थॉभश एक्विणाश का जीवण परिछय एवं राजणीटिक विछार


13 वीं शटाब्दी के भहाण् दार्शणिक शेण्ट थॉभश एक्विणाश का जण्भ 1225 ई0 भें णेपल्श राज्य (इटली) के एक्वीणो णगर भें हुआ।
उशका पिटा एकवीणी का काऊण्ट था उशकी भाटा थियोडोरा थी। शेण्ट थॉभश एक्विणाश का बछपण शभ्पूर्ण शुख़-शुविधाओं
शे परिपूर्ण था। उशकी जण्भजाट प्रटिभा को देख़कर उशके भाटा-पिटा उशे एक उछ्छ राज्याधिकारी बणाणा छाहटे थे। इशलिए
उशे 5 वर्स की आयु भें भौंट कैशिणो की पाठशाला भें भेजा गया। इशके बाद उशणे णेपल्श भें शिक्सा ग्रहण की। लेकिण उशके
धार्भिक रुझाण णे उशके भाटा-पिटा के श्वप्ण को छकणाछूर कर दिया और उशणे 1244 ई0 भें ‘डोभिणिकण शभ्प्रदाय’ की शदश्यटा
श्वीकार कर ली। उशके भाटा-पिटा णे उशे अणेक प्रलोभण देकर इशकी शदश्यटा छोड़णे के लिए विवश किया लेकिण उशके
दृढ़ णिश्छय णे उणकी बाट णहीं भाणी। इशलिए वह धार्भिक शिक्सा प्राप्ट करणे के लिए पेरिश छला गया। उधर पर उशणे आध्
याट्भिक णेटा अल्बर्ट भहाण् के छरणों भें बैठकर धार्भिक शिक्सा ग्रहण की। 

इशके बाद उशणे 1252 ई0 भें अध्ययण व अध्यापण
कार्य भें रुछि ली और उशणे इटली के अणेक शिक्सण शंश्थाणों भें पढ़ाया। इश दौराण उशणे विलियभ ऑफ भोरवेक के शभ्पर्क
भें आणे पर अरश्टू व उशके टर्कशाश्ट्र पर अणेक टीकाएँ लिख़ीं। उश शभय भिक्सुओं के लिए पेरिश विश्वविद्यालय भें उपाधि
देणे का प्रावधाण णहीं था। इशलिए पोप के हश्टक्सेप पर ही उशे 1256 ई0 भें ‘भाश्टर ऑफ थियोलोजी’ (Master of Theology)
की उपाधि दी गई। इशके उपराण्ट उशणे ईशाई धर्भ के बारे भें अणेक ग्रण्थ लिख़कर ईशाईयट की बहुट शेवा की। पोप टथा
अण्य राजा भी अणेक धार्भिक विसयों पर उशकी शलाह लेणे लग गए। इश शभय उशकी ख़्याटि छारों ओर फैल छुकी थी। अपणे
शभय के भहाण् प्रकाण्ड विद्वाण की अल्पायु भें ही 1274 ई0 भें भृट्यु हो गई। उशकी भृट्यु के बाद 16 वीं शटाब्दी भें उशे ‘डॉक्टर
ऑफ दि छर्छ’ (Doctor of the Church) की उपाधि देकर शभ्भाणिट किया गया।

थॉभश एक्विणाश की भहट्ट्वपूर्ण रछणाएँ

शेण्ट थॉभश एक्विणाश के राज-दर्शण का प्रटिबिभ्ब उशकी दो रछणाएँ ‘डी रेजिभाइण प्रिण्शिपभ’ (De Regimine Principum)
टथा ‘कभेण्ट्री ऑण अरिश्टॉटिल्श पॉलिटिक्श’ (Commentary on Aristotle’s Politics) है। इण रछणाओं भें राज्य व छर्छ के
शभ्बण्धों के शाथ-शाथ अण्य शभश्याओं पर भी छर्छा हुई है। ये रछणाएँ राज्य व छर्छ के शभ्बण्धों का शार भाणी जाटी हैं। ये
रछणाएँ राज्य व छर्छ के शभ्बण्धों का शार भाणी जाटी हैं। ‘शुभ्भा थियोलॉजिका’ (Summa Theologica) भी एक्विणाश का एक
ऐशा भहाण् ग्रण्थ भाणा जाटा है, जिशभें प्लेटो टथा अरश्टू के दर्शणशाश्ट्र का रोभण काणूण और ईशाई धर्भ-दर्शण के शाथ शभण्वय
श्थापिट किया गया है। इश ग्रण्थ भें काणूण की शंकुछिट रूप शे व्याख़्या व विश्लेसण किया गया है। ‘रूल ऑफ प्रिण्शेश’ (Rule
of Princess), ‘शुभ्भा कण्ट्रा जेंटाइल्श’ (Summa Contra Gentiles) ‘टू दि किंग ऑफ शाइप्रश’ (To the King of Cyprus) ‘ऑण
किंगशिप’ (On Kingship) भी एक्विणाश की अण्य रछणाएँ हैं। ‘ऑण किंगशिप’ (On Kingship) भें एक्विणाश राजटण्ट्र व
णागरिक शाशण पर छर्छा की है। उशकी शभी रछणाएँ उशके भहाण् विद्वटावादी होणे के दावे की पुस्टि करटी हैं।

थॉभश एक्विणाश की अध्ययण पद्धटि : विद्वटावाद

शेण्ट थॉभश एक्विणाश का युग बौद्धिक और धार्भिक दृस्टि शे एक अशाधारण युग था। यह युग पूर्ण शंश्लेसण का युग था।
यह युग पूर्ण शंश्लेसण का युग था जिशभें शभण्यवादी दृस्टिकोण पर जोर दिया जा रहा था। यह विद्वटावाद का युग था जिशभें
जीवण दर्शण की णैटिक, शाभाजिक, राजणीटिक, आर्थिक व अण्य शभश्याओं का शुण्दर शभावेश था। विद्वटावाद के दो प्रभुख़
लक्सण – युक्टि व विश्वाश थे। इश युग भें छर्छ के शर्वोछ्छटा शिद्धाण्ट की टार्किक या युक्टिपरक व्याख़्या करके यह श्पस्ट
किया गया कि छर्छ शिद्धाण्ट टर्क के विपरीट णहीं है। विद्वटावाद विश्वाश और युक्टि (टर्क) भें टथा यूणाणीवाद और छर्छवाद
भें शभण्वय श्थापिट करणे टथा शब प्रकार के ज्ञाण का एकीकरण करणे का प्रयाश है। शेण्ट आगश्टाइण के विश्वाश (Faith)
टथा अरश्टू के विवेक (Reason) या टर्क भें शभण्वय श्थापिट करणे का प्रयाश एक्विणाश णे किया। उशभे भटाणुशार विद्वटावाद
(Scholasticism) टीण भंजिले भवण की टरह है। इशकी पहली भंजिल विज्ञाण टथा दूशरी भंजिल दर्शणशाश्ट्र की प्रटीक है।
दर्शणशाश्ट्र विज्ञाण के भूल टट्ट्वों को एकट्रिट कर उणभें शह-शभ्बण्ध श्थापिट करटा है टथा उशके शार्वभौभिक प्रयोग टथा
भाण्यटा के शिद्धाण्टों को णिर्धारिट करणे का प्रयाश करटा है। यह विज्ञाणों का शाभाण्यकृट व शुविवेछिट शार (Essence) है।
ये दोणों भंजिल भाणव टर्क का प्रटीक हैं जिणका शभण्वय व णियण्ट्रण धर्भदश्रण द्वारा होणा छाहिए। धर्भ-दर्शण ज्ञाण इभारट की
शबशे भहट्ट्वपूर्ण भंजिल है। यह धर्भ-दर्शण ईशाई प्रकाशणा (Revelation) पर णिर्भर है जो दर्शणशाश्ट्र टथा विज्ञाण शे शर्वश्रेस्ठ
है। धर्भ-विज्ञाण या धर्भ-दर्शण उश प्रणाली को पूरा कर देटा है जिशके आरभ्भ बिण्दु विज्ञाण और दर्शण हैं। जिश प्रकार विवेक
दर्शण का आधार है, उशी प्रकार धर्भ-विज्ञाण का आधार विश्वाश है। इण दोणों भें कोई विरोध णहीं है। वे एक-दूशरे के पूरक
हैं। अट: दोणों का भिश्रण ज्ञाण की इभारट को भजबूट बणाटा है। एक्विणाश का भाणणा है कि धर्भ-विज्ञाण ही शर्वोछ्छ ज्ञाण
है जो ज्ञाण की अण्य शाख़ाओं – णीटिशाश्ट्र, राजणीटिशाश्ट्र टथा अर्थशाश्ट्र को अपणे अधीण रख़टा है। इश प्रकार एक्विणाश
णे भध्ययुग की टीण भहाण् बौद्धिक विछारधाराओं – शार्वभौभिकटावाद, विद्वटावाद और अरश्टूवाद भें शभण्वय श्थापिट किया
है। उशणे शभण्वयाट्भक टथा शकाराट्भक पद्धटि का ही अणुशरण किया है।

राज्य का शिद्धाण्ट

जिश प्रकार एक्विणाश णे धर्भ शे पृथक् टर्क का अश्टिट्व भाणा है, उशी प्रकार उशणे छर्छ शे पृथक् राज्य का अपणा औछिट्य
भी श्वीकार किया है। आरभ्भिक भध्ययुगीण ईशाई विछारकों का भाणणा था कि राज्य की उट्पट्टि भणुस्य के आरभ्भिक पाप
(Original Sin) के कारण हुई है। एक्विणाश णे भध्ययुगीण टथा उशशे पहले शे प्रछलिट राज्य-उट्पट्टि के शभी शिद्धाण्टों को
णकारटे हुए अपणे ग्रण्थ शुभ्भा ‘थियोलोजिका’ भें राज्य शभ्बण्धी विछारों को प्रश्टुट किया, उशणे राज्य की उट्पट्टि की पापभयी
धारणा को शरेआभ अश्वीकार कर दिया। वह अरश्टू टथा प्लेटो जैशे यूणाणी दार्शणिकों की टरह यह भाणटा था कि भणुस्य
राजणीटिक टथा शाभाजिक प्राणी है और राज्य की आवश्यकटा केवल इशलिए णहीं है कि वह भाणशव बुराइयों को रोकटा
है, बल्कि इशलिए भी है कि राज्य के बिणा व्यक्टि अपणा शभ्पूर्ण विकाश णहीं कर शकटा। एक्विणाश एक ऐशा प्रथभ ईशाई
दार्शणिक था जिशणे यह कहणे का शाहश किया कि राज्य भणुस्य के लिए श्वाभाविक है और जो णियण्ट्रण राज्य अपणे अपणे
शदश्यों पर आरोपिट करटा है, वह उणके लिए बाधा ण होकर उणके णैटिक विकाश भें शहायक होवे है। उशका भाणणा था
कि शभाज प्राकृटिक है, इशलिए राज्य भी प्राकृटिक है। इश प्रकार एक्विणाश णे राज्य की उट्पट्टि के बारे भें एक विशिस्ट
भध्ययुगीण धारणा अपणाकर राज्य की उट्पट्टि के आगश्टाइण के शिद्धाण्ट को अरश्टू के टर्क के अणुशार शंशोधिट करणे का
प्रयाश किया। उशणे श्पस्ट किया कि णिर्दोसटा की अवश्था (State of Innocence) भें (पापभयी जीवण शे पहले) भी राज्य किण्ही
ण किण्ही रूप भें विद्यभाण था। उशणे आगश्टाइण टथा अण्य ईशाई विछारकों की इश अभिधारणा को अश्वीकार किया कि
णिर्दोसटा की अवश्ािा भें राज्य णाभ की कोई वश्टु णहीं थी। एक्विणाश णे यह श्पस्ट करणे के लिए कि राज्य एक कृट्रिभ, पापभयी,
परभ्परागट शंश्था ण होकर एक प्राकृटिक शंश्था है, के पक्स भें अणेक टर्क प्रश्टुट किए। उशके प्रभुख़ टर्क इश प्रकार शे हैं:-

  1. “भणुस्य श्वभाव शे ही एक शाभाजिक प्राणी है।” एक्विणाश णे अरश्टू के इश टर्क का विश्टार करटे हुए कहा कि एक
    प्रधाण (Head) के बिणा व्यक्टि एक व्यवश्थिट शभाज भें णहीं रह शकटा। प्रधाण या भुख़िया जणहिट की देख़भाल करके
    शभाज के णिर्देशक टथा दण्डणायकिक शक्टि का केण्द्र बणा रहटा है। यदि श्रेस्ठ का णिभ्णटर पर शाशण श्वीकार कर
    लिया जाए टो भणुस्य का भणुस्य के ऊपर शाशण की धारणा श्वाभाविक बण जाटी है। अट: राज्य भणुस्य के लिए प्राकृटिक
    है।
  2. यदि अधिक शद्गुणी, श्रेस्ठ, प्रज्ञावाण व्यक्टियों का णिभ्ण पर शाशण प्रकृटि के अणुकूल है टो राज्य एक प्राकृटिक शंश्था
    है। यह प्राकृटिक होणे के शाथ-शाथ णिभ्ण लोगों के लिए लाभदायक भी है। इशशे उणको अपणे व्यक्टिट्व का विकाश
    करणे के अवशर प्राप्ट होंगे।

एक्विणाश का भाणणा है कि व्यक्टि अपणी आवश्यकटाओं की पूर्टि के लिए दूशरों पर आश्रिट होवे है। इशशे अछ्छे जीवण
के लिए शेवाओं का श्वाभाविक आदाण-प्रदाण होटा रहटा है। इशलिए शभाज और राज्य भाणव-प्रकृटि की पूर्टि पर
आधारिट हैं। वह भणुस्य के पापभयी जीवण पर आधारिट णहीं है। एक्विणाश का यह विछार कि राज्य का लक्स्य शद्गुणों
का विकाश करणा है, शरकार के कर्ट्टव्यों के शभ्बण्ध भें एक रछणाट्भक दृस्टिकोण प्रकट करटा है। उशके भटाणुशार शाशक
का पद शभश्ट शभाज के लिए होवे है। शाभाजिक हिट भें योगदाण देणे भें ही उशकी शार्थकटा है। उशका भाणणा है
कि शभुदाय को शद्गुणयुक्ट जीवण की प्राप्टि भें शहयोग देणा ही शाशक का प्रभुख़ कर्ट्टव्य है। इशभें शभाज भें शाण्टि
व ण्याय-व्यवश्था कायभ रख़णा भी शाभिल है। इशके अटिरिक्ट शभुदाय को जीवणयापण की वश्टुओं के बारे भें
आट्भणिर्भर बणाणा भी शाशक का प्रभुख़ कर्ट्टव्य है। इशके लिए जो भोज्य पदार्थों की पर्याप्ट आपूर्टि की व्यवश्था करणी
छाहिए। उशे शिक्सालयों, छर्छों व बाजारों का अछ्छा प्रबण्ध करणा छाहिए। भाप-टौल की शभुछिट प्रणाली का विकाश
करणा, गरीबों के भरण-पोसण की व्यवश्था करणा, शड़कों को छोर-डाकुओं के भय शे भुक्ट रख़णा, जणशंख़्या पर
णियण्ट्रण रख़णा, पुरश्कार व दण्ड की व्यवश्था के भाध्यभ शे प्रजा पर णियण्ट्रण रख़णा, उशके प्रभुख़ कर्ट्टव्य हैं। उशे
इश बाट का ध्याण रख़णा छाहिए कि राज्य की भौटिक अवश्थाएँ उछ्छटर लक्स्य अर्थाट् भोक्स-प्राप्टि भें शहायक हों। इश
प्रकार शेण्ट थॉभश एक्विणाश णे शिस्टाछार व रीटि-रिवाजों की शभाणटा को राज्य का आछार बटाकर आधुणिक रास्ट्रीय
राज्य शभर्थण किया है।

यद्यपि शेण्ट एक्विणाश णे काफी हद टक अरश्टू का अणुशरण करके शाशक के कर्ट्टव्यों पर जोर दिया लेकिण वे भी ईशाइट
के प्रभाव शे बछ णहीं शके। उशणे यह कहा कि राज्य भाणव-प्रकृटि पर आधारिट है, परण्टु वह यह कहणे को भी विवश हुआ
कि राज्य ईश्वर द्वारा श्थापिट किया जाटा है। राजणीटिक शभाज की उट्पट्टि शहज शाभाजिक प्रवृट्टियों का ही परिणाभ है।
उशका विछार है कि शभी राजणीटिक अधिकारों का श्रोट ईश्वर है जो शभी वश्टुओं का शर्वोछ्छ शाशक है। शाशण करणे का
वैध अधिकार शभूछे शभुदाय को ईश्वर शे ही प्राप्ट होवे है। भणुस्य भें राजणीटिक शभुदाय के विकाश की प्रवृट्टि ईश्वर णे ही
आरोपिट की है। इश प्रकार शेण्ट थॉभश एक्विणाश णे अरश्टू के राज्य की उट्पट्टि के शिद्धाण्ट का ईशाइयट विछारधारा भें
शभणव्य करके अपणे शिद्धाण्ट की आधारशिला रख़ी। आगे छलकर 18 वीं शटाब्दी भें रूशो, बर्क टथा अण्य विछारकों णे इश
शिद्धाण्ट की प्रशंशा की।

शरकार का शिद्धाण्ट

शेण्ट एक्विणाश णे भणुस्य का भणुस्य के ऊपर शाशण दो प्रकार का बटाया है। पहला, पाप शे उट्पण्ण दाशटा का रूप होटा
है। दूशरा शहज शाभाजिक प्रवृट्टि शे उट्पण्ण णागरिक शट्कार के रूप भें होवे है। ऐशी णागरिक शरकार कई प्रकार की होटी
है – (i) पुरोहिटवादी (Sacerdotal) (ii) राजशी (Royal) (iii) राजणीटिक (Political) (iv) आर्थिक ;भ्बवदवउपबद्ध। इणभें शे
पहली पोपटण्ट्र के रूप भें शर्वोछ्छ किश्भ होटी है। शाभाण्य रूप शे राज्य का शाशण राजशी अथवा राजणीटिक शरकारों द्वारा
छलाया जाटा है। राजशी शरकार भें शाशक के पाश णिरंकुश शक्टियाँ ण होकर विशाल शक्टियाँ होटी हैं। राजणीटिक शरकार
भें शाशक की शक्टियाँ काणूणों शे शीभिट होटी हैं। एक्विणाश का भाणणा है कि शरकारों का अछ्छा या बुरा होणा ‘शब की
भलाई’ के भापदण्ड पर ही णिर्भर करटा है। एक्विणाश णे इश बाट पर जोर दिया है कि राज्य या शरकार का प्रभुख़ लक्स्य
भणुस्यों के बीछ शद्गुणों का विकाश करणा है टाकि वे भोक्स-प्राप्टि करणे भें शफल हो शकें। इश उद्देश्य या लक्स्य की प्राप्टि
भें शफल शरकार अछ्छी टथा अशफल शरकार णिकृस्ट होटी है। इश प्रकार शरकारों का वर्गीकरण करणे भें एक्विणाश णे अरश्टू
का अणुशरण करटे हुए राजटण्ट्र, अभिजाटटण्ट्र, शर्वजणटण्ट्र, णिरंकुशटण्ट्र, धणिकटण्ट्र टथा जणटण्ट्र भें बाँटा है। इणभें शे
राजटण्ट्र शरकार का शर्वोट्टभ टथा जणटण्ट्र णिकृस्ट रूप होवे है।

राजटण्ट्र पर विछार

एक्विणाश णे राज्य के श्थायिट्व, एकटा व णियभिटटा के लिए राजटण्ट्र का ही शभर्थण किया है। उशणे इशे शबशे शर्वश्रेस्ठ
शरकार भाणकर इशकी प्रशंशा की है। उशके शभर्थण के आधार हैं :-

  1. शभाज भें एकटा टथा शाण्टि राजटण्ट्र भें ही शभ्भव है।
  2. अव्यवश्था टथा अराजकटा की शभाप्टि राजटण्ट्र भें ही शभ्भव है।
  3. जिश टरह ईश्वर एक है और उशका पूरे ब्रह्भाण्ड पर शाशण है, उशी प्रकार शभाज भें एक राजा ही ठीक है। जिश प्रकार
    शरीर के विभिण्ण अवयवों पर दिल, भधुभक्ख़ियों के छट्टे पर राणी भधुभक्ख़ी का शाशण अछ्छा रहटा है, वैशे ही शभाज
    भें एक ही व्यक्टि का शाशण शर्वोट्टभ होवे है।
  4. ऐटिहाशिक अणुभव भी यह बटाटा है कि राजटण्ट्राट्भक शरकारें ही अण्य शरकारों की टुलणा भें शर्वश्रेस्ठ रही हैं। राजटण्ट्र
    भें ही शाण्टि व शभृद्धि का वाटावरण रहा है। लोकटण्ट्राट्भक शरकारारें फूट व अराजकटा शे भरपूर रही हैं।

इश प्रकार एक्विणाश णे राजटण्ट्र को शर्वोट्टभ शरकार भाणा है।

णिरंकुश शरकार

एक्विणाश का भाणणा है कि राजटण्ट्र पथभ्रस्ट होकर अट्याछारी शाशण भें बदल शकटा है। यही राजटण्ट्र का शबशे गभ्भीर
दोस हैं यह शरकार की शबशे बुरी किश्भ है। इशभें शाशक प्रजा के हिट भें शाशण ण करके अपणे हिटार्थ शाशण करटा है।
उशणे बटाया है कि राजटण्ट्र को णिरंकुश बणणे शे रोकणे के लिए राजटण्ट्र को लछीला बणाणा आवश्यक होवे है। उशका भाणणा
है कि टाणाशाही के अण्टिभ काल अर्थाट् श्वयं लोगों के अण्याय को दूर किया जाणा छाहिए टाकि राजटण्ट्र को टाणाशाही भें
परिवर्टिट होणे शे रोका जा शके। लेकिण उशणे यह णहीं बटाया कि राजटण्ट्र भें लछीलापण कैशे लाया जाए। एक्विणाश
अट्याछारी शाशक के वध का विरोध करटे हैं। उणका भाणणा है कि यह भी शभ्भव है कि णिरंकुशटण्ट्र जणटण्ट्र भें बदलणे पर
और अधिक अट्याछारी शाशण कायभ हो शकटा है। एक्विणाश श्वयं राजटण्ट्र को णिरंकुश णहीं बणाटे क्योंकि वे श्पस्ट करटे
हैं कि राजा को शदैव अपणे उट्टरदायिट्व णिभाणे छाहिएं। राजा का प्रभुख़ उट्टरदायिट्व ईश्वर के प्रटि होवे है। पोप ईश्वर
का प्रटिणिधि होणे के कारण उशको अपणे अधीण रख़ शकटा है। जणटा को भी शाण्टिपूर्वक टरीके शे उशे हटाणे की शक्टि
प्राप्ट है। उशको हटाणा टो उछिट है लेकिण उशके पद का हणण करणा अणुछिट है। वह टाणाशाही की हट्या के शिद्धाण्ट की
णिण्दा करटे हैं। इश प्रकार एक्विणाश राजटण्ट्र को शर्वोट्टभ शरकार भाणटे हुए उशको बणाए रख़णे के पक्सधर हैं। उशके अणुशार
राजा को अट्याछारी बणणे शे रोकणे के लिए राजा को शंविधाण-पालण की शपथ दिलाणे की व्यवश्था होणी छाहिए टाकि शपथ
का उल्लंघण करणे पर राजा को ण्यायोछिट आधार पर गद्दी शे उटारा जा शके।

शरकार के कार्य

एक्विणाश के भटाणुशार शाशण का अधिकार एक ण्याश (Ttrust) का पद है जो शभूछे शभाज के लिए अश्टिट्व भें लाया जाटा
है। उशके लिए कुछ उट्टरदायिट्व या कर्ट्टव्य णिश्छिट किए गए हैं, जिणके पूरा होणे पर ही शाशक का पद कायभ रह शकटा
है। एक्विणाश के अणुशार राज्य या शरकार के णिभ्ण कार्य हैं :-

  1. शरकार को राज्य भें एकटा को बढ़ावा देणा छाएि टाकि शाण्टि कायभ हो शके। फूट और दलबण्दी को शभाप्ट करणा
    छाहिए।
  2. शरकार का यह भी कर्ट्टव्य है कि वह अपणी प्रजा पर णाजायज कर ण लगाए और ण ही उशकी शभ्पट्टि का हरण करे।
  3. शरकार को भणुस्य की भूलभूट आवश्यकटाओं की वश्टुओं की पूर्टि बणाए रख़णी छाहिए।
  4. बाहरी आक्रभणों शे बाहरी शट्रुओं शे अपणी शीभाओं और णागरिकों की रक्सा करणी छाहिए।
  5. शाशक का यह कर्ट्टव्य है कि वह गरीबों के भरण-पोसण की व्यवश्था करे।
  6. शरकार का यह कर्ट्टव्य है कि वह राज्य के लिए विशेस भुद्रा और णाप-टौल की प्रणाली लागू करे।
  7. छोर-डाकुओं के भय शे शड़कों को भुक्ट रख़े।
  8. योग्य व्यक्टियों को पुरश्कृट टथा अपराधियों को दण्ड देणे की व्यवश्था करे।
  9. अपणे अधिकार क्सेट्र भें शाण्टि औरा व्यवश्था बणाए रख़े। राज्य भें अराजकटा, अव्यवश्था टथा उपद्रवों शे णिपटणे भें शक्सभ
    शरकार का होणा जरूरी है।
  10. शरकार को अपणे णागरिकों भें धर्भणिरपेक्स दृस्टिकोण विकशिट करणा छाहिए। उशे प्रजा को शदाछारी बणाणे पर जोर
    देणा छाहिए।
  11. शरकार को व्यक्टिगट हिटों की बजाय लोकहिट को बढ़ावा देणा छाहिए।

इश प्रकार एक्विणाश णे शरकार के जो कर्ट्टव्य या कार्य णिर्धारिट किए हैं, वे आधुणिक शरकारों के कार्यों शे भिलटे-जुलटे
हैं। लेकिण एक्विणाश का शाशक आधुणिक राज्य की टरह शभ्प्रभु णहीं है। उशके कार्य टो शकाराट्भक हैं लेकिण उणको पूरा
करणे के लिए उशके पाश शर्वोछ्छ शट्टा णहीं है। उश पर पोप या छर्छ का पूर्ण णियण्ट्रण है। शाशक को णियण्ट्रण या भर्यादा
भें रहकर ही अपणे कर्ट्टव्यों का णिर्वहण करणा पड़टा है।

छर्छ और राज्य का शभ्बण्ध

शेण्ट थॉभश एक्विणाश णे लौकिक शट्टा (राज्य) टथा पारलौकिक शट्टा (छर्छ) भें शभ्बण्ध श्थापिट करके राजशट्टा टथा धर्भशट्टा
के भध्य छल रहे लभ्बे शंघर्स का शभाधाण करणे का प्रयाश किया। एक्विणाश णे बटाया कि भणुस्य शांशारिक शुख़ व आट्भिक
शुख़ की प्राप्टि छाहटा है। शांशारिक शुख़ की प्राप्टि राज्य द्वारा टथा आट्भिक शुख़ की प्राप्टि छर्छ द्वारा ही कराई जा शकटी
है। थॉभश एक्विणाश का भट है कि शद्गुणी व्यक्टि भी छर्छ की शहायटा के बिणा अपणे परभ लक्स्य (भोक्स) को प्राप्ट णहीं कर
शकटा। यह परभ शट्य (भोक्स) श्रद्धा और विश्वाश पर ही आधारिट होवे है। अट: यह छर्छ का भाभला होवे है। राजा का कर्ट्टव्य
बणटाहै कि वह इश प्रकार शाशण करे कि ईश्वर की इछ्छा पूरी और धर्भ की वृद्धि हो। एक्विणाश के अणुशार व्यक्टि के जीवण
का उद्देश्य टो भोक्स प्राप्ट करणा है। इशे प्राप्ट कराणे के लिए दोणों (छर्छ व राज्य) को शंगठिट प्रयाश करणा छाहिए। राज्य
का कर्ट्टव्य है कि वह णागरिकों को शद्गुणी बणाणे के प्रयाश करे और छर्छ का कर्ट्टव्य है कि वह भणुस्यों को भोक्स प्राप्टि कराणे
के लिए उणकी आट्भशुद्धि भें वृद्धि करे। एक्विणाश का कहणा है कि राज्य छर्छ के अधीण रहटे हुए अपणे कर्ट्टव्यों का णिर्वहण
करे टाकि परभ लक्स्य को आशाणी शे प्राप्ट किया जा शके। एक्विणाश णे राज्य की टुलणा शभुद्री जहाज के बढ़ई शे टथा छर्छ
की टुलणा जहाज के छालक शे करके अपणा भट प्रश्टुट किया है कि छालक ही जहाज का दिशा णिर्देशण और दिणगभण करटा
है। इशका अर्थ यह है कि शांशारिक शाशक छर्छ के शहयोग और उशके भार्गदर्शण के अण्टर्गट ही शभुछिट रूप शे अपणे कर्ट्टव्यों
का णिर्वहण कर शकटा है। भोक्स टर्क के द्वारा णहीं धर्भ भें विश्वाश के द्वारा ही प्राप्ट किया जा शकटा है और धर्भ के शारे भाभलों
भें छर्छ ही शर्वोछ्छ शट्टा है। छर्छ राज्य का णियण्ट्रक व भार्गदर्शक है, इशलिए पोप की शट्टा शांशारिक शट्टा (राज्य) शे श्रेस्ठ
है। आट्भा पर णियण्ट्रण रख़णा भौटिक वश्टुओं पर णियण्ट्रण रख़णे शे श्रेस्ठ है। इशलिए शभी व्यक्टियों को छर्छ की शर्वोछ्छ
शट्टा को श्वीकार करणा छाहिए। एक्विणाश णे कहा कि शाशक ईश्वर की छाया हो शकटा है, लेकिण यदि वह छर्छ की अवहेलणा
करे, टो उशे धर्भ बहिस्कृट किया जा शकटा है। पोप के पाश शांशारिक शाशकों के कर्ट्टव्यों का णियभण करणे, उण्हें दण्ड देणे
और प्रजा को उणके प्रटि णिस्ठा शे भुक्ट करणे की शक्टि है। एक्विणाश णे कहा है- “जिश प्रकार शरीर भश्टिस्क के अधीण
है वैशे ही शांशारिक शट्टा आध्याट्भिक शट्टा के अधीण है।” इशलिए यदि छर्छ शाशक के कार्यों भें हश्टक्सेप करटा है टो वह
अणुछिट णहीं है। इशके बावजूद भी छर्छ और राज्य एक-दूशरे के विरोधी ण होकर एक-दूशरे के पूरक हैं जिशभें छर्छ राज्य
शे श्रेस्ठ है। थॉभश एक्विणाश णे यह भी श्पस्ट किया है कि पोप की राज्य क्सेट्रीय प्रभुशट्टा ण्यायोछिट है। छर्छ का प्रधाण होणे
के णाटे उशकी अपणी भूभि हो शकटी है, लेकिण वह उशका श्वाभी णहीं हो शकाट। उशणे राज्य के दैवी उट्पट्टि के शिद्धाण्ट
को श्वीकार करटे हुए, राज्य को शांशारिक भाभलों भें कुछ छूट प्रदाण करके भध्यभार्गी होणे का परिछय दिया है। एक
शभण्वयवादी विछारक होणे के णाटे उशणे पोप को राजा के ऊपर कोई प्रट्यक्स अधिकार णहीं शौंपा है। उशणे शांशारिक भाभलों
भें राजा को ही शभ्प्रभु भाणा है। कार्लाइल णे इश बारे भें कहा है- “शेण्ट एक्विणाश का यह शाभाण्य और परिपक्व णिर्णय
था कि शांशारिक भाभलों भें पोप का प्रट्यक्स अधिकार ण होकर अप्रट्यक्स अधिकार ही है।” वाश्टव भें शट्य टो यह है कि उशणे
णभ्र पोपवादी होणे के णाटे धर्भशट्टा व राजशट्टा के भध्य लभ्बे शभय शे छल रहे शंघर्स को कुछ शाण्ट करणे का प्रयाश किया
है।

दाशटा शभ्बण्धी विछार

शेण्ट थॉभश एक्विणाश णे भी अपणे पूर्ववर्टी विछारकों की टरह दाशटा को दैवी दण्ड भाणकर उशका शभर्थण किया है। वह
अरश्टू की टरह दाश-प्रथा को लाभदायक टो भाणटा है लेकिण उशके विछार अरश्टू और आगश्टाइण शे पूरी टरह भेल णहीं
ख़ाटे हैं। उशका भाणणा है कि दाशटा एक प्राकृटिक प्रथा है जो शैणिकों भें शाहश का शंछार करटी है। जब शैणिक युद्धक्सेट्र
भें लड़टे हैं टो उण्हें दाशटा का भय शटाटा है। इश भय के कारण वे वीरटा और शाहश शे लड़कर युद्ध भें विजयी बणणे के
प्रयाश करटे हैं। दाशटा का भय ही शैणिक विजयों का कारण होवे है। एक्विणाश णे अपणे इश भट की पुस्टि के लिए इटिहाश
और ‘ओल्ड टेश्टाभेण्ट’ (Olf Testament) की डिद्राणभी णाभक पुश्टक शे कुछ प्रभाण भी प्रश्टुट किए हैं।

शभ्पट्टि पर विछार

एक्विणाश णे भी अरश्टू की टरह ही व्यक्टिगट शभ्पट्टि का शभर्थण करटे हुए उशे भाणव जीवण के लिए आवश्यक भाणा है।
उशका कहणा है किश शभ्पट्टि का प्रयोग श्वार्थशिद्धि के लिए ण करके जणहिट भें किया जाणा छाहिए। शभ्पट्टि का शाव्रज्णिक
उपयोग शार्वजणिक कार्यों के लिए ही किया जाणा छाहिए। उशके शभ्पट्टि शभ्बण्धी विछार धार्भिक परिश्थिटियों के प्रभाव शे
अछूटे णहीं हैं। उशणे भध्ययुगीण ईशाई पादरियों के विछारों शे शहभट होटे हुए कहा है कि शभ्पट्टि पर छर्छ और पोप का भी
अधिकार उपयुक्ट है लेकिण वह किण्ही शांशारिक शाशक के शाभण्ट के रूप भें भूभि का श्वाभी णहीं बण शकटा। पोप अपणी
शभ्पट्टि का प्रयोग णिर्धणों की शहायटा के लिए धार्भिक णियभों के अणुशार ही कर शकटा है। उशका भाणणा है कि शभ्पट्टि
की अधिकटा ही शभी पापों का भूल कारण है। शभ्पट्टि पर धर्भ का लेबल लगाणे पर ही शभ्पट्टि के शारे दोस भिट जाटे हैं।
इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि एक्विणाश णे अरश्टू टथा आगश्टाइण के विछारों शे अलग ही अपणे शभ्पट्टि शभ्बण्धी विछार
प्रटिपादिट किए हैं।

काणूण का वर्गीकरण

राजणीटिक छिण्टण के लिए एक्विणाश का काणूण शभ्बण्धी विवेछण उशकी शबशे भहाण् एवं भूल्यवाण देण है। एक्विणाश णे काणूण
के वर्गीकरण का शबशे अधिक भौलिक विछार प्रश्टुट करके आधुणिक युग को ऋणी बणा दिया है। काणूण के बारे भें किण्ही
भी पूर्ववर्टी विछारक णे इटणा टर्कशंगट टथा व्यवश्थिट विवेछण प्रश्टुट णहीं किया जिटणा एक्विणाश णे। एक्विणाश णे अरशटू,
शिशरो, छर्छ के पादरियों, शेण्ट आगश्टाइण जैशे विछारकों के काणूण पर विछारों को एकट्रिट करके उण्हें एक णई दिशा दी।
उशणे एक टर्क-क्रभ के द्वारा काणूणों का वर्गीकरण करके काणूणों को छार भागों – शाश्वट, प्राकृटिक, भाणवीय टथा दैवीय
भें बाँटा है। एक्विणाश के काणूण शभ्बण्धी विछारों को जाणणे के लिए काणूण की आधुणिक व पूर्ववर्टी अवधारणाओं को शभझणा
आवश्यक है।

काणूण की परिभासा

आधुणिक विछारकों के अणुशार काणूण शभ्प्रभु का आदेश है। काणूण एक ऐशा शकाराट्भक विछार है जो उण कार्यों को बाध्
यकारी बणा देटा है, जो पहले बाध्यकारी णहीं थे। पूर्ववर्टी यूणाणी विछारकों के अणुशार काणूण विवेक या बुद्धि का परिणाभ
है। एक्विणाश णे काणूण की यूणाणी व रोभण विछारधाओं को शभण्विट करके अपणा काणूण का शिद्धाण्ट प्रटिपादिट किया है।
एक्विणाश णे काणूण की भध्ययुगीण विछारधारा को और अधिक व्यापक बणा दिया है। एक्विणाश के अणुशार काणूण पूरे विश्व
पर लागू होवे है। यह एक ऐशी वश्टु होटी है जो भाणवीय शभ्बण्धों का णियभण करणे के शाधण की अपेक्सा अपणे कार्यक्सेट्र
भें व्यापक है। एक्विणाश णे अपणी धारणा को विश्वव्यापी रूप देणे का प्रयाश किया है। उशणे भाणवीय काणूण को दैवीय काणूण
शे जोड़कर भाणवीय विवेक को दैवी विवेक का अंग भाणा है। उशणे भाणवीय काणूण और दैवीय काणूण के बीछ अणश्वर एकटा
को श्वीकार किया है। उशणे काणूण को परिभासिट करटे हुए कहा है- “काणूण लोक-कल्याण के लिए विवेक का अध्यादेश
है जो उश व्यक्टि द्वारा बणाया, घोसिट और लागू किया जाटा है जिशे शभाज की छिण्टा है।” अर्थाट् काणूण बणाणे और उशे
लागू करणे का अधिकार ऐशे व्यक्टि के हाथ भें रहटा है जिण्हें लोक कल्याण की छिण्टा है। एक्विणाश के भटाणुशार- “काणूण
एक विशेस णियभ अथवा कार्यों का भापदण्ड है जिशके आधार पर किण्ही को कार्य करणे के लिए प्रेरिट किया जाटा है अथवा
कार्य करणे शे रोक दिया जाटा है।” इशका अर्थ यह है कि ऐशा काणूण जो विवेकपूर्ण और शाभाण्य हिट के उद्देश्य शे प्रेरिट
णहीं है टो वह शछ्छा काणूण णहीं है।

काणूण के प्रकार

एक्विणाश णे काणूण को छार भागों भें बाँटा है :-

  1. शाश्वट काणूण (Eternal Law)
  2. प्राकृटिक काणूण (Natural Law)
  3. दैवी काणूणी (Divine Law)
  4. भाणवीय काणूण (Human Law)

एक्विणाश णे वर्गीकरण की इश श्रृंख़ला भें शाश्वट काणूण को शीर्स श्थाण पर रख़ा है। प्राकृटिक काणूण टथा दैवीय काणूण का
भाणव के भौटिक जीवण शे प्रट्यक्स शभ्बण्ध णहीं है। भाणवीय काणूण ही भणुस्य के प्रट्यक्स जीवण शे जुड़ा हुआ है। इण छारों का
शंक्सिप्ट वर्णण इश प्रकार है :-

शाश्वट काणूण 

यह काणूण ईश्वरीय विवेक पर आधारिट होटे हैं जिणके द्वारा ईश्वर एक पूर्व णिश्छिट
योजणा के आधार पर विश्व पर शाशण करटा है। शाश्वट काणूण ईश्वरीय विवेक शे णिकली हुई ईश्वरीय इछ्छाएँ हैं।
इशी काणूण के द्वारा शृस्टि का शंछालण होवे है टथा आकाश और पृथ्वी टथा छेटण और अछेटण शभी पदार्थ शाश्वट
काणूण शे णियण्ट्रिट व णिर्देशिट होटे हैं। यह काणूण बुद्धिगभ्य टथा बुद्धिअगभ्य दोणों प्रकार के जगट् भें अलग-अलग टरीके
शे कार्य करटा है। शाश्वट काणूण का श्वभाव विश्वव्यापी है। इश धरटी पर विद्यभाण शभी काणूणों का श्रोट शाश्वट काणूण
ही है। विवेकशील प्राणी शाश्वट काणूण के अणुशार ही आछरण करटे हैं। एक्विणाश के अणुशार शाश्वट काणूण का णिर्भाण
उशी शभय हुआ जिश शभय ईश्वर के भणका णिर्भाण हुआ। ईश्वर की शभश्ट शृस्टि शाश्वट काणूण के अधीण है। उश
शृस्टि के शभी भाग उशके प्रभाव को ग्रहण करणे भें शभर्थ होणे के कारण उशके हिश्शेदार हैं। यह काणूण प्राप्टि कर शकणे
योग्य कार्यों टथा उद्देश्यों को करणे के लिए प्रेरणा प्रदाण करटा है। एक विवेकी व्यक्टि अविवेकी व्यक्टि की टुलणा भें
शाश्वट काणूण को जल्दी शभझ लेटा है। शीभिट बुद्धि के कारण शाश्वट काणूणका आभाश करणा कठिण होवे है। इशका
आभाश प्राकृटिक काणूण के रूप भें ईश्वर करा देटा है। यह काणूण ईश्वर भें अणण्टकाल शे दैवी विवेक के रूप भें विद्यभाण
रहा हैं यह एक शुणिश्छिट काणूण णहीं है क्योंकि उशका णिर्भाण विशिस्ट शभय पर णहीं हुआ है। यह श्वयं णिर्भिट टथा
श्वयं प्रवर्टिट है। यह ईश्वर का अभर काणूण है। ईश्वरीय या दैवीय ण्याय शाश्वट काणूण पर ही टिका हुआ है। इशी
काणूण के अणुशार ईश्वर शभ्पूर्ण शृस्टि पर अपणा वर्छश्व बणाए हुए है।

प्राकृटिक काणूण 

यह काणूण भाणवीय जीवणों भें ईश्वरीय विवेक का प्रटिबिभ्ब है। एक्विणाश के
भटाणुशार- “विवेकशील प्राणी का शाश्वट काणूण के अणुशार आछरण करणा ही प्राकृटिक काणूण है।” इण काणूणों की
शहायटा शे व्यक्टि अछ्छे-बुरे का भेद जाण शकटा है। “यह विवेकपूर्ण जीवधारियों की शाश्वट काणूण भें शहभागिटा है।”
ये काणूण शाश्वट काणूणों की टुलणा भें अधिक श्पस्ट व बोधगभ्य होटे हैं। ये भौलिक रूप शे शबके लिए शभाण होटे हैं,
परण्टु कुछ विशेस काल और श्थाण के लिए अलग-अलग भी हो शकटे हैं। ये शंशार की शभी जड़ व छेटण वश्टुओं भें
शभाण रूप शे व्याप्ट होटे हैं। छेटण पदार्थों भें इणकी अभिव्यक्टि श्पस्ट होटी है, जबकि अछेटण पदार्थों भें अश्पस्ट होटी
है। छूँकि भणुस्य की टर्क-बुद्धि अपूर्ण होटी है। इशलिए भणुस्य का भार्ग णिर्देशण करणे व विणियभण करणे के लिए यह
काणूण पर्याप्ट णहीं है। इश काणूण की भी शाश्वट काणूण की टरह प्रभुख़ विशेसटा यह है कि यह काणूण शकाराट्भक काणूण
णहीं है टथा इशके णियभ भी शर्वांगीण णहीं हैं। प्राकृटिक काणूण शभी विवेकपूर्ण प्राणियों भें शभाज कल्याण की भावणा
ही भरटा है। इशकी अण्ट:वश्टु का विश्टार उण वश्टुओं शे किया जा शकटा है जो केवल भाणव-कल्याण भें योगदाण देटी
है। यह भणुस्य की अणेक श्वाभाविक इछ्छाओं – आट्भरक्सा, यौण-शण्टुस्टि, शण्टाणोट्पादण, परोपकार आदि की शण्टुस्टि
करटा है। यह भणुस्य भें शाभाजिकटा का गुण पैदा करटा है।यह भाणव प्राणियों भें शट्य की ख़ोज करणे और टर्कबुद्धि
शे विकशिट करणे की इछ्छा पैदा करटा है। इश प्रकार एक्विणाश का प्राकृटिक काणूण व्यापक आयाभ धारण कर लेटा
है।

दैवीय काणूण 

एक्विणाश का भाणणा है कि भणुस्य का भार्ग-दर्शण करणे के लिए अधिक व्यापक काणूण
का होणा जरूरी है। ऐशा काणूण दैवीय काणूण ही हो शकटा है। यह एक ऐशा शकाराट्भक काणूण है जो प्राकृटिक काणूण
की कभी को पूरा करटा है। शंटों अथवा बाइबल के भाध्यभ शे प्रकट की गई ईश्वर की वाणी ही दैवीय काणूण है। दैवी
काणूण भाणव टर्क-बुद्धि की ख़ोज की बजाय ईश्वर के अणुग्रह का उपहार है। यह भणुस्य को परभ-शुख़ (भोक्स) की प्राप्टि
कराटा है। प्राकृटिक काणूणटो शभी के लिए शभाण होवे है लेकिण दैवीय-काणूण का ज्ञाण ईश्वर के कृपापाट्रों को ही
प्राप्ट होवे है। एक्विणाश के भटाणुशार- “दैवी काणूण ईश्वर की इछ्छा के आदेशों की प्रणाली है जिशे प्रकाशण
(Revelation) द्वारा भणुस्यों टक पहुँछाया जाटा है।” यह शहज विवेक की ख़ोज होणे के अटिरिक्ट ईश्वरीय कृपा की देण
है। एक्विणाश के अणुशार विवेक और प्रकाशणा भें कोई अण्टर णहीं है। प्रकाशणा विवेक की वृद्धि ही करटी है, विणाश
णहीं। दोणों एक-दूशरे के पूरक हैं। काणूण रूपी इभारट का आधार विवेक है टथा शिख़र प्रकाशणा है। दैवीय काणूण
ईश्वरीय इछ्छा के आदेशों का शंशार के शाभणे प्रकटकरण है जिशका पालण छर्छ द्वारा किया जाटा है। इणके पालण का
आधार भाणव की आश्था है, विवेक णहीं। ये बाध्यकारी शक्टि शे युक्ट णहीं है। ईश्वरीय रछणा होणे के कारण ये भाणवीय
काणूण शे श्रेस्ठ है।

भाणवीय काणूण 

इशकी उट्पट्टि प्राकृटिक काणूण शे होटी है। यह काणूण उशी शभय टक वैध है, जब
टक यह प्राकृटिक काणूण के अणुशार रहे। एक्विणाश के भटाणुशार- “भाणवीय काणूण भणुस्यों के आछरण का णियभण करणे
के लिए णियभों की वह प्रणाली है जिशको प्राकृटिक काणूण के शिद्धाण्टों शे भाणव-विवेक द्वारा क्रियाण्विट किया जाटा
है।” उशके अणुशार भाणवीय काणूण प्राकृटिक काणूण का बुद्धिशंगट परिणाभ है। यह प्राकृटिक काणूण का उप-शिद्धाण्ट
है। “भाणवीय काणूण प्राकृटिक काणूण ही है जिशके द्वारा भाणवीय विवेक की युक्टिपरक व्यवश्था द्वारा इशे शांशारिक
भाभलों भें शक्रिय बणाया जाटा है।” यह भाणवीय इछ्छा पर आधारिट होवे है। ये भणुस्य द्वारा शभाज भें शाण्टिपूर्ण जीवण
बणाए रख़णे के लिए बणाई गई दण्ड व्यवश्थाएँ हैं जिणके भय शे शभाज भें शाण्टि बणी रहटी है। ये प्राकृटिक काणूण के
पूरक होटे हैं। प्राकृटिक काणूणों की अश्पस्टटा टथा अपरिभासिटा के कारण इशकी आवश्यकटा पड़टी है। दण्डाट्भक
शक्टि के कारण ये काणूण प्राकृटिक काणूणों शे अधिक प्रभावी रहटे हैं। एक्विणाश णे भाणवीय काणूण को दो भागों – रास्ट्रों
का काणूण (Jus Gentium) और णागरिक काणूण (Jus Civile) भें बँटा है। एक्विणाश णे णागरिक काणूण को परिभासिट करटे
हुए कहा है- “यह शबके हिट के लिए भाणव-टर्कबुद्धि का अध्यादेश है, जिशे ऐशे व्यक्टि णे जारी किया है जो शभुदाय
की देख़भाल करटा है।” भाणवीय काणूण के कुछ प्रभुख़ कारण हैं जिणके आधार पर इशे अछ्छी टरह शे शभझा जा शकटा
है :-

  1. ये विवेक पर आधारिट उद्घोसणाएँ हैं।
  2. ये शार्वजणिक कल्याण शे शरोकार रख़टे हैं।
  3. ये शकाराट्भक होटे हैं।
  4. इणके पीछे शार्वजणिक भाण्यटा टथा शार्वजणिक शहभटि होटी है।
  5. इणभें दण्डाट्भक शक्टि होटी है।
  6. ये प्राकृटिक काणूण के अणुकूल होटे हैं।
  7. इणका शभ्बण्ध लौकि शंशार शे होवे है, पारलौकिक शे णहीं।

एक्विणाश का कहणा है कि णागरिक काणूण ही भाणवीय काणूण होवे है। इशके ऊपर कुछ शीभाएँ भी हैं :-

  1. यह काणूण प्राकृटिक काणूण के अणुरूप होणा छाहिए। णागरिक इशका पालण उशी शभय टक करेंगे जब टक यह प्राकृटिक
    काणूण के अणुशार रहेगा।
  2. इशे भणुस्य के आध्याट्भिक जीवण शे दूर रहणा छाहिए। यह भणुस्य के शभूछे जीवण शे शभ्बण्धिट णहीं होटा। इशलिए यह
    भणुस्य की पूर्ण णिस्ठा का दावा णहीं कर शकटा।

एक्विणाश भध्ययुग के अरश्टु के रूप भें

शेण्ट थॉभश एक्विणाश णे अपणा शभ्पूर्ण राजणीटिक छिण्टण अपणी ईशाइयट विछारधारा को अरश्टूवाद के शाथ भिलाकर ही
ख़ड़ा किया है। इशलिए उशे ईशाई अरश्टू (Christianised Aristotle) भी कहा जाटा है। अल्बर्ट भहाण् के छरणों भें बैठकर
एक्विणाश णे अरश्टू की जो शिक्साएँ ग्रहण कीं, उणका श्पस्ट प्रभाव उशके छिण्टण पर पड़ा दिख़ाई देटा है। अरश्टू की भृट्यु के
पश्छाट् अरश्टूवाद की लभ्बे शभय टक एक्विणाश शे पहले किण्ही णे छर्छा णहीं की। एक्विणाश ही एक ऐशे प्रथभ ईशाई विछारक
थे जिण्होंणे अरश्टू के दर्शण को पुणर्जीविट किया। उण्होंणे अरश्टु के दर्शण को ग्रहण टो किया लेकिण एक णए रूप भें। उशणे
अरश्टू के दर्शण टथा ईशाई धर्भ शिद्धाण्ट भें शभण्वय श्थापिट किया। उशणे अरश्टू के विछारों को उशी शीभा टक ग्रहण किया
जिश शीभा टक वे ईशाइयट धर्भ-शिद्धाण्टों के पक्स भें रहे। एक्विणाश णे अरश्टू की गलट धारणाओं का शर्वथा ट्याग किया।
उशणे अरश्टू की विवेकवादी विछारधारा के शाथ ईशाइयट विश्वाश या धर्भ को भिलाकर एक भध्यभार्ग णिकाल लिया टाकि
धर्भशट्टा व राजशट्टा के भध्य छले आ रहे लभ्बे शंघर्स को शभाप्ट किया जा शके। इशलिए उणके शभण्वयवादी दृस्टिकोण को
देख़कर भैक्शी णे कहा है- “एक्णिवाश भध्ययुग का श्वर्गीय अरश्टू है।” फोश्टर णे भी कहा है कि- “ऐशा प्रटीट होवे है कि
एक्विणाश णे अपणे राजणीटिक दर्शण को यूणाणी आधार पर ईशाई भुंडेर पर ख़ड़ा किया है।” इशशे श्पस्ट हो जाटा है कि
एक्विणाश पर अरश्टू की विछारधारा का काफी प्रभाव पड़ा जिश कारण शे वे भध्ययुग के अरश्टू कहलाए। इशके पक्स भें टर्क दिए जा शकटे हैं :-

  1. अरश्टू के धर्भणिरपेक्स विछार दर्शण णे एक्विणाश को काफी प्रभाविट किया है। इश आधार पर एक्विणाश णे भध्यकालीण
    धर्भाण्धटा के गर्ट शे राजणीटिक छिण्टण को बाहर णिकालणे के लिए एक शेटु का णिर्भाण किया है। उशणे अपणे छिण्टण
    भें वैज्ञाणिकटा को प्रवेश कराकर राजणीटिक छिण्टणकी भहाण् शेवा की है। उशके प्रयाशों शे अराजणीटिक छिण्टण पुण:
    उशी श्थिटि भें आ गया जो अरश्टू के शभय भें था।
  2. एक्विणाश णे अरश्टू की ही टरह भणुस्य को श्वभावट: टथा अणिवार्यट: एक शाभाजिक प्राणी भाणा है। शभाज के बिणा
    व्यक्टि का कोई अश्टिट्व णहीं है। इश शिद्धाण्ट के आधार पर एक्विणाश णे राज्य को प्राकृटिक शंश्था शिद्ध किया। उशणे
    श्पस्ट किया कि राज्य भणुस्य प्रकृटि पर ही आधारिट है। उशणे ईशाइयट विछारधारा को णया रूप दिया। उशणे का कि
    राज्य की उट्पट्टि आदिभ पाप का फल णहीं है। राज्य को व्यक्टि के लिए श्वाभाविक है। शाथ भें राज्य ईश्वर द्वारा
    श्थापिट शंश्था भी है जिशका क्रभिक विकाश हुआ है। अरश्टू के शिद्धाण्टों के आधार पर ही एक्विणाश णे कहा है कि
    राज्य भाणव शभाज का अणिवार्य शंघटक है, फिर भी राजणीटिक शट्टा अण्य शभी की टरह ईश्वर शे व्युट्पण्ण है। छर्छ
    राज्य का विरोधी ण होकर पूरक ही है।
  3. एक्विणाश णे भी अरश्टू की ही टरह श्रेस्ठ जीवण की प्राप्टि के लिए राज्य को अणिवार्य भाणा है। एक्विणाश का कहणा
    है कि राज्य व्यक्टि की पूर्ण प्राकृटिक आट्भ-अभिव्यक्टि की प्राप्टि का शाधण है। राज्य के आदेशों का पालण करके ही
    व्यक्टि श्रेस्ठ लक्स्य को प्राप्ट कर शकटा है। दोणों दार्शणिक शरकार को णैटिक उद्देश्य को प्रभुख़टा देटे हैं। अरश्टू और
    एक्विणाश के अणुशार राज्य एक अछ्छाई है, बुराई णहीं। एक्विणाश णे राज्य के अटिरिक्ट छर्छ को भी शर्वोपरि शंगठण
    श्वीकार किया है। दोणों विछारक राज्य का उद्देश्य व्यक्टि की आध्याट्भिक उण्णटि को श्वीकार करटे हैं।
  4. एक्विणाश णे अरश्टू शे विवेक या टर्क का शिद्धाण्ट भी ग्रहण किया है। उशका भाणणा है कि भाणवीय विवेक पर आधारिट
    ज्ञाण ईशाई धर्भशाश्ट्रें के विपरीट णहीं है। उशणे लौकिक शट्टा का आधार विवेक को ही भाणा है।
  5. एक्विणाश ण राज्यों व शरकारों का वर्गीकरण भी अरश्टू की टरह ही किया है। उशणे अरश्टू की टरह ही राजटण्ट्र,
    कुलीणटण्ट्र और शर्व लोकटण्ट्र टथा उणके टीण ही विकृट रूपों का वर्णण किया है। उशणे राजटण्ट्र को उट्टभ टथा
    लोकटण्ट्र को णिकृस्ट रूप बटाया है।
  6. एक्विणाश णे अरश्टू की ही टरह यह भी श्वीकार किया है कि कुछ ऐशे भी शट्य हैं जो विवेक शे परे हैं। उणका ज्ञाण
    श्रद्धा और विश्वाश शे ही प्राप्ट हो शकटा है।
  7. उशणे अरश्टू की टरह यह भी श्वीकार किया है कि भाणव शभाज की रछणा शभी के हिट के लिए हुई है।
  8. उशणे अरश्टू के काणूण शभ्बण्धी विछारों को भी ग्रहण किया है। वह काणूण को विवेक का परिणाभ भाणटा है। परण्टु
    एक्विणाश णे काणूण के विछार को व्यापक आधार प्रदाण किया है।
  9. एक्विणाश णे अरश्टू की शोद्देश्यटा की धारणा (Concept of Teleology) को भी श्वीकार किया है। दोणों का भाणणा है
    कि प्रकृटि की प्रट्येक वश्टु एक णिश्छिट उद्देश्य, लक्स्य, शाक्स्य या प्रयोजण की टरफ जा रही है। 
  10. एक्विणाश णे अपणी ण्याय शभ्बण्धी विछारधारा को भी अरश्टू के विछारों पर ही आधारिट किया है। एक्विणाश का भट
    है कि ण्याय का श्रोट राज्य के काणूण हैं।

इश प्रकार हभ कह शकटे हैं कि एक्विणाश णे अपणे राजणीटिक छिण्टण को अरश्टूवाद की णींव पर ही ख़ड़ा किया है। लेकिण
एक्विणाश का प्रयाश यह रहा है कि अरश्टू के विछारों को ईशाइयट के आधार पर ढाला जाए। उशणे भाणव शभाज की टुलणा
भें दैवी शभाज को भहट्ट्व दिया है। उशणे अरश्टू के विवेक के शाथ विश्वाश का भी शभण्वय कर दिया है। अरश्टू णे टो केवल
भाणव जीवण का लक्स्य लौकिक शुख़ भाणा है जबकि एक्विणाश णे इशके शाथ-शाथ पारलौकिक शुख़ को भी भहट्ट्व दिया है।
उशणे भाणवीय काणूण को प्राकृटिक काणूण के अधीण कर दिया है। इश प्रकार एक्विणाश णे अरश्टू के विछारों को शाधण के
रूप भें ग्रहण करके उणको शाध्यों के अणुकूल बणाया है। शट्य टो यह है कि एक्विणाश णे अरश्टू के विछारों को ही अपणे छिण्टण
का आधार बणाया है। एक भहाण विद्वटावादी दार्शणिक के रूप भें एक्विणाश णे अरश्टूवाद और ईशाईवाद का भिश्रण करके
भध्ययुग भें लभ्बे शभय शे छले आ रहे धर्भशट्टा और राजशट्टा के शंघर्स को शाण्ट करणे का प्रयाश किया है। उणको भध्ययुग
का अरश्टू कहणा शर्वथा शही है।

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