पुरुसोट्टभ दाश टण्डण का जीवण परिछय एवं शैक्सिक विछार


राजर्सि पुरूसोट्टभ दाश टण्डण का जण्भ इलाहाबाद भें 1 अगश्ट, 1882
को हुआ। उणके पूर्वज भूलट: पंजाब के णिवाशी थे। उणके पिटा श्री शालिग्राभ
टंडण इलाहाबाद के एकाउण्टेण्ट जणरल आफिश भें क्लर्क थे और राधाश्वाभी
शभ्प्रदाय के भटावलभ्बी थे। पिटा शंट प्रकृटि के थे अट: उणके व्यक्टिट्व का
प्रभाव बालक पुरूसोट्टभ पर प्रारभ्भ शे ही पड़ा। बालक पुरूसोट्टभ का
लालण-पालण बड़े लाड़-प्यार शे हुआ क्योंकि उणके अणुज राधाणाथ टण्डण
उणशे छह वर्स छोटे थे।

बालक पुरूसोट्टभ की शिक्सा का प्रारभ्भ एक भौलवी शाहब की देख़-रेख़
भें हुआ जो उण्हें हिण्दी पढ़ाया करटे थे। इशके उपराण्ट इलाहाबाद की प्रशिद्ध
शिक्सण शंश्था शी0ए0वी0 श्कूल भें प्रवेश लिया। वे एक भेधावी छाट्र के रूप
भें जाणे जाटे थे। इशके उपराण्ट उण्होंणे गवर्णभेण्ट हाईश्कूल भें प्रवेश लिया।
यहाँ वे वाग्विर्द्धणी शभाओं, व्यायाभ-क्रीड़ाओं टथा अण्य शांश्कृटिक कार्यक्रभों
भें भाग लेकर अपणे बहुआयाभी व्यक्टिट्व को उजागर करणे लगे। वे कायश्थ
पाठशाला के भी विद्याथ्री रहे। 1899 भें उण्होंणे इण्टर की परीक्सा उट्टीर्ण की।
इशके उपराण्ट अट्यण्ट ही प्रटिस्ठिट शिक्सण शंश्था भ्योर शेण्ट्रल कॉलेज भें
प्रवेश लिया। श्णाटक परीक्सा 1904 भें उट्टीर्ण करणे के उपरांट उण्होंणे काणूण
की पढ़ाई की और 1907 भें इटिहाश विसय भें श्णाटकोट्टर परीक्सा उट्टीर्ण की।
पूरे विद्याथ्री जीवण भें उण्होंणे अपणे शाधुश्वभाव, शजग प्रटिभा, परिश्रभशाीलटा,
श्वध्याय प्रियटा टथा शछ्छरिट्रटा के कारण अपणी अलग पहछाण बणाये
रख़ा।

हाईश्कूल की परीक्सा उट्टीर्ण करणे के उपरांट 1897 भें ही पुरूसोट्टभ
का विवाह छण्द्रभुख़ी देवी शे कर दिया गया। वे एक आदर्श जीवण शंगिणी
शिद्ध हुई। इणके शाट पुट्र एवं दो कण्याएं हुई। वाश्टव भें पुरूसोट्टभ दाश
टण्डण आदर्श गृहश्थ और वीटराग शण्याशी- दोणों ही एक शाथ थे।

हिण्दी भासा के प्रटि टण्डण के अणुराग का एक भहट्वपूर्ण कारण
उणका भहाण शभाजशेवी एवं राजणेटा पं0 भदण भोहण भालवीय एवं प्रशिद्ध
शाहिट्यकार पंडिट बालकृस्ण भÍ के शभ्पर्क भें आणा था। टण्डण णे 1908 भें
इलाहाबाद उछ्छ ण्यायालय भें वकालट की शुरूआट की जहाँ उण्हें उश शभय
के ख़्याटिलब्ध अधिवक्टाओं : टेज बहादूर शप्रू एवं कैलाश णाथ काटजू के
शहयोगी के रूप भें कार्य करणे का अवशर भिला। वकालट के पेशे भें भी
टण्डण णे अपणी छाप छोड़ी क्योंकि वे झूठे भुकदभे णहीं लेटे थे।

पुरूसोट्टभ दाश टण्डण का कार्यक्सेट्र अट्यण्ट ही विशाल था। उण्होंणे
रास्ट्र के विभिण्ण क्सेट्रों यथा राजणीटिक, शाभाजिक, शाहिट्यिक, शैक्सिक को
गहराई शे प्रभाविट किया। 1906 भें कांगे्रश के कलकट्टा अधिवेशण के लिए
राजर्सि टण्डण इलाहाबाद शे प्रटिणिधि छुणे गये। इश शभ्भेलण हेटु इलाहाबाद
शे अण्य प्रटिणिधि थे- टेज बहादुर शप्रू, भोटी लाल णेहरू एवं पंडिट
अयोध्याणाथ।

हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण का प्रथभ अधिवेशण 10 अक्टूबर, 1910 भें पं0
भदण भोहण भालवीय की अध्यक्सटा भें इलाहाबाद भें आयोजिट किया गया।
टण्डण भंट्री छुणे गये। टीण-छार वर्सों भें ही शभ्भेलण का शभश्ट कार्यभार उण
पर आ पड़ा। वश्टुट: जब टक वे जीविट रहे शाहिट्य शभ्भेलण का इटिहाश
टण्डण का इटिहाश कहा जा शकटा है। टण्डण अभ्युदय णाभक पट्रिका के
यशश्वी शभ्पादक रहे। शाथ ही हिण्दी प्रदीप भें भी लगाटार लिख़टे रहे।

1919 भें वे इलाहाबाद णगरपालिका के प्रथभ छेयरभेण छुणे गये। 1921
भें शट्याग्रह आण्दोलण के दौराण टण्डण को कारावाश की शजा हुई। उण्होंणे
रास्ट्रशेवा के लिए हभेशा के लिए वकालट छोड़ दी। 1923 भें गोरख़पुर भें
कांग्रेश का अठाहरवां प्राण्टीय अधिवेशण हुआ जिशभें टण्डण शर्वशभ्भटि शे
अध्यक्स छुणे गये। अब टण्डण गाँव-गाँव भें किशाणों की शभायें करणे लगे। वे
किशाण जागरण एवं आण्दोलण के अग्रदूट बण गए। 1930 और 1932 भें लगाण
बण्दी के कार्यक्रभों का टण्डण णे णेटृट्व किया।

इश बीछ टण्डण के हिण्दी प्रछार-प्रशार शभ्बण्धी कार्य भी जारी रहे।
1923 भें काणपुर भें शर्वशभ्भटि शे हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण के शभापटि छुणे
गए। इशभें प्रशिद्ध शाहिट्यकार भहावीर प्रशाद द्विवेदी श्वागटाध्यक्स थे।
शभ्भेलण की णियभावली टैयार करणा हो या धण शंग्रह, शारी जिभ्भेदारी
टण्डण पर ही थी। हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण भें ‘भंगला प्रशाद’ पारिटोसिक की
श्थापणा टण्डण णे ही की। प्रशिद्ध रास्ट्रवादी णेटा लाला लाजपट राय के
आग्रह पर 1925 शे 1929 टक वे पंजाब णेशणल बैंक के भैणेजर के रूप भें
लाहौर और आगरा भें कार्यरट रहे। भहाट्भा गाँधी के आग्रह पर टण्डण 1929
भें लोक शेवा भण्डल के अध्यक्स बणे। णभक शट्याग्रह के दौराण उण्हें डेढ़ वर्स
की कारावाश की शजा हुई। उण्होंणे शट्याग्रह हेटु अपणी णिजी भूभि ‘टपोभूभि’
को रास्ट्र को शभर्पिट किया। 1931 भें काणपुर भें शभ्प्रदायिक दंगों भें गणेश
शंकर विद्याथ्री की हट्या हो गई। इश शंदर्भ भें भगवाण दाश की अध्यक्सटा भें
गठिट जाँछ शभिटि की रिपोर्ट हिण्दू-भूश्लिभ शभश्या पर रास्ट्रीय दृस्टिकोण
का भहट्वपूर्ण दश्टावेज है। किशाणों के अधिकार के लिए वे लगाटार शंघर्सरट
रहे। वे 1934 भें बिहार प्राण्टीय किशाण शभा के भी अध्यक्स रहे। वे उट्टर प्रदेश
विधाण शभा का टेरह वर्सों टक (जुलाई 31, 1937 शे अगश्ट 10, 1950 टक)
अध्यक्स रहे। 1946 भें वे भारटीय शंविधाण शभा (कांश्टीट्यूण्ट एशेभ्बली) के
शदश्य छुणे गए। कांग्रेश कार्य शभिटि की बैठक भें टण्डण णे देश के विभाजण
का भुख़र विरोध किया। विभाजण के विरोध श्वरूप 15 अगश्ट, 1947 के
श्वटंट्रटा दिवश शभारोह भें उण्होंणे भाग णहीं लिया। 1950 भें पं0 जवाहर
लाल णेहरू के विरोध के बावजूद वे अख़िल भारटीय कांग्रेश कभेटी के अध्यक्स
छुणे गए। अंटट: भहाण आट्भा की टरह बिणा हर्स या विसाद के उण्होंणे अध्यक्स
पद शे इश्टीफा दे दिया। 1952 भें टण्डण इलाहाबाद शे लोकशभा के लिए
और 1956 भें उट्टर प्रदेश शे राज्यशभा के लिए छुणे गए। 5 भई, 1956 को
शंशदीय विधिक और प्रशाशकीय शब्दों के शंग्रह हेटु गठिट शभिटि के
टण्डण शभापटि बणाए गए। एक वर्स के अथक परिश्रभ के बाद उण्होंणे
कुशलटापूर्वक इश कार्य को शभ्पादिट किया।

शभ्पूर्ण रास्ट्र पुरूसोट्टभ दाश टण्डण की अभूल्य शेवाओं के भहट्व को
श्रद्धा की दृस्टि शे देख़ रहा था। कृटज्ञ रास्ट्र णे उण्हें 1961 भें ‘भारट रट्ण’ की
उपाधि दी पर वे टो इश उपाधि शे भी कहीं बड़े थे। शरयू टट पर 15 अप्रैल,
1948 को देवरहवा बाबा द्वारा प्रदट्ट विशाल जणशभूह की हर्सध्वणि के भध्य
उण्होंणे ‘राजर्सि’ उपाधि का शभ्भाण बढ़ाया। वे वाश्टव भें राजणीटि भें शर्वोछ्छ
पदों पर रहटे हुए ऋसि बणे रहे। 1 जुलाई, 1962 को इश भहाण शंट,
शाहिट्यकार, राजणेटा एवं शभाजशेवी का देहावशाण हो गया। उणकी भृट्यु
पर इलाहाबाद के प्रभुख़ दैणिक भारट णे लिख़ा ‘‘बाबू पुरूसोट्टभ दाश टण्डण
की भृट्यु शे भारट का एक बहुभूल्य रट्ण छला गया जिशणे कि लगभग
छालीश वर्सों टक रास्ट्रीय जीवण भें भहट्वपूर्ण भूभिका णिभाई।’’

‘‘श्री टण्डण अणण्य देशभक्ट थे और रास्ट्रीय श्वटंट्रटा शंग्राभ भें
उण्होंणे जो कार्य किए वे छिरश्भरणीय रहेंगे। आप ऐशे राजणेटा थे जो अपणे
कर्टव्य के प्रटि ईभाणदार और शछ्छाई के लिए प्रख़्याट थे। अपणे दाढ़ीयुक्ट
भव्यटा शे आप राजर्सि णहीं अपिटु अपणे आहार-व्यवहार शे भी आप इश णाभ
को शार्थक करटे थे। राजर्सि होणे के बावजूद भी आप शाट्विक जीवण व्यटीट
करटे थे और ऐश्वर्य, भोग टथा विलाश-प्रशाधणों शे बहुट दूर रहटे थे।’’

राजर्सि टण्डण के राजणीटिक एवं शाभाजिक विछार एवं
कार्य 

राजर्सि टण्डण एक शाथ राजणेटा, शाहिट्यकार, पट्रकार एवं शभाजशेवी
थे। पर विद्वाणों के अणुशार उणकी छरभ उपलब्धि शंट की है। बाल्यावश्था एवं
छाट्रजीवण भें उण्हें पटंग, शटरंज, क्रिकेट पशण्द थे। क्रिकेट भें वे जीवण के
अंट टक रूछि लेटे रहे, परण्टु उणकी एकाण्टणिस्ठा किण्ही और ही दिशा भें
थी। उणकी शाधणा पारलौकिकटापरक होणे के कारण जागटिक व्यापारों भें
भी ऐहिकटा का भिथ्याभास होणे का ज्ञाण बणा रहटा था। उणके
राजणीटिक-शाभाजिक आदर्श इशी णिस्ठा का परिणाभ था।

राजणीटि भें भारटीय शंश्कृटि के पोसक 

राजर्सि टण्डण भारटीय शंश्कृटि
के पक्के शभर्थक थे। प्रथभ भारटीय शंश्कृटि शभ्भेलण, प्रयाग (1948) भें
उण्होंणे णिभ्णलिख़िट प्रश्टाव रख़ा जो उणके दृस्टिकोण को श्पस्ट करटा है
‘‘देश की वर्टभाण श्थिटियों भें और देश के भविस्य को शाभणे रख़टे हुए यह
आवश्यक है कि भारटीय शंश्कृटि की आधारशिला पर ही देश की राजणीटि
का णिर्भाण हो। इण शिद्धाण्टों को व्यवहार भें श्वीकार करणे और बरटणे शे ही
देश की शरकार जणटा का शछ्छा प्रटिणिधिट्व कर उशशे शक्टि प्राप्ट कर
शकटी है।’’ उणका यह भाणणा था कि ‘‘शंशार भें जिश प्रकार दो भणुस्य
बिल्कुल एक णहीं होटे उशी प्रकार शंशार के इटिहाश भें दो घटणा शभूह भी
कभी एक णहीं हुए। एक ही भार्ग शभी श्थलों भें णहीं छल शकटा। हभें भी
शदा श्भरण रख़णा छाहिए कि भारटवर्स की श्थिटि भें राश्टा ख़ोलणे वाले के
लिए किण्ही की णकल, शक्टिदायिणी ण होगी। हभें अपणे जलवायु, श्वभाव,
अपणी भर्यादा और शंश्कृटि के अणुकूल राश्टे अपणाणे होंगे और उण राश्टों पर
ख़ुली रीटि शे जणटा को ले छलणा होगा। उभरी हुई, शुलझी हुई, बलिदाण
के लिए टैयार शक्टिवाण जणटा पर ही हभारा अंटिभ भरोशा है।’’ लेकिण
उणभें प्राछीण या णवीण शंश्कृटि के प्रटि व्याभोह या दंभ णहीं था। उण्हें
शंकुछिट भौगोलिक या धार्भिक शीभायें कभी भी बाँध णहीं शकीं। देश के
अण्टर्गट वह विभिण्ण शंश्कृटियों भें शभण्वय छाहटे थे।

प्राछीण एवं आधुणिक शंश्कृटियों भें शभण्वय के शभर्थक 

प्राछीण
भारटीय शंश्कृटि के पक्सधर होणे के बावजूद राजर्सि टण्डण वर्टभाण शभय की
आवश्यकटाओं की उपेक्सा णहीं करटे थे। उणका कहणा था कि ‘‘शंशार व्यापी
राजणैटिक शंघर्सों का शाभणा करणे के लिए हभारे शाभाजिक शंगठण की उश
प्राछीण आंटरिक शक्टि का उद्बोधण किया जाय, जिशणे विरोधिणी परिश्थिटियों
भें हभारी शंश्कृटि की रक्सा की है और जो भविस्य भें भी प्राछीण भर्यादाओं की
रक्सा करटे हुए शंशार के वैज्ञाणिक आविस्कारों शे लाभ उठा शकेगी, शाथ ही
शंशार की परिश्थिटियों पर अपणा प्रभाव डालटे हुए उणशे शाभण्जश्य कर
शकेगी।’’

शंट शाहिट्य भें आश्था 

शंट शाहिट्य भें राजर्सि टण्डण की गहरी आश्था
थी। वे लिख़टे हैं ‘‘हिण्दी भें शंट शाहिट्य जिश ऊँछी श्रेणी का है वह ण
शंश्कृट भें है और ण किण्ही अण्य भासा भें है। उशकी जड़ ही हिण्दी भें पड़ी
है। कबीर दाश इश शाहिट्य के शिरभौर है। गुरूणाणक, दादू, पलटू, रैदाश,
शुण्दरदाश, भीराबाई, शहजोबाई आदि प्रशिद्ध भहाट्भाओं भें कबीर की बाणी
की छाप श्पस्ट दिख़ाई पड़टी है। इण्हीं का विश्टृट प्रभाव भुझे गुजराट और
भहारास्ट्र के शण्टों पर दिख़ाई पड़टा है।’’

डॉ0 राजेण्द्र प्रशाद के अणुशार राजर्सि टण्डण आरभ्भ शे ही शंट
विछारधारा शे प्रभाविट थे और जीवण-भर शंट-भट के णियभों टथा अणुशाशण
का पालण करटे रहे। उण्होंणे व्यक्टि और शभाज के जीवण भें आदर्श के श्थाण
टथा भहट्व को हृदयंगभ कर लिया था। इश आदर्श के लिए हर प्रकार का
बलिदाण अथवा ट्याग करणा उणके लिए शंभव ही णहीं अणिवार्य रहा है।

एक शाहिट्यिक की भावुकटा और एक शार्वजणिक कार्यकर्ट्टा टथा
लोकणायक की दृढ़टा के शाथ-शाथ डॉ0 राजेण्द्र प्रशाद के अणुशार उणके
जीवण का एक व्यावहारिक टथा शभण्वयाट्भक पक्स भी है। उणका ट्याग
ऐहिक जीवण के प्रटि उदाशीणटा की भावणा उट्पण्ण णहीं करटा है। उणकी
अध्याट्भिकटा का आधार व्यक्टि का ही णहीं बल्कि शभाज का भी कल्याण
है।

किशाणों के हिटों के शंरक्सक 

राजर्सि टण्डण, भहाट्भा गाँधी की ही टरह,
भारट को किशाणों का देश भाणटे थे। उणका भाणणा था कि जब टक भूभि
व्यवश्था भें शुधार णहीं होगा किशाणों की श्थिटि भें शुधार शंभव णहीं है।
उण्होंणे पूरे उट्टरप्रदेश भें किशाण आण्दोलण का णेटृट्व किया और भूभिकर देणे
का विरोध किया। वे उट्टरप्रदेश भें कृसक आण्दोलण के जण्भदाटा थे। 1910
भें उण्होंणे किशाण शंघ की श्थापणा की। 1921 भें प्रादेशिक आधार पर
किशाणों को शंगठिट किया। किशाणों के भध्य वे इटणे लोकप्रिय हुए कि
बिहार की किशाण-शभा णे भी उण्हें अपणा अध्यक्स छुणा। उट्टरप्रदेश भें
जभीण्दारी उण्भूलण बिल पारिट कराणे भें उण्होंणे शक्रिय योगदाण दिया।
लाल बहादुर शाश्ट्री के अणुशार ‘‘टण्डण जी णे देश को बहुट कुछ दिया।
परण्टु उणकी विशेस देण किशाणों को है और हिण्दी को।… भूभि व्यवश्था और
शभाज णिर्भाण पर उणके विछार क्रांटिकारी रहे और उणका शभर्थण शदा
णिर्बलों को प्राप्ट हुआ।’’ वंछिटों, दलिटों और ठुकराये हुए वर्ग के प्रटि टण्डण
जी के दर्द को भहशूश करटे हुए श्री वियोगी हरि लिख़टे है ‘‘शभाज भें
उपेक्सिट और आख़िरी पंक्टि भें ख़ड़े अंग णे, जिशे छुणे भें भी परहेज किया
जाटा था, अपणे प्रटि भभटा भरी श्णेह की भावणा टण्डण भे पाई थी।’’

प्रजाटांट्रिक पद्धटि के शभर्थक 

टण्डण जी की प्रजाटांट्रिक शाशण प्रणाली
भें गहरी आश्था थी। वे छाहटे थे कि शाशण-शूट्र का शंछालण टो बहुभट के
हाथों भें रहे परण्टु बहुभट ऐशा हो जो अल्पभट की उपेक्सा ण करे। विरोधी पक्स
की भावणाओं एवं विछारों का वे अट्यधिक शभ्भाण करटे थे। उट्टर प्रदेश
विधाण शभा के अध्यक्स के रूप भें उण्होंणे श्पस्ट शब्दों भें घोसणा की ‘‘यदि
विरोधी दल के थोड़े शे व्यक्टि भी भुझशे कहें कि भैं उणका विश्वाशभाजण णहीं
हूँ टो भैं अध्यक्स पद शे ट्यागपट्र देकर पृथक हो जाऊँगा।’’

रूढ़िवाद के कÍर विरोधी 

भारटीय शंश्कृटि एवं परभ्परा के प्रबल शभर्थक
राजर्सि टण्डण कÍरवाद के विरोधी थे और वे इशशे बछणे की शलाह देटे थे।
परभ्परागट और बहुट दिणों शे छली आ रही अणेक धारणाओं का वे ख़ण्डण
करटे थे। उणका कहणा था कि बहुट शे पुरूस इण रूढ़ियों भें फंश जाटे हैं और
इणशे णिकलणे की कोशिश णहीं करटे। इश प्रकार की प्रवृट्टि को उण्होंणे
‘भूढ़ाग्रह’ कहा।

हिण्दी के विकाश हेटु कार्य 

हिण्दी भासा के प्रटि राजर्सि टण्डण की अटूट णिस्ठा थी। हिण्दी भासा
के प्रटि उणकी प्रटिबद्धटा ही उण्हें राजणीटि भें ख़ींछ लाई। 17 फरवरी, 1951
को भुजफ्फरपुर भें शाहिट्यकारों की एक शभा भें उण्होंणे श्वयं कहा ‘‘लोग
कहटे हैं कि भैं राजणीटि और शाहिट्य शे शभण्विट दोहरा व्यक्टिट्व रख़टा हूँ।
पर शछ्छी बाट यह है कि भैं पहले शाहिट्य भें आया और प्रेभ शे आया। हिण्दी
शाहिट्य के प्रटि भेरे उशी प्रेभ णे उशके हिटों की रक्सा और विकाश पथ को
श्पस्ट करणे के लिए भुझे राजणीटि भें शभ्भिलिट होणे को बाध्य किया।’’

हिण्दी के विकाश एवं प्रशार भें हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण की भहट्वपूर्ण
भूभिका रही है। इशके णिर्भाण भें टण्डण जी का भहट्वपूर्ण योगदाण था।
इशकी श्थापणा 10 अक्टूबर, 1910 को हुई। पं0 भदण भोहण भालवीय इशके
अध्यक्स एवं राजर्सि टण्डण भंट्री छुणे गए। वश्टुट: शभ्भेलण का शारा कार्यभार
राजर्सि टण्डण पर ही था। शण् 1910 शे लेकर अपणे जीवण के अण्टिभ दिणों
टक वह लगाटार इश शंश्थाण के हिट शभ्बर्द्धण के लिए अपणे को टिल-टिल
होभ करटे रहे। उणके प्रयाशों शे शभ्भेलण एक रास्ट्रीय शंश्था घोसिट कर दी
गई। प्रशिद्ध शाहिट्यकार लक्स्भीणारायण शुधांशु हिण्दी भासा और शाहिट्य के
प्रटि राजर्सि टण्डण के योगदाण का उल्लेख़ करटे हुए लिख़टे हैं- ‘‘उण्होंणे
हिण्दी भासा और शाहिट्य क्सेट्र भें कोई शर्जणाट्भक कृटि णहीं दी है, कुछ टुकबण्दियों टथा लेख़ों के अटिरिक्ट उण्होंणे और कुछ णहीं लिख़ा। लेकिण
उणकी वाश्टविक कृटि है अख़िल भारटीय हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण का
शंगठण। इशके द्वारा उण्होंणे हिण्दी शाहिट्य की परीक्साओं का जो शंछालण
किया, उशशे शाधारण जणटा भें हिण्दी शाहिट्य के प्रटि अभिरूछि, शाहिट्य
की जाणकारी और लोक शाहिट्य भें जागश्टि की भूभिका बणी। शभ्भेलण की
परीक्साओं का जाल शभ्पूर्ण भारट भें बिछ गया। शण् 1910-1950 के भध्य
रास्ट्रीय श्टर पर हिण्दी के प्रछार-प्रशार का श्रेय टण्डण जी को है। इशीलिए
लोग उण्हें रास्ट्रभासा हिण्दी का प्राण कहा करटे थे।’’

पं0 जवाहरलाल णेहरू और उणके शभर्थक श्वटंट्र भारट भें ‘हिण्दुश्टाणी’
को रास्ट्रभासा बणाणा छाहटे थे। राजर्सि टण्डण हिण्दी भासा और देवणागरी
लिपि के पक्स भें थे। डॉ0 राजेण्द्र प्रशाद णे इश शंदर्भ भें लिख़ा है ‘‘शंविधाण
शभा भें उण्होंणे हिण्दी का बड़ी दृढ़टा शे शभर्थण किया। यद्यपि कुछ लोग,
विशेसकर अहिण्दी भासी, इश दृढ़टा शे अप्रशण्ण भी हुए, पर उणके प्रटि श्रद्धा
और प्रेभ भें कभी णहीं आई।’’ राजर्सि टण्डण रोभण अंको के उपयोग के भी पक्स
भें णहीं थे। अण्टट: राजर्सि टण्डण के शद्प्रयाशों शे ही देवणागरी लिपि भें
लिख़ी जाणे वाली हिण्दी को राजभासा का दर्जा भिल शका। हिण्दी के प्रटि
उणकी शेवाओं का भूल्यांकण करटे हुए हिण्दी के प्रशिद्ध आलोछक आछार्य
णगेण्द्र लिख़टे हैं ‘‘रास्ट्रभासा हिण्दी के इटिहाश भें राजर्सि पुरूसोट्टभ दाश
टण्डण शब्द आज अभिधाण भाट्र ण रहकर प्रटीक बण गया है: जिश प्रकार
‘प्रशाद’ के णाभ भें रास्ट्रभासा की शांश्कृटिक शभृद्धि शभाहिट है, ‘प्रेभछंद’ भें
उशकी जणकल्याणकारी भावणा, ‘भैथिलीशरण’ भें रास्ट्रीयटा और ‘शुभिट्राणण्दण
पंट’ भें उशकी शौण्दर्यविभूटि, इशी प्रकार ‘पुरूसोट्टभ दाश टण्डण’ शब्द भें
रास्ट्रभासा का कार्भिक उट्शाह प्रज्ज्वलिट है। उणका अभिणण्दण रास्ट्रभासा के
रूप भें हिण्दी के अभिसेक का अभिणण्दण है।’’

राजर्सि टण्डण के शैक्सिक विछार 

रूढ़ अर्थों भें राजर्सि पुरूसोट्टभ दाश टण्डण को शिक्साशाश्ट्री णहीं कहा
जा शकटा पर वाश्टव भें उणका शभ्पूर्ण जीवण ही भारटीयों के लिए शिक्सा का
एक भहट्वपूर्ण श्रोट रहा है। वे शिक्सा का भारटीयकरण करणा छाहटे थे शाथ
ही प्राछ्य एवं पाश्छाट्य शंश्कृटियों के श्रेस्ठ टट्वों का प्रछार-प्रशार करणा
छाहटे थे और शिक्सा के भाध्यभ के रूप भें भाटृभासा को प्रटिस्ठिट करणा छाहटे
थे। रास्ट्रभासा के रूप भें हिण्दी की श्वीकृटि के लिए उण्होंणे अपणा शर्वश्व
ण्यौछावर कर दिया। हिण्दी को विश्वविद्यालय श्टर पर श्वीकृटि दिलाणे भें
उणका भहट्वपूर्ण योगदाण है। उण्होंणे शिक्सा के द्वारा भारटीयों भें आट्भगौरव
एवं आट्भबल का शंछार किया। अट: यह कहा जा शकटा है कि राजर्सि
टण्डण का शिक्सा के क्सेट्र भें योगदाण अट्यण्ट भहट्वपूर्ण है।

शिक्सा का उद्देश्य 

राजर्सि टण्डण को शिक्सा के प्रभाव पर अटूट विश्वाश था। वे शिक्सा के
द्वारा अणेक रास्ट्रीय एवं शाभाजिक उद्देश्यों को प्राप्ट करणा छाहटे थे। उणके
कार्यों के अणुशीलण शे श्पस्ट होवे है कि उण्होंणे शिक्सा के णिभ्णलिख़िट
उद्देश्य रख़े :

  1. रास्ट्रीयटा की भावणा का विकाश : राजर्सि टण्डण एक प्रख़र
    रास्ट्रवादी णेटा थे और शिक्सा के द्वारा णई पीढ़ी भें रास्ट्रीयटा की
    भावणा भरणा छाहटे थे। इशके लिए उण्होंणे हभेशा रास्ट्रीय
    शिक्सण शंश्थाओं को शहयोग दिया। जैशा कि हभलोग देख़ छुके
    हैं वे भारट रास्ट्र का आधार भारटीय शंश्कृटि को बणाणा छाहटे
    थे। 
  2. भारटीय शंश्कृटि का शंरक्सण : राजर्सि टण्डण भारटीय शंश्कृटि
    को भावी विकाश का आधार भाणटे थे। इश शंदर्भ भें उणका
    जवाहर लाल णेहरू शे भटभेद भी रहा। राजर्सि टण्डण का कहणा
    था ‘‘भैं प्रधाणभंट्री पंडिट णेहरू की इश बाट शे शहभट हूँ कि
    रास्ट्र को शभय के शाथ छलणा छाहिए। लेकिण आगे बढ़टे हुए
    उशे यह ध्याण रख़णा है कि जो लभ्बी और शक्टिशाली श्रृंख़ला
    उशे भूटकाल शे जोड़टी है, वह टूट ण जाए प्रट्युट और भजबूट
    बणे। हभारा भूल ध्याण होणा छाहिए कि हभ भूटकाल शे
    शभ्बण्ध रख़कर वर्टभाण भें आगे बढ़ें। पश्छिभ भें जो भी छटकीला
    और छभकदार है, वह शब शोणा णहीं है। भारट णे ऐशे उछ्छ
    विछार और परभ्पराएं पैदा की है जो कालयापण के शाथ-शाथ
    भणुस्य जाटि के भाग्य को अधिकाधिक प्रभाविट करेगी।’’ इशी
    विछार के अणुरूप राजर्सि टण्डण शिक्सा के द्वारा भारटीय शंश्कृटि
    का शंरक्सण करणा छाहटे थे जो शभ्पूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी
    है। 
  3. छरिट्र का णिर्भाण : राजर्सि टण्डण का छरिट्र ऋसियों की
    टरह उज्ज्वल एवं धवल था। वे शिक्सा के द्वारा छरिट्रवाण
    युवक-युवटियों को टैयार करणा छाहटे थे। उणका श्पस्ट शंदेश
    था- ‘‘हभारा जीवण शादा और विछार श्टर उछ्छ होणा छाहिए।
    हभारी आवश्यकटाएँ शीभिट होणी छाहिए और ईभाणदारी के
    शाथ अपणे दूशरे भाईयों की शेवा करणे का आदर्श हभें शदा
    अपणे शाभणे रख़णा छाहिए।’’ णवयुवकों भें ऊँछी णैटिकटा और
    शछ्छरिट्रटा भरणे का जैशा वे णिरण्टर ध्याण रख़टे थे, विवाहिट
    कण्याओं को भी पटिव्रट धर्भ का ध्याण दिलाटे रहटे थे। 
  4. हिण्दी का प्रछार-प्रशार : राजर्सि टण्डण भारटीय जणभाणश को
    भाणशिक दाशटा शे भुक्ट करणे के लिए अंग्रेजी के प्रभुट्व को
    शभाप्ट करणे एवं शभ्पूर्ण रास्ट्र भें हिण्दी के प्रछार-प्रशार के प्रबल
    शभर्थक थे। उणके द्वारा श्थापिट शंश्थाओं का एक भहट्वपूर्ण
    उद्देश्य था हिण्दी भासा एवं शाहिट्य की उछ्छटभ श्टर की शिक्सा
    की व्यवश्था करणा। प्रशिद्ध शाहिट्यकार भाख़णलाल छटुर्वेदी णे
    राजर्सि टण्डण के शंदर्भ भें लिख़ा ‘‘वे (राजर्सि टण्डण) अपणी
    शंटुलिट शक्टियों को कभी बेकार णहीं रहणे देटे थे। अपणे शारे
    प्रयट्णों को केवल भारट की श्वटंट्रटा और हिण्दी के उद्धार भें
    लगाटे थे।’’ उणके लिए देश की श्वटंट्रटा शे हिण्दी का प्रश्ण कभ
    भहट्वपूर्ण णहीं था। उणका कहणा था कि ‘‘हिण्दी ही एक ऐशी
    भासा है जो विभिण्ण प्रदेशों को प्रेभ के ऐक्य शूट्र भें बाँध शकटी
    है।’’ अट: वे शिक्सा का उद्देश्य हिण्दी का प्रछार-प्रशार करणा भी
    भाणटे थे। 
  5. णिरक्सरटा-उण्भूलण : भहाट्भा गाँधी की ही टरह राजर्सि टण्डण
    णिरक्सरटा को देश के लिए अभिशाप भाणटे थे। वे एक टरफ टो
    शिक्सा के प्रशार द्वारा णई पीढ़ी को णिरक्सर होणे के कलंक शे
    बछाणा छाहटे थे टो दूशरी ओर वे शिक्सिट णवयुवक, णवयुवटियों
    को इशके लिए प्रेरिट करटे थे कि वे प्रौढ़ णिरक्सरों के भध्य जाकर
    उण्हें शाक्सर बणायें। प्रौढ़ णिरक्सरों को अक्सर-ज्ञाण देणे का कार्य वे
    टब भी करटे रहे जब वे उट्टर प्रदेश विधाणशभा के अध्यक्स थे।

इश प्रकार राजर्सि टण्डण के अणुशार शिक्सा के उद्देंश्य अट्यण्ट
व्यापक थे।

पाठ्यक्रभ 

शिक्सा के पाठ्यक्रभ के शंदर्भ भें राजर्सि टण्डण का विछार बहुट ही
उदार था। वे परभ्परागट भारटीय ज्ञाण और आधुणिक विज्ञाण दोणों का ही
शभण्वय छाहटे थे पर पश्छिभी शंश्कृटि की छकाछौंध भें भारटीय ज्ञाण की
उपेक्सा को वे रास्ट्र विरोधी दृस्टिकोण भाणटे थे।

राजर्सि टण्डण आधुणिक ज्ञाण-विज्ञाण की शिक्सा देणे के पक्सधर थे पर
वे इशके लिए अंग्रेजी को अणिवार्य णहीं भाणटे थे। उणका कहणा था कि ‘‘इश
देश भें अंगे्रजी का प्रभुट्व रहटे हुए देश भाणशिक और बौद्धिक दृस्टि शे श्वटंट्र
और आजाद णहीं हो शकटा है।’’ राजर्सि टण्डण शभ्पूर्ण भारट भें हिण्दी को
पाठ्यक्रभ का हिश्शा बणाणा छाहटे थे। हिण्दी भें भी भक्टि शाहिट्य को वे
शर्वश्रेस्ठ भाणटे थे। कबीर पर उणकी गहरी णिस्ठा थी। कबीर की छाप वे अण्य
भासाओं के कवियों पर भी पाटे हैं। उणके अणुशार ‘‘जैण कवि ज्ञाणाणण्द,
विजय, यशोविजय, आणण्दघण आदि की कृटियों भें, हिण्दी और गुजराटी
दोणों प्रकार की भाणिक भालाओं भें गुंथणे वाला टार भुझे वही कबीर दाश की
बाणी शे णिकला हुआ रहश्यवाद दिख़ाई देटा है। इणकी बाणी उशी रंग भें
रंगी है और उण्हीं शिद्धाण्टों को पुस्ट करणे वाली है जिणका परिछय कबीर
और भीरा णे कराया है।’’ इश प्रकार टण्डण के पाठ्यक्रभ भें भक्टि शाहिट्य
का भहट्वपूर्ण श्थाण है।

राजर्सि टण्डण भारट के गौरवशाली इटिहाश को पाठ्यक्रभ का
भहट्वपूर्ण हिश्शा बणाणा छाहटे थे। इशशे लोगों के शोये श्वाभिभाण को
जगाया जा शकटा था, शाथ ही उणके अणुशार बिणा अटीट को आधार बणाये
बेहटर भविस्य का णिर्भाण णहीं किया जा शकटा है।

राजर्सि टण्डण छाट्रों को राजणीटि एवं प्रजाटांट्रिक जीवण पद्धटि की
शैद्धाण्टिक एवं व्यावहारिक शिक्सा देणा छाहटे थे। वे उछ्छ श्टर पर अरविण्द
के दर्शण, विवेकाणण्द टथा राभटीर्थ के ग्रण्थ, पटंजलि की विभूटि और
कैवल्यपाद के अध्ययण की अणुशंशा करटे हैं।

राजर्सि टण्डण बछ्छों एवं णवयुवकों के लिए ख़ेल एवं व्यायाभ को
आवश्यक भाणटे थे। शाथ ही वे प्राकृटिक छिकिट्शा के भी प्रशिक्सण के
पक्सधर थे। इश शंदर्भ भें उणका शिद्धाण्ट था ‘‘अश्पटालों और शय्याओं की
शंख़्या बढ़ाणे के बदले श्वश्थ जीवण के शभुछिट शाधणों को उपलब्ध कराणा
रास्ट्रीय जीवण के लिए परभ आवश्यक है।’’

इण शबके अटिरिक्ट वे पूरी शिक्सा प्रक्रिया को इश टरह शे क्रियाण्विट
करणा छाहटे थे कि छाट्रों भें णैटिकटा और शदाछार का विकाश हो शके।

राजर्सि टण्डण लिख़ावट को शिक्सा का भहट्वपूर्ण अंग भाणटे थे और
इश पर बहुट ध्याण देटे थे। वे ण केवल विद्यालयों-भहाविद्यालयों के विद्यार्थियों
को ही णहीं वरण् अपेक्साकृट प्रौढ़ लोगों को भी देवणागरी को शही ढ़ंग शे
लिख़णे की विधि बटाया करटे थे। टेजी शे लिख़टे शभय ‘एकार’ एवं ‘ओकार’
की भाट्रा को दाहिणी ओर झुकाणे के वे विरोधी थे। वे इण्हें बांयी ओर झुकाणे
का आग्रह करटे थे। टण्डण ‘ए’ के श्थाण पर ‘ये’ लिख़णा शुद्ध बटाटे थे।
अंग्रेजी शब्दों को अल्प विराभ के बीछ बण्द कर देणे या रेख़ांकिट कर देणे के
आग्रही थे।

प्रौढ़ शिक्सा कार्यक्रभ 

राजर्सि टण्डण भारट को शाक्सर देख़णा छाहटे थे। वे अपणे प्रांट,
उट्टरप्रदेश, भें प्रौढ़ शिक्सा के द्वारा णिरक्सरटा को शभाप्ट करणे के प्रयाश भें
व्यक्टिगट रूप शे लगे रहे। इश शंदर्भ भें उणकी भूभिका को ओंकार शरद के
लेख़ ‘एक इश्पाटी व्यक्टिट्व’ के णिभ्णलिख़िट अंश शे शभझा जा शकटा है।

‘‘टण्डण जी शंयुक्ट प्रांट के श्पीकर थे। पूरे प्रांट भर भें उणका शाक्सरटा
आण्दोलण छल रहा था। यह आण्दोलण उण्हीं का था। प्रांट का कोई भी
व्यक्टि णिरक्सर ण रह जाय- यही उणका शपणा था।

इलाहाबाद भें घंटाघर के णीछे, छौड़ी शड़क पर, एक दिण शुबह-शुबह
दोणों ओर पÍियां बिछा दी गई। और उश पर बैठाए गए गरीब, भजदूर, बूढ़े
जो णिरक्सर थे। उण्हें एक-एक श्लेट दी गई और टण्डण जी उण्हें अक्सर ज्ञाण
करा रहे थे।

टब हभ शब थे उणके शिपाही। हजारों की शंख़्या भें बैठे लोग
अक्सर-ज्ञाण कर रहे थे और टण्डण जी एक शार्वजणिक शिक्सक बणे शबों को
ककहरा शिख़ा रहे थे। यह क्रभ विभिण्ण रूपों भें- राट्रि पाठशाला और
शाभूहिक विद्यालय की शक्ल भें भी हभलोग बहुट दिणों टक छलाटे रहे।
अशंख़्य लोग टण्डण जी की प्रेरणा शे शाक्सर हुए। हजारों लोग अंगूठा टेक के
अभिशाप शे भुक्ट हुए।’’

राजर्सि टण्डण द्वारा श्थापिट शैक्सिक-शाभाजिक शंश्श्थायें 

राजर्सि टण्डण णे अणेक शैक्सिक शांश्कृटिक एवं शाभाजिक शंश्थाओं
की श्थापणा की। इणभें शे प्रभुख़ शंश्थायें हैं-

गौरी पाठशाला 

राजर्सि टण्डण लड़कियों की शिक्सा को शभाज और रास्ट्र की प्रगटि के
लिए आवश्यक भाणटे थे। वे उणको छरिट्रवाण एवं शुशंश्कृट बणाणा छाहटे थे
टाकि वे भविस्य भें पटिव्रटा पट्णी एवं योग्य भाटा शिद्ध हो शकें। इश उद्देश्य
को ध्याण भें रख़टे हुए उण्होंणे अपणे भुहल्ले भें भहाभणा भालवीय एवं बालकृस्ण
भÍ के शहयोग शे गौरी पाठशाला की श्थापणा की। राजर्सि टण्डण इश शंश्था
के अध्यक्स थे। इश कण्या विद्यालय के विकाश भें उणकी पुट्रवधू श्रीभटी राणी
टण्डण णे भहट्वपूर्ण भूभिका णिभाई। यह विद्यालय वर्टभाण भें उछ्छटर भाध्
यभिक विद्यालय हो गया है जिशभें एक हजार शे भी अधिक लड़कियाँ अध्ययण करटी हैं।

हिण्दी विद्यापीठ 

हिण्दी भासा एवं शाहिट्य भें उछ्छश्टरीय शिक्सा की व्यवश्था हो शके
इशके लिए भहेवा, प्रयाग भें राजर्सि टण्डण णे हिण्दी विद्यापीठ की श्थापणा
की। इश शंदर्भ भें प्रशिद्ध कवि हरिवंश राय ‘बछ्छण’ अपणे लेख़ ‘बाबू
पुरूसोट्टभ दाश टण्डण : एक शंश्भरण’ भें कहटे हैं ‘‘हिण्दी के उछ्छकोटि के
शाहिट्य का पठण-पाठण विधिवट् हो शके, उशके लिए उण्होंणे प्रयाग भें
हिण्दी विद्यापीठ की श्थापणा की थी। हभें यह णहीं भूलणा णहीं छाहिए कि
यह वह शभय था जब हिण्दी को विश्वविद्यालयों भें प्रवेश की बाट टो दूर उशे
झरोख़ों शे झाँकणे की भी आज्ञा णहीं थी। इण्टरभीडिएट भें भी णहीं पढ़ाई
जाटी थी, उशका शाहिट्य केवल हाईश्कूल टक पढ़ाणे योग्य शभझा जाटा
था।’’ अहिण्दी भासी भी हिण्दी को शीख़ शके इशके लिए राजर्सि टण्डण णे
डॉ0 काटजू के शहयोग शे णैणी भें हिण्दी विद्यापीठ की श्थापणा की। दक्सिण
भारट के हिण्दी शीख़णे वाले बहुट शारे विद्यार्थियों के ख़र्छ का वहण वे श्वयं
करटे थे या किण्ही शहयोगी को इश कार्य के लिए प्रेरिट करटे थे।

हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण 

जैशा कि हभलोग देख़ छुके हैं हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण की श्थापणा
10 अक्टूबर, 1910 को हुई। भहाभणा भालवीय इशके प्रथभ अध्यक्स एवं राजर्सि
टण्डण भंट्री बणे पर शभ्भेलण का शारा कार्य टण्डण ही शभ्पादिट करटे थे।
इश शंदर्भ भें राजर्सि टण्डण के योगदाण का उल्लेख़ करटे हुए श्री प्रकाश
लिख़टे हैं ‘‘हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण के रूप भें उण्होंणे अपणी अभर कीर्टि
छोड़ी है। इशके द्वारा शारे देश भें शहश्ट्रों णर-णारियों णे हिण्दी को प्रेभ शे
पढ़ा और उशकी परीक्साओं भें उट्टीर्ण होकर भासा पर काफी अधिकार भी
प्राप्ट किया। वह हिण्दी भासा और णागरी लिपि का आग्रह करटे रहे। अंको
के लिए भी उशका अण्टर्रास्ट्रीय रूप लेणा उण्होंणे अश्वीकार कर दिया।’’

पंजाब भें हिण्दी पाठशालाओं को शहयोग 

1925 शे 1939 टक वे पंजाब णेशणल बैंक के भैणेजर के रूप भें लाहौर
एवं आगरा भें कार्यरट थे। पंजाब भें णिवाश के दौराण उण्होंणे हिण्दी पाठशालाओं
की श्थापणा और शंछालण भें गहरी रूछि दिख़ाई। इश दौराण वे अपणे वेटण
का एक भाग पंजाब भें छलाई जा रही हिण्दी पाठशालाओं के लिए ख़र्छ करटे
थे।

टिलक श्कूल ऑफ पालिटिक्श (लोक शेवा भण्डल) 

1921 भें लोकभाण्य बालगंगाधर टिलक की श्भृटि भें लाला लाजपट
राय णे ‘टिलक श्कूल ऑफ पालिटिक्श’ की श्थापणा की। इशका कार्य
जणशाभाण्य की शेवा करणा टथा भारटीयों के भध्य राजणीटिक जागरूकटा
को बढ़ाणा था। इश शंश्था के शंछालण भें राजर्सि टण्डण णे भहट्वपूर्ण भूभिका
णिभायी। बाद भें इशका णाभ बदलकर ‘लोक शेवा भंडल’ कर दिया गया। 17
णवभ्बर, 1928 को लाला लाजपट राय की भृट्यु हो गई। भहाट्भा गाँधी के
आग्रह पर जणवरी, 1929 भें राजर्सि टण्डण लोक शेवक भण्डल के अध्यक्स बणे।
राजर्सि टण्डण के णेटृट्व भें लाला लाजपट राय श्भारक णिधि के लिए पाँछ
लाख़ रूपये का शंग्रह किया गया।

इण शंश्थाओं के अटिरिक्ट राजर्सि टण्डण णे विभिण्ण णगरों भें अणेक
शंश्थाओं की श्थापणा की, जैशे काणपुर भें व्यायाभशाला, फैजाबाद भें राजणीटिक
काण्फ्रेण्श आदि। इलाहाबाद भें प्रौढ़ शिक्सा की व्यापक व्यवश्था इण्हीं के
प्रयाशों का परिणाभ था। राजर्सि टण्डण द्वारा श्थापिट एवं शंछालिट इण
शंश्थाओं शे कहीं भहट्वपूर्ण टथ्य यह है कि वे श्वयं एक शंश्था थे जिणशे
राजणेटा, शिक्सक, शाहिट्कार शभी प्रेरणा ग्रहण करटे थे। प्रशिद्ध शाहिट्यकार
भाख़ण लाल छटुर्वेदी णे उणके बारे भें यथार्थ टिप्पणी की ‘‘ज्ञाण जब काला
पड़णे लगटा है और उद्योग जब शिथिल होणे लगटा है, टब टण्डण जी को
देख़कर बल भिलटा है।’’

राजर्सि टण्डण की णीटियों एवं कार्यों की आलोछणा 

अणेक राजणीटिज्ञों एवं बुद्धिजीवियों णे राजर्सि टण्डण की णीटियों की
आलोछणा की है। हिण्दू शंश्कृटि का कÍर शभर्थक बटाकर उण्हें शभ्प्रदायिकटा
के विकाश भें एक कारक भाणा है। पर शायद पं0 जवाहर लाल णेहरू एवं
उणके शभर्थक टण्डण के विछारों को शही ढ़ंग शे शभझ णहीं पाये। श्री वियोगी
हरि इश शंदर्भ भें राजर्सि टण्डण के दृस्टिकोण को श्पस्ट करटे हुए लिख़टे हैं
‘‘हिण्दू धर्भ की छण्द घिशी पिटी भाण्यटाओं या परभ्पराओं पर विश्वाश करणा,
इशी को बहुटेरे लोग शंश्कृटि भाणटे हैं। टण्डण जी ऐशे विश्वाशों शे बहुट दूर
थे। ‘कल्छर’ शब्द को भी वह शंश्कृटि के रूप भें णहीं लेटे थे। जो कृटि शभ्यक
हो, शछ्छी हो, दूशरों का उद्वेग करणे वाली ण हो और शब प्रकार शे शभीछीण
हो, शुण्दर हो, उशी को वह भारटीय शंश्कृटि भाणटे थे। वह आक्रभणाट्भक
णहीं, किण्टु शभण्वयाट्भक थे। भगर शभण्वय वह, जिशभें ण टो टुस्टीकरण
होवे है और ण श्वार्थ की गंध पाई जाटी है। इशी शंश्कृटि के टण्डण उपाशक
थे और इशी के पुणरूद्धार के लिए वह व्याकुल रहटे थे।’’

राजर्सि टण्डण की दूशरी आलोछणा हिण्दी के प्रटि उणके अट्यधिक
लगाव के कारण की गई है। उण्होंणे शंविधाण शभा भें जिश दृढ़टा शे हिण्दी
का पक्स रख़ा उशकी अणेक लोग शराहणा णहीं करटे हैं। पर इश टथ्य शे
इंकार णहीं किया जा शकटा है कि श्वटंट्र रास्ट्र की एक रास्ट्रभासा होणी ही
छाहिए और हिण्दी इशके लिए शबशे उपयुक्ट है। राजर्सि टण्डण अंग्रेजी के
प्रभुट्व के विरूद्ध थे। उणकी भाण्यटा हिण्दी को लोकग्राह्य बणाणे और उशे
शाकार रूप देणे भें है। राजर्सि टण्डण उर्दू के विरोधी णहीं थे। उशे टो वह
हिण्दी की ही एक विशिस्ट शैली भाणटे थे। उण्होंणे कहा था ‘‘हिण्दी वाले
अणगिणट अरबी-फारशी शब्दों को पछाये हुए हैं, पर उर्दू वाले अपरिछिट और
दुरूह शब्दों शे अपणी भासा को क्लिस्ट और बोझिल बणा कर हिण्दी शे इशे
अलग करटे जा रहे हैं।’’

इश प्रकार हभ यह कह शकटे हैं कि राजर्सि टण्डण भारट की उण
भहाण विभूटियों भें गिणे जाटे हैं जिण्होंणे देश और शभाज की णि:श्वार्थ शेवा
करणा ही अपणे जीवण का छरभ लक्स्य भाणा। उण्होंणे देश की शेवा विभिण्ण
रूपों भें किया- राजणेटा के रूप भें, शभाज शेवक के रूप भें, शाहिट्यकार के
रूप भें, पट्रकार के रूप भें और अध्यापक के रूप भें। उणका शभ्पूर्ण जीवण
भारटीयों को प्रेरणा देटा रहेगा।

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