प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग

By | February 15, 2021


प्रोटीन जन्तु तथा वनस्पति दोनों साधनों से
प्राप्त होता है। प्रोटीन का निर्माण प्रारम्भिक रूप से वनस्पति में ही होता है।
वनस्पति भूमि से नाइट्रोजन, जल, हवा आदि लेकर प्रोटीन का निर्माण करते हैं
तथा अपने बीजों में संग्रह करते हैं। मनुष्य जन्तु एवं वनस्पति दोनों माध्यम से
प्रोटीन का उपयोग करता है, परन्तु जन्तु प्रोटीन अधिक उपयोगी होती है। जैसे-
मांस, मछली, अण्डा, पक्षी, दूध, पनीर, खोआ आदि।

कुछ वनस्पति प्रोटीन भी हमारे शरीर के लिए बहुत उपयेागी होती है।
जैसे- सोयाबीन, सूखे मेवे, मूंगफली, सेम आदि। दूसरे वनस्पति पदार्थ जिनकी
प्रोटीन अधिक उपयोगी नहीं होती है अन्य भोज्य पदार्थ के साथ मिलकर
उपयोगिता बढ़ा देती है। जैसे- दालें, मटर विभिन्न अनाज आदि। फल व
सब्जियों में प्रोटीन नगण्य व अत्यंत निम्न कोटि की होती है।

प्रोटीन के गुण

कुछ प्रकार की प्रोटीन जल में घुलनशील होती है। जैसे- दूध की केसीन,
अण्डे की एल्बूमिन, रक्त की पलाज्मा प्रोटीन। पर कुछ प्रकार की प्रोटीन पानी में
घुलनशील नहीं होती है। जैसे- विभिन्न वनस्पति प्रोटीन, मांस का प्रोटीन आदि।
प्रोटीन गर्म करने पर अथवा अम्ल की क्रिया से जम जाती है। जैसे- उबले अण्डे
की प्रोटीन, उबले मांस की प्रोटीन तथा नींबू या सिरका पड़े दूध की प्रोटीन। कुछ
प्रोटीन अम्लीय व क्षारीय होते हैं।

शरीर में प्रोटीन के कार्य

  1. प्रोटीन का प्रमुख कार्य शरीर का निर्माण करना है। मात्रा की दृष्टि से
    पानी के बाद प्रोटीन की उपस्थिति शरीर में सबसे अधिक होती है।
    शरीर के सभी अंग जैसे- बाल, नाखून, त्वचा, ग्रंथियों, अस्थियों व
    मांसपेशियों आदि में प्रोटीन उपस्थित रहता है। वृद्धि के अवस्थाओं,
    जैसे- शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था,गर्भावस्था आदि में विषेश
    रूप से प्रोटीन अधिक आवश्यक होती है क्योंकि इन अवस्थाओं में नए
    ऊतकों का तेजी से निर्माण होता है।
  2. नए ऊतकों के निर्माण के अतिरिक्त शरीर में टूट-फूट के पुन: निर्माण
    के लिए भी प्रोटीन आवश्यक होती है।
  3. रक्त में एक अन्य प्रोटीन जिसे काइब्रिनोजन कहते हैं पाई जाती
    है जो चोट के समय होने वाले रक्त प्रवाह को रोकने का कार्य
    करता है।
  4. आवश्यक शारीरिक यौगिकों का निर्माण – i. हार्मोन्स जैसे इन्सूलिन, एपीनैफ्रिन तथा थायराक्सिन प्रोटीन
    निर्मित होते हैं। ii. सभी एनजाइम प्रोटीन निर्मित होते हैं। परन्तु सह एंजाइम्स
    विटामिन द्वारा संयुक्त होते हैं। iii. रक्त में पाया जाने वाले पदार्थ हीमोग्लोबिन प्रोटीन आधारित हैं।
    iv. आँख में पाया जाने वाला पदार्थ रोडोप्सिन जो कि दृष्टि में
    सहायक होता है प्रोटीन द्वारा बनता है। v. प्रोटीन ट्रिप्टोफैन नायसिन के तरह कार्य करता है। मस्तिष्क में
    यह सिरोरिम की तरह कार्य करता है। टायरोसिन नारएपीनैफ्रिन
    की तरह कार्य करता है।
  5. पानी के संतुलन का नियंत्रण करना – शरीर कोशिकाओं के दोनों ओर
    द्रव का स्तर निश्चित रहे। यह संतुलन रक्त प्रोटीन तथा
    इलैक्ट्रोलाइट्स द्वारा बनाए रखा जाता है। रक्त में उपस्थित प्रोटीन
    कण, रक्तवाहिनीयों की दीवार द्वारा बाहर नहीं आ पाते तथा वहाँ से
    परासरण दबाव डालते हैं। जिससे परासरण विधि द्वारा पुन: द्रव रक्त
    संचार में आ जाता है तथा अन्त:कोषिका स्थान में द्रव एकत्रित होने
    लगता है जिससे ऊतक स्पंजी हो जाते हैं तथा यह स्थिति इडीमा
    कहलाती है तथा मुख्यत: प्रोटीन की कमी द्वारा होती है।
  6. प्रोटीन बफर की तरह कार्य करता है जिनमें अम्ल तथा क्षार दोनों को
    करने की क्षमता होती है। यह शरीर में ज्यादा अम्ल तथा क्षार जमा
    होने से रोकते हैं।
  7. प्रतिरक्षी कोशिकाओं का निर्माण – एण्टीबॉडी जो कि शरीर के संक्रामक
    इत्यादि की रक्षा करती है। स्वयं प्रोटीन निर्मित करती है।
  8. पोषक तत्वों  का संवहन – प्रोटीन पोषण तत्वों  के आत्रंनली के रक्त मे संवहन में सहायक होते हैं तथा रक्त से विभिन्न कोशिकाओं में पहुँचाने
    में सहायक होते हैं। विभिन्न तत्वों के लिए विभिन्न प्रोटीन वाहक
    होते हैं जिनकी सतह से जुड़कर पोषक तत्व आंत्र नली से रक्त में
    पहुँचते हैं।

प्रोटीन की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले तत्व 

विभिन्न अवस्थाओं
में प्रोटीन की आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक व्यक्ति को भी प्रोटीन की
आवश्यकता में अन्तर होता है। इस आवश्यकता को प्रभावित करने वाले निम्न
कारक हो सकते हैं –

  1. शरीर का आकार – शरीर का आकार भार अथवा डीलडोल से भी
    प्रोटीन की आवश्यकता प्रभावित होती है। यदि व्यक्ति के शरीर का
    आकार अथवा डीलडौल अच्छा है तो उसे छोटे आकार के व्यक्ति की
    अपेक्षा अधिक प्रोटीन लेना चाहिए।
  2. प्रोटीन का पोषक महत्व – प्रोटीन या पोषक महत्व भी प्रोटीन
    आवश्यकता को प्रभावित करता है। यदि व्यक्ति पूर्ण प्रोटीन लेता है तो
    उसका जैवकीय मूल्य अधिक होने के कारण वह शरीर के लिए पूर्ण
    उपयोगी होगी।,
  3. कैलोरी आवश्यकता की पूर्ति – कैलोरी आवश्यकता की पूर्ति यदि
    कार्बोहाइड्रेट वसा से हो रही है तो प्रोटीन अपने प्रमुख कार्य करने के
    लिए ही आवश्यक होगी। यदि कैलोरी आवश्यकता की पूर्ति अन्य माध्यम
    से नहीं हो पा रही है तो प्रोटीन की आवश्यकता अधिक होगी।
  4. पोषक की पूर्व स्थिति – यदि व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ है तो उसको
    प्रोटीन दैनिक आवष्यकता के अनुसार ही चाहिए पर यदि व्यक्ति
    अस्वस्थ है अथवा पहले से उसमें प्रोटीन हीनता है अथवा कुपोशित है
    तो उसमें प्रोटीन पुरानी कमी को पूरी करने के लिए भी आवश्यक
    होगी।
  5. पाचन क्षमता – प्रोटीन की पाचन क्षमता भी प्रोटीन की आवश्यकता को
    प्रभावित करती है। यदि शरीर की प्रोटीन पाचन क्षमता कम है तो
    अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होगी।
  6. विशेष अवस्थाएँ – जैसे- वृद्धावस्था, गर्भावस्था, दूग्धपान अवस्था तथा
    ज्वर के बाद की अवस्थाएँ भी प्रोटीन आवश्यकता को प्रभावित करती
    है। इसी तरह शरीर जल जाने के बाद तथा आपरेशन के बाद की
    समस्याओं में भी अधिक प्रोटीन की आवश्यकता है क्योंकि इन
    अवस्थाओं में भी नए ऊतकों का निर्माण तेजी से होता है।


प्रोटीन के विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातें –

  1. प्रोटीन शरीर के सभी ऊतकों का निर्माण करता है और उनकी मरम्मत
    व क्षतिपूर्ति करता है।
  2. ग्रंथियों के स्रावों, हार्मोनों, पाचक अन्य एंजाइमों का निर्माण करता है। 
  3. रोग निरोधक पदार्थों को बनाता है।
  4. शरीर को ऊर्जा व ताप भी प्रदान करता है। इससे 1 ग्राम से 4 कैलोरी
    ऊर्जा प्राप्त होती है।
  5. प्रोटीन कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन से बनता है।
    कभी-कभी इसमें गंधक, लोहा या फॉस्फोरस भी पाया जाता है।
  6. एमिनो एसिड प्रोटीन की रासायनिक इकाईयाँ हैं।
  7. जिस प्रोटीन में आवष्यक एमीनो एसिड पाए जाते हैं वह उत्तम वर्ग का
    है, पषुजन्य प्रोटीन उत्तम वर्ग का प्रोटीन है, वनस्पतिक प्रोटीन उससे
    कम महत्वपूर्ण का है।
  8. दोनों प्रकार के प्रोटीन के साथ-साथ खाने से घटिया प्रोटीनों की कमी
    उत्तम प्रोटीन के एमीनो एसिडो से पूर्ण हो जाती है।
  9. पर्याप्त प्रोटीनों से लाभ – सुगठित, सुविकसित व स्फूर्तिवान शरीर
    उत्तम स्वास्थ्य रोगों से बचाव शीघ्र मुक्ति, घाव का शीघ्र भरना, शल्य
    चिकित्सा में लाभ।
  10. आहार नियोजन में प्रोटीन की मात्रा निर्धारित करने की आयु विषेश
    परिस्थितियों, शरीर विकास की अवस्था, कैलरी की पर्याप्तता तथा
    प्रोटीन के प्रकार को भी ध्यान में रखना होगा। आहार में 50 प्रतिषत
    उत्तम वर्ग की होनी चाहिए।

प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग

प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण लक्षणों की एक
लंबी श्रृंखला है जिसके एक तरफ मरास्मस है जो किसी ऊर्जा प्रोटीन व अन्य
पौष्टिक तत्वों की कमी से उत्पन्न होता है तथा दूसरी ओर क्वाषियोरकर है जो
की प्रोटीन की कमी से होता है। इन दोनों के मध्य अनेक ऐसे लक्षण देखे जा
सकते हैं जो प्रोटीन तथा ऊर्जा की कमी से होते हैं।

1. क्वाशियोरकर – 

यह नाम 1933 में सिसले विलियम द्वारा सर्वप्रथम परिचित
कराया गया था। क्वाषियोरकर का अर्थ पहले निम्न प्रकार से दिया गया –
‘‘दूसरे बच्चे के जन्म से बड़े बच्चे को बीमारी प्राप्त होती है।’’ यह उचित भी है
क्योंकि दूसरे बच्चे के जन्म के कारण बड़े बच्चे को आकस्मिक रूप से माँ का दूध
मिलना बन्द हो जाता है और यह वह समय होता है जब बच्चे के लिए केवल दूध
ही उत्तम गुणों वाला प्रोटीन देने का स्रोत है। क्वाषियोरकर में बच्चे को मिलने
वाली प्रोटीन का मात्रात्मक रूप से ह्रास हो जाता है परन्तु ऊर्जा की मात्रा
पर्याप्त है।

प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग
क्वाषियोरकर

क्वाशियोरकर के लक्षण

  1. सामान्य लक्षण – सामान्य रूप से वृद्धि रूक जाती है। सांस लेने में
    कश्ट, ऑक्सीजन की कमी, इडीमा तथा एक सामान्य उदासीनता पाई
    जाती है।
  2. वृद्धि का झुकाव – एडीमा तथा वसा के कारण भार में हीनता कम
    प्रतीत होती है। भार तथा लम्बाई दोनों की वृद्धि रुक जाती है तथा
    मांसपेशियां कमजोर हो जाती है।
  3. एडीमा – यह प्रोटीन की मात्रा में कमी के अनुसार ज्यादा या कम अंष
    में पाया जाता है परन्तु भोजन में उपस्थित पानी तथा नमक की मात्रा
    पर निर्भर करता है। यह संपूर्ण शरीर के साथ-साथ चेहरे पर परन्तु
    मुख्यत: टांगों में पाया जाता है।
  4. त्वचा – त्वचा में चर्म रोग हो जाता है, जिसके प्रमुख लक्षण त्वचा पर
    चकत्ते पड़ना तथा Pigmentation है। त्वचा का रंग गहरा होने लगता
    है तथा किरेटिन के अलग होने से त्वचा परतदार हो जाती है। शरीर
    के किसी भी हिस्से में हो सकता है परन्तु मुख्यत: पैरों में, नितंब पर
    तथा शरीर के बाहरी भागों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है।
  5. बालों पर प्रभाव – बाल पतले, कम कड़े एवं सीधे हो जाते हैं। बालों के
    रंग में भी परिवर्तन होने लगता है तथा भूरे रंग लाल रंग के चकत्तो के
    रूप में बदल जाता है। यह नीग्रो बालकों में एषियन बालकों की अपेक्षा
    ज्यादा पाया जाता है।
  6. म्यूकस झिल्ली – होठों के किनारे कट जाते हैं, सूख जाते हैं तथा
    चिलोसिस (होठों का कटना तथा पकना), जीभ की सतह चिकनी हो
    जाती है, गुर्दा के चारों ओर भी नासूर हो जाते हैं।
  7. पाचन तंत्र – डायरिया यकृत दबाने पर कड़ा महसूस होता है।
    कभी-कभी यकृत बढ़ा हुआ भी पाया जाता है।
  8. मांसपेशियाँ – मांसपेशियों का क्षय होने लगता है जिसके परिणामस्वरूप
    बच्चों का शारीरिक विकास रूक जाता है।
  9. रक्तअल्पता – प्रोटीन की कमी के कारण रक्त अल्पता हो जाती है,
    परन्तु बच्चों के भोजन में फोलिक अम्ल तथा आयरन की कमी भी पायी
    जाती है तथा पोशक तत्व पाचन नली द्वारा शोशित नहीं हो पाते।
  10. मानसिक परिवर्तन– हीन-संवेदनशीलता एक मुख्य लक्षण है तथा बच्चा
    निराष दिखाई पड़ता है। कुछ बच्चों में कपकपाहट पाई जाती है। 
  11. हृदय – रक्त संचार व्यवस्था बिगड़ जाती है, हाथ, पैर ठण्डे तथा सुन्न
    हो जाते हैं तथा नाड़ी की गति कम हो जाती है।
  12. शरीर में प्रतिरक्षी कोशिकाओं, एन्जाइम्स तथा हार्मोन्स की कमी से
    चयापचय सम्बन्धी क्रियाओं में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

2. मरास्मस – 

यह ‘‘ग्रीक’’ शब्द द्वारा उत्पन्न है, जिसका अर्थ है व्यर्थ करना।
यह चिकित्साशास्त्र में पुराने समय से जाना जाता है।

प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग
मरास्मस

मरास्मस लक्षण 

  1. सामान्य लक्षण – इसमें प्रमुख रूप से वृद्धि रूक जाती है। जलना
    चिड़चिड़ाहट, क्रमिकहीन संवेदनशील, उल्टी-दस्त आदि मुख्य हैं। कुछ
    बच्चों की भूख बढ़ जाती है, परन्तु कुछ में भूख कम लगती है।
  2. सामान्य तथा भार – बच्चा दिन-प्रतिदिन सूखता जाता है तथा त्वचा
    पर वसा की मात्रा नगण्य हो जाती है, पानी की कमी हो जाती है।
    शारीरिक भार उम्र के अनुसार बहुत कम हो जाता है तथा बीमारी लम्बे
    समय तक रहने पर लम्बाई में वृद्धि रूक जाती है।
  3. पाचन तंत्र – पानी के समान पतले दस्त, उल्टी या अर्द्ध ठोस दस्त हो
    जाते हैं। यदि संक्रमित हो जाती है तो दस्त कष्टदायक हो जाते हैं।
    पेट सिकुड़न या गैस के कारण फूला रहता है।
  4. मांसपेशी तंत्र – मांसपेशियां कमजोर हो जाती है तथा क्षय होने
    लगती है। इसके साथ-साथ त्वचीय वसा की कमी होने के कारण
    हाथ-पैर पर खाली हड्डियाँ तथा त्वचाहीन होने का आभास होने
    लगता है।
  5. त्वचा तथा श्लेभिक झिल्ली – इनका सूखकर क्षय होने लगता है, परन्तु
    क्वाषियोकर में पाए जाने वाले परिवर्तन नहीं पाए जाते हैं।

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