ति, रीति
एवं तत्कालीन युग की साहित्यिक परम्पराओं और घर के धार्मिक वातावरण से
मिली। ‘चित्राधार’ की भाँति इन कविताओं में भी कवि की आस्तिक श्रद्धा है,
सिद्धि नहीं, अनुकरण का प्रयास है, आत्मानुभूति की निष्छल वृत्ति नहीं।

वस्तु और शिल्प, दोनों की दृष्टि से प्रसाद की यह कृति प्राचीन और
नवीन की संधि पर खड़ी है। रीतिकालीन ब्रजकाव्य के संस्कार केवल कतिपय
शब्दों में सीमित हैं, द्विवेदी-युगीन काव्यादर्ष और “ौलियाँ अपेक्षाकृत अधिक हैं।
किंतु कवि धीरे-धीरे स्थूल से सूक्ष्म की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर बढ़ रहा है,
जिसकी पूर्णता ‘आँसू’ और ‘कामायनी’ में हुई है।

3. करूणालय –

‘जयशंकर प्रसाद’ जी की यह लघुकाव्य-रचना है। इसका सर्वप्रथम प्रकाशन
इन्दुकला 4, खण्ड 1 किरण, सम्वत् 1969 में हुआ। 5 वर्ष बाद ‘चित्राधार’ के
प्रथम संस्करण में इसका समावेश किया गया। तदनन्तर 1918 ई. में जयशंकर प्रसाद जी
ने इसे एक स्वतन्त्र पुस्तक का रूप प्रदान कर दिया।

जयशंकर प्रसाद जी के अनुसार यह काव्य गीति-नाट्य के ढंग पर लिखा गया
है। यद्यपि कुछ लोगों ने इसे गीति-रूपक, भाव-नाट्य आदि भी कहा है।
तथापि इस संदर्भ में जयशंकर प्रसाद जी का संकेत ही समीचीन प्रतीत होता है। यह
गीतिनाट्य मात्रिक छन्द वाली तुकान्त कविता में रचा गया है। हिन्दी में जयशंकर प्रसाद
जी का यह अभिनव प्रयोग था, जिसका बाद में अनुकरण भी किया गया।
इसकी कथावस्तु-ऋग्वेद, तैत्तीर्य-संहिता, अथर्ववेद, ऐतरेय-ब्राह्मण, रामायण,
महाभारत, ब्रह्मपुराण आदि वैदिक और पौराणिक-साहित्य में बिखरी पड़ी है।

जयशंकर प्रसाद जी ने इन ग्रंथों में उपलब्ध, मनु:षोध, रोहित, हरिष्चन्द्र एवं वशिष्ठ आदि
से सम्बन्धित सूत्रों को एकत्र कर उन्हें अपनी मौलिक कल्पना से सर्वथा एक
नया रूप दिया है।

‘करूणालय’ की कथानक योजना से तत्कालीन-युग की सांस्कृतिक,
सामाजिक, धार्मिक आदि विविध परिस्थितियों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। उस
समय यज्ञ में नर-बलि की प्रथा थी। वशिष्ठ जैसे महर्षि इसके समर्थक थे।

विष्वामित्र ने सर्वप्रथम आर्य-अनार्य-प्रथाओं का स्पष्टीकरण कर इस
आसुरी-कर्म का विरोध किया। धार्मिक कट्टरता के उस युग में महाराज द्वारा
महर्षि की बातों का सम्मान तत्कालीन धार्मिक-सहिष्णुता का बोधक-तथ्य है।
दासी-प्रथा भी थी। समाज में गन्धर्व-विवाह अमान्य था। इस प्रकार कवि ने
एक पौराणिक-प्रसंग को लेकर भारतीय समाज के एक विकृत-जर्जर-अंष की
गंदगी को निर्ममतापूर्वक साफकर स्वस्थ दृश्टि से जीवन की संक्षिप्त व्याख्या
प्रस्तुत की है।कथोपकथन-षैली में लिखित यह गीतिनाट्य रविन्द्रनाथ के
“यामा, चण्डालिका और चित्रांगदा की भाँति अभिनय है।

4. महाराणा का महत्व –

यह काव्य सर्वप्रथम 1914 में ‘इन्दु’ में प्रकाशित हुआ था। फिर
‘चित्राधार’ के एक अंग के रूप में 1918 में छपा। स्वतंत्र पुस्तक के रूप में
1928 में साहित्य-जगत् में प्रवेश किया। यह कथामूलक काव्य है। इसमें कवि
की मानवतावादी विचारधारा बड़े ही प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई।

प्रेमराज्य
और वीरबालक व्याख्यानक रचनाओं की अग्रिम परम्परा में परिगणित पाँच दृष्यों
में विभक्त जयशंकर प्रसाद जी का यह ऐतिहासिक खण्डकाव्य है। महाराणा प्रताप, रहीम
खानखाना, अकबर आदि से सम्बन्धित ऐतिहासिक इतिवृत्त लेते हुए इसकी
कथानक-योजना में जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी सर्जनात्मक-कल्पना-शक्ति का अच्छा
परिचय दिया है। इसका नामकरण-नायक एवं वीर, ऐतिहासिक महाराणा प्रताप
के आधार पर किया गया है। महाराणा प्रताप ने अपने देष एवं जाति के
मान-सम्मान के लिए किन-किन संकटों को झेला, किस प्रकार वन-वन की
खाक छानी, इस खण्ड-काव्य में कवि का राष्ट्र-प्रेम स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ
है। प्रताप का चरित्र भारतीय-संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप है। नायक के
अतिरिक्त सेनापति रहीम खानखाना-स्वाभिमानी, वीर और शत्रु के प्रति भी
कृतज्ञता व्यक्त करने वाला है। इसकी भाषा-परिष्कृत खड़ी-बोली है।

काव्य-विकास की दृष्टि से इस काव्य में पर्याप्त प्रौढ़ता है। संवादों में पर्याप्त
विदग्धता के साथ परिस्थिति तथा चरित्र के अनुसार हास्य-व्यंग्य, विनोद,
गम्भीरता, शालीनता, मनोवैज्ञानिकता, स्पश्टवादिता विद्यमान है। भाषा-सहज
स्वाभाविक एवं ओज-गुण सम्पन्न है।

निश्कर्शत: यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी की यह रचना अन्तरंग
एवं बहिरंग, सभी तत्वों की दृष्टि से, पूर्व-कृतियों से प्रौढ़ एवं स्वच्छंदोमुखी है।

5. प्रेम-पथिक –

‘महाराणा का महत्व’ के पश्चात प्रसाद जी का यह महत्वपूर्ण खण्डकाव्य
है। छायावादी काव्य की मानवीय, स्वच्छन्दतामूलक और सर्वात्मवादी पृष्ठभूमि
इस कृति में बड़े सशक्त रूप में विद्यमान है।

‘प्रेम-पथिक’ के दो रूप उपलब्ध होते हैं-पहला है- ब्रजभाषा का और
दूसरा- खड़ी-बोली का। पहले की रचना सं0 1962 में तथा उसके कुछ भाग
का प्रकाशन-इन्दु, कला, किरण, नवम्बर 1914 में ‘प्रेम-पथ’ तथा कुछ ‘इन्दु’
1914 में ‘चमेली’ शीर्षक में प्रकाशित हुआ। बाद में यह रूपान्तर सं0 1970 वि0
में पहली बार पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इसके विषय में कवि का कथन
है-कि ‘‘यह ब्रजभाषा में 8 वर्ष पहले लिखित, ‘प्रेम-पथिक’ का परिवर्तित,
परिवर्धित, तुकान्त-विहीन हिन्दी-रूप है।’’

‘प्रेम-पथिक’ कोरा काव्य नहीं है। इसमें प्रेमदर्षन जैसे महत्वपूर्ण विषय
का प्रतिपादन हुआ है। प्रेम को अत्यन्त व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित किया गया
है। उसके अनुसार क्षुद्र-वासना या त्वचा का स्पर्षमात्र, प्रेम नहीं, वरन् प्रेम तो
जीवन की संजीवनी है, विश्व की मूल-प्रेरणा है, आत्मा का रस है तथा प्रेम ही
मानव को राग-द्वेष के बन्धनों से मुक्त कर सकता है। प्रेम का मार्ग अनोखा
होता है। प्रेम-यज्ञ में उन्होंने सम्पूर्ण स्वाथ्र्ाी कामनाओं का हवन आवश्यक
बताया है। प्रसाद जी इस रचना के अंत में व्यक्त सुख-दुख, प्रेम, ईश्वर एवं
उसके प्रति कर्तव्य-उनकी आध्यात्मिक विचारधारा को भी स्पष्ट कर देते हैं।
शान्ति और आनंद की प्राप्ति के लिए हमें अपने प्रेम को सौहार्दपूर्ण एवं
विश्वव्यापी बनाना होगा, यही प्रसाद का जीवन-दर्शन भी है।

कथावस्तु में पर्याप्त जिज्ञासा एवं कौतूहल है। कलेवर की दृष्टि से, लघु
होते हुए भी, यह काव्य अपनी विषय-वस्तु एवं शिल्प की दृष्टि से सफल रहा
है।

6. झरना –

‘झरना’ का प्रथम प्रकाशन 1918 ई. में हुआ था। द्वितीय प्रकाशन 1927
में हुआ। कवि ने ‘चित्राधार’ के अंतर्गत संकलित होने वाले ‘कानन-कुसुम’ में
द्वितीय संस्करण से एवं ‘झरना’ के प्रथम संस्करण की कविताओं (तीन छोड़कर)
21 कवितायें और जोड़कर वर्तमान रूप को प्रस्तुत किया है।

इसके प्रथम संस्करण में 25 तथा द्वितीय संस्करण में 55 कवितायें
संग्रहीत हैं। इस कृति में प्रसाद जी की प्रेमपरक, प्रकृतिपरक तथा विनय से
सम्बन्धित रचनायें हैं। इसमें एक ओर तो द्विवेदी-युगीन प्रभाव है, तो दूसरी ओर
उनकी विकासशील प्रतिभा के स्वच्छन्दतावादी संस्कार भी दिखाई देते हैं। इन्हें
छायावादी रचना कहा जा सकता है। क्योंकि इसकी वेदना के आधार पर
स्वानुभूतियों की अभिव्यंजना के साथ ही भावों की तीव्रता, गंभीरता, प्रवाह और
एकाचित्तता भी है। सभी रचनायें प्रतीकात्मक हैं, संक्षिप्त हैं, साथ ही
मानवीकरण, प्रतीकीकरण एवं लाक्षणिक तथा ध्वन्यार्थ शब्द-षक्तियों से युक्त
हैं। इस प्रकार यह कृति छायावाद के इतिहास में अपना विषेश महत्व रखती है।

जयशंकर प्रसाद जी की इस कृति में व्यक्तिगत अनुभूति और मन की तरंगें बरबस
फूट पड़ती हैं। इसमें जयशंकर प्रसाद जी का यौवन-उल्लास, सरसता, कुतूहल, प्रेमिल
और निष्चिन्तता से युक्त जीवन अभिव्यंजित हुआ है। प्रेम के छन्दों में गुथी
रचनाओं में कवि, वर्शा से भरे हुए मधुर-स्रोत और मधुर-लहरियों वाले झरने को
देखकर, कल्पनातीत काल की घटनायें याद करता है। कभी पपीहे की ध्वनि
उसे व्यथित कर देती है, तो कभी कामना के नूपुरों की झनकारें उसके मन को
अव्यवस्थित कर देती हैं। किन्तु ‘झरना’ के अंत तक पहुँचते-पहुँचते कवि
भावानुभूतियों में बहने की अपेक्षा चिन्तनप्रिय हो उठता है।

इस कृति के सम्बन्ध के रामनाथ ‘सुमन’ ने कहा है-”झरने को देखकर
उस गुलदस्ते की याद आती है जिसमें जूही और रजनीगन्धा, गुलाब और
मन्दारपुश्प एक साथ लगे हुए हैं। जहाँ सरोज का गुच्छा है, तो नीम की पत्तियों
का भी ग्रन्थन है।”

7. आँसू –

यह जयशंकर प्रसाद जी का अत्यन्त लोकप्रिय, आत्म-रसासिक्त एक विरह-काव्य
है। इसमें कवि जीवन के मधुर एवं रसमय अतीत का स्मरण करता है। ऐसा
प्रतीत होता है कि कवि के सम्पूर्ण काव्य में मानव-जीवन के उत्कर्ष की धारा
आँसू में धुलकर निखर गई है।

इसका प्रथम संस्करण 1925 ई. (सं. 1982) में निकला। उसमें इसके 26
छन्द थे। मन में जैसे-जैसे भावना उठती गई है, कवि उसका निबन्धन करता
चला गया है। क्रमिक-संयोजन न होते हुए भी द्रवीभूत करने वाली मार्मिकता
है। अपनी कृतियों का निरंतर संस्कार करने वाले प्रसाद जी ने इसे भी अनेक
बार सजाया-सँवारा है। ‘आँसू’ का द्वितीय संस्करण 1933 में प्रकाषित हुआ।
इसमें छन्दों की संख्या 190 हो गई तथा छन्दों के क्रम में परिवर्तन भी कर
दिया गया है। पूर्ववर्ती छन्दों में भी अनेक संषोधन किये गये हैं। ‘आँसू’ की
प्रमुख विषेशता है-सौन्दर्य-चित्रण तथा विरहावस्थाओं की मार्मिक एवं
जीवन-अभिव्यंजना। इसमें भावानुभूतियों का क्रमिक संयोजन है।

विरह-व्याकुल-अन्तर की कसकती-वेदना, प्रियतम का मनोरम-रूपांकन एवं
संयोग-कालीन मादक-स्मृतियाँ, अन्तर की अनुनय-भरी-पुकार, सभी कुछ है।
कवि ने अपनी व्यक्तिगत वेदना को उदात्तीकृत रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास
किया है जो करुणा में प्लावित होकर विश्व-सदन में आशा का संचार कर
सके। अनुभूतियों का ऐसा भावभीना चित्रण है कि मन को आकर्षित किये विना
नहीं रहता। कल्पना का अनन्त-वैभव तथा प्राजंल-भाषा आदि सभी दृश्टियों से
यह अद्भुत-कृति है।

8. लहर –

‘लहर’ प्रसाद जी की स्फुट-कविताओं का अत्यन्त रसमय-संग्रह है। यह
काव्य, कवि की अन्तरतम भावना का प्रतीक है। व्यक्तिगत अनुभूति, व्यापक
जीवन-दर्शन की ओर उन्मुख हो गयी। वह, व्यक्ति की सीमित-सीमाओं का
अतिक्रमण कर, समष्टि के असीम में प्रवेष करती है। इस काव्य-संग्रह का
प्रकाशन 1935 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका था। इसमें
प्रसाद जी की 29 लघु प्रणीत तथा 4 आख्यानक संग्रहीत हैं। आख्यानक के
अतिरिक्त विषय-वस्तु की दृष्टि से इनके प्रगीत-प्रेम, प्रकृति, विचारात्मक,
आत्मत्व, वर्णनात्मक और प्रषस्तिमूलक हैं।

‘लहर’ के लगभग आधे प्रगीत,
प्रेम-प्रगीत में आ जाते हैं। ये सभी, प्रेमी की विरह-वेदना-जन्य-उच्छवास,
मधु-स्मृति, अनुनय, आह्वान, उपालम्भ, क्षोभ, पश्चाताप आदि विविध
मन: स्थितियों से युक्त हैं। ‘वे दिन कितने सुन्दर थे’ में अतीत की ही स्मृति है।
‘तुम्हारी आँखों का बचपन’ में प्रिय के हास-विलास संबंधी क्रीड़ाओं का स्मरण
तथा ‘कितने दिन जीवन जलनिधि’ में प्रतीक्षारत मन:-स्थिति के साथ ही
अनुनय के स्वर भी हैं।

‘लहर’ के प्रकृति-विषयक-प्रगीत भी तत्वत: मानवजीवन की उदात्त और
व्यापक भूमिका पर प्रस्तुत किये गये हैं। प्रकृति, जीवन के चरम् तत्वों में,
प्रतीक-रूप में, प्रस्तुत हुई है। उसका स्वयं का अपूर्व-सौंदर्य तो है ही, पर
मानवीय-शोभा का सहारा लेकर वह और अधिक निखर उठी है। डा0 गणेष
खरे के अनुसार-” ‘लहर’ का नामकरण और आरम्भ एक प्रकृति-विषयक रचना
से हुआ है। वह एक संबोध-गीत है, जहाँ लहर मानस में उठने वाली मधुपूरित
कामनाओं का प्रतीक है।” ‘हे मानससंगम अरूण-नील’ में महागम्भीर जलधि
का आलम्बनगत चित्रण है, जो दार्शनिक-पृष्ठभूमि लिये हुए है।

‘सागर’-परमात्मा का प्रतीक है और ‘सरिता’- आत्मा का। इन दोनों का
मानवीय-रूप तथा अलौकिक-मिलन बड़ा ही सुन्दर है। ‘बीती विभावरी जाग
री’ में प्रात: कालीन बेला का बड़ा ही मनोहर-चित्रण है, जो मानवीकरण का
श्रेष्ठ उदाहरण है।

आत्मपरक प्रतीक प्रसादजी के स्वयं के जीवन-दर्शन से संबंधित हैं।
‘लहर’ में इस प्रकार के तीन प्रगीत हैं- ‘मधुप गुन-गुनाकर कह जाता, कौन
कहानी यह अपनी’, ‘ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे’, तथा ‘अरे
आ गयी है भूली-सी यह मधु-ऋतु दो दिन की।’ कुछ रचनायें प्रसाद जी ने
वर्णनात्मक-शैली में की हैं-’अरी करुणा की शांत कछार उस दिन जब जीवन
के पक्ष में’ तथा ‘जगती की मंगलमयी उशा वन’, आदि रचनायें वर्णानात्मक हैं,
जिन पर बौद्ध-धर्म का व्यापक प्रभाव है।

प्रसादजी की चार कवितायें आख्यानक रूप में हैं। ये सभी ऐतिहासिक
वृत्तों पर आधारित हैं। ये सभी रचनायें मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं
मानवीय-मूल्यों पर लिखी गई हैं। प्रथम कविता- ‘अशोक की चिन्ता’ बौद्ध-धर्म
की पीठिका पर प्रस्तुत है। द्वितीय- “ोरसिंह का शस्त्र-समर्पण, तृतीय- पेषोला
की प्रतिध्वनि में देष-प्रेम, अतीत-गरिमा तथा वर्तमान राष्ट्रीय-जीवन की
अस्त-व्यस्तता एवं विघटित हो रहे मानव-मूल्यों के प्रति कवि की वेदना प्रकट
हुई है। अन्तिम चतुर्थ-आख्यानक-कविता ‘प्रलय की छाया में’ कवि ने कर्णसिंह
की पत्नी वन्दिनी ‘कमला’ के माध्यम से नारी-जीवन की सौन्दर्य-चेतना और
स्वयं उसके जीवन पर पड़ने वाले सम्प्रभावों का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण
किया है। चारों आख्यानों में सफल भावांकन हुआ है।

9. कामायनी –

‘कामायनी’ प्रसाद जी की अन्तिम-कृति है। इस महाकाव्य की रचना
करके उन्होंने अद्भुत-प्रतिभा का परिचय दिया है, जिससे हिन्दी ही नहीं,
अपितु विश्व-साहित्य में उनका नाम अमर हो गया। ‘लहर’ में कवि ने जो
मानवता की विजय-यात्रा प्रारम्भ की थी, वह ‘कामायनी’ में पूर्ण हुई।
यह गौरव-ग्रन्थ ‘प्रसाद’ जी के अप्रतिम कल्पना-वैभव एवं उदात्त
जीवन-दर्शन का अमर-प्रतीक है। इस काव्य-संग्रह का प्रकाशन 1935 ई.
(सं. 1993) में हुआ। इसके पूर्व इसके अनेक अंष-सुधा, माधुरी, हंस और
कोषोत्सव-स्मारक-संग्रह में समय-समय पर छपते रहे। इसका सर्जन 1929 ई के
पहले से प्रारम्भ हो गया था, जो 1935 में आकर पूर्ण हुआ।

‘कामायनी’ आधुनिक हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसमें आदि-मानव
मनु की कथा के द्वारा मानव-मन के विकास का वर्णन है। इसकी रचना
शतपथ-ब्राह्मण के पौराणिक-आख्यान पर की गई है। जिसे स्वयं प्रसाद जी
ने ‘कामयानी’ के प्राक्कथन में साकार किया है।17 ‘कामायनी’ की कथावस्तु
15 सर्गों में विभक्त है-ये सर्ग हैं- चिन्ता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा,
कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्षन, रहस्य, आनन्द। सर्गों का
नामकरण-व्यक्ति, चरित्र, स्थान, कार्य, घटना इत्यादि के नाम पर न होकर
मानवीय-भावों पर आधारित है। इन भावों में एक विकास-क्रम भी संनिहित है।
चिन्ता से आनन्द तक की सभी स्थितियों, मनोभावों एवं स्वाभाविकताओं का
सफल चित्रण ‘कामायनी’ में हुआ है। ‘कामायनी’ के तीन प्रमुख पात्र हैं- मनु,
श्रद्धा और इड़ा। मनु- मन का प्रतीक है, श्रद्धा- भावना का और इड़ा- बुद्धि
का। इसकी आकर्षक कहानी के आधार पर प्रसाद जी ने मानवीय-चेतना के
अन्नकोश से आनन्द-कोश तक पहुँचने का सुंदर इतिहास प्रस्तुत किया है।

‘कामायनी’ का प्रारम्भ, उत्तंग-शिखर पर एक षिला की छाँह में बैठे हुए
सिक्त-नेत्रों से जल-प्लावन को देखने वाले एक पुरूश के अस्तित्व की चिंता से
होता है। फिर क्रम से उनके मन में आशा का संचार होता है। विपन्न-मन वाले
मनु की श्रद्धा से भेंट होती है। वह इनकी प्रेरणा बन जाती है, कर्मयोगी मनु को
स्थिर नहीं रहने देती। वह भावी सन्तान के प्रति श्रद्धा का प्रेम देखकर ईर्ष्या से
क्षुब्ध होकर श्रद्धा को वहीं छोड़कर चला जाता है। किन्तु वहाँ भी मनु की
कामनायें पूरी नहीं हो पातीं, अपितु उसे दण्ड मिल जाता है। श्रद्धा अपने बेटे
मानव को लेकर मनु की (स्वप्न के निर्देषानुसार) खोज में इड़ा के पास तक
पहुँच जाती है। आत्मग्लानि के कारण मनु पुन: हिमालय पर चले जाते हैं। बाद
में इड़ा भी पहुँच जाती है और यहीं पर आनन्द में ही कथानक समाप्त हो जाता
है। यह ‘कामायनी’- काव्य की संक्षिप्त रूपरेखा है। इसकी प्रमुख विशेषता यह
है कि कथानक के प्रारम्भ में भी मनु हिमालय पर बैठे हैं और अन्त में भी।
लेकिन दोनों समय की परिस्थतियों में बहुत अन्तर है। प्रारम्भ में चिन्तित और
दुखी मनु हैं, किंतु अन्त में सुख-दुख से तटस्थ, समास अखण्ड-आनन्द में
लीन मनु। आरम्भ में ऐष्वर्य, भोग, विलास, वैभव इत्यादि से रहित मनु का
चिन्तित-जीवन है और अन्त में सर्वस्व-त्यागी और निश्काम-मनु का
देदीप्यमान-रूप है। व्यावहारिक दृश्टि से भी केवल भावना या केवल बुद्धि के
सहारे व्यक्ति नहीं जी सकता। सफल जीवन के लिए- श्रद्धा और बुद्धि अर्थात्
हृदय और मस्तिश्क-दोनों का समन्वय आवष्यक है।

‘कामायनी’ आधुनिक-युग की श्रेष्ठतम कृति है। इसके विविध पक्षों को
लेकर अब तक अनेक शोध किये जा चुके हैं। सभी समीक्षकों ने इसकी
भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह शुद्ध खड़ी-बोली का सौन्दर्योपेत युग-युगीन
मानव-चेतना का रमरणीय आख्यान प्रस्तुत करने वाला मनोहारी-काव्य है। कवि
केवल बाह्य जगत् के नानारूपों का ही चित्ताकर्शक वर्णन कर विराम नहीं ले
पाता, अपितु अन्तर्जगत् के सूक्ष्मातिसूक्ष्म व्यापारों का प्रकाशन भी करता है।

‘कामायनी’ में छायावाद की ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता,
सौन्दर्यमय-प्रतीक-विधान, रूप-स्रश्टि कल्पना के क्षितिज पर अलंकरण की
इन्दुधनुशी छाया बड़ी चित्ताकर्शक है। इस काव्य में प्रसाद जी की सर्जना अपनी
पराकाष्ठा पर पहुँच गई है।

‘कामायनी’ में सम्पूर्ण मानव-जीवन का चित्र अंकित है। उसमें
मानव-सृष्टि का आरम्भ, उसका विकास और चरम-सिद्धि की झलक है। उसमें
यह भी बताया गया है कि मानवता का शुद्ध रूप क्या है, किस तरह वह
कल्याणकारी हो सकती है? उसमें वास्तविकता से पलायन नहीं है, वरन् उसी
वास्तविकता के उचित उपयोग और उसके रस से पुष्ट होकर संस्कार करने का
उपदेश है।

10. प्रसाद-संगीत –

‘‘इस कृति में जयशंकर प्रसाद जी के आत्मज रत्नषंकर जी ने उनके
नाटकों में उपलब्ध सभी गीतों का संकलन किया है। यह प्रसाद जी का पहला
नाटक था तथा अन्तिम ‘धुव्रस्वामिनी’ है। इस बीच लगभग 23 वर्षों का अन्तराल
है। आपके नाटकों में लगभग 125 से अधिक गीत प्राप्त हुये हैं। ‘प्रसाद-संगीत’
नाटक में गीतों के अतिरिक्त प्रसाद जी की 21 चतुर्दष पदियाँ भी संकलित हैं,
जो उनके विभिन्न काव्य-संग्रहों से संचयित हैं।’’

‘प्रसाद-संगीत’ नामक कृति श्री रत्न शंकर प्रसाद के सम्पादकत्व में
सं. 2031 में प्रकाशित हुई। इसमें प्रसाद जी के नाटकों में पाये जाने वाले
अर्थात् 1910 से 1934 ई. तक के गीतों का संकलन है।21 समय के इतने
अधिक अंतराल के कारण गीतों में वैविध्य है। इन गीतों का वैषिश्ट्य इस
कारण भी है कि उन्हें नाटकों से निकालकर पढ़ने से स्वतन्त्र काव्य का
आस्वादन मिलता है। इन कविताओं से कवि की काव्य-चेतना निरंतर उत्कर्ष
को प्राप्त होती गई है। प्रतिपाद्य-विशय और प्रतिपादन-शैली, दोनों का परिष्कार
होता चला गया है।

वस्तु की दृश्टि से ये गीत-प्रेम, विचारात्मक, भक्ति, राष्ट्रीयता एवं
आत्मपरक सम्बन्धी कहे जा सकते हैं। प्रसाद जी के गीतों में प्रेम-गीतों की
संख्या सबसे अधिक है। प्रेम के उभय-पक्षों में- संयोग की अपेक्षा,
वियोग-सम्बन्धी-गीत अधिक हैं। विचारात्मक गीतों में-जीवन की क्षण-भंगुरता,
परिवर्तनशीलता तथा असारता इत्यादि भावों की अभिव्यक्ति मिलती है।

आम-परक गीतों की संख्या कम है, ये विक्षुब्ध मन:- स्थितियों के व्यंजक हैं।
प्रसाद जी के नाटकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण गीत, राष्ट्रीय ही हैं। ये
सांस्कृतिक और राष्ट्रीय-चेतना से ओत-प्रोत हैं। भारतीय सांस्कृतिक-गरिमा,
दार्शनिक-उदात्तता, परमार्थ, अपनी सभ्यता पर गर्व, देष पर सर्वस्व न्यौछावर
करने की प्रेरणा, बाधाओं को कुचलते हुए प्रगति का उद्बोधन आदि की व्यापक
संयोजना हुई है। इन गीतों में अंतर को झंकृत करने वाली संगीतात्मकता है।
यह भी प्रसाद-काव्य की अनुपम-निधि है।

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