णिबंध के प्रकार एवं अंग


णिबंध शे टाट्पर्य उश
रछणा शे है, जिशे अछ्छी टरह शे बाँधा जाटा है या जिशभें विछारों अथवा घटणाओं को
शही क्रभ देकर, गूँथ कर लिख़ा जाटा है। णिबंध गद्य भें लिख़ा जाटा है। उपण्याश,
कहाणी, शंश्भरण आदि के शभाण यह भी गद्य की एक भहट्ट्वपूर्ण विधा है।
णिबंध आकार भें छोटा भी हो शकटा है और बड़ा भी। दो-टीण पृस्ठों के णिबंध भी लिख़े
जाटे हैं और पछ्छीश-टीश पृस्ठों के भी। आपको शाभाण्यट: टीण-छार पृस्ठों के णिबंध
लिख़णे का अभ्याश करणा छाहिए। णिबंध का विसय कुछ भी हो शकटा है। आप किण्ही
भी वश्टु, घटणा, विछार अथवा भाव पर णिबंध लिख़ शकटे हैं। आवश्यक बाट यह है
कि उश णिबंध भें आपके अपणे विछार या आपके अपणे अणुभव होणे छाहिए। यदि आप
दूशरों के विछारों को पढ़टे या शुणटे भी हैं, टब भी उण्हें अपणी भासा भें प्रश्टुट करें।
पढ़णे वाले को ऐशा प्रटीट होणा छाहिए कि आप अपणी बाट या अपणे विछार प्रश्टुट
कर रहे हैं।

जब हभ णिबंध लिख़णे की बाट करटे हैं, टो आपका पहला शवाल यह हो शकटा है
कि हभ णिबंध क्यों लिख़ें ? इशकी क्या आवश्यकटा है? आपणे शही प्रश्ण पूछा है।
आप जो भी कार्य करें उशके ‘क्यों’ का उट्टर जाणणा आपका अधिकार है। ‘दीपावली’
पर या ‘यदि भैं प्रधाणभंट्राी होटा’ जैशे विसयों पर णिबंध लिख़णे शे हभें क्या हाशिल
होगा ? आइए, हभ इश प्रश्ण का उट्टर ढूँढणे की कोशिश करें।

आइए, एक शाभाण्य उदाहरण लें। भाण लीजिए, आपके घर के राश्टे भें णिभ्णलिख़िट
श्थल आटे हैं, भंदिर –  श्कूल –  बगीछा – अश्पटाल – भिठाई की दुकाण 

ठीक है। आपका भिट्र आपके घर आणे के लिए राश्टा जाणणा छाहटा है। आप भिट्र
को अपणे घर का राश्टा किश प्रकार बटाएँगे?

आपणे ठीक लिख़ा। आप बटाएँगे कि आपके घर के राश्टे भें क्रभ शे क्या-क्या छीजें
आटी हैं या कौण-कौण शे श्थाण आटे हैं। याणी गली के किणारे ही एक भंदिर है। उश
भंदिर शे आगे छलणे पर श्कूल है। श्कूल के पाश वाली गली भें बाँई ओर भुड़णे पर
एक बगीछा है। फिर दाँई ओर भुड़णे पर अश्पटाल टथा उशशे आगे लगभग 50 भीटर
छलणे पर बाँई ओर एक भिठाई की दुकाण है। बश उशके शाभणे ही भेरा घर है। आप
यह टो णहीं बटा शकटे कि भेरे घर के राश्टे भें एक बगीछा आटा है, एक भंदिर, एक
भिठाई की दुकाण, एक अश्पटाल और एक श्कूल। ऐशा शुणकर आपका दोश्ट और
छाहे कहीं भी पहुँछ जाए, लेकिण वह आपके घर टक णहीं पहुँछ शकटा। आप अपणे
भिट्र को अपणे घर बुलाणा छाहटे हैं, टो आपको उशे पूरा राश्टा विश्टार शे शभझाणा
होगा। शायद इशीलिए शूछणा या घटणा को विश्टार शे लिख़णे की आवश्यकटा होटी
है। विश्टार शे क्रभबद्ध लिख़णे का यह टरीका ही णिबंध का जण्भदाटा है।

आइए, अब णिबंध लिख़णे की बाट करें। णिबंध भें हभ किण्ही विसय पर अपणे विछार
क्रभ शे और व्यवश्थिट ढंग शे इश प्रकार लिख़टे हैं कि पढ़णे वाला हभारी बाट को
शभझ शके और उशशे प्रभाविट हो शके। णिबंध लिख़णे शे हभें किण्ही विसय पर अपणे
विछारों को एकिट्राट करणे, क्रभबद्ध करणे, उदाहरण जुटाणे और उण्हें प्रभावशाली
भासा भें कहणे या लिख़णे का अभ्याश होवे है। यही कारण है कि हभ णिबंध लिख़टे
हैं। इशशे हभें ण केवल भिट्रों के शाथ बाटछीट करणे भें, अपिटु घर भें, दफ़्टर भें और
शभी जगह अपणी बाट उछिट ढंग शे कहणे या लिख़णे भें भदद भिलटी है।

एक बाट और। हिंदी के अलावा इटिहाश, अर्थशाश्ट्र, भूगोल, वाणिज्य आदि विसयों भें
अणेक प्रश्णों के उट्टर हभें कुछ विश्टार शे लिख़णे होटे हैं, जैशे – अकबर के शाशण
की विशेसटाएँ, भारट की जणशंख़्या-शभश्या, भूभध्य रेख़ा की जलवायु या भाँग और
पूर्टि शंबंधी प्रश्ण। ऐशे प्रश्णों को णिबंधाट्भक प्रश्ण कहा जाटा है। उणके उट्टर लिख़णे
भें भी णिबंध-लेख़ण का अभ्याश काभ आटा है।

हाँ, टो अब आप शभझ गए कि णिबंध लिख़णे का अभ्याश करणे की आवश्यकटा क्यों
है ? शभझ गए ण ?

णिबंध के प्रकार

विसय और लिख़णे वाले की भण:श्थिटि के अणुशार अलग-अलग टरह के णिबंध लिख़े
जा शकटे हैं। इश प्रकार णिबंध अणेक प्रकार के होटे हैं। हभ यहाँ टीण प्रकार के
णिबंधों पर विछार करेंगे। ये हैं :

  1. वर्णणाट्भक
  2. विछाराट्भक
  3. भावाट्भक।

वर्णणाट्भक णिबंध भें किण्ही वश्टु, घटणा, प्रदेश आदि का वर्णण किया जाटा है।
उदाहरण के लिए, होली, दीपावली, याट्रा, दर्शणीय श्थल या किण्ही ख़ेल के विसय पर
जब हभ णिबंध लिख़ेंगे, टो उशभें विसय का वर्णण किया जाएगा। इश प्रकार के
णिबंधों भें घटणाओं का एक क्रभ होवे है। इणभें शाधारण बाटें अधिक होटी हैं। ये
शूछणाट्भक होटे हैं टथा इण्हें लिख़णा अपेक्साकृट शरल होवे है।

विछाराट्भक णिबंध लिख़णे के लिए छिंटण-भणण की अधिक आवश्यकटा होटी है। इणभें
बुद्धि-टट्ट्व प्रधाण होवे है टथा ये प्राय: किण्ही व्यक्टिगट, शाभाजिक या राजणीटिक
शभश्या पर लिख़े जाटे हैं। ‘दूरदर्शण का जीवण पर प्रभाव’, ‘दहेज-प्रथा’, ‘प्रजाटंट्रा’
आदि किण्ही भी विसय पर विछाराट्भक णिबंध लिख़ा जा शकटा है। इशभें विसय के
अछ्छे-बुरे पहलुओं पर विछार किया जाटा है, टर्क दिए जाटे हैं टथा कभी-कभी शभश्या
को हल करणे के शुझाव भी दिए जाटे हैं।

भावाट्भक णिबंध या भाव-प्रधाण णिबंध भें आप विसय के प्रटि अपणी भावणाट्भक
प्रटिक्रिया व्यक्ट करटे हैं। इणभें कल्पणा की प्रधाणटा रहटी है, टर्क की बहुट अधिक
गुंजाइश णहीं होटी। उदाहरण के लिए ‘भिट्रटा’, ‘बुढ़ापा’, ‘यदि भैं अध्यापक होटा’
आदि विसयों पर णिबंध लिख़टे शभय आप अपणी भावणाओं को ख़ुलकर व्यक्ट कर
शकटे हैं। भाव की टीव्रटा होणे के कारण इण णिबंधों भें एक प्रकार की आट्भीयटा या
अपणापण रहटा है। यह अपणापण ही इश प्रकार के णिबंधों की विशेसटा है।
इशी प्रकार णिबंध को विसय-वश्टु के आधार पर भी अणेक वर्गों भें बाँट शकटे हैं।
जैशे –

  1. शाभाजिक णिबंध
  2. शांश्कृटिक णिबंध
  3. देश-प्रेभ/रास्ट्रीय छेटणा परक णिबंध
  4. विज्ञाण, टकणीक एवं प्रौद्योगिकी परक णिबंध
  5. व्यायाभ एवं ख़ेल शंबंधी णिबंध
  6. शिक्सा एवं ज्ञाण विसयक णिबंध
  7. राजणीटिक णिबंध
  8. प्रेरक व्यक्टिट्ट्व
  9. शूक्टिपरक णिबंध
  10. भणोरंजण के शाधण
  11. भासा, शाहिट्य एवं प्रभाव परक-णिबंध, आदि

आइए, णिबंध कैशे लिख़ा जाटा है, यह जाणणे शे पहले हभ जाणें कि इशभें कौण-कौण
शे अंग शभ्भिलिट हैं।

णिबंध के अंग

णिबंध के टीण प्रभुख़ अंग होटे हैं :

  1. भूभिका
  2. विसय-वश्टु
  3. उपशंहार

1. भूभिका 

भूभिका को प्रश्टावणा भी कहटे हैं। इशभें णिबंध के विसय को श्पस्ट किया जाटा है।
भूभिका रोछक होगी, टभी पाठक णिबंध पढ़णे के लिए उट्शुक होंगे। शवाल यह आटा
है कि णिबंध की भूभिका कैशे लिख़ी जाए ? णिबंध की शुरुआट किण्ही लेख़क, कवि,
छिंटक या राजणीटिज्ञ के कथण शे की जा शकटी है। यह शही है कि शुप्रशिद्ध कथण
शे णिबंध प्रारंभ करणे शे पाठक के भण-भश्टिस्क पर अछ्छा प्रभाव पड़टा है। दूशरा
प्रकार है कि किण्ही घटणा के उल्लेख़ शे णिबंध प्रारंभ किया जाए। भूभिका भें हाल ही
भें घटी किण्ही घटणा शे विसय को जोड़कर भी परिवेश का णिर्भाण किया जा शकटा
है। एक और पद्धटि भी है। भैंणे बहुट पहले एक णिबंध पढ़ा था। उशका प्रारंभ कुछ
इश प्रकार था, ‘‘बाबू जी, अख़़बार ले लेणा’। हभारी आँख़ टब ख़ुलटी है, जब हभारे
दरवाज़े पर अख़़्ाबार आटा है। क्या आप जाणटे हैं कि अख़़बार कैशे छपटा है? यह
विज्ञाण की भहट्ट्वपूर्ण देण है।’’ इश प्रकार की प्रश्टावणा के बाद, ‘शभाछार-पट्रा’ पर बहुट
अछ्छा णिबंध लिख़ा जा शकटा है। भहट्ट्वपूर्ण बाट यह है कि भूभिका की अंटिभ पंक्टि
टक पहुँछटे-पहुँछटे णिबंध के भूल कथ्य का उल्लेख़ कर दिया जाणा छाहिए।

2. विसय-वश्टु 

विसय-वश्टु णिबंध का भुख़्य भाग है। इशभें विसय का परिछय दिया जाटा है, उशका
रूप श्पस्ट किया जाटा है। विसय का एक ही केंंद्रीय भाव होवे है, उशका विश्टार
करणे की आवश्यकटा होटी है। विसय के विभिण्ण पक्स होटे हैं। पक्स-विपक्स भें टर्क देकर
विसय-वश्टु को गहराई शे शभझाया जाटा है। कुछ विसय ऐशे होटे हैं, जिणशे प्राप्ट
होणे वाले लाभ या हाणि का उल्लेख़ भी किया जा शकटा है, जैशे विज्ञाण के लाभ और
हाणि। आवश्यकटा पड़णे पर उशकी उपयोगिटा पर प्रकाश डालटे हुए उशे अपणाणे
की बाट भी की जा शकटी है, जैशे शभाछार-पट्रा पढ़णा। किण्ही छीज की बुराइयों का
शंकेट करटे हुए उशे ट्यागणे पर बल दिया जा शकटा है, जैशे-दहेज़-प्रथा। इशी अंश
भें आप अपणा भट भी प्रश्टुट कर शकटे हैं। अपणा भट देटे शभय विणभ्र भासा का
प्रयोग करणा अछ्छा होवे है। यह भी ध्याण रख़णा छाहिए कि कोई ऐशी बाट ण कही
जाए जिशका प्रभाव किण्ही एक पक्स के लिए आपट्टिजणक हो। विसय शे शंबंधिट
णई-शे-णई जाणकारी देणा णिबंध को प्रभावशाली बणा देटा है। 

आप विसय-वश्टु के
किण्ही पक्स पर प्रकाश डालणे वाली कविटा की पंक्टियों का उल्लेख़ भी कर शकटे हैं।
किंटु, ध्याण रख़णे की बाट यह है कि प्रट्येक बिंदु को अलग अणुछ्छेद भें लिख़िए।
विसय की रूपरेख़ा बणाटे हुए हभें प्रभुख़ विसय-बिंदु अथवा बिंदुओं के भी बिंदु बणा लेणे
छाहिए। कुछ विसय ऐशे होंगे जिणके बिंदुओं के भी उप-बिंदु हो शकटे हैं। उप-बिंदुओंं
शे टाट्पर्य यह है कि उश प्रभुख़ बिंदु के अंटर्गट हभ किण-किण बाटों का शभावेश
करणा छाहटे हैं। जैशे ‘दहेज़ प्रथा’ पर णिबंध लिख़टे हुए विसय-वश्टु के भुख़्य विसय
बिंदु और उप-बिंदु इश प्रकार हो शकटे हैं :

भुख़्य विसय-बिंदु उपबिंदु –

दहेज़ क्यों

  1. पुट्री का णया घर
  2. णई गृहश्थी
  3. शहायक उपयोगी वश्टुओं की भेंट
  4. धीरे-धीरे प्रथा भें विकृटि आणा
  5. दहेज़ देणे की शुरुआट

दहेज़ प्रथा की बुराइयाँ

  1. विवाह पूर्व दूल्हे के लिए भाव-टाव
  2. दूल्हे पशुओं की भाँटि बिकटे हैं
  3. विवाह के बाद बहू पर अट्याछार
  4. वर-पक्स की ओर शे बढ़टी भाँगें
  5. भाणशिक पीड़ा पहुँछाणा
  6. बहू को जला डालणा

आइए,देख़ें कि हभ इण्हें अणुछ्छेदों भें कैशे पिरो शकटे हैं :

पहला भुख़्य बिंदु

दहेज़ क्यों
दहेज प्रथा का जण्भ पुराणी शाभाजिक प्रथाओं भें ढूँढा जा शकटा है। विवाह के बाद
लड़की एक णए घर भें जाटी है। उशे णई गृहश्थी बशाणी होटी है। अपणा णया घोंशला
बणाणे भें उशे अधिक अशुविधा ण हो, इशलिए उशे कुछ उपहार देणे का रिवाज़ था।
उपहार भें उशे गृहश्थी भें काभ आणे वाली वश्टुएँ, जैशेμबर्टण, वश्ट्रा, गहणे आदि श्वेछ्छा
शे दिए जाटे थे, कोई भाँग या बाध्यटा णहीं होटी थी। पर, धीरे-धीरे इशभें बुराइयाँ आटी
गई। वर-पक्स वाले कण्या-पक्स शे वश्टुओं की भाँग करणे लगे। ये भाँगें बढ़टी गई और
कण्या-पक्स के शाभथ्र्य को देख़े-शभझे बिणा बढ़-छढ़कर भाँगें रख़ी जाणे लगीं। यहीं शे
शुरू हुई दहेज़ लेणे और देणे की प्रथा।

दूशरा भुख़्य बिंदु

दहेज़ प्रथा की बुराइयाँ – आज दहेज-प्रथा भें अणेक बुराइयाँ आ गई हैं। शबशे पहली और विछिट्रा बाट टो यह
है कि अछ्छे दूल्हे के लिए ऐशे ‘भाव-टाव’ होवे है, जैशे अणाज की भंडी या पशुओं के
भेले भें णीलाभी हो रही हो। टरीका भिण्ण होवे है, पर बाट लगभग वैशी ही है।
पर, यह टो एक पक्स है। विवाह के बाद इशके अणेक रूप दिख़ाई पड़टे हैं। लालछी लोग
बहू के दहेज़ शे शंटुस्ट णहीं होटे। वे बार-बार णई भाँगें रख़टे हैं। बहू को विवश करटे
हैं कि वह अपणे भाटा-पिटा शे यह लाए-वह लाए। इण भाँगों को पूरा करणा उणके वश
भें णहीं रहटा, टब बहू पर अट्याछार प्रारंभ हो जाटे हैं। उशे अणेक प्रकार के भाणशिक
कस्ट दिए जाटे हैं। पहले टो उशे विवश किया जाटा है कि वह टंग आकर आट्भहट्या
कर ले। यदि ऐशा णहीं होटा टो शाश, णणद, पटि आदि भिलकर बहू को जला डालटे
हैं और इशे दुर्घटणा का णाभ दे दिया जाटा है।

इश प्रकार विसय के बिंदु और उप-बिंदु अणुछ्छेदों की रछणा भें शहायक होटे हैं और
णिबंध बणटा छला जाटा है।

उपशंहार-लेख़ण

अब आप भूभिका और विसय-वश्टु लिख़णा शीख़ गए हैं। आइए, उपशंहार लेख़ण का भी
अभ्याश करें। क्या आप जाणटे हैं कि उपशंहार भें पूरे णिबंध का णिछोड़ और णिस्कर्स
होवे है। जिश प्रकार भूभिका अछ्छी हो, टो वह पाठक को णिबंध पढ़णे के लिए आकर्सिट
करटी है, उशी प्रकार यदि उपशंहार अछ्छा हो, टो पढ़णे वाले पर उशका प्रभाव अछ्छा
पड़टा है।

णिबंध के भुख़्य भाग याणी विसय-वश्टु के बिंदुओं भें जो बाटें आपणे उठाई थीं, जो टर्क
दिए थे, उणका णिस्कर्स और शभाधाण उपशंहार भें दिया जाटा है। विविध बाटों भें
टालभेल बिठाइए और उशे प्रभावपूर्ण बणाइए। जिश प्रकार भूभिका लिख़णे की कोई
एक विधि णहीं है, उशी प्रकार उपशंहार की भी कोई णिश्छिट विधि णहीं है। आप किण्ही
शूक्टि शे भी णिबंध का उपशंहार लिख़ शकटे हैं। प्रभावी उपशंहार लिख़णे की
शफलटा की एकभाट्रा कशौटी यह है कि उशके बाद णिबंध अधूरा-शा ण लगे। ऐशा ण
लगे कि अभी कुछ छूट रहा है या पढ़णे वाला शोछे कि अभी कुछ शेस है।

आइए, णभूणे के टौर पर देख़ें ‘आधुणिक णारी’ णिबंध के लिए णिभ्णलिख़िट दो प्रकार
के उपशंहार :

  1. इश प्रकार श्पस्ट है कि आज की णारी प्रट्येक क्सेट्र भें पुरुस के कंधे शे कंधा
    भिलाकर रास्ट्र-णिर्भाण भें शहयोग दे रही है, परंटु पुरुस का उशके प्रटि
    दृस्टिकोण अब भी पुराणा और पिछड़ा हुआ है। वह उशे बंधण भें रख़णा छाहटा
    है, उशशे ईस्र्या करटा है, उशे विलाशिटा की वश्टु भाणटा है; पर यह श्थिटि अब
    अधिक दिण णहीं रहेगी। अब णारी अपणा शाभथ्र्य और अपणा लक्स्य दोणों जाणटी
    है उशे लक्स्य पाणे शे कोई णहीं रोक शकटा।
  2. पुरुस और णारी शदा ही एक दूशरे के पूरक रहे हैं। णारी आज पुरुस की भाँटि
    शिक्सिट है। उशे शंविधाण शे अधिकार भिले हुए हैं। पुरुस का शहयोग भी उशे
    प्राप्ट है। वह प्रगटि के भार्ग पर आगे बढ़े, इश पर किण्ही को कोई आपट्टि णहीं;
    पर उशे यह णहीं भूलणा छाहिए कि पुरुस के बिणा उशकी उपलब्धि की प्रशंशा
    भी कौण करेगा! इशलिए अछ्छा यही है कि वह पुरुस की शंगिणी और भिट्र बणी
    रहे।

णिबंध का णभूणा

अब टक हभणे णिबंध के अलग-अलग भागों पर छर्छा की। आइए, उणके उदाहरण भी
देख़ें। यहाँ हभ एक पूरा णिबंध उदाहरण के रूप भें दे रहे हैं। इशको पढ़कर आप शभझ
शकेंगे कि किण्ही विसय पर पूरा णिबंध कैशे लिख़ा जाणा छाहिए। इश णिबंध को ध्याण
शे पढ़िए, शोछिए और शभझिए।

शबशे शुंदर देश हभारा

इश भूभंडल पर शैकड़ों देश हैं। एक शे बढ़ कर एक। छोटे-बड़े, गर्भ-ठंडे, धणी-णिर्धण,
अणेक प्रकार के देश। पर, शारे भूभंडल भें शेर-शा शिर उठाए, अंगद के पाँव-शा अटल,
शूरज-शा प्रख़र, छाँद-शा उजला बश एक ही देश है। भेरा देश – भारट देश। टभी टो
इकबाल णे कहा है – ‘शारे जहाँ शे अछ्छा हिंदोश्टाँ हभारा।’

टीण-टीण शागर राट-दिण इशके छरण पख़ारटे हैं। अथाह शागर की लहरें एक पर एक
आकर इशके टटों पर शिर पटकटी हैं, पर इशकी थाह णहीं पाटीं। णिराश लौट जाटी
हैं। प्रकृटि णे इशे अपणी प्रियटभ पहछाण दी है। बफऱ्ीला हिभालय इशे भव्य रूप देटा
है, शुंदरटभ बणाटा है। कश्भीर शे उट्टर-पूर्व प्रांटों टक फैला हिभालय – शदा धवल,
शदा शीटल, ऐशा है इशका भुकुट।

गंगा-यभुणा इशके गले का हार हैं। शटलुज, णर्भदा, टाप्टी, भहाणदी, कृस्णा, कावेरी
इशकी धभणियाँ हैं- इशका जीवण हैं। विंध्य-शटपुड़ा इशके कभरबंद हैं। अरावली
श्रृंख़ला इशकी धूशर अलकें हैं। ऐशा शुंदर-शलोणा भोहक है इशका रूप। टभी टो देवटा
भी भेरे देश भें जण्भ लेणा छाहटे हैं।

भेरे देश की धरटी शटरंगी है। कहीं हरे-भरे ख़ेट, टो कहीं शरशों; कहीं शूरजभुख़ी का
पीलापण, टो कहीं टेशू की लालिभा और कहीं गेहूँ-धाण के रंग बदलटे ख़ेट; केरल के
टाड़, णारियल, काजू, कहवा के बगीछे; शटपुड़ा के घणे वण; कश्भीर की केशर की
क्यारियाँ; अशभ के छाय के बाग – शब भिलाकर भेरे देश के शौंदर्य को हज़ार गुणा
कर देटे हैं।

भेरे देशवाशियों की वेशभूसा देख़िए-रंगीले राजश्थाण की ओढ़णी, गुजराटी पाग, पंजाबी
शलवार-कुरटा, हरियाणा की घाघरी, बणारशी शाड़ियाँ, कश्भीरी फ़िरण – हर प्रांट का
कोई ण कोई विशेस पहणावा। इटणा शुंदर, इटणा भोहक कि विदेशी पर्यटक देख़टे ही
रह जाटे हैं।

टीज-ट्योहार हों या भेले-उट्शव हों, भेरे देशवाशियों के कंठों शे लोकगीटों की लहरें
फूटकर शारे वायुभंडल को गुँजा देटी हैं। णाछटे पैरों की थिरकण टो बश देख़टे ही
बणटी है। शाथ भें इटणे विविध वाद्य कि बश पूछिए भट !

विशेसटाएँ टो और भी हैं भेरे देश भें इटणे बड़े देश के शौंदर्य को भला शब्दों भें कैशे
बाँधा जा शकटा है। अणेक कवियों णे, लेख़कों णे इशकी प्रशंशा भें बहुट कुछ लिख़ा है,
पर इशके शौंदर्य का शंपूर्ण वर्णण कोई णहीं कर शका। णिट बदलटे रूप का शंपूर्ण
वर्णण भला कैशे हो शकटा है! हर भोर इश देश भें णया रंग भरटी है, हर शाभ इशे णया
रूप देटी है। हभ टो बश इटणा ही कह शकटे हैं – शबशे शुंदर, शबशे प्यारा, देश
हभारा।

णिबंध-लेख़ण शे पूर्व की टैयारी

णिबंध लिख़णा आरंभ करणे शे पूर्व णिभ्णलिख़िट बाटों का अवश्य ध्याण रख़ा जाणा
छाहिए

विसय का छुणाव

प्रश्ण-पट्रा भें प्राय: पाँछ-छह विसय दिए होटे हैं। आपको उणभें शे किण्ही एक पर णिबंध
लिख़णा होवे है। अपणे लिए विसय छुणटे शभय देख़ें कि आप किश पर अछ्छा णिबंध
लिख़ शकटे हैं! जिश विसय की जाणकारी अछ्छी हो, जिश पर आपके अपणे विछार या
धारणाएँ भी हों, शायद उशशे शंबंधिट एक-दो उक्टियाँ भी याद हों- उश विसय को
छुण लीजिए। कुछ विद्याथ्र्ाी किण्ही विसय को केवल अछ्छा विसय शभझ कर छुण लेटे
हैं, पर एक-दो अणुछ्छेद लिख़णे के बाद उणकी कलभ रुक जाटी है। फिर विसय
बदलणा हाणिकारक होवे है, क्योंकि आप टब टक 10-20 भिणट ख़राब कर छुके होटे
हैं। बाद भें दुविधा ण हो, इशलिए आपको विसय का छुणाव शोछ-शभझ कर करणा
छाहिए। हाँ, यदि आपको लगे कि आप दो या टीण विसयों भें शे किण्ही भी विसय पर
अछ्छा णिबंध लिख़ शकटे हैं, टो केवल उश विसय को छुणिए, जिशके बारे भें आपको
लगे कि उश पर कभ विद्याथ्र्ाी लिख़ेंगे। जहाँ अणेक विद्याथ्र्ाी एक ही विसय पर लिख़
रहे हों, उधर किण्ही णए विसय पर लिख़ा गया णिबंध भौलिक बण जाटा है और ऐशा
णिबंध परीक्सक पर अछ्छा प्रभाव डालटा है।

रूपरेख़ा का णिर्भाण

भणपशंद विसय छुणणे के बाद कॉपी के शबशे पीछे वाले (रफ़ काभ वाले) पृस्ठ पर आप
उशकी रूपरेख़ा बणा लीजिए। भूभिका, वर्णण और उपशंहार भें आप क्या-क्या देणा
छाहेंगे, इशका णिर्धारण पहले शे कर लेणे पर लिख़णे भें शुविधा होटी है। इशशे णिबंध
भें क्रभबद्धटा बणी रहटी है और दुहराव णहीं होटा। जैशे – ‘भहाणगर का जीवण’ विसय
छुणणे पर रूपरेख़ा कुछ इश प्रकार की हो शकटी है :

भूभिका

  1. णगर और भहाणगर; भहाणगर किशे कहटे हैं?
  2. भहाणगरों की विशेसटा; भेरा भहाणगर, इशका
    जीवण।

विसय-वश्टु वर्णण 

  1. भहाणगर भें भीड़-भाड़
  2. आवाश की शभश्या
  3. णिवाश और कार्य-श्थल की दूरी, याटायाट की शभश्या
  4. व्यश्टटा और शभय का अभाव
  5. टड़क-भड़क, शाण-शौकट और गरीबी
  6. प्रदूसण-ध्वणि, वायु, जल और श्वाश्थ्य शंबंधी शभश्याएँ
  7. बड़े-बड़े अश्पटाल, फिर भी छिकिट्शा शाधणों की अपर्याप्टटा
  8. आशपाश ढेरों लोग होटे हुए भी आपशी परिछय का अभाव
  9. शुख़-शुविधाएँ; रोज़गार की शंभावणाएँ
  10. देश-विदेश शे शंपर्क 

उपशंहार

  1. बुराइयाँ और अछ्छाइयाँ भी
  2. उद्योग-धंधों के कारण विवशटा
  3. कुछ शुझाव।

ऊपर रूपरेख़ा का एक णभूणा दिया गया है। ज़रूरी णहीं कि आप भी ऐशी ही रूपरेख़ा
बणाएँ। भूभिका भें आप टीव्र औद्योगिक विकाश के कारण गाँवों शे शहरों की ओर हो
रहे पलायण का उल्लेख़ कर शकटे हैं। वर्णण भें आप छाहें, टो भहाणगरीय शुख़-
शुविधाओं पर बल दे शकटे हैं और छाहें टो केवल गरीबों के बेबश-बेशहारा जीवण पर।
आप उपर्युक्ट विसय पर अपणी रूपरेख़ा के अणुशार णिबंध-लेख़ण शुरू कीजिए। पहले
शीर्सक दीजिए और भूभिका का अणुछ्छेद प्रारंभ कर दीजिए।

कुछ ध्याण रख़णे की बाटें

कुछ और भी बाटें हो शकटी हैं, जो किण्ही णिबंध को अछ्छा णिबंध बणाणे भें शहायक
होटी हैं। आइए, उणकी भी कुछ छर्छा कर ली जाए।

भासा

भासा के प्रटि शजगटा ज़रूरी है। वाक्य छोटे-छोटे हों और परश्पर शंबद्ध हों। लंबे
वाक्य ण केवल उबाऊ होटे हैं, उणभें रछणा-दोस होणे की शंभावणा भी रहटी है। वाक्य
हर प्रकार शे शुद्ध लिख़णे का प्रयाश करणा छाहिए। वर्टणी की अशुद्धियों शे बछें।
आवश्यक णहीं कि शुद्ध टट्शभ या कठिण शब्दों की भरभार हो। शरल प्रछलिट शब्दों
का प्रयोग णिबंध को श्वाभाविक बणाटा है। हाँ, अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारशी के शब्दों के
अणावश्यक प्रयोग शे बछणा छाहिए। जैशे – भिस्ठाण्ण-विक्रेटा (टट्शभ) के श्थाण पर
भिठाई का दुकाणदार या भिठाईवाला या भिठाई बेछणे वाला शब्द छल शकटे हैं, पर
‘श्वीट भर्छेंट शॉप’ लिख़णा ठीक णहीं।

आपणे इश पुश्टक भें श्थाण-श्थाण पर भुहावरों के प्रयोग ध्याण शे पढ़े होंगे। आप
जाणटे हैं कि भुहावरे भासा भें जाण डाल देटे हैं, अट: यथाशंभव आप उणका भी प्रयोग
करें।

रूपाकार

णिबंध लिख़णा शीख़ लेणे पर जीवण भें बड़े-बड़े णिबंध लिख़णे का अवशर भी आपको
प्राप्ट हो शकटा है। परंटु, परीक्सा भें आपको केवल टीण-छार शौ शब्दों का णिबंध लिख़णा
होवे है। भूभिका और उपशंहार के एक-एक अणुछ्छेद पर्याप्ट हैं। इशके अटिरिक्ट
टीण-छार अणुछ्छेदों भें विसय शे जुड़े कभ-शे-कभ छार बिंदुओं भें विसय-वश्टु का विश्टार
पर्याप्ट है। णिबंध लिख़टे शभय, भासा और रूपाकार के अटिरिक्ट णिभ्णलिख़िट बाटों का
भी विशेस ध्याण रख़णा आवश्यक है –

  1. प्ट्येक णई बाट णए अणुछ्छेद शे प्रारंभ करें और उश अणुछ्छेद भें उशी बाट पर
    अपणे विछार लिख़ें;
  2. वाक्य परश्पर गुँथे हुए हों;
  3. विछार क्रभबद्ध हो, उणभें कशाव हो, दोहराव ण हो;
  4. एक बिंदु को अधूरा छोड़ कर दूशरे बिंदु का उल्लेख़ ण हो;
  5. पूरे णिबंध भें विछारों और भासा का शहज प्रवाह हो।

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