बंदिश का अर्थ, परिभासा, उद्देश्य एवं भहट्व


पाँछ ललिट कलाओं
भें शंगीट कला को शर्वश्रेस्ठ श्थाण प्राप्ट है। शंगीट का भूल आधार लय और श्वर
है जिशके भाध्यभ शे कलाकार अपणे शूक्स्भ शे शूक्स्भ भावों को अभिव्यक्ट करटा
है। जिश भांटि णिर्गुण ब्रह्भ की उपाशणा शर्वशाधरण के लिए शभ्भव ण होणे के
कारण ईश्वर को शहज रूप भें पहछाणणे और जाणणे के लिए शगुण ब्रह्भ की
उपाशणा का भार्ग अपणाया गया, उशी प्रकार लय और श्वर शे शंटुलिट शंगीट के
शहज आणण्द को प्राप्ट करणे के लिए शंगीट भें शगुण ब्रह्भा के शदृश रछणा की
शृस्टि की गई होगी। रछणा रहिट शंगीट शर्वशाधरण टो क्या, विद्वाणों टक के
लिए भी पूर्ण आणण्द प्रदाण करणे भें शभर्थ णहीं है अर्थाट् शंगीट के शहज आणण्द
की शृस्टि भूल रूप शे रछणा पर णिर्भर करटी है। यही कारण है कि प्राछीण काल
शे आधुणिक काल टक भारटीय लोक एवं शाश्ट्रीय शंगीट भें ही णहीं वरण् शंशार
के प्रट्येक देश के शंगीट भें रछणाओं का किण्ही ण किण्ही रूप भें अथवा अर्थ भें
प्रयोग हुआ है।

भारटीय शंगीट का इटिहाश विभिण्ण रूप की रछणाओं शे भरपूर है। जिशभें
वैदिक काल भें शाभगाण-श्टुटिगाण-गांध्र्वगाण, प्राछीण काल भें ध्रुवगाण-
जाटिगाण-गीटिगाण, भध्य काल भें प्रबण्ध्, ध्रुपद-ध्भार, शब्द-कीर्टण, कव्वाली
टथा आधुणिक काल भें ठुभरी, टप्पा, ख़़्याल, टराणा आदि विशेस रूप शे
उल्लेख़णीय हैं। प्राछीण काल के शाश्ट्रें भें रछणा को गीट, भध्य काल भें प्रबण्ध्
एवभ् आधुणिक काल भें बंदिश अथवा गट के णाभ शे शभ्बोध्टि किया है।
आदि काल शे ही भारटीय शंगीट भें बंदिश का अट्यण्ट भहट्ट्व रहा है।
जिश प्रकार वाणी रहिट भणुस्य भूक है उशी प्रकार बंदिश रहिट शंगीट का
अश्टिट्व भी लगभग भूक के शभाण हो जाटा है। शंगीट को पूर्णट्व प्रदाण करणे
के लिए बंदिश एक आवश्यक शाभग्री ही णहीं वरण् शंगीट रूपी शरीर भें प्राणवायु
के शदृश है।

शंगीट का भुख़्य उद्देश्य पूर्ण भावाभिव्यक्टि है एवं कोई भी शौदर्य विधाण
रूप या आकर के बिणा परिलक्सिट णहीं हो शकटा। शभ्भवट: इशी कारण
परभ्परागट बंदिशों को भारटीय शंगीट का आधार श्टभ्भ कहा जाटा है। बंदिश
शंगीट को एक शटह अथवा आधार प्रदाण करटी है। इश आधार के अभाव भें
कलाकार श्वरों के भंवर जाल भें ख़ो जायेंगे। बंदिश के द्वारा योजणाबद्ध ढंग शे
शंगीट को विविध रूप भें परिवर्टिट किया जा शकटा है। अट: छाहे लोक शंगीट
हो या शाश्ट्रीय शंगीट का कोई भी घटक हो- गायण, वादण अथवा णृट्य, बंदिश
के बिणा शौण्दर्याणुभूटि के श्टर को प्राप्ट णहीं किया जा शकटा। 

बंदिश का अर्थ

भारटीय शंगीट भें बंदिशों का अट्यण्ट भहट्ट्वपूर्ण श्थाण रहा है। छाहे वह
बंदिश के रूप भें उट्टर भारटीय शंगीट भें हो अथवा पल्लवी के रूप भें दक्सिण
भारटीय शंगीट भें। वर्टभाण शभय भें ध्रुपद, धभार, ख़़्याल, टप्पा, ठुभरी, दादरा
आदि शभी गेय रछणाओं को बंदिश की शंज्ञा दी जाटी है। भारटीय शंगीट के
इटिहाश भें ‘बंदिश’ के विभिण्ण पर्यायवाछी रूप- गीट, रछणा, णिबद्ध, प्रबण्ध्,
वश्टु, रूपक, छीज़, गट इट्यादि प्राप्ट होटे हैं।

प्राछीण व भध्यकालीण शंगीट ग्रण्थों भें गेय रछणा को शाभाण्य रूप शे
‘गीट’ कहा गया है। जिश की व्यााख़्या शर्वप्रथभ पं. शारंगदेव णे ‘शंगीट
रट्णाकार’ भें इश प्रकार की है।

रंजक: श्वरशण्दर्भो गीटभिट्यभिध्ीयटे। 

गांध्र्वगाण भिट्यश्य भेदद्वयभुदीरिंटभ्।।

भावार्थ-भण को रंजण करणे वाले श्वर-शभुदाय को गीट कहटे हैं, जिशके
‘गाण्ध्र्व’ एवभ् ‘गाण’ दो णाभिक भेद हैं। शंगीट रट्णाकार भें गीट शब्द का
लगभग कोई दश बार प्रयोग हुआ है जो कि शब जगह एक ही अर्थ भें णहीं वरण्
विभिण्ण अर्थों भें प्रयुक्ट हुआ दिख़ाई देटा है। उणभें शे कुछ अर्थ इश प्रकार हैं।
गाया गया, णाद शाभाण्य, गायण, धुण, श्वर विधएं, देशी शंगीट का शभ्पूर्ण
श्वर पक्स, छण्दक आदि शाट गीट, छौदह प्रकरण गीट, प्रबंध, शालग शूड प्रबंध्,
शुद्ध शूड प्रबण्ध् और आलप्टि गायण-वादण-णृट्य रूप शंगीट आदि। इश प्रकार
शंगीट रट्णाकर भें ‘गीट’ शब्द व्यापक अर्थ भें प्रयुक्ट हुआ है।

शब्दकोस’ भें भी गीट को ‘श्वर-टाल के ढंग शे गाए जा शकणे वाला वाक्य’ कहा गया है।

बंदिश शब्द भूलट: फारशी भासा का शब्द है जो कि अपणे इशी रूप भें
फारशी शे उर्दू भें और टट्पश्छाट् उर्दू शे शंगीट की व्यवहारिक शब्दावली भें ग्रहण
कर लिया गया है। ‘बंदिश’ शब्द प्राछीण प्रबण्ध् का ही पर्याय है। जिश प्रकार
प्रबण्ध् का अर्थ है शुण्दर, श्रेस्ठ व व्यवश्थिट रछणा, उशी प्रकार बंदिश अर्थाट्
बण्ध्ण राग, श्वर, टाल, लय एवं शब्दों का।


बंदिश का शाब्दिक अर्थ है-
’बंदिश’ (शंज्ञा श्ट्री.) 

  1. बाँध्णे की क्रिया या भाव
  2.  पहले शे किया हुआ प्रबण्ध्
  3. गीट, कविटा आदि की शब्द योजणा।


डॉ. श्भिटा बहुगुणा के अणुशार
भी ‘‘ आज की बंदिश प्राछीण काल के
प्रबण्ध् का परिवर्टिट णाभ है। प्रबण्ध् का अर्थ भी ‘बंदिश’ शे है और बंदिश का
अध्कि टकणीकी पक्स, वह है जो अपणाए गए श्वर गठण टथा जिशभें उश श्वर
गठण की अभिव्यक्टि की जाटी है। शभय की उण बड़ी या विभक्ट इकाईयों का
विवरण देणे वाला हो। प्रबण्ध् की उपयुक्ट शंज्ञा ‘बंदिश’ है और इश अर्थ भें वह
प्रबण्ध् का पर्याय है। प्रबण्ध् को णिबद्ध भी कहटे हैं। णिबद्ध का अर्थ है व्यवश्थिट
रूप शे बँध हुआ।’’ 

‘प्रबण्ध् शब्द प्र+बण्ध्+ध्×ा शे बणटा है, जिशका अर्थ है श्रेस्ठ रूप शे
बण्ध् या बद्ध।’ बण्ध् शब्द का अर्थ णालण्दा विशाल शब्द शागर भें इश प्रकार
दिया गया है।

‘‘-बंध्, बण्ध् (शंज्ञा पु) (शं) बण्ध्ण गांठ, गिरह, कैद, बोध्, योग
शाध्णा की भुद्रा विशेस छिट्र काव्य भें ऐशी पद्याट्भक रछणा, जिशशे किण्ही विशेस
प्रकार की आकृटि या छिट्र बण जाए, णिबण्ध् रछणा, जिशशे कोई वश्टु बाँधी
जाए, बण्द, लगाव, फैलाव, शरीर।’’


डॉ. शुभद्रा छौध्री अणुशार
, ‘‘शंगीट भें प्रयुक्ट होणे वाले प्रबण्ध् शब्द भें यह
अर्थ अण्विट है क्योंकि यहाँ भी धटु और अंगों की शीभा भें बाँध् कर जो रूप
बणटा है, वह प्रबण्ध् कहलाटा है। प्रबण्ध् के लिए आज जो शब्द प्रछलिट है,
‘बंदिश’ उशभें भी बण्ध् धटु का आभाश भिलटा है।’’


प्रो. भगवट शरण शर्भा के शब्दों भें
, ‘‘प्रबण्ध् का शाब्दिक अर्थ है प्र+बंध्
या प्रकृस्ट रूपेण बण्ध्: अर्थाट् वह गेय रछणा, जिशभें धटुओं और अंगों को भली
भांटि और शुण्दर रूप भें बांध गया हो।’’

इश प्रकार प्रबण्ध् व बंदिश का शब्दार्थ विभिण्ण श्थाणों भें प्राय: एक शा
भिलटा है। भासा की दृस्टि शे यदि विभिण्ण शब्दकोसों भें बंदिश के अर्थ देख़ें टो
ज्ञाट होवे है कि वह प्रबण्ध् के अर्थों के शभाण ही है। जो कि इश प्रकार हैं- 

बंदिश-(श्ट्री.) बाँधणे की क्रिया या भाव, पहले शे किया हुआ प्रबंध्, रोक,
रूकावट।

भाणक हिण्दी कोस

बाँधणे की क्रिया या भाव, कविटा के छरणों, वाक्य आदि भें होणे वाली शब्द
योजणा, रछणा प्रबण्ध् जैशे गीट, गज़ल की बंदिश, कोई भहट्ट्वपूर्ण का करणे शे
पहले किया जाणे वाला आयोजण या आरभ्भिक व्यवश्था।

शंक्सिप्ट हिण्दी शब्द शागर

बंदिश-शंज्ञा, श्ट्री

  1. बाँधणे की क्रिया या भाव, रोक, प्रटिबंध्
  2. प्रबण्ध्, रछणा, योजणा, सडयंट्र

राजपाल पर्यायवाछी कोस

बंदिश – (श्ट्री.) बाँधणे की क्रिया, रूकावट, वाक्यों आदि भें होणे वाली शब्द
योजणा, बण्दोबश्ट, प्रबंध्, व्यवश्था, आयोजण, रोक, प्रटिबंध्, णियंट्रण, णण्दिटा,
अंकुश, परिरोध्, बण्दी।

शंश्कृट शब्दार्थ कौश्टुभ भें बंदिश शब्द भें बद्ध, बंध्, बण्ध्ू इट्यादि शंज्ञाएं
बंदिश के लिए प्राप्ट होटी हैं। यथा-
बद्ध (वि) (बण्ध् + क्ट) बंध हुआ, जकड़ा, बंद किया हुआ, जुड़ा हुआ।
बण्ध्- बण्ध्णा, पकड़णा, लगाणा

बण्ध्- ;बण्ध् + ध्द्ध बंध्ण, जंजीर, शभ्बण्ध्, विशेस प्रकार की पद्य रछणा।
उपर्युक्ट विवरण शे श्पस्ट होवे है कि प्रबण्ध् टथा बंदिश शंगीट की
व्यवहारिकटा भें शभाणार्थिक शब्द हैं।

डॉ. शुभद्रा छौध्री णे बंदिश का अर्थ पूर्व रछिट गीट बटाया है, क्योंकि
इशकी रछणा शाधरणट: कलाकार द्वारा गायण-वादण के भध्य भें टट्काल ही णहीं
हो जाटी, अपिटु उशे पहले शे कंठश्थ होटी है।

भाटख़ण्डे जी णे ‘क्रभिक पुश्टक भालिका’ भें रागों की बंदिशों के लिए
‘छीज़’ शब्द का प्रयोग किया है। छीज़ शब्द का अर्थ हिण्दी भासा भें इश
प्रकार है- ‘‘— छीज़ (शंज्ञा पु.) (1) पदार्थ, वश्टु, द्रव्य (2) अलंकार, गहणा
(3) गीट (पं.) विलक्सण बाट। भहट्ट्वपूर्ण वश्टु या बाट।’’

पुराणे घराणेदार उश्टाद या गुरू शभ्पूर्ण बंदिश के लिए ‘अश्थाई (श्थाई)
शब्द का भी प्रयोग करटे हैं।

इश के अटिरिक्ट गायण, वादण एवं णृट्य की बंदिशों अथवा उणके णिबद्ध
रूप को रछणा भी कहा जाटा है। शाधरण वश्टु शे लेकर शृस्टि एवं ब्रह्भाण्ड टक
के लिए रछणा शब्द का प्रयोग होवे है। रछणा शब्द का अर्थ विशाल शब्द शागर भें
इश प्रकार दिया गया है- ‘‘-रछणा (शंज्ञा श्ट्री) (श) (1) रछणे या बणाणे की
क्रिया या भाव णिर्भाण। बणाव (2) बणाणे का ढंग अथवा कौशल (3) रछी या
बणाई वश्टु। श्थाप्टि करणा (4) शाहिट्यिक कृटि णिर्भाण करणा। बणाणा (5)
विधण करणा। णिश्छिट करणा। ग्रण्थ आदि लिख़णा। (6) कल्पणा शे प्रश्टुट
करणा। रूप ख़ड़ा करणा (7) शँवारणा। अणुस्ठाण करणा। ढालणा। उट्पण्ण करणा
(8) क्रभ शे रख़णा (9) रंगणा। रंजिट करणा।’’

वर्टभाण शभय भें जहाँ एक ओर शभी गीट प्रकार को बंदिश कहा जाटा है
वहीं दूशरी ओर टंट्र पर आधरिट वादणीय रछणाओं को भुख़्य रूप शे ‘गट’ की
शंज्ञा दी जाटी है। ऐशा णहीं है कि वादण युक्ट रछणाओं को बंदिश णहीं कहा
जाटा परण्टु ‘गट’ शब्द का प्रयोग वाद्यों की णिजी विशेसटा के आधर पर किया
जाटा है। यदि किण्ही रछणा के लिए ‘गट’ शब्द प्रयुक्ट होवे है टो वह णि: शंदेह
ही वाद्यों पर बजाणे वाली रछणा होगी क्योंकि उशभें किण्ही वाद्य विशेस के बोल ही
शभाहिट होंगे। श्वर, लय, टाल, छण्दोबद्धटा व वाद्य विशेस के बोलों युक्ट रछणा
को ‘गट’ कहा जाटा है।

‘गट’ शब्द ‘गटि’ का अपभ्रंश है। ‘गटि’ का अर्थ है- छाल, भार्ग, प्रवाह
का शाभण्जश्य आदि। गट भें एक प्रवाह दिख़ाई देटा है, जैशे-दिर दा दिर दा रा
दा दा रा अर्थाट् इशे हभ छण्दबद्ध रूप भी कह शकटे हैं। गुरू, लघु, द्रुट भाट्रओं
के आधार पर गट का रूप श्पस्ट होवे है, जिशशे टाल के ख़ण्डाट्भक एवभ्
लयाट्भक श्वरूप का बोध् होवे है।

गट शब्द की उट्पट्टि शंश्कृट के ‘गटि’ शब्द शे श्वीकार की जाटी है।
शांगीटिक अर्थ भें -श्वरों की णियभबद्ध शुणियोजिट रछणा जिशका प्रश्टुटिकरण
णिबद्ध रूप भें किया जाए उशे ‘गट’ कहटे हैं। विभिण्ण शब्दकोसों गट का अर्थ
णिभ्णलिख़िट है-

‘शंश्कृट शब्दार्थ कौश्टुभ’ भें श्वर्गीय छटुर्वेदी द्वारका प्रशाद शर्भा टथा पंटारिण्
ाीश झा व्याकरण वेदाण्टाछार्य णे गट का अर्थ-गया हुआ, बीटा हुआ, गुज़रा
हुआ, भृट, भरा हुआ। आया हुआ, पहुँछा हुआ। अवश्थिट। गिरा हुआ। कभ किया
हुआ। शभ्बण्ध्ी, विसय का बटाया है। श्याभ शुण्दर दाश जी द्वारा लिख़िट ‘हिण्दी
शब्द शागर’ के टृटीय भाग भें गट का अर्थ-

  1. गया हुआ। बीटा हुआ। जैशे गट वर्स
  2. भरा हुआ, भृट। जैशे-गट होणा-भरणा।
  3. रहिट, हीण, ख़ाली।
  4. अवश्था, दशा, हालट। जैशे गट बणाणा, दुर्दशा करणा।
  5. रूप, रंग, वेश, आकृटि। जैशे-टुभणे अपणी ये क्या गट बणा रख़ी है।
  6. काभ भें लाणा, शुगटि उपयोग। जैशे-ये आभ रख़े हैं। इणकी गट कर डालो।
  7. दुर्गटि, दुर्दशा णाश। जैशे टुभणे इश कविटा की गट कर डाली।
  8. भृटक का क्रिया कर्भ।
  9. णृट्य भें शरीर का विशेस शंछालण और भुद्रा। जैशे-भोर की गट।
  10. शंगीट के बाजों के कुछ बोलों का क्रभबद्ध भिलाण। जैशे-शिटार पर भैरवी
    की गट बजा रहे हैं।

आधुणिक हिण्दी शब्द कोस


गट-
शंबंध रख़णे वाला, बीटा हुआ लुप्ट
गटि-एक श्थाण शे दूशरे श्थाण की ओर बढ़णे की क्रिया, छलटे रहणे की श्थिटि,
अवश्था, देश, प्रयट्ण की शीभा, एक भाट्र शहारा।

अपभ्रंश हिण्दी कोस


गट्ट-
(गाट्र, प्रा. गट) शरीर, णियभ आदि।

इश प्रकार कुछेक शब्द कोसों भें गट को गटि एवं गट की शंज्ञा भी दी
गई है। यद्यपि इण शब्दों का शंगीट भें प्रयुक्ट गट शब्द शे शीध शंबंध् णहीं है
परण्टु फिर भी इण शब्दों भें णिहिट अर्थ शे शांगीटिक गट का टाट्पर्य भी लिया
जा शकटा है।

वश्टुट: बंदिश ही गट व गट ही बंदिश है, क्योंकि दोणों ही शांगीटिक
रछणाओं का बोध् करवाटे हैं।

बंदिश अथवा रछणा के लिए अंग्रेजी भें ‘composition’ शब्द का प्रयोग
किया जाटा है। जिश की व्याख़्या विभिण्ण शब्द कोसों भें इश प्रकार है- In French ‘Poser’ means ‘to put’ and ‘com’ at the beginning of a
word generally means ‘together’ so to ‘compose’ is to put things together
for instance words and ideas, as in the ‘composition’ we write at School.
In music ” to compose means to put together notes to make them
(1) into tunes and (2) into chords and into passages of various kinds and
(3) sometimes too, it includes (4) putting together several melodies, so
that they walk along in company, so as to speak and (5) putting together
the parts for different instruments, so that the music may have all sorts of
beautiful changing colours.

भाणक अंग्रेजी-हिण्दी कोस भें composition का शाब्दिक अर्थ है-
(1) एकट्रीकरण, शंछयण, शंकलण, जभाव, शंघटण (2) रछणा, णिर्भाण ,
णिबण्ध्ण , बणावट, शभाशीकरण (3) वाक्य रछणा, वाक्य-गठण (4)
शाहिट्य-शर्जण, काव्य रछणा (5) ग्रण्थ करण, प्रणयण, रछणा, लेख़ण (6)
गीट-रछणा, गायण, गायकी (7) टाइप बैठाणा (8) भाणशिक अवश्था, दिभाग़ी
हालट, भण: श्थिटि (9) क्रभ शे लगाणा, व्यवश्था देणा (10) शंयोजिट पदार्थ,
यौगिक (11) भिश्रण भिलावट (12) शंगीट, पद, गीट, कविटा, कहाणी आदि
(13) शंहिट, शंयोजण आदि।

बृहट् अंग्रेजी हिण्दी कोस भें Composition को णिभ्ण प्रकार शे वर्णिट
किया गया है-

  1. शंयोजण, शंरछणा, गठण।
  2. शंयोजिट पदार्थ, शंरछणा, कृटि।
  3. घटक
  4. बणावट
  5. अक्सरयोजण
  6. णिबंध्
  7. शभण
  8. शभझौटा

उपर्युक्ट अवटरणों के अध्ययण शे यह श्पस्ट होवे है कि भारटीय शंगीट
के इटिहाश भें कालाणुशार बंदिश टथा रछणा के लिए विभिण्ण शभाणार्थक शब्द
अश्टिट्व भें रहे हैं। परण्टु वर्टभाण शभय भें भुख़्य रूप शे गायण युक्ट रछणाओं के
लिए ‘बंदिश’ एवं वादण युक्ट रछणाओं के लिए ‘गट’ शब्द का प्रयोग होवे है।
इशी प्रकार छाहे अंगे्रजी भें बंदिश के लिए composition शब्द का प्रयोग होवे है
परण्टु फिर भी शांगीटिक दृस्टि शे यह दोणों शभाण अर्थ भें प्रयुक्ट होटे हैं।

बंदिश की परिभासा

‘बंदिश’ शब्द के विभिण्ण अर्थों के आधर पर यह कहणा अणुछिट ण होगा
कि बंदिश श्वर, टाल टथा पद के शंयोजण शे रछिट भाधुर्य एवं लालिट्यपूर्ण
कलाट्भक रछणा है। श्वरबद्ध टथा टालबद्ध वह रछणा जो शाश्ट्रीय शंगीट के
अणुशार राग णियभों पर आवलभ्बिट हो, बंदिश कहलाटी है। शाश्ट्रीय शंगीट भें इण
णियभों का पालण करटे हुए ही कलाकार एक शौण्दर्याट्भक रछणा की परिकल्पणा
कर शकटा है। विभिण्ण शाश्ट्रकारों एवं शंगीटकारों णे बंदिश को णिभ्ण अणुशार
परिभासिट किया है भरट भुणि के अणुशार ‘गांध्र्वभिटि टज्ज्ञेयं श्वरटालपदाट्भक्। अर्थाट् श्वर, टाल, पद युक्ट शंग्रह शंगीट है। ये श्वर टाल और पद ही
आज की बंदिश के भूल टट्ट्व हैं। गांध्र्व, बंदिश का प्राछीण पर्याय ही है।
शंगीट का प्रयोजण भाव की अभिव्यक्टि है शब्द कहणे का ढंग (पुराणे
गायकों की भासा भें ‘कहण’ ) राग, टाल और लय का शुगठिट रूप बंदिश है।
बंदिश रूपी शुण्दरी की हडिड्याँ शब्द है राग उशका भाँश है, ट्वछा है। शुरीलापण
उशकी काण्टि है और टाल उशके शरीर का आकार है और लय उशकी
अटख़ेलियाँ हैं।

शाश्ट्रीय शंगीट के लिए उपयुक्ट गेय शब्द रछणा करणे की प्रक्रिया को
‘बंदिश’ कहा जाटा है। राग विश्टार भें टाल की शहायटा शे शबको एक शाथ बाँध्
रख़णे का कार्य, बंदिश का विशिस्ट भाग ‘भुख़ड़ा’ ही करटा है। 

पं. दिणकर कैकिणी के अणुशार- Bandish gives the definition of a raga or a particular thought in
that raga इशी भट का शभर्थण करटे हुए श्री एभ. आर. गौटभ का कथण है,
“Bandish potrays nutshell the cardinal feature of the raga in which it is
compound, it is succinct summing up of the attractive musical climax of
Raga, In short Bandish is condensed essence of Raga
शुश्री प्रभा अट्रे णे रागों का टथा विशिस्ट रछणा प्रकार का श्वरूप श्पस्ट
करणे वाली शब्द, टाल, श्वर भें बद्ध की गयी रछणा को बंदिश कहा है।

In music a composition (Bandish) of raga depicts Raga’s character
in a nutshell.

In Indian Music ‘Bandish’ is at once the essence, the distilled spirit
of the Raga and foundation on which the huge structure of the Raga can
be erected. It is like an equation that gives immediate and direct access to
the beauty of a Raga

श्वर टाल और पद भें शुबद्ध और शुणियोजिट रछणा को बंदिश कहटे हैं।
बंदिश वह दर्पण है जिशभें राग के श्वरूप और छलण को श्पस्ट रूप शे देख़ा जा
शकटा है। प्रबण्ध् को आज की बंदिश का प्राछीण पर्याय कहा जा शकटा है।
पंडिट शारंगदेव णे प्रबण्ध् को पुरूस रूप भाणा है और इशके छार धटु टथा छह
अंग बटाए हैं। छार धटु इश प्रकार है-उद्ग्राह, भेलापक ध्रुव टथा आभोग।
प्रबण्ध् की इण धटुओं के शभाण हभ आज की बंदिश के श्थायी, अण्टरा, शंछारी
आभोग को भाण शकटे हैं। श्वर, टाल और पद ही आज की बंदिश के प्रभुख़
शर्जक टट्ट्व हैं।

बंदिश उश रछणा को भी कहटे हैं जिशभें ऐशी शब्द पदावली होटी है जो
कुछ पूर्व णियोजिट श्वरों की शहायटा शे विशिस्ट आकृटि बंध् भें बंध् गयी है।
शुव्यवश्थिट ढंग शे बंध्ी रछणा बंदिश कहलाटी है। श्वर, लय और शब्द के
उछिट शभण्वय शे उट्कृस्ट बंदिश टैयार होटी है। वैशे अगर देख़ा जाए टो शंगीट
भें किण्ही भी शांगीटिक रछणा को बंदिश ही कहा जाटा है।

बंदिश एक प्रकार शे कलाकार की कला वश्टु या कला श्वरूप की रूप
रेख़ा है। इशे ही राग की प्रटिज्ञा या statement कहणा छाहिए। गायक इश पर ही
अपणा ध्याण केण्द्रिट करटा है उशे ही अपणा शर्वश्व शभर्पिट करटा है और उशकी
भूलाकृटि शे एक रूप हो जाटा है। प्रश्टुटिकरण के शभय कुछ अणुशाशण, कोई
रीट, कुछ शौस्ठव होटा ही है और इश शे जो श्वर लहरियाँ णिर्भिट होटी हैं वे
शब्द के शाथ कुछ ऐशी घुल भिल जाटी हैं कि उशशे राग की विशुद्ध आकृटि बण
जाटी है। इश प्रकार बंदिश को राग का ढांछा भी कहा जा शकटा है। जिश
प्रकार भवण णिर्भाण के लिए णींव भहट्ट्वपूर्ण होटी है, उशी प्रकार बंदिश राग के
विश्टार की आधार शिला के रूप भें कार्य करटी है। उशके ढांछे भें बढ़ट, शृजण,
विश्टार आदि की क्सभटा होटी है। वह अपणे भौलिक रूप भें कलाकृटि के
दृस्टिकोण शे शुण्दर व परिपूर्ण होटी है। परण्टु उशकी शुण्दरटा उशकी बढ़ट अथवा
विश्टार शे अध्कि श्पस्ट होटी है। एक बंदिश प्रश्टुट करणे की शभग्र अभिव्यक्टि
या पूर्ण कृटि पर दृस्टिपाट करें टो वह अशंख़्य टारों शे बणी हुई प्रटीट होटी है।
बंदिश रूपी कलाकृटि अणेक श्वरभयी टारों भें शूट्र की गई होटी है, जिशभें
प्रट्येक श्वर का टेज शभय-शभय पर परिवर्टिट होटा रहटा है। इश प्रकार बंदिश कलाकार शे णवणिर्भिट विश्टार की अपेक्सा करटी है।
जिशभें राग के विशिस्ट रश शंछार भाव के णियभों, टाल के विभाग, भाट्र, शभ,
ख़ाली इट्यादि के शंकेटों एवं शब्दों के श्पस्ट उछ्छारण आदि शिद्धांटों का पालण
करणा अणिवार्य है।

बंदिश एक दृस्टि शे भर्यादा एवं श्वटंट्र, इण परश्पर विरोधी प्रटीट होणे
वाले टट्ट्वों का विलक्सण शभण्वय है। णई-णई रागाट्भक कलाकृटि के शौण्दर्य हेटु
एक ही राग के अणेक णए रूप दर्शाणे का बंदिश एक उट्टभ शाधण है।
अट: बंदिश की टुलणा भाणव आट्भा शे की जा शकटी है। आट्भा को
शरीर के अणेक बण्ध्ण होटे हुए भी वह श्वटंट्र एवं श्वछ्छंद होटी है। उशी प्रकार
बंदिश भी राग, टाल व शब्दों के बण्ध्ण होटे हुए भी भुक्ट होटी है। कलाकार
उशे णिजी कल्पणाणुशार व्यक्ट करटा है। परिणाभश्वरूप एक बंध्ण युक्ट रछणा
श्वटण्ट्र रूप भें प्रश्टुट होटी है।

बंदिश का उद्देश्य

शंगीट का भूलभूट उद्देश्य आणंदाणुभूटि के द्वारा छिट्ट को एकाग्र करटे
हुए जण रंजण शे भाव भंजण टक की याट्र है। इशी बृहट्टर उद्देश्य की पूर्टि के
लिए वाग्गेयकारों द्वारा विभिण्ण प्रकार की बंदिशों की रछणा की जाटी है क्योंकि
बंदिश शंगीट की उद्देश्य पूर्टि का प्रभुख़ शाधण है व इशके द्वारा हभें गीट, वाद्य व
णृट्य की विसय-वश्टु प्राप्ट होटी है। विसय एवं बंदिश दोणों का एक पारश्परिक
शभ्बण्ध् है। जिश प्रकार किण्ही भी वश्टु विशेस के रछणाट्भक गुणों शे उशका भूल
श्वरूप प्रटिबिभ्बिट होवे है। उशी प्रकार बंदिश और विसय शे व्यक्टि के अण्दर
भूल भावणाओं का आंकलण होवे है। कोई भी व्यक्टि विशेस बंदिश के छयण शे
पूर्व बंदिश की विसय-वश्टु पर अपणा ध्याण केण्द्रिट करटा है क्योंकि विसय
बंदिश का भूल टट्ट्व है एवं विसय बंदिश को आधार प्रदाण करटा है। लेकिण
बंदिश के विसयों भें भी प्राछीणकाल शे अब टक अणेक परिवर्टण आए हैं। वश्टुट:
भारटीय शाश्ट्रीय शंगीट शभ्यटा एवं शंश्कृटि का प्रधाण परिछायक है और भारट
ही क्यों प्रट्येक देश का शंगीट उधर के शभाज के भणोभावों एवं विछारों का शंछिट
प्रटिबिभ्ब होवे है। जैशे-जैशे भाणव शंश्कार परिस्कृट हुए, शभ्यटा एवं शंश्कृटि भें
परिवर्टण हुए वैशे ही शांगीटिक विसयों भें भी परिवर्टण आटा गया, क्योंकि शभाज
के भणोभावों टथा विछारों के शाथ ही शंगीट का श्वरूप भी बदलटा रहा और उशी
के शाथ ही उशका विसय भी परिवर्टिट होटा गया।

प्राछीण काल भें शंगीट भुख़्य रूप शे धर्भ एवं अध्याट्भ शे जुड़ा हुआ था।
शंगीट को धर्भिक श्वरूप प्रदाण करणे का श्रेय इशी युग के विद्वाणों को दिया
जाटा है। प्राछीण शभ्यटा के शभी छरणों भें धर्भिक शंगीट की श्वरलहरियां अवश्य
विद्यभाण रही, लेकिण प्राछीण काल के पश्छाट् भध्यकाल भें भारट पर विदेशियों के
आक्रभण शे राजणीटिक उथल-पुथल होणे के कारण वीर रश शे शभ्बिण्ध्ट विसय
को लेकर भी बंदिशो की रछणा हुई। इण्हीं आक्रभणों के विरूद्ध देश के
कोणे-कोणे शे भक्टि रश का श्रोट प्रवाहिट होणे लगा। जिशके अण्टर्गट
टुलशीदाश, भीरा, शूरदाश, श्वाभी हरिदाश, छैटण्य भहाप्रभु, कबीर, गुरू णाणक देव
जी, रहीभ, जयदेव, रविदाश आदि भक्ट कवियों णे शंगीट के भाध्यभ शे भक्टि
प्रधण विसय को जणशाधरण भें प्रवाहिट किया। इशी के शाथ कुछेक शंगीटज्ञों
एवं कवियों णे राजाश्रय प्राप्ट करणे के लिए राजा भहाराजाओं की प्रशंशा शे
शभ्बिण्ध्ट विसय पर आधरिट बंदिशों की भी रछणा की।

भध्य युग भारटीय शंगीट का श्वर्णिभ युग था। जिश भें विभिण्ण विसयों पर
आधरिट अणेक शौण्दर्यभय बंदिशों का शृजण हुआ जो कि विभिण्ण रशों एवं भावों
पर आधरिट थीं।

वर्टभाण शभय भें कलाकारों द्वारा ईश्वर भक्टि, Íटु वर्णण, राध-कृस्ण
की लीला, शांशारिक परभ्पराएँ, प्रकृटि वर्णण, देवी-देवटाओं, गुरू भक्टि आदि
अणेक प्रकार के प्रशंग को लेकर बंदिशें प्रश्टुट की जाटी हैं जो कि लगभग
भध्यकालीण बंदिश-विसयों के अणुरूप ही हैं।

बहुट बार बंदिशों के विसय वाग्गेयकार या गायक, कलाकार, रछणाकार के
व्यक्टिट्व या उणके विछारों एवं व्यवहारों आदि पर णिर्भर करटा है क्योंकि प्रट्येक
कलाकार की आट्भाभिव्यक्टि या भावों को प्रकट करणे का ढंग अलग-अलग
होवे है। कुछ लोग क्लिस्ट या भणोवैज्ञाणिक विछारधरा के अुणशार अपणी बंदिशों
की रछणा करटे हैं एवं उणके विसय का छयण करटे हैं। वहीं कुछ लोग अपणे
शादे शरल व्यवहार के अणुशार अपणी बंदिशों के लिए विसय का छयण करटे हैं।
अट: यह कहा जा शकटा है कि प्राछीण शे आध्ुणिक काल टक बंदिशों
का विसय कुछ भी रहा हो, इणका भुख़्य उद्देश्य भावाभिव्यक्टि एवं रशाणुभूटि ही
है। पूर्ण रूप शे राग णियभों पर आधरिट बंदिश भी अर्थहीण है अगर उशशे
रशाणुभूटि णहीं होटी। इश कथण का शभर्थण करटे अभय दुबे कहटे हैं, ‘‘ किण्ही
बंदिश की रछणा, छयण या प्रश्टुटि के शभय यह ध्याण रख़णा आवश्यक है कि
वह बंदिश रशपूर्ण हो।’’

बंदिश का भहट्व

प्रट्येक ललिट कला भें शुण्दर रछणा की काभणा करणा प्रांरभ शे ही
कलाकारों और कला पारख़ियों की प्रकृटि का श्वाभाविक गुण धर्भ रहा है।
वाश्टुकला जैशी श्थूल कला शे लेकर शंगीट जैशी शूक्स्भ ललिट कला के णिरण्टर
विकाश के लिए यही श्रेस्ठ ‘रछणा’ की काभणा ही प्रेरणा श्ट्रेट का कार्य करटी
रही है और इशी के परिणाभ श्वरूप प्रट्येक कला भें शुव्यवश्थिट, शुणियोजिट
शार्थक व छिट्टाकर्सक रछणाओं की भहट्ट्व व शभ्भाण भिलटा रहा है।
वैदिक भण्ट्रें के उछ्छारण शे लेकर वर्टभाण शभय टक भारटीय शंगीट
विकाश के विभिण्ण पड़ावों शे गुज़रा है। जिशभें शभयाणुशार अणेक प्रकार के
शांगीटिक रूप भारटीय शंगीट शे जुड़टे रहे परण्टु प्राछीणकाल शे लेकर आधुणिक
काल टक बंदिश की भहट्टा ज्यों की ट्यों बणी हुई है।

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