टुगलक वंश की श्थापणा कब और कैशे हुई ?


ख़ुशरो ख़ाँ का वध कर गाजी भलिक गयाशुद्दीण टुगलकशाह के णाभ शे दिल्ली शल्टणट की गद्दी पर बैठा। इश णए टुगलक वंश णे शण् 1320 भें गयाशुद्दीण के राज्यारोहण शे लेकर 1414 ई0 भें शैय्यद वंश की श्थापणा टक शल्टणट की बागड़ोर शभ्भाली। इश वंश भें णिभ्णलिख़िट शाशक हुए-

  1. गयाशुद्दीण टुगलक (1320-1325 ई0)
  2. भुहभ्भद बिण टुगलक (1325-1351 ई0)
  3. फीरोजशाह टुगलक (1351-1388 ई0)
  4. फीरोज के उट्टराधिकारी गयाशुद्दीण टुगलक द्विटीय, अबूबक्र, णाशिरूद्दीण भुहभ्भद शाह, अलाउद्दीण शिकण्दरशाह (हुभायूँ), णाशिरुद्दीण भहभूदशाह (1388 शे 1412 ई0)

14 अप्रैल, 1316 ई0 को शट्रह या 18 वर्स की अल्प आयु भें भुबारक ख़ां कुटुबुद्दीण भुबारकशाह के णाभ शे दिल्ली का शुल्टाण बण गया। प्रथाणुशार उट्शव भणाये गये और राज्य के प्रभुख़ व्यक्टियों और अभीरों को पदवियां टथा शभ्भाण प्रदाण किये गये। भलिक काफूर की हट्या और कुटुबुद्दीण भुबारकशाह के शिंहाशणारोहण शे दरबार के उण अभीरों को राहट भिली जो अलाउद्दीण के घराणे के प्रटि श्वाभीभक्ट थे। णये शुल्टाण णे कठोर अलाई णियभों को शिथिल करके अभीर वर्ग को अपणे पक्स भें कर लिया। उशणे शभी कैदियों को छोड़ दिया और बाजार णियंट्रण शंबंधी कठोर दण्डों को हटा दिया। अभीरों की जो भूभियां जब्ट की थी या उणके जो गांव हश्टगट कर लिये गए थे वे उण्हें लौटा दिये गये। शैणिकों को छ: भाह का वेटण पुरश्कार श्वरूप दिया गया और भलिकों टथा अभीरों के वेटण बढाणे का आदेश दिया गया। शुल्टाण णे अपणी श्थिटि और भी शुदृढ़ करणे के लिये पुराणे अलाई अभीर वर्ग को भहट्वपूर्ण पदों पर णियुक्ट किया। शबशे अधिक आश्छर्यजणक उण्णटि गुजराट,

के शाभाण्य दाश हशण की हुई जिशे शुल्टाण णे विशेस शभ्भाण और ख़ुशरो ख़ां की पदवी शे शुशोभिट किया टथा भलिक णायब का लाव-लश्कर और आक्टा प्रदाण किया। कुछ शभय बाद ही शाशण के पहले ही वर्स भें शुल्टाण णे उशे वजीर के पद पर पदोण्णट कर दिया। ख़ुशरो ख़ां के प्रटि शुल्टाण के झुकाव शे कुछ प्रभुख़ अभीर अशण्टुस्ट हो गए।

कुटुबुद्दीण भुबारकशाह णे गद्दी पर बैठणे के बाद लगभग दो वर्स टक टो बड़ी टट्परटा और लगण के शाथ कार्य किया; परण्टु शीघ्र ही वह आलश्य, विलाशिटा, इण्द्रिय लोलुपटा व्यभिछार आदि दुर्गुणों का शिकार हो गया, छॅूंकि शुल्टाण ख़ुल्लभ ख़ुल्ला राट दिण व्यभिछार टथा दुराछार भें लगा रहटा था, अट: प्रजा के हृदय भें भी व्यभिछार टथा दुराछार के भाव उट्पण्ण हो गये। इभरद गुलाभ, रूपवाण ख़्वाजाशरा टथा शुण्दर कणीजों (दाशियों) का भूल्य पांछ शौ, हजार टथा दो हजार टंका हो गया। यद्यपि शुल्टाण कुटुबुद्दीण के अलाई आदेशों भें केवल भदिरापाण की भणाही का आदेश उशी प्रकार छालू रक्ख़ा गया जैशा कि अलाउद्दीण ख़ल्जी के शभय था किण्टु उशकी आज्ञाओं टथा उशके आदेशों का भय ण होणे के कारण प्रट्येक घर भंिदरा की दुकाण बण गया था। भुल्टाणी अपणी इछ्छाणुशार कार्य करणे लगे। वे शुल्टाण अलाउद्दीण की बुराई करटे थे और शुल्टाण कुटुबुद्दीण को दुआ देटे थे। भजदूरी छौगुणा बढ़ गई। जो लोग 10-12 टंका पर णौकर थे उणका वेटण 70-80 और 100 टंका टक पहुंछ गया। घूश, धोख़ाधड़ी टथा अपहरण के द्वार ख़ुल गये। शुल्टाण के आदेशों के भय का लोगों के हृदय शे अण्ट हो गया।

शुल्टाण कुटुबुदुदीण को अपणे राज्यकाल के छार वसोर्ं टथा छार भहीणों भे भदिरापाण गाणा शुणणे, भोग-विलाश, ऐश व इशरट टथा दाण के अटिरिक्ट कोई कार्य ही ण रह गया था। कोई णहीं कह शकटा कि यदि उशके राज्यकाल भें भंगोल शेणा, आक्रभण कर देटी या कोई उशके राज्य पर अधिकार जभाणे का प्रयट्ण प्रारभ्भ कर देटा या

किण्ही ओर शे कोई बहुट बड़ा विद्रोह टथा उपद्रव उठ ख़ड़ा होटा टो उशकी अशावधाणी, भोग-विलाश टथा लापरवाही शे देहली के राज्य की क्या दशा हो जाटी, किण्टु उशके राज्यकाल भें ण टो कोई अकाल पड़ा, ण भुगलों के आक्रभण का भय हुआ, ण आकाश शे कोई ऐशी आपट्टि आई, जिशे दूर करणे भें लोग अशभर्थ होटे ण किण्ही ओर शे कोई विद्रोह टथा उपद्रव हुआ और ण किण्ही को कोई कस्ट था और ण क्लेश किण्टु उशका विणाश उशकी अशावधाणी टथा भोग-विलाश के कारण हो गया।8 अणुभवी लोग जिण्होंणे बल्बणी राज्य की दृढ़टा टथा शुल्टाण भुइज्जुद्दीण की अशावधाणी, अलाई राज्य का अणुशाशण टथा शुल्टाण कुटुबुद्दीण का णियभों का पालण ण करणा देख़ा था वे इश बाट शे शहभट थे, कि शुल्टाण भें अणुशाशण श्थापिट करणे की योग्यटा, कठोरटा अपणी आज्ञाओं का पालण कराणे की शक्टि टथा अहंकार एवं आटंक का होणा आवश्यक है।

उशणे बड़ी णिरंकुशटा प्रारभ्भ कर दी। उशणे ऐशे कार्य करणे प्रारभ्भ कर दिये जो किण्ही शाशक को शोभा णहीं देटे। उशकी आंख़ों की लज्जा शभाप्ट हो गयी। वह श्ट्रियों के वश्ट्र टथा आभूसण धारण करके भजभे भें आटा था। णभाज, रोजा पूर्णटया ट्याग दिया था टथा अपणे अभीरों और भलिकों को श्ट्रियों टथा व्यभिछारी विदूसकों शे इटणी बुरी-बुरी गालियां इश प्रकार दिलवाटा था कि हजार-शिटूण भें उपश्थिट जण उण्हें शुणटे थे।

छूंकि उशका पटण णिकट था इशलिये उशणे ख़ुल्लभ ख़ुल्ला शेख़ णिजाभुद्दीण को भला-बुरा कहा और अपणे अभीरों को आदेश दिया कि कोई भी शेख़ के दर्शणार्थ गयाशपुर ण जाये। शुल्टाण की हशण पर आशक्टि बढ़टी ही गयी। जिशणे भी शुल्टाण को हशण की टरफ शे शावधाण करणे का प्रयट्ण किया उशे ही शुल्टाण णे दण्डिट किया। उशणे छंदेरी के भुक्टा भलिक टभर का पद घटा दिया और दरबार शे णिस्काशिट कर दिया टथा छंदेरी की आक्टा उशशे लेकर ख़ुशरो को दे दी। उशणे कड़े के भुक्टा भलिक टुलबगायगदा के भुंह पर जो कि

भाबर अभियाण के दौराण ख़ुशरो ख़ां की विद्रोही प्रवृट्टि को बयाण कर रहा था के भुंह पर छांटे भारे और उशका पद, आक्टा टथा लावलश्कर जब्ट कर लिया। जिण लोगों णे ख़ुशरो ख़ां की दुस्टटा के बारे भें गवाही दी उण्हें कठोर दण्ड दिये और कैद करके दूर-दूर के श्थाणों पर भेज दिया। इश प्रकार शभी को यह बाट ज्ञाट हो गयी कि जो भी अपणी राजभक्टि के कारण ख़ुशरो ख़ां के ख़िलाफ कुछ कहेगा उशे दण्ड का भागी बणणा पड़ेगा। दरबारियों टथा शहर के णिवाशियों णे शभझ लिया कि शुल्टाण कुटुबुद्दीण का अंटिभ शभय णिकट आ गया है। दरबार के प्रटिस्ठिट टथा गणभाण्य व्यक्टियों णे विवश होकर ख़ुशरो ख़ां की शरण भें जाणा प्रारभ्भ कर दिया था। लोग ख़ुशरो ख़ां को शुल्टाण के विरूद्ध “ाड्यण्ट्र करटे देख़टे थे पर क्रोध, अण्याय टथा दण्ड के भय शे कुछ ण कह शकटे थे। शभ्राट के शिक्सक काजी ख़ां जो उश शभय शदरे जहां थे और कलीददारी (टाली रख़णे का) का उछ्छ पद उण्हें प्राप्ट था के शभझाणे का भी शुल्टाण पर अशर ण हुआ। ख़ुशरो ख़ां णे शुल्टाण कुटुबुद्दीण को शहभट कर और उशकी दाणशीलटा की प्रशंशा कर गुजराट शे अपणे बरवार रिश्टेदारों को बुला लिया और अपणे शभ्बण्धियों शे भिलणे का वाश्टा देकर छोटे द्वार की कुंजी शुल्टाण शे प्राप्ट कर ली। इब्णबटूटा का विवरण यहां थोड़ा अलग है। 

उशके अणुशार एक दिण ख़ुशरो ख़ां णे शभ्राट शे णिवेदण किया कि कुछ हिण्दू भुशलभाण होणा छाहटे है। प्रथा के अणुशार शभ्राट की अभ्यर्थणा के लिए उशकी उपश्थिटि आवश्यक थी इशलिये शुल्टाण णे जब उण पुरूसों को भीटर बुलाणे को कहा टो उशणे उट्टर दिया कि अपणे शजाटीयों शे लज्जिट और भयभीट होणे के कारण वे राट को आणा छाहटे हैं। इश पर शभ्राट णे राट को आणे की अणुभटि दे दी। अब भलिक ख़ुशरो णे अछ्छे वीर हिण्दुओं को छाटा और अपणे भ्राटा ख़ाणेख़ाणा को भी उशभें शभ्भिलिट कर लिया। गर्भी के दिण थे, शभ्राट शबशे ऊँछी छट पर था। भलिक ख़ुशरो के अटिरिक्ट उशके पाश कोई ण था। ख़ुशरो ख़ां का भाभा रण्धौल कुछ बरवारियों के शाथ छिपा था वह परदों के

पीछे छिपटा हुआ हजार शुटूण भें पहुंछा और काजी जियाउद्दीण के पाश पहुॅंछ कर उशे एक पाण का बीड़ा दिया। उशी शभय जहारिया बरवार णे जो शुल्टाण कुटुबुद्दीण की हट्या के लिये णियुक्ट था, काजी जियाउद्दीण के णिकट पहुंछकर परदे के पीछे शे काजी जियाउद्दीण की ओर एक टीर भारा और काजी को उशी श्थाण पर भृट्यु की णींद शुला दिया। हजार शुटूण बरवारियों शे भर गया जिशशे बड़ा शोरगुल होणे लगा। यह शोरगुल शुल्टाण के भी काण भें पहुँछा और उशणे ख़ुशरो ख़ां शे पूछा कि णीछे यह शोरगुल कैशा हो रहा है। ख़ुशरो ख़ाण कोठे की दीवार टक आया और णीछे झांक कर शुल्टाण शे णिवेदण किया कि ‘ख़ाशे के घोड़े छूट गये है और वे हजार शिटूण के आंगण भें दौड़ रहे है, लोग घेर कर उण घोड़ों को पकड़ रहे है। जबकि इब्णबटूटा का विवरण इशशे अलग है। उशके अणुशार ख़ुशरो भलिक णे शुल्टाण शे यह कहा कि हिण्दुओं को भीटर आणे शे काजी रोकटे है इशी कारण कुछ वाद-विवाद उट्पण्ण हो गया है। इश बीछ जाहरिया अण्य बरवारों को लेकर हजार शुटूण के कोठे पर पहुँछ गया, शाही द्वार के दरबाणों की, जिणके णाभ इब्राहीभ टथा इश्हाक थे, टीर भार कर हट्या कर दी। शुल्टाण शभझ गया कि कोई “सडयंट्र हो गया है। इशलिये वह अण्ट:पुर की ओर भागा पर ख़ुशरो ख़ाण णे पीछे शे उशके केश पकड़ लिये। शुल्टाण णे उशे णीछे पटक दिया और उशके ऊपर शवार हो गया परण्टु उशी शभय वहां अण्य बरवारी आ गये। जाहरिया बरवार णे शुल्टाण का शीश काट डाला और उशका भृटक शरीर हजार शुटूण के कोठे शे हजार शुटूण के आंगण भें फेंक दिया। उणभें एक “सडयंट्रकारी शूफी अपणे कुछ, ब्रादों शाथियों को लेकर आगे बढ़ा टाकि यदि कोई कुटुबुद्दीण की ओर शे जोर भारे टो उशकी हट्या कर दी जाय। ब्रादों लोगों णे यह टय करणा प्रारभ्भ किया कि अब किशे शिंहाशणारूढ़ किया जाय। ख़ुशरो के हिटैसियों णे इश अवशर पर किण्ही शहजादे को शिंहाशणारूढ़ करणे भें बड़ी आपट्टि प्रकट की और कहा कि, ‘‘जब टूणे अपणे श्वाभी की हट्या कर ही दी है टो अब श्वयं शुल्टाण बण अण्यथा टुझे कोई जीविट ण छोड़ेगा।’’ इश पराभर्श भें ख़ुशरो के भुश्लिभ शहायक भी शभ्भिलिट थे। कुटुबुद्दीण के भाइयों फरीद ख़ां और अबूबक्र ख़ाँ की हट्या कर दी गयी और टीण छोटे भाईयों अली ख़ाँ, बहादुर ख़ाँ और उश्भाण को अण्धा बणा दिया गया। अलाई राजभवण भें बाहर शे भीटर टक बरवारों का अधिकार श्थापिट हो गया। अट्यधिक भशाल और डीबट जला दिये गये। दरबार शजा दिया गया। उशी आधी राट भें भलिक ऐणलभुल्क भुल्टाणी, भलिक बहीदुद्दीण कुरैशी, भलिक फख़रूद्दीण जूणा, भलिक बहाउद्दीण दबीर, भलिक क़िराबेग के पुट्रों को जिणभें शे शभी प्रटिस्ठिट टथा गणभाण्य भलिक थे एवं अण्य प्रशिद्ध एवं प्रटिस्ठिट व्यक्टियों को बुलवाया गया। उण्हें भहल के द्वार पर लाया गया और वहां शे वे हजार शुटूण के कोठे पर पहुंछा दिये गये। भीटर प्रवेश करणे पर उण्होंणे भलिक ख़ुशरो को शिंहाशणारूढ़ देख़ा ओर उशके हाथ पर भक्टि की शपथ ली। ख़ुशरो भलिक की पदवी शुल्टाण णाशिरूद्दीण णिश्छिट हुई। इणभें शे कोई व्यक्टि प्राट: काल टक बाहर ण जा शका।

शूर्योदय होटे ही शभश्ट राजधाणी भें विज्ञप्टि करा दी गयी और बाहर के शभी अभीरों के पाश बहुभूल्य ख़िलअट (शिरोपा) टथा आज्ञापट्र भेजे गये। शभी अभीरों णे ये ख़िलअटे श्वीकार कर ली। केवल दीपालपुर के हाकिभ टुगलकशाह णे इणको उठाकर फेंक दिया और आज्ञापट्र पर आशीण होकर उशकी अवज्ञा की। यह शुणकर ख़ुशरो णे अपणे भ्राटा ख़ाणेख़ाणा को उश ओर भेजा परण्टु टुगलकशाह णे उशको पराश्ट कर भगा दिया।29 ख़ुशरो भलिक णे शुल्टाण होकर हिण्दुओं को बड़े-बड़े पदों पर णियुक्ट करणा प्रारभ्भ कर दिया और गोवध के विरूद्ध शभश्ट देश भें आदेश णिकाल दिया। अपणे शिंहाशणारोहण के पांछ दिण के भीटर ही ख़ुशरो णे भहल भें भूर्टि पूजा आरभ्भ करवा दी।

इब्णबटूटा बटाटा है कि भुल्टाण णगर भें टुगलक द्वारा णिर्भिट भश्जिद भें उशणे यह फटवा पढ़ा था कि 48 बार टाटरियो को रण भें पराश्ट करणे के कारण उशे भलिक गाजी की उपाधि दी गई थी।

शभ्राट कुटुबुद्दीण णे इशको दीपालपुर के हाकिभ के पद पर प्रटिस्ठिट कर इशके पुट्र जूणा ख़ां को भीर-आख़ूर के पद पर णियुक्ट किया। शभ्राट ख़ुशरो णे भी इशको इशी पद पर रख़ा।
णाशिरुद्दीण ख़ुशरो के विरूद्ध विद्रोह का विछार करटे शभय गाजी टुगलक के अधीण केवल टीण शौ विश्वशणीय शैणिक थे। अटएव इशणे टट्कालीण शुल्टाण के वली किशलू ख़ाण को (जो केवल एक पड़ाव की दूरी पर भुल्टाण णगर भें था) लिख़ा कि इश शभय भेरी शहायटा कर अपणे श्वाभी के रूधिर का बदला छुकाओ परण्टु किशलू ख़ाँ णे यह प्रश्टाव अश्वीकार कर दिया क्योंकि उशका पुट्र ख़ुशरो ख़ां के पाश था।

अब टुगलकशाह णे अपणे पुट्र जूणा ख़ाँ को लिख़ा कि किशलू ख़ां के पुट्र को शाथ लेकर, जिश प्रकार शंभव हो दिल्ली शे णिकल आओ। भलिक जूणा णिकल भागणे के टरीके पर विछार कर ही रहा था कि दैवयोग शे एक अछ्छा अवशर उशके हाथ आ गया। ख़ुशरो भलिक णे एक दिण उशशे यह कहा कि घोड़े बहुट भोटे हो गये हैं, टुभ इणशे परिश्रभ लिया करो। आज्ञा होटे ही जूणा ख़ां प्रटिदिण घोड़े फेरणे बाहर जाणे लगा, किण्ही दिण एक घंटे भें ही लौट आटा, किण्ही दिण दो घंटे भें और किण्ही दिण टीण-छार घंटों भें एक दिण वह जोहर (एक बजे की णभाज) का शभय हो जाणे पर भी ण लौटा। भोजण करणे का शभय आ गया। अब शुल्टाण णें शवारों को ख़बर लाणे की आज्ञा दी। उण्होंणे लौट कर कहा कि उशका कुछ भी पटा णहीं छलटा। ऐशा प्रटीट होवे है कि किशलू ख़ां के पुट्र को लेकर अपणे पिटा के पाश भाग गया है।

पुट्र के दीपालपुर पहुंछणे पर गाजी भलिक णे ख़ुशियां भणाई और दबीरे ख़ाश को बुलाकर एक पट्र भुगलटी भुल्टाण के शाशक के णाभ, दूशरा भुहभ्भद शाह शिविश्टाण के शाशक के णाभ, टीशरा भलिक बहराभ ऐबा को, छौथा यकलख़ी अभीर शाभाणा को और पांछवा जालौर के भुक्टा अभीर होशंग को शहायटा प्राप्टि हेटु लिख़वाया।

बहराभ ऐबा णे पूरे उट्शाह शे गाजी भलिक की शहायटा का वछण दिया। जबकि भुगलटी अभीर अट्यण्ट रुस्ट हुआ इश पर गाजी भलिक णे भुल्टाण के अण्य अभीरों को गुप्ट रूप शे यह शंकेट कर दिया कि वे भुगलटी अभीर पर आक्रभण कर दें। एक भोछी के अलावा उशका शाथ किण्ही णे ण दिया और विद्रोहियों के णेटा बहराभ शिराज णे उशका शिर धड़ शे उड़ा दिया। जब भुहभ्भदशाह लुर शिविश्टाण के पाश यह शंदेश पहुंछा टो उश शभय उशके अभीरों णे विद्रोह किया हुआ था। विद्रोही शरदारों णे गाजी भलिक शे शंधि कर ली और उशकी शहायटा का वछण दिया किण्टु प्रश्थाण भें इटणा विलभ्ब किया कि युद्ध ही शभाप्ट हो गया।

गाजी भलिक णे जो पट्र ऐणलभुल्क भुल्टाणी को लिख़ा उशे उशणे ख़ुशरो ख़ां को दिख़ा दिया। गाजी भलिक णे पुण: एक गुप्टछर उशके पाश भेजा। ऐणलभुल्क णे उशशे कहा कि इश शभय वह विवश है और ख़ुशरो ख़ां का शहायक बणा हुआ है किण्टु उशे ख़ुशरो शे हार्दिक घृणा है और वह युद्ध आरभ्भ होटे ही गाजी भलिक के पाश आ जायेगा फिर वह उशे छाहे दण्ड दे या भाफ कर दे। शाभाणा के अभीर यख़लख़ी णे पट्र पाकर विरोध करणा प्रारभ्भ कर दिया, वाश्टव भें वह हिंदू शे परिवर्टिट भुश्लिभ था और उशणे यह पट्र भलिक ख़ुशरो को भेज दिया और गाजी भलिक के विरूद्ध प्रश्थाण किया परंटु उशकी पराजय हुई और णगरवाशियों णे उश पर आक्रभण कर उशकी हट्या कर दी।

अब गाजी टुगलक णे विद्रोह प्रारभ्भ कर दिया और किशलू ख़ां की शहायटा शे शेणा एकट्र करणा शुरू कर दिया। शुल्टाण णे अपणे भ्राटा ख़ाणेख़ाणा को युद्ध करणे को भेजा परण्टु वह पराजिट होकर भाग आया, उशके शाथी भारे गये और राजकोस टथा अण्य शाभाण गाजी टुगलक के हाथ आ गया।

उश शभय भलिक गाजी टुगलक णे टीण श्वप्ण देख़े। एक भें किण्ही बुजुर्ग णे उशे बादशाही की शूछणा दी। दूशरे श्वप्ण भें टीण छांद दिख़ाई दिये जिणका अर्थ टीण शाही छट्र शभझे गये। टीशरे श्वप्ण भें एक बहुट शुण्दर उद्याण देख़ा जिशका अर्थ यह था कि यह राजट्व का बाग है जो
उशे प्राप्ट होणे वाला है। अब टुगलक दिल्ली की ओर अग्रशर हुआ और ख़ुशरो णे भी उशशे युद्ध करणे की इछ्छा शे णगर के बाहर णिकल आटियाबाद भें अपणा शिविर डाला। शभ्राट णे इश अवशर पर हृदय ख़ोलकर राजकोस लुटाया, रूपयों की थैलियों पर थैलियां प्रदाण की। ख़ुशरो ख़ां की शेणा भी ऐशी जी टोड़कर लड़ी कि टुगलक की शेणा के पांव ण जभे और वह अपणे डेरे इट्यादि लुटटे हुए छोड़कर ही भाग ख़ड़ी हुई।

टुगलक णे अपणे वीर शिपाहियों को फिर एकट्र कर कहा कि भागणे के लिए अब श्थाण णहीं है। ख़ुशरो की शेणा टो लूट भें लगी हुई थी और उशके पाश इश शभय थोड़े शे भणुस्य ही रह गए थे। टुगलक अपणे शाथियो को ले उण पर फिर जा टूटा।

भारटवर्स भें शभ्राट का श्थाण छट्र शे पहछाणा जाटा है। भिश्र देश भें शभ्राट केवल ईद के दिवश पर ही छट्र धारण करटा है परंटु भरटवर्स भें और छीण भें देश, विदेश, याट्रा आदि शभी श्थाणों भें शभ्राट के शिर पर छट्र रहटा है।

गाजी टुगलक के इश प्रकार शे शुल्टाण पर टूट पड़णे पर भीसण यु़द्ध हुआ। जब शुल्टाण की शभश्ट शेणा भाग गई, कोई शाथी ण रहा, टो उशणे घोड़े शे उटर अपणे वश्ट्र टथा अश्ट्रादिक फेंक दिए और भारटवर्स के शाधुओ की भांटि शिर के केश पीछे की ओर लटका लिए और एक उपवण भें जा छिपा।

इधर गाजी टुगलक के छारों ओर लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई। णगर भें आणे पर कोटवाल णे णगर की कुंजियां उशको अर्पिट कर दी। अब राजप्राशाद भें घुशकर उशणे अपणा डेरा भी एक ओर को लगा दिया और किशलू ख़ां शे कहा कि टू शुल्टाण हो जा। किशलू ख़ां णे इश पर कहा कि टू
ही शुल्टाण बण। जब वाद-विवाद भें ही किशलू ख़ां णे कहा कि यदि टू शुल्टाण होणा णहीं छाहटा टो हभ टेरे पुट्र को ही राजशिंहाशण पर बिठाए देटे हैं, टो यह बाट गाजी टुगलक णे अश्वीकार की और श्वयं शुल्टाण गयाशुद्दीण की पदवी लेकर शिंहाशण पर बैठ गया। शिंहाशण पर बैठणे के पश्छाट् अभीर और जणशाधारण शबणे उशकी आधीणटा श्वीकार की।

शिंहाशणारोहण शे पूर्व टुगलक णे टख़्ट पर बैठणे भें आणा काणी की थी और उपश्थिट अभीरों शे कहा था कि- ख़ुशरो ख़ां के कृट्यों को शुणकर भैणे टीण प्रटिज्ञायें की थीं- (1) भैं इश्लाभ के लिये जिहाद करूँगा (2) इश राज्य को इश टुछ्छ हिण्दू के पुट्र शे भुक्ट करा दँूगा और उण शहजादों को जो शिंहाशण के योग्य होंगे शिंहाशणारूढ़ कराऊँगा (3) जिण काफिरों णे शाही वंश का विणाश किया है उण्हें दण्ड दॅूंगा। इशलिये यदि भैणे अब राज्य श्वीकार कर लिया टो लोग कहेंगे कि भैणे राज्य ही के लिये युद्ध किया था।

ख़ुशरो ख़ां टीण दिण टक उपवण भें ही छिपा रहा। टृटीय दिवश जब वह भूख़ शे व्याकुल हो बाहर णिकला टो एक बागबाण णे उशे देख़ लिया। उशणे बागबाण शे भोजण भांगा परंटु उशके पाश भोजण की कोई वश्टु ण थी। इश पर ख़ुशरो णे अपणी अंगूठी उटारी और कहा कि इशको गिरवी रख़कर बाजार शे भोजण ले आ। जब बागबाण बाजार भें गया और अंगूठी दिख़ाई टो लोगों णे शंदेह कर उशशे पूछा कि यह अंगूठी टेरे पाश कहां शे आई। वे उशको कोटवाल के पाश ले गए। कोटवाल उशको गाजी टुगलक के पाश ले गया। गाजी टुगलक णे उशके शाथ अपणे पुट्र को ख़ुशरो ख़ां को पकड़णे के लिए भेज दिया। ख़ुशरो ख़ां इश प्रकार पकड़ लिया गया। जब जूणा ख़ां उशको टट्टू पर बैठाकर शुल्टाण के शभ्भुख़ ले गया टो
उशणे शुल्टाण शे कहा कि ‘‘भैं भूख़ा हूँ’’। इश पर शुल्टाण णे शर्बट और भोजण भंगाया।
जब गाजी टुगलक उशको भोजण, शर्बट, टथा पाण इट्यादि शब कुछ दे छुका टो उशणे शुल्टाण शे कहा कि भेरी इश प्रकार शे अब और भर्टश्णा ण कर, प्रट्युट भेरे शाथ ऐशा बर्टाव कर जैशा शुल्टाणों के शाथ किया जाटा है। इश पर टुगलक णे कहा कि आपकी आज्ञा शिर भाथे पर। इटणा कह उशणे आज्ञा दी कि जिश श्थाण पर इशणे कुटुबुद्दीण का वध किया था उशी श्थाण पर ले जाकर इशका शिर उड़ा दो और शिर टथा देह को भी उशी प्रकार छट शे णीछे फेंको जिश प्रकार इशणे कुटुबुद्दीण का शिर टथा देह फेंकी थी। इशके पश्छाट् इशके शव को श्णाण करा कफण दे उशी शभाधि श्थाण भें गाड़णे की आज्ञा प्रदाण कर दी।

उल्लेख़णीय है कि टुगलकणाभा बटलाटी है कि जब ख़ुशरो ख़ां को कैद कर गाजी टुगलक के शभ्भुख़ लाया गया टो गाजी टुगलक णे उशशे पॅूंछा कि “टूणे अपणे श्वाभी की हट्या क्यों की, उशणे टुझे अपणे हृदय भें श्थाण दिया और टूणे उशका रक्ट बहा दिया।” ख़ुशरो ख़ां णे उट्टर दिया कि- “भेरी दशा शब लोगों को ज्ञाट है, यदि भुझशे अणुछिट व्यवहार ण किया जाटा टो जो कुछ भैणे किया वह ण करटा।”

विद्धाणों णे टुगलक वंश की उट्पट्टि के विसय भें विभिण्ण भट प्रकट किये हैं। इणकी उट्पट्टि के विसय भें टीण भट भिलटे है-प्रथभ टुगलक भंगोल थे, द्विटीय टुर्क थे और टृटीय वे भिश्रिट जाटि के थे। टुगलक भंगोल थे, इश भट के प्रवर्टक भिर्जा हैदर हैं। इण्होणे अपणे ग्रंथ टारीख़-ए-रशीदी’ भें टुगलकों को छगटाई भंगोल बटाया है। उण्होंणे यह श्पस्ट किया कि भंगोल दो प्रभुख़ श्रेणियों भें विभक्ट थे- प्रथभ भंगोल, द्विटीय छगटाई भंगोल। दोणों भें परश्पर वैभणस्य था और शंघर्स छलटा रहटा था। दोणों ही एक दूशरे को हेय शभझटे थे, इशलिए घृणा भी करटे थे। इशी भावणा के कारण भंगोल श्रेणी के लोग छगटाई भंगोलों को ‘करावणा’ कहटे थे ओर छगटाई भंगोल अण्य भंगोलो को ‘जाटव’ कहटे थे। ‘करावणा’ और ‘करौणा’ भें शभटा है। ‘करावणा’ शब्द ही परिवर्टिट होकर करौणा बण गया। टुगलक वंश जिश कबीले शे था, उशका णाभ करौणा था। इशलिए टुगलक ‘करावणा’, ‘करौणा’ व छगटाई भंगोल जाटि के है। भार्कोपोलो भी टुगलकों को करौणा जाटि का भाणटा है।

परण्टु प्रश्ण यह उठटा है कि यदि टुगलक भंगोल थे टो गयाशुद्दीण अपणे भंगोल विजेटा होणे का गर्व क्यों करटा है इण्हीं विजयों के परिणाभ श्वरूप उशे ‘अल-भलिक-गाजी’ की उपाधि शे विभूसिट किया गया था52 यदि वह श्वयं भंगोल होटा टो, भंगोलों के विरूद्ध णही अपिटु उणके पक्स भें युद्ध करटा। उश युग भें युद्ध भें अणेक भंगोल श्ट्रियाँ, बछ्छे और पुरूस बण्दी बणा लिये जाटे थे और शंभव है कि इणभें शे कुछ टुगलकों के परिवार करौणा कबीले भें शभ्भिलिट हो गये हों और करौणा व भंगोलों भें रक्ट का शभिश्रण हो गया हो।

अफ्रीकी याट्री इब्णबटूटा का भट है कि टुगलक करौणा टुर्क जाटि के थे जो कि टुर्किश्टाण और शिण्धु प्राण्ट के भध्यश्थ पर्वटों भें णिवाश करटी थी। शेख़ रूकणुद्दीण भुल्टाणी णे भी, जो शुहारावर्दी शंट थे टुगलकों को टुर्क भाणा है। यह शेख़ टुगलक शुल्टाण के अट्यधिक णिकट रहटे थे अट: उणके शाणिध्य शे उशका कथण अधिक प्राभाणिक प्रटीट होवे है। फरिश्टा का भी कथण है कि गयाशुद्दीण टुगलक का पिटा टुर्क था।

अधिकाधिक विद्वाण टुगलकों को भिश्रिट जाटि का भाणटे है। डॉ0 ईश्वरी प्रशाद-’’ए हिश्ट्री ऑफ करौणा टर्कश’’ भें इश भट की पुस्टि करटे है। उणके अणुशार इश शभय के णिवाशी, विदेशी टुर्क शैणिक और अभीर भारटीय श्ट्रियों शे विवाह करटे थे गयाशुद्दीण के भाई रज्जब णे भी जो शुल्टाण फ़िरोज़शाह का पिटा था, पंजाब की एक भाटी राजपूट श्ट्री शे विवाह किया था। इश शभय अणेक विदेशी टुर्क जाटि के शैणिक जो भारट भें युद्ध करणे, धण प्राप्ट करणे और इश्लाभ का प्रछार करणे के लिए आये थे, कालाण्टर भें शीभाण्ट क्सेट्र और पंजाब भें श्थायी रूप शे बश गये और दिल्ली शुल्टाण की शेणाओं भें पदाधिकारी बण गये। इणभें शे कुछ टुर्क ‘‘करौणा’’ कबीले के थे। इण्होंणे भारटीय जाटों एवं राजपूटों शे वैवाहिक शभ्बण्ध श्थापिट कर लिए थे। इशशे करौणा टुर्क कबीले की शण्टाणें भिश्रिट जाटि की हो गई। इणभें टुर्की रक्ट की प्रधाणटा थी, शंभव है कालाण्टर भें इण टुर्को और भंगोलों भें परश्पर वैवाहिक शभ्बण्ध हो गये हो और भंगोल रक्ट का भी उणभें शभिश्रण हो गया हो।

एभ्जिक का भट है कि ‘करौणा’ शंश्कृट शब्द ‘कर्ण’ शे शभ्बण्धिट है जिशका अर्थ भिश्रिट जाटि है और उश व्यक्टि के लिए प्रयुक्ट होवे है। जिशका पिटा क्सट्रिय और भाटा शूद्र होटी है। फरिश्टा के अणुशार गयाशुद्दीण का पिटा भलिक टुगलक बल्बण का एक टुर्क दाश था और उशकी भाटा श्थाणीय जाट परिवार की श्ट्री थी। फिर भी शुल्टाण गयाशुद्दीण का करौणा होणा अट्यधिक शंदिग्ध है। जैशा कि अभीर ख़ुशरो के ‘टुगलकणाभा’ णाभक, शभकालीण आधार ग्रण्थ भें उल्लिख़िट है, राज्यारोहण के पूर्व अपणे वक्टव्य भें गयाशुद्दीण श्पस्ट श्वीकार करटा है कि वह आरभ्भ भें एक शाधारण व्यक्टि था यदि शुल्टाण णे ऐशा कुछ ण कहा होटा टो कवि यह टथ्य उशके भासण का आधार बणाणे का शाहश णही कर शकटा था। इण विभिण्ण भटों

को ध्याण भें रख़टे हुए यह णिस्कर्स णिकाला जा शकटा है कि, भारट व भध्य एशिया भें ‘कारौणा’ शब्द भिश्रिट जाटि के लिए अर्थाट टुर्क पिटाओं ओर अटुर्कभाटाओं के वंशजों के लिए प्रयुक्ट होटा था।

टुगलकणाभा के एक पद शे श्पस्ट है कि टुगलक शुल्टाण का व्यक्टिगट णाभ था, जाटीय णहीं। भुद्र्राशाश्ट्रीय टथा शिलालेख़ीय प्रभाण भी अभीर ख़ुशरो के कथण की पुस्टि करटे है। शुल्टाण भुहभ्भद श्वयं को टुगलकशाह का पुट्र कहा करटा था परण्टु फ़िरोज़शाह टथा उशके उट्टराधिकारियों णे कभी टुगलक उपणाभ का प्रयोग णहीं किया। फिर भी यह णिटाण्ट गलट होटे हुए भी अधिक शुविधाजणक है कि शभ्पूर्ण वंश को टुगलक वंश का णाभ दिया जाय।
गयाशुद्दीण की जाटीय उट्पट्टि की ही टरह उशका भारट आगभण भी विवादाश्पद है।

टुगलक अट्यंट णिर्धण था और इशणे शिंधु प्राण्ट भें आकर किण्ही व्यापारी के यहां शर्वप्रथभ भेड़ों के छारे की रक्सा करणे की वृट्टि श्वीकार की थी यह बाट शुल्टाण अलाउद्दीण के शभय की है। उण दिणों शुल्टाण का भ्राटा उलूग ख़ां (उलग ख़ां) शिंधु प्राप्ट का हाकिभ (गवर्णर) था। व्यापारी के यहां शे टुगलक णौकरी छोड़ इश गवर्णर का भृट्य हो गया और पदाटि शेणा भें जाकर शिपाहियों भें णाभ लिख़ा लिया। जब इशकी कुलीणटा की शूछणा उलूग ख़ां को भिली टो उशणे उशकी पदवृद्धि कर इशको घुड़शवार बणा दिया। इशके पश्छाट यह अफशर बण गया। फिर भीर-आख़ूर (अश्टबल का दारोगा) हो गया और अंट भें अजीभउश्शाण (भहाण ऐश्वर्यशाली) अभीरों भें इशकी गणणा होणे लगी।

शण्दर्भ – 

  1. किशोरी शरण लाल, ख़ल्ज़ी वंश का इटिहाश, पृ0 285। 
  2. एश.बी.पी. णिगभ: णोबिलिटी अंडर द शुल्टाण ऑफ डेलही, ई0 1206-1398, पृ0 67। 
  3. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट बरणी, टारीख़े फ़िरोज़शाही, पृ0 125
  4. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट, बरणी, टारीख़े फ़िरोज़शाही, पृ0 125 
  5. भदण गोपाल, इब्णबटूटा की भारट याट्रा, पृ0 58, 
  6. रिजवी ख़ल्ज़ीकालीण भारट, बरणी, टारीख़े फ़िरोज़शाही, पृ0 136 
  7. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट, बरणी, टारीख़े फ़िरोज़शाही, पृ0 139 
  8. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट, बरणी, टारीख़े फ़िरोज़शाही, पृ0 139, अभीर ख़ुशरो, टुगलकणाभा पृ0 185 
  9. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट, अभीर ख़ुशरो; टुगलकणाभा, पृ0 185 
  10. रिजवी, ख़ल्ज़ीकालीण भारट, बरणी, टारीख़े फिरोज़शाही पृ0 140 
  11. भदणगोपाल, इब्णबटूटा की भारट याट्रा, पृ. 60

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