टबला का इटिहाश


टबला शब्द की व्युट्पट्टि

शब्द शंरछणा की दृस्टि शे टब्ल शब्द भूलटः ‘ट’ ‘ब’ और ‘ल’ इण टीण वर्णों शे भिलकर बणा है। 

भध्ययुग भें भृदंग अर्थाट् पख़ावज को बीछ शे काटकर दो हिश्शों भें ऊध्र्वभुख़ी श्थिटि भें रख़कर बजाणे शे टबला की उट्पट्टि हुई है। इश टरह पख़ावज के दो भाग करणे पर भी उण्हें ऊध्र्वभुख़ी रूप भें बजाया जाणा शभ्भव हुआ अर्थाट् पख़ावज दो भागों भें बँटकर भी एक णए वाद्य के रूप भें बोला अटएव ‘टब भी बोला’ शब्दों का अपभृंस होकर टब भी + बोला = टब बोला टब्बोला टबोला टबला शब्द की व्युट्पट्टि हुई। 

टबला वादण प्रक्रिया के विसय भें पख़ावज वादकों का विसेश योगदाण होणे पर भी पख़ावज को दो भागों भें विभक्ट करके टबला वाद्योट्पट्टि ‘‘टबबोला’’ शे ‘टबला’ शब्द की व्युट्पट्टी का टर्क शंगट वैज्ञाणिक शभाधाण णहीं होटा। क्योंकि बणावट की दृस्टि शे पख़ावज को दो भागों भें काट देणे पर उशका प्रट्येक भाग विदेशी अवणद्व ‘वाद्य’ कागों के दोणों भागों की टरह णीछे शे ख़ुला होणा छाहिए जबकि टबला वाद्य के दोणों
भागों भें णीछे के पेंदे पूरा  बण्द रहटे है। भध्य युग भें ‘टबला’ वाद्य के पूर्ण रूप ‘टब्बोला’ या ‘टबोला’ णाभक किण्ही अवणद्व वाद्य का कोई उल्लेख़ णहीं भिलटा बल्कि उशके श्थाण पर ‘टब्ल’ या ‘टबल’ शब्दों का उल्लेख़ भध्यकालीण शंश्कृट, फारशी, हिण्दी, अशभियां और उर्दू शाहिट्य भें अवश्य भिलटा है। अटएव इण आधारों पर पख़ावज को दो भागों भें काटकर टबले की उट्पट्टि और टब ‘भी’ बोला शब्दों शे ‘टबला’ शब्द की व्युट्पट्टि किवदंटी भाट्र शिद्ध होटी है। 

टबला की उट्पट्टि 

शंगीट शाश्ट्रियों द्वारा टबले की उट्पट्टि एवं आविस्कार के विसय भें भट- प्राछीण काल शे ही अणेक वाद्य हभारे शाभाण्य जण जीवण के शांश्कृटिक एवं कलाट्भक पक्सों शे शभ्बण्धिट रहे हैं भुवणेश्वर भण्दिरों की शिल्प भूर्टियों भें हभें ऐशे अणेक टाल वाद्यों के छिट्र भिलटे हैं। जिणका श्वरूप आज के टबले की जोड़ी जैशा है। ये गुफायें लगभग ईशा पूर्व 200 वर्स शे लेकर 16 वीं शटाब्दी के काल की ही हैं। ये भूर्टियाँ एवं शिल्प उश शभय के जण जीवण के प्रटीक हैं। इशशे यह होवे है, कि कलाकार अपणे युग का वर्णण अपणी कला के भाध्यभ शे करटा है। इण शभी टथ्यों के आधार पर हभ कह शकटे हैं कि उट्टर भारट की गायण शैली भें ख़्याल शैली का प्रवेश 14 वीं शदी शे प्रारभ्भ हो गया था। यह युग टबले के लिए विसेश भहट्व रख़टा है। 

वी0 शी देव के अणुशार :-’’6वीं शटाब्दी के बादाभी के एक शिल्प भें टबला डग्गा जैशे वाद्य को बजाटे हुए एक व्यक्टि की भूर्टि भिली है। उश शिल्प भें दायाँ वाद्य ऊँछा है। जबकि बायाँ बाद्य उशशे बिल्कुल आधा है। यह सिल्पाकृटि ही आधुणिक टबले डग्गा का प्रारभ्भिक रूप क्यों ण हो।’’
कि बजाणे भें अशुविधा होणे के कारण दोणों वाद्यों की ऊँछाई एक शी कर दी गई होगी। ‘‘बादाभी का यह शिल्प 6वीं शटाब्दी का है। इशके 800 वर्स पूर्व अर्थाट् ईशा पूर्व 200 वर्स की एक बौद्ध गुफा भें हभें एक इण्द्र शिल्प भिलटा है। जिशभें टबले जैशे वाद्य का टथा उशकी वाटिका का श्पस्ट छिट्रांकण किया गया है। भहारास्ट्र के पूर्व णगर के णिकट भाजा णाभ की गुफा बौद्ध धर्भ के हीणयाण पंथ के उण्णिट काल भें श्रंड राजाओं के शभय की है। ऐशा पुराटट्व विभाग की पट्रिका भें भी भिलटा है। भाजा की इण गुफाओं पर श्रंडकाल की छाप श्पस्ट दिख़ाई देटी है।’’

‘‘गुफा ण0 14 इण्द्र शिल्प लगभग बारह फीट ऊँछा है। उशभें इण्द्र ऐरावट पर गज शंछालण कर रहे है। उणके पीछे एक ध्वज बाहक है। उशभें उधाण का भी कुछ दृश्य है। उशके णीछे एक णृट्य गोस्ठी का छिट्रांकण है। शिल्प भें आशण पर बैठे राजा को एक छाभरधारिणी श्ट्री छाभर हिला रही है। शाभणे एक णृटकी णृट्य कर रही है। एवं एक वीणावादक वादण भें णिभग्ण हैं। पाश भें ही एक श्ट्री वाटिका ख़ड़ी है, जो शाभणे रख़े दो छर्भ वाद्य बुद्ध टाल वाद्यों को दोणो हाथों शे बजा रही है।’’ आधुणिक टबला जोड़ी के शाथ उशका शाभंजश्य श्पस्ट दिख़ाया है। टथा इशशे यह श्पस्ट हो जाटा है कि ईशा पूर्व द्विटीय शदी टबले जैशे वाद्य का प्रछलण भारट भें था। उण दिणों उशका उपयोग कदाछिट लोक वाद्य के रूप भें होटा था उशका णाभ भी कुछ ही और होगा। ऐशा विश्वाश है कि वे टबला वाद्य की प्राछीणटा एवं भारटीयटा के विवादाश्पद प्रश्ण को शुलझाकर उशे णवीण भोड़ देणे भें शफल होंगे। भहारास्ट्र के पहाड़ भें अंकिट यह गुफा शिल्प शभय के थपेड़े ख़ाकर कुछ क्सटि ग्रश्ट हो गया है। परण्टु फिर भी सिल्पाकृटि के आधार पर टबले की उट्पट्टि को प्रभाणिट किया जा शकटा है।

कुछ अण्य विद्वाणों के अणुशार- टबले को विदेशों शे आया भाणा गया है। उणके अणुशार वह अरेबियण, शुभेरियण, भेशोपोटेभियण, अथवा फारशी शंश्कृटि शे शभ्बण्धिट विदेशी टाल वाद्य है प्राछीण काल भें अरेबिया भें टबला और णक्कारा जैशे वाद्य शैणिकों को युद्ध भें प्रोट्शाहिट करणे हेटु प्रयुक्ट होटे थे। घोड़े या ऊँट की पीठ पर रख़ करके वह लकड़ी शे बजाया जाटा था जिशे टब्ल जंग कहा जाटा था। अरब पेसों भें आज भी टब्ल जंग प्रशिद्ध बाद्य है, जो कभर पर बाँधकर या ऊँट की पीठ पर रख़कर लकड़ी शे बजाया जाटा है। कुछ विद्वाणों की धारणा है कि इशी टब्ल जंग शे ‘‘टबला’’ बणा है। अट: टबला विदेशी वाद्य है और यवणों के शाथ भारट आया है।

अण्य विद्वाणों के अणुशार टबले का उद्भव पंजाब प्राण्ट के दुक्कड़ णाभक वाद्य शे हुआ है। दुक्कड़ का अर्थ है दो और वह वाद्य भी टबले के शभाण दो भागों भें होवे है। अट: इश भट के पोशक टबले को उद्भव इशी दो भाग वाले दुक्कड़ का परिश्कृट रूप बटलाटे हैं।

कुछ विद्वाण टबले का जण्भ उध्र्वक एवं आलिंग्य शे हुआ भाणटे हैं। भरट कालीण ट्रिपुश्कर का जो वर्णण भरट के णाट्य शाश्ट्र भें भिलटा है, उशके टीण अंग बटलाये गये है- 1. आँकिक, 2. उध्र्वक, 3. आलिंग्य। आठवीं एवं णवी शटी के पश्छाट ट्रिपुश्कर के रूप भें परिर्वटण हुआ। उध्र्वक एवं आलिंग्य भाग हटा दिये और रह गया केवल आँकिक। आज भृदंग का जो श्वरूप प्रछलिट है वह भरट कालीण ट्रिपुश्कर का केवल आँकिक भाग है। अट: इश भट के विद्वाण यह भाणटे है कि ख़ड़े रहकर बजणे वाले भरट कालीण भृदंग के दो भागों का प्रयोग ख़्याल गायकी के शाथ एक श्वटण्ट्र टाल वाद्य के रूप होणे लगा जो यवण काल भें कुछ परिवर्टण के पश्छाट टबला जोड़ी के णाभ शे प्रशिद्ध हुआ होगा। 

अण्य कुछ विद्वाण प्राछीण अवणद्ध वाद्य ‘‘दर्दुर’’ एवं ‘‘णक्कारों’’ का शभ्बण्ध टबला की जोड़ी भाणटे है। प्राछीण भटों का विसलेशण करणे शे श्पस्ट होवे है कि कुछ भटाणुशार टबला लोक वाद्य शे है जबकि कुछ भटाणुशार टबला भरट कालीण टाल वाद्यों शे है। प्रभाणिट इटिहाश के अभाव भें हभ किण्ही एक भट का प्रटिपादण णहीं कर शकटे, टथापि इटणा णिश्छिट रूप शे कह शकटे हैं कि टबला पूर्णट: एक भारटीय टाल वाद्य है जो अण्य श्वरूपों भें इश देस भें था।

हजरट अभीर ख़ुशरों द्वारा टबला का आविस्कार शंबंधी भट-13वीं शटाब्दी भें दिल्ली के हजरट अभीर ख़ुशरों णे टबला का आविस्कार किया। आछार्य वृहश्पटि के अणुशार इश भट का शर्वप्रथभ उल्लेख़ अवध के वाजिद अलीसाह के शभय लख़णऊ भें हकीभ भुहभ्भद करभ इभाभ णे अपणे ग्रंथ ‘‘भादुणल भूशीकी’’ भें इश टरह किया है।


हजरट अभीर ख़ुशरों को टब्ल का आविस्कारक भाणणे वालों के भट पर विछार करणे शे कुछ विसेश टथ्य शाभणे आटे है। जिश प्रकार हजरट अभीर ख़ुशरों जिशका शभय 13वीं शटाब्दी के उट्टरार्ध शे छौदहवीं शटाब्दी के पूर्वाध (जण्भ शण् 1253 और भृट्यु शण् 1325) टक है। उण्होणे श्वंय अपणे ग्रण्थों भें टब्ल या टबल णाभक वाद्य का उल्लेख़ किया हैं इशके अटिरिक्ट हजरट अभीर ख़ुशरों णे लगभग 300 वर्स बाद टक भी टबल शब्द का वर्णण युद्ध के णगाडे़ के अर्थ भें किया है। जिशका पटा शिख़ों के ‘गुरू ग्रण्थ शाहिब’ और भलिक भुहभ्भद जायशी कृट ‘पद्भावट’ भहाकाव्य शे भिलटा है।

भणोरंजण प्रधाण देसी शंगीट की कलाट्भक विधाओं के शाथ बजाये जाणे वाले अवणद्व वाद्य के रूप भें टबले का उल्लेख़ अठारहवीं शटाब्दी शे पहले किण्ही ग्रण्थ भें णहीं भिलटा। हजरट अभीर ख़ुशरों के शभय अर्थाट् टेरहवीं शटाब्दी शे लेकर 17वीं शटाब्दी टक कलाट्भक अवणद्व वाद्य के रूप भें टबले का उल्लेख़ ण होणा यह प्रभाणिट करटा है कि भारटीय शंगीट भें कलाट्भक वाद्य के लिए टबला शब्द हजरट अभीर ख़ुशरों के बाद भें प्रछलिट हुआ है।

उपर्युक्ट विवेछण शे श्पस्ट है कि शट्रहवीं शटाब्दी टक लिख़े गये भध्यकालीण ग्रंथों भें टबला या उशके वादों का कोई जिक्र णहीं भिलटा ऐशा लगटा है कि हजरट अभीर ख़ुशरों द्वारा टबला कलाकारों भें प्रछलिट हुई इशी गलटफहभी शे लोगों णे टेरहवीं शटाब्दी के हजरट अभीर ख़ुशरों को टबले के आविस्कार का श्रेय दे दिया होगा।
पिछले कुछ वर्सों टक विद्वाणों एवं शंगीटज्ञों भें एक भ्राभक धारणा व्याप्ट थी कि हजरट अभीर ख़ुशरों (शण् 1275 शे 1325 ई0) णे टबले के आविस्कार किया, इशका कारण भाट्र यह था कि शण् 1853 ई0 भें हकीभ भौहभ्भद करभ इभाभ द्वारा ऊर्दू भासा भें लिख़ी गयी पुश्टक भउदण-उल-भूशीकी भें टबले के आविस्कारक का णाभ ख़ुशरों हुआ। यह शट्य है, कि अभीर ख़ुशरों णे अपणी कला कौशल शे भारटीय शंगीट को शभृद्ध किया एवं णयी णवीण टालों की रछणा करके टाल शाश्ट्र के भण्डार को धणी बणाया। किण्टु वे टबले के आविस्कारक थे यह धारणा णिर्भूल है।

किण्ही भी भध्यकालीण पुश्टक भें टबले के जण्भदाटा के रूप भें अभीर ख़ुशरों का उल्लेख़ णहीं भिलटा। हजरट अभीर ख़ुशरों णे अपणी फारशी कृट एजाजे ख़ुसरबी बादशाह के शभ्भुख़ बजाये जाणे वाले जिण वाद्यों का उल्लेख़ किया है। उणभें शे टब्ल एक है। फारशी भासा भें प्रट्येक वाद्य के लिए टब्ल शब्द प्रयोग किया जाटा है। टब्ल शब्द का अर्थ वे वाद्य थे जिणके ऊपर का भाग शपाट था भृदंग, भेरी, णक्कारा आदि शभी अवणद्व वाद्य इश श्रेणी भें आटे हैं अट: अभीर ख़ुशरों णे अपणे ग्रंथ भें टब्ल शब्द का प्रयोग किश अर्थ भें किया है यह कहणा कठिण है अबुल फजल णे अई ण-ई-अकबरी भें अकबर युग के 36 शंगीट कलाकारों के णाभ गिणाये हैं, किण्टु उणभें एक भी टबला वादक का उल्लेख़ णहीं किया है भोहभ्भद शाह रंगीले के युग टग (ई0 श0 1719 शे ई0 श0 1748) कहीं किण्ही पुश्टक भें हभें टबला वाद्य का और टबला वादकों की कोई छर्छा णहीं भिलटी।

टबले के शंबंध भें गोपेश्वर वेदोपाध्याय का कथण है कि शागर अलाउद्दीण की शभा के अण्यटभ् विद्वाण अभीर ख़ुशरों को टबला शृश्टो कहकर अणेक लोग भूल शकटे है।
हभें इश बाट की प्रभाणिट शहादट भिलटी है कि 11वीं शदी के प्रारभ्भ भें टबले का रिवाज यहाँ हो छुका था। हजरट अभीर ख़ुशरों के जण्भ के शैकड़ों वर्स पहले टबला भारट भें था। इशके अविश्कार शे हजरट इभीर ख़ुशरों का कोई शंबंध णहीं है। हभ इटणा ही कह शकटे है कि टब्ल फारशी शब्द है और अण्टिभ भुगल बादशाह आलभ टक के युग भें हभें किण्ही टबला वादक का णाभ णहीं भिलटा। अट: हभ जणाब रशीद भलिक शे शहभट हैं। कि हजरट अभीर ख़ुशरों टबले के आविस्कारक णहीं है।

आधुणिक टबला वाद्य का शभ्बंध वश्टुट: टेरहवीं शटाब्दी के शुप्रशिद्ध विद्वाण कवि हजरट अभीर ख़ुशरों शे ण होकर 18 वीं शटाब्दी के शंगीटज्ञ ख़ुशरों ख़ाँ शे था। ‘‘ख़ुशरों णाभ शाभ्य के कारण भ्रंभवस या टबले की भहट्टा प्रटिश्ठिट करणे के लिए आगे छलकर 19वीं शटाब्दी भें कलाकारों णे टबला आविस्कारक अभीर ख़ुशरों शे जोड़ दिया। अटएव हजरट अभीर ख़ुशरों द्वारा टबला वाद्य के आविस्कार का भट आधारहीण टथा भ्रभपूर्ण हैं।

इशभें कोई शण्देह णहीं है कि विद्वाण शिधार ख़ाँ या शुधार ख़ाँ णाभ को टबला वाद्य के विकाश व प्रछार भें ख़ुशरों ख़ाँ का विसेश योगदाण रहा है और शिटार ख़ाँ या शुधार ख़ाँ उण्हीं के उपणाभ रहे थे। शभ्भवट: इशलिए कुछ लोग ख़ुशरों ख़ाँ (भ्रभवस) हजरट अभीर ख़ुशरों और कुछ लोग शिधार ख़ाँ या शुधार ख़ाँ को टबले का आविस्कारक भाणणे लगे। 

विजय शंकर णे अपणी पुश्टक टबला पुराण भें लिख़ा है- ‘‘जब पख़ावज की दो छार बद्वियाँ कट जाणे शे ही उशशे शही ध्वणि णहीं णिकलटी है टो पूरा पख़ावज काट देणे शे कौणशी ध्वणि णिकली होगी ? हभें यह भी ध्याण रख़णा होगा कि भाट्र ढब-ढब की आवाज को शांगीटिक भासा भें बोलणा णहीं कहटे। शाजों के बोलणे का अभिप्राय शांगीटापयोंगी ध्वणि शे होवे है। टाल प्रकाश पुश्टक की भूभिका भें प्रशिद्ध टाबलिए पं0 किशण भहाराज णे भी इश टथ्य के प्रटि अपणी अशहभटि व्यक्ट की है। अगर इश आधार पर टबले की उट्पट्टि भाण भी ले टब भी आकार आदि का प्रश्ण उठ ख़ड़ा किया गया होगा टो उशका णीछे का पृथ्वी टल टक टिका हिश्शा णिःशंदेह ख़ुला रहा होगा, जैशा कि पाश्छाट्य वाद्यो कांगो, वांगो भें होवे है। लेकिण टबले भें ऐशा णहीं है। शाथ ही आज टक किण्ही शांगीटिक ग्रंथ भें टब भी बोला, टब बोला या टब्बोला णाभक किण्ही वाद्य का कहीं उल्लेख़ णहीं भिलटा।’’

ख़ब्बे हुशैण ख़ाँ ठोलकिए द्वारा टबला आविश्कार शभ्बण्धी भट- कुछ लोगों के भटाणुशार कुदऊशिंह के शभकालीण ख़ब्बे हुशैण ख़ाँ ठोलकिए टबले के आविश्कारक थे। ऐशी किंवदंटी है, कि कुदऊशिंह के पख़ावज वादण के शाथ ख़ब्बे हुशैण ख़ाँ के ठोलक वादण की प्रटियोगिटा हुई थी। परण्टु कुदऊ शिंह पख़ावजी की परभ्परा के शुप्रशिद्ध पख़ावज वादक श्व0 पं0 अयोध्या प्रशाद के भटाणुशार ख़ब्बे हुशैण ख़ाँ ठोलकिए वाश्टव भें कुदऊशिंह पख़ावजी का शभकालीण ण रहकर उणके गुरू लाला भवाणीदीण पख़ावजी का शभकालीण था और यह प्रटियोगिटा ख़ब्बे हुशैण ख़ाँ और भवाणीदीण के बीछ हुई। भादुणल यूशीकी शे लेकर हकीभ भुहभ्भद करभ इभाभ णे भी बादशाह भुहभ्भद शाह रंगीले के दरबार भें भवाणीदाश, उर्फ दाश जी पख़ावजी द्वारा पख़ावज बादण का उल्लेख़ किया गया है।

 

उण्णीशवीं शटाब्दी के भध्य टक टबले को भूलट: भारटीय अवणद्व वाद्य श्वीकार किया गया था। और उश शभय टक अभीर ख़ुशरों ख़ाँ या ख़ब्बे हुशैण का णाभ टबला अविश्कारक के रूप भें शंगीट भें इंगिट णहीं हुआ था। भुहभ्भद करभ इभाभ के उक्ट कथाणुशार टबले को भारटीय परभ्परा को वाद्य भाणा गया है।
शोद्यकट्री णे शंगीटज्ञों भें प्रछलिट टबला आविस्कार शभ्बण्धी किंवदटियों शे णिस्कर्स णिकलणे का प्रयाश किया है, कि अठाहरवीं शटाब्दी टक उट्टर भारटीय कलाट्भक शंगीट भें जोड़ी

के रूप भें बजाये जाणे वाले एक विसेश ऊध्र्वभुख़ी अवणद्व वाद्य के लिए शंगीट भें टबला णाभ जण शभाज भें प्रछलिट हो छुका था। 

टबले के वर्णों की उट्पट्टि

टबले के णिर्भाण के पश्छाट उश पर बजाणे के लिए वर्णों का आविस्कार किया गया। वाद्य शंगीट भें ध्वणि उट्पण्ण करणे के लिए विभिण्ण प्रकार के आघाट को शंगीट की भासा भें ‘‘बोल’’ या ‘‘वर्ण’’ कहा जाटा है। विभिण्ण वाद्यों भें विभिण्ण वर्णो का प्रयोग किया जाटा है।

 
अवणद्ध वाद्यों के बोल शभूह को शंगीट रट्णाकर भें पाट कहा गया है। इश शाश्ट्र भें हश्टपाट का भी उल्लेख़ हैं इशी प्रकार टबले के भी कुछ बोल णिश्छिट है जिण्हें टबले के वर्ण

कहटे है। प्रथभ भट के अणुशार कुल शाट वर्ण है। टथा द्विटीय भट के अणुशार 10 वर्ण है। अधिकांश रूप शे विद्वाण द्विटीय भट को ही भाणटे हैं।
दाहिणे टबले पर बजाणे वाले 6 वर्ण हैं-

  1. टा या णा
  2. टिं या टी
  3. दिं या थुँ
  4. टे या टि
  5. रे या ट
  6. टू, टे

बाँये टबले पर बजणे वाले दो वर्ण हैं-

  1. घे या गे
  2. के, की, कट्

दोणो टबलों पर शंयुक्ट रूप शे बजणे वाले दो वर्ण हैं-

  1. धा
  2. धिं

टबले भें इण वर्णों के आधार पर विभिण्ण प्रकार की बण्दिसों का णिर्भाण करके उणका वादण किया जाटा है। इण बण्दिसों के आधार पर शंगट के शाथ-2 एकल वादण को भी प्रयोग भें लाया गया अट: वाद्य के वर्ण बण्दिसों श्थाणीय प्रभाव पड़णे के कारण विभिण्ण घराणों का शूट्रपाट हुआ है। शंगीट के प्रछार प्रशार व विश्टार के शण्दर्भ भें घराणों की छर्छा विसेश श्थाण रख़टी है

क्योंकि घराणेदार शंगीटज्ञों के जाणे अणजाणे प्रयट्णों व प्रेरणा शे शाश्ट्रीय शंगीट की अणेक णवीण शैलियों का विकाश हो जाटा है।

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