ध्वनि की परिभाषा और उसका वैज्ञानिक आधार

By | February 15, 2021


ध्वनि का सामान्य अर्थ है- आवाज, गूँज, नाद, कोलाहल। मेघ गरजते हैं, तूफान चिंघाड़ता है, पशु रम्भते हैं, पक्षी चहचहाते हैं, प्रकृति के अन्य रूप शब्द करते हैं, भाषा विज्ञान इन्हें ध्वनि नहीं मानता। उसकी दृष्टि में ये सब कोलाहल मात्र हैं। मनुष्य भी ऐसी ध्वनि का उच्चारण करे जो किसी सार्थक शब्द का अंग न बन सके या पदों के निर्माण में सहायक न हो तो वह भी शोर ही है। भाषा विज्ञान की दृष्टि में, मानव-मुख से उच्चरित होने वाला नाद जो शब्दों और पदों के निर्माण में अंग बने और उनकी सार्थकता में काम आए, ध्वनि है। ध्वनि विज्ञान उन ध्वनियों का विश्लेषण नही करता जो मानव-भाषा से असंबद्ध हों। भौतिकी आदि विज्ञानों में जिस ध्वनि का अध्ययन किया जाता है, उसका भाषा विज्ञान से कोई सम्बन्ध नहीं। भाषा विज्ञान तो भाषा की मूल इकाइयों के रूप में प्रयुक्त होने वाली ध्वनियों का अध्ययन करता है। ध्वनि की परिभाषा और उसका वैज्ञानिक आधार अध्ययन करेगे।

ध्वनि की परिभाषा

ध्वनि की परिभाषा महाभाष्य में पंतजलि का कथन है कि भाषा की लघुतम ध्वनि इकाइयाँ, वर्ण हैं। ये वर्ण स्वयं में सार्थक नहीं होते, परन्तु मिलकर अर्थवान् शब्दों का निर्माण करते हैं। उदाहरणत: क् का उच्चारण निरर्थक है, परन्तु इसके साथ औ और आ ध्वनियों के मिल जाने से ‘कौआ’ सार्थक शब्द बन जाता है। क्, औ, आ ध्वनियाँ अपने आप में पृथक-पृथक अर्थ व्यक्त नहीं करतीं। ध्वनियाँ भाषा का स्थूल आधार हैं और इनमें मानव के चिन्तन की अभिव्यक्ति का उपाय निहित है। मनुष्य मूलत: ध्वनियों में नहीं, सार्थक पदों में सोचता है। मनुष्य के मस्तिष्क में विचार सार्थक पदों के रूप में विद्यमान रहते हैं। वहाँ शब्द और अर्थ में पार्थक्य नहीं रहता। जब विचारों और भावों की अभिव्यंजना की इच्छा होती है तो ये पद मुख से नि:सृत होते हैं। पदों का ठोस रूप नहीं होता और न ही इनका उच्चारण पूर्ण पदों के रूप में करना सम्भव है, अत: मनुष्य के स्वरयन्त्र से, पदों में अंगभूत ध्वनियों का उच्चारण, उनकी व्यवस्था क्रम में किया जाता है, उदाहरणत: ‘फल’ शब्द के उच्चारण में पूर्ण शब्द का उच्चारण, इकट्ठा नहीं होता, अपितु प्फ आदि ध्वनियाँ अपने क्रम में सुनाई पड़ती हैं। इसका कारण स्वरयन्त्र की कार्यप्रणाली की व्यवस्था है। भतरृहरि ‘वाक्यपदीयम्’ में स्पष्ट करते हैं कि शब्द और अर्थ परस्पर इस प्रकार आबद्ध हैं कि चिन्तन में इनका पूर्वापर क्रम नहीं रहता। वे शब्द और अर्थ के संघात को स्फोट (अर्थमय शब्द) नाम देते हैं, परन्तु स्फोट की अभिव्यक्ति नाद (ध्वनि) के रूप में होती है, जहाँ स्फोट में निहित ध्वनियों का व्यवस्था के क्रम में ही उच्चारण संभव है। यदि ध्वनियों की व्यवस्था का क्रम उलट-पलट हो जाए तो उनसे बने पद, विचारों और भावों के अर्थ का संप्रेषण करने में असमर्थ होंगे। ‘घट’ स्फोट के उच्चारण में ध्वनियों का क्रम बदल जाने पर ‘टघ’ शब्द और उसका अर्थ, पृथक् स्थितियाँ न रख कर स्फोट रूप में अर्थमय शब्द का द्योतक है। इस प्रकार निष्कर्षत:

  1. भाषा विज्ञान में, भाषा से सम्बद्ध मानवीय वाणी ही ध्वनि है।
  2. ध्वनि इकाइयाँ शब्दों का निर्माण करती हैं।
  3. ध्वनि इकाइयाँ (वर्ण) अपने आप में सार्थक नहीं होतीं, परन्तु सार्थक शब्दों की निर्मिति में सहायक हैं।
  4. मनुष्य ध्वनि इकाइयों में नहीं सोचता। उसके चिन्तन का आधार सार्थक शब्द होते हैं।
  5. शब्दों में ध्वनि-इकाइयों की व्यवस्था रहती है।
  6. शब्दों की अभिव्यक्ति के लिए स्वरयन्त्र, उनमें व्यवस्थित ध्वनि इकाइयों का क्रमश: उच्चारण करता है।
  7. शब्दों में ध्वनियों का जो क्रम निश्चित है, उसे बदलने पर उन शब्दों की सार्थकता को व्याघात पहुँचता है, भले ही ध्वनियाँ स्वयं निरर्थक हों।

अत: अर्थमय शब्दों को स्थूल अभिव्यक्ति देने वाली मानवीय वाणी ध्वनि है अर्थात् मनुष्य, स्फोट की अभिव्यक्ति नाद में करता है, यह नाद ही ध्वनि है। ध्यातव्य है कि किसी व्यक्ति के स्वरयन्त्र में विकार आने पर, ध्वनियों का उच्चारण प्रभावित हो सकता है। मानसिक दबाव और विकारग्रस्त मन की प्रक्रिया, ध्वनि के स्वस्थ उच्चारण में बाधक हैं। इनसे उच्चारण का सुर (Tone) बदल जाता है।

ध्वनि के वैज्ञानिक आधार

ध्वनि-विज्ञान का मूल-भूत अंग ध्वनि-शिक्षा है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टि से वाणी का अध्ययन किया जाता है-वर्णों की उत्पत्ति कैसे होती है, वर्ण का सच्चा स्वरूप क्या है, भाषण-ध्वनि, ध्वनि-मात्र, अन्य अवांतर श्रुति ऐसे ही अनेक प्रश्नों का परीक्षा द्वारा विचार किया जाता है। अत: इन रहस्यों का भेदन ही-इस सूक्ष्म ज्ञान की प्राप्ति ही-उसका सबसे बड़ा प्रयोजन होता है।

इस अलौकिक पुण्य और आनंद के अतिरिक्त ध्वनि-शिक्षा व्यवहार में भी बड़ी लाभकर होती है। किसी भाषा का शुद्ध उच्चारण सिखाने के लिए वर्णों की वैज्ञानिक व्याख्या करना आवश्यक होता है। विशेषकर किसी विदेशी को उच्चारण सिखाने में इससे बड़ी सहायता मिलती है। प्राचीन भारत में वर्ण-शिक्षा की उन्नति के कारण ही वेदों की भाषा का रूप आज भी इतना अक्षुण्ण छोड़कर ध्वनि-शिक्षा से ही काम लेना पड़ता था।

अभी कुछ ही दिन पहले लोग दूसरी भाषाओं का उच्चारण शिक्षक का अनुकरण करके ही सीखते थे पर अब शिक्षक वर्णों का उच्चारण करके बतलाने के अतिरिक्त यह भी सिखा सकता है। कि किन अवयवों और स्थानों से तथा किस ढंग का प्रयत्न करने से कौन वर्ण उच्चरित होना चाहिए। फोनेटिक रीडर (ध्वनि-पाठबलियाँ) ऐसे कार्यों के लिए ही बनती हैं। उनके द्वारा व्यवहार में उच्चारण भी सीखा जाता है। और उस वर्ण-शिक्षा के आधार पर भाषा की ध्वनियों का विचार भी किया जाता है।

इस वर्ण-शिक्षा और ध्वनि-विचार का भाषा-विज्ञान से संबंध स्पष्ट ही है। तुलना ओर इतिहास भाषा-विज्ञान के आधार हैं। इन दोनों ढंगों की प्रक्रिया के लिए ध्वनि-शिक्षा आवश्यक है। हम वर्णों के विकारों और परिवर्तनों की तुलना करते हैं उन्हीं का इतिहास खोजते हैं पर उनका कारण ढूँढने के लिए उनके उच्चारण की शिक्षा अनिवार्य है। बिना उच्चारण जाने हम उनका कोई भी शास्त्रीय विचार नहीं कर सकते। भाषा के वैज्ञानिक विवेचन के लिए तो यह परमावश्यक हो जाता है कि हम ध्वनियों के संपूर्ण जगत् से परिचित रहें, क्योंकि कभी-कभी एक ध्वनि का विशेष अध्ययन करने में भी उन सब ध्वनियों को जाना आवश्यक हो जाता है जिनसे उसका विकास हुआ है अथवा जिन ध्वनियों का स्थान ले सकना उसके लिए संभव है। अत: विकास और विकास के अध्ययन के लिए सामान्य ध्वनि-समूह का और किसी भाषा-विशेष के ध्वनि-समूह का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

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