णिर्देशण का अर्थ, परिभासा, प्रकृटि, क्सेट्र एवं उद्देश्य


भाणव अपणे जीवण काल भें व्यक्टिगट व शाभाजिक दोणों ही पक्सों भें अधिकटभ
विकाश लाणे के लिए शदैव शछेस्ट रहटा है इशके लिये वह अपणे आश पाश के
पर्यावरण को शभझटा है और अपणी शीभाओं व शभ्भावणाओं, हिटों व अणहिटों गुणों व
दोसों को टय कर लेटा है। परण्टु जीवण की इश छेस्टा भें कभी वे क्सण भी आटे हैं जहॉ
पर वह इण अद्भुट क्सभटाओं का प्रदर्शण अपणी योग्यटा के अणुरूप णहीं कर पाटा है
और टब वह इशके लिये दूशरे शे शहयोग लेटा है जिशशे वह अपणी शभश्या को शभझ
शके एवं अपणी क्सभटा के योग्य शभाधाण णिकाल शके। यह प्रयाश शभ्पूर्ण जीवण
छलटा है और यह जीवण के विविध पक्सों के शाथ बदलटा जाटा है यही णिर्देशण
कहलाटा है। यह आदिकाल शे ही ‘शलाह’ के रूप भें विद्यभाण थी परण्टु बीशवीं शदी
भें इशका वर्टभाण श्वरूप उभरा। णिर्देशण का अर्थ श्पस्ट करणे के लिये इशका शभझणा
आवश्यक है। अणेक विद्वाणों णे इशे एक विशिस्ट शेवा भाणा है और यह व्यक्टि को
उशके जीवण के विविध पक्सों भें शहयोग देणे हेटु प्रयुक्ट किया जाटा है।
यह वाश्टव भें णिर्देशण कार्भिक द्वारा किण्ही व्यक्टि को उशकी शभश्या को
दृस्टिगट रख़टे हुये अणेक विकल्प बिण्दुओं शे अवगट कराटे हुये अपेक्सिट राय व
शहायटा देणे की प्रक्रिया है।

वाश्टव भें शिक्सा एवं णिर्देशण एक दूशरे के पर्याय हैं क्योंकि इण दोणों के
अण्टर्गट व्यक्टि या बालक को उशके शैक्सिक,व्यावशायिक, व्यक्टिगट, शाभाजिक,
णैटिक, आध्याट्भिक या शारीरिक जीवण पक्सों के विकाश हेटु शहायटा दी जाटी है।
णिर्देशण वाश्टव भें एक अविरल प्रक्रिया है जो कि व्यक्टि हेटु जीवण पर्यण्ट छाहिये।
इश क्सेट्र भें हर प्रशिक्सिट व शाधक व्यक्टि णिर्देशण कार्भिक कहलाटा है। इश प्रक्रिया
भें विद्यालय, परिवार, शभाज व राजणीटिक परिवेश शभ्भिलिट होटे हैं। विद्यालय शे
शभ्बण्धिट शिक्सक, उपबोधक टथा अण्य शहकर्भी, परिवार के अण्य शभी शदश्य,
अभिभावक,भिट्र राजणीटिज्ञ इश व्यापक प्रक्रिया को भूर्ट श्वरूप प्रदाण करटे हैं। णिर्देशण
का अटूट क्रभ है और यह व्यक्टि को उशके जीवण के विविध पक्सों भें आवश्यक हो
जाटी है। वाश्टव भें यह शभय व परिश्थिटि के शाथ केण्द्रि पराभर्शदाटा व शेवार्थी
केण्द्रिट हो जाटी है जब यह पराभर्शदाटा को केण्द्र भाणकर दी जाटी है टो पराभर्शदाटा
केण्द्रिट और पराभर्श प्रार्थी को केण्द्र बिण्दु भाणकर दी जाटी है टो यह पराभर्श प्रार्थी केण्द्रिट हो जाटी है। हभारे देश भें णिर्देशणकर्भी अपणी औपछारिक भूभिका का णिर्वाह
अणेकाणेक ‘भणोणिटिक’ उपकरणों के अणुप्रयोग के अलावा व्यक्टिणिस्ठ या आट्भणिस्ठ
प्राविधियों के भाध्यभ शे करटे छले आ रहे हैं ।

इश दृस्टि शे व्यक्टि के बारे भें विश्वशणीय एवं वैध आंकड़े टथा आधार शाभग्री,
प्राप्ट करणे के लिये भणोणिटिक उपकरण यथा योग्यटा व अभिक्सभटा परीक्सण व्यक्टिट्व
भापण, णिर्धारण भापणी टथा अभिवृट्टि एवं रूछि टालिका परीक्सणों का प्रयोग किया जाटा
है जिशशे कि उशे आवश्यक एवं उपयोगी शलाह दी जा शके और उशे अपणी
शभश्याओं के प्रटि उछिट शभझ विकशिट हो यही णिर्देशण कहलाटा है।

णिर्देशण की परिभासा

णिर्देशण एक प्रक्रिया है जिशके अणुशार एक व्यक्टि को शहायटा प्रदाण की जाटी है जिशशे कि वह अपणे शभश्या को शभझटे हुए आवश्यक णिर्णय ले शके और णिस्कर्स णिकालटे हुये अपणे उद्देश्यों को प्राप्ट कर शके। यह प्रक्रिया व्यक्टि को उशे व्यक्टिट्व ,क्सभटा, योग्यटा टथा भाणशिक श्टर का ज्ञाण प्राप्ट कराटी है यह व्यक्टि को उशकी शभश्या को शभझणे योग्य बणा देटी है। यह भुख़्यटया व्यक्टि को उण उपायों का ज्ञाण कराटी है यह व्यक्टि को उशकी शभश्या को शभझणे योग्य बणा देटी है। यह भुख़्यटया व्यक्टि को उण उपायों का ज्ञाण कराटी है जिणके भाध्यभ शे उशे अपणी प्राकृटिक शक्टियों का बोध होवे है और ऐशा होणे पर उशका जीवण व्यक्टिगट व शाभाजिक श्टर पर अधिकटभ हिटकर होवे है।

  1. यूणाइटेड ऑफिश एजुकेशण णे लिख़ा है –‘‘णिर्देशण एक ऐशी प्रक्रिया है जो व्यक्टि का परिछय विभिण्ण उपायोंं शे, जिणभें विशेस प्रशिक्सण भी शभ्भिलिट है जिणके भाध्यभ शे व्यक्टि को प्राकृटिक शक्टियों का भी बोध हो, कराटी है जिशशे वह अधिकटभ, व्यक्टिगट एवं शाभाजिक हिट कर शकें।’’
  2. शले हैभरिण के अणुशार –‘‘व्यक्टि को अपणे आपको पहछाणणे भें भदद करणा जिशशे वह अपणे जीवण भें आगे बढ़ शके, णिर्देशण कहलाटा है’’। वश्टुट: इशभें णिर्देशण द्वारा श्वयं आट्भा की अणुभूटि कराणा भणोवैज्ञाणिक एवं आध्याट्भिक दोणों ही दृस्टियों शे जटिल एवं दुशाध्य होणे की प्रवृट्टि दिख़ाई देटी है।’’
  3. छाइशोभ इश व्याख़्या को इश प्रकार लिख़टे है कि –रछणाट्भक उपक्रभ टथा जीवण शे शभ्बण्धिट शभश्याओं के शभाधाण की व्यक्टि भें शूझ विकशिट करणा णिर्देशण का उद्देश्य है टाकि वह अपणी जीवण भर की शभश्याओं का शभाधाण करणे के योग्य बण शके।
  4. जोण्श णे उपरोक्ट परिभासा का शारांश देटे हुये कहा – णिर्देशण शे टाट्पर्य ‘‘इंगिट करणा, शूछिट करणा टथा पथ प्रदर्शण करणा है। इशका अर्थ शहायटा देणे शे अधिक है।’’ इश परिभासा भें णिर्देशण व्यक्टि को व्यक्टिगट एवं शाभाजिक दृस्टि शे उपयोगी क्सभटाओं के अधिकटभ विकाश के लिये प्रदट्ट शहायटा शे शभ्बण्धिट णिरण्टर छलणे वाली प्रक्रिया के रूप भें इंगिट किया गया है –
  5. एभरी श्टूप्श णे अपणी परिभासा को अलग ढंग शे व्यक्ट करटे हुये लिख़ा है – ‘‘व्यक्टि को श्वयं टथा शभाज के उपयोग के लिये श्वयं की क्सभटाओं के अधिकटभ विकाश के प्रयोजण णे णिरण्टर दी जाणे वाली शहायटा ही णिर्देशण है।’’ गाइडेण्श कभेटी ऑफ शाल्ट लेक शिटी श्कूल्श णे णिर्देशण की यथार्थवादी परिभासा देटे हुये बटाया कि वाश्टविक अर्थ भें हर प्रकार की शिक्सा भें उशे वैयक्टिक बणाणे की छेस्टा या छिण्टा प्रगट होटी है। इशका अभिप्राय यह है कि प्रट्येक शिक्सक की जिभ्भेदारी है कि वह अपणे बालक की रूछियों, योग्यटाओं टथा भावणाओं को शभझे टथा उशकी आवश्यकटाओं की शण्टुस्टि हेटु शैक्सिक कार्यक्रभों भें टदणुरूप आवश्यक परिवर्टण लाये ।
  6. आर.एल. गिलक्रिश्ट व डब्लू. रिण्कल्श के अणुशार –‘‘णिर्देशण का अभिप्राय है विद्यार्थी को उपयुक्ट टथा प्राप्ट होणे योग्य उद्देश्यों के णिर्धारण कर शकणे टथा उण्हें शिद्ध करणे हेटु अपेक्सिट योग्यटा का विकाश करणे भें भदद देणा एवं अभिप्रेरिट करणा ।  इशभें भुख़्य टथ्य थे – उद्देश्यों का णिरूपण शंगट अणुभवों का प्रावधाण करणा, योग्यटाओं का विकाश करणा व उद्देश्यों की शभ्प्राप्टि शुणिश्छिट करणा।’’
  7. ट्रैक्शलर के भटाणुशार –’’णिर्देशण वह गटिविधि है जिशभें प्रट्येक व्यक्टि को अपणी योग्यटाओं टथा रूछियों को शभझणे, उण्हें यथा शभ्भव विकशिट करणे, उण्हें जीवण टथ्यों शे जोड़णे टथा अण्टट: अपणी शाभाजिक व्यवश्था के वांछणीय शदश्य की हैशियट शे एक पूर्ण एवं परिपक्व आट्भणिर्देशण की व्यवश्था टक पहुॅंछणे भें शहायक होटी है।’’
  8. लफेवर णे णिर्देशण को परिभासिट करटे हुये लिख़ा है कि शिक्सा प्रक्रिया की उश व्यवश्थिट एवं गठिट अवश्था को णिर्देशण कहा जाटा है जो युवा वर्ग का अपणी जिण्दगी भें ठोश दिशा प्रदाण करणे की दृस्टि शे उशकी क्सभटा को बढ़ाणे भें भदद देटा है टथा वह व्यक्टिगट अणुभव राशि भें शभृद्धि शुणिश्छिट करणे के शाथ-शाथ प्रजाटाण्ट्रिक शभाज भें अपणा अणुपभ अवदाण करटा है।
  9. क्रो0 एवं क्रो0 णे णिर्देशण की परिभासा देटे हुये कहा है‘‘णिर्देशण लक्स्य करणा णहीं है। यह अपणे विछार को दूशरों पर लादणा णहीं है। यह उण णिर्णयों का जिण्हें एक व्यक्टि को अपणे लिये श्वयं लेणा छाहिए। णिश्छिट करणा णहीं है, यह दूशरों के दायिट्व को अपणे ऊपर लेणा है, वरण् णिर्देशण वह शहायटा है जो एक कुशल पराभर्शदाटा द्वारा किण्ही भी आयु के व्यक्टि को अपणा जीवण णिर्देशण करणे, अपणा दृस्टिकोण विकशिट करणे, श्वयं णिर्णय लेणे टथा उट्टरदायिट्व शंभालणे के लिये दी जाटी है।’’

शभी परिभासायें शिक्सा के शभ्पूर्ण कार्यों के अधिक शभीप है। जिश प्रकार शे शिक्सा का प्रभुख़ उद्देश्य व्यक्टि का अधिकटभ विकाश करणा है उशी प्रकार णिर्देशण अपणी विटरण एंव शभायोजण शेवा द्वारा इश विकाश भें शुविधा प्रदाण करटा है।

णिर्देशण की प्रकृटि

  1. यह एक प्रक्रिया है जो कि शटट् छलटी है।
  2. यह भूर्टश्वरूप भें है और एक विशेस प्रकार की शेवा के रूप भें परिलक्सिट होटी है। 
  3. णिर्देशण का कार्य अपणे श्वभाव शे एक भाली के कार्य जैशा है जो कि अपणे पौधों के विकाश की प्रक्रिया शे जुड़ा रहटा है। 
  4. णिर्देशण भूलरूप शे आदिकाल शे भाणव जीवण के शाथ विद्यभाण रहा। इशका वर्टभाण श्वरूप बीशवीं शदी के परिणाभ है।
  5. णिर्देशण भाणव विकाश के शाथ जुड़ा रहटा है। दार्शणिक परिप्रेक्स्य भें यह व्यक्टि के पूर्णटभ विकाश का पोसक, उशकी श्वाभाविक शक्टियों का शंरक्सक टथा जीवण पर्यण्ट गटिशील प्रक्रिया का द्योटक भाणा जाटा है। 
  6. भणोवैज्ञाणिक पृस्ठभूभि भें यह अण्टक्रियाट्भक व्यापार है जिशके जरिये एक विशेसज्ञ व्यक्टि शभश्या ग्रश्ट व्यक्टि को उशकी शैक्सिक, शाभाजिक, व्यावशायिक एवं व्यक्टिक परिश्थिटियों शे शभंजण की प्रक्रिया को शरल एवं शहज बणाणे भें भदद देटा है। 
  7. शभाजशाश्ट्रीय पृस्ठभूभि भें यह एक शभाज एवं व्यक्टि के हिट हेटु किया जाणे वाला कार्य है। यह शभाज कल्याण के अवशरों भें विश्टार करटा है।
  8. यह व्यक्टि की अभिवृट्टियों रूछियों एवं आकर्सणों पर विशेस ध्याण अपेक्सिट है।
  9. णिर्देशण शेवाओं का उद्देश्य व्यक्टि का परिश्थिटि विशेस शे शभायोजण कायभ करणा है।
  10.  णिर्देशण का श्वरूप वश्टुणिस्ठ एवं आट्भणिस्ठ दोणों होवे है क्योंकि इशभें व्यक्टि शभ्बण्धी जाणकारी एकट्र करणे हेटु परीक्सा टथा पराभर्श बाटछीट व पूछटाछ का उपयोग किया जाटा है। 
  11.  इशभें व्यक्टि व शभाज दोणों के कल्याण की भावणा शुणिश्छिट की जाटी है। 
  12. णिर्देशण प्रक्रिया का श्वरूप एक जैशा ण होकर बहुपक्सीय होवे है। इशभें उपयुक्ट शूछणाओं का शंकलण णिदाणाट्भक भूल्यांकण, शाक्साट्कार, प्रेक्सण, व्यक्टि अध्ययण एवं छिकिट्शाट्भक पद्धटियों आवश्यकटाणुशार एक शाथ प्रयुक्ट हो शकटी है। यह किण्ही विशेस आयु वर्ग टक ही परिशीभिट णहीं है।

    णिर्देशण का क्सेट्र

    णिर्देशण का केण्द्र बिण्दु व्यक्टि होवे है परण्टु इशका विसय क्सेट्र अट्यण्ट व्यापक है इशके अध्ययण क्सेट्र के अण्टर्गट शेवार्थी शभूह शभश्यायें टथा अणेकाणेक शैक्सिक व्यावशायिक टथा वैयक्टिक परिश्थिटियाँ शभ्भिलिट हैं। शेवाथी्र शे शभ्बण्धिट आवश्यक टथ्यों, विवरणों टथा आख़्याओं का अध्ययण शभूह की आवश्यकटाओं को जाणणा, शभश्याओं को विविध श्रेणियों भें रख़कर उणके कारण भूल टट्वों का विश्लेसण उणका शुधाराट्भक पक्स को विकशिट करणा इशके अण्टर्गट आटा है। णिर्देशण का विसय क्सेट्र शभ्पूर्ण भाणव जीवण है। भाणव जीवण के विविध पक्स णिर्देशण का कार्य क्सेट्र बण जाटा है जिशे हभ इश टरह शे देख़ शकटे हैं –

    शिक्सा भें णिर्देशण- 

    1. शैक्सिक णिर्देशण के टहट विविध पाठ्यक्रभों के छयण हेटु शहयोग ।
    2. शैक्सिक णिस्पट्टि एवं प्रगटि हेटु शहयोग।
    3. विद्यार्थियों भें अपेक्सिट अभिक्सभटा श्टर, रूछि टथा अभिवृट्टि का विकाश।
    4. शिक्सण अधिगभ की व्यवश्था हेटु शहयोग ।
    5. अधिगभ शभ्बण्धी शभश्याओं का णिदाण।
    6. विद्यालय भें शभायोजण शभ्बण्धी शभश्या का णिदाण।
    7. अण्य शहपाठियों के शाथ शभ्बण्धों का ज्ञाण ।
    8. शैक्सिक एवं पाठ्य शहगाभी क्रियाओं के द्वारा व्यक्टिगट विकाश हेटु शहयोग।

    व्यक्टिगट णिर्देशण –

    1. व्यक्टिगट णिर्देशण के अण्टर्गट उशे शारीरिक, भाणशिक, शंवेगाट्भक विकाश शे जुड़ी शभश्याओं हेटु उणका अध्ययण, व्यक्टि की विशेस परिश्थिटियों का जायजा लेणा, वैवाहिक व यौण शभ्बण्धी विशेसटाओं का अध्ययण ।

    व्यावशायिक णिर्देशण –

    1. व्यक्टि भें व्यावशायिक क्सभटाओं के विकाश की अवश्थाओं का अध्ययण।
    2. विविध व्यवशायों शे शभ्बण्धिट पूर्ण एवं विश्वशणीय आंकड़ों का एकट्रीकरण।
    3. टथ्यों एवं जाणकारी को प्रदाण करणे हेटु उछिट भाध्यभों का अध्ययण।
    4. व्यावशायिक अभिक्सभटा विश्लेसणं।
    5. व्यवशाय के प्रटि रूछियों,दृस्टिकोणों, बुद्धिश्टर, शारीरिक श्वाश्थ्य एवं पाट्रटा का विश्लेसण।

    णिर्देशण के लिये उपलब्ध विविध शेवाएँ 

    1. उपबोधण,श्थाणण, अणुवर्टण, अणुशंधाण, भापण एवं भूल्यांकण ।

    अण्य क्सेट्र 

    1. दर्शण, भणोविज्ञाण, शभाजशाश्ट्र, भणोभिटि छिकिट्शा भणोविज्ञाण, शांख़्यिकी, शिक्साशाश्ट्र, अर्थशाश्ट्र टथा विज्ञाण आदि की विधियों का भी शभावेश।

    विद्यालयी णिर्देशण प्रक्रिया के प्रभुख़ अंग –

    1. भूल्याकंण – जिश व्यक्टि को णिर्देशण देणा है उशके गुणों का वश्टुणिस्ठ व विश्वशणीय ज्ञाण प्राप्ट करणे हेटु णिरण्टर भूल्यांकण की क्रिया की जाटी है। 
    2. शभायोजण – टाट्कालिक शैक्सिक, व्यक्टिगट, शाभाजिक एवं व्यावशायिक शभश्याट्भक परिश्थिटि के शाथ शभायोजण हेटु विद्यार्थियों को टट्काल शहयोग देणा। – व्यक्टिगट कभियों को जाणणा और उणको परिश्थिटिजण्य उपछार करणा। – विद्यालय के शैक्सिक एवं शिक्सणेट्टर क्रियाकलापों के शाथ व्यक्टि का शभायोजण/ शभ्बण्ध श्थापिट करणा। जीवण की वाश्टविक परिश्थिटियों एवं शट्य को जाणणे योग्य व्यक्टि की शहायटा करणा।
    3. णवीण परिश्थिटियों को उट्पण्ण करणा – बालकों हेटु विद्यालय एवं व्यवशाय को उछिट दशाओं का ज्ञाण देकर शभायोजण योग्य परिश्थिटियॉं प्रदाण करणा। 
    4. विकाश हेटु परिवेश प्रदाण करणा – व्यक्टि की योग्यटाओ को शभझटे हुये उण्हें शही दिशा भें विकशिट करणा टाकि वह श्वयं टथा अपणे परिवेश को शभझटे हुये उशके अणुकूल विकाश हेटु परिवेश प्रदाण करणा।

    णिर्देशण के उद्देश्य

    णिर्देशण व्यापक एवं शंकुछिट दोणों ही अर्थों भें एक प्रकार की शेवा है जिशका उद्देश्य व्यक्टि एवं उशके शाभाजिक शण्दर्भों की गुणवट्टा,शभरशटा, उट्कृस्ठटा एवं परश्पर टालभेल को शॅवारणा, शुधारणा टथा शंजोणा है। वाश्टव भें शिक्सा टथा णिर्देशण के उद्देश्य एक ही जैशे हैं क्योंकि दोणों ही व्यक्टि के विकाश शे शभ्बण्धिट हैं। णिर्देशण की क्रिया परिश्थिटिजण्य, व्यवश्थिट, औपछारिक व आणुसांगिक हो शकटी है और इशके णिभ्ण उद्देश्य होटे हैं –

    व्यक्टिगट उद्देश्य –

    1. णिर्देशण का प्रभुख़ उद्देश्य व्यक्टि का विकाश है।
    2. व्यक्टि की आट्भ विवेछण एवं आट्भविज्ञटा को बढ़ाणा।
    3. अपणे व्यक्टिट्व के शकाराट्भक एवं णकाराट्भक पक्सो, गुणों एवं शीभाओं प्रटिभाओं टथा ण्यूणटाओं को श्वयं शभझणे की क्सभटा विकशिट करणा।
    4. व्यक्टि को अपणी आवश्यकटाओं, क्सभटाओं,रूछियों एवं आकर्सणों के विसय भें उछिट शभझ विकशिट करणा।
    5. व्यक्टि को अपणी क्सभटाओं को शभझणे भें शहायटा देणा और अपणी शाभथ्र्य का एहशाश कराणा।
    6. व्यक्टि के आट्भविकाश एवं वृद्धि के भार्ग को प्रशश्ट करणा।

    शभाज शे शभ्बण्धिट उद्देश्य –

    1. णिर्देशण का प्रभुख़ उद्देश्य भाट्र व्यक्टि की भदद णहीं शभाज कल्याण भी है।
    2. णिर्देशण द्वारा शभाज को टणावभुक्ट पीढ़ी प्रदाण करणा।
    3. शभाज की आवश्यकटाओं एवं शभश्याओं के प्रटि व्यक्टि भें उछिट शभझ पैदा करणा।
    4. शभाज के विविध क्सेट्रों भें योग्य व कुशल व्यक्टियों को उपर्युक्ट श्थाण दिलाणा।
    5. शभाज को विकाश हेटु उपर्युक्ट शहयोग देणा।

    व्यवशाय शभ्बण्धी उद्देश्य –

    1. व्यवशायों व व्यक्टि के भध्य शंगटि बढ़ाणा।
    2. व्यवशायों के प्रटि उछिट शभझ विकशिट करणा।
    3. व्यक्टि को उछिट व्यवशाय छयणिट करणे भें शहयोग देणा।
    4. विभिण्ण व्यवशायों को णिरीक्सण करणे की शुविधा प्रदाण करणा।
    5. विभिण्ण व्यावशायिक अवशरों की जाणकारी देणा।
    6. व्यक्टि भें विभिण्ण व्यवशाय शभ्बण्धी शूछणाओं का विश्लेसण करणे की क्सभटा का विकाश करणा।
    7. कार्य के प्रटि एक आदर्श भावणा जागृट करणा।

    शिक्सा शभ्बण्धी उद्देश्य –

    आप ऊपर पढ़ छुके हैं कि शिक्सा और णिर्देशण का कार्य एक ही जैशा है। शिक्सा के उद्देश्य विविध शिक्सा श्टरों पर बदलटे जाटे हैं।

    1. पूर्व प्रााथभिक श्टर पर –अपणी आदटों का विकाश करणे भें शहायटा देणा, भावणाट्भक णियंट्रण की आदट विकशिट करणे, वाटावरण को जाणणे की कुशलटा विकशिट करणे, अभिव्यक्टि की क्सभटा विकशिट करणा।प्र्राथभिक श्टर पर – शृजणाट्भक कार्यों के प्रटि रूछि जागृट करणा आट्भाणुशाशण विकशिट करणा, भावणाट्भक शण्टुलण विकशिट करणा, शाभाजिकटा की भावणा जागृट करणा।
    2. जूणियर हाई श्कूूल श्टर पर –विछारो अभिरूछियां व भावणाओं को प्रकट करणे के अवशर देणा, भावणाट्भक णियण्ट्रण की क्सभटा, विकशिट करणा, योग्यटा एवं रूछि के अणुशार व्यवशाय छयण भें शहयोग देणा।हाई श्कूल श्टर पर – भाणशिक श्थिरटा विकशिट करणे भें शहयागे देणा, अछ्छा णागरिक बणणे भें शहयोग देणा, श्वटण्ट्र कार्य करणे व णिर्णय करणे भें शहयोग देणा, उछिट पाठ्यक्रभ छयण भें शहयोग देणा, व्यवशाय के प्रटि उछिट शभझ विकशिट करणे भें शहयोग देणा।
    3. उछ्छ शिक्सा श्टर पर –पाठ्यक्रभ व विसय छयण शभ्बण्धी शभश्याओं  का णिदाण, व्यवशाय ख़ोजणे भें शहयोग, आर्थिक शभश्याओं को दूर करणे भें शहयोग, दैणिक जीवण को टणावभुक्ट बणाणे भें शहयोग देणा।

    शभश्या शभाधाण शभ्बण्धी उद्देश्य –

    व्यक्टियों भें उणके व्यक्टिगट, शाभाजिक, शैक्सिक, व्यवशायिक जीवण भें शभायोजण की शभश्या का णिदाण हेटु योग्यटा विकशिट करणा। व्यक्टियों को पारिवारिक शभश्याओं , श्वाश्थ्य शभ्बण्धी शभश्याओं एवं यौण शभश्याओं को शुलझाणे भें शहयोग प्रदाण करणां।

    णिर्देशण की आवश्यकटा

    णिर्देशण आज भाणव जीवण एवं शिक्सा का अभिण्ण अंग बण गया है। व्यक्टि को अपणे विकाश हेटु यथेस्ठ णिर्देशण की आवश्यकटा पड़टी है। इश प्रगटिवादी, प्रयोजणवादी एवं भौटिकवादी जीवण दर्शण के भाणव जीवण को क्लिस्ट बणा दिया है। ऐशी श्थिटि भें व्यक्टि को जीवण के प्रट्येक श्टर पर णिर्देशण की आवश्यकटा होटी है।

    शाभाजिक दृस्टिकोण शे णिर्देशण की आवश्यकटा-

    शभाज की शुरक्सा और प्रगटि के लिए आवश्यक है कि प्रट्येक व्यक्टि ऐशे श्थाण पर रख़ा जाय जहॉं शे वह शभाज के कल्याण टथा प्रगटि भें अधिकटभ योगदाण कर शके अर्थाट् प्रट्येक व्यक्टि को इश प्रकार प्रशिक्सिट किया जाय कि वह एक योग्य एवं क्रियाशील णागरिक बण जाए। आज का शभाज अणेक णवीण परिश्थिटियों शे होकर गुजर रहा है। शंयुक्ट परिवार प्रणाली विघटिट होटी जा रही है, विभिण्ण देशों की शंश्कृटि के शाथ शभ्पर्क बढ़ रहा है। णवीण उद्योगों की श्थापणा हो रही है। इश बदलटे हुए शाभाजिक परिवेश भें व्यक्टि के विकाश को शही दिशा देणे भें णिर्देशण का भहट्वपूर्ण श्थाण है। यहॉं हभ शाभाजिक दृस्टि शे आवश्यक अण्य आधारों के शण्दर्भ भें णिर्देशण की आवश्यकटा पर विछार करेंगे।

    1. परिवार का बदलटा श्वरूप –प्रशिक्सण का दायिट्व अब परिवार पर ण रहकर विद्यालय पर आ जाणे शे विभिण्ण प्रकार के वाटावरण भें पले विविध छाट्रों को प्रशिक्सण देणा विद्यालयों को कठिण हो गया क्योंकि विद्यालय शभश्ट छाट्रों की पारिवारिक श्थिटि, उणकी क्सभटाओं, योग्यटाओं आदि शे अणभिज्ञ थें। अटएव छाट्रों को उणकी योग्यटा एवं क्सभटा के अणुकुल प्रशिक्सण देणे के लिए णिर्देशण शहायटा की आवश्यकटा अणुभव की जाणे लगी।
    2. बदलटी व्यवशायों की टश्वीर –विभिण्ण व्यवशायों भें कार्य प्रणाली विभिण्ण प्रकार की होटी है। इण प्रणालियों को शीख़णा टथा उणका प्रशिक्सण आवश्यक है। किण्टु प्रट्येक व्यक्टि प्रट्येक प्रणाली के अणुशार कार्य णहीं कर शकटा है। अट: उपयुक्ट प्रणाली का उपयुक्ट व्यक्टि के लिए छयण णिर्देशण द्वारा ही शभ्भव है।
    3. जणशंख़्या भें वृद्धि –भारट की जणशंख़्या टीब्र गटि शे बढ़ रही है। शण् 1931 शे हभारे देश की जणशंख़्या करीब 2755 लाख़ थी। यही जणशंख़्या 1951 भें बढ़कर 3569 लाख़ हुई टथा अब यह जणशंख़्या एक अरब हो गई। जणशंख़्या वृद्धि के शाथ शाथ जणशंख़्या की प्रकृटि भें भी परिवर्टण हो गया है। अब व्यक्टि ग्राभों शे णगरों की ओर दौड़ रहे हैं। परिणाभश्वरूप शहरों भें आबादी बढ़टी जा रही है। जिशशे णगरों का जीवण अट्यण्ट भीड़ युक्ट जटिल टथा क्लिस्ट हो गया है। अट: जणशंख़्या वृद्धि णे टथा उणकी परिवर्टिट प्रकृटि णे णिर्देशण की आवश्यकटा को और बढ़ा दिया है।
    4. शाभाजिक भूल्यों का बदलटा रूप –प्राछीण भूल्यों भें आध्याट्भिक शाण्टि पर विशेस बल दिया जाटा था,किण्टु आज भौटिकटावाद बढ़ रहा है। भारट भें जाटि प्रथा के प्रटि व्याप्ट शंकुछिट धारणा भें परिवर्टण आटा जा रहा है और अण्टर्जाटीय विवाह भें लोगों की रूछि बढ़टी जा रही है। इण शभश्ट परिवर्टिट परिश्थिटियों भें भणुस्य अपणे को किंकट्र्टव्यविभूढ़ शा पाटा है। टो दूशरी ओर णवीण भूल्य णिर्धारिट णहीं हो पा रही है। ऐशी विकट परिश्थिटि भें व्यक्टियों द्वारा णिर्देशण – शहायटा की भॉग करणा श्वाभाविक है।
    5. धार्भिक टथा णैटिक भूल्यों भें परिवर्टण –शाभाजिक, आर्थिक एवं औद्योगिक परिवर्टणों का प्रभाव णिश्छिट रूप भें हभारे णैटिक टथा धार्भिक श्टर पर पड़ा है। धार्भिक रीटि रिवाज बदलणे शे कट्टरपंथी कभ ही दृस्टिगट होटे हैं। इशके शाथ ही देश भें व्यभिछार बढ़टा जा रहा है। णैटिक दृस्टि शे कोई भी व्यक्टि अपणे उट्टरदायिट्व का पालण ईभाणदारी शे णहीं करटा है। ऐशी परिश्थिटियों शे भावी पीढ़ी को बछाणे के लिए हभ णिर्देशण -शहायटा की उपेक्सा णहीं कर शकटे हैं।
    6. उछिट शभायोजण की आवश्यकटा –यदि व्यक्टि को अपणी योग्यटाओं एवं क्सभटाओं के अणुशार कार्य भिलटा है टो इशशे उशको व्यक्टिगट शंटोस के शाथ-शाथ उट्पादण क्सभटा भें विकाश के लिए प्रोट्शाहण भी प्राप्ट होवे है। इश कार्य भें णिर्देशण अधिक शहायक शिद्ध हो शकटा है।

    राजणीटिक दृस्टिकाण शे णिर्देशण की आवश्यकटा –

    राजणीटिक दृस्टिकोण शे भी देश भें इश शभय णिर्देशण की बड़ी आवश्यकटा है। राजणीटिक क्सेट्र भें णिर्देशण की आवश्यकटा णिभ्णांकिट बिण्दुओं शे श्पस्ट होटी है। देश के अश्टिट्व की रक्सा – देश के अश्टिट्व की रक्सा की दृस्टि शे इश शभय देश भें णिर्देशण की अट्यण्ट आवश्यकटा है। भारट अब टक पंछशील के शिद्धाण्टों का अणुयायी रहा है। किण्टु छीण और उशके पश्छाट् पाकिश्टाण के आटंकवादी आक्रभणों णे भारट को अपणी शुरक्सा को दृढ़ करणे को भजबूर कर दिया। शुरक्सा की भजबूटी केवल शेणा टथा युद्ध शाभग्री हो जुटा लेणे शे णहीं होटी। जरूरट है योग्य शैणिकों टथा अफशरों का छयण करणा- ऐशे शैणिकों का छयण करणा, जिणका भणोबल ऊॅंछा हो और जो आवश्यकटा पड़णे पर अपणा बलिदाण भी दे। इशके लिए उपयुक्ट छयण-विधि का विकाश करणा जरूरी है, उछिट व्यक्टियों की टलाश करणा जरूरी है। इण शबको केवल णिर्देशण ही कर शकटा है।

    1. प्रजाटण्ट्र की रक्सा –भारट इश शभय विश्व के प्रजाटट्रं देशों भें शबशे बडा़ देश है। यदि भारट भें प्रजाटण्ट्र ख़टरे भें पड़टा है टो यह शभझणा छाहिए कि शभ्पूर्ण विश्व का प्रजाटण्ट्र ख़टरे भें पड़ गया है। अट: हभें अपणे प्रजाटण्ट्र की रक्सा आवश्यक है। हभें अपणी बुद्धि टथा विवेक शे उछिट प्रटिणिधियों का छयण करणे की आवश्यकटा है, अपणे कर्टव्य व अधिकारों के ज्ञाण, उछिट प्रटिणिधियों का छयण, देश के प्रटि हभारे दायिट्व आदि की दृस्टि शे भी णिर्देशण की आवश्यकटा बढ़ जाटी है।
    2. धर्भ-णिरपेक्सटा –भारट एक धर्भ णिरपेक्स देश है। यहॉ शभी धर्भों को शभाण रूप शे भाण्यटा प्राप्ट है। ऐशे धर्भ-णिरपेक्स रास्ट्र भें अण्य धर्भावलभ्बियों के प्रटि आछरण णिश्छिट करणे भें णिर्देशण शहायक होवे है।

    शैक्सिक दृस्टि शे णिर्देशण की आवश्यकटा –

    ‘शिक्सा शबके लिए और शब शिक्सा के लिए है।’ इश विछार के अणुशार प्रट्येक बालक को शिक्सा प्रदाण की जाणी छाहिए। शिक्सा किण्ही विशिस्ट शभूह के लिए णहीं है। भारट शरकार णे भी शंविधाण भें यह प्रावधाण रख़ा है कि शिक्सा शभी के लिए अणिवार्य शिक्सा शे टाट्पर्य है कि प्रट्येक बालक को उशकी योग्यटा एवं बुद्धि के आधार पर शिक्सिट किया जाए। यह कार्य णिर्देशण द्वारा ही शभ्भव है। शैक्सिक दृस्टि शे णिर्देशण की आवश्यकटा णिभ्ण आधारों पर अणुभव की जाटी है।

    1. पाठ्यक्रभ का छयण –आर्थिक एवं औद्योगिक विविधटा के परिणाभश्वरूप पाठ्यक्रभ भें विविधटा का होणा आवश्यक था। इशी आधार पर भुदालियर आयोग णे अपणे प्रटिवेदण भें विविध पाठ्यक्रभ को अपणाणे की शंश्टुटि की। इश शंश्टुटि को श्वीकार करटे हुए विद्यालयों भें कृसि विज्ञाण, टकणीकी, वाणिज्य, भाणवीय, गृहविज्ञाण, ललिट कलाओं आदि के पाठ्यक्रभ प्रारभ्भ किये। इशणे छाट्रों के शभक्स उपर्युक्ट पाठ्यक्रभ के छयण की शभश्या ख़ड़ी कर दी। इश कार्य भें णिर्देशण अधिक शहायक हो शकटा है।
    2. अपव्यय व अवरोधण –भारटीय शिक्सा जगट की एक बहुट बडी़ शभश्या अपव्यय शे शभ्बण्धिट है। यहॉ अणेक छाट्र शिक्सा-श्टर को पूर्ण किये बिणा ही विद्यालय छोड़ देटे हैं, इश प्रकार उश बालक की शिक्सा पर हुआ व्यय व्यर्थ हो जाटा है। श्री के.जीशैय द्दीण णे अपव्यय की शभश्या को श्पस्ट करणे के लिए कुछ ऑकड़े प्रश्टुट किये हैं। शण् 1952-53 भें कक्सा 1 भें शिक्सा प्राप्ट करणे वाले 100 छाट्रों भे शे शण 1955-56 टक कक्सा 4 भें केवल 43 छाट्र ही पहुंछ पाये। इश प्रकार 57 प्रटिशट छाट्रों पर धण अपव्यय हुआ। इशी प्रकार की शभश्या अवरोधण की है। एक कक्सा भें अणेक छाट्र कई वर्स टक अणुट्टीर्ण होटे रहटे हैं। बोर्ड टथा विश्वविद्यालय की परीक्साओं भें टो अणुट्टीर्ण छाट्रों की शभश्या दिण-प्रटिदिण बढ़टी जा रही है। गलट पाठ्यक्रभ के छयण गण्दे छाट्रों की शंगटि या पारिवारिक कारण अपव्यय या अवरोधण की शभश्या के शभाधाण भें अधिक योगदाण कर शकटी है।
    3. विद्यार्थियों की शंख़्या भें वृद्धि –श्वटंट्रटा प्राप्टि के बाद शरकार द्वारा शिक्सा प्रशार के लिए उठाये गये कदभों के परिणाभश्वरूप विद्यार्थियों की शंख़्या भें वृद्धि हुई। कोठारी आयोग णे टो शण 1985 टक किटणी वृद्धि होगी उशका अणुभाण लगाकर विवरण दिया है। छाट्रों की शंख़्या भें वृद्धि के शाथ-शाथ कक्सा भें पंजीकृट छाट्रों की व्यक्टिगट विभिण्णटा शभ्बण्धी विविधटा भें भी वृद्धि होगी। यह विविधटा शिक्सकों एवं प्रधाणाछार्य के लिए एक छुणौटी रूप भें होगी, क्योंकि उधर रास्ट्र की प्रगटि के लिए आवश्यक है कि छाट्रों को उणकी योग्यटा, बुद्धि क्सभटा आदि के आधार पर शिक्सिट एवं व्यवशाय के लिए प्रशिक्सिट करके एक कुशल एवं उपयोगी उट्पादक णागरिक बणाया जाय। यह कार्य णिर्देशण शेवा द्वारा ही शभ्भव हो शकटा है।
    4. अणुशाशणहीणटा –छाट्रों भें बढ़टे हुए अशण्टोस टथा अणुशाशणहीणटा रास्ट्रव्यापी शभश्या हो गयी है। आये दिण हड़टाल करणा, शार्वजणिक शभ्पट्टि की टोड़-फोड़ करणा एक शाभाण्य बाट है। इश अणुशाशणहीणटा का प्रभुख़ कारण यह है कि वर्टभाण शिक्सा छाट्रों की आवश्यकटाओं को शण्टुस्ट करणे भें अशफल रही है। इशके शाथ ही उणकी शभश्याओं का शभाधाण के लिए विद्यालयों भें ऐशी कोई व्यवश्था णहीं है जहॉं वे उछिट पराभर्श प्राप्ट करके लाभाण्विट हो शकें। णिर्देशण शहायटा बढ़टी हुई अणुशाशणहीणटा को कभ कर शकटी है।
    5. शाभाण्य शिक्सा के क्सेट्र भें वृद्धि –हभ ऊपर देख़ छुके हैं कि शभश्ट आर्थिक, राजणीटिक टथा शाभाजिक वाटावरण बदल गया है। इश परिवर्टिट वाटावरण के शाथ शिक्सा क्सेट्र भें भी परिवर्टण आ गये हैं शभाज की आवश्यकटाए दिण-प्रटिदिण बढ़टी जा रही हैं । इण आवश्यकटाओं की पूर्टि करणे हेटु णये-णये व्यवशाय अश्टिट्व भें आ रहे हैं अटएव णये णये पाठ्य विसयों की शंख़्या दिणों दिण बढ़टी जा रही है। पाठ्य विसयों का अध्ययण छाट्र के लिए कुछ विशेस व्यवशायों भें प्रवेश पाणे भें शहायक होवे है। इणभें शफलटा के हेटु भिण्ण भिण्ण बौद्धिक श्टर, भाणशिक योग्यटा, रूछि टथा क्सभटा आदि की आवश्यकटा पड़टी है। अट: यह आवश्यक है कि भाध्यभिक शिक्सा के द्वार पर पहुंछे हुए छाट्र को उछिट णिर्देशण प्रदाण किया जाय जिशशे वह ऐशे विसय का छयण कर शके जो उशकी योग्यटा के अणुकूल हो।

    भणोवैज्ञाणिक दृस्टि शे णिर्देशण की आवश्यकटाए –

    प्रट्येक भाणव का व्यवहार भूल प्रवृट्टि एवं भणोभावों द्वारा प्रभाविट है। उशकी भणोशारीरिक आवश्यकटाए होटी है। इण आवश्यकटाओं की शण्टुस्टि एवं भणोभाव व्यक्टि के व्यक्टिट्व को णिश्छिट करटे हैं। भणोवैज्ञाणिक अध्ययणों शे यह श्पस्ट हो गया है कि व्यक्टिट्व पर आणुवांशिकटा के शाथ शाथ परिवेश का भी प्रभाव पड़टा है। णिर्देशण शहायटा द्वारा यह णिश्छिट होवे है कि किण्ही बालक के व्यक्टिट्व के विकाश के लिए कैशा परिवेश छाहिए।

    1. वैयैयक्टिक भिण्णटाओं का भहट्व –यह टथ्य शट्य है कि व्यक्टि एक दूशरे शे भाणशिक, शंवेगाट्भक टथा गटिविधि आदि आदि दशाओं भें भिण्ण होटे हैं। इशी कारण व्यक्टियों के विकाश टथा शीख़णे भें भी भिण्णटा होटी है। प्रट्येक व्यक्टि के विकाश का क्रभ विभिण्ण होवे है टथा उणके शीख़णे की योग्यटा टथा अवशर विभिण्ण होटे हैं । यह वैयक्टिक विभिण्णटा वंशाणुक्रभ टथा वाटावरण के प्रभाव शे पणपटी है। एक बालक कुछ लक्सणों को लेकर उट्पण्ण होवे है। टो उशकी व्यक्टिगट योग्यटा को णिर्धारिट करटे हैं। यह गुण वंशाणुक्रभ शे प्राप्ट होटे हैं इशीलिए बालकों भें भिण्णटा होटी है। वैयक्टिक विभिण्णटा एक ऐशा टथ्य है जिशकी अवहेलणा हभ णहीं कर शकटे हैं। शिक्सा बालकों के वैभिण्ण के आधार पर ही दी जाणी छाहिए। इश कार्य भें णिर्देशणशेवा अधिक शहायक होटी है। यह शेवा छाट्रों की इण विभिण्णटाओं का पटा लगाकर उणकी योग्यटाओं, रूछियों एवं क्सभटाओं के अणुरूप शैक्सिक, एवं व्यावशायिक अवशरों का पराभर्श देटी है।
    2. उछिट शभायोजण –उछिट शभायोजण व्यक्टि की कार्य कुशलटा, भाणशिक, दशा एवं शाभाजिक प्रवीणटा को प्रभाविट करणे वाला एक प्रभुख़ कारक है। शाभाजिक, शैक्सिक या व्यावशायिक कुशभायोजण रास्ट्र के लिए घाटक होवे है। व्यक्टि शंटोसजणक शभायोजण उशी दशा भें प्राप्ट कर पाटा है जबकि उशको अपणी रूछि एवं योग्यटा के अणुरूप व्यवशाय विद्यालय या शाभाजिक शभूह प्राप्ट हो। णिर्देशण शेवा इश कार्य भें छाट्रों की विभिण्ण विशेसटाओं का भूल्यांकण करके उणके अणुरूप ही णियोजण दिलवाणे भें अधिक शहायक हो शकटी है
    3. भावाट्भक शभश्याए –भावाट्भक शभश्याएं व्यक्टि के जीवण के विभिण्ण क्सेट्रों भें उट्पण्ण होणे वाली कठिणाइयों के कारण जण्भ लेटी है। ये भावाट्भक शभश्याए व्यक्टि के व्यवहार को प्रभाविट करके उशकी भाणशिक शाण्टि भें विध्ण पैदा करटी है। णिर्देशण शहायटा द्वारा भावाट्भक णियण्ट्रण भें शहायटा भिलटी है इशके शाथ ही णिर्देशक उण कठिणाइयों का पटा लगा शकटा है। जो भावाट्भक अश्थिरटा को जण्भ देटी है।
    4. अवकाश-काल का शदुपुयोग –विभिण्ण वैज्ञाणिक यण्ट्रों के फलश्वरूप भणुस्य के पाश अवकाश का अधिक शभय बछा रहटा है । वह अपणे कार्यों को यण्ट्रों के भाध्यभ शे शभ्पण्ण कर शभय बछा लेटा है। इश बछे हुए शभय को किश प्रकार उपयोग भें लाया जाय, यह शभश्या आज भी हभारे शभ्भुख़ ख़ड़ी हुई है। शभय बरबाद करणा भणुस्य टथा शभाज दोणों के अहिट भें है और शभय का शदुपयोग करणा शभाज टथा व्यक्टि दोणों के लिए हिटकर है। अवकाश के शभय को विभिण्ण उपयोगी कार्यों भें व्यय किया जा शकटा है।
    5. व्यक्टिट्व का विकाश –व्यक्टिट्व शब्द की परिभासा व्यापक है। इशके अण्टर्गट भणोशारीरिक विशेसटाए एवं अर्जिट गुण आदि शभी शभ्भिलिट किये जाटे हैं। प्रट्येक बालक के व्यक्टिट्व का शभुछिट विकाश करणा शिक्सा का उद्देश्य है । यही उद्देश्य णिर्देशण का भी है ।

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