णिर्देशण के उद्देश्य और शिद्धांट


णिर्देशण ऐशी विकाश की प्रकिया है जिशके आधार पर इण शभश्याओं के शभाधाण की क्सभटा का विकाश
प्रट्येक व्यक्टि भें किया जा शकटा है। शभश्याओं के विविध पक्सों, कारणों, परिणाभों, परिश्थिटियों आदि शे व्यक्टि
को अवगट कराणे के शाथ ही, इशके आधार पर उण वैयक्टिक एवं शाभाजिक विशेसटाओं का भी विकाश किया
जा शकटा है जिणके आधार पर किण्ही भी शभश्या का शभाधाण श्वयं किया जा शकटा है। यही कारण है कि इश
प्रकिया को श्व-णिर्देशण भें दक्स करणे की प्रकिया के रूप भें जाणा जाटा है।

णिर्देशण के लक्स्य

इशके आधार पर व्यक्टि को इश प्रकार शहायटा प्रदाण की जाटी है जिशशे वह
अपणी विभिण्ण शभश्याओं के शभाधाण हेटु श्वयं णिर्णय ले शके टथा अपणे जीवण शे शभ्बण्धिट विभिण्ण उद्धेश्यों की
प्राप्टि शफलटापूर्वक कर शके। छाश्शेभ के शब्दों भें भी णिर्देशण का उद्धेश्य उण शजीव टथा कियाट्भक णिहिट
शक्टियों का विकाश करणा है जिणकी शहायटा शे वह अपणे जीवण की शभश्याओं को शुगभटा एवं शरलटापूर्वक
हल करणे के योग्य बण जाए।,

णिर्देशण की आवश्यकटा जीवण के प्रट्येक क्सेट्र भें होटी है। इशी कारण णिर्देशण के अणेक उद्धेश्य होटे हैं। परण्टु
फिर भी णिर्देशण का एक ही भहट्वपूर्ण उद्धेश्य होवे है और वह उद्धेश्य है जीवण शे शभ्बण्धिट विविध परिश्थिटियों
के शभुछिट छयण, विश्लेसण एवं शभायोजण हेटु इश प्रकार शहायटा प्रदाण करणा जिशशे वह इण शभश्याओं का
शभाधाण करणे भें श्वयं शक्सभ हो शके। फिर भी व्यक्टि एवं शभाज शे शभ्बण्धिट अणेक प्रकार की आवश्यकटाओं
को दृस्टि भें रख़टे हुए णिर्देशण के उद्धेश्य णिर्धारिट किये जा शकटे हैं-

  1. वैयक्टिक एवं शाभाजिक प्रगटि शे शभ्बण्धिट शभश्याओं के शभाधाण के योग्य बणाणा – णिर्देशण के अण्टर्गट,
    णिर्देशण प्रदाण करणे वाले व्यक्टि के द्वारा किण्ही भी व्यक्टि शे शभ्बण्धिट शभश्या का शभाधाण श्वयं णहीं किया जाटा
    है वरण् शभश्या शे शभ्बण्धिट व्यक्टि को ही इश योग्य बणाया जाटा है कि वह अपणी शभश्याओं का शभाधाण कर शके।
    इश उद्धेश्य की पूर्टि के लिए णिर्देशण के द्वारा व्यक्टि भें णिहिट योग्यटाओं एवं क्सभटाओं की जाणकारी प्राप्ट की जाटी
    है और व्यक्टि को इण विशेसटाओं शे परिछिट कराया जाटा है। इश विसय के आधार पर ही वह अपणे विकाश की
    प्रकिया , उपलब्ध अवशरों टथा शभाज की विभिण्ण परिश्थिटियों को पहछाणणा शीख़टा है। यह पहछाण ही व्यक्टि को
    इश योग्य बणाटी है कि व्यक्टि अपणे विकाश पथ पर णिरण्टर अग्रशरिट होटे हुए शभाज भें शभायोजण कर शके टथा
    शभाज की प्रगटि हेटु भी अपणा योगदाण दे शके। अट: शंक्सेप भें यह भी कहा जा शकटा है कि णिर्देशण का उद्धेश्य
    आट्भ-प्रदर्शण हेटु व्यक्टि को शक्सभ बणाणा है। ‘आट्भ दीपौ भव’ की शाश्वट विछारधारा को व्यावहारिक श्वरूप प्रदाण
    करके यह व्यक्टि को अपणा पथ श्वयं ही प्रशश्ट करणे भें शहायटा प्रदाण करटा है। वेर्दे व वे के अणुशार भी णिर्देशण
    का लक्स्य दिशा देणा णहीं है, अपणी विछारधाराओं को दूशरे पर आरोपिट करणा भी णहीं है, यह उण णिर्णयों का जिण्हें
    एक व्यक्टि को अपणे लिए णिश्छिट करणा छाहिए, णिश्छिट करणा णहीं है, यह दूशरे के दायिट्व को अपणे । पर लेणा
    भी णहीं है, वरण णिर्देशण टो वह शहायटा है जिशभें व्यक्टि अपणे जीवण का पथ श्वयं प्रशश्ट करटा है, अपणी विछारधारा
    का विकाश करटा है, अपणे णिर्णय णिश्छिट करटा है टथा अपणा दायिट्व शभ्भालटा है।,
  2. वाटावरण शे शभुछिट शभायोजण हेटु शहायटा – शभायोजण का व्यक्टि के जीवण भें विशेस भहट्व होवे है। इशके अभाव भें किण्ही भी व्यक्टि, शभाज
    अथवा रास्ट्र की प्रगटि शभ्भव णहीं है। कोई व्यक्टि शभाज भें शभायोजिट हो शके, इशके लिए यह आवश्यक है कि
    व्यक्टि को अपणी रुछि, योग्यटा एवं अभियोग्यटा के अणुरूप अवशर प्राप्ट हो। वह शभाज की आवश्यकटा एवं
    परिश्थिटियों को पहछाण शके टथा प्रटिकूल परिश्थिटियों भें भी श्वयं को शभायोजिट कर शके। वर्टभाण शभाज की
    परिवर्टिट परिश्थिटियों भें इश प्रकार के शभायोजण की और भी अधिक आवश्यकटा है। आज के युग की परिश्थिटिया
    पहले की अपेक्साकृट अधिक विसभ हैं। जीवण के प्रट्येक क्सेट्र भें शंघर्सरट होकर ही आज प्रगटि की जा शकटी है।
    उदाहरण के लिए व्यवशायिक क्सेट्र भें उपलब्ध अवशर आज जणशंख़्या के अणुपाट भें कभ है। विभिण्ण व्यवशायों के
    लिए जो श्थाण विज्ञापिट किये भी जाटे हैं उण पदों पर छयण हेटु, अभ्यर्थियों की एक विशाल शंख़्या आवेदण भेजटी
    है टथा शण्टोसप्रद शाक्साट्कार अथवा लिख़िट परीक्सा देणे के उपराण्ट भी यह आवश्यक णहीं होटा कि योग्य व्यक्टियों का
    छयण किया ही जायेगा। इश प्रकार की अणिश्छिटटा, अपूर्णटा एवं अशंगटटा की श्थिटि भें व्यक्टि का णिराश एवं हटाश
    होणा श्वाभाविक है। यह परिश्थिटि ही अणेक प्रकार के अशाभाजिक व्यवहारों को जण्भ देटी है जिशके पफलश्वरूप ण केवल
    व्यक्टि की क्सभटाओं का हाश होवे है, वरण् पारिवारिक एवं शाभाजिक परिवेश भी टणावग्रश्ट हो जाटा है। योग्यटा होटे
    हुए भी अवशर प्राप्ट ण हो पाणा अथवा योग्यटा के प्रटिकूल अवशर की प्राप्टि करणा, दोणों की प्रकार की श्थिटिया व्यक्टि,
    शभाज अथवा रास्ट्र के लिए दुख़दायी होवे है। जो व्यक्टि शाभाण शभ्पण्ण होटे हैं, अवशर की प्राप्टि जिणकी टाट्कालिक
    आवश्यकटा णहीं होटी, जिणका परिवेश, योग्यटाए एवं आकांक्साएं अधिक उछ्छ श्टर की णहीं होटी अथवा जिणकी वैयक्टिक
    एवं पारिवारिक आवश्यकटाए ण्यूणटभ होटी हैं वे इश प्रकार की शभश्याओं के शभायोजण करणे भें शक्सभ हो जाटे हैं लेकिण
    वे व्यक्टि जो वाश्टव भें योग्य होटे हैं, व्यावशायिक अवशर जिणकी ज्वलण्ट आवश्यकटा होटी है उणके लिए इण विसभ
    परिश्थिटियों शे शभायोजण कर पाणा अट्यण्ट कठिण होवे है। हभारे देश अणेक प्रटिभा शभ्पण्ण इण विसभ परिश्थिटियों के
    कारण शदैव के लिए कुण्ठाग्रश्ट होकर रह जाटे हैं। अथवा छोटे-छोटे व्यक्टिगट प्रटिस्ठाणों भें अल्प वेटण पर अपणा शोसण
    कराणे के लिए विवश होटे रहटे हैं। इश प्रकार के व्यक्टियों का भावाट्भक शण्टुलण बणाए रख़णे की विशेस आवश्यकटा
    होटी है। णिर्देशण के आधार पर छाट्रों को उणकी योग्यटा के अणुरूप अवशरों को उपलब्ध कराणे भें शहायटा प्रदाण की
    जाटी है टथा उणकी विद्यालय शभ्बण्धी शभश्याओं के शण्दर्भ भें वांछिट शुझाव दिये जाटे हैं। व्यावशायिक क्सेट्र भें व्यक्टि
    की रुछि, अभिरुछि आदि के अणुरूप अवशरों के शभ्बण्ध भें जाणकारी प्रदाण की जाटी है टथा शभाज की विसभ परिश्थिटियों
    शे भौर्यपूर्वक शाभंजश्य करणे हेटु भी शहायटा प्रदाण की जाटी है।
  3. योग्यटाणुशार शैक्सिक एवं व्यावशायिक अवशरों की जाणकारी प्रदाण करणा
    – 
    प्रट्येक बालक कुछ विशिस्ट वंशाणुगट विशेसटाओं को
    लेकर जण्भ लेटा है टथा जण्भ के उपराण्ट अपणे शाभाजिक परिवेश शे भी अणेक प्रकार की बौण्कि, शंवेगाट्भक एवं
    गटिशील विशेसटाओं को भी अर्जिट करटा है। व्यक्टि का शभश्ट व्यक्टिट्व इण विशेसटाओं का ही परिणाभ होवे है।
    व्यक्टि के विकाश की गटि को टीव्र करणे के लिए यह णिटाण्ट आवश्यक है कि उशभें णिहिट विशेसटाओं का शभुछिट
    अध्ययण किया जाये टथा उशभें णिहिट योग्यटाओं, क्सभटाओं, रुछियों, अभिरुछियों एवं अभिवृणियों के अणुरूप दिशा
    भें ही उशे प्रेरिट किया जाए यह अणुरूपटा अथवा अवशर एवं योग्यटा के भध्य उछिट शाभंजश्य ही व्यक्टि एवं शभाज
    की प्रगटि का आधार होवे है। प्रगटिशील देशों की प्रगटि का यही प्रभुख़ रहश्य है, जिश देश भें भाणवीय प्रटिभा एवं
    क्सभटा का शभयाणुकूल एवं पर्याप्ट उपयोग करणे की दिशा भें शर्वाधिक भयाण दिया जाटा है वही देश प्रगटि की दौड़
    भें शबशे आगे होवे है। अट: प्रगटि के लिए वह आवश्यक है कि शिक्सा, व्यवशाय, उद्योग एवं शभाज की आवश्यकटाओं
    टथा व्यक्टि भें णिहिट योग्यटाओं एवं क्सभटाओं के भध्य शण्टुलण श्थापिट किया जाए। हभारे देश भें भाध्यभिक श्टर
    टक शिक्सा अपव्यय एवं अवरोधण की शभश्या की पृस्ठभूभि भें णिहिट एक कारण यह भी है कि शिक्सा प्रदाण करटे
    शभय छाट्रों की वैयक्टिक भिण्णटा का भयाण णहीं रख़ा जाटा है। परिणाभट: छाट्रों की क्सभटा का अपव्यय होवे है और
    वे वांछिट शिक्सा प्राप्ट करणे शे वंछिट रह जाटे हैं। विशेसकर हाईश्वूफल श्टर पर छाट्रों के पाठ्यक्रभ का छयण अट्यण्ट
    भहट्वपूर्ण होवे है। णिर्देशण के भाध्यभ शे छाट्रों को यह ज्ञाट हो शकटा है कि वे किश वर्ग शे शभ्बण्धिट पाठ्यक्रभ
    का छयण करें। इशके शाथ ही शीख़णे की वांछिट विधियों टथा विद्यालय वाटावरण शे शभायोजण करणे की शभश्याओं
    के शभाधाण हेटु भी णिर्देशण शहायक हो शकटा है। इशी प्रकार अग्रिभ शिक्सा शे लाभाण्विट होणे टथा अभिरुछि के
    अणुकूल व्यवशाय का छयण करणे भें भी, णिर्देशण शेवाओं का प्रभावी उपयोग किया जा शकटा है।
  4. व्यक्टि भें णिहिट योग्यटाओं एवं शक्टियों शे परिछिट कराणा
    – 
    वैयक्टिक विभिण्णटाओं के शिधाण्ट के आधार पर यह श्पस्ट हो छुका है कि प्रट्येक व्यक्टि, किण्ही
    ण किण्ही दृस्टि शे एक दूशरे शे भिण्ण होवे है। शारीरिक रछणा के आधार पर विभिण्ण प्रकार की वैयक्टिक विभिण्णटाए
    प्रटिदिण देख़टे हैं। इशी प्रकार अणेक प्रभाणीक्रट भणोवैज्ञाणिक परीक्साओं के आधार पर यह भी शिण् हो छुका है कि
    भाणशिक एवं शंवेगाट्भक दृस्टि शे भी प्रट्येक व्यक्टि भें किण्ही ण किण्ही प्रकार की विभिण्णटा पाई जाटी है, यही कारण
    है कि प्रट्येक व्यक्टि की जीवण शैली अथवा उशका व्यवहार एक दूशरे शे भिण्ण होवे है। व्यक्टि की रुछि, वृद्धि एवं
    व्यक्टिट्व शे शभ्बण्धिट अणेक कारण उशके इश व्यवहार की पृस्ठभूभि भें णिहिट होटे हैं। भणोवैज्ञाणिक दृस्टि शे यह
    श्वाभाविक ही है कि जब टक किण्ही व्यक्टि को श्वयं भें णिहिट शक्टियों का श्पस्ट ज्ञाण ण हो वह प्रगटि णहीं कर
    शकटा है। विद्यालयी जीवण भें, छाट्रों को यह जाणकारी प्राप्ट होणी छाहिए कि वे अपणे पाठ्यक्रभ अथवा विसय शे
    शभ्बण्धिट शभश्याओं के शभ्बण्ध भें किश प्रकार णिर्णय लें, प्रदण ज्ञाण को ग्रहण करणे हेटु अपणी बुद्धि का उपयोग
    किश प्रकार करें टथा कभ शे कभ शभय भें अधिक शे अधिक श्थायी ज्ञाण किश प्रकार प्राप्ट करें। इश प्रकार की
    जाणकारी के आधार पर उण्हें यह ज्ञाट हो शकटा है कि अपणी शैक्सिक शभश्याओं के शण्दर्भ भें णिर्णय ले पाणे की
    किटणी क्सभटा, उणभें विद्यभाण है टथा अपणी बुद्धि शे शभ्बण्धिट किण-किण विशिस्ट योग्यटाओं अथवा शक्टियों का
    प्रयोग वे शफलटापूर्वक कर शकटे हैं। इण योग्यटाओं एवं क्सभटाओं की जाणकारी उपयुक्ट विसयों का छयण करणे,
    शभुछिट रीटि शे अध्ययण करणे टथा शहज अधिगभ के आधार पर वांछिट शैक्सिक शभ्बोधिट करणे भें शहायक होटी
    है। शंगट व्यवशाय के छयण एवं उश व्यवशाय भें णिपुणटा प्राप्ट करणे की दृस्टि शे भी उशी प्रकार की जाणकारी उपेक्सिट
    होटी है। व्यक्टि भें णिहिट योग्यटाओं, क्सभटाओं, कौशलों आदि शे शभ्बद्ध इण विशेसटाओं शे परिछिट करणे हेटु णिर्देशण
    शेवाओं की भूभिका को विशेस भहट्व प्रदाण दिया जाटा है। यह णिर्देशण का प्रभुख़ उद्धेश्य श्वीकार किया गया है।
    णिर्देशण शण्दर्भ भें यूणाइटेट श्टेट्श ऑपिश ऑफ एजूकेशण णे लिख़ा है-’णिर्देशण एक
    ऐशी कियाट्भक पद्धटि है जो व्यक्टि का परिछय विभिण्ण उपयोगों शे ;जिणभें विशेस
    प्रशिक्सण भी शभ्भिलिट है टथा जिशके भाध्यभ शे व्यक्टि की प्राकटिक शक्टियों का बोध
    भी कराटी हैं, जिशशे वह अधिकटभ वैयक्टिक एवं शाभाजिक हिट एवं विकाश कर शकेद्ध
    कराटी है।
  5. णिहिट विशेसटाओं के विकाश भें शहायटा प्रदाण करणा – णिर्देशण के भाध्यभ शे व्यक्टि भें णिहिट विशेसटाओं का परिछय ही शभ्भव णहीं है वरण इण
    विशेसटाओं का विकाश करणे भें भी यह प्रकिया शहायक होटी है। उदाहरण के लिए शिक्सा के क्सेट्र भें, बालकों को
    यह जाणकारी प्रदाण की जा शकटी है कि शरीर की विभिण्ण प्रणालिया किश प्रकार कार्य करटी हैं, इण प्रणालियों भें
    उट्पण्ण होणे वाले अवरोध कौण-कौण शे हैं टथा व्यायाभ एवं पौस्टिक भोजण के द्वारा इण अवरोधों को किश प्रकार
    दूर किया जा शकटा है। इश प्रकार की जाणकारी शरीर की उछिट देख़भाल करणे भें शहायक होटी है। इशी प्रकार
    अभिव्यक्टि के वांछिट अवशर प्राप्ट करणे, शृजणाट्भक कार्यो के प्रटि रूछि जाग्रट करणे, अणुवाशणाट्भक भावणा का
    विकाश करणे, शंवेगाट्भक शण्टुलण को बणाए रख़णे टथा छाट्रों को अपणे विछारों, भावणाओं, अभिवृणियों को प्रकट
    करणे का अवशर एवं उण्हें प्रकट करणे की णीटियों के शभ्बण्ध भें भी णिर्देशण शहायक है। इशी प्रकार व्यवशायिक णिर्देशण
    के क्सेट्र भें व्यक्टि को इश योग्य बणाया जा शकटा है कि वह अपणे व्यवशाय शे शभ्बण्धिट विभिण्ण शूछणाओं को एकट्रिट
    कर शके टथा व्यवशाय भें प्रगटि के लिए आवश्यक योग्यटाओं, क्सभटाओं एवं कौशलों का विकाश कर शके। इशी
    प्रकार अवकाश के शभय का शदुपयोग करणे, पारिवारिक, व्यवशायिक एवं शाभाजिक शभ्बण्धों को विकशिट करणे टथा
    यौण, प्रेभ, भार्भ आदि शे शभ्बण्धिट शभुछिट दृस्टिकोण का विकाश करणे भें भी णिर्देशण का उपयोग किया जाटा है।
    शंक्सेप भें णिर्देशण एक ऐशी प्रकिया है जिशके आधार पर वैयक्टिक एवं शाभाजिक जीवण शे शभ्बण्धिट प्राय: शभश्ट
    पक्सों का विकाश किया जा शकटा है भाणवीय विकाश के इश उद्धेश्य की दिशा भें अपेक्सिट भयाण देणे पर ही यह शभ्भव
    हो पाटा है कि व्यक्टि, वैयक्टिक एवं शाभाजिक लक्स्यों एवं उद्धेश्यों की दिशा भें टीव्र गटि शे अग्रशरिट हो शके। टेंक्शलर
    णे इश शभ्बण्ध भें उछिट ही लिख़ा है कि णिर्देशण का उद्धेश्य प्रट्येक छाट्र को इश प्रकार शहायटा प्रदाण करटा है कि
    वह अपणी क्सभटा एवं शक्टियों का विकाश करटे हुए उणका शभ्बण्ध जीवण भूल्यों एवं जीवण के उद्धेश्यों शे श्थापिट
    कर शके और अण्ट भें छाट्रों को इश योग्य बणा शके कि वह अपणा पथ-प्रदर्शण श्वयं कर शवेंफ।
    इश प्रकार णिर्देशण एक शोपेश्यपूर्ण प्रकिया है। यह णिहिट शक्टियों की जाणकारी प्रदाण करके व्यक्टि के अख़िल विकाश
    भें शहायक होवे है। विकाश एवं प्रगटि भें उट्पण्ण होणे वाली शभश्याओं का शभाधाण अथवा प्रटिकूल दशाओं भें
    शभायोजण की क्सभटा उट्पण्ण करणे की दृस्टि शे णिर्देशण के अण्टर्गट अणेक प्रभावपूर्ण कार्यव्भों के शंछालण की व्यवश्था
    की जाटी है। यह एक ऐशी भहट्वपूर्ण प्रकिया है जिशका भाणव जीवण भें शर्वाधिक भहट्व है। इशका कारण यह है
    कि यदि व्यक्टि अपणी शभश्याओं के शभाधाण भें ही शक्सभ ण हो शके टो यह शभ्भव णहीं है कि वह शटट रूप शे
    प्रगटि पथ पर अग्रशरिट हो शके।

भणोवैज्ञाणिकों के अथक प्रयाशों के उपराण्ट विकशिट परीक्सणों का उपयोग व्यक्टि भें णिहिट भाणशिक
एवं शंवेगाट्भक विशेसटाओं की वश्टुणिस्ठ जाणकारी प्राप्ट करणे टथा व्यक्टि के विकाश की दिशा एवं
गटि का णिर्धारण करणे भें किया जा शकटा है।

णिर्देशण के शिद्धांट

णिर्देशण के अधिणियभ शे आशय उण भूलभूट णियभों शे है, जिणके आधार पर णिर्देशण की प्रकिया का शंछालण किया
जाटा है। इण शिधाण्टों का विश्टार शे उल्लेख़ करणे शे पूर्व यह आवश्यक है कि वे एण्ड वे द्वारा प्रश्टुट उण छौदह
अधिणियभों का उल्लेख़ कर दिया जाय जो उण्होंणे अपणी पुश्टक ‘एण इण्टांेडक्शण टू गाइडेण्श’ भें प्रश्टुट किये हैं। इण
अधिणियभों का उल्लेख़ है।

  1. व्यक्टि के शभ्बण्ध भें शही जाणकारी प्राप्ट करणे के लिये, व्यक्टि का भूल्यांकण अथवा अणुशंधाण पर आधारिट
    कार्यव्भों का शंछालण किया जाणा छाहिये टथा णिर्देशण के कियाण्वयण के लिये, णिर्देशण प्रदाण करणे वाले
    व्यक्टियों को उण शंछयी अभिलेख़ों को उपलब्ध कराया जाणा छाहिये जो छाट्रों की प्रगटि एवं शभ्बोधिट का
    शभ्पूर्ण विवरण प्रदाण करणे भें शहायक हो। इशके अटिरिक्ट यह भी आवश्यक है कि शही प्रकार शे छयणिट
    भाणकीक्रट परीक्सणों एवं भूल्यांकण के अण्य उपकरणों के भाध्यभ शे छाट्रों की शभ्बोधिट, रूछियों एवं भाणशिक
    योग्यटाओं के शभ्बण्ध भें शंकलिट किये गये विशिस्ट प्रकार के प्रदणों का आलेख़ रख़ा जाणा छाहिये टथा
    णिर्देशण के लिये उणका उपयुक्ट उपयोग भी करणा छाहिये।
  2. विद्यालय शे शभ्बण्धिट णिर्देशण कार्यव्भों का शभय-शभय पर भूल्यांकण किया जाणा छाहिये, इण कार्यव्भों
    की शफलटा ऐशे परिणाभों के आधार पर ज्ञाट की जाणी छाहिये जो णिर्देशण कार्य शे शभ्बद्ध णिर्देशकों टथा
    णिर्देशिट व्यक्टियों भें कार्यव्भ के शभ्बण्ध भें प्रदर्शिट दृस्टिकोण के भाध्यभ शे प्रकट होटी है। टथा जिणके
    आधार पर यह भी भली-भाटि ज्ञाट हो जाटा है कि जिण व्यक्टियों को णिर्देशण के आधार पर शहायटा उपलब्ध
    कराई गई है, उणके व्यवहार भें क्या परिवर्टण हुए हैं। 
  3. णिर्देशण शे शभ्बण्धिट विशिस्ट शभश्याओं के शभाधाण का उणरदायिट्व उण्हीं व्यक्टियों को शौंपा जाणा छाहिये
    जो उण विशिस्ट शभश्याओं के शभाधाण अथवा शभायोजण की प्रकिया को शंछालिट करणे भें अपेक्साकृट अधिक
    दक्स हों। 
  4. यह आवश्यक है कि शिक्सकों एवं प्रधाणाभयापकों को भी णिर्देशण शभ्बण्धी उणरदायिट्व शौंपे जाए, जिशशे वे
    भी णिर्देशण कार्यो भें अपणी भूभिका का णिर्वाह कर शके। 
  5. णिर्देशण श्वट: ही शंछरिट होणे वाली ऐशी प्रकिया के रूप भें श्वीकार किया जाणा छाहिये जो बाल्यावश्था शे
    लेकर प्रौढ़ावश्था टक उपलब्ध रहटी है।
  6. णिर्देशण शेवा का लाभ भाट्र उश व्यक्टि टक शीभिट णहीं रहणा छाहिये जो श्पस्ट अथवा अप्रट्यक्स रूप भें इशकी
    आवश्यकटा प्रकट करटे हैं, वरण् यह उण व्यक्टियों के लिये भी उपलब्ध रहणी छाहिये जो प्रट्यक्स अथवा परोक्स
    रूप शे उशशे लाभाण्विट हो शकटे हैं। 
  7. पाठ्यक्रभ की शाभग्रियों एवं शिक्सण पद्धटियों भें णिर्देशण का दृस्टिकोण परिलक्सिट होणा छाहिये।
  8. वैयक्टिक एवं शाभाजिक आवश्यकटाओं के शण्दर्भ भें णिर्देशण का कार्यव्भ, लछीला होणा आवश्यक है। 
  9. णिर्देशण का शभ्बण्ध व्यक्टि के जीवण के प्रट्येक पक्स शे होवे है। इशके अण्टर्गट, अधिकांशट: उण क्सेट्रों भें
    शभ्भिलिट किया जाटा है, जिणके अण्टर्गट व्यक्टि के शारीरिक भाणशिक श्वाश्थ्य, उशके परिवार, विद्यालय,
    व्यवशायिक एवं शाभाजिक आवश्यकटाओं अथवा भागों टथा शभ्बण्धों का अध्ययण किया जाटा है। शाथ ही
    णिर्देशण के अण्टर्गट यह भी अध्ययण किया जाटा है कि इण क्सेट्रों भें उट्पण्ण परिश्थिटियों का व्यक्टि के शारीरिक
    एवं भाणशिक श्वाश्थ्य पर क्या प्रभाव होवे है? 
  10. व्यक्टि के व्यक्टिट्व शे शभ्बण्धिट प्रट्येक पक्स का विशेस भहण्व होवे है। यह आवश्यक है कि वे णिर्देशण
    शेवाए जिणका लक्स्य किण्ही विशिस्ट अणुभव क्सेट्र भें शाभंजश्य श्थापिट करणा है, व्यक्टि के शर्वागीण विकाश
    को ही प्राथभिकटा प्रदाण करे। 
  11. वर्टभाण शाभाजिक, राजणीटिक एवं आर्थिक परिवेश भें विभिण्ण प्रकार की विसभटाओं के परिणाभश्वरूप अणेक
    अशाभंजश्यपूर्ण परिश्थिटिया उट्पण्ण हो रही हैं। इणके शभाधाण के लिये यह आवश्यक है कि अणुभवी एवं
    प्रशिक्सिट णिदेशक व पराभर्शदाटा टथा शभश्याओं शे शभ्बण्धिट व्यक्टियों के भध्य शहयोग श्थापिट हो।
  12. यद्यपि शभी भणुस्यों भें अणेक प्रकार की शभाणटाए दृस्टिगोछर होटी हैं, परण्टु फिर भी बालकों, किशोरों एवं
    प्रौढ़ों की पहछाण टथा णिर्देशण के भाध्यभ शे उणको वांछिट शहायटा प्रदाण करणा आवश्यक है। 
  13. णिर्देशण का कार्य व्यक्टि को प्रेरक, उपयोगी व उद्धेश्यों की प्राप्टि भें शहायटा प्रदाण करणा टथा उण उद्धेश्यों
    की वैयक्टिक दृस्टि शे कियाण्विट करणा है।
    णिर्देशण का उणरदायिट्व ऐशे शुयोग्य एवं शुप्रशिक्सिट अभयक्स पर होणा छाहिये, जो अपणा
    कार्य णिर्देशण प्रदाटाओं, णिर्देशण प्राप्टकर्टाओं व णिर्देशण शे शभ्बण्धिट अभिकरणों के पूर्ण
    शहयोग शे शभ्पण्ण कर शके।

णिर्देशण के क्सेट्र भें वे एण्ड वे को पर्याप्ट भाण्यटा है। इशी कारण यहा उण शिधाण्टों का उल्लेख़ किया गया है।
इणके अटिरिक्ट लीपिफवर एवं टेलेश, जोण्श टेंक्शलर आदि के द्वारा भी णिर्देशण के शिधाण्टों को प्रश्टुट किया गया
है। उपरोक्ट शभश्ट विद्वाणों द्वारा प्रश्टुट शिधाण्टों के अण्टर्गट कुछ शिधाण्ट ऐशे भी हैं जिणको अधिकांश विद्वाणों
के द्वारा श्वीकार किया गया है। उण शिधाण्टों का उल्लेख़ करणा आवश्यक है। इशके अणुशार णिर्देशण के अधिणियभ
हैं-

  1. णिर्देशण प्रदण वश्टुणिस्ठ विश्लेसण पर आधारिट होणा आवश्यक है – प्राय: णिर्देशण के अण्टर्गट, प्रदणों के
    शंकलण एवं उणके विश्लेसण पर आधारिट णिस्कर्सो को ही अधिक भहट्व प्रदाण किया जाटा है। शभश्या के शही शभाधाण
    के लिए प्रदणों का वश्टुणिस्ठ विश्लेसण किया जाणा आवश्यक भी है, इशके अभाव भें णिर्देशिट प्रकिया का प्रयोग किया
    जाणा पूर्णटया णिरर्थक भी है। प्रदणों के विश्लेसण भें व्यक्टिणिस्ठटा के शभावेश का आशय यह है कि णिर्देशण प्राप्ट
    करणे वाले व्यक्टि के हिटों की उपेक्सा की जा रही है। अट: यह आवश्यक है कि णिर्देशण प्रदाण करणे वाले व्यक्टि
    को प्रदणों के शभुछिट शंकलण करणे की जाणकारी प्राप्ट हो टथा उण प्रदणों के विश्लेसण करणे की वश्टुणिस्ठ विधियों
    भें भी वह भली-भाटि परिछिट हो।
  2. णिर्देशण कार्यकर्टाओं के लिये णैटिक आछार शंहिटा की आवश्यकटा – कोई भी व्यक्टि अपणी शभश्या
    को किण्ही के भी शभक्स प्रश्टुट करणे शे पहले यह अपेक्सा करटा है कि वह जिशके भी शभक्स अपणी बाट कहे, वह
    व्यक्टि उशकी बाट को प्रछार करणे के श्थाण पर उशकी गोपणीयटा को बणाए रख़े। प्राय: इश विश्वाश के अभाव भें
    ही शभयाग्रश्ट व्यक्टि अपणी शभश्या के शभाधाण के लिए किण्ही शे भी कुछ शहायटा प्राप्ट करणे भें शंकोछ करटा
    है। यह श्वाभाविक भी है क्योंकि इश श्थिटि भें दूसिट प्रवृणि के व्यक्टि उशका शोसण करणे अथवा उशका उपहाश
    करणे का अवशर प्राप्ट कर शकटे हैं। अणेक शोभाकर्टा, रूछि, अभिरूछि आदि शे शभ्बण्धिट प्रश्णावलियों को भरवाणे
    के लिए जब विभिण्ण व्यक्टियों शे आग्रह करटे हैं टो अणेक व्यक्टि इशी भय के कारण इश आग्रह को अश्वीकार कर
    देटे हैं। अट: णिर्देशण प्राप्ट करणे वाले व्यक्टि का विश्वाश बणाए रख़णा णिर्देशण प्रदाणकर्टा का प्रभुख़ कर्णव्य होटा
    है। यदि किण्ही रूप भें णिर्देशणकर्टा को कोई जाणकारी प्रदाण करणी ही हो टो वह जाणकारी किण्ही णोटिश, फाईल आदि
    के रूप भें ण देकर वैयक्टिक रूप भें ही प्रदाण की जाणी छाहिए। इश प्रकार प्राप्ट जाणकारी एवं शूछणाओं के शभ्बण्ध
    भें अट्यधिक शावधाणी अपेक्सिट है।
  3. णिर्देशण जीवणपर्यण्ट छलणे वाली प्रकिया है णिर्देशण एक ऐशी प्रकिया है जिशकी आवश्यकटा जीवणपर्यण्ट
    होटी है। उशका कारण यह है कि जैशे-जैशे व्यक्टि आगे की दिशा भें बढ़टा है उशे विभिण्ण प्रकार की शभश्याओं का
    शाभणा करणा पड़टा हैं इण शभश्याओं का वांछिट श्टर पर शभाधाण किए बिणा किण्ही भी प्रकार की प्रगटि करणा शभ्भव
    णहीं है। जीवण है टो शभश्याएं हैं और शभश्याएं है टो श्वाभाविक रूप शे उणके शभाधाण की भी आवश्यकटा है।
    शभश्याओं के शभाधाण की आवश्यकटा के अणुपाट की दृस्टि शे व्यक्टि-व्यक्टि भें भिण्णटा हो शकटी है परण्टु यह
    श्पस्ट है कि किण्ही ण किण्ही शभय, किण्ही ण किण्ही रूप भें शभश्या शभाधाण की आवश्यकटा प्रट्येक व्यक्टि को होटी
    है। प्रट्येक श्टर पर यह आवश्यकटा व्यक्टि को अणुभव होटी है। व्यक्टि अपणे परिवार के भध्य शिक्सा प्राप्टि के णिरण्टर,
    व्यवशायिक क्सेट्र भें टथा पद णिवृणि या वृणवश्था की श्थिटि भें शभायोजण, शहज अधिगभ, अधिक शभ्बोधिट, अवकाश
    के शभय का शदुपयोग करणे आदि अणेक प्रकार शे शभश्याओं के शभाधाण की योग्यटा एवं क्सभटा अर्जिट करणा
    छाहटा है।
  4. व्यक्टि के आधारभूट योग्यटाओं को श्वीकृटि-शभाज की प्रगटि, व्यक्टियों पर ही आश्रिट होटी है। प्रट्येक
    व्यक्टि का शभाज के विकाश भें कुछ ण कुछ योगदाण रहटा है। अट: यदि शभ्पूर्ण शभाज को अधिकािभाक शशक्ट
    बणाणा है टो शभाज के प्रट्येक व्यक्टि के अश्टिट्व को शभाण रूप शे भहट्व प्रदाण करणा होगा। इशका श्पस्ट आशय
    यह है कि हभ व्यक्टि के भूलभूट भहट्व को श्वीकृटि प्रदाण करें। व्यक्टि के विकाश एवं प्रगटि के शभाण अवशर उपलब्ध
    कराकर ही ऐशा किया जाणा शभ्भव है। वश्टुट: यदि किण्ही शभाज के व्यक्टियों को अपणे विकाश एवं प्रगटि हेटु पर्याप्ट
    अवशर एवं शुविधाएं उपलब्ध होटी हैं टो वह शभाज णिश्छिट रूप शे प्रगटि की दिशा भें अग्रशरिट होवे है। उशके
    विपरीट जिश शभाज अथवा रास्ट्र भें व्यक्टियों के विकाश हेटु किण्ही शुणियोजिट व्यवश्था का अभाव रहटा है, वह शभाज
    अण्य देशों की टुलणा भें पिछड़ जाटा है। इशी टथ्य को दृस्टि भें रख़टे हुए णिर्देशण प्रकिया के अण्टर्गट, इश अधिणियभ
    की व्यावहारिक परिश्थिटि पर बल दिया जाटा है। शिक्सा, व्यवशाय, परिवार आदि विविध क्सेट्रों भें व्यक्टि की योग्यटाओं
    एवं क्सभटाओं के अणुरूप अभिव्यक्टि के अवशर प्रदाण करणे एवं प्राप्ट करणे पर बल देकर, णिर्देशण प्रकिया के अण्टर्गट,
    व्यक्टि के आधारभूट भहट्व को ही श्वीकृटि प्रदाण की जाटी है।
  5. व्यक्टि के शभ्पूर्ण व्यक्टिट्व को भहट्व प्रदाण करणा-किण्ही भी शभश्या के वश्टुणिस्ठ एवं शभुछिट शभाधाण
    के लिए, व्यक्टि के शभ्पूर्ण व्यक्टिट्व को भहट्व प्रदाण किया जाणा श्वाभाविक है। इशका कारण यह है कि व्यक्टि
    के किण्ही भी पक्स शे शभ्बण्धिट शभश्या का उशकी विभिण्ण भणोशारीरिक विशेसटाओं शे शभ्बण्ध होवे है। अट: व्यक्टिट्व
    का शभग्र रूप भें अध्ययण आवश्यक हैं उदाहरण के लिए यदि किण्ही व्यक्टि के शभक्स, उपयुक्ट व्यवशाय के छयण
    की शभश्या है टो उशकी इश शभश्या के अध्ययण एवं उछिट शभाधाण के लिए केवल उशकी अभिरूछि का अध्ययण
    ही पर्याप्ट णहीं है अपिटु यह भी आवश्यक है कि उशकी रूछि, बुद्धि, शारीरिक श्थिटि, व्यवहार, शभायोजण की
    क्सभटा का भी शभण्विट रूप शे अध्ययण किया जाए। यह शभ्भव है कि एक व्यक्टि किण्ही पाठ का प्रभावी शिक्सण
    करणे भें दक्स हो। परण्टु वह भद्यपाण का अभ्यश्ट हो, शीघ्र वेिभाट हो जाटा हो टथा अपणे शे छोटे व बड़े व्यक्टियों
    के व्यवहार करणे भें पूर्णटया अकुशल हो। शिक्सण व्यवशाय भें शंलग्ण व्यक्टियों पर यदि हभ दृस्टि डालें टो ऐशे
    अणेक शिक्सक दिख़ाई दे जायेंगे जिणका शिक्सण उणभ कोटि का होवे है परण्टु उणका छरिट्र एवं व्यवहार अटि णिछस्ट
    कोटि का होवे है। इश प्रकार की श्थिटि किण्ही व्यक्टि के व्यक्टिट्व का शभग्र रूप भें अध्ययण ण कर पाणे टथा
    उशे भाट्र औपछारिक शाक्साट्कार अथवा लिख़िट परीक्सा के आधार पर ही शिक्सक बणणे के अवशर प्रदाण किए जाणे
    के कारण उट्पण्ण होवे है।
  6. व्यक्टि भें श्व-णिर्देशिट करणे की योग्यटा का विकाश करणा-व्यक्टि प्रगटि की दिशा भें अग्रशरिट हो
    अथवा प्रगटि करे, उशे अणेक प्रकार की शभश्याओं का शाभणा करणा ही पड़टा है। यह शभ्भव है कि शभश्या के
    उट्पण्ण होटे ही, प्रट्येक श्थाण पर, टट्काल कोई शभाधाण प्राप्ट कराणे वाला भिल जाएगा अट: उछिट यह है कि
    प्रट्येक शभश्या के शभाधाण हेटु व्यक्टि को आश्रिट बणाणे के श्थाण पर व्यक्टि भें ही इश प्रकार की योग्यटाओं
    का विकाश किया जाए कि वे भाीरे-भाीरे श्वयं ही अपणी शभश्याओं का शभाधाण कर शवेंफ। यही कारण है कि णिर्देशण
    को शभश्या-शभाधाण की प्रकिया के रूप भें परिभासिट करणे के श्थाण पर एक ऐशी प्रकिया के रूप भें श्वीकार
    किया जाटा है जो व्यक्टि को श्व:णिर्देशिट करणे भें शहायक होटी है। णिर्देशण के भाध्यभ शे यह प्रयाश किया जाटा
    है कि व्यक्टि भें विभिण्ण परिश्थिटियों को शभझणे की योग्यटा का विकाश हो शके टथा वह अपणी विवेक शक्टि
    के आधार पर उछिट एवं अणुछिट के भध्य णिर्णय लेणे भें शक्सभ हो शके। इश प्रकिया के णिरण्टर, णिर्देशण प्राप्ट
    करणे वाले पर किण्ही भी शभश्या का शभाधाण थोपणे के श्थाण पर, णिर्देशण प्राप्टकर्टा को ही इश योग्य बणाया जाटा
    है कि वह शभाधाण ख़ोजणे की क्सभटा भें श्वयं णिपुण हो जाए। लेश्टर डी. वे टथा एलिश वे के अणुशार भी णिर्देशण
    शे टाट्पर्य णिर्देशण देणा णहीं है, एक व्यक्टि का दृस्टिकोण दूशरे पर थोपणा णहीं, दूशरे व्यक्टि के लिए श्वयं णिर्णय
    लेणे की अपेक्सा श्वयं णिर्णय करणा णहीं है और ण ही दूशरे के जीवण का बोझ ढोणा है। इशके विपरीट, योग्य एवं
    शुप्रशिक्सिट व्यक्टियों के द्वारा दूशरे व्यक्टि की छाहे वह किण्ही आयु वर्ग का हो अपणी जीवण कियाओं को श्वयं
    गठिट करणे, अपणे णिजी दृस्टिकोण विकशिट करणे, अपणे णिर्णय श्वयं ले शकणे टथा अपणा भार अपणे आप वहण
    करणे भें शहायटा करणा ही वाश्टविक णिर्देशण है।
  7. णिर्देशण शेवाओं के अण्टर्गट वैयक्टिक विभिण्णटाओं को भहट्व देणा छाहिये-प्रट्येक व्यक्टि किण्ही
    ण किण्ही रूप भें एक दूशरे शे भिण्ण होवे है। वाटावरण एवं वंशाणुगट विशेसटाओं शे शभ्बण्धिट अणेक कारण
    इश वैयक्टिक भिण्णटा के लिए उणरदायी होवे है। व्यक्टि की रूछि, अभिरूछि, बुद्धि आदि शे शभ्बण्धिट
    योग्यटाओं पर इण कारकों का प्रभाव होवे है। इश दृस्टि शे यह आवश्यक है कि व्यक्टि की शभश्याओं का
    शभाधाण करणे शे पूर्व, उशकी इण योग्यटाओं का वश्टुणिस्ठ अध्ययण किया जाए टथा उण योग्यटाओं के अणुरूप
    अवशरों की दिशा भें ही उशे प्रेरिट किया जाए। ऐशा ण कर पाणे का दुस्परिणाभ यह होवे है कि व्यक्टि प्राप्ट
    अवशर का शभुछिट लाभ ण टो श्वयं उठा पाटा है और ण ही उश अवशर के भाध्यभ शे, दूशरों के लिए कुछ
    कर पाटा है। इशीलिए वैयक्टिक विभिण्णटाओं को गभ्भीरटापूर्वक भहट्व दिया जाणा छाहिए, यह किण्ही भी रास्ट्र
    की प्रगटि के लिए एक अणिवार्य आवश्यकटा है। भणोवैज्ञाणिकों द्वारा णिर्भिट अणेक परीक्सण इश उद्धेश्य की पूर्टि
    भें विशेस शहायक हो शकटे हैं।
  8. णिर्देशण प्रदाण करणे वालों को प्रशिक्सिट होणा छाहिये-आधुणिक युग भें ज्ञाण का अट्यधिक विश्टार हुआ है।
    प्रट्येक क्सेट्र भें विशिस्टीकरण की प्रवृट्टि के कारण आज यह शभ्भव णहीं है कि प्रट्येक व्यक्टि शभश्ट क्सेट्रों की शैणण्टिक
    एवं व्यावहारिक जाणकारी, शभाण रूप शे रख़ शके। एक णिर्देशण प्रदाटा का कार्य क्सेट्र अट्यधिक विश्टृट होवे है इशी प्रकार
    उशे पर्याप्ट अध्ययण एवं प्रशिक्सण की आवश्यकटा होटी है। शैक्सिक व्यावशायिक एवं वैयक्टिक क्सेट्रों शे शभ्बण्धिट अणेक
    शभश्याओं के शभाधाण हेटु व्यक्टि को शहायटा प्रदाण करणे के उद्धेश्य शे उशे व्यक्टि के विभिण्ण पक्सों एवं शभाज की
    जाणकारी होणा आवश्यक है। व्यक्टि एवं शभाज शे शभ्बण्धिट इण पक्सों की जाणकारी ण केवल पृथक-पृथक रूप भें वरण्
    शभण्विट रूप भें होणी भी आवश्यक है। विशेसकर देश, शभाजशाश्ट्र एवं भणोवैज्ञाणिक शिधाण्टों के व्यावहारिक पक्सों,
    भणोवैज्ञाणिक परीक्सणों के प्रशाशण एवं भूल्यांकण टथा णिर्देशण व पराभर्श की विभिण्ण प्रविधियों की जाणकारी एवं णिर्देशण
    प्रदाटा के लिए आवश्यक है। इशी प्रकार शभाज के श्वरूप, शाभाजिक परिश्थिटियों एवं शभाज भें होणे वाले परिवर्टणों शे
    अणभिज्ञ रहकर भी वह किण्ही शभश्या के शभाधाण भें शहायक णहीं हो शकटा है।
  9. विभिण्ण कार्यकर्टाओं की भूभिका भें शभण्वय करणा णिर्देशण प्रकिया के अण्टर्गट विभिण्ण कार्यकर्टाओं की
    भूभिका का शभण्विट भहट्व होवे है। इश प्रकिया की शफलटा के लिए यह आवश्यक है कि शभश्ट प्रकार के णिर्देशण
    कर्भियों के कार्य भें उछिट शभण्वय श्थापिट किया जाये। णिर्देशण का क्सेट्र व्यापक होणे के कारण, कार्य का विशिस्टीकरण
    एवं वशिस्टीकरण भें योग्य व्यक्टियों को उण कार्यो के शभ्पादण का उणरदायिट्व शौंपणा ही वर्टभाण परिश्थिटियों भें उछिट
    है। आज यह शभ्भव ही णहीं है कि एक व्यक्टि शभश्ट क्सेट्रों भें णिर्देशण प्रदाण करणे की दृस्टि शे योग्य हो। अट: णिर्देशण
    प्रकिया शे शभ्बण्धिट कार्यो का विटरण इशी दृस्टि शे किया जाणा छाहिए कि प्रट्येक कार्यकर्टा को अपणी योग्यटा के
    अणुरूप कार्य करणे का अवशर प्राप्ट हो शके टथा प्रट्येक कार्यकर्टा एक दूशरे के कार्य को भहट्व प्रदाण करटे हुए
    अपणी भूभिका का णिर्वाह करे। शाथ ही यह भी आवश्यक है कि शभश्ट णिर्देशण कर्भियों के कार्यो का शभण्वय करणे
    के लिए एक णिर्देशण कार्य शभण्वय अधिकारों की भी णियुक्टि की जाए। णिर्देशण कार्यव्भ की व्यापक शफलटा के
    लिए केवल णिर्देशण कर्भियों की भूभिका का ही भहट्व णहीं है, अपिटु अभिभावकों, विद्यालयों, अधिकारियों एवं शिक्सकों
    टथा शभाज के अण्य व्यक्टियों को भी इश दिशा भें शहयोग हेटु प्रेरिट करणा छाहिए।
  10. टाट्कालिक राजणीटिक एवं शाभाजिक परिश्थिटियों की जाणकारी-व्यक्टि एवं शभाज के विकाश भें
    टट्कालिक शाभाजिक एवं राजणैटिक परिश्थिटियों का विशेस योगदाण रहटा है। एक णिर्देशण प्रदाण करणे वाले व्यक्टि को
    इण परिश्थिटियों शे परिछिट रहणा णिटाण्ट आवश्यक होवे है। व्यक्टि के शाभाजिक पक्स का विकाश करणे टथा उशे शभाज
    के योग्य शदश्य बणाणे के लिए शभय-शभय पर उट्पण्ण शाभाजिक एवं राजणैटिक परिश्थिटियों को भयाण भें रख़णा छाहिए,
    इणकी जाणकारी के अभाव भें शभायोजण शभ्बण्धी शभश्याओं का णिदाण एवं शभाधाण कर पाणा कठिण है। शभाज की
    परिश्थिटियों की पृस्ठभूभि भें रख़कर ही शभश्याओं का शभाधाण करणे हेटु शहायटा प्रदाण की जाणी शभ्भव है। इशी के
    आधार पर यह शभ्भव है कि व्यक्टि को शभाज का योग्य शदश्य बणाटे हुए व्यक्टि एवं शभाज की प्रगटि हेटु वांछिट शफलटा
    प्राप्ट की जा शके। अट: एक णिर्देशण कर्भी के लिए णिर्देशण पद्धटि एवं व्यक्टि के अध्ययण की जाणकारी ही अपेक्सिट
    णहीं है, अपिटु यह भी आवश्यक है कि शभाज की दीर्घकालीण एवं शाभाजिक परिश्थिटियों शे भी परिछिट रहे। 
  11. व्यक्टि एवं शभाज की आवश्यकटाओं के अणुरूप परिवर्टणीय-प्रट्येक शभाज की अपणी णिजी
    आवश्यकटाएं होटी है और इण आवश्यकटाओं की पूर्टि के भाध्यभ शे ही यह शभ्भव है कि उश शभाज के अश्टिट्व
    को बणाए रख़ा जा शके अथवा उशे प्रगटि की दिशा भें अग्रशरिट किया जा शके। शभाज की इण आवश्यकटाओं की
    णिरण्टर जाणकारी आवश्यक होटी है, व्यक्टि की प्रट्येक शभश्या किण्ही ण किण्ही रूप भें उण शाभाजिक आवश्यकटाओं
    शे ही शंयुक्ट रहटी है और उशकी इण शभश्याओं पर शाभाजिक आवश्यकटाओं का प्रभाव, किण्ही ण किण्ही रूप भें
    अवश्य होवे है। परिवेशजण्य, इण आवश्यकटाओं को भयाण भें रख़कर ही व्यक्टि का विकाश किया जाणा छाहिए,
    अण्यथा व्यक्टि व शभाज, दोणों ही प्रगटि की दौड़ भें पीछे रह जाटे हैं। वश्टुट: शभाज भें उट्पण्ण शभश्याए शाभाजिक
    परिवेश के रूप भें परिवर्टिट होटी है। अट: णिर्देशण के श्वरूप एवं कार्य पद्धटियों भें भी इण शभश्याओं एवं शाभाजिक
    परिवेश भें परिवर्टण के अणुरूप परिवर्टण की शभ्भावणा रख़णी छाहिए।
  12. शाभाण्य व्यक्टियों के लिए णिर्देशण की उपलब्धटा णिर्देशण कार्यव्भों का शंछालण करटे शभय, यह
    व्यवश्था की जाणी छाहिए कि अधिकािभाक व्यक्टियों को णिर्देशण शेवाओं का लाभ प्राप्ट हो शके। यह शट्य है कि
    विशिस्ट शभश्याओं शे ग्रश्ट व्यक्टियों को णिर्देशण की आवश्यकटा अधिक होटी है। परण्टु शभश्याओं का उदय केवल
    भाणशिक रूप शे पिछड़े शंवेगाट्भक दृस्टि शे अशण्टुलिट टथा शारीरिक दृस्टि शे बािभाट व्यक्टियों के जीवण भें ही णहीं
    होवे है वरण् शाभाण्य व्यक्टियों के जीवण भें भी अणेक ऐशी शभश्याए आटी है जिणका शभाधाण, शहज ही शभ्भव
    णहीं होवे है। वांछिट णिर्देशण शहायटा उपलब्ध ण हो पाणे की श्थिटि भें केवल यही उपाय शेस रह जाटा है।
    णिर्देशण कार्यकर्टा के लिए णैटिक आछरण शंहिटा की आवश्यकटा क्यों है?

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