न्यायपालिका का अर्थ, परिभाषा, कार्य एवं स्वतन्त्रता

By | February 15, 2021


राजनीतिक शक्ति की स्वेच्छाचारिता से नागरिक स्वतन्त्रताओं व अधिकारों की रक्षा के लिए सभी लोकतन्त्रीय देशों में स्वतन्त्र व
निष्पक्ष न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है। यह सरकार का ऐसा अंग है जो विधायिका और कार्यपालिका को अपने अधिकार
क्षेत्र का अतिक्रमण करने से रोकता है। न्यायपालिका किसी भी सभ्य समाज का आधार है। सभ्य समाज में प्रत्येक नागरिक और
समाज यह आशा करता है कि उसके साथ कोई अन्याय न हो और उसका जीवन सुचारु ढंग से चलता रहे। इसके लिए वह स्वतन्त्र
व निष्पक्ष न्यायपालिका की कामना रखता है। यह निष्पक्ष न्यायपालिका ही कानून का शासन स्थापित करके नागरिक स्वतन्त्रताओं
व अधिकारों की रक्षा करती है और सम्पूर्ण सामाजिक व राजनीतिक जीवन को नियन्त्रित भी रखती है। यह सरकार का तीसरा
अंग होने के नाते शासन की कार्यकुशलता में वृद्धि करने का साधन भी है।

न्यायपालिका का अर्थ व परिभाषा 

साधारण अर्थ में न्यायपालिका सरकार का वह अंग है जिसका प्रमुख कार्य संविधान की व्याख्या करना तथा कानूनों को भंग करने
वालों को दण्ड देना है। इस तरह कानूनों की व्याख्या करने व उनका उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दण्डित करने की संस्थागत
व्यवस्था को न्यायपालिका कहा जाता है। यह उन व्यक्तियो का समूह है जिन्हें न्याय करने का अधिकार प्राप्त है। यह राजनीतिक
प्रक्रिया का एक ऐसा अंग भी है जो सरकार के हाथों में राजनीतिक शक्ति के अत्यधिक केन्द्रीकरण की रोकथाम और लोकतन्त्र
की धांधलियों या बहुमत के निरंकुश शासन से नागरिकों की स्वतन्त्रता व अधिकारों की सुरक्षा करती है। ब्राईस ने इसे राज्य के
लिए एक आवश्यकता ही नहीं, बल्कि उसकी क्षमता से अधिक सरकार की उत्तमता की कसौटी माना है। कुछ विद्वानों ने न्यायपालिका
को निम्न रूप में परिभाषित भी किया है ‘:-

  1. वाल्टन एच0 हेमिल्टन के अनुसार- “न्यायिक प्रक्रिया न्यायधीशों के द्वारा मुकद्मों का निर्णय करने की मानसिक प्रविधि है।”
  2. लास्की के अनुसार-”न्यायपालिका अधिकारियों का ऐसा समूह है, जिसका कार्य, राज्य के किसी कानून विशेष के उल्लंघन
    की शिकायत, जो विभिन्न नागरिकों व राज्य के बीच एक दूसरे के खिलाफ होती है, का समाधान व फैसला करना है।”
  3. रॉले के अनुसार-”न्यायपालिका सरकार का वह अंग है जिसका कार्य अधिकारों का निश्चय और उन पर निर्णय देना,
    अपराधियों को दण्ड देना तथा निर्बलों की अत्याचार से रक्षा करना है।”
  4. ब्राइस के अनुसार-”न्यायपालिका किसी सरकार की उत्तमता को जांचने की कसौटी है।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि न्यायपालिका सरकार का ऐसा अंग है जो सरकार की निरंकुशता से नागरिकों को बचाता है,
कानून की व्याख्या करता है और गलत कार्य करने वालों को दण्ड देता है। गार्नर ने इसे सभ्य समाज का मेरुदण्ड कहा है।

न्यायपालिका का संगठन 

प्रत्येक देश में एक सर्वोच्च न्यायालय तथा उसके अधीन अनेक राज्य व जिला न्यायालय होते हैं। इस त्रिस्तरीय व्यवस्था के बाद
भी देश का सम्पूर्ण न्यायतन्त्र एकरूपता ही दिखाता है। न्यायपालिका संविधान को ही अपना आदर्श मानती है और उसके मूल्यों
को बनाए रखने तथा प्राप्त करने में नागरिकों व सरकार को पूरा सहयोग देती है। दीवानी तथा फौजदारी अभियोगों के लिए
अलग-अलग न्यायालय होते हैं। न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह होती है जो ऊपर सेनीचे की तरफ खुल जाती है।
जैसे-जैसे प्रादेशिक स्तर के केन्द्रीय स्तर की तरफ कदम रखे जाते हैं, वैसे-वैसे यह संख्या कम होती जाती है। राजनीतिक व्यवस्था
की प्रकृति में अन्तर आने पर न्यायपालिका की प्रकृति भी बदल जाती है। प्रत्येक देश में न्यायिक संगठन तो लगभग एक जैसा ही
होता है, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति के अनुसार उनकी कार्यप्रणाली में अवश्य अन्तर आ जाता है। भारत में तो सामान्य
न्यायालय ही हैं, लेकिन फ्रांस में प्रशासकीय व सामान्य दोनों प्रकार के न्यायालय हैं। भारत में लोक-न्यायालयों का नया रूप उभरा
है। भारत तथा अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय पुनरावलोकन की शक्ति से युक्त है, जबकि अन्य देशों में इसका अभाव है। प्रत्येक
देश में सैनिक न्यायालय भी हैं जो स्वतन्त्र क्षेत्रधिकार रखते हैं। आजकल भारत में त्वरित अदालतों की भी व्यवस्था की जा रही
है ताकि नागरिकों को जल्दी न्याय प्राप्त हो सके। भारत में केन्द्र स्तर पर तो सर्वोच्च न्यायालय है जो सारे भारत के लिए है। प्रान्तों
के अपने अलग-अलग न्यायालय हैं। प्रान्तों के अन्दर जिला स्तर पर भी जिला न्यायालयों की व्यवस्था की गई है। दीवानी और फौजदारी
मुकद्दमों के लिए अलग-अलग न्यायालय हैं। अमेरिका में भी न्यायपालिका की भारत की तरह ही त्रिस्तरीय व्यवस्था है।

न्यायधीशों की नियुक्ति एवं कार्यकाल 

प्रत्येक देश में न्यायधीशों की नियुक्ति के तरीके व कार्यकाल भिन्न-भिन्न हैं। न्यायधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा, व्यवस्थापिका
द्वारा व जनता द्वारा निर्वाचित करने पर जोर दिया जाता है। इसके अन्तर्गत न्यायधीशों की योग्यता व सेवाकाल को ध्यान में रखा
जाता है। भारत में यही पद्धति प्रचलित है। लेकिन इसमें प्रमुख दोष यह है कि इसमें राजनीतिक दलबन्दी का शिकार न्यायपालिका
हो सकती है। अमेरिका में भी यही प्रणाली प्रचलित है। वहां यह न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। अमेरिका के कुछ
राज्यों में न्यायधीश विधानमण्डल द्वारा भी चुने जाते हैं। रूस में भी सुप्रीम सोवियत निम्न न्यायालयों को छोड़कर शेष सभी न्यायालयों
में न्यायधीशों की नियुक्ति निश्चितकाल के लिये करती है। इस व्यवस्था में भी दलीय गुटबन्दी का दोष है। यह व्यवस्था भी
कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति की तरह ही है। स्विटजरलैंड में न्यायधीशों का चुनाव जनता द्वारा ही किया जाता है। आजकल भारत
जैसे लोकतन्त्रीय देश में न्यायिक लोक सेवा से भी पदोन्नति या चयन द्वारा न्यायधीशों की नियुक्ति होने लगी है। यह प्रणाली नियुक्ति
की सर्वोत्तम प्रणाली मानी जाती है। सभी देशों में न्यायधीशों का कार्यकाल लगभग 60 वर्ष के आसपास ही पाया जाता है। न्यायध्
ाीशों को समय से पहले हटाने के लिए महाभियोग की व्यवस्था भी अनेक देशों के संविधानों में की गई है। भारत, अमेरिका, इंग्लैण्ड
तथा कनाडा में न्यायधीशों का कार्यकाल उनके सदाचार व संविधानिक प्रावधानों पर निर्भर है।

न्यायपालिका के कार्य

न्यायपालिका किसी भी सरकार का प्रकाश स्तम्भ है। राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति ही इसके कार्यों की नियामक होती है।
संघात्मक शासन-प्रणालियों में तो यह संतुलक का काम करती है। कानून व संविधान की व्याख्याकार होने के नाते यह नागरिक
स्वतन्त्रता व अधिकारों का सुरक्षा कवच मानी जाती है। लार्ड ब्राइस ने इसे अच्छे शासन की कसौटी कहा है। गार्नर ने भी कहा
है कि यदि न्याय विभाग न हो तो सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता। न्यायपालिका आधुनिक सभ्य समाज का आधार स्तम्भ
है। न्यायपालिका ही हमें सरकार की निरंकुशता से बचाती है। किसी भी देश में न्यायपालिका के कार्य हो सकते हैं :-

न्याय करना 

न्यायपालिका का प्रमुख कार्य न्याय करना है। जो व्यक्ति कानूनों का उल्लंघन करता है, उसे
कार्यपालिका द्वारा पकड़कर न्यायालयों के सामने पेश किया जाता है। न्यायपालिका फौजदारी और दीवानी दोनों प्रकार के
मुकद्दमों में न्याय करती है। दीवानी झगड़े प्राय नागरिकों के बीच में होते हैं, जबकि फौजदारी मुकद्दमों में एक तरफ सरकार
तथा दूसरी तरफ नागरिक होते हैं। गवाही के आधार पर न्यायपालिका सभी झगड़ों में कानून के अनुसार अपराधी को उचित
दण्ड देती है और प्रभावित व्यक्ति के साथ न्याय करती है।

कानून की व्याख्या करना 

न्यायपालिका कार्यपालिका तथा विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों की
व्याख्या करती है। कई बार कानून अस्पष्ट व संविधान के विरूद्ध होते हैं। उनकी व्याख्या किए बिना उनको लागू करने का
अर्थ होगा – मानव अधिकार व स्वतन्त्रताओं पर कुठाराघात। न्यायपालिका ही सर्वोच्च शक्ति की स्वामी होने के नाते ऐसे
कानूनों की अन्तिम व्याख्याकार होती है। भारत तथा अमेरिका में न्यायपालिका को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि कोई कानून
स्पष्ट न हो तो न्यायधीश अपनी बुद्धि, विवेक और नैतिकता के आधार पर निर्णय दे। न्यायालयों द्वारा कानूनों के स्पष्टीकरण
के लिए दी गई व्याख्याएं सामान्य कानूनों की तरह ही महत्वपूर्ण होती हैं। निर्णयमूलक कानून के रूप में ये कानून भी संविधान का अंग बन जाते हैं।

संविधान की रक्षा करना 

संविधान की प्रमुख संरक्षक भी न्यायपालिका ही होती है। संविधान की मर्यादा और पवित्रता को बचाए रखने के लिए वह विधायिका तथा कार्यपालिका द्वारा निर्मित कानूनों को संविधान
के विरुद्ध होने पर असंवैधानिक घोषित कर सकती है। भारत तथा अमेरिका में न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन का
अधिकार प्राप्त है। इसके तहत वह संविधान की निष्पक्षता व प्रभावशीलता को बनाए रखने के लिए असंवैधानिक निणयों को
पलट देती है। अत: न्यायपालिका संविधान की रक्षक भी है।

नागरिक अधिकारों व स्वतन्त्रताओं की रक्षा

प्रत्येक देश में
न्यायपालिका ही नागरिक स्वतन्त्रता व अधिकारों की रक्षक मानी जाती है। न्यायपालिका इनकी रक्षा के लिए सरकार को
निरंकुशता को रोकती है और किसी भी नागरिक या संस्था द्वारा मौलिक अधिकारों को हानि पहुंचाने के प्रयास में दण्डित
करती है। इनकी सुरक्षा के लिए वह न्यायादेश भी जारी कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों व स्वतन्त्रता को
कोई हानि पहुंचती है तो वह न्यायपालिका की शरण ले सकता है। मौलिक अधिकारों की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए
न्यायपालिका कार्यपालिका तथा विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों को भी अवैध घोषित करने का अधिकार रखती है। अत:
न्यायपालिका नागरिक स्वतन्त्रता व अधिकारों का सुरक्षा कवच है।

संघ की संरक्षक – 

संघात्मक शासन प्रणाली वाले देशों में केन्द्र व राज्यों में शक्तियों का
विभाजन होने के कारण उनके शक्तियों के प्रयोग तथा व्याख्या को लेकर आपसी झगड़े होने की संभावना अधिक होती है।
इन झगड़ों का निपटारा न्यायपालिका ही करती है। शक्ति विभाजन की उचित व्याख्या संविधान के अन्तर्गत न्यायपालिका ही करती
है औ राज्य व केन्द्र को अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करने से रोकती है। इस तरी वह संघ की संरक्षक भी मानी जाती है।
संघात्मक शासन प्रणाली वाले देशों में जो न्यायपालिका की केन्द्र व राज्यों के विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका है।

सलाहकारी कार्य –

कई देशों में न्यायपालिका सरकार को परामर्श भी देती है। लेकिन न्यायपालिका
की सलाह मानना या न मानना सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है। इसके लिए न्यायपालिका सरकार को बाध्य नहीं कर
सकती। इंग्लैण्ड में सलाहकारी भूमिका ने न्यायपालिका का अधिक सम्मान बढ़ाया है। भारत में भी राष्ट्रपति ने कई मामलों
में सर्वोच्च न्यायालय की सलाह ली है। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर केन्द्र सरकार ने कई बार सर्वोच्च न्यायालय
की ही सलाह ली है। कनाडा, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, पनामा आदि में भी न्यायपालिका की सलाह ली जाती है।

राजनीतिक व्यवस्था को स्थायित्व व शांति कायम रखना – 

राजनीतिक व्यवस्था में विघटनकारी ताकतों के विरुद्ध न्यायपालिका ही कड़ा रुख अपनाती है। जो व्यक्ति या संस्था
राजनीतिक व्यवस्था के स्थायित्व से छेड़छाड़ करता है, वह देशद्रोह का अपराधी माना जाता है। सरकार का तीसरा अंग होने
के नाते राजनीतिक स्थायित्व को कायम रखने का प्रमुख उत्तरदायित्व न्यायपालिका का ही बनता है। न्यायपालिका ही सरकार
के कार्यों को औचित्यता प्रदान करके सरकार के प्रति जनता का विश्वास कायम रखती है। इसके लिए न्यायपालिका विधायिका
व कार्यपालिका के कानूनों की जांच-परख करती रहती है। न्यायिक सक्रियतावाद के माध्यम से आज न्यायपालिका जनहित
के कार्य भी करने लगी है। इससे राजनीतिक स्थायित्व में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक स्थायित्व के लिए देश
में शांति कायम रखने में न्यायपालिका ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके लिए वह पुलिस व सेना तक की मदद लेती
है। कानून का शासन लागू रखने के लिए न्यायपालिका अपराधी को उसके अपराध के अनुसार ही दण्ड देती है। अत:
राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व तथा समाज में शान्ति कायम रखने में भी न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

प्रशासनिक कार्य –

न्यायपालिका को अपना प्रशासन चलाने के लिए अधीनस्थ कर्मचारी वर्ग
को भी आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए वह स्थानीय पदाधिकारियों और अधीनस्ाि कर्मचारियों की नियुक्ति करती है जो
प्रशासन में न्यायपालिका का सहयोग करते हैं और सभी आवश्यक कागजात व अभिलेख सुरक्षित रखते हैं ताकि आवश्यकता
पड़ने पर उन्हें न्यायपालिका को उपलब्ध कराया जा सके।

अन्य कार्य –

उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त भी न्यायपालिका अनेक दूसरे महत्वपूर्ण कार्य भी करती है।
सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रन्यासियों ;ज्तनेजममेद्ध को नियुक्त करना, अल्पव्यस्कों के संरक्षकों को नियुक्त करना, वसीयतनामे तैयार
करना, मृतक व्यक्तियों की सम्पत्ति का प्रबन्ध करना, नागरिक विवाह की अनुमतिदेना, विवाह विच्छेद की अनुमति देना, शस्त्र
लाईसैंस जारी करना, निर्वाचन सम्बन्धी अपीलें सुनना, उच्च अधिकारियों को शपथ दिलवाना आदि कार्य भी न्यायपालिका द्वारा
ही सम्पन्न किए जाते हैं।

    उपरोक्त विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि न्यायपालिका नागरिक अधिकारों व स्वतन्त्रता का रक्षक है। संविधान की व्याख्याकार
    होने के नाते वह सरकार के अन्य दो अंगों पर नियन्त्रण रखने का प्रभावी साधन भी है। न्यायिक पुनरावलोकन द्वारा न्यायपालिका
    ने जो शक्ति अर्जित की है, उससे उसका जनहितकारी स्वरूप उभरा है। आज न्यायिक सक्रियतावाद के द्वारा न्यायपालिका करोड़ों
    व्यक्तियों के दिल की धड़कन बन गई है। भारत में न्यायपालिका राजनीतिक शक्ति से त्रस्त लोगों के लिए प्रकाश पुंज का कार्य
    करती है। अनेक राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं पर सरकारें न्यायपालिका से ही सलाह करती हैं ताकि संविधान व कानून की मर्यादा
    का उल्लंघन न हो और देश में शांति कायम रहे। ब्राइस का यह कथन सर्वथा सही है कि न्यायपालिका ही शासन की उत्तमता जांचने
    की कसौटी है। आज न्यायपालिका को समाज में जो स्थान प्राप्त है, वह कार्यपालिका या विधायिका को नहीं। आज केवलमात्र जनता
    के लिए दु:ख की घड़ी में न्याय प्राप्त करने के लिए न्यायपालिका ही एकमात्र आशा की किरण है।

    न्यायपालिका की स्वतन्त्रता 

    न्यायपालिका राजनीतिक प्रक्रिया का एक ऐसा अंग है जो सरकार या राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग से नागरिक स्वतन्त्रता व अक्तिाकारों को बचाता है। इसी कारण स्वयं न्यायपालिका का भी निष्पक्ष व स्वतन्त्र रहना आवश्यक है ताकि उसके कारण जनता को
    कोई कष्ट न हो और नागरिक स्वतन्त्रता व अधिकारों की रक्षा के काम में उसे कोई बाधा न आए। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता
    लोकतन्त्र की सफलता का मूलाधार है। संघात्मक तथा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वाले देशों के साथ-साथ एकात्मक सरकारों या
    तानाशाही शासन व्यवस्था वाले राज्यों में भी न्यायपालिका की स्वतन्त्रता बहुत आवश्यक है। हैमिल्टन ने लिखा है- “किसी भी देश
    का कानून कितना ही अच्छा क्यों न हो, एक स्वतन्त्रत और निष्पक्ष न्याय विभाग के बिना प्राणहीन है।” संघीय शासन प्रणालियों में
    तो न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्व और भी अधिक होता है। केन्द्र व राज्यों के झगड़े निष्पक्ष व स्वतन्त्रत न्यायपालिका ही
    सही ढंग से सुलझा सकती है। गार्नर ने न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को आवश्यक बताते हुए लिखा है-”यदि न्यायधीशों में प्रतिभा,
    सत्यता और निर्णय देने की स्वतन्त्रता न हो तो कार्यपालिका का समस्त ढांचा खोखला प्रतीत होगा और ऊँचे लक्ष्य की सिद्धि नहीं
    होगी जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है।” इसी कारण राजनीतिक व्यवस्था के स्थायित्व और देश में शांति कायम रखने
    के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र व निष्पक्ष होना जरूरी है।

    न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ

    न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से हमारा तात्पर्य है कि न्यायधीश अपना निर्णय देते समय अपने विवेक से काम लें और बाहरी दबावों
    से मुक्त रहें, अर्थात् कार्यपालिका तथा विधायिका के हस्तक्षेप से मुक्त रहें। सी0एफ0 स्ट्रांग ने न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को
    परिभाषित करते हुए लिखा है-”न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायधीशों में भ्रष्टाचार नहीं होना चाहिए और उन पर
    विधानमण्डल तथा कार्यकारिणी का नियन्त्रण नहीं होना चाहिए।” न्यायपालिका की स्वतन्त्रता ही न्यायिक निष्पक्षता का आधार है।
    इस प्रकार न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ – न्यायधीशों को कानूनों की व्याख्या करने में और न्याय प्रदान करने में अपने विवेक
    का निर्बाध प्रयोग करने, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के प्रभावों व शक्तियों से, राजनीतिक दलों व अन्य किसी प्रकार के
    राजनीतिक या गैर-राजनीेतिक संगठन तथा समूह या व्यक्ति विशेष के प्रभाव से बचाना है।

    न्यायपालिका की स्वतन्त्रता स्थापित करने के तरीके

    न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए अनेक देशों में अलग-अलग साधन अपनाए जाते हैं। आज लोकतन्त्रीय देशों में विशेष
    तौर पर कुछ ऐसे तरीके अपनाए गए हैं कि न्यायपालिका की स्वतन्त्रता या तो स्थापित हो चुकी है या स्थापित होने की दिशा में
    अग्रसर हैं। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता इन बातों पर निर्भर है :-

    1. न्यायधीशों की नियुक्ति के तरीके – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता इस बात पर भी
      निर्भर करती है कि न्यायधीशों की नियुक्ति किस आधार पर की जाती है। आज प्राय: इसके लिए चार तरीके प्रचलित हैं
      – (i) कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति (ii) विधायिका द्वारा चुनाव (iii) जनता द्वारा चुनाव (iv) न्याययिक लोक सेवा आयोग द्वारा
      परीक्षा प्रणाली के माध्यम से नियुक्ति। इन तरीकों में कार्यपालिका तथा विधायिका द्वारा नियुक्ति करने से न्यायधीश राजनीतिक
      रूप से तटस्थ नहीं रह सकते। जनता द्वारा नियुक्ति करने से भी कई बार चालाक राजनीतिक भी जनता को झांसा देकर
      न्यायपालिका में पहुंच सकते हैं। भारत में न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति योग्यता के आधार पर ही करता है। लेकिन
      न्यायधीशों की नियुक्ति यदि योग्यता के आधार पर न्यायिक लोक सेवा आयोग के माध्यम से की जाए तो न्यायधीशों के स्वतन्त्र
      व निष्पक्ष रहने के आसार सबसे अधिक हो सकते हैं। भारत में राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति मुख्य
      न्यायधीश की सलाह से ही वरिष्ठता व योग्यता के आधार पर करता है। उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों की नियुक्ति भी वह
      मुख्य न्यायधीश की सलाह से ही करता है। इस तरह न्यायधीशों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर मुख्य कार्यपालक या
      न्यायिक लोक सेवा आयोग द्वारा करने से ही न्यायपालिका स्वतन्त्र रह सकती है।
    2. न्यायधीशों की कार्यकाल –  न्यायपालिका की स्वतन्त्रता न्यायधीशों के सेवाकाल पर भी निर्भर
      करती है। छोटा सेवा काल न्यायधीशों को लालच के गर्त में धकेल सकता है। इसलिए उनकी सेवा अवधि लम्बी होनी चाहिए।
      लम्बे सेवाकाल में न्यायधीशों को अपने कार्य का अनुभव भी हो जाता है और उन्हें नौकरी की सुरक्षा की गारन्टी भी मिल
      जाती है तथा उनके भ्रष्टाचार की ओर उन्मुख होने के आसार कम हो जाते हैं। इसी कारण भारत में न्यायधीशों को नौकरशाहों
      की तरह स्थायी आधार पर निश्चित समय के लिए लम्बे काल तक नियुक्त किया जाता है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय के
      न्यायधीश 65 वर्ष तक उच्च न्यायालय के न्यायधीश 62 वर्ष तक अपने पद पर रहते हैं। इंग्लैण्ड में कदाचार से बचे रहने पर
      जीवन पर्यन्त वे अपने पद पर बने रहते हैं।
    3. न्यायधीशों की पदच्युति – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता न्यायधीशों को पद से हटाने की व्यवस्था
      पर भी निर्भर करती है। भारत, अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में न्यायधीशों को दुराचार का महाभियोग लगाकर ही हटाया जा सकता
      है। यह प्रक्रिया इतनी कठिन है कि सामान्य परिस्थितियों में इसका प्रयोग करना असम्भव है। इस कठिन प्रक्रिया के कारण
      वहां पर न्यायपालिका की स्वतन्त्रता मजबूत हुई है। भारत में न्यायधीशों को तभी हटाया जा सकता है, जब संसद के दोनों
      सदन कदाचार का अभियोग पास करके राष्ट्रपति को लिखित रूप में न्यायधीश को हटाने की मांग करें।
    4. न्यायिक व्यवहार – जिस देश में न्यायधीश निष्पक्ष, योग्य, विद्वान, सद्चरित्र और गुणदान है, वहां पर
      न्यायपालिका की स्वतंत्रता की स्थापना आसानी से हो सकती है। निष्पक्ष न्यायिक व्यवहार ही न्यायपालिका के आधार को
      मजबूत बना सकता है। जिस देश में न्यायिक व्यवहार जनता का उत्पीड़क व वर्ग विशेष के हितों का पोषक हो, उससे निष्पक्षता
      व स्वतन्त्रता की आशा करना बेकार है।
    5. न्यायधीशों का वेतन व अन्य सुविधाएं – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता व
      निष्पक्षता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायधीशों को पद की गरिमा के अनुसार जीवन यापन करने के लिए अच्छे वेतन
      व भत्ते मिले। भारत में न्यायधीशों को अच्छा वेतन, भत्ते व सुविधाएं इसी कारण दी जाती हैं ताकि वे निष्पक्ष व स्वतन्त्र ढंग
      से अपना कार्य करते रहें। रिटायरमैंट के बाद उन्हें पैंशन भी दी जाती है और उनको वकालत करने पर भी प्रतिबन्ध है।
    6. न्यायपालिका का कार्यपालिका तथा विधायिका से पृथक्करण – न्यायपालिका को स्वतन्त्रता प्रदान करने के लिए उसे कार्यपालिका तथा विधायिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखना
      भी जरूरी है। साथ में राजनीतिक शक्ति का विभाजन भी बहुत आवश्यक है। यदि सारी शासन शक्ति एक व्यक्ति या संस्था
      के हाथों में होगी तो न्याय की हत्या होगी, क्योंकि समसत शक्तियों का स्वामी होने के नाते कोई भी व्यक्ति या संस्था पथभ्रष्ट
      हो सकती है। इसी कारण अमेरिका में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त अपनाकर न्यायपालिका को कार्यपालिका तथा
      विधायिका के नियन्त्रण से मुक्त रखा गया है। भारत में भी न्यायपालिका कई तरह से स्वतन्त्र ही है। उस पर कार्यपालिका
      तथा विधायिका का कोई नियन्त्रण नहीं है।
    7. न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति – न्यायपालिका को स्वतन्त्र बनाए रखने के लिए उसके पास
      न्यायिक समीक्षा की शक्ति भी होनी चाहिए। भारत तथा अमेरिका को अपनी इसी शक्ति के कारण न्यायपालिका कार्यपालिका तथा
      विधायिका के संविधान विघटित कानूनों को जो नागरिक स्वतन्त्रताओं का हनन करते हैं, अवैध घोषित कर सकती है। न्यायपालिका
      ने अपनी इस शक्ति का कई बार प्रयोग किया है। इसी कारण आज न्यायिक सर्वोच्चता का सिद्धान्त कायम हो चुका है। 

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए न्यायधीशों की नियुक्ति के तरीके पारदश्र्ाी व योग्यता प्रणाली
    पर आधारित होने चाहिए। उनका कार्यकाल लम्बा हो और उन्हें अच्छा वेतन व सुविधाएं प्रदान की जाएं। उसे निष्पक्ष बनाए रखने
    के लिए कार्यपालिका तथा विधायिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए। उनको हटाने का तरीका इतना जटिल हो कि न्यायपालिका
    की स्वतन्त्रता पर कोई आंच न आ सके। लेकिन ये सब बातें लोकतन्त्र में ही सम्भव हैं, तानाशाही देशों में नहीं। आज शासन का
    एक अंग होने के नाते न्यायपालिका को स्वतन्त्र व पृथक अस्तित्व प्रदान करने पर अनेक विद्वान आपत्ति करते हैं। उनका कहना
    है कि राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रखकर न्यायपालिका से लाभ की आशा नहीं की जा सकती। लेकिन यह बात तो सत्य है कि
    आज के बदलते परिवेश में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता पहले से अधिक जरूरी है। आज राजनीतिक शक्ति का फैलाव राजनीतिक
    समाज की जड़ों तक है, जिसका सीधा प्रभाव आम जनता पर पड़ता है। इसलिए राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए
    तथा आम नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र व निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है। आज
    राजनीतिक शक्ति से त्रस्त लोगों के लिए न्यायपालिका ही एकमात्र आशा की किरण है। न्यायपालिका को स्वतन्त्रता-विहीन करने
    का तात्पर्य होगा – समाज में अराजकता व अशान्ति।

    विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में अन्तर्सम्बन्ध

    आज का युग कल्याणकारी सरकारों का युग है। आज आर्थिक विकास व राजनीतिक स्थायित्व का प्रश्न विकासशील देशों को कचोट
    रहा है। ऐसी अवस्था में शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त लागू करके सरकार के तीनों अंगों को एक दूसरे का विरोधी बनाना प्रासंगिक
    नहीं है। व्यवहार में कार्यपालिका और विधायिका की पारस्परिक निर्भरता को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। आज यह कहना
    बिल्कुल गलत है कि सरकार का कौन सा अंग अधिक महत्वपूर्ण है ? इसी कारण राबर्ट सी0. बोन ने संसदीय तथा अध्यक्षात्मक
    शासन व्यवस्थाओं में कार्यपालिका तथा विधायिका के सहमिलन की बात पर जोर दिया है। लेकिन अनेक विद्वान इस बात पर भी
    जोर देने लगे हैं कि व्यवस्थापिका के कार्यों का हास हुआ है और कार्यपालिका की शक्तियां बढ़ी हैं। यदि कार्यपालिका तथा
    विधायिका की शक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो कार्यपालिका को अधिक शक्तिशाली बना दिया है। लेकिन हमें यह
    नहीं भूलना चाहिए कि व्यवस्थापिकाएं भी आज नई नई भूमिकाएं अदा कर रही हैं। आज कार्यपालिका, विधायिका तथा
    न्यायपालिकाएं कार्य करने लगी हैं जो पहले उनके द्वारा नहीं किए जाते थे। उनके शक्ति संतुलन की बात करने की बजाय उनके
    द्वारा राजनीतिक व्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए किए जाने वाले कार्यों पर चर्चा करना अधिक प्रासंगिक होगा। आज
    मुख्य विवाद कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के बीच न होकर राजनीतिक शक्ति के दुरुपयोग को लेकर है।

    कार्यपालिका,
    विधायिका व न्यायपालिका राजनीतिक शक्ति के रूप में जन इच्छा को अमली जामा पहनाने वाली संस्थाएं हैं। कार्यपालिका
    तो विधायिका की इच्छा का संचालन करती हैं और विधायिका, कार्यपालिका को अपनी इच्छा बताती है। संसदीय शासन प्रणाली
    वाले देशों में तो इन दोनों में पारस्परिक निर्भरता बहुत अधिक होती है। इसमें कार्यपालिका विधानमण्डल की कृपा पर ही कार्य
    करती है। यदि उसके खिलाफ संसद में अविश्वास का मत प्रापत हो जाए तो उसे त्यागपत्र देना पड़ सकता है। लेकिन यदि संसदीय
    सरकार में प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालक के रूप में सरकार को विचार करने के लिए नाममात्र के कार्यपालक राष्ट्रपति को प्रार्थना
    करे तो कार्यपालिका के साथ-साथ विधायिका भी भंग हो जाती है। इसलिए संसदीय देशों में कार्यपालिका तथा विधायिका में आपस
    में गहरा सम्बन्ध होता है। यहां पर नाममात्र व वास्तविक कार्यपालिका में भेद होने के कारण कार्यपालिका तथा विधायिका का आपस
    में पड़ने वाले प्रभाव का पता लगाना कठिन होता है। अध्यक्षात्मक देशों में शक्तियों के पृथक्करण के कारण कार्यपालिका, विधायिका
    तथा न्यायपालिका की स्वतन्त्र भूमिकाओं का पता लगाना आसान होता है। सर्वसत्ताधिकारवादी देशों में तो ये तीनों अंग आपस में
    इस तरह गुंथे होते हैं कि उनको अलग-अलग पहचानना कठिन होता है। उनमें शक्तियों का केन्द्रीयकरण ही सरकार के तीनों अंगों
    के सम्बन्धों का निर्धारक होता है। संसदीय तथा अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों में न्यायपालिका को शेष दोनों अंगों से कुछ पृथक
    सा अस्तित्व प्रदान किया जाता है ताकि विधायिका और कार्यपालिका में शक्ति के प्रयोग को लेकर होने वाले टकराव को रोका
    जा सके। वास्तव में कार्यपालिका और विधायिका तो जन इच्छा को अमली रूप देती है और न्यायपालिका इस कार्य में उनकी
    मदद करती है। आज प्रदत व्यवस्थापन की व्यवस्था न तो कार्यपालिका तथा विधायिका को काफी निकट ला दिया है और न्यायिक
    शक्ति ने उनके कार्यों को औचित्यपूर्ण बनाने में सहयोग दिया है। आज समस्या विधायिका और कार्यपालिका के बीच टकराव की
    न होकर नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव की है, जिससे कार्यपालिका व विधायिका दोनों चिन्तित हैं।

    यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो प्रजातन्त्र में सर्वोच्च शक्ति व्यवस्थापिका में ही निहित रहती हैं। विधि-निर्माण के साथ-साथ
    विधानपालिका, कार्यपालिका पर नियन्त्रण भी रखती है। वह प्रश्नों, वाद-विवाद, मन्त्रिमण्डलीय नीति की आलोचना, नीति को
    अस्वीकृत करने, कटौती प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव आदि विधियों से कार्यपालिका पर अपना दबाव
    बनाने का प्रयास करती रहती है। अध्यक्षात्मक शासन प्रणालियों में भी व्यवस्थापिका शक्ति पृथक्करण के बावजूद भी कार्यपालिका
    पर नियन्त्रण स्थापित करने का प्रयास करती है। इनके लिए वह अनुमानित बजट को स्वीकृति देती है; नीति पर भी व्यापक
    वाद-विवाद के बार स्वीकृति देती है; राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों पर जांच आयोग नियुक्त कर सकती है; विभागीय कार्यों सम्बन्ध्
    ाी मांगों पर विस्तृत स्वीकृति देती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कार्यपालिका, विधायिका के हाथ की कठपुतली है। आज दलीय
    व्यवस्था के कारण स्थिति काफी पलट गई है। जब तक मन्त्रिमण्डल का संसद में बहुमत है तब तक संसद मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण करने
    की नहीं सोच सकती। दलीय बहुमत कार्यपालिका को स्वामी बना देता है। वह अपने दलीय बहुमत के कारण ही अपनी नीति और कार्यों
    पर संसदीय स्वीकृति प्राप्त करने में सफल रहती है। सरकार का दलीय बहुमत विरोधी दल की इच्छा को भी धूल में मिला देता है। संसदीय
    व्यवस्था में संसद के अधिवेशनों के समय, उसमें किए जाने वाले कार्यों, उसका अवसान व विघटन सभी कार्य मन्त्रीमण्डल (कार्यपालिका)
    ही निश्चित करता है। इस प्रणाली में यदि संसद को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा मन्त्रिमण्डल का अस्तित्व नष्ट करने की छूट है तो मन्त्रिमण्डल
    को भी वह अधिकार है कि वह निम्न सदन को भंग कराकर नए चुनाव करा सकता है। इसलिए विधायिका और कार्यपालिका पारस्परिक
    सामंजस्य बनाए रखने का ही प्रयास करते हैं। इसी तरह वित्तीय क्षेत्र में भी वास्तविक शक्ति कार्यपालिका के पास ही है। मन्त्रीमण्डल ही
    बजट तैयार करवाता है, उसे पारित करवाता है और लागू करता है तथा समस्त आर्थिक नियोजन पर अपना नियन्त्रण रखता है। वित्त पर
    संसदीय नियंत्रण तो नाममात्र का है। संसद तो केवल वित्त विधेंयक की आलोचना ही कर सकती है, न कोई नया कर लगा सकती है और
    न ही खर्चे की सीमा में वृद्धि कर सकती है। इस प्रकार कार्यपालिका विधायिका से भारी पड़ती है। अध्यक्षात्मक देशों में कार्यपालिका और
    विधायिका की पृथक शक्तियां होने के बावजूद भी दोनों का आपस में सम्बन्ध बना रहता है।

    विधायिका और कार्यपालिका के बाद न्यायपालिका की बारी आती है। न्यायपालिका इन दोनों से सर्वोच्च व स्वतन्त्र मानी जाती
    है। न्यायपालिका को भारत तथा अमेरिका की शासन प्रणालियों में यह अधिकार है कि वह कार्यपालिका तथा विधायिका के असंवैधानिक निर्णयों व कानूनों को अवैध घोषित कर दे। इस न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति द्वारा न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा
    विधायिका पर अपना नियन्त्रण कायम रखने में सफल रहती है। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों तथा नागरिक स्वतन्त्रताओं की रक्षा
    करके, अपराधिक तत्वों पर रोक लगाकर, कानूनों की व्याख्या करके कार्यपालिका तथा विधायिका दोनों के काम को आसान बना
    देती है। कई बार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सरकार न्यायपालिका से परामर्श भी लेती है। इसी तरह न्यायपालिका कार्यपालिका तथा
    विधायिका के अतिक्रमण से नागरिकों की रक्षा भी करती है। लेकिन कई बार संसदीय शासन प्रणाली में संसद की सर्वोच्चता के
    कारण विधायिकाएं तथाा कार्यपालिकाएं न्यायिक निर्णयों को पलट देती हैं और संविधान में संशोधन का नया अध्याय जोड़ देती है। इससे
    न्यायिक सर्वोच्चता व स्वतन्त्रता में कमी आती है। लेकिन ऐसा सदा नहीं होता। संसद न्यायधीशों के वेतन व भत्ते भी निर्धारित करती है।
    आवश्यकता पड़ने पर उन सुविधाओं में कटौती भी कर सकती है। इस तरह न्यायपालिका और अन्य दोनों अंगों में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

    उपरोक्त विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका सरकार के प्रमुख अंग हैं। इनके आपसी
    सहयोग के बिना कोई भी सरकार अपने उद्देश्यों में कामयाब नहीं हो सकती। इन अंगों के पारस्परिक सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध ही सरकार
    को सफलता दिला सकते हैं। इसी आवश्यकता को महसूस करते हुए आज कार्यपालिका तथा विधायिका में सामंजस्यपूर्ण ढंग से
    कार्य करने के तरीकों पर विचार किया जाने लगा है। संसदीय सरकारों की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह लोकतन्त्र
    के समानता व सहयोग के आदर्श पर चले और न्यायपालिका के आदेशों व निर्णयों का सम्मान करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *