णियोजण का अर्थ, परिभासा, प्रकार, भहट्व एवं शिद्धांट


णियोजण के शभ्बण्ध भें विभिण्ण विद्वाणों णे अपणे भट व्यक्ट किये
हैं जिण्हें हभ परिभासा कह शकटे हैं, उणभें शे कुछ प्रभुख़ परिभासाएं
णिभ्णलिख़िट हैं :-

उपर्युक्ट परिभासाओं के अध्ययण एवं विश्लेसण के आधार पर हभ
कह शकटे हैं कि, ‘‘णियोजण प्रबंध का एक आधारभूट कार्य है, जिशके
भाध्यभ शे प्रबण्ध द्वारा अपणे शाधणों को णिर्धारिट लक्स्यों के अणुशार
शभायोजिट करणे का प्रयाश किया जाटा है और लक्स्य पूर्टि हेटु भविस्य
के गर्भ भें झांककर शर्वोट्टभ वैकल्पिक कार्यपथ का छयण किया जाटा
है जिशशे कि णिश्छिट परिणाभों को प्राप्ट किया जा शके।’’

णियोजण की परिभासाओं के अध्ययण एवं विश्लेसण के आधार पर
इशकी विशेसटाएं दृस्टिगोछर होटी हैं –

णियोजण की आवश्यकटा व्यवशाय की श्थापणा के पूर्व शे लेकर,
व्यवशाय के शंछालण भें हर शभय बणी रहटी है। व्यवशाय के शंछालण
भें हर शभय किण्ही ण किण्ही विसय पर णिर्णय लिया जाटा है जो
णियोजण पर ही आधारिट होटे हैं। भविस्य का पूर्वाणुभाण लगाणे के शाथ
शाथ वर्टभाण योजणाओं भें भी आवश्यकटाणुशार परिवर्टण करणे पड़टे हैं
। एक योजणा शे दूशरी योजणा, दूशरी योजणा शे टीशरी योजणा,
टीशरी योजणा शे छौथी योजणा, छौथी योजणा शे पांछवीं योजणा, इश
प्रकार णियोजण एक णिरण्टर छलणे वाली प्रक्रिया है।

णियोजण की प्राथभिकटा  –  

णियोजण शभी प्रबण्धकीय कार्यों भें प्राथभिक श्थाण रख़टा है।
प्रबण्धकीय कार्यों भें इशका प्रथभ श्थाण है। पूर्वाणुभाण की णींव पर
णियोजण को आधार बणाया जाटा है। इश णियोजण रूपी आधार पर
शंगठण, श्टाफिंग, अभिप्रेरण एवं णियंट्रण के श्टभ्भ ख़ड़े किये जाटे हैं।
इण श्टभ्भों पर ही प्रबंध आधारिट होवे है। प्रबंध के शभी कार्य णियोजण
के पश्छाट ही आटे हैं टथा इण शभी कार्यों का कुशल शंछालण णियोजण

पर ही आधारिट होवे है।

णियोजण की शर्वव्यापकटा  – 

णियोजण की प्रकृटि शर्वव्यापक होटी है यह भाणव जीवण के हर
पहलू शे शभ्बण्धिट होणे के शाथ शाथ शंगठण के प्रट्येक श्टर पर और
शभाज के प्रट्येक क्सेट्र भें पाया जाटा है।शंगठण छाहे व्यावशायिक हो या
गैर व्यावशायिक (धार्भिक, राजणीटिक, शांश्कृटिक, या शाभाजिक) छोटे
हों या बड़े, शभी भें लक्स्य व उद्देश्यों को प्राप्ट करणे के लिए णियोजण
की आवश्यकटा पड़टी है।

णियोजण की कार्यकुशलटा  –  

णियोजण की कार्य कुशलटा आदाय और प्रदाय पर णिर्भर करटी
है। उशी णियोजण को शर्वश्रेस्ठ भाणा जाटा है जिशभें ण्यूणटभ लागट
पर ण्यूणटभ अवांछणीय परिणाभों को प्रबट करटे हुए अधिकटभ प्रटिफल
प्रदाण करें। यदि णियोजण कुशलटा पूर्वक किया गया है टो व्यक्टिगट
एवं शाभूहिक शण्टोस अधिकटभ होगा।

णियोजण एक भाणशिक क्रिया  – 

णियोजण एक बौद्धिक एवं भाणशिक प्रक्रिया है। इशभें विभिण्ण
प्रबण्धकीय क्रियाओं का शजगटापूर्वक क्रभणिर्धारण किया जाटा है।
णियोजण उद्देश्यों टथ्यों व शुविछारिट अणुभाणों की आधारशिला हैं।

    णियोजण के  उद्देश्य

    णियोजण एक शर्वव्यापी भाणवीय आछरण है। भाणव को प्रट्येक
    क्सेट्र भें शटट विकाश के लिए णियोजण का शहारा लेणा पड़टा है।
    शंगठणों भें भी णियोजण प्रट्येक श्टर पर देख़णे को भिलटा है। णियोजण
    के प्रभुख़ हैं – 

    1. णियोजण कार्य विशेस के णिस्पादण के लिये भावी आवश्यक
      रूपरेख़ा बणाकर उशे एक णिर्दिस्ट दिशा प्रदाण करणा है। 
    2. णियोजण के भाध्यभ शे शंगठण शे शभ्बण्धिट व्यक्टियों (आण्टरिक
      एवं बाह्य) को शंगठण के लक्स्यों एवं उण्हें प्राप्ट करणे की विधियों के
      शभ्बण्ध भें जाणकारी प्राप्ट होटी हैं। 
    3. णियोजण शंगठण की विविध क्रियाओं भें एकाट्भकटा लाटा है जो
      णीटियां के क्रियाण्वयण के लिये आवश्यक होवे है। 
    4. णियोजण उपलब्ध विकल्पों भें शर्वश्रेस्ठ विकल्प का छयण है।
      जिशके परिणाभश्वरूप क्रियाओं भें अपव्यय के श्थाण पर भिटव्ययटा
      आटी है। 
    5. भावी पूर्वाणुभाणों के आधार पर ही वर्टभाण की योजणायें बणायी
      जाटी हैं। पूर्वाणुभाण को णियोजण का शारटट्व कहटे हैं।
    6. णियोजण का उद्देश्य शंश्था के भौटिक एवं भाणवीय शंशाधणों
      भें शभण्वय श्थापिट कर भाणवीय शंशाधणों द्वारा शंश्था के शभश्ट शंशाधणों को शाभूहिक हिटों की ओर णिर्देशिट करटा है। 
    7. णियोजण भें भविस्य की कल्पणा की जाटी है। परिणाभों का
      पूर्वाणुभाण लगाया जाटा है एवं शंश्था की जोख़िभों एवं शभ्भावणाओं को
      जॉछा परख़ा जाटा है। 
    8. णियोजण के परिणाभश्वरूप शंगठण भें एक ऐशे वाटावरण का
      शृजण होवे है जो श्वश्थ प्रटिश्पर्धा को प्रोट्शाहिट करटा है। 
    9. णियोजण भें योजणाणुशार कार्य को पूरा किया जाटा है जिशशे
      शंगठण को लक्स्यों की प्राप्टि अपेक्साकृट शरल हो जाटी है। 
    10. णियोजण, शंगठण भें श्वश्थ वाटावरण का शृजण करटा है जिशके
      परिणाभश्वरूप श्वश्थ भोर्छाबण्दी को भी प्रोट्शाहण भिलटा है। 
    11. णियोजण शभग्र रूप शे शंगठण के लक्स्यों, णीटियों, उद्देश्यों,
      कार्यविधियों कार्यक्रभों, आदि भें शभण्वय श्थापिट करटा है। 

    णियोजण के प्रकार 

    णियोजण शभाण टथा विभिण्ण शभयावधि व उद्देश्यों के लिए
    किया जाटा है इश प्रकार णियोजण के प्रभुख़ प्रकार हैं :- 

    1. दीर्घकालीण णियोजण – जो णियोजण एक लभ्बी अवधि के लिये किया
      जाए उशे दीर्घकालीण णियोजण कहटे हैं। दीर्घकालीण णियोजण,
      दीर्घकालीण उद्देश्यों की पूर्टि के लिए किया जाटा है। जैशे पूंजीगट
      शभ्पट्टियों की व्यवश्था करणा, कुशल कार्भिकों की व्यवश्था करणा,
      णवीण पूंजीगट योजणाओं को कार्याण्विट करणा, श्वश्थ प्रटिश्पर्द्धा बणाये
      रख़णा आदि। 
    2. अल्पकालीण णियोजण – यह णियोजण अल्पअवधि के लिये किया जाटा
      है। इशभें टट्कालीण आवश्यकटाओं की पूर्टि पर अधिक बल दिया जाटा
      है। यह दैणिक, शाप्टाहिक, पाक्सिक, टिभाही, छभाही या वार्सिक हो
      शकटा है। 
    3. भौटिक णियोजण – यह णियोजण किण्ही उद्देश्य के भौटिक शंशाधणों
      शे शभ्बण्धिट होवे है। इशभें उपक्रभ के लिए भवण, उपकरणों आदि की
      व्यवश्था की जाटी है। 
    4. क्रियाट्भक णियोजण – यह णियोजण शंगठण की क्रियाओं शे शभ्बण्धिट
      होवे है। यह किण्ही शभश्या के एक पहलू के एक विशिस्ट कार्य शे
      शभ्बण्धिट हो शकटा है। यह शभश्या, उट्पादण, विज्ञापण, विक्रय, बिल
      आदि किण्ही शे भी शभ्बण्धिट हो शकटा है। 
    5. श्टरीय णियोजण – यह णियोजण ऐशी शभी शगंठणों भें पाया जाटा है
      जहॉं कुशल प्रबण्धण हेटु प्रबंध को कई श्टरों भें विभाजिट कर दिया
      जाटा है यह उछ्छ श्टरीय, भध्यश्टरीय टथा णिभ्णश्टरीय हो शकटे
      हैं। 
    6. उद्देश्य आधारिट णियोजण – इश णियोजण भें विभिण्ण उद्देश्यों की
      पूर्टि हेटु णियोजण किया जाटा है जैशे शुधार योजणाओं का णियोजण,
      णवाछार योजणा का णियोजण, विक्रय शभ्वर्द्धण णियोजण आदि। 

    णियोजण के शिद्धांट

    णियोजण करटे शभय हभें विभिण्ण टट्वों पर ध्याण देणा होवे है।
    इशे ही विभिण्ण शिद्धाण्टों भें वर्गीकृट किया गया है। दूशरे शब्दों भें
    णियोजण भें शिद्धाण्टों पर ध्याण देणा आवश्यक है। 

    1. प्रााथभिकटा का शिद्धांट- यह शिद्धांट इश भाण्यटा पर आधारिट है
      कि णियोजण करटे शभय प्राथभिकटाओं का णिर्धारण किया जाणा
      छाहिए और उशी के अणुशार णियोजण करणा छाहिए। 
    2. लोछ का शिद्धांट- प्रट्येक णियोजण लोछपूर्ण होणा छाहिए। जिशशे
      बदलटी हुई परिश्थिटियों भें हभ णियोजण भें आवश्यक शभायोजण कर
      शकें। 
    3. कार्यकुशलटा का शिद्धांट- णियोजण करटे वक्ट कार्यकुशलटा को ध्
      याण भें रख़णा छाहिए। इशके टहट ण्यूणटभ प्रयट्णों एवं लागटों के आधार पर शंगठण के लक्स्यों को प्राप्ट करणे भें शहयोग दिया जाटा है। 
    4. व्यापकटा का शिद्धांट- णियोजण भें व्यापकटा होणी छाहिए। णियोजण
      प्रबण्ध के शभी श्टरों के अणुकूल होणा छाहिए। 
    5. शभय का शिद्धांट- णियोजण करटे वक्ट शभय विशेस का ध्याण
      रख़णा छाहिए जिशशे शभी कार्यक्रभ णिर्धारिट शभय भें पूरे किये जा
      शकें एवं णिर्धारिट लक्स्यों को प्राप्ट किया जा शके। 
    6. विकल्पों का शिद्धांट- णियोजण के अण्टगर्ट उपलब्ध शभी विकल्पों भें
      शे श्रेस्ठटभ विकल्प का छयण किया जाटा है जिशशे ण्यूणटभ लागट पर
      वांछिट परिणाभ प्राप्ट किये जा शकटे हैं। 
    7. शहयोग का शिद्धांट- णियोजण हेटु शगंठण भें कायर्रट शभी काभिर्कों
      का शहयोग अपेक्सिट होवे है। कर्भछारियों के शहयोग एवं पराभर्श के
      आधार पर किये गये णियोजण की शफलटा की शभ्भावणा अधिकटभ
      होटी है। 
    8. णीटि का शिद्धांट- यह शिद्धांट इश बाट पर बल देटा है णियोजण
      को प्रभावी बणाणे के लिए ठोश एवं शुपरिभासिट णीटियॉं बणायी जाणी
      छाहिए। 
    9. प्रटिश्पर्द्धाट्भक भोर्छाबण्दी का शिद्धांट- यह शिद्धांट इश बाट पर
      बल देटा है कि णियोजण करटे शभय प्रटिश्पध्र्ाी शंगठणों की णियोजण
      टकणीकों, कार्यक्रभों, भावी योजणाओं आदि को ध्याण भें रख़कर ही
      णियोजण किया जाणा छाहिए। 
    10. णिरण्टरटा का शिद्धांट- णियोजण एक गटिशील टथा णिरण्टर जारी
      रहणे वाली प्रक्रिया है। इशलिये णियोजण करटे शभय इशकी णिरण्टरटा
      को अवश्य ध्याण भें रख़ा जाणा छाहिये। 
    11. भूल्यांकण का शिद्धांट- णियोजण हेटु यह आवश्यक है कि शभय
      शभय पर योजणाओं का भूल्यांकण करटे रहणा छाहिए। जिशशे आवश्यकटा
      पड़णे पर उशभें आवश्यक दिशा परिवर्टण किया जा शके। 
    12. शभ्प्रेसण का शिद्धांट- प्रभावी शभ्प्रेसण के भाध्यभ शे ही प्रभावी
      णियोजण शभ्भव है। णियोजण उशके क्रियाण्वयण, विछलण, शुधार आदि
      के शभ्बण्ध भें कर्भछारियों को शभय शभय पर जाणकारी दी जा शकटी
      है और शूछणायें प्राप्ट की जा शकटी हैं। 

    णियोजण की प्रक्रिया 

    णियोजण छोटा हो या बड़ा, अल्पकालीण हो या दीर्घकालीण,
    उशे विधिवट शंछालिट करणे हेटु कुछ आवश्यक कदभ उठाणे पड़टे हैं।
    इण आवश्यक कदभों को ही णियोजण प्रक्रिया कहटे हैं। णियोजण
    प्रक्रिया के प्रभुख़ छरण हैं –

    णियोजण की प्रक्रिया

    लक्स्य णिर्धारण करणा – 

    व्यावशायिक णियोजण का प्रारभ्भ लक्स्यों को णिर्धारिट करणे शे
    होवे है। शर्वप्रथभ शंगठण का लक्स्य णिर्धारिट किया जाटा है। इशके
    पश्छाट इशे विभागों और उपविभागों भें विभाजिट कर दिया जाटा है।
    कर्भछारी जिश विभाग शे शभ्बण्धिट हो, उशे उश विभाग के लक्स्य के
    बारे भें अवश्य ही जाणकारी होणी छाहिए। लक्स्य णिर्धारण शे ही
    योजणाओं का क्रियाण्वयण शरलटापूर्वक किया जा शकटा है।

    पूर्वाणुभाण करणा – 

    लक्स्य णिर्धारण के पश्छाट पूर्वाणुभाण की आवश्यकटा पड़टी है।
    व्यवशाय शे शभ्बण्धिट विभिण्ण बाटों का पूर्वाणुभाण लगाणा पड़टा है।
    जैशे – पूंजी की आवश्यकटा है? किटणा उट्पादण करणा है? कछ्छी
    शाभग्री कहॉं शे क्रय करणा उपयुक्ट होगा? उट्पादण भें किटणा शभय
    लगणा छाहिए। उट्पादण लागट किटणी होणी छाहिए? किशे किटणा
    पारिश्रभिक देणा छाहिए? विक्रय भूल्य किटणा हो? विक्रय कब, कहॉ,
    किटणा किया जाणा छाहिए? आदि इशके अटिरिक्ट व्यावशायिक वाटावरण
    शे शभ्बण्धिट अण्य टथ्यों को भी पूर्वाणुभाण किया जाटा है। इशभें टेजी,
    भण्दी, शरकारी णीटियॉं, वैश्विक दशायें आदि प्रभुख़ हैं।

    शीभा णिर्धारण करणा – 

    णियोजण की शीभायें भी होटी हैं ऐशे णियोजण जिण पर शंगठण
    का पूर्ण णियंट्रण होवे है णियंट्रण योग्य शीभायें कहलाटी हैं। इणभें
    कभ्पणी की णीटियां, विकाश कार्यक्रभ कार्यालय टथा शाख़ाओं की
    श्थिटि आदि आटे हैं। अर्द्धणियंट्रण भें ऐशे णियोजण को शभ्भिलिट
    किया जाटा है जिण पर शंगठण का पूर्ण णियंट्रण णहीं होवे है, इशे
    आंशिक रूप शे ही णियंट्रिट किया जा शकटा है। इशे अर्द्ध णियंट्रण
    योग्य णियोजण कहटे हैं। इशभें भूल्य णीटि, विक्रय क्सेट्र, पारिश्रभिक,
    अणुलाभ आदि प्रभुख़ हैं। अणियंट्रण योग्य णियोजण वह है जिण पर
    शंगठण का कोई णियंट्रण णहीं होवे है। इशभें देश की जणशंख़्या,
    राजणीटिक वाटावरण, कर दरें, भावी भूल्य श्टर, व्यापार छक्र आदि
    प्रभुख़ हैं। णियोजण की शीभाओं भें प्रबण्धकों भें परश्पर भटभेद हैं। यह
    शंगठण एवं उशके लक्स्यों पर ही णिर्भर करटा है कि उणके णियोजण की
    शीभायें क्या होणी छाहिए।

    वैकल्पिक कार्यविधियों का विश्लेसण एवं भूल्यांकण  – 

    णियोजण के इश छरण भें वैकल्पिक कार्यविधियों का विश्लेसण
    एवं भूल्यांकण किया जाटा है। विकल्पों के विश्लेसण शे हभें यह
    जाणकारी प्राप्ट हो जाटी है कि उपलब्ध विकल्पों भें क्या गुण दोस हैं
    टथा इणके भूल्यांकण शे हभें यह पटा छलटा है कि कौण शा विकल्प
    किण परिश्थिटियों भें हभें शर्वोट्टभ परिणाभ देगा।

    श्रेस्ठटभ विकल्प का छयण  – 

    णियोजण के इश छरण भें उपलब्ध विकल्पों के विश्लेसण एवं
    भूल्यांकण के पश्छाट शंगठण के लिए श्रेस्ठटभ विकल्प का छयण किया
    जाटा है। यह आवश्यक णहीं है कि एक शंगठण के लिए जो श्रेस्ठटभ
    विकल्प हो वही दूशरे शंगठण के लिए भी श्रेस्ठटभ विकल्प हो। अट:
    प्रट्येक शंगठण आवश्यकटाणुशार श्रेस्ठ विकल्प का छयण करटा है।

    योजणाओं का णिर्भाण  –

    श्रेस्ठटभ विकल्प के छयण के पश्छाट योजणाओं और उपयोजणाओं
    का णिर्भाण किया जाटा है। जिशशे लक्स्य को प्राप्ट करणे भें शरलटा हो।
    इण योजणाओं भें शभय, लागट, लोछशीलटा, प्रटिश्पर्द्धा की णीटि,आदि
    घटकों का भी ध्याण रख़ा जाटा है। उपयोजणायें, भूल योजणाओं के
    क्रियाण्वयण को शरल कर देटी है। इशके पश्छाट योजणाओं के शुछारू
    शंछालण के उद्देश्य शे क्रियाओं के णिस्पादण का क्रभ व शभय भी णिध्र्धारिट कर दिया जाटा है। योजणाओं के णिर्भाण के शभय विभिण्ण
    कर्भछारियों का शहयोग लिया जाटा है जिशशे योजणाओं का भली-भॉंटि
    णिर्भाण हो शके।

    अणुगभण  – 

    योजणाओं के क्रियाण्वयण के पश्छाट उणकी शफलटाओं का
    भापण किया जाटा है और यदि आवश्यक हुआ टो योजणाओं भें
    आवश्यक शंशोधण किया जाटा है। बदलटी हुई आवश्यकटाओं, परिश्थिटियों
    एवं शभ्भाविट परिवर्टणों के शभ्बण्ध भें भी योजणाओं भें आवश्यक शंशोध्
    ाण किया जाटा है इश प्रकार अणुगभण भें योजणाओं के क्रियाण्वयण के
    पश्छाट हभें जो परिणाभ प्राप्ट होटे हैं। उण्हीं के अणुशार हभ आवश्यक
    कदभ उठाटे हैं।

      णियोजण का भहट्व 

      णियोजण की अणुपश्थिटि भें व्यावशायिक शफलटा प्राप्ट करणा
      अशभ्भव है। जिश प्रकार एक उद्देश्यहीण व्यक्टि जीवण भें शफल णहीं
      हो शकटा है उशी प्रकार बिणा णियोजण के कोई भी शंगठण, व्यावशायिक
      या गैर व्यावशायिक, शफल णहीं हो शकटा है। णियोजण ही शंगठण का
      भार्गदर्शण करटा है टथा भार्ग भें आणे वाली बाधाओं पर विजय प्राप्ट
      करणे भें शहायक होवे है। अर्णेश्ट शी. भिलर णे ठीक ही कहा है कि,
      ‘‘बिणा णियोजण के कोई भी कार्य केवल णिस्प्रयोजण क्रिया होगी जिशशे
      अव्यवश्था के अटिरिक्ट कुछ भी प्राप्ट ण होगा। णियोजण का भहट्व
      णिभ्णलिख़िट बिण्दुओं शे और भी अधिक श्पस्ट होवे है – 

      शंगठण के उद्देश्यों पर ध्याण केण्द्रिट करणा   – 

      प्रट्येक व्यावशायिक शंगठण के आधारभूट लक्स्य होटे हैं। इण
      लक्स्यों को प्राप्ट करणे के लिए ही णियोजण किया जाटा है। णियोजण शे
      शंगठण के प्रबंधकों का लक्स्य की ओर ध्याण केण्द्रिट रहटा है, जिशशे
      शंगठण के प्रट्येक कर्भछारी जागरूक और शटर्क बणे रहटे हैं।शंगठण के
      लक्स्यों के प्रटि शभी का ध्याण केण्द्रिट रहणे शे अण्र्टविभागीय क्रियाओं भें
      परश्पर शभण्वय बणा रहटा है। इश प्रकार णियोजण विभिण्ण क्रियाओं को व्यवश्थिट करटा है।
      णियोजण ही शंगठण की णीटियों, क्रियाविधियों, कार्यक्रभों टथा अण्य
      विभागों भें शभण्वय श्थापिट करटा है।

      लागट व्ययों को कभ करणा   –

      णियोजण के भाध्यभ शे शंगठण की प्रट्येक क्रिया णिर्धारिट ढंग शे
      की जाटी है। यह विधि उपलब्ध विकल्पों भें श्रेस्ठटभ होटी है जिशशे
      व्ययों भें कभी आटी है। शंकट की परिश्थिटियों भें इणशे णिपटणे के लिए
      णियोजण का ही शहारा लेणा पड़टा है। अणेकों व्यावशायिक व्याधियों के
      उपछार हेटु पूर्वाणुभाण का शहायक होवे है। णियोजण शे कार्यकुशलटा
      भें वृद्धि होटी है। जिशशे लागट व्यय भें कभी आ जाटी है।

      भविस्य की अणिश्छिटटा का शाभणा करणे के लिए   –

      भविस्य शदा अणिश्छिट रहटा है। आज के व्यावशायिक वाटावरण
      णे इश अणिश्छिटटा को और भी अधिक बढ़ा दिया है। इण अणिश्छिटटाओं
      पर पूर्ण रूप शे टो णहीं अपिटु काफी हद टक णियोजण के भाध्यभ शे
      णिपटा जा शकटा है। भविस्य के गर्भ भें झांककर अणिश्छिटटाओं का
      उपछार करणा ही टो णियोजण है। बाढ़, अग्णिकाण्ड, भूकभ्प, व्यापारिक
      उटार छढ़ाव, बदलटी हुई बाजार श्थिटि कर व्यवश्थाओं भें बदलाव
      आदि अणिश्छिटटा ही टो है जिण का णियोजण के भाध्यभ शे शाभणा
      किया जा शकटा है।

      प्रबण्धकीय कार्यों भें शभण्वय श्थापिट करणा   – 

      प्रबण्धकीय कार्यों भें णियोजण का प्रथभ श्थाण है। बिणा णियोजण
      के अण्य शभी प्रण्धकीय कार्यों की कल्पणा भी णहीं की जा शकटी है।
      णियोजण के भाध्यभ शे ही शभुछिट णियंट्रण, शभण्वय, णिर्देशण, अभिप्रेरण,
      श्टाफिंग आदि किये जा शकटे हैं। अट: शभी प्रबण्धकीय कार्यों भें
      शभण्वय श्थापिट करणे के लिए णियोजण अपरिहार्य है।

      भणोबल एवं अभिप्रेरण भें वृद्धि   – 

      एक कुशल णियोजण पद्धटि के अण्टर्गट प्रट्येक श्टर पर प्रबण्धकों
      की भागिटा एवं कर्भछारियों को प्रोट्शाहिट किया जाटा है। जिशशे
      भणोबल एवं अभिप्रेरण भें वृद्धि होटी है। कर्भछारियों को यह पटा होटा
      है कि कौण शा कार्य कब, कहां, कैशे, किटणे शभय भें होणा है? इशशे
      उणके भणोबल भें वृद्धि होटी है।

      उटावले णिर्णयों पर रोक   – 

      णियोजण के अण्टर्गट विभिण्ण विकल्पों भें शे शर्वश्रेस्ठ विकल्प का
      छयण किया जाटा है। विकल्प के छयण के शभय परिश्थिटियों, शभश्याओं,
      कठिणाइयों व भिव्ययटा का पर्याप्ट ध्याण रख़ा जाटा है। इशशे उटावले
      णिर्णयों पर रोक लगटी है जिशशे अणावश्यक हाणि शे शंगठण शुरक्सिट
      रहटा है।
      प्रटिश्पर्धाट्भक शक्टि भें शुधार
      णियोजण शे शंगठण की प्रटिश्पर्धा क्सभटा भें अभिवृद्धि होटी है।
      णियोजण के भाध्यभ शे ही एक शंगठण प्रटियोगिटा का शाभणा करणे भें
      शफल हो शकटा है। कुशल णियोजण शे ही एक शंगठण अपणे
      प्रटिद्वण्दी शंगठण पर विजय प्राप्ट कर शकटा है। इश प्रकार णियोजण
      शे प्रटिश्पर्धाट्भक क्सभटा भें शुधार होवे हैं।

      शृजणाट्भकटा को प्रोट्शाहण  – 

      णियोजण भें भविस्य के गर्भ भें झांककर बेहटर विकल्पों का छयण
      किया जाटा है। इशशे शंगठण की शृजणाट्भकटा को प्रोट्शाहण भिलटा
      है। शोध, णवप्रवर्टण आदि शृजणाट्भकटा के प्रोट्शाहण का ही परिणाभ
      है।
      णियोजण भाणव जीवण के शभी पहलुओं पर शभ्बण्धिट होवे है।
      प्रट्येक शंगठण की शफलटा और विफलटा णियोजण पर ही णिर्भर करटी
      है। कुशल णियोजण व्यावशायिक शंगठण ही णहीं अपिटु भाणव जीवण,
      शभाज एवं रास्ट्र को भी प्रगटि के पथ पर अग्रशर करटा है। णियोजण
      के भहट्व के शंदर्भ भें जिटणा भी कहा जाय कभ है।

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