पर्यावरण किसे कहते हैं?

By | February 15, 2021


पर्यावरण शब्द ‘परि’ एवं ‘आवरण’ से मिलकर बना है। परि का अर्थ चारों ओर व आवरण का अर्थ घेरा होता है अर्थात् हमारे चारों ओर जो कुछ भी दृश्यमान एवं अदृश्य वस्तुएँ हैं, वही पर्यावरण है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि हमारे आस-पास जो भी पेड़-पौधें, जीव-जन्तु, वायु, जल, प्रकाश, मिट्टी आदि तत्व हैं वही हमारा पर्यावरण है। भारतीय वाड़्मय में आधुनिक पर्यावरण के स्थान पर ‘प्रकृति’ तथा ‘सृष्टि’ जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता है। प्रकृति तथा सृष्टि शब्द वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पर्यावरण से अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है। भारतीय मनीषा प्राचीन काल से ही प्रकृति प्रधान रही हैं इसलिए हमारे ग्रन्थों में जल, वायु, अग्नि, वृक्ष, जीव एवं भूमि की पूजा पर बल दिया गया है। ‘सृष्टि’ मूलत: चार घटकों- अण्डज, पिण्डज, स्वेदज और उद्भिज के लिए प्रयुक्त है। वस्तुत: ये चारों घटक सृष्टि के चैतन्य तत्व हैं। इस दृष्टि से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि आधुनिक पर्यावरण शब्द मात्र उद्भिज से ही सम्बन्धित प्रतीत होता है। 

कुछ पर्यावरण शास्त्री पिण्डज अर्थात् वन्य जन्तु तथा मानव को पर्यावरण का मूल मानते हैं। यह अस्तित्ववादी सोच का परिणाम है जिसमें मनुष्य को ‘योग्यतमावशेष’ के अनुसार सर्वोपरि माना गया है। अपने स्वार्थों के लिए मानव ने उद्भिज एवं पिण्डज अर्थात् पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तुओं का अन्धाधुन्ध दोहन एवं शोषण किया है, जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है क्योंकि स्वस्थ एवं सामान्य सृष्टिक्रम का अर्थ है- अण्डज, पिण्डज, स्वदेज एवं उद्भिज तत्वों का पारस्परिक संतुलन, संवर्द्धन एवं सह-अस्तित्व।

पर्यावरण की परिभाषा

पर्यावरण से क्या तात्पर्य है? इसे समझने के लिए विभिन्न विद्वानों एवं लेखकों द्वारा पर्यावरण के बारे में क्या परिभाषा दी गई है इसे समझना होगा।

डगलस व हालैण्ड के अनुसार- ‘‘पर्यावरण या वातावरण वह शब्द है, जो समस्त बाह्य शक्तियों, प्रभावों और परिस्थितियों का सामूहिक रूप से वर्णन करता है, जो जीवधारी के जीवन, स्वभाव, व्यवहार और अभिवृद्धि, विकास तथा प्रौढ़ता पर प्रभाव डालता है।’’ इस प्रकार जो कुछ भी हमारे चारों ओर स्थित है और जो हमारे रहन-सहन की दशाओं तथा मानसिक क्षमताओं को प्रभावित करता है, वही पर्यावरण कहलाता है तथा वह शिक्षा जो हमें पर्यावरण का ज्ञान कराती है उसे ‘पर्यावरण शिक्षा’ कहते हैं।

बोरिंग ने पर्यावरण को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-
“A Person’s environment consists of the sum total of the stimulation which he receives from his conception until his death” -Boring
अर्थात् ‘एक व्यक्ति के पर्यावरण में वह सब कुछ सम्मिलित किया जाता है जो उसके जन्म से मृत्युपर्यन्त उस पर प्रभाव डालता है।’
व्यक्ति का जन्म भी पर्यावरण की परिधि में, जीवन भी उसी परिधि में तथा मृत्यु भी पर्यावरण की परिधि में ही होता है। इस प्रकार यदि जीवन है तो वह पर्यावरण से हटकर नहÈ रह सकता।

सी.सी. पार्क (1980) के अनुसार- ‘‘पर्यावरण उन सम्पूर्ण स्थितियों का योग है जो व्यक्ति को एक विशेष स्थान एवं विशेष समय पर चारों ओर से घेरे रहती है।’’
मनुष्य का एक विशेष समय पर उसके रहने का स्थान निश्चित रहता है उस समय उसके चारों ओर की स्थितियाँ जो उसे घेरे रहती हैं उन सबको मिलाकर पर्यावरण कहा जाता है।
महर्षि गौतम ने न्यायशास्त्र में सात पदार्थ बतलाया है उनमें पहला पदार्थ द्रव्य है। इस द्रव्य को नौ (9) प्रकार का बतलाया गया है-
पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा एवं मन। यही नवों ‘द्रव्य’ किसी न किसी रूप में मनुष्य को घेरे रहते हैं जो वातावरण का निर्माण करते हैं। इसीलिये पर्यावरण के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ- भौतिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं भावात्मक शक्तियाँ सम्मिलित की जाती है। इस प्रकार पर्यावरण इन सभी शक्तियों का योग है। इन शक्तियों के सहयोग से ही व्यक्ति का जीवन क्रम बना रहता है और सुव्यवस्थित जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन भारत में पर्यावरण संरक्षण का विशेष महत्व रहा है। पर्यावरण के विभिन्न अंगों को भगवान् इसलिए कहा गया ताकि व्यक्ति जैसे ईश्वर के प्रति आस्था रखता है उसी प्रकार पर्यावरण के विभिन्न अंगों को ईश्वर समझकर उन पर आस्था रखे एवं उनसे व्यर्थ में छेड़छाड़ न करे।

जर्मन वैज्ञानिक फिटिंग के अनुसार- ‘‘पर्यावरण जीवों के परिवृत्तिय कारकों का योग है। इसमें जीवन के परिस्थितियों के सम्पूर्ण तथ्य, आपसी सामंजस्य से वातावरण बनते हैं।’’

टासले के अनुसार- ‘‘पर्यावरण उन सभी दशाओं, प्रणालियों तथा प्रभावों का योग है जो जीवों तथा उनकी प्रजातियों का विकास, जीवन एवं मृत्यु को प्रभावित करता है।’’

डी0 डेविस के अनुसार- ‘‘पर्यावरण से अभिप्राय है कि जीव के चारों ओर से घेरे उन सभी भौतिक स्वरूपों से जिनमें वह रहता है जिनका उनकी आदतों एवं क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार के स्वरूपों में भूमि, जलवायु, मिट्टी की प्रकृति, वनस्पति, प्राकृतिक संसाधन, जल, थल आदि सम्मिलित हैं।’’

डडले स्टेम्प के अनुसार- ‘‘पर्यावरण प्रभावों का ऐसा योग है, जो किसी जीव के विकास एवं प्रकृति को परिवर्तित तथा निर्धारित करता है।’’

सोरोकिन के अनुसार- ‘‘पर्यावरण से तात्पर्य ऐसी व्यापक दशाओं से है जिनका अस्तित्व मनुष्यों के कार्यों से स्वतंत्र हैं अर्थात् जो मानव रचित नहÈ है। ये दशायें बिना मनुष्य के कार्यों से प्रभावित हुए स्वत: परिवर्तित होती है। दूसरे शब्दों में पर्यावरण में वे सब प्रभाव अन्तर्निहित होते हैं जिनका अस्तित्व मनुष्य को पृथ्वी से पूर्णतया हटा देने पर भी बना रहेगा।’’

डॉ0 गोविन्द प्रकाश डाबर के अनुसार- ‘‘जीव के चारों ओर उपस्थित जैविक-अजैविक पदार्थ है वह पर्यावरण कहलाता है। जीव अपने पर्यावरण से और पर्यावरण अपने जीवों से प्रभावित होते हैं।’’

गाउड़ी ए के अनुसार- ‘‘सामान्य रूप से पर्यावरण को प्रकृति के समतुल्य माना जा सकता है जिसके अन्तर्गत गृही पृथ्वी के भौतिक तत्वों को सम्मिलित किया जाता है। ये भौतिक तत्व जैव-मण्डल में विभिन्न जीवों को आधार प्रदान करते हैं, उन्हें विकास तथा संवर्धन हेतु आवश्यक दशा में प्रदान करते हैं और उन्हें प्रभावित करते हैं।’’
हर्ष केविट्ज ए0जे0 के अनुसार- ‘‘पर्यावरण उन सभी बाहरी दशाओं एवं प्रभावों का योग है जो जीव-धारियों के जीवन उनके विकास एवं उनकी अनुक्रियाओं को प्रभावित करता है।’’

उपर्युक्त विभिन्न विद्वानों के विचारों से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण से तात्पर्य हमारे चारों ओर के उस परिवेश एवं वातावरण से है जिससे हम घिरे हैं। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि जो कुछ जीव के चारों ओर उपस्थित होता है, वह उसका पर्यावरण होता है। प्रत्येक जीव पर्यावरण में पैदा होता है पर्यावरण में जीता है और अन्तत: पर्यावरण में ही विलीन हो जाता है।

पर्यावरण के प्रकार 

पर्यावरण के अध्ययन की दृष्टिकोण से इसे तीन खण्डों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. भौतिक पर्यावरण
  2. जैविक पर्यावरण
  3. सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण

1. भौतिक पर्यावरण –

भौतिक पर्यावरण के तत्व हैं- 

(1) सूर्य- पर्यावरण के भौतिक तत्वों में सबसे पहले सूर्य आता है। सूर्य की शक्ति, विविध रूपों में जीवन का मूल आधार है। सूर्य भौतिक पर्यावरण का ऐसा तत्व है जो प्रकृति के समस्त सजीव या निजÊव तत्वों को अनेक ढंग से प्रभावित करता है।


(2) पृथ्वी-
पर्यावरण के मुख्य तत्वों में पृथ्वी अथवा मिट्टी आता है। पृथ्वी में समस्त जीवों की और वनस्पतियों की उत्पत्ति होती है। मिट्टी समस्त वनस्पतियों का पोषक है। मनुष्य पृथ्वी पर मिट्टी के विभिन्न रूपों से बने आवासों में रहता है और मिट्टी से उपजे वनस्पतियों से पोषण प्राप्त करता है। मनुष्य का जीवन और मरण मिट्टी पर ही निर्भर है।


(3) जल-
भौतिक पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण तत्व जल है जल के कारण ही ब्रह्माण्ड में जीवन संभव हुआ है जल जीवन की शक्ति को जीवन के अन्दर प्रवाहित करता है। हाइड्रोजन के दो अडु तथा अॉक्सीजन के एक अणु के क्रिया से जल का निर्माण होता है। मनुष्य की संरचना में भी 70 प्रतिशत जल है। वृक्षों की संरचना में 40 प्रतिशत जल होता है। फल-फूल, सब्जी से लेकर अनाज तक सभी उत्पादन जल पर ही निर्भर है। मनुष्य की समस्त दैनिक क्रियायें जल पर आधारित है।

शुद्ध जल रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, हानिकारक रसायनों से और जीवाणुओं से मुक्त तथा पारदशÊ होता है। इसका भार बहुत कम होता है। सामान्य रूप से जल का घनत्व 4 डिग्री सेल्सियस पर एक (1) ग्राम प्रति घन सेन्टीमीटर होता है। शुद्ध जल का हिमांक 0 डिग्री सेल्सियस तथा क्वथनांक 100 डिग्री सेल्यिस होता है।
प्रकृति में जल तीन रूप में मिलता है-

  1. ठोस- बर्फ
  2. द्रव- पानी
  3. गैस- वाष्प

धरती का चार भाग में तीन भाग जल से भरा है। भूमंडल पर जल का आधार भंडार है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सम्पूर्ण पृथ्वी के दसवें का सतवाँ भाग है। इसका आयतन लगभग 1 अरब 46 करोड़ घन किलोमीटर है। पानी के इस पूरे आवरण को हम जल मंडल कहते हैं।

पृथ्वी पर स्थिति के अनुसार महासागरों और समुद्रों में 93 प्रतिशत, पृथ्वी के भूगर्भ में 4 प्रतिशत तथा ग्लेशियर जल वाष्प, मिट्टी की आर्द्रता, झील, नदी तथा झरने में 3 प्रतिशत जल है।


(4) वायु-
वातावरण में उपस्थित गैसों का मिश्रित समूह जो हमें अदृश्य रूप में बराबर घेरे रहता है, सामुहिक रूप से उसी मिश्रण को वायु, हवा, पवन कहते हैं। पृथ्वी से लगभग 250 किलोमीटर की ऊँचाई तक वायु विद्यमान रहता है। वायु में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस होती है। इसके बाद प्राणवायु यानि आक्सीजन 21 प्रतिशत पायी जाती है। वायु के शेष भाग में आर्गन, कार्बन डाई आक्साइड, लिआन, हिलियम, क्रिपटोन, जेनोन, हाइड्रोजन, भोजन तथा धूल इत्यादि के कण होते हैं।


(5) ऊर्जा-
भौतिक पर्यावरण के तत्वों में ऊर्जा की एक प्रमुख तत्व है। किसी भी कार्य को करने की क्षमता कार्य करने वाली की ऊर्जा होती है। पर्यावरण में यह ऊर्जा हमें निम्न रूपों में प्राप्त होती है।

  1. सूर्य से सौर ऊर्जा
  2. जल से जल ऊर्जा
  3. पवन से पवन ऊर्जा
  4. यूरेनियम से अणु ऊर्जा
  5. कोयले से प्राप्त ऊर्जा
  6. खनिज तेलों से प्राप्त ऊर्जा
  7. गैसों से प्राप्त ऊर्जा

कहने का अर्थ यह है कि खाने-पीने, साँस लेने से लेकर बड़े-बड़े कल-कारखाने चलाने और जीवन की जटिल क्रियाओं को निपटाने में हम ऊर्जा के विभिन्न रूपों में उसकी शक्तियों का प्रयोग करते हैं।

2. जैविक पर्यावरण –

मनुष्य के आस-पास के वातावरण में उपस्थित छोटे से लेकर बड़े तक समस्त जीव उसके पर्यावरणीय घटक होते हैं। इन सबका एक-दूसरे से इतना गहरा सम्बन्ध होता है कि कहÈ एक भी घटक ही उत्पत्ति, विकास एवं संवर्धन में आया बदलाव, समूचे पर्यावरण को असंतुलित करके रख देता है। धरती के समस्त जीवधारी चाहे वे जन्तु जगत के सदस्य हों या वनस्पति जगत के मनुष्य के लिए जैविक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। अध्ययन के दृष्टिकोण से जैविक पर्यावरण को मुख्यत: दो भागों में बाँट सकते हैं- (अ) प्राणी जगत (ब) वनस्पति जगत।

(अ) प्राणी जगत- वैज्ञानिकों ने अध्ययन एवं जन्तुओं के विकास के क्रम में प्राणी जगत को 10 संघों में बाँटा है-

  1. प्रोटोजोआ- एक कोशीय जन्तु- जैसे अमीबा
  2. पोरीफेरा- छिद्रयुक्त जन्तु- जैसे स्पन्ज
  3. सिलेण्ट्रेटा- सिलोम की उपस्थिति- जैसे हाइड्रा
  4. प्लेटीहेल्मेन्थीज- चपटे कृमि- जैसे प्लेनिरिया
  5. निमैटोडा- गोल कृमि- जैसे एस्केरिस
  6. मोलास्का- मुख्यत: माँसल शरीर वाले- जैसे घोंघा
  7. एनिलीडा- शरीर खण्डित जैसे- केंचुआ
  8. आर्थोपोडा- शरीर या पाँव जुड़े हुए
  9. इकाइनोडर्मेटा- शरीर तारे के समान जैसे तारा मछली
  10. कार्डेटा- कशेरूकी जन्तु।

इन समस्त जन्तुओं का प्रकृति के प्रत्येक तत्व से गहरा सम्बन्ध होता है। पृथ्वी पर इनका विस्तार पर्यावरणीय दशाओं से प्रभावित होता है।
जन्तु-जगत प्राकृतिक वातावरण पर आश्रित होता है तथा चलायमान होने के बावजूद भी एक विशिष्ट परिस्थिकीय पर निर्भर रहता है।


(ब) वनस्पति जगत-
वनस्पतिक जगत पर्यावरण के जैवीय घटक का दूसरा अति महत्वपूर्ण पक्ष है। जिस प्रकार जीवन के लिए पर्यावरण में पाये जाने वाले सूक्ष्मतम् जन्तुओं तक सभी का महत्व होता है, उसी प्रकार धरती पर जीवन के लिए सूक्ष्मतम से लेकर सिकोया वृक्ष जैसी वृहदाकार वनस्पतियाँ भी महत्वपूर्ण होती है। पर्यावरण के लिए पौधों का महत्व हम इसी से आँक सकते हैं कि खाने के लिए अनाज, फल, दालें, सब्जियाँ इन पौधे से ही हमें प्राप्त होती हैं। रोगों से छुटकारा पाने के लिए दवायें हमें वनस्पति जगत के पेड़-पौधों से प्राप्त होते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्राणी जगत् के विकास का पर्यावरण वनस्पति जगत है।

3. सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण –

मानव सभ्यता का इतिहास वस्तुत: प्रकृति की आराधना, समन्वय एवं संघर्षों के घात-प्रतिघातों का ही इतिहास है। मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक उसके जीवन में जो भी क्रियायें होती है, उन सभी को उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक दशाओं की श्रेणी में रखा जाता है। सामाजिक मनुष्य सुसंस्कृत होता है। सामाजिक मनुष्य पर्यावरण से सामंजस्य बनाकर जीवनक्रम के क्रियाओं को सम्पादित करता है।

पर्यावरण का महत्व

मानव के आर्थिक जीवन की प्रत्येक गतिविधि किसी न किसी प्रकार से वनों से सम्बन्धित है। वन प्रकृति की अमूल्य सम्पदा है जो वातावरण के महत्वपूर्ण जैविक घटक के रूप में विकसित करते हैं। इनकी महत्ता के आधार पर इन्हें ‘हरा सोना’ कहा जाता है। हमारे देश में कुल उत्पादन का 33 प्रतिशत भवन निर्माण सामग्री में तथा 50 प्रतिशत ईंधन के रूप में उपयोग होते हैं तथा अन्य रबर सेल्यूलोप, लाख, कत्था, गोंद, जड़ी-बूटियाँ आदि के काम आती है। आज के परिवर्तनशील पर्यावरण में पर्यावरण एवं परिस्थितिकी से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं, घटकों, मानव तथा मानव की विविध क्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभावों तथा दीर्घकालीन पर्यावरण विकास पर आधारित क्रियाओं को सम्मिलित किया गया है। इस प्रकार पर्यावरण के महत्व कुछ इस प्रकार हैं-

  1. पर्यावरण के अध्ययन के द्वारा हमें वन, वृक्ष, नदी-नाले आदि का हमारे जीवन में क्या महत्व है, इसकी उपयोगिता की जानकारी होती है।
  2. पर्यावरण अध्ययन से पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत होने, सकारात्मक अभिवृत्तियाँ तथा पर्यावरण के प्रति भावनाओं का विकास होता है।
  3. वर्तमान विश्व में बढ़ते पर्यावरणीय प्रदूषण की जानकारी इसके प्रभाव तथा समान जनता के प्रदूषण के प्रति उत्तरदायित्व तथा कर्तव्य आदि के बारे में पर्यावरण अध्ययन का अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
  4. पर्यावरण अध्ययन आधुनिक समय में सर्वसाधारण को पर्यावरणीय समस्याओं की जानकारी इसके बारे में विशिष्ट विश्लेषण तथा समस्याओं के समाधान में उपयोगी योगदान प्रदान करता है।
  5. पर्यावरणीय अध्ययन का महत्व उन क्षेत्रों में अधिक है जहाँ शिक्षा एवं ज्ञान का उच्च स्तर पाया जाता है। अज्ञान तथा अशिक्षा वाले क्षेत्र में पर्यावरणीय सुरक्षा तथा संरक्षण के प्रति जनसाधारण में उदासीनता पायी जाती है।
  6. पर्यावरण अध्ययन के द्वारा जनसाधारण को विभिन्न प्रदूषणों की उत्पत्ति, उनसें होने वाली हानि तथा प्रदूषण को रोकने के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
  7. शहरीकरण एवं नगरीकरण के आवृत्ति से उत्पन्न समस्याओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।
  8. वर्तमान समय में परिवर्तन के विभिन्न साधनों की बढ़ती संख्या के कारण प्रदूषण का स्तर तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है। पर्यावरणीय अध्ययन का परिवहन द्वारा उत्पन्न प्रदूषण की रोकथाम में विशेष महत्व है।
  9. हमारी संस्कृति जिसके अहिंसा, जीवों के प्रति दयाभाव, प्रकृति पूजन आदि मुख्य मूलाधार हैं, पर्यावरण अध्ययन संस्कृति के इन मूलाधारों के संरक्षण में सहायक है।
  10. औद्योगीकरण से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने तथा इससे उत्पन्न समस्याओं के समाधान में पर्यावरण अध्ययन का महत्वपूर्ण योगदान है।
  11. वर्तमान समय की विश्व की मुख्य समस्या तीव्र जनसंख्या वृद्धि है। पर्यावरण अध्ययन हमें जनसंख्या नियंत्रण के विभिन्न उपायों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

पर्यावरण का विषय क्षेत्र

वर्तमान में पर्यावरण अध्ययन का क्षेत्र व्यापक हो गया है जिसमें जीवमण्डलीय वृहद् पारिस्थितिक तन्त्र्ा के तीनों परिमण्डलों यथा स्थलमण्डल, जलमण्डल एवं वायुमण्डल के संघटन एवं संरचना का अध्ययन सम्मिलित है। पर्यावरण में स्थल, जल, वायु एवं जीवमण्डल के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है जिसमें सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं का निर्धारण होता है। इस प्रकार पर्यावरण भौतिक तत्त्वों का ऐसा समूह है जिसमें विशिष्ट भौतिक शक्तियाँ कार्य करती हैं एवं इनके प्रभाव दृश्य एवं अदृश्य रूप में परिलक्षित होते हैं।

पर्यावरण अध्ययन की विषयवस्तु में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के विविध घटकों, इनके पारिस्थितिकीय प्रभावों, मानव पर्यावरण अन्तर्सम्बन्धों आदि का अध्ययन सम्मिलित किया जाता है। साथ ही इसमें पर्यावरणीय अवनयन, प्रदूषण, जनसंख्या, नगरीकरण औद्योगीकरण तथा इनके पर्यावरण पर प्रभावों, संसाधन उपयोग एवं पर्यावरण संकट, पर्यावरण संरक्षण एवं प्रबन्धन के विभिन्न पक्षों का भी अध्ययन किया जाता है।

20वÈ शताब्दी के अंतिम दशकों में पर्यावरण की प्रकृति में पर्यावरण के भौतिक एवं जैविक घटकों का सम्मिलित रूप से अध्ययन किया जाने लगा तथा इनकी प्रभावकारी दशाओं का पारिस्थितिकीय विश्लेषण भी आरम्भ हुआ। वर्तमान में पर्यावरण की प्रकृति परिवर्तित स्वरूप में अग्रसर हो रही है तथा इसमें निम्नलिखित तथ्यों के अध्ययन को समावेशित किया जा सकता है-

  1. पारिस्थिकीय विश्लेषण- इसमें किसी भौगोलिक प्रदेश के पर्यावरण के तत्त्वों और मनुष्य के मध्य जैविक एवं आर्थिक सम्बन्धों के समाकलित अध्ययन का मूल्यांकन किया जाता है।
  2. पारिस्थितिक प्रणाली- इसमें किसी भौगोलिक प्रदेश के पर्यावरण के तत्त्वों और मनुष्य के मध्य जैविक एवं आर्थिक सम्बन्धों के समाकलित अध्ययन का मूल्यांकन किया जाता है।
  3. स्थानिक प्रणाली- एक प्रदेश का पर्यावरण दूसरे प्रदेश के भूगोल से प्रभावित होता है तथा उसे प्रभावित करता है। क्योंकि विभिन्न परस्पर स्थानिक सम्बन्ध रखते हैं।
  4. स्थानिक विश्लेषण- स्थानिक विश्लेषण के द्वारा किसी भौगोलिक प्रदेश के पर्यावरण की अवस्थिति भिन्नताओं को समझा जा सकता है।
  5. प्रादेशिक समिश्र विश्लेषण- इसके द्वारा किसी पर्यावरण की क्षेत्रीय भिन्नताओं की प्रादेशिक इकाइयों में पारिस्थितिकीय विश्लेषण और स्थानिक विश्लेषण दोनों का समिश्र अध्ययन हाता है।
  6. जैवमण्डल का अध्ययन- वर्तमान समय में जैवमण्डलीय वृहद् पारिस्थितिकीय तन्त्र का पर्यावरण के अभिन्न घटक समूह के रूप में अध्ययन किया जाता है।
  7. प्राकृतिक आपदाओं का अध्ययन- ज्वालामुखी, भूकम्प, बाढ़, सूखा चक्रवातीय तूफान आदि को पर्यावरणीय अध्ययन में महत्त्व मिला है।
  8. पर्यावरण में मानवकृत परिवर्तनों की भविष्यवाणी के लिए वैज्ञानिक (भौगोलिक) विकास को भी महत्त्व मिला है।

संदर्भ-

  1. पर्यावरण चेतना, विद्याशंकर, 
  2. निशान्त सिंह, पर्यावरण शिक्षा 
  3. पर्यावरण चेतना, विद्याशंकर  
  4. निशान्त सिंह, पर्यावरण शिक्षा 
  5. पर्यावरण अध्धयन, नवप्रभात प्रिटिंग प्रेस, मेरठ, पे0न0 39-43
    8- वही पे0न0 3 
  6. यादव विरेन्द्र सिंह, नई सहस्राब्दी का पर्यावरण भाग 1-2 2010 
  7. उपाध्याय राजेश्वर, उपाध्याय सुधा, 2006 
  8. निशान्त सिंह, पर्यावरण शिक्षा, 2007 
  9. राजीव नयन, पर्यावरण शिक्षा

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