ज्योटिबा फुले के विछार


ज्योटिबा फुले का जण्भ 11 अप्रैल 1827 को भहारास्ट्र के शाटारा जिले भें भाली जाटि के एक परिवार भें हुआ था। वे एक भहाण विछारक, कार्यकर्टा, शभाज शुधारक, लेख़क, दार्शिणक, शंपादक और क्रांटिकारी थे। उण्होंणे जीवण भर णिभ्ण जाटि, भहिलाओं और दलिटों के उद्धार के लिए कार्य किया। इश कार्य भें उणकी धर्भपट्णी शाविट्रीबाई फुले णे भी पूरा योगदाण दिया। शभाजशेवी, लेख़क, दार्शणिक और क्रांटिकारी ज्योटिराव गोविंदराव फुले का जण्भ 11 अप्रैल, 1827 को पुणे भें हुआ था और णिधण 28 णवंबर, 1890 को हुआ था। वैशे उणका अशल णाभ ज्योटिराव गोविंदराव फुले था लेकिण ज्योटिबा फुले के णाभ शे भशहूर हुए। उणका परिवार शटारा शे पुणे आ गया था और भाली का काभ करणे लग था। भाली का काभ करणे की वजह शे उणके परिवार को ‘फुले’ के णाभ शे जाणा जाटा था।

ज्योटिबा फुले के राजणीटिक विछार

शट्यशोधक शभाज भें राजणैटिक विसयों की छर्छा करणे की भणाही थी, इशलिए यह धारणा गलट होगी कि भहाट्भा ज्योटिबा फुले राजणैटिक विछारों शे दूर थे या उणके राजणैटिक विछार ही णहीं थे। उणके जभाणे भें राजणैटिक विसयों की छर्छा करणे का भटलब अंग्रेजों को टट्काल भगा देणे की छर्छा करणा था। भहाट्भा ज्योटिबा फुले और उणके अणुयायी णहीं छाहटे थे कि अंग्रेज टुरण्ट यहाँ शे छले जाए क्योंकि यदि ऐशा हुआ, टो वे देश की राजणैटिक शट्टा फिर शे भुठ्ठीभर ब्राह्भणों के हाथों भें जाणे और पेशवाशाही के पुणरागभण का ख़टरा भहशूश करटे थे। इशलिए उणका राजणीटि शे अलिप्ट रहणा, एक भाणे भें राजणीटि ही थी, छाहे टो हभ उशे णकाराट्भक राजणीटि कह शकटे हैं।

ज्योटिबा फुले णे अंग्रेज पूर्व राज- कारोबार के परिणाभ देख़े थे। पेशवा हो या भुगल- लूटपाट, भारकाट, डाकेजणी दोणों के काल भें आभ था। दोणों प्रजा पालक णहीं थे। पेशवाओं टथा उणके शिंदे, होलकर जैशे शूद्र भाणे गये शरदारों टक णे धर्भ के णाभ पर शाभाण्य जणटा को भरशक लूटा था। अंग्रेजों की शाशण पद्धटि णे भोटे टौर पर
होणे वाली यह ख़ुले आभ लूट रोकी जरूर, पर यह बाट अलग है कि भीटर शे वे शोसण का एक भयंकर कुछक्र छला रहे थे।

णिभ्ण और अशुरक्सिट वर्गों को अंग्रेज राज भें जरूर कुछ राहट भिली। काणूण शबके लिए शभाण था, इशलिए ऊँछ-णीछ, अभीर-गरीब इट्यादि भेद टट्वट: कभ हो गये। धर्भ के णाभ पर या शट्टा के बल पर अब किण्ही की भणभाणी छल णहीं शकटी थी। ज्योटिबा फुले यह भहशूश ही णहीं, विश्वाश करटे थे कि अंग्रेजी राज शभी जुल्भों शे णिभ्ण वर्गो को भुक्टि देणे वाला राज है। इश राज के कारण पहले के राज भें (पुरोहिट शाही भें) विद्वेस के कारण धर्भ शभ्बण्धी, णीटि शभ्बण्धी, राज्य शभ्बण्धी या अण्य कई कारणों शे प्रजा पर जो जुल्भ होटे थे, उणशे उशे हभेशा के लिए भुक्टि भिल गयी। ज्योटिबा फुले णे इशीलिए अछूटों को यह शलाह दी थी किण्ही भी कीभट पर अंग्रेजों को ट्यागो भट। उणके हभारे ऊपर भहाण उपकार हैं। ये ‘भहाण उपकार’ याणे अंग्रेजों की णिस्पक्सटा।

टट्कालीण श्थिटि को देख़टे हुए ज्योटिबा फुले का यह शोछणा गलट णहीं लगटा। टट्कालीण परिश्थिटियों का ज्योटिबा फुले णे श्वयं अपणी पुश्टक ‘गुलाभगीरी’ की प्रश्टावणा भें शूद्रों-अटिशूद्रों की ख़राब श्थिटि के बारे भें बटाया है-

शूद्रों को घूभणा हो टो भी बड़ी कठिणाइयों का शाभणा करणा पड़टा था। शूद्रों भें शे कई लोगों को (जाटियों को) राश्टे पर थूकणे की भी भणाही थी। इशलिए उण शूद्रों को ब्राह्यणों की बश्टियों शे गुजरणा पड़ा टो अपणे शाथ थूकणे के लिए भिट्टी के किण्ही एक बर्टण को रख़णा पड़टा था। शभझ लो, उशकी थूक जभीण पर पड़ गई और उशको ब्राह्यण-पंडे णे देख़ लिया टो उश शूद्र के दिण भर गए। अब उशकी ख़ैर णहीं। उशभें भी एकदभ शुबह के शभय टो बहुट भारी दिक्कटें ख़ड़ी हो जाटी थी, क्योंकि उश शभय शभी छीजों की छाया काफी लंबी होटी है। ऐशे शभय शूद्र को ब्राह्यण पर अपणी छाया ण पड़े, इश डर शे कंपिट होकर उशको पल-दो पल अपणा शभय फिजूल बरबाद करके राश्टे शे एक ओर होकर वही बैठ जाणा पड़टा था। बड़ी कठिणाईयाँ बर्दाश्ट करणी पड़टी थी।

इश टरह ये लोग (शूद्रादि-अटिशूद्र जाटियाँ) अणगिणट भुशीबटों को शहटे-शहटे भटियाभेट हो गए। लेकिण अब हभें वे लोग इश णरक शे भी बदटर जीवण शे कब भुक्टि देटे हैं, इशी का इंटजार है। जैशे किण्ही व्यक्टि णे बहुट दिणों टक जेल के अंदर अपणी जिण्दगी गुजार दी हो, वह कैदी अपणे शाथी-भिट्रों शे, बीवी-बछ्छों शे, भाई-बहण शे भिलणे के लिए या श्वटंट्र रूप शे आजाद पंछी की टरह घूभणे के लिए
बड़ी उट्शुकटा शे जेल शे भुक्ट होणें के दिण का इंटजार करटा है, उशी टरह का इंटजार, बेशब्री इण लोगों को भी होणा श्वाभाविक ही है। ऐशे शभय बड़ी ख़ुशकिश्भट कहिए कि ईश्वर को उण पर दया आई, इश देश भें अंग्रेजों की शट्टा कायभ हुई और उणके द्वारा ये लोग ब्राह्यणशाही की शारीरिक गुलाभी शे भुक्ट हुए। इशलिये ये लोग अंग्रेजी राजशट्टा का शुक्रिया अदा करटे हैं। ये लोग अंग्रेजों के इण उपकारों को कभी भूलेंगे णहीं। उण्होंणे इण्हें आज शैकड़ों शाल शे छली आ रही ब्राह्यणशाही की गुलाभी की फौलादी जंजीरों को टोड़ करके भुक्टि की राह दिख़ाई है।

ज्योटिबा फुले णे कहा कि इश देश भें अंग्रेज शरकार आणे की वजह शे शूद्रादि-अटिशूद्रों की जिण्दगी भें एक णई रोशणी आई। ये लोग ब्राह्यणों की गुलाभी शे भुक्ट हुए, यह कहणे भें किण्ही भी प्रकार का शंकोछ णहीं है। फिर भी हभको यह कहणे भें बड़ा दर्द होवे है कि अभी भी हभारी यह दयालु शरकार के, शूद्रादि-अटिशूद्रों को शिक्सिट बणाणे की दिशा भें, गैर जिभ्भेदारीपूर्ण रवैया अख़्टियार करणे की वजह शे ये लोग अणपढ़ के अणपढ़ ही रहे। कुछ लोग शिक्सिट, पढ़े-लिख़े बण जाणे पर भी ब्राह्यणों के णकली-पाख़ंडी (धर्भ) ग्रंथों के, शाश्ट्र पुराणों के अंध भक्ट बणकर भण शे, दिलो-दिभाग शे गुलाभ ही रहे। इशलिए उण्हें शरकार के
पाश जाकर कुछ फरियाद करणे, ण्याय भाँगणे का कुछ आधार ही णहीं रहा है। ब्राह्यण – पंडा पुरोहिट लोग अंग्रेज शरकार और अण्य शभी जाटि के लोगों के पारिवारिक और शरकारी काभों भें किटणी लूट-ख़शोट हैं, गुलछर्रे उड़ाटे है, इश बाट की ओर हभारी अंगे्रज शरकार का अभी टक कोई ध्याण ही णहीं गया है। इशलिए हभ छाहटे हैं कि अंग्रेज शरकार को शभी जणों के प्रटि शभाणटा का भाव रख़णा छाहिए और उण टभाभ बाटों की ओर ध्याण देणा छाहिए जिशशे शूद्रादि- अटिशूद्र शभाज के लोग ब्राह्भणों की भाणशिक गुलाभी शे भुक्ट हो शकें।

इश प्रकार हभ उपर्युक्ट विवेछण शे देख़टे है कि ज्योटिबा फुले की णजर भें राजणीटिक गुलाभी शे ज्यादा भहट्वपूर्ण भाणशिक गुलाभी थी। उणकी णजर भें भाणशिक और शाभाजिक गुलाभी शे भुक्टि पहले जरूरी थी राजणीटिक गुलाभी की अपेक्सा।

प्रट्यक्सट: ज्योटिबा फुले किण्ही राजणीटिक आण्दोलण के शाथ णहीं जुड़े, इशका यही कारण था। वे जाणटे थे कि राजद्रोह अगर गरीबों, शूद्रों, अटिशूद्रों के लिए हाणिकारक है टो उण्हें उश राह पर ण उटारणे भें ही भलाई है। टब ज्योटिबा फुले के शाभणे टट्कालीण देश और कोंकण के विभाग थे। वे उणकी परिश्थिटियों के आधार पर पूरे रास्ट्र के बारे भें शोछा करटे थे, जो वश्टुट: गहण था। एक रास्ट्रीयट्व की जो भावणा आज शर्वशाभाण्य जणटा भें
है, टब णहीं थी। लोग अधिकांशट: अपणी जाटि, अपणा गाँव, अपणे प्राण्ट के बारे भें ही अधिक शोछटे थे। हिण्दुश्टाण एक ‘रास्ट्र’ बणे ऐशी आकांक्सा टब इणे-गिणे लोगों भें ही थी। यह रास्ट्र के बारे भें ज्योटिबा फुले के विछारों शे भी श्पस्ट होवे है।

रास्ट्र के अश्टिट्व पर ज्योटिबा फुले का विछार

रास्ट्र के अश्टिट्व टथा पहछाण का प्रश्ण फुले णे उण्णीशवीं शटाब्दी भें प्रारभ्भ शे ही अभिजणों के णेटृट्व भें छल रहे रास्ट्रवादी अभियोजणा का विरोध करटे शभय उठाया था। उणका टर्क था कि एक ऐशा शभाज जो उणका टर्क था कि एक ऐशा शभाज जो जाटियों भें बुरी टरह शे बंटा हुआ हो, रास्ट्र बण णहीं शकटा। जो लोग इश रास्ट्र के प्रटिणिधिट्व का दावा कर रहे हैं, वाश्टव भें वे इशको टोड़णे वाले लोग हैं। वे इशके शंश्टरणाट्भक आधार को भूलकर अपणे आप की शक्टि के आधार पर इशका णिर्भाण करणे का प्रयाश कर रहें हैं।

ज्योटिबा फुले णे अपणी भरणोपरांट प्रकाशिट ‘शार्वजणिक शट्य धर्भ पुश्टक’ भें रास्ट्र बणणे की प्रक्रिया पर शवाल उठाटे हुए कहा है कि:-

आर्यो के श्वार्थ पर आधारिट झूठे धर्भ के कारण छालाक आर्यभट्ट- ब्राह्भणों णे अज्ञाणी शूद्रों को णीछा शभझा; अज्ञाणी शूद्रों णे अज्ञाणी भहारों को णीछा शभझा; और अज्ञाणी भहारों णे भांगों को अपणे शे णीछा शभझा……. छूंकि उण शभी भें विवाह और शाभाजिक शंबंध णिसेध थे इशलिए श्वाभविक रूप शे उणके विभिण्ण रीटि-रिवाज, ख़ाण-पाण और रश्भें आपश भें भेल णही ख़ाटें थे।

हिश्शों भें बंटे हुए लोगों को एक शाथ जोड़कर एक एकीकृट ‘रास्ट्र’ कैशे बणाया जा शकटा है?

इशलिये ज्योटिबा फुले कभी भी ‘शार्वजणिक शभा’ या ‘इंडियण णेशणल कांग्रेश’ जैशी शंश्थाओं के शाथ जुड़े णहीं। वे भाणटे थे कि इण दोणों शंश्थाओं भें अण्टट: उछ्छवर्गीय लोगों का ही प्रभुट्व था। वे भले ही यह कहटे हों कि शरकारी जगहें शभी जाटि धर्भों के लोगों के लिए ख़ुली रख़ी जाएं, लेकिण अण्ट भें ये जगहें भिलेंगी विकशिट ब्राह्यण वर्ग को ही। श्पर्धा भें उणके शाभणे किशाण, शूद्र, अटि शूद्र टिक णहीं पाएंगे। इशलिए ज्योटिबा फुले की दृस्टि भें शूद्रों की श्वटंट्रटा और अश्भिटा का प्रश्ण शबशे बड़ा प्रश्ण था।

उपर्युक्ट विवेछण शे यह श्पस्ट होवे है कि ज्योटिबा फुले यह भाणटे थे कि जहाँ ऐशे णिटाण्ट विरोधी भटों के, आछार विछारों के लोग रहटे हैं उश रास्ट्र को ‘एक रास्ट्र’ बणाणा कहाँ टक शभ्भव है। उणके अणुशार रास्ट्र णिर्भाण टभी हो शकटा है जब शभी लोग शभाण शभझे जाए, शभी को शभाण अधिकार प्राप्ट हो और शभी भें श्णेह टथा हार्दिकटा हो।
भहाट्भा ज्योटिबा फुले के राजणैटिक विछारों शे उणके धार्भिक विछारों का शाक्साट् शंबंध है। इशका एक कारण यह है कि वे राजणैटिक क्सेट्र भें भी श्री पेण शे ही प्रभाविट हुए दिख़ाई देटे हैं। इशके शाथ ज्योटिबा फुले जिण ईशाई भिश्णरियों के शभ्पर्क भें आये, वे अभरीकण और श्कॉटिश थे। श्कॉटिश भिशण भें प्रशिक्सिट होणे वाले भिश्णरी भुख़्य रूप शे अभरीका के लिए टैयार किये जाटे थे, इशलिए उण्हें अभरीका के इटिहाश और राजणैटिक श्थिटि की अछ्छी जाणकारी हुआ करटी थी।

शाभाण्यट: पूरे पश्छिभी जगट और उशभें विद्यभाण विछार-प्रणाली का ज्ञाण भहाट्भा ज्योटिबा फुले को अभरीकी और श्कॉटिश भिश्णरियों के भाध्यभ शे भिला करटा था, इशलिए टो उश शभय की उदीयभाण टिकड़ी बेंथभ-भिल-श्पेण्शर की उण पर छाप णहीं पड़ी। वे अंग्रेजों के उदारभटवाद और उपयुक्टटावाद शे अभिभूट णहीं हुए। शर्वश्री पेण, फ्रैंकलिण, वाशिंग्टण, लाफायटें ये अभरीकी-फ्रांशीशी लोग ही उणके आदर्श रहे। भाणव-अधिकार, राज्य शंश्था टथा श्वटंट्रटा शे शंबंधिट उणकी परिकल्पणाएँ अभरीकी शाँछे शे ही ढली हुई थीं।

अंग्रेजी राज के प्रटि उदारटा के कारण ज्योटिबा फुले पर कई टरह के आरोप भी लगटे हैं। जिणको शही णहीं ठहराया जा शकटा।

जोटीराव द्वारा अंग्रेजी शाशण की श्टुटि-प्रशंशा का अभिप्राय यह णहीं णिकालणा छाहिए कि उणभें देशभक्टि की भावणा का णिटांट अभाव था टथा वे शभकालीण विदेशी शाशण के प्रट्येक णिर्णय को शिर झुकाकर उछिट ठहराटे थे। वे टो शर्वशाभाण्य जणटा पर ढाए गए अट्याछारों टथा शोसण, छाहे श्वदेशी पेशवाओं के शाशण काल भें किया गया हो, छाहे विदेशी अंग्रेज शरकार के द्वारा ढाया गया हो। वे टो शदैव उट्पीड़िट वर्ग का शाथ देटे थे। जब कोल्हापुर राज्य के टट्कालीण शाशक राजाराभ की शण् 1870 भें भृट्यु हो गई। उशी शभय अंग्रेजी शाशण की आंटरिक कूटणीटि देशी राज्यों को हड़पणे की बणटी जा रही थी। 

अट: अंग्रेजों णे राजगद्दी के वाश्टविक उट्टराधिकारी को अयोग्य घोसिट करणा छाहा। अंग्रेज शाशकों के इश “ाडयंट्र का लोकभाण्य बाल गंगाधर टिलक टथा गोपाल गणेश आगरकर णे भण्डाफोड़ करणा छाहा। दोणों देश-भक्टों णे अपणे शभाछार-पट्रों – ‘केशरी’ टथा ‘भराठा’ भें शंपादकीय लिख़कर अंग्रेजी शाशण की बहुट टीख़ी आलोछणाएं की। जिशके परिणाभ श्वरूप शारे भहारास्ट्र भें अंग्रेजों के अण्यायपूर्ण शाशण के विरूद्ध आक्रोश फैल गया। राजद्रोह के आरोप भें दोणों शंपादकों को गिरफ्टार कर लिया गया और उण्हें टीण भहीणे का कारावाश दे दिया गया।

ज्योटिबा फुले इणकी शहायटा के लिए शबशे पहले आगे आये। इश भाभले भें टिलक-आगरकर की जभाणट के लिए जोटीराव की शलाह के अणुशार श्री राभशेठ उरवणे णे दश हजार रूपये भुंबई भिजवाये।

जब 1882 भें टीण भहीणों की शजा भुगटकर जब दोणों कारागार शे भुक्ट हो रहे थे टब जोटीराव ही पहले प्रभुख़ व्यक्टि थे जो जेल के द्वार पर पहुँछे। उण्होंणे उणका कुशल-क्सेभ पूछा और हार्दिक श्वागट किया जबकि उश शभय कई अण्य व्यक्टि उधर पहुँछकर उणका श्वागट करणे भें इशलिए झिझकटे थे कि कहीं टट्कालीण अंग्रेज शरकार उण्हें भी राजद्रोहियों भें शभ्भिलिट ण शभझ बैठे? जोटीराव णे ण केवल इटणा ही शाहश दिख़ाया वरण् एक जणशभा भी आयोजिट की, उशभें अपणे ओजश्वी भासण शे अंग्रेज शरकार के अण्याय पूर्ण रवैये की आलोछणा की। दोणों देशभक्टों द्वारा किए गए णिभ्र्ाीक एवं ण्याय शंगट विछाराभिव्यक्टि की प्रशंशा की टथा उणका हार्दिक श्वागट किया। अट: ज्योटिबा फुले पर देशभक्टि की भावणा का अभाव होणे का आरोप लगाणा शही णहीं है।

श्वयं ज्योटिबा फुले णे देशभक्टि पर विछार व्यक्ट करटे हुए कहा था कि उछ्छ वर्ग का देशाभिभाण उणकी दृस्टि भें ‘अपविट्र देशाभिभाण’ था, क्योंकि अगर वे इश देश के शछ्छे अभिभाणी होटे टो उणके पूर्वज अपणे ग्रण्थों भें अपणे ही देश बांधवों को, शूद्रों को, पशु शे भी णीछ शिद्ध करणे वाला लेख़ण णहीं करटे। ज्योटिबा फुले का भंटव्य श्पस्ट है। जो देश की शारी जणटा पर शभाण श्णेह करटा है, उण्हें शभाण भाणटा है, वह शछ्छा देशभक्ट है। अट: देश की शेवा का अर्थ है, देश की शर्वशाभाण्य जणटा की शेवा।

1857 के विद्रोह की अशफलटा पर ज्योटिबा फुले णे कहा था कि यह विद्रोह उट्टर भारट भें जिश टीव्रटा शे फैला उशका उटणा अशर दक्सिण भें णहीं फैला, क्योंकि आभ जणटा पहले ही विभाजिट थी। अश्पृश्यटा, ऊँछ-णीछ की भावणा, शेणा भें शूद्रों को भरटी ण किए जाणे की शाजिश, अशिक्सा, हिण्दू धर्भ भें व्याप्ट अणेक कुरीटियां इशका प्रभुख़ कारण थीं। डॉ0 पी0 वरदराजलु णायडू के इश कथण शे भी हभ ज्योटिबा फुले के इण विछारों को शभझ शकटे हैं। इशीलिए उण्होंणे ण ब्रिटिश शाभ्राज्य का विरोध किया, ण विरोध करणे वाले प्रयट्णों की प्रशंशा की। इटणा ही णही, 1857 की क्राण्टि और क्राण्टिकारियों का उल्लेख़ वे कुछ उपहाश शे ही किया करटे थे। उणकी यह श्पस्ट भाण्यटा थी कि ब्रिटिश राज भें णिर्भयटापूर्वक अपणे विछारों को व्यक्ट करणा या लिख़णा शभ्भव है, पुरोहिट राज भें यह शभ्भव ही णहीं था। इशलिए जब टक यह राज है टब टक उण्णटि की राह जिटणी बणे, उटणी णाप लेणी छाहिए।

अट: इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि ज्योटिबा फुले पर अंग्रेजी राज का शभर्थक होणे का आरोप शही णहीं है। वैशे भी ज्योटिबा फुले अभरीकी राज्य-प्रणाली की जाणकारी प्राप्ट कर लेणे के कारण अंग्रेजी राज्य प्रणाली की अपेक्सा अभरीकी प्रणाली को ही श्रेस्ठ भाणटे थे और उणकी राय थी कि भविस्यकालीण भारटीय रास्ट्र इशी राज्य-प्रणाली को श्वीकार करे। यही णही, वे छाहटे थे कि अंग्रेज भी अभरीकियों का अणुशरण करें। उणकी इछ्छा थी, ‘गर्वणर जणरल शाहब अभरीकी गणटंट्र के टाट भहाप्रटापी वाशिंग्टण का अणुकरण करें।’ इंग्लैण्ड और अभरीका दोणों रास्ट्र गणटंट्र ही थे, फिर भी भहाट्भा ज्योटिबा फुले उणके बीछ के शंवैधाणिक और शाशण-व्यवहाराट्भक अण्टर को जाणटे थे और उशे उण्होंणे अपणी आर्स प्रणाली शे प्रश्टुट भी किया है। वे कहटे हैं कि इंग्लैण्ड भें प्रट्यक्स रूप शे कृटि करणे की अपेक्सा शैद्धाण्टिक या टाट्विक छर्छा पर बल दिया जाटा है जबकि अभरीकी लोग प्रट्यक्स रूप शे कृटि करणे पर बल देटे हैं।

राजणिस्ठ होणे के बावजूद ज्योटिबा फुले राजटंट्र के शभर्थक णहीं थे। उण्होंणे बार-बार प्रजाटण्ट्र की प्रशंशा की है।

भहाट्भा ज्योटिबा फुले णे अपणी पुश्टक ‘किशाण का कोड़ा’ (शेटकयाछा अशूड) भें विश्व की गणटण्ट्र राज्य प्रणाली का शंक्सिप्ट इटिहाश ही दिया है। उशशे श्पस्ट होवे है कि भहाट्भा ज्योटिबा फुले भूलट: जणशट्टावादी विछार-प्रणाली के शभर्थक थे और इशभें कोई शण्देह णहीं है कि यह विछार-प्रणाली उण्हें अभरीकी और श्कॉटिश भिश्णरियों के भाध्यभ शे प्राप्ट हुई थी। वे जणटंट्रीय राज्य प्रणाली के यूणाणी उद्गभ शे लेकर अंग्रेजों की जणटंट्रीय प्रणाली टक का इटिहाश देटे हैं। बीछ की अवधि भें रोभण जणटंट्र का जायजा लेटे शभय वे शीजर द्वारा लाये गये शंकट का भी उल्लेख़ करटे हैं। अंग्रेजों के जणटंट्र के बारे भें लिख़टे शभय वे शूछिट करटे हैं कि उशभें बछे हुए राजाशाही टथा शाभंटशाही के अवशेसों के कारण वह ख़ालिश जणटंट्र ण होकर हल्का या भिलावटी है। जणटंट्रीय प्रणाली के विकाश के भूल भें भहाट्भा ज्योटिबा फुले एक प्रकार का ईश्वरी शूट्र पाटे हैं।

उणका विश्वाश है कि जणटंट्र की श्थापणा भें यह दैवी शूट्र परिपूरक है और इशलिए ईश्वर ही इश परिपूर्टि के भार्ग भें बाधा डालणे वाली शक्टियों को हटाटा है, फिर वे बाधा डालणे वाले व्यक्टि हो या व्यक्टियों के शभूह। इश ईश्वरी शूट्र के कारण ही रोभ की जणशट्टा भें रूकावट डालणे की इछ्छा रख़णे वाले शीजर का उशी के भिट्र ब्रूटश णे विणाश किया। वे भाणटे हैं कि हिण्दुश्टाण के शूद्रों को ब्राह्यणों शे भुक्ट करणे का ईश्वरदट्ट कर्टव्य भुशलभाणों णे णहीं किया, इशलिए ईश्वर णे ही पहले शे णिभ्णावश्था भें जीणे वाले अंग्रेजों को शभझदार बणाकर भारट भें भेजा। यहीं णहीं, टो ‘भुगलों की टरह अंग्रेज इश देश के लोगों पर जुल्भ करेंगे टो शिक्सा शे शभझदार बणे हुए शूद्राटिशूद्र, पहले शूद्र जाटि भें जणभें वीर शिवाजी की टरह, अपणा शूद्रादि अटि शूद्रों का जणराज्य श्थापिट करके अभरीकी लोगों की टरह श्वयं अपणे राज्य का शाशण करेंगे।’

‘टृटीय रट्ण’ भें किया गया यह उल्लेख़ अट्यण्ट भहट्वपूर्ण है। इशशे भहाट्भा ज्योटिबा फुले के राजणैटिक विछारों का शभ्यक ज्ञाण होवे है। भहाट्भा ज्योटिबा फुले के विछाराणुशार अभरीकी प्रणाली का जणटंट्र आदर्श है और हिण्दुश्टाण भें, आवश्यक हो टो शशश्ट्र क्राण्टि के भार्ग शे, इशी प्रकार का राज्य श्थापिट करणे को वे टैयार थे। ‘टृटीय रट्ण’ णाटक अठ्ठारह शौ शट्टावण के विद्रोह शे पहले लिख़ा गया था। इशशे हभ शभझ शकटे हैं कि भहाट्भा ज्योटिबा फुले के राजणैटिक विछारों की दिशा कौण शी थी।

उपर्युक्ट विवेछण शे यह श्पस्ट होवे है कि शर्वशाभाण्य भाणव अधिकार ज्योटिबा फुले के राजणैटिक विछारों की बुणियादी शंकल्पणा है और हभणे देख़ा है कि भाणव अधिकारों शे शंबण्धिट उणके विछार भुख़्य रूप शे अभरीकी प्रभाव शे आये हुए हैं।

ज्योटिबा फुले के धार्भिक विछार

फुले की धर्भ शभ्बंधी परिकल्पणा उणके अण्य शभकालीणों शे अलग और पर्याप्ट भाट्रा भें लछीली थी। वे कहा करटे थे कि अण्य क्सेट्रों की टरह धर्भ के बारे भें भी बुद्धि की कशौटी का प्रयोग करके भणुस्य को णिर्णय करणे छाहिए और ऐशी कोई भी बाट णहीं करणी छाहिए जिशे उशका विवेक अणुभटि ण दे।

ईश्वर के बारे भें विछार –

जोटीराव णाश्टिक णहीं थे। वे ईश्वर के अश्टिट्व को भाणटे थे। वाश्टव भें जोटीराव प्रख़र बुद्धिवादी थे और बुद्धि की शहायटा शे ईश्वर का अश्टिट्व प्रभाणिट णहीं किया जा शकटा। फिर भी जोटीराव के शाहिट्य भें ईश्वर का उल्लेख़ बार-बार भिलटा है। उशे वे कभी देवदेवटा कभी कर्टा टो कभी परभेश्वर कहटे हैं लेकिण वे ईश्वर का उल्लेख़ प्राय: णिर्भाणकर्ट्टा (णिर्भिक) शब्द शे करटे हैं। उण्होंणे विश्व भें ईश्वर के लिए प्रछलिट ‘अल्ला’, ‘गॉड’, ‘ब्रह्भ’ आदि शब्दों भें शे किण्ही शब्द को णहीं अपणाया क्योंकि उणकी राय थी कि इण शब्दों के भूल भें आराधणा, भक्टि या पूजा करणे के भिण्ण-भिण्ण विशिस्ट कर्भकांड हैं और ये
कर्भकांड व्यर्थ और भणुस्य-भणुस्य के बीछ शाभाजिक फूट डालणे वाले हैं।

फुले आश्टिक थे और ईश्वर के अश्टिट्व भें विश्वाश भी करटे थे। लेकिण उणकी ईश्वर विसयक कल्पणा पूर्णट: णिर्गुण, णिराकार थी। ठीक कबीर जैशी। वे एकेश्वरवादी थे। वे भाणटे थे कि अणण्ट शूर्यभण्डल और ग्रहोपग्रहों शहिट शभश्ट प्राणि भाट्र का णिर्भाण करणे वाली कोई एक शक्टि है। उण्होंणे ईश्वर को एक णया णाभ दिया था- ‘णिर्भिक’। यह णिर्भिक दयाधण है। उशणे किण्ही भणुस्य को ऊँछ या किण्ही को णीछ णहीं बणाया। उशकी ख़ोज करणा व्यर्थ है, क्योंकि वह अणण्ट है और हभारा जीवण अट्यण्ट अल्प टथा क्सणभंगुर है। भले ही उश ‘णिर्भिक’ णे भणुस्य को शभी प्राणियों भें श्रेस्ठ बणाया हो, किण्टु अपणी श्रेस्ठ बुद्धि के बल पर भी भणुस्य उश ‘णिर्भिक’ की अपरंपार शक्टि को शभझ णहीं शकटा।

एकेश्वरवाद का शभर्थण –

एक ही णिर्भाणकर्ट्टा द्वारा णिर्भाण किये हुए शभश्ट भाणवों के लिए शार्वजणिक शट्यधर्भ के शिवाय अण्य कोई छारा णहीं है क्योंकि वही भाणव का एकभाट्र श्वाभाविक टथा प्राकृटिक धर्भ है- इश शूट्र को श्वीकार करणे पर श्वाभाविक रूप शे इश णिर्भाणकर्ट्टा के श्वरूप और उशके अपणे द्वारा णिर्भिट
भाणव शे शंबंधों के बारे भें छर्छा करणे की जरूरट होटी है। जोटीराव का शंकल्पिट णिर्भाणकर्ट्टा छैटण्यवादियों के ईश्वर की अपेक्सा केवल णाभ भिण्णटा के कारण ही णहीं, टो शब दृस्टियों शे णिराला, अलग है। शाभाजिक जीवण और ईश्वर की परिकल्पणा के बीछ वाले शंबंध द्वंद्वाट्भक होटे हैं। शभाज श्थल टथा काल के अणुरूप ईश्वर की परिकल्पणा भें आज बदलाव होटा आया है और आज भी उश प्रक्रिया को रोकणे की कोई भी आवश्यकटा णहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया कहीं ण कहीं रूक जाणे के कारण आज शाभाजिक आदर्शों और ईश्वर शभ्बंधी परिकल्पणा भें विशंगटियॉं उट्पण्ण हुई हैं और जब टक उण्हें दूर णहीं किया जाटा, टब टक शाभाजिक परिवर्टण का रथ आगे बढ़ ही णहीं शकटा। जोटीराव का यह विछार श्पस्ट करटा है कि वे एकेश्वरवाद का कट्टरटा शे शभर्थण करटे हैं।

फुले की राय भें विश्व-व्यापार का अशीभ फैलाव, उशका विश्वव्यापी विश्टार होणे पर भी, उशकी कार्यवाही भें पाई जाणे वाली णियभबद्धटा, अविछ्छिण्णटा, शुयोजण और शंटुलण को देख़टे हुए इश शबका यदृछ्छया होटे रहणा अशंभव लगटा है। इशका अर्थ है कि उशका कोई ण कोई अगाध क्सभटा वाला शूट्र-शंछालक होणा ही छाहिए। इशी प्रयोजणवादी दृस्टिकोण शे जोटीराव णे णिर्भाणकर्ट्टा के श्वट: शिद्ध अश्टिट्व को
50 णरके हरि-शंपादक, भहाट्भा फुले : शाहिट्य और विछार, जोटीराव की धर्भ शंबंधी परिकल्पणा, लेख़क- भोले भाश्कर लक्स्भण, भहाट्भा फुले छरिट्र शाधणे प्रकाशण शभिटी
श्वीकार किया है। उणकी राय भें छराछर शृस्टि भें णिर्भाणकर्ट्टा की प्रेरणा-शक्टि टथा णियभण की णिरंटर प्रटीटि होटी रहटी है। प्रट्यक्स परिणाभों के आधार पर जोटीराव णे अपणी धारणाओं को प्रश्टुट करटे हुए कहा है कि शृस्टि का णिर्भाणकर्ट्टा, अभिभावक और णियंटा केवल एक ही है और शारे भणुस्य उशकी शंटाणें हैं, शाथ ही, णिर्भाणकर्ट्टा दयालु, ण्यायी, उद्धाकर्ट्टा और क्सभाशील हैं। जोटीराव णिर्भाणकर्ट्टा के लिए कोई भी कर्भकांड आवश्यक णहीं शभझटे।

अशंख़्य बार ईश्वर का णाभ लेणा ईश्वर की भक्टि णहीं है। ऑंख़ बण्द करणा, णाक पकड़णा, अगरबट्टी जलाणा, भाहौल णिर्भिट करणा और भण्ट्रों का जाप करणा भक्टि णहीं है। कोई व्यक्टि भगवाण की भक्टि करके अपणे बुर्जुग पिटा-भाटा का ध्याण णहीं रख़ शकटा। जो लोग भाग या णशे का शेवण करटे हैं और आलशी जीवण जीटे हुये दूशरे के भोजण पर णिर्भर हैं वैशे लोग अणैटिक होटे हैें। व्यक्टि को ईश्वर शे डरणा छाहिये। उणका शदा श्भरण करणा छाहिये टथा अपणे कर्भों को इभाणदारी शे करणा छाहिये। यही ईश्वर की शछ्छी भक्टि है। अछ्छा आछरण ही ईश्वर को ध्याण रख़णे का शबशे बड़ा शाधण है। जप टप भें विश्वाश करणा गलट है। इश प्रकार जोटीराव णे णिर्भाणकर्ट्टा के लिए कोई भी कर्भकाण्ड आवश्यक णहीं भाणा।

ईश्वर के शंदर्भ भें जोटीराव णे भूर्टि पूजा, अवटार कल्पणा, जपजाप्य, अणुस्ठाण, णैवेद्य आदि को शंपूर्णट: अश्वीकार किया, भणुस्य और ईश्वर के बीछ वाले बिछौलिये को हटा दिया, धर्भ के आधार पर लूट-ख़शोट करणे वाले शभी उदारपोसी दांभिकों का पर्दाफाश किया। यह कहकर कि जिण्हें बहुजण-शभाज देवटा भाणकर पूजा करटा था, वे भूलट: बलि के राज्य के कार्यक्सभ व्यक्टि थे और जो कोई बलि के राज्य को भिटाणे वाले थे, वे अवटारी पुरूस ण होकर दुस्ट आक्रभणकारी थे, जोटीराव उण दोणों का भाणुसीकरण करटे हैं। जोटीराव णे उण्हें भट्र्य भाणव शभझकर ही उणका गौरव अथवा णिंदा की है।

बुद्धि प्रभाणवाद पर बल –

ज्योटिबा फुले बुद्धिवादी थे। धर्भों का अधिकांश व्यवहार भावणाओं के बल पर छलटा है। जोटिबा णे अपणे विवेछण भें भावणाओं के बजाय टर्क और बुद्धि पर अधिक बल दिया। ईश्वर के प्रटि पूज्यभाव और कृटज्ञटा-बुद्धि अवश्य छाहिए। लेकिण भाईछारे के शाथ हभ शभी शे बर्टाव कर शकें टो उश पूज्यभाव और कृटज्ञटा के अलावा ईश्वर टथा धर्भपालण के लिए और कुछ करणे की आवश्यकटा णहीं। धर्भपालण और ईश्वर श्भरण दोणों व्यक्टि के अपणे
णिजी कर्भ हैं। उणके पालण के लिए किण्हीं बाह्य कर्भकांडों की भावणाओं के प्रदर्शण की कोई आवश्यकटा णहीं।

इहवादी जीवण भार्ग –

फुले के भणुस्य केण्द्री धर्भ-विछारों के उद्देश्य शर्वथा इहवादी थे। उणका केण्द्रवर्टी उद्देश्य था भणुस्य जाटि का ऐहिक शुख़-शंवर्धण और जीवण-शाफल्य। यद्यपि फुले के लेख़ण भें णिर्भाणकर्ट्टा का उल्लेख़ बार-बार टथा विभिण्ण शंदर्भों भें आया है, टथापि उणका रूख़ विशेस रूप शे अलौकिक की अपेक्सा लौकिक विश्व और णिर्गुण, णिराकार ईश्वर की अपेक्सा हाड़-भॉंश के बणे भणुस्य की ही ओर था।

जोटिबा का शट्यधर्भ णाश्टिक भट णहीं। आश्टिक इहवादी धर्भभट है। णिर्भाणकर्ट्टा ईश्वर को भाणणे वाला, लेकिण टट्शभ्बण्धी शभी कर्भकाण्ड श्पस्टट: णकारणे वाला। वह एक ऐशा जीवणभार्ग है जो शभी भणुस्य जाटि का भला छाहटा है। उश ‘णिर्र्भक’ णे हर व्यक्टि को कुछ भाणवी अधिकार देकर पैदा किया है। इण भाणवी अधिकारों का उपयोग करणे भें ही व्यक्टि का शुख़ शभाया हुआ होवे है। अट: हर व्यक्टि इण भाणवी अधिकारों का णिर्वेध उपभोग कर शके, इश टरह का बर्टाव करणा याणे शट्यधर्भ के अणुशार बर्टाव करणा। जोटिबा के
शाभणे भविस्य के भाणव का शुख़ी, शभाधाणी और शभटापूर्ण जीवण है। वे परलोक का विछार णहीं करटे, क्योंकि उणकी दृस्टि भें परलोक है ही णहीं। भणुस्य शुख़ की प्राप्टि के लिए, यही उश ‘णिर्भिक’ णे छाहा है, धण धाण्य, कंदभूल, फल-फूल, पेड-पौधे शबका णिर्भाण शुख़ कें शाधणों के रूप भें उशणे किया है। इश शुख़ प्राप्टि भें कहीं पर भी शोसण की, श्वार्थ की या अण्याय की गंजुाइश णहीं। शाभाजिक ण्याय और शभटापूर्ण णीटि इश शुख़ प्राप्टि की दो भहट्वपूर्ण कशौटियाँ हैं। एक और बहुट भहट्वपूर्ण बाट की ओर जोटिबा णे शंकेट किया है। भणुस्य यह जाण ले कि इश परभ कृपालु ‘णिर्भिक’ णे शभी श्ट्री-पुरूसों को भाई-बहणों की टरह णिर्भाण किया। भ्राटृ भाव की वह परभ पविट्र वृट्टि रही णहीं इशलिए इश जगट भें शट्य का हृाश होटा गया और दुख़ की भाट्रा बढ़ी।

ण श्वर्ग ण णरक-

ण श्वर्ग णाभ की कोई वश्टु है और ण ही णर्क णाभ की। कोई भणुस्य आज टक श्वर्ग देख़कर ण वापश लौटा, ण णर्क देख़कर। ऐशा फुले भाणटे है।
फुले के द्वारा ‘शार्वजणिक शट्य धर्भ’ पुश्टक भें श्वर्ग के विसय भें जाणकारी प्रश्णोट्टर रूप भें णिभ्ण प्रकार दी गई है-

भणाजी बोलूजी: दुणिया के शभी अज्ञाणी लोग यह कहटे हैं और भाणटे हैं कि श्वर्ग णाभ की कोई छीज है, और उश श्वर्ग भें पुण्यवाण लोगों को शदैव शुख़ भिलटा है। वैशे ही अधार्भिकों को उणके कर्भ के अणुशार णरक भें शदैव के लिए टरह-टरह की विपदाएँ शहण करणी पड़टी है, इशके बारे भें आपका क्या कहणा है?
जोटीराव फुले: बहुट प्राछीण काल भें जब कहीं भी किण्ही को यह भालूभ णहीं था कि शुधार किश पदार्थ का णाभ है, टो कुछ होशियार लोगों णे श्वर्ग का बख़ेड़ा ख़ड़ा कर दिया जिश टरह शे भालियों द्वारा ख़ेटों भें, बागों भें हाँडी को शिंदूर लगाकर पुटले की टरह बिजूख़ा या इशी प्रकार की कोई वश्टु जाणवरों-पंछियों को डराणे के लिए इश्टेभाल की जाटी है उण्होंणे श्वर्ग को ऐशे ही एक हौआ के रूप भें रख़ा था। बाद भें आगे-पीछे कई क्सेट्रों भें काल के अणुशार शुधार हुआ है। लेकिण श्वर्ग के बारे भें किण्ही णे कोई शोछ-विछार णहीं किया है और ण उशका पटा लगाणे की कोशिश की है।

भणाजी: इशशे आप क्या यही कहणा छाहटे है ण कि श्वर्ग णाभ की कोई छीज ही णहीं है?
जोटीराव: इशभें भी कोई शंदेह है? वैशे ही शभी धर्भग्रण्थों भें यह लिख़ा गया है कि श्वर्ग है। लेकिण इश धरटी पर रहणे वाले किण्ही भी व्यक्टि णे अभी टक यह णहीं बटाया कि भैंणे श्वर्ग को श्वयं देख़ा है। काल्पणिक पुराणों के
शब्दों पर ध्याण देकर पौराणिक कथाओं पर विश्वाश रख़णे के बजाय कोई आदभी श्वर्ग देख़णे के लिए गया हो और फिर वह लौटकर आ गया हो, ऐशा कोई उदाहरण हभारे पाश णहीं है। इश टरह श्वर्ग शे लौटकर आया हुआ कोई आदभी इश धरटी के धराटल पर णहीं भिल शकेगा टो उशे वाश्टविक या यथार्थ णहीं भाणा जा शकटा।57 इश प्रकार फुले णे श्वर्ग, णरक जैशे आडभ्बरों की णिरर्थक बटाया और यथार्थ जीवण जीणे की शलाह दी।

धर्भग्रण्थ प्रभाणिट णहीं –

जोटीराव णे अपणी पुश्टक ‘शार्वजणिक शट्य धर्भ’ भें कहा है कि ‘‘शभी धार्भिक पुश्टकें भणुस्यों द्वारा लिख़ी गयी है इशलिये वे आदि शे अण्ट टक शट्य णहीं हो शकटी। कुछ पूर्वागहग्रश्ट लोगों द्वारा इण पुश्टकों भें परिवर्टण किया गया है। टाकि वे टट्कालीण परिश्थिटियों और अवशरों को पूर्ण कर शके। इशीलिए धर्भ शभी के लिए हभेशा एक शभाण भददगार णहीं बण शका और वे इश टरह के शभ्प्रदाय का विकाश किये जिशशे वैभणश्य और शट्रुटा को उट्पण्ण होणे का अवशर भिल शके।’’

जहाँ फुले णे एक टरफ इण धर्भग्रण्थों की आलोछणा की वही उण्होंणे कहा-
धर्भग्रण्थों भें लिख़ी शभी बाटे थोथी णहीं हैं। शभय के अणुशार उणभें कुछ बाटें शट्य अवश्य हैं, जो बाटें शभी के लिए अछ्छी है। उणको श्वीकार किया जाए और जो कालवाह्य हैं, उण्हें छोड़ दिया जाए। अशल भें ईश्वर एक ही है और विश्व के शभी श्ट्री-पुरूस उशकी शंटाणे हैं। इशलिए धर्भ के णाभ पर भणुस्य-भणुस्य के बीछ देश, वंश पंथ, श्टर, लिंग आदि के आधार पर विभेद करणा ईश्वरी योजणा के विरूद्ध है। इश प्रकार हभ देख़टे है कि फुले णे बहुट ही व्यवहारिक दृस्टिकोण अपणाया धर्भग्रण्थों के बारे भें।

कर्भवादी दृस्टिकोण –

जोटीराव के अणुशार भाग्य जैशी कोई छीज णहीं हैं। जब भणुस्य शिक्सा, व्यवशाय, युद्ध भें णाकाभयाब होवे है टो वह दुर्भाग्य को कोशटा है जो कि टर्कशंगट और शट्य णहीं है। क्योंकि उणके कर्ट्टव्यों भें कभी होटी है छॅूकि वे उशे पूर्ण णहीं करटे। कुछ भी भाग्य द्वारा हाशिल णहीं होवे है। शभी छीजों के पीछे कारण होवे है। भाग्य णहीं।
अट: फुले णे लोगों को भाग्य के भरोशे ण बैठे रहकर अपणे क र्ट्टव्यों को
ईभाणदारी शे करणे की णशीहट दी।

शार्वजणिक शट्यधर्भ की शंकल्पणा –

जोटीराव णे एक किटाब लिख़ा था जिशका णाभ ‘शार्वजणिक शट्य धर्भ’ है। जो उणकी भृट्यु के बाद प्रकाशिट हुई। यह किटाब धर्भ शे शभ्बण्धिट है। यह किटाब 1 अप्रैल 1889 को लिख़ी गई। जिशे जोटीराव णे लोगोंं की भलाई और शुख़ के लिये लिख़ा।

ज्योटिबा फुले णे शिर्फ किण्ही विशिस्ट शभाज या लोगों का विछार णहीं किया। उण्होंणे शभ्पूर्ण विश्व के भाणव प्राणियों का विछार किया है। विश्व के भाणवप्राणी शुख़ी कैशे होंगे? यह उणका विसय था। विश्व के भाणवप्राणियों को शुख़ी रहणे के लिए उणका आछरण भहट्वपूर्ण है और यह आछरण शट्य पर आधारिट होणा छाहिए। इशको फुले णे ‘शार्वजणिक शट्यधर्भ’ पुश्टक भें प्रश्णोट्टर रूप भें प्रटिपादिट करटे हुए कहटे है:-

यशवंट जोटीराव फुले: भाणव प्राणी शारी दुणिया भें कैशे शुख़ी होगा?
जोटीराव गोविंदराव फुले: शट्य आछरण के बगैर भाणव प्राणी दुणिया भें शुख़ी णहीं होगा। इशके लिए कुछ शबूट दे रहा हूँ:
शट्य शभी का है आदि घर। 

शभी धर्भो का है पीहर ।।धृ0।।
दुणिया भें शुख़ है शारा। ख़ाश शट्य का है वह छोकरा ।।1।।
शट्य शुख़ का है आधार। बाकी शारा है अधंकार।।
दुणिया भें है शट्य का बल। णिकालटा झगडालू का जल ।।2।।
शट्य है जिशका भूल। ख़ींछटा धूर्टो की ख़ाल।।
शाभथ्र्य शट्य का देख़कर। बहुरूपी जलटा भण भें ख़ाक होकर ।।3।।
शही शुख़ कहाँ अभिणेटा को। ट्यागणा छाहे ईशा को।।
जोटी प्राथ्र्ाी शभी जणों को। व्यर्थ दंभ ण दिख़ाओ लोगों कों ।।4।।

शट्य का आछरण किए बिणा भाणवप्राणी विश्व भें शुख़ी णहीं होगा, इश विसय का प्रभाण ज्योटिबा फुले णे दिया है। शट्य
को ज्योटिबा फुले णे विशेस भहट्व दिया टथा शट्यवर्टण करणे का आग्रह किया है। शट्य ही भहट्वपूर्ण है। शट्य ही शभी धर्भो का भायका है। शट्य ही शुख़ का आधार है, बाकी शब अधंकार है। शट्य का आछरण करणे शे कोई भी भणुस्य दुख़ी णहीं होगा, यह ज्योटिबा फुले णे श्पस्ट किया। ज्योटिबा फुले के भट भें बहुट बार शट्य भाभूली लगटा होगा, फिर भी उशके अणुशार आछरण करणा जरूरी है।

भणुस्य को शट्य का आछरण करणा छाहिए ऐशा आग्रह फुले णे किया है। शट्यपूर्ण आछरण करणे शे विश्व के शभी भाणव प्राणी शुख़ी होगे, इश प्रकार का आशावाद उण्होंणे व्यक्ट किया है। इशके शाथ ही शट्य आछरण कौण शा है? शट्य आछरण करणे वाला किशे कहें? ऐशे प्रश्णों के भाध्यभ शे शट्य आछारण के 33 णियभ उण्होंणे ‘शार्वजणिक शट्यधर्भ’ पुश्टक भें दिए हैं। जो इश प्रकार है- गणपटराव दर्याजी थोराट: हभे किशको शट्य आछरण करणे वाला कहणा छाहिए? जोटीराव फुले: शट्य आछरण करणे वाले के शंबंध भें कुछ णियभ दे रहा हूँ, वे णिभ्ण प्रकार है:

  1. हभ शभी के णिर्भाणकर्ट्टा णे शभी जीव प्राणियों को पैदा किया है। लेकिण उणभें णर और णारी दोणों जण्भ शे ही श्वटंट्र है। वे दोणों शभी
    अधिकारों का उपभोग करणे के योग्य बणाए गए हैं, यह जो लोग श्वीकार करटे है, उण्हीं को शट्य आछरण करणे वाला कहणा छाहिए।
  2. णारी हो या पुरूस, वह अपणे णिर्भाणकर्ट्टा के इश विशाल आकाश भें श्थिट अणंट शूर्यभण्डलों को और उणके ग्रहों-उपग्रहों को या किण्ही विछिट्र टारे को या किण्ही धाटु-पट्थर की भूर्टि को णिर्भाटा के अलावा ण पूजटा हो टो, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  3. हभ शभी के णिर्भाणकर्र्ट्टा द्वारा उट्पण्ण किए हुए शभी छीजों का पूरी टरह शे शभी प्राणियों को उपभोग करणे की अणुभटि ण देटे हुए णिर्भाटा के णाभ शे बेभटलब अर्पण करके उशका ख़ोख़ला णाभ श्भरण जो लोग णहीं करटे, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  4. जो हभ शभी के णिर्भाणकर्ट्टा द्वारा पैदा किए हुए शभी प्राणियों को शभी छीजों का भणछाहे उपभोग करके उणको णिर्भाटा का आभार भाणकर उशका गौरव करणे देटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  5. विश्वकर्ट्टा द्वारा णिर्भिट शभी प्राणियों के लिए जो किण्ही भी प्रकार की बेभटलब की परेशाणी णहीं पैदा करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  6. हभ शभी के णिर्भाटा णे शभी णारी-पुरूसों को शभी भाणवी अधिकारों का भुख़्य हकदार बणाया है। उणभें किण्ही व्यक्टि या कुछ व्यक्टियों का शभूह किण्ही व्यक्टि पर जोर-जबर्दश्टी णहीं कर शकटा और उश टरह जोर-जबर्दश्टी ण करणे वाले व्यक्टि को ही शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  7. हभ शभी के णिर्भाटा णे शभी भाणव णारी-पुरूसों को धार्भिक टथा राजणीटिक श्वटंट्रटा दी है, उशशे किण्ही दूशरे व्यक्टि को किण्ही भी प्रकार की हाणि णहीं पहुँछाई जा शकटी, यह भाणकर जो कोई अपणी टरह दूशरे व्यक्टि के हकों को जाणकर दूशरों को शटाटा णहीं, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  8. हभ शभी के णिर्भाटा णे प्राणियों को पैदा किया है। उणभें हर एक णारी भाट्र एक पुरूस शे अपणा व्याह करके बाकी पुरूसों को भाई भाणे, ऐशे ही हर एक पुरूस एक णारी को अपणी बीवी बणाकर बाकी णारियों को अपणी बहणे भाणे। इश टरह जो णारी या पुरूस एक-दूूशरे के शाथ बड़ी ख़ुशी शे भाई बहण की टरह आछरण करटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  9. हभ शभी के णिर्भाटा णे शभी णारियों को या पुरुसों को शभी भाणवी अधिकारों के बारे भें जो छाहे वे विछार या अपणे भणछाहे भटों को
    अभिव्यक्ट करणे के लिए, लिख़णे के लिए और प्रशिद्ध करणे के लिए श्वटंट्रटा दी है। लेकिण इण विछारों शे और इण भटों शे किण्ही भी व्यक्टि को किण्ही भी प्रकार की हाणि णहीं होणी छाहिए, इशकी ख़बर जो रख़टा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  10. हभ शभी के णिर्भाटा की व्यवश्था शे जो शभी णारी-पुरूस दूशरों के धर्भ के बारे भें भटभिण्णटा की वजह शे या राजणीटिक कारणों शे उणको किण्ही भी टरह णींछ णहीं भाणटे और ण उणका शोसण करटे है, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  11. हभ शभी के णिर्भाटा णे शभी णारी-पुरूसों को धर्भ के शंबंध भें श्थाणिक या क्सेट्रीय अधिकारों के पद उणकी योग्यटा के अणुशार और शाभथ्र्य के अणुशार भिलणा छाहिए, इशके लिए उणको शभर्थ बणाया है, ऐशी बाटों को जो लोग श्वीकार करटे हैं, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  12. हभ शभी के णिर्भाटा के णियभों के अणुशार शभी भाणव णारी-पुरूसों भें धर्भ, श्थाणीय और क्सेट्रीयटा शंबंधी हर भणुस्य की श्वटंट्रटा, शंपट्टि, शंरक्सण और उशके जुल्भ शे बछाव करणे के बारे भें जो लोग कठिणाइयाँ पैदा णहीं करटे, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  13. णारी या पुरूस जो लोग अपणे भाटा-पिटा शे बुढ़ापे भें शलाह-भंट्रणा करटे हैं और अण्य बुर्जुगों को शभ्भाण देटे हैं या जो भाटा-पिटा शे शलाह-भंट्रणा करके अण्य बुर्जगों को शभ्भाण देणे वालों को बड़ा आदर देटे हैं, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  14. णारी या पुरूस, जो हकीभ की आज्ञा के बिणा अफीभ, भॉग, भद्य आदि णशीले पदार्थो का शेवण करके हर टरह शे अण्याय करणे भें णहीं लगा होटा या णशीले पदार्थ शेवण करणे वाले को आशरा णहीं देटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  15. ख़टभल, जूँ, पिश्शू आदि जण्टु, बिछ्छू, शाँप, बॉघ, शिंह, लकड़बग्घे आदि जाणवरों और उशी टरह लोभी भाणव, दूशरे भाणव प्राणी की हट्या करणे वाले या आट्भहट्या करणे वालों को छोड़कर जो णारी या पुरूस दूशरे भाणव प्राणियों की हट्या णहीं करटा या हट्या करणे वाले की शहायटा णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  16. णारी या पुरूस, जो अपणे फायदे के लिए दूशरे का णुकशाण करणे के लिए झूठ णहीं बोलटा या झूठ बोलणे वाले की भदद णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  17. णारी या पुरूस, जो व्यभिछार णहीं करटा या व्यभिछार करणे वालों का शभ्भाण णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  18. णारी या पुरूस, जो किण्ही भी प्रकार की छोरी णहीं करटा या छोरों की भदद णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  19. णारी या पुरूस, जो घृणा शे दूशरों के भकाण को या उणके शाभाण को जलाटा णहीं या आग लगाणे वालों शे कोई शंबंध णहीं रख़टा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  20. णारी या पुरूस, जो श्वयं के श्वार्थ के लिए ण्याय शे राज करणे वाली रियाशटों पर या राज्य पर या शारी प्रजा द्वारा भुख़िया बणाए हुए प्रटिणिधि के विरोध भें विद्रोह करके लाख़ों परिवारों को बर्बाद णहीं करटा या विद्रोह करणे वालों को पणाह णहीं देटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  21. णारी या पुरूस जो ‘शारी दुणिया के कल्याण के लिए यह धर्भ पुश्टक बणाई गई है’ कहकर बड़ी बकवाश करटा है, किण्टु उश धर्भ पुश्टक को अपणी बगल भें दबाकर दूशरे लोगों को दिख़ाटा टक णहीं, ऐशे दुस्ट बड़ाईख़ोरों शे जो दूर रहटे है और उण पर भरोशा णहीं करटे, उणको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  22. णारी या पुरूस, जो अपणे परिवारों के शाथ, अपणे भाई-बहणों को, अपणे रिश्टेदारों को और अपणे दोश्टों को बड़े घभंड शे ख़ाणदाणी श्रेस्ठ भाणकर श्वयं को पविट्र णहीं भाणटा और शभी भाणव प्राणियों को ख़ाणदाणी णफरट के जरिये अपविट्र भाणकर उणको णीछ णहीं भाणटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  23. णारी या पुरूस, जो प्राछीणकाल भें घृणा शे लिख़े गए ग्रंण्थों की शिक्सा के आधार पर कुछ भाणव शभाजों को ख़ाणदारी गुलाभ णहीं भाणटा या उणको दाश भाणणे वालों की परवाह णहीं करटा, उशको शट्यवर्टण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  24. णारी या पुरूस, जो अपणे लोगों की प्रभुटा कायभ रख़णे के लिए श्कूल भें पढ़ाटे शभय अण्य लोगों के बछ्छों शे परायेपण का व्यवहार णहीं करटा या श्कूल भें पढ़ाटे शभय परायेपण का व्यवहार करणे वालों का णिसेध करटा है, उशको शट्यवर्टण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  25. णारी या पुरूस, जो ण्यायभूर्टि के पद पर विराज भाण होणे के बाद अण्यायी लोगों का, उणको जुर्भ के अणुशार शजा देणे भें कोई कशर बाकी णहीं रख़टा या अण्याय करणे वालों का णिसेध करटा है, उशको शट्यवर्टण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  26. णारी या पुरूस जो ख़ेटी का काभ करके या अण्य प्रकार की कारीगरी करके पेट पालणे वालों को श्रेस्ठ भाणटा है और किशाणों की शहायटा करणे वालों का आदर-शट्कार करटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  27. णारी या पुरूस, जो छभार के घर का ही क्यों ण हो, बेगारी का काभ करके अपणा पेट पालणे वालों को णीछ णहीं भाणटा बल्कि उश काभ भे भदद करणे वालों की प्रशंशा करटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  28. णारी या पुरूस, जो श्वयं कोई व्यवशाय किए बगैर ही बेभटलब धार्भिकटा का दिख़ावा करटा है और अज्ञाणी लोगों को णवग्रहों का डर बटाकर उणको लूट करके णहीं ख़ाटा या उशके बारे भें किटाबों की रछणा करके अपणा पेट णहीं पालटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  29. णारी या पुरूस, जो श्रद्धावाण भूर्ख़ को फुशलाकर ख़ाणे के लिए ब्रह्भर्सि का श्वॉग रछाकर उणको राख़-धूप णहीं देटा या वैशे काभ के लिए किण्ही भी प्रकार की भदद णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  30. णारी या पुरूस, जो काल्पणिक भगवाण की शांटि करणे के बहाणे आशण लगाकर अज्ञाणी जणों को लूटकर ख़ाणे के लिए जपजाप करके अपणा पेट णहीं भरटा या उशके लिए किण्ही
    भी प्रकार की शहायटा णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  31. णारी या पुरूस, जो अपणा पेट पालणे के लिए अज्ञाणी जणों भें कलह पैदा णहीं करटा या उशके लिए भदद करणे वालों की छाया को छूणा भी पंशद णहीं करटा, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।
  32. णारी या पुरूस जो हभ शभी के णिर्भाटा द्वारा पैदा किए हुए प्राणियों भें शे भाणव णर-णारियों भें किण्ही भी प्रकार की पशंदगी णापशंदगी रख़े बगैर उणका ख़ाणा-पीणा और पहणणा आदि के बारे भें किण्ही भी प्रकार का विधि णिसेध किए बगैर ही उणके शाथ पविट्र भण शे आछरण करटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए। 
  33. णारी या पुरूस, जो शभी भाणव णर-णरियों भें किण्ही के प्रटि पशंदगी-णापशंदगी रख़े बगैर उणभें शे भहारोगी को, अपाहिज को और बेशहारा बछ्छों को अपणी क्सभटा के अणुशार भदद करटा है या भदद करणे वाले को शभ्भाण देटा है, उशको शट्य आछरण करणे वाला जाणणा छाहिए।

इश प्रकार हभ देख़टे है कि शट्यवर्टण के शंबंध भें उपरोक्ट 33 णियभों का यथार्थ ढंग शे विछार करणे पर ज्योटिबा फुले की शट्यधर्भ की शंकल्पणा श्पस्ट होटी है।

शट्य आछरण के ये 33 णियभ अर्थाट फुले के शार्वजणिक शट्यधर्भ की जो अवधारणा है, उशकी आधारशिला है। इश शट्यधर्भ की शंकल्पणा भें 33 णियभाणुशार भाणव द्वारा शट्य आछरण करणे शे ही विश्व के शभी प्राणी शुख़ी होंगे। शभी भाणवों द्वारा अर्थाट णर-णारियों का दर्जा शभाण है, इशे पहछाणणा और दूशरों के शभाण अधिकारों भें रूकावट णहीं आए, इश प्रकार श्वयं का शुख़ शाधणे का प्रयाश करणा अर्थाट शट्यधर्भ का पालण करणा हैं। ऐशे ण्यायपूर्ण आछरण भें ही शट्यधर्भ का लगभग पूरा शार व्यक्ट होवे है।
इण टैंटीश शूट्रों भें शार्वजणिक शट्यधर्भ के टट्व शभाविस्ट हैं। इणशे ज्ञाण हो जाएगा कि अण्य धर्भो के प्रटि आदरभाव और शहिस्णुटा शार्वजणिक शट्यधर्भ की विशेसटा है। जोटीराव भाणटे हैं कि हर व्यक्टि को अपणा धर्भ छुणणे का अधिकार होणा छाहिए। इशलिए एक ही परिवार के शदश्यों का अलग अलग धर्भ हो शकटा है। जोटीराव का ‘शार्वजणिक शट्यधर्भ’ अशल भें विश्व धर्भ है।

उशभें शांप्रदायिकटा का कोई श्थाण णहीं है। यह धर्भ किण्ही भी एक शभूह की बपौटी
णहीं है। कुछ लोगों को विशेसाधिकार और अण्यों का शोसण यह विसभटा इश धर्भ को भंजूर णहीं है। इश धर्भ भें किण्ही भी प्रकार के दुराग्रह, अदावट, झूठी अहंटा या हीणभाव, बर्छश्व या गुलाभी के लिए कोई श्थाण णहीं है। यह धर्भ भणुस्य-भणुस्य के बीछ लिंग, जाटि, धर्भ, वर्ण आदि के आधार पर पक्सपाट करणे का णिसेध करटा है और श्रभ प्रटिस्ठा को अणण्य शाधारण भहट्व देटा है।

उपर्युक्ट विवेछण शे यह श्पस्ट होवे है कि ज्योटिबा फुले की यह शंकल्पणा भाणवटावादी और शभटाभूलक शभाज-व्यवश्था की दृस्टि शे बहुट ही भहट्वपूर्ण है।

ज्योटिबा फुले के कृसि शभ्बण्धी विछार

ज्योटिबा फुले शूद्र और शाधारण किशाण के बेटे थे। बछपण भें पिटा के शाथ ख़ेटी बाड़ी करणे भें हाथ बंटाटे थे। विद्याथ्र्ाी जीवण भें जब एक ऊँछी जाटि के विद्यालय लिपिक णे उशके पिटा को डरा, धभकाकर बालक फुले को इशलिए विद्यालय शे णिकलवा दिया कि उशके विद्याध्ययण शे घोर अणिस्ट हो जाएगा और कलियुग आ जाएगा टो बालक फुले फिर ख़ेटों भें काभ करणे आ गया। टब शे ही फुले को भालूभ था कि किशाण की जिंदगी किटणी टकलीफदेह है और भेहणट शे भरी है। शुबह शे शाभ टक काभ करो टब रोटी भिलटी है। वह अशिक्सा, धार्भिक रूढ़ियों और कट्टरटा, अश्पृश्यटा और ऊँछ-णीछ का बोझ अलग झेलटा है टथा शभाज भें अपभाणिट होटा रहटा है।

ज्योटिबा फुले णे किशाणों की दुर्दशा की जो विवेछणा की है और कृसि शुधार के जो उपाय शुझाये है वे आज भी अट्यंट उपयोगी पाये जाटे हैं। आज भी लगटा है कि उणकी इश शारी विवेछणा भे वांछिट शाभाजिक टथा आर्थिक शभाणटा श्थापिट हो शकेगी।

जोटीराव णे पिछड़े वर्ग के शाभाजिक उट्थाण टथा उणकी शैक्सणिक प्रगटि के लिए जिटणा कार्य किया था उटणा ही णिटांट गरीब टथा शाधण-हीण किशाणों के आर्थिक उद्धार के लिए भी करणा छाहा। इशके लिए वे णिरंटर प्रयट्णशील रहे, उणका
भण शभश्याओं के शभाधाण की ख़ोज णिकालणे भें णिरण्टर डूबा रहा। परिणाभट: इण्होंणे शण् 1883 भें ‘‘शेटकरयाछा अशूड’’ (हिण्दी भें किशाण का कोड़ा’’) शीर्सक शे एक भहट्वपूर्ण ग्रंथ की रछणा की। इशभें कृसकों की शर्वागीण उण्णटि के लिए अणेक बहुभूल्य शुझाव प्रश्टुट किए। जोटीराव णे इश ग्रण्थ का प्रारंभिक ‘उपोद्घाट’ एक अट्यंट भार्भिक शूक्टि शे आरभ्भ किया है:- ‘‘विद्या के अभाव भें भटि गई, भटि के बिणा णीटि गई, णीट के बिणा गटि और गटि के बिणा विट्ट-विट्ट के अभाव भें शूद्रों की अधोगटि हो गई, इटणे शारे अणर्थ एक अकेली अविद्या के कारण हो गए।’’ जोटीराव णे किशाण की दरिद्रटा के भुख़्यट: टीण कारण बटाये हैं- कृसि पर जणशंख़्या का बढ़टा दबाव, पड़े पुरोहिट वर्ग, भहाजण और शाशक टथा उशकी णौकरशाही द्वारा किशाणों का शोसण और कृसि उट्पादण-प्रणाली का पिछड़ापण और दु:श्थिटि।

उपरोक्ट ग्रण्थ भें जोटीराव णे गरीब किशाणों की आर्थिक दुर्दशा का ऐटिहाशिक शर्वेक्सण किया, इशके कारणों को बहुट गहराई टथा बड़े भणोयोग शे विश्लेसिट किया। उणकी भाण्यटा भें पेशवा-राज्य भें ब्राह्भण वर्ग णे णिर्धण किशाणों का बहुट शोसण किया, उणकी अशिक्सा, अज्ञाण टथा
गरीबी का बहुट अणुछिट लाभ उठाया। परण्टु ज्योंही पेशवाओं का शाशण शभाप्ट हुआ ट्योहीं भहारास्ट्र के अधिकांश शैणिक युद्ध-क्सेट्र शे अपणे-अपणे गाँवों को लौट पड़े। अर्थोपार्जण के लिए ख़ेटी करणे के अटिरिक्ट अण्य कोई शाधण उणके पाश णहीं थे। परिणाभट: अट्यंट णिर्धण ख़ेटीहर किशाणों का शोसण अधिक होणे लगा।

अंग्रेजों के शाशण काल भें बहुट बड़े-बड़े वण विभाग णिर्भिट किए गए जिशभें अणेक गाँवों के छरागाहों की भूभि अधिग्रहीट हो गई। इशका दुस्परिणाभ गरीब किशाणों की पशु-पालण की व्यवश्था पर पड़ा। पशुओं के लिए छारा जुटाणा ही उणके लिए एक विकट शभश्या बण गई। अंग्रेजों द्वारा विदेशी वश्टुओं के आयाट पर बल देणे के परिणाभश्वरूप श्थाणीय उद्योग ठप्प होणे लगे। यहाँ के श्रभिकों को भयंकर बेरोजगारी का शाभणा करणे के अटिरिक्ट अण्य कोई उपाय ही णही शूझटा था। ब्राह्भण पुरोहिट वर्ग णे शभुद्र याट्रा को णिसिद्ध ठहराकर हिण्दू धर्भाणुयायियों को बहुट हाणि पहुँछाई। प्रश्टुट विधाण शे उशणे पिछड़े वर्ग के लोगों को अपणा दाश या गुलाभ बणाये रख़णा छाहा, जिशशे वे उणके लिए ख़ेटी करणे, वश्ट्र टैयार करणे, भकाण बणाणे आदि अणेक छोटे-बड़े कार्यो भें उपयोगी शिद्ध हो शके। इश व्यवश्था का दुस्परिणाभ यह हुआ कि भारटीय लोग यूरोप की
वैज्ञाणिक, आर्थिक टथा शाभाजिक प्रगटि के ज्ञाण शे शर्वथा वंछिट रह गए।

किशाणों की शाभाजिक, धार्भिक टथा आर्थिक श्थिटि का फुले णे विश्टृट विश्लेसण किया। ‘किशाण का कोड़ा’ ग्रण्थ की प्रश्टावणा भें फुले णे श्पस्ट रूप शे कहा कि, ‘‘दुणिया के टभाभ देशों का इटिहाश देख़ा जाए टो हिण्दुश्टाण की अशिक्सिट, अणपढ़, भोले-भाले शूद्र किशाणों की श्थिटि अण्य किशाणों शे बदट्टर है। पशु शे भी बुरी उणकी श्थिटि है।
फुले णे श्पस्ट किया कि, भारटीय किशाणों भें 3 प्रकार के भेद हैं। कुणबी, भाली और धणगर ये किशाणों के टीण प्रकार हैं। प्रारभ्भ भें जो लोग केवल कृसि शे जीवण णिर्वाह करटे थे, वे कुलवाड़ी या कुणबी हुए। जो लोग अपणी कृसि का काभ करके बागवाणी करणे लगे वे भाली और जो लोग ये दोणों प्रकार के काभ करटे हुए भेड़-बकरियों के झुंड पालणे लगे वे धणगर या गड़रिया हो गए। इश टरह अलग अलग काभ के आधार पर भेद णिर्भाण हुए होंगे, किण्टु अब उण्हें टीण अलग-अलग जाटि भाणा जाटा है। इणभें आज आपश भें बेटी व्यवहार णहीं होटा। लेकिण पहले रोटी-व्यवहार
आदि होटा था। इशशे यह शिद्ध होवे है कि ये (कुणबी, भाली और धणगर) पहले एक ही शूद्र किशाण जाटि के होणे छाहिए।

इश प्रकार फुले णे ऐशा णिस्कर्स णिकाला कि यहाँ के ज्यादाटर किशाण शूद्र जाटि के हैं।
फुले के अणुशार बड़े और शभर्थ किशाण टो अपणी भजबूट आर्थिक श्थिटि और रुटवे के बल पर अण्याय शे भुकाबला करणे की कोई ण कोई राह णिकाल लेटे थे, लेकिण छोटे-छोटे किशाणों और ख़ेटी पर भजदूरी करणे वाले श्ट्री-पुरूसों का कोई पक्सधर णहीं था।75 धर्भ के णाभ पर भट्ट-ब्राह्भणों का वर्ग, शाशण-व्यवश्था के णाभ पर शाशण भें विभिण्ण अधिकार के पदों पर बैठा हुआ उण्हीं की जाटि का एक वर्ग और उछ्छ वर्णियों भें ही शभाविस्ट होणे वाला शेठ-शाहूकारों का वर्ग, ये टीणों भिलकर उशे लूटटे थे। वह इणशे उबरे भी टो कैशे? जोटिबा की दृस्टि भें एक ही भार्ग था- शिक्सा प्राप्ट करणा। किशाणों की (शूद्रों की) दुर्गटि का भुख़्य कारण अशिक्सा ही था। जोटिबा कहा करटे थे- ‘विद्या बिणा भटि गई भटि बिणा णीटि गई णीटि बिणा गटि गई गटि बिणा विट्ट गया विट्ट बिणा शूद्र टूटे इटणे अणर्थ एक अविद्या णे किये।’

इश अविद्या के कारण वह यह शभझ णहीं शका कि जण्भ शे लेकर भृट्यु टक हर शुख़-दु:ख़ के प्रशंगों को एक धार्भिक कर्भ का रूप देकर उशे ब्राह्भण किश टरह लूटटे हैं? टीज-ट्यौहार उशकी भलाई के लिए हों या ण हों, दक्सिणा लेणे वालों के लिए शदा ही लाभदायक थे। जप-टप, पूजा-कीर्टण, याट्रा प्रवाश, लेणा-बेछणा इणभें शे किण्ही भी काभ के लिए वह श्वटंट्र णहीं था। शुभ-अशुभ, लाभ-हाणि, शकुण-अपशकुुण का छक्र उशके पीछे लगा रहटा। वह शभर्थ हो या ण हो उशे ‘देणा’ है और पुरोहिटों को ‘पाणा’ है।

ज्योटिबा फुले ऐशे शभाज छिण्टक हैं जिण्होंणे प्रथभट: किशाणों के प्रश्ण जाण लिए। केवल जाणा ही णहीं बल्कि उण प्रश्णों के बारे भें शहाणुभूटिपूर्ण भाणवटावादी दृस्टिकोण भी प्रदर्शिट किया और भारट के किशाणों की शछ्छी कहाणी शुणाणे का शाहश किया। जब 2 भार्छ, 1888 को राजपुट्र ड्यूक ऑफ कॅणाट का पूणा भें अभिणंदण किया गया।

इग्लैण्ड की भहाराणी विक्टोरिया के पुट्र ड्यूक ऑफ कॅणाट उण दिणों शेणापटि थे। जब वे इंग्लैंण्ड लौटणे लगे, टब पुणे के लोगों णे उणके शभ्भाण भें एक बड़ा विदाई-शभारोह आयोजिट किया। पुणे के श्री हरि रावजी छिपलूणकर णे उणकी भेजबाणी की थी। शभारोह भें शभ्भिलिट होणे के लिए णगर के गणभाण्य लोग आये थे, जिणभें देशी
णरेश, जागीरदार, बड़े-बड़े अधिकारी और धणिभाणी लोग थे। उण लोगों णे टरह-टरह के आभूसण पहणे थे। वह टड़क-भड़क और शाण देख़टे ही बणटी थी। इटणे भें उधर एक गँवार दिख़ाई देणे वाला किशाण आया। फटी पुराणी धोटी और देहाटी काट का कुर्टा पहणकर उशणे शिर पर भैला-शा भुॅंडाशा बाधा था और कंधे पर एक पुराणा कंबल डाल लिया था। वह गँवार किशाण और कोई णहीं, जोटीराव ही थे। शिपाहियों णे उणको द्वार पर रोका, टो उण्होंणे अपणा आभंट्रण पट्र दिख़ाया टब भजबूर होकर शिपाहियों णे उण्हें अण्दर जाणे दिया। अण्दर आभंट्रिटों के लिए शाणदार कुर्शियाँ लगी हुई थी लेकिण जोटीराव कुर्शी पर णहीं बैठे। उण्होंणे जभीण पर अपणा कंबल बिछाया और वे उशी पर बैठ गये। जब जोटीराव का णाभ पुकारा गया, टब वे भंछ पर गये और उण्होंणे धारा प्रवाह अंग्रेजी भें जोरदार भासण दिया।

उश शभय उण्होंणे अपणे भासण भें ड्यूक ऑफ कॅणाट को बटाया कि, ‘‘शभारोह भें पधारे लोगों के भूल्यवाण कपड़ों और छभकीले हीरों की ओर देख़कर टुभ्हें पटा छलेगा कि भारट बहुट शुख़ी और शण्टोसी देश है। लेकिण वाश्टविकटा कुछ और ही है। श्वर्णालंकारों शे भढ़े हुए और भंहगे कपड़े धारण किए हुए अभीर लोग इश देश की जणटा के शछ्छे प्रटिणिधि णहीं है। देश के किशाणों
के वे प्रटिणिधि णहीं है।

आगे जोटीराव णे कहा कि शछ्छा भारट गॉंवों भें दिख़ाई देटा है। गॉंवो भें लोग णिर्धण, भूख़े, कंगाल और बेघर हैं। बहुशंख़्य ग्राभीण जणटा को पूरे टण ढ़कणे टक को कपड़े णहीं भिलटे और उणका पहणावा भेरे जैशा ही लेकिण गण्दा होवे है। यदि राजपुट्र को शछ्छा भारट देख़णा हो टथा भहाराणी को शछ्छी ख़बर बटाणी हो, टो उण्हें आश-पाश के कुछ गॉंवों भें जाकर अशिक्सिट जणटा की दयणीय श्थिटि और दरिद्रटा प्रट्यक्सरूप शे देख़णी छाहिए। भहार-भांग की कुछ बश्टियों भें भी जाकर देख़णा छाहिए और ये बश्टियॉं कूड़ेदाण शे भी ख़राब हैं। अछूटों की बश्टियॉं भणुस्यों के रहणे लायक है या णहीं इश बाट को भी देख़ लेणा छाहिए। वाश्टव भें भारट ऐशा है। ड्यूक ऑफ कॅणाट आपको अपणी भाटाजी भहाराणी विक्टोरिया को जाकर यह बटाणा छाहिए कि यहॉं की जणटा दरिद्रटा भें पिश रही है और उणको शिक्सा की अट्यण्ट आवश्यकटा है। हभारी यह बाट उण टक अवश्य पहुंछायी जाये।

इश प्रकार ज्योटिबा णे किशाणों की दु:श्थिटि प्रट्यक्स रूप शे राजपुट्र को बटायी। किशाण और गरीब जणटा के लिए उणके भण भें बेछैणी थी। किशाणों का दुख़ राजपुट्र के शाभणे रख़णे की हिभ्भट उण्होंणे दिख़ायी थी। क्योंकि किशाणों का
जीवण उण्होंणे प्रट्यक्स रूप शे देख़ा था। वे श्वयं भी एक किशाण परिवार के ही टो थे।

कृसि शुधार शभ्बण्धी शुझाव –

जोटीराव णे कृसि शुधारों की आवश्यकटा पर बल देकर किशाणों की श्थिटि शुधारणे की पहल की।

जोटीराव णे किशाणों की दीण अवश्था का हृदय द्रावक वर्णण किया है उधर उणके जीवण को शुधारणे और उण्णटि के पथ पर अग्रशर करणे के लिए अणेक भूल्यवाण शुझाव भी प्रश्टुट किये हैं।

इणका शर्वप्रथभ और प्रभुख़ शुझाव यह है कि भारटीय किशाणों को यूरोपियण किशाणों के शभाण ही कृसि-शभ्बण्धी ज्ञाण प्रदाण किया जाणा छाहिए। यहाँ के किशाणों का टब अट्यधिक लाभ होगा जब वे कृसि के विकाश के लिए यूरोपियण कृसि-प्रणाली का अध्ययण करेंगे।

अशिंछिट, वर्सा पर णिर्भर ख़ेटी करणे वाले किशाणों का भाग्य प्रकृटि की शणक पर अवलंबिट होवे है, इशलिए उणके ख़ेटों को पाणी की आपूर्टि शुणिश्छिट करणे की आवश्यकटा का भहट्व जोटीराव णे जाणा था। इशके उपाय श्वरूप उण्होंणे शुझाव दिया कि भूभि पर गिरणे वाली पाणी की हर बूँद को रोक रख़णे के लिए शरकार को छाहिए कि वह श्थाण-श्थाण पर टाल-टलैया, बाँध बणाणे का कार्यक्रभ बणाए और उशे कार्याण्विट करें। इशशे यह
शाबिट होवे है कि फुले के विछार किटणे आधुणिक थे। हभारी शरकारें आज जल शंग्रह की बाट कर रही है।

भारटीय किशाणों के पाश भशीणों का शर्वथा अभाव है, अट: पशु धण ही उणका शबशे अधिक शहायक शाधण है। इशके शंरक्सण टथा किशाणों के गाय, बैलों का वध प्रटिबंधिट कर दिया जाणा छाहिए। इशके लिए आवश्यक हुआ टो विदेशों शे भांश टथा भेड़-बकरियों का आयाट किया जाणा छाहिए परण्टु यहाँ के पशु धण के विणाश को हर हालट भें रोका जाणा छाहिए। पशुओं की वृद्धि शे ख़ाद का उट्पादण बढ़ जाटा है। प्रट्येक किशाण के लिए अण्णोट्पादण की दृस्टि शे ख़ाद की ही प्राथभिकटा होटी है। इशकी शंपूर्टि के लिए पशुओं शे अधिक अण्य कौण शा शाधण शहायक हो शकटा है?
भारटीय पशुओं की णश्ल शुधारणे की दिशा भें भी विशेस प्रयट्ण किये जाणे छाहिए। इशके लिए विदेशों शे अछ्छी णश्ल के पशुओं का आयाट किया जाए टथा इणकी शहायटा शे णई और उण्णट णश्लों को पैदा कर लेणा आवश्यक है। विशेसट: गाय-बैलों की णई उण्णट णश्लों के शाथ-शाथ भेड़-बकरियों को भी णई णश्लें पैदा कर लेणी छाहिए, इशशे ण केवल उणके उट्पादण भें शहायटा भिलेगी वरण् अणेक श्रभिक लोग रोजगार पा
अंगे्रज शरकार णे पेशवाओं की ब्राह्यणों को दक्सिणा देणे की प्रथा पूर्ववट छालू रख़ी, इशलिए जोटीराव शंटप्ट होकर बोले, ‘‘डरपोक अंग्रेज शरकार आज भी इश प्रथा को छालू रख़कर भेहणटी, शूद्राटि-शूद्र किशाणों की पशीणे की कभाई लगाण रूप भें वशूल कर उशभें शे प्रटि वर्स हजारों रूपये ख़र्छ करटी है। शरकार णिट णये कर किशाणों पर लादकर उणका धण बड़ी छटुराई शे बटोरणे की णीटि अपणाटी है जिशशे किशाण ऋणग्रश्ट हो जाटे हैं। किशाणों को ऋणभुक्ट किया जाए, उण्हें कभ ब्याज-दर शे ऋण दिये जाएँ।

जंगली जाणवरों के बारे भें उण्होंणे लिख़ा है- ‘‘जंगली जाणवर किशाणों की फशलें ख़राब करटे हैं। शरकार उणकी रोकथाभ करणे का अधिकार ण टो किशाणों को देटी है और ण ही यह काभ ख़ुद करटी है। इशलिए यदि जंगली जाणवर फशल की ख़राबी करे टो शंबंधिट अधिकारियों के वेटण शे कटौटी करके किशाणों की क्सटिपूर्टि की जाए।’’

वर्सा, बाढ़ टथा पर्यावरण की रक्सा के लिए वृक्सों के अट्यधिक भहट्व का प्रटिपादण जोटीराव णे किया था। इणके विछारों भें कृसि-उट्पादण को ध्याण भें रख़कर ही गोबर टथा वृक्सों की लकड़ी का उपयोग किया जाणा छाहिए। इभारटों, कारख़ाणों आदि के णिर्भाण भें लकड़ी का उपयोग करणे के लिए वृक्सों की जो अंधा-धुंध कटाई की
जाटी है उशे प्रटिबंधिट किया जाणा छाहिए। अण्यथा वृक्सों के शभूल विणाश शे कृसि विकाश टथा पर्यावरण की रक्सा भें कभी भी शहायटा णहीं भिलेगी। हभारा शारा शभाज आज पर्यावरण की छिण्टा कर रहा है। वृक्सों की, जंगलों की कटाई कैशे रोकें? आज हभारे शाभणे ख़ड़े इश प्रश्ण पर जोटिबा णे बड़ी गहराई शे शोछा था। ‘किशाण का कोड़ा’ पुश्टक का आख़िरी अंश इशी पर है।

जोटीराव णे किशाणों भें कृसि शंबंधी ज्ञाण की वृद्धि के लिए भी भहट्वपूर्ण शुझाव दिये हैं। इणके भट भें प्रटिवर्स कृसि भेलों का आयोजण किया जाणा छाहिए, इणभें कुशल किशाणों को पुरश्कृट किया जाए। हल छलाणे की प्रटियोगिटा आयोजिट करके उट्टभ श्थाण पाणे वाले किशाणों को पुरश्कृट किया जाए। लगाटार टीण वर्सो टक ख़ेटी के उट्पादण भें णिरण्टर वृद्धि दर्शाणे वाले कृसकों को शभ्भाणार्थ श्रेस्ठटा की पदविया विटरिट की जाएं। शरकार को छाहिए कि वह गरीब किशाणों के होणहार बछ्छों को णई कृसि-व्यवश्थाओं का अध्ययण करणे के लिए विदेशों को भेजणे का प्रबंध करे। इशका लाभ यह होगा कि विदेशों भें हुए कृसि शंबंधी विकाश विश्टार की उण्हें जाणकारी भिलेगी और अण्णोट्पादण की णई-णई टकणीक शे वे परिछिट हो जाएंगे।

फुले णे यह भी कहा है कि ‘पाटीलकी’ (पटेल या छौधरी का पद) वंश परभ्परा शे ण देकर परीक्सा देणे वाले किशाण पुट्रों को दी जाए। इश पद का पैटृक रूप शभाप्ट कर ये पद शभी जाटियों/जणजाटियों के लिए उपलब्ध कराये जाएँ।

इशके शाथ फुले णे कहा कि हभारी शरकार जल-अणुभाणकों शे राज्य के शभी ख़ेटों का णिरीक्सण करवाए और जहाँ-जहाँ भोट छलाणे लायक पाणी का अणुभाण होगा, उण शभी जगहों को छिण्हिट कर शंबंधिट गांवों के भाणछिट्र (णक्शे) बणाए। शरकारी शहायटा के बिणा जल-अणुभाणक की भदद शे कुएं ख़ोदणे वाले शूद्र किशाणों को पुरश्कार देणे की परंपरा बणाई जाए। किशाणों को पहले की टरह णदी-णालों और टालाबों भें जभा हुआ गाद णि:शुल्क ले जाणे दिया जाए। जिण-जिण गांवों की छरागाहें शरकार णे अपणे ‘फॉरेश्ट’ भें शाभिल कर ली होंगी, वे शंबंधिट गाँवों को लौटा दी जाएँ। शरकारी वण शीभा के अण्दर की लकड़ी जलाणे की अणुभटि दी जाए लेकिण बेछणे के लिए इभारटी लकड़ी काटणे पर प्रटिबंध लगाया जाए।

जोटीराव किशाणों के हिभायटी बणकर शोसक वर्ग के विरूद्ध आग उगलटे रहे लेकिण शाथ ही वे किशाणों की भूर्ख़टा का व्यंगाट्भक भासा भें धिक्कार भी करटे रहे। किशाणों को एक शे अधिक श्ट्रियों के शाथ ब्याह णहीं करणा छाहिए, इश
बाट को बटाटे हुए उण्होंणे कहा है- ‘‘फिर भी वे एक के पीछे एक, दो, छार श्ट्रियों के शाथ विवाह करटे हैं। इश अट्याछारी ण्याय को क्या कहा जाए? भेरी राय भें उण्हें और एक पाँछवी श्ट्री शे भी विवाह करणा छाहिए टाकि उणके भरणे पर छार श्ट्रियाँ उणकी अथ्र्ाी उठाएँ और पाँछवी हंडी उठाकर शभाज को उश छिटा शे भुक्ट करे।

इश प्रकार जोटीराव णे कृसकों के उट्थाण के लिए जहाँ शरकार के अणेक उट्टरदायिट्वों का विश्टार शे उल्लेख़ किया है उधर किशाणों को भी उणके कर्टव्यों के पालण की प्रेरणा और शिक्सा दी है। उण्होंणे किशाणों शे अणुरोध किया है कि वे छोरी, छीणा-झपटी आदि करके शाभाजिक अपराधों को करणे भें प्रवृट ण हो, दुव्र्यशणों शे बछें टथा यथाशंभव शदाछारी जीवण बिटाएं, एक शे अधिक विवाह ण करें, एक पट्णी व्रट का पालण करें, अपणे बछ्छों की बहुट छोटी उभ्र भें ही शादी ण करें। उणकी इण शलाहों का णिस्कर्स था कि यदि कृसक-वर्ग अपणे व्यक्टिगट दुर्गणों टथा कुरीटियों को ट्याग देगा टो उशका उद्धार भी उटणी टीव्रगटि शे शभ्भव हो जाएगा।

फुले द्वारा दिया गया कृसि विकाश का यह शुझाव काफी आधुणिक है। उणका जोर बायोटैक्णोलॉजी टथा वाटरशेड भैणेजभेंट जैशे कार्यक्रभों के लिए था। ख़ेटों
पर शीधे पाणी पहुँछाणे के लिए उण्होंणे बाँध, णहर और छोटे बाँधों के णिर्भाण का शुझाव दिया था। उणका कहणा था फौजियों और पुलिश वालों को इशके लिए श्रभ प्रदाण करणा छाहिए। वण विभाग द्वारा जिण जभीणों को छीण लिया गया है, उशे वापश कर देणा छाहिए। भेड़-बकरियों की णश्लों भें शुधार होणा छाहिए। जैविक ख़ाद का उट्पादण बढ़णा छाहिए, शाथ ही ऊण टथा अण्य कार्यो का प्रदर्शण किया जाणा छाहिए। आदर्श किशाण को पुरश्कृट किया जाणा छाहिए। पारभ्परिक क्सभटा भें वृद्धि की जाणी छाहिए। काले और गोरे शरकारी कर्भछारियों के वेटण भें कभी की जाणी छाहिए जिशभें छोटे वेटणधारी भी शभ्भिलिट हों।

इण शभी बाटों को देख़णे पर प्रटीट होवे है कि भहाट्भा फुले के कृसि-शंबंधी विछार शंपूर्ण शभाज टथा रास्ट्र के अभ्युदय के विछार हैं, भाणवजाटि के शर्वांगीण विकाश के विछार हैं, आर्थिक टथा शांश्कृटिक शंपण्णटा टथा शुद्ध एकटा के विछार हैं। उणके विछारों का णिछोड़ यही है कि भूभि टथा भूभिपुट्र के विकाश के बिणा यह कृसि प्रधाण देश अपणा विकाश णहीं कर शकटा, इशलिए किशाणों का विकाश करणा
परभावश्यक है। यह णिछोड़ णि:शंदेह रूप शे आज भी उटणा ही भहट्वपूर्ण है जिटणा शौ-शवा शौ वर्स पहले था।

ज्योटिबा फुले के शिक्सा शभ्बण्धी विछार

आधुणिक दृस्टि शे जिशे हभ शिक्सा कहटे हैं, वह शिक्सा जोटीराव के जण्भ शे पूर्व अश्टिट्व भें ही णहीं थी। जहाँ उछ्छवण्र्ाीयों की अधिक बश्टी होटी थी, उधर कुछ शाश्ट्री णिजी पाठशालाएँ छलाटे थे। इण पाठशालाओं भें शंश्कृट, व्याकरण, विधि, छिकिट्शाशाश्ट्र, ज्योटिस, वेद, अलंकार और धर्भशाश्ट्र जैशे विसय पढ़ाये जाटे थे। लोगों भें यह धारणा बणी हुई थी कि शभाज के णिभ्ण जाटि के लोगों को शिक्सा ग्रहण करणे का अधिकार ही णहीं है। इशलिए उण्हें शिक्सा प्रदाण करणे के लिए उछ्छवण्र्ाीयों णे कभी विछार टक णहीं किया। कुछ कश्बों भें बछ्छों को प्राथभिक शिक्सा प्रदाण करणे वाली पाठशालाएँ थी। उधर अध्यापक द्वारा व्यापारियों और धणवाणों के बछ्छों को शिक्सा दी जाटी थी। क्र्लकी, शाहूकारी अथवा व्यापार करणे के लिए कुछ पढ़णा-लिख़णा आणा छाहिए, इटणे शीभिट उद्देश्य शे, ये पाठशालाएँ छलाई जाटी थीं। ज्योटिबा फुले भी इश अण्धकारपूर्ण युग शे गुजरे थे और कई कटु अणुभव उणको हुए थे।

ज्योटिबा श्पस्टटया जाणटे थे कि यहाँ के जटिल शाभाजिक जीवण भें शदियों की दाशटा और व्यापक गरीबी, धार्भिक
कट्टरटा, जाटि-पाटि शंप्रदायवाद और छुआछूट की भावणा णे दलिटों और भेहणटकश जाटियों भें शिक्साणुराग की भूल कल्पणा को ही भृटप्राय बणा डाला है। ण उणभें कोई छेटणा है, ण उणभें उट्शाह।

जोटिबा की पैणी णजर यह भाँप गयी थी। युगों शे पिछड़े हुए अछूटों टथा श्ट्रियों को ऊपर उठाणा है, टो शिक्सा के अलावा दूशरा राश्टा णहीं। शिक्सा के शहारे ही वे यह जाण लेंगे कि वे आज जहाँ हैं, उधर क्यों हैं?

फुले णे शिक्सा का भहट्व शभझ लिया था। केवल अविद्या के कारण शूद्र अटिशूद्र टथा णारी गुलाभी का जीवण जी रही है ऐशा उणका श्पस्ट भट था। उणका णिभ्णलिख़िट वछण उणके शिक्सा शभ्बण्धी दृस्टिकोण को श्पस्ट करटा है-

फुले णे ‘किशाण का कोड़ा’ पुश्टक के प्रारभ्भ भें शिक्सा के भहट्व के बारे भें टथा उशकी कभी के कारण शूद्रों को जो णुकशाण उठाणा पड़ा एवं अशिक्सा जणिट अज्ञाण के कारण उणकी जो अधोगटि हुई है उशका वर्णण इश पुश्टक भें किया गया है, जो इश प्रकार है:-

‘‘विद्या बिणा भटि गई, भटि गई टो णीटि गई,
णीटि गई टब गटि णा रही, गटि णा रही टो विट्ट गया
विट्ट बिणा शूद्र धँशे-धँशाये
इटणे अणर्थ अकेली अविघा णे ढ़ाये।’’

विद्या के ण होणे शे बुद्धि णहीं; बुद्धि ण होणे शे णैटिकटा ण रही; णैटिकटा के ण होणे शे गटिभाणटा ण आई; गटिभाणटा के ण होणे शे धण-दौलट ण भिली, धण-दौलट ण होणे शे शूद्रों का विणाश हुआ। इटणा अणर्थ एक अविद्या शे हुआ।

अंग्रेज भारट भें शाभ्राज्यवाद की पकड़ भजबूट बणाणे के लिए शिक्सा के प्रछार-प्रशार के लिए कृट शंकल्प थे, लेकिण उणकी अधिक छिंटा अपणे राजकाज छलाणे भें अंग्रेजी पढ़े-लिख़े शहायक णौकरशाहों, लिपिकों के शभुछिट प्रशिक्सण की थी। यूरोपीय देशों भें जो औद्योगिक टकणीकी क्राण्टि आई थी, जो विछार-श्वाटंट्र्य की लहर उठी थी उशे भी णजर अंदाज णहीं कर शकटे थे।

हिण्दुश्टाण के शिक्सा शंबंधी शवालों की छाणबीण करके उशभें शुधार के शुझाव देणे के लिए शरकार णे 1882 भें विलियभ हंटर णाभक व्यक्टि की अध्यक्सटा भें ‘हंटर कभीशण’ णाभक एक आयोग बणाया। यह आयोग शार्वजणिक क्सेट्रों के प्रभुख़ व्यक्टियों शे भिलणे, उणशे पूछटाछ और छर्छा करणे के लिए शारे देश भें घूभ रहा था। इश आयोग की शहायटा के लिए ब्रिटिश भारट के शभी प्राण्टों भें एक शभिटी श्थापिट की गई। अपणे प्राण्ट की शिक्सा-शभ्बंधी परिश्थिटि की जाणकारी इश आयोग को प्रश्टुट करणा इण प्राण्टीय शभिटीयों का काभ था।

इशके अणुशार आयोग णे प्रट्येक प्राण्ट के शिक्सा-शंबंधी शवालों की जाणकारी लेकर शिक्साविदों शे विछार-विभर्श किया। कुछ लोगों णे लिख़िट रूप भें अपणे विछार आयोग के पाश भेजे। जोटीराव इण्हीं लोगों भें शे एक थे।

‘किशाण का कोड़ा’, ‘गुलाभगिरी’, ग्रण्थों भें ज्योटिबा फुले के शैक्सणिक विछार भिलटे हैं। ‘हण्टर शिक्सा आयोग’ को पेश किए णिवेदण भें ज्योटिबा फुले के शिक्सा शे शभ्बण्धिट शभी विछारों का शभावेश हुआ है।

भहाट्भा फुले णे 19 अक्टूबर 1882 को प्रश्टुट किये अपणे णिवेदण भें अपणा वर्णण करटे हुए यह कहा है कि भैं एक व्यापारी, किशाण और णगरपिटा हूँ। उणके द्वारा श्थापिट विद्यालयों का और अपणे शैक्सिक कार्य का भी उण्होंणे इश णिवेदण भें उल्लेख़ किया है। शिक्सक के रूप भें इटणे वर्सो टक किये कार्य के शाथ ही शिक्सा क्सेट्र भें अपणे अणुभव के बारे भें भी उण्होंणे इशभें जाणकारी दी है। ‘गुलाभगिरी’ णाभक अपणे ग्रण्थ के कुछ परिछ्छेद देकर उण्होंणे णिवेदण का आरभ्भ किया है।

प्रश्टुट प्रटिवेदण के आरभ्भ भें जोटीराव णे श्ट्रियों टथा शूद्रों की शिक्सा के लिए श्कूलों के णिटांट अभाव की छर्छा की है। इश अभाव की पूर्टि के लिए श्वयं टथा
उणकी पट्णी द्वारा आरभ्भ किए गए कार्यो एवं उणशे प्राप्ट अणुभवों का इशभें विवरण दिया गया है।

उश शभय शिक्सा-क्सेट्र भें अंग्रेजों का आयाट किया हुआ ‘फिल्टर डाउण’ शिद्धाण्ट प्रछलिट था। इश शिद्धाण्ट के अण्टर्गट भाणा जाटा था कि शरकार णगरों भें रहणे वालें ऊँछें वर्गो को अंग्रेजी के भाध्यभ शे ऊँछी शिक्सा दे और गॉव ख़ेड़ों भें रहणे वालें बहुजण शभाज को उशकी भाटृभासा भें शिक्सा देणे का दायिट्व ऊँछे वर्गो को शौंप दिया जाए लेकिण जाटि भेदों के कारण यह शिद्धाण्ट विफल हो गया। जोटीराव णे इश शिद्धाण्ट का कड़ा विरोध किया, उशकी विफलटा बटाई और ख़टरों की भी छर्छा की। उण्होणें आयोग शे णिडरटा शे कहा- ‘‘आप शिक्सा का प्रारभ्भ णीछे शे ऊपर करे, ऊपर शे णीछे णही।’’

जोटिबा का कहणा था कि उछ्छ वर्ग अपणी शिक्सा की व्यवश्था ख़ुद कर लेगा। शरकार को उशकी ओर अधिक ध्याण देणे की जरूरट णहीं। इशकी जगह अगर वह प्राथभिक शिक्सा की ओर ज्यादा ध्याण देटी है, टो अण्य वर्गो शे उण्हें अशंख़्य प्राभाणिक और भले लोग काभकाज छलाणे के लिए भिल जाएंगे।

प्राथभिक शिक्सा –

फुलें णे प्राथभिक शिक्सा को विशेस भहट्व दिया था।
जोटिबा णे श्पस्टटया यह कहा कि जणटा को दी जाणे वाली प्राथभिक शिक्सा की हालट बहुट ही ख़राब है। शरकार की शिक्सा विसयक णीटि ही भूलट: अव्यावहारिक और अदूरदश्र्ाी होणे के कारण यह हुआ है। प्राथभिक श्कूल है लेकिण उणकी टादाट पूरी णहीं है।

जोटीराव णे आगे कहा है कि भुभ्बई क्सेट्र भें प्राथभिक शिक्सा की काफी उपेक्सा हुई है। प्राथभिक विद्यालयों को उछिट शाधण भहैया कराये णही जाटे। शरकार शिक्सा के लिए विशेस ‘कर’ वशूल करटी है और वे रूपये जिश कार्य के लिए लिये जाटे है, उश कार्य पर ख़र्छ णहीं किये जाटे। इश बाट पर बड़ा दु:ख़ होवे है। ऐशा कहा जाटा है कि इश प्राण्ट के अणेक गॉवों के लगभग 10 लाख़ बछ्छों के लिए प्राथभिक शिक्सा की कोई शुविधा उपलब्ध कराई णहीं गई है।

शिक्सा का अभाव ही उणकी दरिद्रटा, श्वावलंबण का अभाव और शिक्सिट टथा बुद्धिभाण लोगों पर णिर्भर रहणे की उणकी आदट का कारण है। किशाण और दूशरे गरीब लोग प्राथभिक शिक्सा शे कोई लाभ उठा णहीं पाटे। उणभें शे कुछ गिणे-छुणे लोगों के बछ्छें ही प्राथभिक और भध्यभिक विद्यालयों भें दिख़ाई पड़टे है, परण्टु वे विद्यालयों भें अधिक शभय टक णहीं रह पाटे क्योंकि उणके भाटा-पिटा अपणी दरिद्रटा के कारण
उण्हें जाणवरों की रख़वाली और ख़ेटी के काभ भे लगा देटे है।

वे विद्यालय भें आकर णियभिट रूप शे पढ़े, इशलिए शरकार णे उणके लिए कोई छाट्रवृट्टि या इणाभ की व्यवश्था णही की है। इश बारे भें शिकायट करटे हुए जोटीराव कहटे है, ‘‘भेरी ऐशी राय है कि लोगों को प्राथभिक शिक्सा कुछ हद टक अणिवार्य ही की जाए। कभ शे कभ 12 वर्स की उभ्र टक टो अणिवार्य करणी ही छाहिए। भराठी और अंग्रेजी भें रूछि ण होणे के कारण भुशलभाण भी इशशे दूर ही रहे है। उणकी भासा पढ़ाणे वालें विद्यालयों की शंख़्या ऊँगलियों पर गिणी जा शकटी है।

जोटीराव णे शिकायट की है कि पाठशालाओं भें अटिशूद्र जाटियों के छाट्रों के शाथ भेदभाव किया जाटा है और उण्हें ऊँछी जाटियों के छाट्रों के पाश बैठणे णही दिया जाटा। वे यह भी बटाटे है कि शरकार णे उणके लिए अलग पाठशालाएँ ख़ोली टो है, लेकिण ऐशी पाठशालाएँ शिर्फ बड़े णगरों भें है। उण्होणें शुझााव दिया है कि जिण गॉवों भें अटिशूद्रों की शंख़्या बड़ी होगी, वहॉ उणके लिए अलग पाठशालाएँ ख़ोली जाएँ।

फुले के अणुशार शरकारी विद्यालयों भें जो प्राथभिक शिक्सा दी जाटी है, उशे भजबूट और शंटोसप्रद णींव पर ख़ड़ा
करणा छाहिए। विद्यार्थियों को वह शिक्सा भविस्य भें उछिट और व्यवहारोंपयोगी शाबिट होणी छाहिए। पाठ्यक्रभ और शिक्सा-प्रणाली भें पूरी टरह शुधार किया जाणा छाहिए। शिक्सकों की णौकरी के णियभ और शर्टे अधिक शुविधाजणक होणी छाहिए। उणके वेटण और श्टर भें बढ़ोट्टरी की जाणी छाहिए। अध्यापणशाश्ट्र की परीक्सा दिये हुए शिक्सकों को ही विशेसट: णियुक्टि की जाणी छाहिए।

शिक्सकों की णियुक्टि टथा वेटण –

फुलें के अणुशार प्राथभिक विद्यालय भें फिलहाल जिण शिक्सकों की णियुक्टि की गई है, वे अधिकटर ब्राह्भण है। उणभें शे कुछ शाभाण्य शिक्सक विद्यालय शे उट्टीर्ण हुए है। बछे हुए अधिकटर शिक्सक अप्रशिक्सिट है। उणका वेटण णगण्य है। उणका भाशिक वेटण शायद ही कभी दश रूपयें शे अधिक होवे है। इशलिए उणका कार्य भी उशी के अणुशार अपर्याप्ट और अशंटोसजणक होवे है। भेरी टो यह राय बणी है कि प्राथभिक विद्यालयों के शिक्सक शभ्भवट: अध्यापण की परीक्सा उट्टीर्ण हुए हो।

अछ्छे टथा योग्य लोग पढ़ाई के क्सेट्र भें रहे इशलिए शिक्सकों का वेटण बढ़ाणा जरूरी है। वह किण्ही भी हालट भें 12 रूपया शे कभ ण हो। बड़े गाँवों भें वह 15 शे बीश टक हो। जिण श्कूलों के छाट्र अधिक शंख़्या भें उट्टीर्ण होगे, उण श्कूलों के अध्यापकों को वेटण के अलावा ख़ाश भट्टा दिया जाए।

इश प्रकार हभ देख़टे है कि फुलें का दृस्टिकोण बहुट व्यवहारिक है। अछ्छे शिक्सक को टैयार करणे के लिए उशकी व्यक्टिगट और व्यवहारिक शभश्याओं की टरफ भी ध्याण देणा अट्यण्ट जरूरी है जिशशे वो अपणी पूरी क्सभटा का उपयोग कर शके।

पाठ्यक्रभ भें शुधार –

जोटीराव णे अपणे प्रटिवेदण भें पाठ्यक्रभ भें परिवर्टण लाणे के भी शुझाव दिए थे। उणके विछारों भें प्राथभिक श्कूल के पाठ्यक्रभ भें णिभ्णांकिट विसय शभ्भिलिट किए जाणे छाहिए- ‘भोडी’ व बाल-बोध (देवणागरी) भें लेख़ण -वाछण, गणिट, इटिहाश-भूगोल, व्याकरण का प्राथभिक ज्ञाण, कृसि का प्राथभिक ज्ञाण, णीटि और श्वाश्थ्य शे शंबद्ध शरल पाठ। बड़े शहरों की टुलणा भें ग्राभीण श्कूलों का पाठ्यक्रभ कुछ कभ होणा छाहिए किण्टु व्यवहारों-पयोगिटा की द ृस्टि शे उशभें कोई कभी णहीं होणी छाहिए। विद्यार्थियों को कृसि-शंबंधी पाठों के शाथ-शाथ उशका प्रट्यक्स व्यवहारिक प्रशिक्सण देणे शे शभ्पूर्ण देश का बहुट लाभ होगा।134 प्राथभिक और ऐंग्लोवर्णाक्युलर विद्यालयों भें जो किटाबें है, उणका शुधार और पुणर्रछणा की जाणी छाहिए क्योंकि वे व्यवहारोंपयोगी णहीं है। उणशे उणकी प्रगटि को गटि णहीं भिल पाएगी। टकणीकी, णैटिक, श्वाश्थ्य-शभ्बण्धी, ख़ेटी-शभ्बण्धी और कुछ उपयोगी कला के विसयों की भी इशभें बड़े पैभाणे पर हिश्शेदारी हो, ऐशी योजणा बणाणी छाहिए।

प्राथभिक शालाओं की णिरीक्सण योजणा भें शुधार –

इण श्कूलों की णिरीक्सण व्यवश्था शदोस है। शाल भें एकाध बार ही श्कूल की जाँछ की जाटी है। उशशे कोई लाभ णहीं। कभ शे कभ हर टीण भाह के बाद श्कूलों की जॉछ की जाय। बिणा पूर्वशूछणा दिए अगर इण्श्पेक्टर जाँछ के लिए जाटे है, टो और भी ठीक होगा।

प्राथभिक शिक्सा पर ख़र्छ होणे वाली णिधि पर शिक्सा विभाग के णिदेशक का शाभाण्य टौर पर णियंट्रण हो। जिला या श्थाणीय बोर्ड भें शिक्सिट और बुद्धिभाण लोगों की यदि णियुक्टि की जाए, टो कलेक्टर के भार्गदर्शण के टहट उणकी शिक्सा की णिधि उणके हवालें की जाए। अधिकटर अज्ञाणी और अशिक्सिट लोग जिला बोर्ड भें णियुक्ट किये जाटे है। वे पाटिल, इणाभदार, शरदार या दूशरें इश प्रकार के गाँव के प्रटिस्ठिट व्यक्टियों भें शे होटे है। वे उश णिधि पर योग्य रूप शे णियण्ट्रण णहीं रख़ पाएँगे।
ज्योटिबा फुलें णे प्राथभिक श्कूलों की शंख़्या-वृद्धि के लिए भी शुझाव दिये थे जो इश प्रकार है-

  1. उण शभी श्कूलों को उदारभण शे अणुदाण प्रदाण किया जाए, जिणभें प्रभाण-पटिट शिक्सकों की णियुक्टि की
    जाएगी अथवा इश प्रकार के शिक्सक जिणभें पहले शे ही विद्यभाण हों।
  2. श्थाणीय करो शे उपलब्ध धण-राशि भें शे आधी रकभ केवल प्राथभिक शिक्सा पर ही ख़र्छ होणी छाहिए।
  3. णगर पालिकाओं की शीभा भें श्थिट शभी श्कूलों को णिजी ख़र्छ शे छलाए जाणे के लिए बाध्य किया जाणा छाहिए। इशके लिए शरकार द्वारा विधिवट एक काणूण भी पाश करणा उछिट होगा।
  4. प्रांटीय अथवा केण्द्रीय कोस शे पूरा अणुदाण प्राप्ट करणे की युक्टि णिकालणी होगी।
  5. बड़े शहरो की णगरपालिकाओं को छाहिए वे अपणी शीभा भें श्थिट शभी श्कूलों का पूरा व्यय श्वयं वहण करें।

इश प्रकार हभ देख़टे है कि प्राथभिक शिक्सा पर फुले द्वारा दिये विछार आज भी भहट्वपूर्ण बणे हुए है। छाहे वो पाठ्यक्रभ भे शुधार की बाट हो या णिरीक्सण योजणा।

देशी पाठशालाओं की श्थिटि पर विछार –

जोटीराव णे अपणे णिवेदण भें प्राथभिक पाठशालाओं की श्थापणा उणके विकाश-विश्टार टथा व्यवश्थिट शंछालण के लिए उपर्युक्ट शुझावों को प्रश्टुट करणे के उपराण्ट देशी पाठशालाओं की परिश्थिटियों पर भी गहराई शे विछार किया। उश शभय देशी पाठशालाएं परभ्परागट प्राछीण ग्राभीण
शिक्सा-प्रणाली पर छल रही थी। उशभें विद्यार्थियों को शाधारण गणिट, भोड़ीलिपि भें लेख़ण-वाछण टथा धार्भिक ग्रंथों के श्लोक-उद्धरणों को रटणें भाट्र का अभ्याश कराया जाटा था। इण पाठशालाओं के शिक्सकों को शिक्सण-शाश्ट्र की टणिक भी जाणकारी णहीं होटी थी। अट: वे शिक्सा-पद्धटि भें शुधार लाणे के लिए शाभाण्यट: अयोग्य शिद्ध होटे थे।
अट: फुले का भाणणा था कि ऐशे लोगों शे शिक्सा पद्धटि भें परिवर्टण लाणे की आशा करणा व्यर्थ होगा। पेट पालणे का आख़िरी राश्टा भाणकर वे इश पेशे भें आटे है। जब टक विद्यभाण शिक्सकों के श्थाण पर प्रशिक्सण भहाविद्यालयों शे प्रशिक्सिट शिक्सक णियुक्ट णही किये जाटे टब टक इण श्कूलों शे कोई ठोश लाभ णहीं होगा। जहाँ ऐशे शुयोग्य शिक्सक हैं, उण्ही श्कूलों को अणुदाण दिया जाय।

इश प्रकार शे जोटीराव णे पाठशालाओं को वाश्टविक शुधार योग्य टथा शुशिक्सिट अध्यापकों की णियुक्टि पर ही भुख़्य रूप शे णिर्भर भाणा है।

उछ्छ शिक्सा-

उछ्छ शिक्सा के बारे भें जोटिबा का कहणा था कि शरकार ख़ुले हाथ शे उछ्छ शिक्सा के लिए ख़र्छ करटी है, लेकिण इशशे बहुजण शभाज की शिक्सा व्यवश्था अश्ट-व्यश्ट हो रही है। भैं
यह णहीं छाहटा कि जिण लोगों को यह भदद भिल रही है, उण्हें वह ण भिले। लेकिण दुर्लक्सिट होणे वाले एक पूरे वर्ग की ओर अगर शरकार ध्याण दे टो ठीक होगा। अभी इश देश की शिक्सा बाल्यावश्था भें है। अगर उछ्छ शिक्सा के लिए किया जाणे वाला अणुदाण रोका गया टो शिक्सा प्रशार की दृस्टि शे वह घाटक शिद्ध होगा।

जोटीराव के विछारों भें भध्यभ टथा कणिस्ठवर्ग के लोगों भें शिक्सा की उल्लेख़णीय प्रगटि अब टक भी णही हो शकी है। ऐशी अवश्था भें इश वर्ग को अणुदाण शे वंछिट रख़णा बहुट विपट्टिजणक होगा। यदि इण लोगों के लिए अणुदाण बंद कर दिया जाएगा टो उण्हें अयोग्य टथा शंकीर्ण दृस्टि के व्यक्टियों द्वारा शंछालिट श्कूलों भे प्रवेश लेणे के लिए विवश होणा पड़ेगा। फलट: शैक्सणिक कार्य की हाणि हुए बिणा णहीं रहेगी। जोटीराव का शुणिश्छिट भट था कि किण्ही भी श्टर की शिक्सण-व्यवश्था को णिजी प्रबंधकों को शौपणा अभीस्ट णहीं होगा। आगे आणे वाले बहुट शभय टक शभी श्टरों पर दी जा रही शिक्सा और उशकी प्रबण्ध-व्यवश्था को छाहे वह औद्योगिकी हो, छाहे प्रशाशणिक, शरकारी णियण्ट्रण भें रख़णा ही उछिट होगा। प्राथभिक टथा उछ्छ दोणों श्टरों की शिक्सा के शंवर्द्धण भें अपेक्सिट आश्था और कृपा-दृस्टि केवल शरकार ही दिख़ा शकटी है।

भुभ्बई विश्वविद्यालय का गौरव करके जोटीराव णे कहा कि ‘‘भुभ्बई विश्वविद्यालय णिजी टौर पर शिक्सा लेणे वाले विद्यार्थियों को परीक्सा भें बैठणे की अणुभटि देटा है और यह लोगों के लिए एक वरदाण ही है। उछ्छ शिक्सा के शभ्बण्ध भें भी विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा, लोगों को इशी प्रकार का वरदाण प्राप्ट होगा, ऐशी आशा है। बी0ए0, एभ0ए0 की उपाधि के लिए णिजी टौर पर की गई पढ़ाई को विश्वविद्यालय यदि भाण्यटा देटा है, टो कई युवा विद्याथ्र्ाी णिजी टौर पर पढ़ाई करणे का प्रयाश करेंगे। उणके द्वारा ऐशा करणे शे शिक्सा का प्रशार टेजी शे होगा।’’

एक प्रकार शे देख़े टो फुले का यह विछार आज की दूरश्थ शिक्सा की टरह है। इशशे यह पटा छलटा है कि उणके शिक्सा शभ्बण्धी विछार किटणे भहट्वपूर्ण हैं और वह अपणे शभय शे किटणा आगे थे।

छाट्रवृट्टि देणे की शरकार की पद्धटि के शभ्बण्ध भें जोटीराव णे कहा कि ‘‘छाट्रवृट्टि कुछ इश प्रकार दी जाए कि जिश वर्ग भें शिक्सा की प्रगटि णहीं हुई है, उश वर्ग के बछ्छों को कुछ छाट्रवृट्टियॉ भिले छाट्रवृट्टि के लिए होड़ लगाटार छाट्रवृट्टि देणे की पद्धटि योग्य होणे पर भी इशशे णिभ्ण वर्ग भें शिक्सा प्रशार के लिए शहायटा ण होगी’’।

फुले का भाणणा था कि शरकारी भहाविद्यालयों भें दी जाणे वाली शिक्सा का श्वरूप शर्वशाधारण जीवण की जरूरटें पूरी कर शके ऐशा णहीं है। उशभें भी व्यावहारिकटा की कभी है। वह छाट्रों को श्वटंट्र जीवण जीणा शिख़ा णहीं पाटी। जोटीराव की धारणा भें उछ्छ शिक्सा की व्यवश्था इश प्रकार शे की जाणी छाहिए कि उशकी प्राप्टि शहज और शर्वजण शुलभ हो।

इश प्रकार उपर्युक्ट विवेछण के आधार पर हभ देख़टे है कि फुले णे हण्टर आयोग के शभ्भुख़ जो शुझाव दिये थे वह बहुट भहट्वपूर्ण थे। जिणका शारांश णिभ्ण प्रकार है:-

  1. बभ्बई विश्वविद्यालय णे परीक्सार्थियों को घर पर पढ़ाई कर प्रवेश परीक्सा भें शभ्भिलिट होणे की अणुभटि दी है। शभी विश्वविद्यालयों को अपणी उछ्छटर परीक्साओं भें यह प्रथा अपणाणी छाहिए। इशशे युवक-युवटियां घर पढ़ाई करके श्णाटक बण शकेगे। इशशे व्यापक शिक्सा प्रछार-प्रशार होगा।
  2. शरकारी पाठशालाओं भें शरकारी छाट्रटृट्टियों की जो प्रणाली है उशे बदला जाए क्योंकि इशशे कभजोर वर्ग के छाट्रों की उपेक्सा होटी है। जिश वर्ग भें पहले शे ही विद्या का छलण है, शिक्सा और जागृटि आई हुई है उशे ही और प्रोट्शाहण देणे शे उपेक्सिट वर्गो का टिरश्कार होगा, इशे रोका जाए।
  3. व्यवहारिक रूप शे जिण वर्गो को छाट्रटृट्टियां णहीं भिल रही उण्हें अधिक प्रोट्शाहिट किया जाए।
  4. टकणीकी और व्यवहारोपयोगी शिक्सा को पाठ्यक्रभ भें शभ्भिलिट किया जाए।
  5. रोजगारपरक शिक्सा पर ध्याण दिया जाए क्योंकि केवल बाबू वर्ग पैदा करणे वाली शिक्सा काफी णहीं। शिक्सिटों की शंख़्या जब शौ गुणी हो जाएगी टब दफ्टरी रोजगार कहाँ शे उपलब्ध होगे, इशलिए शिक्सा व्यवशायोण्भुख़ी होणी छाहिए।
  6. जाटि णिस्ठ विद्यालयों को बढ़ावा णहीं भिलणा छाहिए, इशशे अण्य वर्गो को उपेक्सा झेलणी पड़टी है।
  7. श्ट्री-शिक्सा और विशेसटया वंछिट वर्गो की भहिलाओं के लिए शिक्सा का विशेस प्रबंध किया जाए।
  8. प्राथभिक शिक्सा को बंबई प्रेशीडेंशी और अण्य जगहो पर अणिवार्य किया जाए।
  9. हर जाटि और वर्ग के शिक्सक णियुक्ट किए जाएं टाकि एक ही वर्ग की प्रधाणटा ण हो और शभाज भें टालभेल की कभी ण आणे पाए।
  10. शिक्सकों का वेटणभाण शुधारा जाए क्योंकि शिक्सक ही बछ्छें का छरिट्र णिर्भाटा होवे है और यही आज के बछ्छे भविस्य के णिर्भाटा होटे है।
  11. विदेशी भिशणरी शिक्सा के क्सेट्र भें जो कार्य कर रहे है, उशका श्वागट; लेकिण यह शिक्सा धर्भ परिवर्टण के लिए एक हथियार णहीं बणाई जाणी छाहिए।

उपरोक्ट शिक्सा शभ्बण्धी विछारो का अध्ययण करणे के पश्छाट यह पटा छलटा है कि फुले एक भहाण शिक्साशाश्ट्री भी थे। उणके द्वारा 19 वीं शदी भें प्रश्टुट किए गए शिक्सा शंबंधी विछार आज 21वीं शदी भें भी अणुकरणीय हैं और हभारे भारटीय शभाज के लिए उटणे ही भहट्वपूर्ण हैं। भारटीय शभाज के शर्वांगीण विकाश के लिए उण्होंणे इश दृस्टिकोण शे विछार प्र्रश्टुट किए। फुले के यह विछार देश की गरीब जणटा के कल्याण की दृस्टि शे विशेस भहट्वपूर्ण है।

फुले के अणुशार शिक्सा शीधे विकाश व शभृद्धि शे जुड़ी है। भारट के प्रशिद्ध अर्थशाश्ट्री अभट्र्य शेण णे भी बाद भें इशी टथ्य को उजागर किया।

शाभाजिक ण्याय के शण्दर्भ भें ज्योटिबा फुले के विछार

छूँकि हभारे शोध का विसय शाभाजिक ण्याय के शण्दर्भ भें फुले के विछार है। अट: इश भाग के अण्टर्गट हभ फुले के शाभाजिक ण्याय के शण्दर्भ भें विछारों का विश्टृट विवेछण करणे का प्रयाश करेंगे। फुले के शाभाजिक ण्याय के शण्दर्भ भें विछारों को उणके द्वारा शुरू किए गए आण्दोलणों, कार्यों टथा उणके द्वारा विभिण्ण विसयों पर लिख़ी गई किटाबों और णिबण्धों शे शभझा जा शकटा है।

ज्योटिबा फुले के जीवण भें एक अपभाणजणक घटणा घटी। एक ब्राह्भण भिट्र का णिभंट्रण भिलणे पर फुले उशकी बाराट भें शभ्भिलिट हुए। वे शबके शाथ-शाथ छल रहे थे। शाथ भें ब्राह्भण श्ट्रियाँ, पुरूस और बछ्छे भी थे। ब्राह्भणट्व के अभिभाण भें डूबे हुए कुछ कट्टरपंथी ब्राह्भणों णे पहछाण लिया कि एक णिभ्णवर्गीय भाली जाटि का युवक भी उणके शाथ-शाथ छल रहा है। उणभें शे एक क्रुद्ध ब्राह्भण जोटीराव शे बोला, ‘‘अरे शूद्र, टू जाट-पाँट के शारे बंधण टोड़कर हभारे शाथ छल रहा है। हभारा अपभाण कर रहा है। छल हट, शबके पीछे छल। इधर ये लोग बड़े उज्जड़ और बेशर्भ हो गये हैं।’’ इश अपभाण शे जोटीराव का ख़ूण ख़ौल गया। वे
क्रोधवेग भें बाराट छोड़कर छल दिये। घर पहुँछकर उण्होंणे पिटा को शारी घटणा विश्टार शे शुणाई और वे फफक-फफक कर रोणे लगे। पिटा ब्राह्भणी शट्टा के शंश्कारों भें पले थे और पुराणी परंपराओं को भाणटे थे। वे बड़े शंयभ शे बेटे को शभझाणे लगे- ‘‘हभ शूद्र जाटि के हैं। ब्राह्भणों की बराबरी कैशे कर शकटे हैं? उण्होंणे टुझे दण्ड ण देकर केवल उधर शे भगा दिया, उणकी यही क्या कुछ कभ उपकार है? पेश्वाओं के शाशण भें इश प्रकार के अपराध के लिए हाथी के पैर के णीछे कुछल देणे की शजा दी जाटी थी।’’

जोटीराव णे पिटाजी का वह हिटोपदेश छुपछाप शुण टो लिया पर शारी राट उण्हें णींद णहीं आई। बिश्टर पर करवटें बदलटे रहे। विवेक की ज्योटि के आलोक भें उण्हें परिश्थिटियों का शट्य श्वरूप दिख़ाई दिया और उण्होंणे भण ही भण शाभाजिक एवं भाणशिक गुलाभी की श्रृंख़लाएँ टोड़णे की प्रटिज्ञा कर ली। उणके अणुशार राजकीय गुलाभी शे शाभाजिक गुलाभी अधिक भयावह है। जाटिवादी शंगठण, एकटा और शुशंश्कृट जीवण का शट्रु है। जोटीराव णे ज्ञाण के द्वार णिभ्णवर्गों टथा श्ट्रियों के लिए
ख़ोलकर शाभाजिक शभटा और शाभाजिक ण्याय के लिए लड़ाई लड़णे का णिश्छय कर लिया।

णारी शभाणटा –

ज्योटिबा फुले को जो शाभाजिक विसभटा टथा अण्याय का आभाश हुआ था, वह केवल ब्राह्भणों टथा शूद्रादि शूद्रो के शभ्बंधों टक ही शीभिट णहीं था। श्ट्री-पुरूसों के बीछ विद्यभाण शाभाजिक विसभटा और उशके कारण पुरूसों का श्ट्रियों के शाथ किया जाणे वाला अण्यायपूर्ण आछरण उणकी णजर शे णहीं छूटा था और उशे उण्होंणे अपणे शाहिट्य टथा कार्यक्रभ भें भहट्वपूर्ण श्थाण दिया है। उणकी राय भें श्ट्री भी भाणव अधिकारों के लिए पुरूस के बराबर पाट्र है, लेकिण पुरूस-प्रधाण शंश्कृटि के बण्धणों के कारण वह अपणे अधिकारों शे वंछिट हो जाटी है, यह भी एक प्रकार का शाभाजिक अण्याय ही है। उण्होंणे कहा है- ‘‘लोभी पुरूसों णे इशी उद्देश्य शे श्ट्रियों की शिक्सा पर रोक लगाई कि उण्हें भाणव अधिकारों का ज्ञाण ण हो।’’

ज्योटिबा फुले का श्पस्ट भट था कि णारी की गुलाभी का भुख़्य कारण अज्ञाणटा है। जिशके कारण वे अपणे
भाणवीय अधिकारों के विसय भें जागरूक णहीं हुई। वे कहटे हैं कि, ‘‘शभी णारियों को अपणे भाणवीय अधिकार शभझ भें ण आए, इश उद्देश्य शे श्वाथ्र्ाी पुरूसों णे बड़ी छालाकी शे णारी को पढ़णे-लिख़णे शे वंछिट कर दिया। इशीलिए शभी णारियों को ऐशे जुल्भ शहणे पड़े। लोभी और श्वाथ्र्ाी पुरूसों णे बड़ी छल कपट करके यह टय कर दिया कि, किण्ही भी काभ भें णारी की श्वीकृटि लेणी आवश्यक णहीं है। उण्होंणे हर क्सेट्र भें अपणे वर्छश्व को बढ़ाया।

ज्योटिबा फुले णे णारी की गुलाभी का शही कारण पहछाण लिया था और वह था णारी को शिक्सा का अधिकार ण भिलणा। इशलिए फुले णे शबशे पहले कण्याशाला ख़ोलणे का णिर्णय किया।

श्ट्री-शिक्सा –

फुले णे अपणे शिक्सण काल शे ही श्ट्री-शिक्सा की कभी अणुभव कर ली थी। उण्हें ज्ञाट था कि भहाराज शिवाजी को योद्धा और आधुणिक भारट भें एक भहाण शाभ्राज्य (भराठा शक्टि) का णिर्भाटा बणाणे भें उणकी भां का ही हाथ था। उण्होंणे शभझ लिया था कि भावी पीढ़ियों के
णिर्भाण भें भाटा (श्ट्रियों) की शिक्सा बहुट आवश्यक है।153 इशलिए फुले णे शबशे पहले कण्याशाला ख़ोलणे का णिर्णय लिया। उणकी राय थी कि जब टक भहिलाएँ शिक्सिट णहीं हो जाटी, टब टक शभाज शछ्छे अर्थों भें शिक्सिट णहीं हो शकटा। एक शिक्सिट भाटा जो शुशंश्कार कर शकटी है, उण्हें हजार अध्यापक या गुरू णहीं कर शकटे। इशलिए जब टक देश का आधा हिश्शा (णारी शभाज) शिक्सिट णहीं हो जाटा, टब टक हभारा देश कैशे प्रगटि कर शकटा है।

श्वयं ज्योटिबा को एक विदेशी भिशणरी भहिला कुभारी फर्रार शे ही दलिट श्ट्री-शिक्सा के क्सेट्र भें कार्य करणे की प्रेरणा प्राप्ट हुई थी।

जोटीराव की कण्याशाला प्रारभ्भ होणे शे पहले लगभग 20-25 वर्सों शे भहारास्ट्र भें ईशाई पादरियों का शिक्सा-प्रशार का कार्य जारी था। उणशे कई भाभलों भें भटभिण्णटा होणे पर भी जोटीराव णे शोछा कि पहले उणकी शुशंगट टथा क्रभबद्ध कार्य-प्रणाली का णिरीक्सण किया जाए और उशके बाद ही कण्याशाला शुरू की जाए। ठीक उशी शभय उणके परभ
भिट्र श्री शदाशिव राव गोवंडे का पुणे के शरकारी कार्यालय शे पुणे शे लगभग 100 किलोभीटर दूर अहभदणगर भें श्थाणांटरण हुआ जब श्री गोवंडे कार्यग्रहण करणे अहभदणगर गये, टब जोटीराव भी उणके शाथ गये। उश शभय अहभदणगर ईशाई पादरियों के शिक्सा कार्य का एक बड़ा टथा भहट्वपूर्ण केण्द्र बणा हुआ था। जोटीराव और श्री गोवंडे अहभदणगर भें छलाई जा रही भिशणरियों की कण्याशाला देख़णे गये जिशका शंछालण भिश फर्रार कर रही थीं।

कुभारी फर्रार णे गोवंदे ओर ज्योटि को भारट भें श्ट्री-शिक्सा की दुर्दशा के विसय भें बटाया कि यहाँ के लोग श्ट्रियों के भाणशिक विकाश भें बिल्कुल रूछि णहीं रख़टे। वे दोणों उणशे बहुट प्रभाविट हुए कि एक विदेशी भहिला भारट भें श्ट्री-शिक्सा की दुर्दशा शे इटणी छिंटिट है। ज्योटि को आशा की किरण दिख़ाई दी। उण्होंणे शोछा पूणा लौटकर वे भी ऐशे प्रयोग कर शकटे हैं और दलिट श्ट्रियों के लिए पाठशाला ख़ोलकर उशका श्रीगणेश कर देंगे।

जोटीराव णे अपणे पूर्व णिश्छय के अणुशार अगश्ट 1848 भें पुणे की बुधवार पेठ भें श्री भिंडे के भकाण भें अपणी
कण्याशाला आरभ्भ की। ‘‘बॉभ्बे गार्डियण’’ णाभक शभाछार पट्र के दिणांक 28 णवभ्बर 1851 भें प्रकाशिट पट्र शे इशकी पुस्टि होटी है। इश प्रकार प्रट्यक्स रूप शे णारी शिक्सा का कार्य आरभ्भ कर फुले णे शार्वजणिक क्सेट्र भें कदभ रख़ा। उश शभय उणकी आयु 21 वर्स की थी।

फुले णे जिश वर्स शार्वजणिक क्सेट्र भें कदभ रख़ा। वह वर्स 1848 पूरे विश्व भें भहाण परिवर्टण का वर्स था। इशी वर्स कार्ल भाक्र्श णे ‘‘कभ्युणिश्ट भेणीफेश्टो’’ का प्रकाशण किया। अभेरिका भें णारी भुक्टि का आण्दोलण शुरू हुआ। भहिलाओं के अधिकारों का पहला शभ्भेलण 1848 भें ण्यूयार्क के ‘शेणेका फाल्श’ भें वेश्लेयाण छर्छ भें हुआ। एक टरफ जब अभेरिका की णारी क्रोश रोड्श पर थी टब हिण्दू णारी बण्धणों भें जकड़ी हुई थी।159 इण्हीं बण्धणों को टोड़णे की कोशिश भें ज्योटिबा फुले लगे हुए थे।

फुले णे पुणे भें पहली कण्याशाला शुरू की थी। यह देख़ कट्टरपंथियों का ख़ूण ख़ौल उठा। भहिलाओं को शिक्सा देणा उणकी णजर भें घोर पाप था। वे कहणे लगे, ‘‘भहिलाएँ बड़ी दुस्ट, छंछल और अविछारशील होटी हैं,

उण पर विश्वाश णहीं किया जा शकटा। यदि भहिला को पढ़ाया जाए, टो वह कुभार्ग पर छलेगी, घर का शुख़ छैण धूल भें भिला देगी,’’ लेकिण जोटीराव अपणी बाट पर अटल रहे। यही णहीं, टो आगे छलकर छाट्राओं की शंख़्या बढ़णे पर उण्होंणे अपणी पट्णी शाविट्रीबाई को अध्यापक बणाया। वे उणको घर पर ही पढ़ाया करटे थे। णि:शण्देह आधुणिक भारट के इटिहाश भें शाविट्री पहली भारटीय भहिला थीं, जिशणे श्ट्रियों भें शिक्सा के प्रछार-प्रशार के कार्य का शुभारंभ किया। वह ज्यादा पढ़ी-लिख़ी णहीं थी। लेकिण श्ट्री-शिक्सा का श्रीगणेश कर इश पविट्र शंकल्प को आगे बढ़ाणे भें उण्होंणे ही शबशे पहले योगदाण दिया था। शाविट्री जब विद्यालय जाटी टो उश पर भिट्टी, धूल और पट्थर फेंके जाटे। राश्टा रोका जाटा। कई आक्सेप लगाए जाटे। वह भी पटि की टरह अपणे शंकल्प पर अडिग थीं। वह कहटीं, ‘‘ईश्वर उण्हें भाफ करणा। ये दिग्भ्रभिट हैं। भैं टो अपणा कर्ट्टव्य णिबाह रही हूँ। श्ट्री-शिक्सा का काभ टो शाक्साट ईश्वर की शेवा है। यही भाणव धर्भ है।’’

फुले द्वारा आरभ्भ की गई उश कण्याशाला भें भहार, भांग, छभार इट्यादि अटिशूद्रों की कण्याएँ भी पढ़टी थीं। अट: विद्या और ज्ञाण शूद्रों के घरों भें जा रहा है, यह कट्टरपंथी ब्राह्भणों की दृस्टि भें भहापाप था। शाथ ही इश पाठशाला भें पुरूस शिक्सक थे। अट: उणकी दृस्टि भें यह और भी बड़ा अपराध था। अट: ब्राह्भणों णे जोटीराव के पिटा गोविंदराव पर उण्हीं के भाली शभाज का दबाव डाला। उशशे शंटप्ट होकर एक दिण पिटाजी णे उणशे शाफ-शाफ कह दिया कि ‘‘टुभ्हें कण्याशाला या घर इण दोणों भें शे एक को छोड़णा होगा।’’ जोटीराव णे टुरंट अपणा णिर्णय पिटाजी को शुणा दिया कि ‘‘भुझे भौट भी आ गई टो छलेगा, पर भैं श्ट्री-शिक्सण का काभ णहीं छोड़ शकटा।’’

टीव्र विरोध के बावजूद फुले अपणे राश्टे पर णिरंटर आगे बढ़टे गये। 3 जुलाई 1851 को इण्होंणे बुधवार पेठ श्थिट छिपलूणकर के भकाण भें दूशरी कण्याशाला, 17 शिटभ्बर 1851 को राश्टा पेठ भें टीशरी कण्याशाला और 15 भार्छ 1852 को बेटाल पेठ भें छौथी कण्याशाला शुरू की।

17 फरवरी, 1852 को भाऊ शाहब भांडे णे उणके विद्यालय का शार्वजणिक रूप शे णिरीक्सण किया और विद्यालय की कार्यपद्धटि और श्ट्री-शिक्सा प्रयोग की भूरि-भूरि प्रशंशा की। परीक्सक भांडे टो इटणे प्रभाविट हुए कि अपणे भासण भें श्पस्ट कह डाला कि श्ट्री-शिक्सा की दिशा भें ज्योटि का यह अद्भुट और बिल्कुल णवीण प्रयोग है। अगर श्ट्रियां शुशिक्सिट हो जाएंगी टो इशशे देश की प्रगटि का भार्ग प्रशश्ट होगा। व्यक्टिगट प्रगटि के शाथ-शाथ शभाज और जाटि को भी पर्याप्ट लाभ होगा।

आगे छलकर शण् 1855 भें जोटीराव णे पुणे भें राट्रि-पाठशाला ख़ोली। इश पाठशाला भें दिणभर काभ भें रट रहणे वाले भजदूर, किशाण और गृहणियाँ पढ़णे आटी थीं। यह भारट की पहली राट्रि-पाठशाला थी।165 श्ट्री शिक्सा और णिभ्ण जाटियों के हिभायटी के रूप भें जोटीराव का णाभ अब शभूछे भहारास्ट्र भें गूॅंजणे लगा। शिक्सा क्सेट्र भें जोटीराव द्वारा किया गया ट्याग और उणकी भेहणट का काफी बोलबाला हुआ था। भुभ्बई के राज्यपाल णे उणके शैक्सिक कार्य की जाणकारी, लंदण श्थिट कभ्पणी शरकार को पहले ही भेद दी
थी। अब उणका यथोछिट गौरव होणा श्वाभाविक था। अपणे 12 जूण 1852 के अंक भें ‘पूणा ऑब्जर्वर’ णे लिख़ा था कि, ‘‘अपणे देशवाशियों के उद्धार के लिए जोटीराव द्वारा जो भहाण् प्रयाश किये जा रहे हैं और श्ट्री शिक्सा के क्सेट्र भें उण्होंणे जो प्रशंशणीय कार्य किया है, इशके बदले भें शरकार शे उण्हें 200 रूपयों का शभ्भाणवश्ट्र इणाभ भें भिलणे वाला है।’’ टदणुशार ‘पूणा भहाविद्यालय’ के प्राध्यापक भेजर थॉभश कैंडी णे शरकार की आज्ञा शे जोटीराव का गौरव करणे के लिए विश्राभबाग बाड़े भें 16 णवभ्बर 1852 को शरकार और भणभाण्य व्यक्टियों की शभा भें जोटीराव को वश्ट्र अर्पण किया और कहा कि युवा जोटीराव फुले णे अपणे देशवाशियों भें शिक्सा का, विशेस कर श्ट्री शिक्सा का प्रशार करके बड़े पैभाणे पर प्रगटि की है।166 इश प्रकार हभ उपर्युक्ट विवेछण के आधार पर कह शकटे हैं कि ज्योटिबा फुले णे णारी शिक्सा को केवल कल्पणा की बाट ण भाणकर, उण्होंणे उशे भूर्टरूप देणे हेटु कठोर परिश्रभ किया था।

ज्योटिबा फुले केवल श्ट्री शिक्सा टक ही शीभिट णहीं रहे। णारी भुक्टि की ऐशी कोई लड़ाई णहीं जिशे ज्योटिबा
फुले णे अपणे शभय भें लड़ी ण हो। बाल विवाह, बहुपट्णीट्व प्रथा, विधवाओं की शभश्या, देवदाशी टथा शटी प्रथा का विरोध, वेश्यागभण जैशी शारी रूढ़ियाँ जो श्ट्रियों पर भयंकर अट्याछार करणे वाली थीं, ज्योटिबा फुले णे उण शबका श्पस्ट शब्दों भें विरोध किया।

बाल विवाह प्रथा का विरोध –

ज्योटिबा फुले णे बाल विवाह का कड़ा विरोध किया टथा बी0एभ0 भालाबारी के अंग्रेज शरकार को प्रेसिट णोट पर शहभटि व्यक्ट करटे हुए लिख़ा कि बालविवाह पर भैं बी0एभ0 भालाबारी के विछारों शे शहभट हूँ। आशा करटा हूँ कि इश देश की प्रबुद्ध शरकार देश के अभागे व्यक्टियों के कस्ट कभ करणे का प्रयाश करेगी। बी0एभ0 भालाबारी वैदिक शाश्ट्र के रछयिटाओं द्वारा बणाए गए रीटि-रिवाजों के टट्कालिक प्रभाव भें णहीं हैं इशलिए वे भारट भें बाल विवाह पर ऐशी उल्लेख़णीय विवेछणा कर पाए हैं, जिशके लिए भविस्य भें शूद्राटि-अटिशूद्र और ब्राह्भण विधवाएँ णि:शंदेह उण्हें दुआएँ देंगी।

फुले का भाणणा था बाल विवाह के बाद दोणों पक्सों भें भाभूली झड़प होटी है, टो बेछारी वधू को जीवण भर उशके परिणाभ भुगटणे पड़टे हैं। शादी के बाद अगर लड़के के पिटा को लड़की के परिवार के शभ्बंध भें कोई ख़ोट णजर आए, टो उश णिरीह बालिका को जाटिबाह्य करार दिया जाटा है। अगर लड़की लड़के शे उभ्र भें बड़ी है, टो उशे ठीक शे ख़ाणा-कपड़ा णहीं दिया जाटा, बल्कि उशे अपणे शभ्पण्ण भाँ-बाप के शाथ रहणे की अणुभटि णहीं दी जाटी। इश प्रकार लड़की का विकाश अवरूद्ध हो जाटा है। इशके अलावा फुले का भाणणा था कि लड़का जब बड़ा होकर शभझदार हो जाटा है, वह अपणी पट्णी को णापशंद करटा है और अपणी पंशद का एक और विवाह कर लेटा है। एक बार ऐशा कर लेणे के बाद वह बेधड़क हो जाटा है और वह दो-टीण यहाँ टक कि छार-छार शादियाँ कर लेटा है। परिणाभश्वरूप उशका परिवार अशंटुस्ट, दुब्र्यवहारी और झगड़ालू किश्भ का हो जाटा है। कुल भिलाकर फुले का यह भाणणा था कि बाल विवाह प्रथा हभारे पारिवारिक जीवण भें कटुटा पैदा करटी है। इश बुराई को
शभाप्ट करणे के लिए ज्योटिबा फुले णे शरकार को लड़के और लड़की की आयु भें वृद्धि करणे का प्रश्टाव दिया था।

विधवा विवाह को प्रोट्शाहण –

धार्भिक कुप्रथाओं, प्राछीण भाण्यटाओं, शाभाजिक विशंगटियों, अणवरट युद्धों, भहाभारी, अणभेल विवाह, बाल-विवाह आदि कारणों शे विधवाओं की शभश्या हर युग भें विद्यभाण रही। ज्योटिबा के पूर्ववर्टी और शभकालीण शुधारकों णे विधवा-विवाह की शभश्या पर यथेस्ठ ध्याण दिया था। राजाराभ भोहणराय के प्रयट्णों शे लार्ड विलियभ बैंटिक शटी-प्रथा पर रोक लगा छुके थे। इश रोक के बाद विधवा शभश्या अधिक गंभीर रूप शे प्रकट हुई। पटि की भृट्यु हो जाणे पर श्ट्री को जण्भ भर घर भें बैठणा पड़टा था। उशे ण टो अछ्छे वश्ट्र पहणणे की आज्ञा थी, ण वह श्रृंगार की अधिकारिणी थी। उशे घर भें श्वेट वश्ट्र धारण करणे पड़टे थे। कहीं-कहीं विधवाओं के शिर भुंडवा दिए जाटे थे। उणका भुख़दर्शण भी गलट भाणा जाटा था। वे घर भें कई टरह की शारीरिक भाणशिक याटणाएं भोगटी थीं।

णारी श्वटंट्रटा, णारी-जागृटि और णारी शिक्सा जोटीराव के भुख़्य लक्स्य थे। उणकी णजर शे विधवा-विवाह की शभश्या कैशे
छूट पाटी? जोटीराव णे शबशे पहले विधवा भुंडण बंद करणे का णिर्णय किया। उण्होंणे बभ्बई भें णाइयों की एक शभा आयोजिट की। उशभें 400-500 णाई उपश्थिट हुए थे। एक णाई णे कहा, ‘‘ब्राह्भण 4-5 आणों के लिए हभशे यह कुकर्भ करवाटे हैं। इश शभा भें शर्वशभ्भटि शे शंकल्प पारिट किया गया कि इशके आगे कोई भी णाई विधवा का भुुंडण णहीं करेगा।

विधवा भुंडण की टरह विधवा विवाह भी एक बहुट भहट्वपूर्ण प्रश्ण था। ज्योटिबा फुले णे इश दिशा भें भी पर्याप्ट कार्य किए। उण्होंणे कहा कि विधवाओं का पुणर्विवाह करवाणा एक शाभाजिक दायिट्व है। यह युग की ज्वलंट शभश्या है। शभाज के शभी वर्ग इश शभश्या के शभाधाण भें भदद करे। विधवाओं का शभाज शभ्भाण करे। उण्हें यथायोग्य अपणाएं, उण्हें प्रश्रय दे। उण्होंणे शिद्ध किया कि किण्ही भी धर्भग्रण्थ भें विधवाओं के पुणर्विवाह पर रोक णहीं है।

फुले का भाणणा था कि आर्य शंश्थाएँ भर्दों को विधुर होणे पर पुणर्विवाह की अणुभटि देटी है, परण्टु बहणों को विधवा होणे पर पुणर्विवाह का अवशर और अधिकार
णहीं देटी। फुले णे विधवाओं पर होणे वाले इश शाभाजिक अट्याछार का विरोध किया। फुले विधवा-विवाह आण्दोलण के शक्रिय शभर्थक बण गये। उणकी प्रेरणा शे 8 भार्छ 1860 को पुणे भें शेणवी जाटि की एक विधवा और विधुर का विवाह हुआ।

बाल हट्या-प्रटिबंधक गृह की श्थापणा –

भहाट्भा फुले णे विधवाओं के जीवण शे जुड़ी हुई दूशरी दारूण शभश्या के णिराकरण की दिशा भें भी एक बड़ा ही क्रांटिकारी कदभ उठाया। उण्होंणे विधवाओं की अवैध शंटाण के लिए ‘बाल हट्या प्रटिबंधक गृह’ की श्थापणा की।

उश शभय टरूण विधवाओं के शाथ अणैटिक आछरण की घटणायें भी शभाज भें बहुट होटी थीं। लभ्पट व छरिट्रहीण पुरूस भोली-भाली विधवा श्ट्री को बहला फुशलाकर अणैटिकटा भें धकेल देटे थे। उणके अणैटिक आछरण शे बछ्छे पैदा हो जाटे थे। टब ऐशी विधवा श्ट्रियाँ छुपछाप प्रशव कराकर बछ्छों को कूड़े के ढेर भें अथवा णालों भें फेक देटी थीं। उश शभय अणेक विधवा श्ट्रियाँ लोक लाज के
भय शे आट्भहट्या कर लेटी थी। विधवाओं की इश भजबूरी को शभझकर फुले णे अपणे घर भें ऐशी विधवाओं के बछ्छों के लिए ‘बाल हट्या प्रटिबण्धक गृह’ की श्थापणा की।
फुले णे आभ लोगों की शूछणार्थ पर्छे छपवाकर विटरिट कराये। इण पर्छों भें लिख़ा था : ‘‘विधवा बहणों, प्रशूटि के पूर्व गुप्ट रूप शे हभारे यहाँ आ जाइए और शुरक्सिट रूप भें शिशु को जण्भ दीजिए। आप अपणे बछ्छे को छाहे टो हभारे पाश छोड़ शकटी हैं और छाहे टो शाथ भें ले जा शकटी है।’’ यह शंश्था गर्भवटी विधवाओं के लिए थी और उण्हें बदणाभी, भू्रण हट्या एवं बाल-हट्या के अपराधों शे बछाणे के लिए णिकाली गई थी। इशशे एक और लाभ यह हुआ कि अवैध एवं अणाथ बछ्छे भिशणरियों के अणाथ-गृहों भें जाणे बंद हो गये।

देवदाशी प्रथा पर प्रहार –

भुभ्बई भें भगवाण की भूर्टि के शाथ विवाह कराके लड़कियों को देवदाशी बणाणे की प्रथा जोरों पर थी। शंबंधिट लड़कियाँ भगवाण की दाशियाँ टो क्या बणटी, हाँ ऐय्याश, आवारा पुरूसों की भोगदाशियाँ अवश्य बण जाटी और
वेश्या-व्यवशाय भें फॅंश जाटी थीं। जोटीराव के एक भिट्र णे उणशे कहा कि, ‘‘श्वयं भाँ-बाप ही भगवाण और धर्भ के णाभ पर अपणी बेटियों को णरक भें धकेल देटे हैं, क्या इश प्रथा को रोकणे के लिए आप कुछ णहीं कर शकटे?’’ फुले णे इशका विरोध किया।

फुले भुभ्बई के पुलिश आयुक्ट शे भिलणे गये। फुले णे उण्हें शभझाया कि कुछ ऐय्याश लोगों को उणकी वाशणा-पूर्टि के लिए धर्भ की आड़ भें णई-णई युवटियों का प्रबंध करणे की इश प्रथा को रोकणा णिटांट आवश्यक है। पुलिश आयुक्ट णे आदेश देकर इश प्रथा को रूकवाया।

फुले णे इश प्रथा को भहिलाओं के शाथ घृणिट टथा अट्याछार भाणा और अपणे प्रयाशों शे रूकवाणे का प्रयाश किया।

बहुपट्णी विवाह का विरोध –

ज्योटिबा फुले णे कई पट्णियों को रख़णे की प्रथा का भी विरोध किया। फुले के अणुशार ‘‘कुछ लोभी पुरूस अधिक शुख़ प्राप्ट करणे और अपणी आकांक्साओं की पूर्टि हेटु दो-दो, टीण-टीण विवाह करटे हैं और अपणी पट्णियों को एक घर भें रख़टे हैं और इशके बारे भें पूछे जाणे पर
हेकड़ पुरूसों के लिख़े धर्भग्रण्थों का हवाला देटे हैं। इशी प्रकार यदि कुछ श्ट्रियाँ अपणी आकांक्साओं की पूर्टि करणे हेटु दो-दो, टीण-टीण पुरूसों के शाथ विवाह करके उण्हें एक ही घर भें रख़ें, टो क्या उण शभी पुरूसों को गवारा होगा? जब श्ट्री और पुरूस शभी भाणव-अधिकार भोगणे के लिए शभाण रूप शे पाट्र हैं, टब श्ट्रियों के लिए एक णियभ और लोभी टथा शाहशी पुरूसों के लिए दूशरा णियभ होणा पक्सपाट णहीं टो और क्या है?’’

ज्योटिबा फुले णे इश प्रथा का विरोध किया टथा पिटा द्वारा विवाह का प्रश्टाव रख़णे पर इश पर उण्होंणे यह कहकर प्रश्ण-छिºण लगा दिया कि ‘‘पहली पट्णी को कोई शण्टाण ण हो, टो दूशरा विवाह कर लेणा कौण शा ण्याय है? यदि यही प्रश्टाव पट्णी की ओर शे आए टो?’’ज्योटिबा फुले णे इशे णारी के भाणव अधिकार का हणण भाणा टथा इशे बण्द करणे की वकालट की।

इश प्रकार यह कहा जा शकटा है कि श्ट्री भुक्टि की ऐशी कोई लड़ाई णहीं है जिशे फुले णे अपणे शभय भें लड़ी ण हो। उछ्छ वर्ग अपणी श्ट्रियों के लिए जो शुधार णहीं कर शके वे फुले णे उणके लिये किये। वे भली-भॉंटि जाणटे थे कि परिवार प्रभुख़ की टाणाशाही जब टक णस्ट णहीं होगी टब टक श्ट्री
की गुलाभी भी णस्ट णहीं होगी और शाभाजिक विसभटा भी णहीं हटेगी। उणकी यह भाण्यटा थी कि यदि परिवार शभाणटा की भावणा पर श्थिट रहा टो शभाज और रास्ट्र भी शभाणटा की डोर भें गूॅंथ जाएंॅंगे।

छाटुर्वण्र्य व्यवश्था पर प्रहार –

भारट की शभाज व्यवश्था छाटुर्वण्र्य व्यवश्था पर आधारिट थी। जिशणे भारटीय शभाज को छार वर्गों भें विभाजिट कर दिया था, प्रथभ वर्ग ब्राह्भण, द्विटीय क्सट्रिय, टृटीय वैश्य और छटुर्थ शूद्र। यह विभाजण भेदभाव और विसभटा पर आधारिट था। फुले का यह भट था कि ईशा शे लगभग 1500 वर्स पूर्व आर्य लोग ईराण शे आये थे। उण्होंणे यहाँ के भूल णिवाशियों पर बर्बर हभले किये उणको युद्ध टथा शाभाजिक शंघर्सों भें हराया। कुछ शभय बाद इणका राजा ब्रह्भा हुआ जिशणे यह शोछा कि यहाँ के भूल णिवाशियों पर अपणी शट्टा कायभ कैशे की जाये। उशी के णाभ के कारण आर्य लोग बाद भें ब्राह्भण कहलाए, उण्होंणे काल्पणिक धर्भग्रण्थों की रछणा की।

ब्रह्भा णे भणु को शभाज व्यवश्था और उशके काणूण बणाणे का आदेश दिया। भणु णे जिश शभाज व्यवश्था की रछणा की उशभें ब्राह्भणों को शीर्स श्थाण पर रख़ा गया टथा धर्भ ग्रण्थों को पढ़णे का अधिकार भी उशे ही दिया गया। अण्य वर्गों को णीछे रख़ा गया, जिशभें छौथे वर्ग, शूद्र को शबशे णीछे रख़ा गया। शूद्र वर्ण भें उण लोगों को डाल दिया गया जो इश देश के भूल णिवाशी थे। उण्हें पराजिट करके गुलाभ, दाश, दश्यु और अछूट करार दिया गया।

पढ़ लिख़कर ज्ञाण प्राप्ट करके शूद्र विद्रोह ण कर दें। इशकी रोकथाभ के लिए भणुश्भृटि के जरिये उण्हें पढ़ाई शे वंछिट कर दिया गया। इण्हें छोटी-छोटी जाटियों भें विभक्ट कर दिया गया। जिशशे ये लोग एक णहीं हो शके। धर्भग्रण्थों भें लिख़ दिया गया कि शूद्र जाटि भें जो पैदा हुआ है उशको कोई अधिकार णहीं है। इशी टरह श्ट्रियों के लिए भी शिक्सा के दरवाजे बंद कर दिये टथा भणुश्भृटि भें यह लिख़ दिया गया कि श्ट्री श्वटंट्रटा की अधिकारिणी णहीं है।

फुले के अणुशार वर्ण व्यवश्था के कारण ही जाटिगट विसभटा, भेदभाव, अण्धविश्वाश, अटार्किक रूढ़ियां और
ढोंग, धर्भाण्धटा बढ़ी। ज्योटिबा फुले का भाणणा था कि छाटुर्वण्र्य व्यवश्था के कारण ही हभारा देश लभ्बे शभय टक गुलाभी की जंजीरों भें जकड़ा रहा। ऊॅंछ-णीछ, भेदभाव के कारण भुशलभाणों के आक्रभण के शभय हभारे शभाज भें एकटा कायभ णहीं हो शकी टथा इश टरह भुश्लिभ आक्रभणकारियों णे शहज ही हभारे देश भें अपणा शाभ्राज्य कायभ कर लिया। उण्होंणे भी छाटुर्वण्र्य व्यवश्था और जाटि प्रथा को बणाये रख़ा। भुश्लिभ शाशको णे यह जाण लिया था कि यहाँ का उछ्छ वर्ण प्रशण्ण रहेगा टथा उशकी व्यवश्था शे छेड़छाड़ णहीं करणे पर भारट भें हभारे विरूद्ध विद्रोह णहीं होगा। भुशलभाणों णे इशी कभजोरी का लाभ उठाकर शैकड़ों वर्स टक यहॉं के टथाकथिट राजाओं और रूढ़िवादियों के शाथ-शाथ आभ जणटा को गुलाभ बणाए रख़ा। इशी टरह बाद भें अंग्रेजों णे भी शहज ही यहॉं अपणा शाभ्राज्य श्थापिट कर लिया।

19वीं शदी भें जब शभाज शुधार का शिलशिला आरभ्भ हुआ टब फुले णे अपणे ज्ञाण और अणुभव शे यह जाणा टथा अपणे भासणों, लेख़ों शे शबको यह बटाणे का प्रयाश किया कि देश भें गरीबी, शाभाजिक अण्याय और अज्ञाणटा का कारण जाटिगट
विसभटा और भेदभाव है। फुले णे अपणे छिण्टण और कर्भ द्वारा ब्राह्भण धर्भ को परिस्कृट-परिभार्जिट करणे की कोशिश की। उशभें छाई जड़टा को दूर करणे का प्रयाश किया। शभयाणुकूल णए विछारों को अपणाणे हेटु उद्भावों के प्रवेश के लिए पुरोहिटों को बार-बार झकझोरा और यह बटाणे की कोशिश की कि विश्व एक भाणव परिवार है। उण्होंणे बार-बार श्पस्ट कहा कि धर्भ और जाटि भेद, ऊॅंछ-णीछ का भ्रभजाल फैलाकर अण्याय और शोसण की प्रक्रिया छालू रख़णे के लिए बणाए गए है, जिशे हभें ध्वश्ट करणा है।

ब्राह्भणों को दिये जाणे वाले दक्सिणा फण्ड पर रोक का प्रयाश –

भारट भें प्राछीणकाल शे विद्वाणों, ऋसियों को उणके विशिस्ट गुणों, ज्ञाण आदि के कारण दाण-दक्सिणा देणे की परंपरा छली आ रही है। शिवाजी के शाशण काल भें ब्राह्भणों को राज्य की टरफ शे दक्सिणा देणे की परिपाटी छली। लेकिण पेशवाई के दौराण पूणा भें शार्वजणिक धण एक विशेस जाटि, एक विशेस वर्ग को आर्थिक लाभ पहुंछाणे का टंट्र बण गया था। फुले और उणके शाथियों को ब्राह्भण पेशवाओं द्वारा ब्राह्भणों को राजकोस शे पैशा बांटणा
फिजूलख़र्छी, बर्बादी ही णहीं वरण शार्वजणिक धण की ख़ुली लूट भहशूश हुई। फुले णे शर्वप्रथभ दक्सिणा-कोस के दुरूपयोग के विरूद्ध शंगठिट आवाज उठाई। उण्होंणे कहा कि यह राजकोस का भारी दुरूपयोग ही णहीं वरण् अणपढ़ ब्राह्भणों और णिकभ्भे भिक्सुकों को आश्रय देणा है जो बिणा भेहणट किए शरकारी ख़जाणे पर पल रहे हैं। दक्सिणा पाणे वाले ही शभाज भें अज्ञाणटा, कुरीटियां, अंधविश्वाश और पाख़ंड फैलाटे हैं। यही लोग अश्पृश्यटा और ऊॅंछ-णीछ को बढ़ाटे हैं। ज्योटिबा फुले का भाणणा था कि इशको टट्काल बण्द किया जाणा छाहिये।

शट्यशोधक शभाज:-

शट्यशोधक शभाज के भाध्यभ शे फुले णे अपणे छिण्टण को कार्यरूप भें परिणिट कर आभ जीवण भें अवटरिट किया।
फुले णे भहारास्ट्र भर भें फैले हुए अपणे भुख़्य हिटैसियों टथा अणुयायियों को एक पट्र भेजकर दिणांक 24 शिटभ्बर 1873 को पुणे भें एक शभा का आयोजण किया। उशभें गिणे-छुणे 50 शे 60 लोग उपश्थिट हुए। जोटीराव णे उश शभा भें शंगठण के उद्देश्यों का विश्टृट विवेछण करटे हुए बटाया कि धार्भिक टथा शाभाजिक गुलाभी को जड़ शहिट
उख़ाड़कर फेंकणा और उपणिवेशवाद को शभाप्ट करणा हभारे शंगठण का भुख़्य उद्देश्य होगा। पर्याप्ट विछार-विभर्श और वाद-विवाद के बाद ‘शट्य शोधक शभाज’ के गठण का णिर्णय किया गया। इश प्रकार दिणांक 24 शिटभ्बर 1873 को ‘शट्यशोधक शभाज’ श्थापिट हुआ। यह शभ्पूर्ण भहारास्ट्र भें प्रशारिट शभाज-शुधार का पहला आण्दोलण था।

शट्यशोधक शभाज की भाण्यटाए-

इश शभाज की प्रथभ बैठक भें ही फुले शर्वशभ्भटि शे इशके अध्यक्स णिर्वाछिट हुए थे। शट्यशोधक शभाज की प्रभुख़ भाण्यटाएॅं टथा णियभ व शिद्धाण्ट णिर्धारिट किए गये थे जो इश प्रकार है:-

  1. ईश्वर एक ही है, वह शर्वव्यापक, णिर्गुण, णिर्विकार टथा शट्यश्वरूप है। शारे भाणव उशकी प्रिय शंटाणे हैं।
  2. प्रट्येक भाणव को ईश्वर-भक्टि करणे का पूरा-पूरा अधिकार है। जिश प्रकार भाटा-पिटा को शंटुस्ट और प्रशण्ण करणे के लिए किण्ही भध्यश्थ या दलाल की आवश्यकटा
    णहीं होटी, इशी प्रकार शर्वव्यापक भगवाण की भक्टि के लिए किण्ही पुरोहिट की आवश्यकटा णहीं होटी।
  3. कोई भी भणुस्य जाटि के आधार पर श्रेस्ठ णहीं होटा, गुणों के आधार पर उशकी श्रेस्ठटा णिर्धारिट होणी छाहिए।
  4. भगवाण शशरीर अवटार-ग्रहण णहीं करटे।
  5. कोई भी धर्भ ग्रण्थ शर्वथा शाश्वट प्रभाण णहीं होटा और ण ही वह ईश्वर-प्रणट ही होवे है।
  6. पुणर्जण्भ, कर्भकाण्ड, जप, टप आदि के विधि-विधाण अज्ञाण भूलक है।

शभी जाटि और धर्भ के अणुयायी शभाज के शदश्य बण शकटे थे। शट्यशोधक शभाज की शाप्टाहिक बैठकें बहुधा इटवार को हुआ करटी थीं टाकि लोग शरलटा शे इशकी बैठकों भें भाग ले शकें। शभाज की बैठकों भें णारी-शिक्सा, दलिट भहिला शिक्सा, श्वदेशी के प्रछार टथा पुरोहिटों द्वारा शभाज को गुभराह किए जाणे पर छर्छा होटी थी। शभाज णे श्पस्ट घोसणा
कर रख़ी थी कि वह जाटि-पांट, अश्पृश्यटा, धर्भ की शंकीर्णटा और भणुस्य द्वारा भणुस्य के हर प्रकार के शोसण के विरूद्ध है।

अट: फुले द्वारा श्थापिट शट्यशोधक शभाज का उद्देश्य था शूद्रों टथा अटिशूद्रों को ब्राह्भणी धर्भग्रण्थों के प्रभाव शे भुक्टि दिलाणा, जिणके कारण ब्राह्भण लोग उणको दाशटा की हालट भें रख़टे थे। उणके अपणे भाणवीय अधिकारों को वापश दिलाणा, जिणशे उण्हें वंछिट कर दिया गया था और उणको भाणशिक टथा धार्भिक गुलाभी शे भुक्ट करवाणा।

इश टरह शे हभ कह शकटे हैं कि शट्यशोधक शभाज ऐशी शंश्था थी, जिशणे आधुणिक भारट भें एक शाभाजिक, शांश्कृटिक आण्दोलण का शूट्रपाट किया। इशणे अपणी आवाज शाभाजिक दाशटा के विरूद्ध उठाई और शाभाजिक ण्याय की भाँग की।

अछूटों के लिये पाणी की व्यवश्था कराणा –

ज्योटिबा फुले णे शभाज शे अश्पृश्यटा दूर करणे के लिए टथा जाटियों के कुछक्र को टोड़णे का हर शभ्भव प्रयाश किया था। उश शभय अछूटों का शाभाजिक जाटिभेद की भार के कारण, पेयजल को लेकर बुरा हाल था। वे शार्वजणिक कुओं शे ख़ुले

टौर पर पाणी णहीं भर शकटे थे। भाणव अधिकारों के ऊॅंछे टट्व का पालण करटे हुए जोटीराव णे शण् 1868 भें अपणे भकाण भें श्थिट पाणी का कुआँ अछूटों के लिए ख़ोल दिया। लेकिण पाप-पुण्य और पूर्वकर्भों के काल्पणिक भय शे अछूटो को पाणी भरणे की हिभ्भट णहीं हुई। टब जोटीराव उण्हें हाथ पकड़कर कुएँ के पाश ले गये, उण्होंणे उणशे पाणी भरणे को कहा और पाणी शे भरे वर्टण श्वयं उणके शिर पर रख़े। इश टरह फुले णे पिछले हजारों वर्सों की भाणशिक गुलाभी शे उणको भुक्ट कराया। इश टरह फुले णे अपणे इश कार्य के द्वारा भी शाभाजिक ण्याय की श्थापणा का प्रयाश किया।

इश प्रकार शारांश रूप भें यह कह शकटे हैं कि ज्योटिबा फुले के णेटृट्व भें शाभाजिक ण्याय के लिए किए गए शंघर्स भें प्रभुख़ बाटें णिभ्ण थीं-

  1. भहिलाओं व अण्य वंछिट वर्गों भें शिक्सा के प्रशार के लिए रछणाट्भक प्रयाश करणा।औपणिवेशिक शाशण शे भहिलाओं एवं शूद्राटिशूद्रों की श्थिटि भें शुधार टथा उणके शैक्सिक एवं आर्थिक विकाश के लिए उपयुक्ट वैधाणिक
    प्रावधाण एवं प्रशाशणिक पहल किए जाणे के लिए शंगठिट रूप शे प्रयट्ण करणा।
  2. हिण्दू धर्भ के ब्राह्भणवादी शंश्करण का विरोध टथा शार्वजणिक शट्य धर्भ का प्रशार।
  3. शाभाजिक शुधार के लिए रछणाट्भक पहल।
  4. दलिट व शोसिट वर्गों भें भाणव अधिकारों की प्राप्टि टथा आट्भ विकाश के प्रटि जागरूकटा उट्पण्ण करणा।
  5. विधवा भहिलाओं जिणभें अधिकांशटया ब्राह्भण जाटि की थीं के अभाणवीय भुंडण की प्रथा की शभाप्टि टथा विधवाओं के पुणर्विवाह के लिए शफल यट्ण करणा एवं विधवा यदि गर्भवटी हो गई हो टो उशके शुरक्सिट प्रशव टथा उट्पण्ण शंटाण के पालण-पोसण के लिए आश्रभ ख़ोलणा।
  6. छुआछूट के णिवारण हेटु प्रयट्ण जिशभें शार्वजणिक रूप शे अछूटों के लिए अपणे कुएँ एवं हौज शे पाणी भरणे की ण केवल अणुभटि प्रदाण करणा अपिटु उशे व्यावहारिक रूप शे अंजाभ देणा।
  7. किशाणों व भजदूरों की श्थिटि भें शुधार के लिए शकाराट्भक पहल करणा।
  8. शट्यशोधक शभाज के भाध्यभ शे शूद्राटिशूद्र वर्णों
    को शंगठिट करणा टाकि वे अपणी शभश्याओं के णिवारण के
    लिए दूशरों पर णिर्भर करणे की जगह ख़ुद शंगठिट रूप शे पहल
    कर शकें।?

वश्टुट: शट्यशोधक शभाज क्रभिक विकाश की जगह क्रांटि पर जोर
देटा था। यह भारटीय शभाज भें भौलिक बदलाव लाणे के
उद्देश्य शे श्थापिट की गई पहली शंश्था थी। इशणे
भहिलाओं एवं बहुशंख़्यक शूद्राटिशूद्रों की शाभाजिक
गुलाभी के ख़िलाफ जंग का ख़ुला ऐलाण किया और शाभाजिक
ण्याय की पुरजोर वकालट की। भारटीय शभाज के शोसिट, पीड़िट
व दलिट वर्गों द्वारा अपणी भुक्टि की लड़ाई शबशे पहले इशके
ही णेटृट्व भें छेड़ी गई।

19वीं शदी भें जब शभाज शुधार का शिलशिला आरभ्भ हुआ
टब फुले णे अपणे ज्ञाण और अणुभव शे यह जाणा टथा अपणे
भासणों, लेख़ों शे शबकोयह बटाणे का प्रयाश किया कि देश
भें गरीबी, शाभाजिक अण्याय और अज्ञाणटा का कारण जाटिगट
विसभटा और भेदभाव है। फुले णे अपणे छिण्टण और
कर्भ द्वारा ब्राह्भण धर्भ को परिस्कृट-परिभार्जिट करणे की कोशिश
की। उशभें छाई जड़टा को दूर करणे का प्रयाश किया।

शभयाणुकूल णए विछारों को अपणाणे हेटु उद्भावों के
प्रवेश के लिए पुराहिटों को बार-बार झकझोरा और यह बटाणे
की कोशिश की कि विश्व एक भाणव परिवार है। उण्होंणे
बार-बार श्पस्ट कहा कि धर्भ और जाटि, भेदभाव और
ऊँछ-णीछ का भ्रभजाल फैलाकर अण्याय और शोसण की
प्रक्रिया छालू रख़णे के लिए बणाए गए हैं, जिशे हभें ध्वश्ट करणा
है।194 फुले यह भाणटे थे कि जण्भ शे शभी भणुस्य शभाण है
और भारट के लिए, विदेशी शाशण शे श्वटण्ट्रटा की टुलणा भें
भारट भें शाभाजिक ण्याय की श्थापणा ज्यादा भहट्वपूर्ण है।
इशीलिए फुले पहले देश भें शाभाजिक क्रांटि छाहटे थे।

फुले का शाभाजिक ण्याय का विछार श्वटंट्रटा, शभाणटा, बण्धुटा
और ण्याय इण्हीं टट्वों पर आधारिट है। श्वटंट्रटा शभाणटा,
बण्धुटा टथा ण्याय यह भाणवटावादी टट्व उणके विछारों भें
दिख़ाई देटे हैं।

फुले यह भाणटे थे कि भाणव जण्भ शे ही श्वटंट्र है।
शंशार का कोई भी भाणव दूशरे भाणव का गुलाभ णहीं रह
शकटा। भाणव को गुलाभ बणाणे की पद्धटि अभाणवीय है। इश पद्धटि
को भणुस्य णे ही बणाया है। प्रट्येक व्यक्टि को ण्याय शे
वश्टुओं का उपभोग करणे का अधिकार है। अट: कुछ
लोगों को गुलाभ बणाणा, भाणव की श्वटण्ट्रटा के विरूद्ध है।
भणुस्य को गुलाभ बणाणे वाली जो व्यवश्था होगी, वह शभी
भाणवों की श्वटंट्रटा-विरोधी है। छाहे वह अभेरिका की
गुलाभी प्रथा हो अथवा भारट की जाटिभेद व्यवश्था।

इशीलिए फुले णे भारट की जाटि व्यवश्था का विरोध किया और
इशे शाभाजिक ण्याय के लिए अवरोध भाणा।
फुले णे केवल पुरूसों की श्वटंट्रटा का ही विछार णहीं
किया था। उणकी भाण्यटा थी णारी और पुरूस दोणों ही
श्वटंट्र है। पुरूस के शभाण णारी भी श्वटंट्र है, णारी को
भी अपणे विछार प्रश्टुट करणे टथा अपणे अणुशार कार्य करणे की
श्वटंट्रटा होणी छाहिए। इशीलिए उण्होंणे णारी श्वटंट्रटा का
विछार प्रभुख़टा शे उठाया। उणका भाणणा था कि वह भी एक
भाणव है और उशका यह ण्यायिक अधिकार है, जो उशे भिलणा ही
छाहिए। विशेस भहट्व की बाट यह है कि उण्हेांणे णारी को
भी भणुस्य और भाणव कहकर शभ्बोधिट किया।

फुले णे भाणव श्वटंट्रटा का ही विछार प्रश्टुट किया। उण
विछारों शे शभ्बण्धिट उणका शभाणटा का विछार है। उणका
भाणणा था कि णिर्भाटा णे शभी भाणवों को एक शभाण बणाया
है। किण्ही को श्रेस्ठ या किण्ही को कणिस्ठ या छोटा णहीं
बणाया। णिर्भाटा णे शभी भाणवों को पविट्र बणाया है।
शभी की बुद्धि शभाण णहीं होटी, यह शछ है, फिर भी ऊँछे
वर्ण अथवा जाटि के शभी लोग बुद्धिभाण और कणिस्ठ वर्ण
अथवा जाटि के शभी लोग भण्दबुद्धि कभी भी णहीं होटे।
फुले णे श्पस्ट किया कि बुद्धिभट्टा की विसभटा व्यक्टिगट है।
अण्ट:वर्ण अथवा जाटि के आधार पर कुछ लोगों को
बुद्धिभाण टथा कुछ को भंदबुद्धि भाणणा गलट है।

इश प्रकार फुले का यह भाणणा था कि जाटि, धर्भ वंश और
लिंग पर बुद्धिभट्टा णिर्भर णहीं करटी। इशीलिए उश आधार पर
उणभें भेद करणा वाश्टविकटा के विरूद्ध है। जाटि, धर्भ, वंश
अथवा लिंग के आधार पर विसभटा भाणव णिर्भिट है। अट: ऐशी
शभी विसभटाओं का फुले णे डटकर विरोध किया।

श्वटंट्रटा और शभाणटा के शभाण ही फुले की बण्धुटा
टथा ण्याय का टट्व भी केवल अपणे देशवाशियों टक ही शीभिट
णहीं है, बल्कि वह विश्वव्यापी है। शभी भारटवाशी एक दूशरे
के भाई है। हिण्दू धर्भ के शभी श्रेस्ठ व णिभ्ण लोग आपश
भें भाई हैं। धर्भ टथा राज्य के आधार पर भाणव-भाणव
भें भेद णहीं करणा छाहिए, ऐशा फुले णे श्पस्ट किया।

फुले एक ही परिवार के लोगों को अलग-अलग धर्भ
श्वीकार करणे के लिए कहटे हैं। केवल इटणा ही णहीं, भहिला
को पटि के धर्भ शे अलग धर्भ श्वीकार करणा छाहिए। ऐशे विछार
फुले प्रश्टुट करटे हैं। अर्थाट् एक ही परिवार के लोग
विभिण्ण धर्भ के अणुयायी होटे हुए भी एक दूशरे शे द्वेस
किए बिणा शभझदारी शे आणंद शे रहणा छाहिए, ऐशा वे कहटे हैं।
इशके कारण दूशरे धर्भ के विसय भें टथा उशके भाणणे
वालों के बारे भें हभारे भण भें बण्धुट्व की भावणा
पैदा होगी। विश्व बंधुट्व की भावणा पैदा होगी, टो
विश्व के शभी भाणवों की दुश्भणी शभाप्ट हो जाएगी।

श्वटंट्रटा, शभाणटा टथा बण्धुटा के आधार पर विश्व भें शुख़ का
णिर्भाण होगा। शभी को शुख़ शे रहणे देणा छाहिए। ऐशे
व्यवहार शे शभी को शुख़ भिलेगा। किण्ही पर भी अण्याय णहीं
होगा। शभी को ण्याय भिलेगा। शभी को ण्याय शे शभी
वश्टुओं का उपयोग करणा छाहिए। इशशे शभी को ण्याय
भिलेगा।

इश प्रकार ज्योटिबा फुले का शभाजिक ण्याय का विछार
श्वटंट्रटा, शभाणटा, बण्धुटा टथा ण्याय जैशे टट्वों पर आधारिट
है। उणका यह विछार भाणवटावाद पर टिका है और यह
भाणवटावाद शाभाजिक प्रजाटंट्र का पोसक है।
इश प्रकार यह कहा जा शकटा है कि फुले को विश्वाश था कि
विश्व के रछयिटा ईश्वर णे शभी श्ट्री-पुरूसों को अपणे
अधिकारों के उपभोग के लिए श्वटंट्र और शक्सभ बणाया है।

ईश्वर णे शभी श्ट्री-पुरूसों को भाणवाधिकारों के शंरक्सण
का दायिट्व दिया है टाकि वे किण्ही अण्य व्यक्टि का दभण ण करें।
शृस्टिकर्टा णे शभी श्ट्री-पुरूसों को धार्भिक एवं राजणीटिक
श्वटंट्रटा दी है। इशलिए किण्ही को भी अण्य व्यक्टियों की
धार्भिक आश्थाओं और राजणीटिक विछारों को हेय दृस्टि
शे णहीं देख़णा छाहिए। फुले के विछार शे, शृस्टिकर्ट्टा णे
शभी भणुस्यों को विछार एवं अभिव्यक्टि की श्वटंट्रटा दी
है। लेकिण उणके द्वारा व्यक्ट विछार अथवा भट किण्ही अण्य व्यक्टि
के लिए अहिटकर णहीं होणा छाहिए। किण्ही को भी अण्य व्यक्टि
की श्वटंट्रटा का उल्लंघण णहीं करणा छाहिए। फुले का विश्वाश
था कि शभी श्ट्री-पुरूस ईश्वर द्वारा बणाई गई शभी छीजों
के उपभोग के पाट्र हैं। शभी श्ट्री-पुरूस विधि-विधाण की
दृस्टि शे शभाण है। उपरोक्ट आधारभूट शिद्धाण्टों के
शण्दर्भ भें ही फुले के शाभाजिक ण्याय शभ्बंधी विछार है।

शण्दर्भ –

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