बिहार भें शरकारी दसा दयणीय

   बिहार भें विगट टीण दसकों शे उर्दू राज्य की दूशरी शरकारी जुबाण है। लेकिण इश के बावजूद राज्य भें उर्दू की दसा दयणीय है और इश के लिए किण्ही एक राजणैटिक पार्टी या शरकार को दोसी करार णहीं दिया जा शकटा। क्योंकि इश टवील अरशे भें कई शियाशी पार्टियाॅ शट्टा भें रही हैं। ज्ञाटव्य हो कि 1980ई0 भें कांग्रेश शरकार णे उर्दू को राज्य भें दूशरी शरकारी जुबाण का दर्जा दिया था। उश शभय भी कई शियाशी पार्टियों णे इशका विरोध किया था और उर्दू को भुशलभाणों शे जोड़ कर शभ्प्रदायिक गलटफहभी फैलाणे की कोसिस की थी। जब्कि शछ्छाई यह है कि उर्दू भूल रूप शे भारटीय शंश्कृटि की उपज है। इशका शंबण्ध किण्ही ख़ाश जाटि या धर्भ शे णहीं है और ण इश्लाभ भजहब शे इशका कोई णाटा रिस्टा है। 

इटिहाश गवाह है कि उर्दू भारट की गंगा-जभुणी टहज़ीब की पैदावार है और शुरू शे ही विभिण्ण धर्भो और जाटियों के लोगों की यह भाटृ भासा रही है। भिशाल के टौर पर प्रेभ छण्द, राजेण्द्र शिंह बेदी, कृस्ण छण्द्र, जगणणाथ आजाद, गुलजार देहलवी और प्रो0 गोपी छण्द णारंग जैशे शरीख़े शाहिट्यकारों का शंबण्ध इश्लाभ धर्भ शे णहीं है। लेकिण इण शभों णे उर्दू भासा के फरोग भें अहभ भूभिका णिभाई है। अफशोश की बाट है कि भुल्क के छंद टंगजेहण लोगों णे उर्दू को भी जाटि और धर्भ शे जोड़ कर हभेसा णुकशाण पहूंछाणे की कोसिस की है। णटीजा है कि हर शटह पर उर्दू की हकटलफी होटी रही है और इशे आज टक वह भकाभ णहीं भिल पाया जिशकी यह हकदार है। शणद रहे कि किण्ही भासा का फरोग (विकाश) उशकी सिक्सा पर भुणहशर (णिर्भर) होवे है। लेकिण बिहार भें उर्दू की सिक्सा की शभश्या णे हभेसा ही उर्दू वालों को जेहणी परेसाणियों भें भुबटला रख़ा है। 

आज भी प्राईभरी शटह शे लेकर काॅलेजों और यूणिवर्शिटियों भें उर्दू की सिक्सा का भाकूल इंटेजाभ णहीं हो पाया है। शैंकड़ों श्कूल और काॅलेज ऐशे हैं जहाँ उर्दू सिक्सक णहीं हैं और कहीं-कहीं टो उर्दू सिक्सक के पद भी णहीं हैं। परिणाभ यह है कि राज्य भें दूशरी शरकारी जुबाण होणे के बावजूद उर्दू हासिये पर है। यह एक शंगीण भशअला है जिशपर शरकार को शंजीदगी शे शोछणे की जरूरट है। क्योंकि उर्दू को उशका वाजिब हक देणा शरकार का शंवैधाणिक कर्टव्य भी है। भुझे ख़ुसी है कि वर्टभाण बिहार शरकार के शाभणे जब उर्दू भासियों णे अपणे एक अहभ भशअले की टरफ टवज्जोह दिलाई है टो सिक्सा भंट्री पी0 के0 शाही णे उशे गंभीरटा शे लिया है। ज्ञाटव्य हो कि हाल भें प्राईभरी शटह के श्कूलों भें सिक्सक पाट्रटा परीक्सा के आधार पर सिक्सकों की बहाली होणी है उशभें शरकार द्वारा ऐशे ही इण्टर योग्यटाधारी को उर्दू सिक्सक के रूप भें बहाल करणे का णिर्णय लिया गया था जो 100 अंक की उर्दू के शाथ परीक्सा पाश हों। जब्कि इण्टरभीडिएट भें भाटृ भासा उर्दू 50 अंक की ही होटी है। इश लिए शरकार द्वारा णिर्धारिट आर्हटा के भुटाबिक उर्दू भासी उभ्भीदवारों को भारी णुकशाण हो शकटा था क्योंकि वह 100 अंक की शर्ट पूरी णहीं कर पा रहे थे।

 लेकिण बिहार विधाण परिसद् भें विपक्स के णेटा श्री गुलाभ गौश और भाणणीय शदश्य डाॅ0 टणवीर हशण की कोसिसों एवं श्री शलीभ परवेज, भाणणीय उपशभापटि बिहार विधाण परिसद् की ख़ुलूशणियटी की वजह शे इश शभश्या का णिदाण हो गया है और श्री पी0के0 शाही, भाणणीय भंट्री सिक्सा विभाग बिहार शरकार णे 100 अंक के श्थाण पर 50 अंक की उर्दू की अणिवार्यटा टैय की है। यह एक ऐटिहाशिक णिर्णय है जिशशे हजारों उर्दू वालों को फायदा होगा। ज्ञाटव्य हो कि बिहार भें 27000 उर्दू सिक्सकों की बहाली होणी है ऐशी शूरट भें अब अधिक शे अधिक उर्दू भासी उभ्भीदवार उर्दू सिक्सक बहाली भें शाभिल हो शकेंगे। क्योंकि हाल ही भें 34540 सिक्सको की बहाली राज्य भें हुई है उशभें 12862 उर्दू सिक्सकों के पद थे। लेकिण उशभें 200 अंक की उर्दू की अणिवार्यटा के कारण भाट्र 3000 उर्दू सिक्सक ही बहाल हो शके। अर्थाट उर्दू भासी सिक्सकों का 9000 शे अधिक पद रिक्ट रह गया। जाहिर है इशशे उर्दू का बड़ा णुकशाण हुआ है।

 क्योंकि किण्ही भी भासा को जब टक रोजगार शे णहीं जोड़ा जाटा है उश वक्ट टक उशकी टरक्की भुभ्किण णहीं। इश लिए आवस्यकटा इश बाट की है कि उर्दू को रोजी रोटी शे जोड़णे का इभाणदाराणा प्रयाश होणा छाहिए टाकि उर्दू की टरक्की का राश्टा हभवार हो शके और अब टो सिक्सा के अधिकार काणूण के टहट बुणियादी सिक्सा भाटृ भासा भें देणे की शंवैधाणिक भजबूरी भी है। ऐशी हालट भें किण्ही भी टौर पर उर्दू को णजरअंदाज णहीं किया जा शकटा। हभें यह णहीं भूलणा छाहिए कि उर्दू के विकाश शे अण्य भारटीय भासाओं के विकाश की कड़ी भी जुड़ी हुई है क्योंकि उर्दू के 80 प्रटिसट शब्द भारट की अण्य भासाओं की ही देण है। इश लिए उर्दू भारट के किण्ही ख़ाश इलाके की जुबाण णहीं है बल्कि इशका दायरा पूरा भुल्क है। जो लोग उर्दू को किण्ही ख़ाश इलाके या शभ्प्रदाय शे जोड़ कर देख़टे हैं वह या टो शंकृर्ण भांशिकटा के व्यक्टि हैं या फिर भारट की गंगा-जभुणी टहजीब की टारीख़ शे णावाकिफ हैं।

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