प्रबंध किसे कहते हैं?

By | February 15, 2021


प्रबंध से आशय कर्मचारियों के उस समूह से है जो व्यापार के निर्धारित
उद्देश्यों एवं नीतियों के क्रियान्वयन हेतु उत्तरदायी होता है। जो व्यक्ति इस कार्य को
करते हैं उन्हें ‘प्रबंधक’ कहते हैं। प्रबंध, वास्तव में एक सामाजिक प्रक्रिया होती है।
जिसके द्वारा किसी संस्था के उपलब्ध संसाधनों तथा कर्मचारियों के प्रयासों में इस
प्रकार समन्वय स्थापित किया जाता है जिससे संस्था के लक्ष्यों को सुव्यवस्थित,
सुसंगठित दक्षतापूर्ण एवं प्रभावी ढंग से सम्पन्न किया जा सके।

इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग हैं – नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण तथा
नियंत्रण। इस प्रकार प्रबंध उद्योग की वह शक्ति है जो नियम सीमाओं के अन्तर्गत
नीतियों के क्रियान्वयन तथा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संगठन का उपयोग करती है।
व्यापक दृष्टि से प्रबंध हमारी अर्थव्यवस्था को आकार प्रदान करता है और सुयोग्य
कर्मचारियायें की नियुक्ति के द्वारा अधिकतम लाभ प्रदान करता है। वस्तुत: प्रभावी
प्रबंध से ही सफलता की अपेक्षा की जा सकती है। प्रबंध आर्थिक व सामाजिक विकास
की धुरी है। यह वह शक्ति है जो मिट्टी को सोना बना सकता है। यह वह संजीवनी
है जिसका प्रयोग समाज की समस्त समस्याओं के लिए समान रूप से उपयोगी व
कारगर सिद्ध हो सकती है।

प्रबंध की कोई ऐसी परिभाषा नहीं दी जा सकती जो सर्वमान्य हों। प्रबंध
गुरूओं ने अपने अपने ढंग से इसकी अवधारणाएं दी हैं। प्रबंध की अवधारणा उस लघु
कथा के समान है जिसमें अन्धे व्यक्तियों ने एक हाथी को पकड़ लिया और जिसके
हाथ में उसका जो अंग आया उसी के अनुरूप वह हाथी के सम्बन्ध में अपने विचार
व्यक्त करने लगे। हाथी की पूंछ पकड़ने वाले ने गजराज को सॉंप, पॉंव पकड़ने वाले
ने खम्भा, सूॅंड पकड़ने वाले ने बांस, कान पकड़ने वाले ने सूप और जिसका हाथ पेट
पर पड़ा, उसने उसे मूशक जैसा बताया। इसी प्रकार विभिन्न विद्वानों ने प्रबंध को जिस
रूप में समझा उन्होंने उसी के समान उसकी अवधारणा प्रकट की। इस प्रकार
अनायास ही प्रबंध की अनेक अवधारणाएं विकसित हो गई हैं । उनमें से कुछ
महत्वपूर्ण अवधारणाएं इस प्रकार हैं।

प्रबंध की अवधारणा

प्रक्रिया विचारधारा 

इस विचारधारा में प्रबंध की परिभाषा का आधार प्रबंधकों के कार्यों से है जिसे
प्रबंधक समेकित रूप से संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु कार्य करता है। इस
विचारधारा के प्रमुख तत्व में पूर्वानुमान व नियोजन, संगठन, आदेश, संयोजन और
नियंत्रण आदि आते हैं। नीचे अंकित चित्र प्रबंध की इस अवधारणा को और स्पष्ट करेगा।

प्रबंध

प्रबंधक
प्रबंधक प्रबंधक अभिप्रेरण नियंत्रण
समुदाय की सन्तुष्टि हेतु श्रेष्ठम व कुशलतम
उपयोग के लिए निम्न साधनों का प्रयोग करना है।
मानव माल मशीन विधि मुद्रा
जिससे प्राप्त होते हैं
निर्धारित लक्ष्य
उपरोक्त चित्र को ऊपर से नीचे की ओर व्याख्या करने से यह ज्ञात होता है
कि ‘‘प्रबंध, वास्तव में एक प्रक्रिया है । नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण, तथा नियंत्रण
जिसके आधारभूत अंग हैं तथा जो समुदाय को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करने हेतु
मानव, माल, मशीन, विधि व मुद्रा जैसे संसाधनों का प्रयोग करता है तथा पूर्व निर्धारित
उद्देश्यो को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

जिस प्रकार कप्तान के अभाव में एक क्रिकेट टीम इधर-उधर भटक सकती है।
उसी प्रकार प्रबंध के अभाव में समुदाय के समस्त प्रयास निरर्थक हो सकते हैं प्रत्येक
सामुदायिक प्रक्रिया में श्रमिक वर्ग टीम के खिलाड़ी और प्रबंध वर्ग उसका कप्तान की
भॉंति होते हैं।

मानव प्रधान अवधारणा 

इसके अनुसार 20वीं शताब्दी के चौथे दशक में समाजशास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों
के दबाव के कारण इस अवधारणा का विकास माना जाता है। इसके अनुसार प्रबंध
दूसरों से कार्य कराने की कला व विज्ञान है। इस अवधारणा के समर्थक यह मानते हैं
कि मानव का विकास करके ही संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस
विचारधारा में संगठन के मानवीय पहलू पर बल दिया गया है, चूॅंकि प्रबंधकीय कार्य
मानवीय संबंधों पर आधारित है इसलिए प्रबंध एक सामाजिक प्रणाली है। प्रबंध केवल
संगठन को दिशा प्रदान करने के लिए ही नहीं है। यह मानव के विकास के लिए भी
उत्तरदायी है। संक्षेप में, प्रबंध की यह अवधारणा यह स्वीकार करती है कि न्यूनतम
लागत और प्रयासों से संस्था के लक्ष्यों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जबकि
प्रबंध अपने कर्मचारियों का विधिवत विकास करें।

वस्तुत: मनुष्य का व्यक्तित्व एक अविकसित पुष्प की भांति होता है। जिसे
प्रबंध के द्वारा ही पल्लवित किया जा सकता है। जिस प्रकार एक कुशल माली अपनी
वाटिका के वृक्षों के खाद-पानी एवं प्रकाश की उत्तम व्यवस्था करके वृक्षों के लिए सुरक्षा
करता है उसी प्रकार एक कारखाने में प्रबंध रूपी माली व्यवसायिक पर्यावरण को
विकसित करके उपभोक्ताओं को सुख, शान्ति एवं संतोष प्रदान कर सकता है। इसमें
कारखानें तथा उद्योग का विहित भी छिपा रहता है। इसी तथ्य के आधार पर एक बार
अमरीकन कारपोरेशन के अध्यक्ष ने अपने कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए कहा था, ‘‘हम
मोटर, हवाई जहाज, फ्रिज, रेडियो या जूते के फीते का निर्माण नहीं करते बल्कि हम
बनाते हैं मनुष्य और इन मनुष्य उत्पादों का निर्माण करते हैं।’’ यह कथन सुस्पष्ट करता
है कि ‘प्रबंध मनुष्यों का विकास है न कि उत्पादों का निर्देशन ।’’

निर्णयन विचारधारा 

इस विचारधारा के अनुसार प्रबंध नियम बनाने तथा उनका अनुपालन कराने
वाली संस्था है। प्रबंधक जो भी कार्य करता है निर्णय उसका आधार होता है। एक
प्रबंधक का अधिकतर समय निरंतर निर्णय लेने में ही व्यतीत होता है। निर्णय लेने की
क्षमता ही संगठन को उत्पादनशील एवं प्रभावी बनाने की गतिशील शक्ति है। अत:
प्रबंधक अच्छे निर्णयों के द्वारा ही न्यूनतम लागत सुव्यवस्थित तथा प्रयासों से उद्देश्यों
को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार प्रबंध की सफलता हेतु श्रेष्ठ निर्णयन परमावश्यक
है।

प्रबंध की विशेषताएँ 

  1. प्रबंध विविध विषयों द्वारा विकसित ज्ञान तथा अवधारणाओं के समन्वय एवं व्यवहार की कला व विज्ञान है।
  2. प्रबंध व्यक्ति नहीं, वरन् एक प्रक्रिया है जिसके अंग हैं, नियोजन, संगठन, अभिप्रेरण व नियंत्रण ।
  3. प्रबंध के पूर्व निर्धारित कुछ लक्ष्य व उद्देश्य होते हैं।
  4. अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रबंध संगठन का उपयोग करता है।
  5. प्रबंध एक गतिशील व परिवर्तनशील सामाजिक प्रक्रिया है जो समूहों के प्रयास से सम्बन्धित है।
  6. प्रबंध में काम करने के लिए पदानुक्रम व्यवस्था बनाई जाती है जिसके अनुसार कुछ अधिकारी व अधीनस्थ होते हैं। ऐसी व्यवस्था संगठन के अनेक स्तरों पर बनाई जा सकती है।
  7. सुचारू प्रबंध हेतु अधिकारी का प्रत्यायोजन किया जाता है तथा आदेश प्रसारित किए जाते हैं।
  8. प्रबंध प्रत्येक संस्था का अनिवार्य अंग होता है क्योंकि वह साधनों की प्रभावशीलता एवं दक्षता को बढ़ाकर अधिकाधिक उत्पादकता का सृजन करने में योगदान देता है।

प्रबंध कर्मचारियों को नेतृत्व देने का प्रयास करता है तथा उन्हें सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा क्रमबद्ध रूप से कार्य सम्पन्न करने के लिए अभिप्रेरित करने का प्रयास करता है। संकुचित अर्थ में प्रबंध अन्य व्यक्तियों से कार्य कराने की युक्ति से है। इस प्रकार जो अन्य व्यक्तियों से काम कराने की क्षमता रखते हैं, उन्हें ‘प्रबंधक’ की संज्ञा दी जाती है। व्यापक अर्थ में प्रबंध एक कला एवं विज्ञान है जो पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उत्पादन के विभिन्न घटकों में समन्वय स्थापित करता है। इस दृष्टि से यह स्वयं उत्पादन का एक महत्वपूर्ण घटक है।

उत्पादन के विभिन्न साधनों में भूमि, पूॅंजी व मशीन गैर-मानवीय साधन हैं, जबकि श्रम, साहस व प्रबंध मानवीय साधन हैं। उत्पादन के ये सभी साधन अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं,किन्तु ‘प्रबंध’ इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह वो आर्थिक साधन है जो उत्पादन के साधनों को एकत्र करता है, नियोजन करता है, संस्था में संगठनात्मक भावना का संचार करता है, व्यावसायिक क्रियाओं का निर्देशन संचालन व समन्वय स्थापित करता है तथा समस्त क्रियाओं पर नियंत्रण रखता है। संक्षेप में, ‘प्रबंध एक कला एवं विज्ञान है जो एक संस्था के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों के व्यक्तिगत व सामूहिक प्रयासों के नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय एवं नियंत्रण से सम्बन्धित होता है।

    प्रबंध के विभिन्न स्तर एवं कार्य 

    आधुनिक प्रतियोगात्मक व्यवसायिक युग में संस्था का स्वामित्व एवं प्रबंध
    पृथक पृथक होते हैं और प्रबंध के भी विभिन्न स्तर होते हैं। प्रबंध के विभिन्न स्तरों के
    अन्तर्गत प्रबंधकीय क्रम व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। प्रबंधकीय क्रम व्यवस्था
    से आशय किसी संस्था के प्रबंधक वर्ग में अधिकारी एवं अधीनस्थों का सम्बन्ध रखने
    वाले विभिन्न पदों से है। प्रबंधकीय क्रम व्यवस्था अथवा प्रबंध के स्तर एक प्रकार का
    खाका है जो इस बात को स्पष्ट करता है कि किस अधिकारी की क्या स्थिति है कौन
    किसको आदेश देगा तथा कौन किससे आदेश प्राप्त करेगा।

किसी संस्था में प्रबंध के
कितने स्तर होंगे यह संस्था के आकार एवं कार्यों पर निर्भर करता है। जैसे जैसे संस्था
का आकार एवं कार्यों का विस्तार होता जाता है, प्रबंध वर्ग के अन्तर्गत अधिकारी एवं
अधीनस्थों की श्रृंखला का विस्तार भी हो जाता है। 

प्रबंध के विभिन्न स्तर एवं कार्य
 प्रबंधकीय स्तर

प्राय: प्रबंध के स्तर अथवा
प्रबंधकीय क्रम व्यवस्था को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. उच्च प्रबंध 
  2. मध्य प्रबंध, एवं 
  3. निम्न स्तरीय प्रबंध, 

उच्च प्रबंध – 

व्यावसायिक उपक्रम में यह प्रबंध सर्वोच्च स्तर होता है।
इसके अन्तर्गत संचालक मण्डल, प्रबंध निदेशक/जनरल मैनेजर एवं सचिव आदि को
सम्मिलित किया जाता है। इनके प्रमुख कार्य व्यावसायिक उपक्रम में सफल संचालन
हेतु उद्देश्य एवं लक्ष्यों का निर्धारण है। महत्वपूर्ण निर्णय लेना, नीतियां बनाना और यह
देखना कि नीतियां प्रभावोत्पादक तरीके से लागू की जा रही है या नहीं तथा उपक्रम
के परिणामों का मूल्यांकन करना है। उच्च प्रबंध के कार्यों को निम्न दो भागों में
विभाजित किया जा सकता है –

निर्णय सम्बन्धी कार्य – पुन: उच्च निर्णय सम्बन्धी कार्यों को पॉचं भागों में
विभक्त किया जा सकता है। 

  1. निर्णय एवं उनकी पुष्टि, 
  2. योजना बनाना, लक्ष्यों को निर्धारित करना, तकनीकी प्रक्रिया निर्धारित
    करना, संगठन संरचना निश्चित करना, समन्वय करना एवं प्रमुख
    अधिकारियों की नियुक्ति, 
  3. सामान्य एवं विशिष्ट नीतियों को परिभाषित करना तथा उनकी
    व्याख्या, 
  4. नीतियों के क्रियान्वयन के लिए अधीनस्थों को अधिकार देना, एवं 
  5. वित्त व्यवस्था के लिये साधन निर्धारित करना एवं लाभों का वितरण
    करना। 
    1. न्यायिक कार्य- उच्च प्रबंध के न्यायिक कायों को पुन: तीन भागों में बॉटां
      जा सकता है –

    1. उपलब्धियों तथा लक्ष्यों की तुलना करना, 
    2. उपलब्धियों की लागत से मूल्यांकन करना तथा वैकल्पिक सम्भावनाओं
      का मूल्यांकन करना, एवं 
    3. निर्णय तथा आदेश के सम्बन्ध में परामर्श। 
      1. मध्य प्रबंध – 

        प्रबंध के इस स्तर के अन्र्तगत कनिष्ठ प्रबंधक, अधीक्षक,
        जनरल श्रम अधिकारी आदि अधिकारियों को सम्मिलित किया जाता है। मध्य प्रबंध के
        प्रमुख कार्य इस प्रकार हो सकते हैं –

        1. संगठन का संचालन
        2. आपस में समन्वय, 
        3. महत्वपूर्ण नीतियों के सम्बन्ध में विभागों के पारस्परिक सम्बन्धों को
          समझना, 
        4. संगठन के विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करना, 
        5. अधीनस्थों को संतुष्ट करना एवं उनको कार्यकुशल बनाना और उनकी
          योग्यतानुसार पारिश्रमिक की व्यवस्था करना, 
        6. प्रशिक्षण की व्यवस्था करना एवं 
        7. उपक्रम भावना को विकसित करना आदि।

        निरीक्षक वर्ग/निम्न स्तरीय प्रबंध – 

        निम्ननिरीक्षक वर्ग/निम्नस्तरीय
        प्रबंध श्रमिकों में प्रबंध का एवं प्रबंध में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरों शब्दों
        में निरीक्षक वर्ग एवं फोरमैन प्रबंध की अन्तिम कड़ी है जो प्रबंधकीय कर्मचारियों और
        गैर प्रबंधकीय कर्मचारियों में समन्वय रखता है। इसलिये संस्था के सफल संचालन में
        प्रबंध के इस स्तर का विशेष महत्व है। निरीक्षक वर्ग में वे सभी अधिकारी सम्मिलित
        किये जाते हैं जो कार्यालय, कारखाना, विपणन आदि क्षेत्रों में कार्य करने वाले
        कर्मचारियों के ऊपर पर्यवेक्षण का कार्य करते हैं। निरीक्षक वर्ग द्वारा किये जाने वाले
        प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –

        1. प्रत्येक क्रियाशील कर्मचारी के लिये कार्य योजना का निर्माण, सारणी
          बनाना और उसे कार्य सौपना। 
        2. स्टोर से सामग्री एवं यंत्र एवं उपकरणों को प्राप्त करना एवं क्रियाशील
          कर्मचारियों को देना, 
        3. क्रियाशील कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना एवं कार्य सम्बन्धी आदेश
          देना, 
        4. कार्य करने का स्वस्थ वातावरण बनाये रखना एवं अनुशासन बनाये
          रखना, 
        5. आवश्यक मात्रा में उत्पादन करना, 
        6. कार्य करने की दशाओं में सुधार करना, मशीनों एवं उपकरणों की
          देखभाल, 
        7. क्रियाशील कर्मचारियों में मनोबल और सहयोगी भावना का विकास
          करना, 
        8. क्रियाशील कर्मचारियों को अधिक कार्य करने के लिए प्रेरणायें प्रदान
          करना, 
        9. अनुपस्थिति की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना तथा, 
        10. उत्पादन विधियों में सुधार करना, एवं क्रियाशील कर्मचारियों की
          शिकायतें दूर करना। 

        क्रियाशील कर्मचारी – 

        इस श्रेणी के अन्तर्गत ऎसे कर्मचारियों को सम्मिलित
        किया जाता है जिनको प्रबंधकीय अधिकार प्राप्त नहीं होते लेकिन वे स्वयं अपने कार्य
        एवं उपकरणों का प्रबंध करते हैं। इस वर्ग का प्रत्येक कर्मचारी निरीक्षक द्वारा सौंपे गये
        सारे कार्य को करता है और अपने कार्य के लिए निरीक्षक के प्रति उत्तरदायी होता है।
        अनौपचारिक आधार पर कभी कभी ऐसे कर्मचारी अपने में से किसी एक को अपना
        मुखिया अथवा नेता मान लेते हैं और उसके आदेश एवं निर्देश के अनुसार कार्य करते
        हैं। लेकिन ऐसे मुखिया अथवा नेता को औपचारिक तरीके से प्रबंध के अधिकार नहीं
        दिये जाते हैं। प्रबंधकीय क्रम व्यवस्था के उपर्युक्त वर्णित तीन स्तरों के बीच विभाजन
        की कोई रेखा नहीं खींचीजा सकती है। प्रबंध के स्तरों की संख्या व्यावसायिक उपक्रम
        के आकार एवं स्वभाव की आवश्यकतानुसार कम अथवा अधिक हो सकती है।

        प्रबंध के सामाजिक उत्तरदायित्व 

        आज औद्योगिक क्षेत्र के बढ़ते हुए स्वरूप के साथ साथ प्रबंध की विचारधारा
        का दृष्टिकोण भी अत्यधिक विस्तृत हो गया है। प्रारम्भिक अवस्था में प्रबंध केवल
        नियोक्ता के प्रति ही उत्तरदायी था परन्तु आज यह सम्पूर्ण समाज के प्रति उत्तरदायी
        है। आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में प्रबंध का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं

        रह गया है अपितु प्रबंध समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते
        हुए उत्पादन कार्य को सम्पन्न करना भी है जिससे प्रबंध न्यूनतम लागत पर श्रेष्ठतम
        उत्पाद उपलब्ध करा सके। आज के युग में प्रबंध उपभोक्ताओं के उत्पादों की गुणवत्ता
        तथा विशेषताओं के संबंध में जानकारी प्रदान करता है। इस प्रकार प्रबंध अर्थव्यवस्था
        में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। आइये सामाजिक दायित्व के क्षेत्रों को और
        गहराई से समझने का प्रयास करें –

        1. देश की प्राकृतिक सम्पदा का व्यवस्थित व श्रेष्ठ उपयोग करना जिससे राष्ट्र
          समृद्ध हो सके। 
        2. उपभोक्ताओं को पर्याप्त मात्रा में उच्च गुणवत्ता के सस्ते उत्पाद व सेवाऐं
          उचित समय व स्थान पर उपलब्ध कराना तथा मूल्यों में स्थायित्व बनाए रखना तथा
          उनमें अत्यधिक वृद्धि को रोकना। 
        3. पूॅंजीपतियों, अंशधारियों व ऋणदाताओं द्वारा लगायी गयी पूॅंजी की सुरक्षा एवं
          लाभांश की व्यवस्था करना। 
        4. बेरोजगारी की समस्या के निवारणार्थ रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर प्रदान
          करना। प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना तथा सामाजिक कल्याण की
          व्यवस्था करना, जैसे विद्यालय व महाविद्यालय खोलना, शिशु सदन, धर्मशाला, मंदिर,
          मनोरंजनालय, चिकित्सालय, आदि की व्यवस्था करना। 
        5. सरकार द्वारा प्रतिपादित नीतियों, नियमों व कानून का पालन सुनिश्चित करना,
          राज्य द्वारा लगाए गये करों को ईमानदारी के साथ चुकाना। 
        6. धूल, धुऑं, गन्दा जल, विषैले रासायनिक पदार्थ आदि से होने वाले प्रदूषण को
          रोकना तथा वृक्षारोपण को बढ़ावा देना। 
        7. समाज की संस्कृति व प्रचलित परम्पराओं की रक्षा करना तथा लोकतंत्र,
          समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को प्रोत्साहित करना। 

        प्रबंध के सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने के पश्चात आइये इसके
        धनात्मक पहलुओं का विश्लेषण करें, जिसके कारण व्यवसायिक संस्थाओं को इन्हें
        अपनी कार्य प्रणाली में सम्मिलित करना चाहिये।

        1. यद्यपि सामाजिक उत्तरदायित्व को पूर्ण करने में व्यवसाय को समय और धन
          का व्यय करना पड़ता है, किन्तु वास्तव में यह व्यय नहीं वरन निवेश है जिसमें व्यवसाय
          का दीर्घकालीन हित छुपा होता है क्योंकि इससे व्यवसाय में शामिल सभी उपभोक्ता,
          कर्मचारी, पूर्तिकर्ता आदि लाभान्वित होते हैं एवं संतुष्ट रहते हैं।
        2. अपने उद्देश्यों में सामाजिक दायित्व का समावेश, किसी भी व्यवसाय की
          समाज में छवि उज्जवल होती है।
        3. प्राय: जो संगठन सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह विधिपूर्वक सुव्यवस्थित
          ढंग से करते हैं, उनसे समाज ही नहीं वरन सरकार भी संतुष्ट रहती है तथा सरकार
          ऐसे व्यवसायों की सहायता करती है। 
        4. समाज भी ऐसी संस्थाओं को धनात्मक दृष्टि से देखता है तथा इनकी कमियों
          के आलोचनाओं के प्रति जनता का ध्यान नहीं जाता। 
        5. सामाजिक दायित्व की मांग काफी हद तक व्यवसाय की सफलता का मूल्य
          है। इससे जनसाधारण के जीवन स्तर की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। 
        6. सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना आर्थिक उत्पादन तो बढ़ाती ही है, साथ ही
          देश के संसाधनों व संस्कृति की भी रक्षा होती है। संसाधनों के सदुउपयोग से राष्ट्रीय
          सम्पत्ति में वृद्धि होती है। 
        7. इस भावना के फलस्वरूप ही अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं स्वत:
          समाप्त हो जाती है। जैसे – बेरोजगारी की समस्या, बीमारी, अज्ञानता, आवास की
          समस्याएं आदि। 
        8. किसी व्यवसाय द्वारा सामाजिक दायित्वों का निर्वहन व्यवसाय के नैतिक
          व्यवहार का एक आवश्यक अंग हैं। सामाजिक दायित्व व्यवसाय के नैतिक दायित्व का
          निर्माण करते हैं। व्यवसाय मात्र धर्नाजन का उपकरण ही नहीं हैं। 
        9. सामाजिक उत्तरदायित्व का उद्देश्य व्यवसाय के वाणिज्यिक और आर्थिक
          हितों में वृद्धि करता है और उसे प्रत्यक्ष रूप से शक्ति प्रदान करता है। सामाजिक
          शक्ति की सुरक्षा भी सामाजिक उत्तरदायित्व से ही हो सकती है। ऐसी संस्थाएं वैध
          सामाजिक मूल्यों और हितों के विरूद्ध कोई काम नहीं कर सकती।

        इस प्रकार यहॉं सामाजिक उत्तरदायित्व के धनात्मक पक्ष ही नहीं बल्कि
        इसकी कुछ सीमायें भी हैं। जिसका विश्लेषण इस प्रकार से है –

        1. सामाजिक दायित्व के पालन के साथ-साथ प्रबंधक को अपने आर्थिक लाभों
          को संरक्षित कर लेना चाहिए। आर्थिक दृष्टि से कमजोर संगठन अपने सामाजिक
          दायित्व को सुव्यवस्थित रूप से नहीं निभा सकते। आवश्यकता यह है कि सामाजिक
          दायित्व एवं आर्थिक सुदृढ़ता के मध्य समन्वय एवं संतुलन लेकर चला जाए। 
        2. प्रबंधक को यह भी निश्चित करना चाहिए कि क्या वह सामाजिक दायित्व का
          निर्वहन कर सकता है या नहीं। ऐसा न करने पर सामाजिक दायित्व को निभाने के
          परिणाम निरर्थक व असंतुलित हो सकते हैं। 
        3. सामाजिक दायित्व के कुछ क्षेत्र गैरकानूनी हो सकते हैं, जैसे राष्ट्रीय शिक्षा
          नीति के विरूद्ध शिक्षा देना आदि। व्यवसाय समाज का सेवक है। मालिक नहीं अत:
          सरकार की तरह प्रबंधकों का काम नहीं हो सकता। इस प्रकार जो भी कार्य किया जाए
          वह अधिकार की सीमा के बाहर नहीं होना चाहिए। 

        उपर्युक्त विवेचनाओं से यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त सीमाओं के अन्तर्गत ही
        सामाजिक उत्तरदायित्व का कार्य होना चाहिए। आधुनिक युग में यह विचार उत्तरोत्तर
        प्रगति पर है कि प्रबंध को सामाजिक दायित्व में अपनी भूमिका को प्रभावपूर्ण एवं
        सुव्यवस्थित ढंग से स्वीकार करना चाहिए। जिससे समाज निरन्तर प्रगति के पथ पर
        अग्रसारित हो सके।

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