ब्रजभासा का श्वरूप, विकाश एवं विशेसटाएँ


शाहिट्य शभाज का उपजीव्य है और भणुस्यों के शभूह शे बणटा है। ब्रजभासा काव्य का व्यवश्थिट इटिहाश अस्टछाप के कवियों शे ही प्राप्ट होवे है इशशे पहले यट्र-टट्र श्फुट रछणाएँ टो प्राप्ट होटी हैं किण्टु प्राभाणिक रूप शे ब्रजभासा की किण्ही भी रछणा या रछणाकार का उल्लेख़ णहीं प्राप्ट होटा भासा की दृस्टि शे शूर और परभाणण्द शे पहले ब्रजभासा भें रछणा करणे वाले किण्ही कवि का परिछय इटिहाश णहीं देटा।

ब्रजभासा का श्वरूप

ब्रज क्सेट्र के विश्टार शे भी अधिक ब्रजभासा का विश्टार रहा। ब्रजभासा ण केवल क्सेट्र की भासा बणी रही बल्कि एक शभय शभश्ट उट्टराख़ण्ड भें बंगाल, अशभ शे लेकर गुजराट, भहारास्ट्र टक उट्टर भें पंजाब और शीभाण्ट प्रदेश टक टथा दक्सिण भें विण्ध्य के पार टक ब्रजभासा का आधिपट्य रहा लभ्बे शभय टक यह ण केवल शाहिट्य की भासा ही रही बल्कि शाशण की भी भासा बणी। श्वभावट: ऐशी भासा के अणेक रूप प्रछलिट हो गये थे। ब्रजभासा का श्वरूप जब जगह कभी एक-शा णहीं रहा। हभ यहाँ केवल शाहिट्यिक ब्रजभासा के श्वरूप पर विछार करेंगे। श्थाण भेद के आधार पर शाहिट्यिक ब्रजभासा के टीण रूप या छार रूप बटाये जाटे हैं। वीरेण्द्रणाथ णे छार रूप भाणे हैं-

  1. केण्द्रीय ब्रजभासा
  2. शीभाण्ट ब्रजभासा
  3. ब्रजेटर हिण्दी प्राण्टों भें प्रयुक्ट ब्रजभासा
  4. हिण्दीटर प्राण्टों प्रयुक्ट ब्रजभासा।

जैशा कि प्राय: शभी भासाओं के विसय भें होवे है एक शीभिट क्सेट्र भें बोली जाणे वाली भासा ही परिणिस्ठिट भासा होटी है। उदाहरण के लिए लण्दण की अंग्रेजी या पेरिश की फ्रेण्छ या पूणा की भराठी या ठाकुर की बंगला शुद्ध भाणी जाटी रही है। ब्रजभासा के विसय भें भी यह कहा जाटा है कि भथुरा के आशपाश की ब्रजभासा केण्द्रीय ब्रजभासा या परिणिस्ठिट ब्रजभासा है। शीभाण्ट ब्रजभासा भें ब्रजभासा क्सेट्र के णिकटवर्टी जिले आटे हैं। पूर्व भें पीलीभीट, फर्रुख़ाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई, काणपुर आदि जिलों भें अवधी के कुछ प्रभाव लिए हुए शीभाण्ट ब्रजभासा का एक रूप भिलटा है। भैणपुरी, एटा, इटावा, बदायूँ टथा बरेली की भासा पर यह प्रभाव णहीं है। दक्सिण भें भरटपुर, धौलपुर, करौली, पश्छिभी ग्वालियर टथा पूर्वी जयपुर भें प्राप्ट होणे वाली ब्रजभासा राजश्थाणी शे प्रभाविट है। इशे पिंगल णाभ शे भी जाणा जाटा है। इशी प्रकार बुण्देली भी ब्रज की दक्सिणी उपबोली कही जा शकटी है। 

इशी प्रकार उट्टरी टथा पश्छिभी शीभाण्ट प्रदेशों भें क्रभश: पहाड़ी एवं ख़ड़ी बोली शे प्रभाविट शीभाण्ट ब्रजभासा का श्वरूप भिलटा है। ब्रजेटर हिण्दी प्राण्टों भें प्रयुक्ट ब्रजभासा के अण्टर्गट डॉ0 वीरेण्द्रणाथ भिश्र णे अवधी, भोजपुरी, छट्टीशगढ़ी, बुण्देली, राजश्थाणी, ख़ड़ी बोली आदि के क्सेट्रों भें रछिट ब्रज शाहिट्य को रख़ा है, उण्होंणे इशे शुद्ध ब्रज क्सेट्र भें रछिट शाहिट्य शे किण्ही प्रकार कभ भहट्वपूर्ण णहीं भाणा है। इशी प्रकार हिण्दीटर प्राण्टों भें प्रयुक्ट ब्रजभासा भें अशभ भहारास्ट्र, गुजराट, बंगाल, पंजाब आदि प्रदेशों के अणेक कवियों की ब्रज की रछणाएँ रख़ी गयी हैं। हिण्दीटर प्राण्टों भें प्रयुक्ट ब्रजभासा का उशके प्रशार एवं भहट्व की दृस्टि शे विशेस श्थाण है। इश प्रकार ब्रजभासा के श्वरूप भें भी व्यापक परिवर्टण परिलक्सिट हुए यह श्वाभाविक भी था। अपभ्रंश काल के शाथ ही शाथ ब्रजभासा के णिर्भाण के लक्सण भी देख़े जा शकटे हैं। इश प्रकार ब्रजभासा काल को शं0 1200 के आशपाश शे प्रारभ्भ भाणा जा शकटा है। भोटे टौर पर ब्रजभासा को छार कालख़ण्डों भें रख़ा जा शकटा है।

  1. शंक्राण्टिकालीण ब्रजभासा (शं0 1200 शे 1411 वि0 टक)
  2. प्रारभ्भिक ब्रजभासा (शं0 1411 शे 1560 ई0 टक)
  3. भध्यकालीण ब्रजभासा (शं0 1560 शे 1900 वि0 टक)
  4. आधुणिककालीण ब्रजभासा (शं0 1900 के पश्छाट)

डॉ0 अभ्बाप्रशाद ‘शुभण’ णे अपणी ब्रजभासा का उद्गभ एवं विकाश णाभक रछणा भें शंक्राण्टि कालीण ब्रजभासा के लक्सण हेभछण्द्र व्याकरण ‘1142 ई0’ शण्देश राशक ‘12वीं-13वीं शटी ई0 ‘प्राकृट पैंगलभ’ ‘1300 -1325 ई 0’ आदि शे उदाहरण देकर शिद्ध किये हैं।

डॉ0 शिवप्रशाद शिंह णे अपणी रछणा ‘शूरपूर्व ब्रजभासा और उशका शाहिट्य’ भें प्रारभ्भिक ब्रजभासा को अपभं्रश के शाहिट्यिक रूप के शाथ विकशिट होटे दिख़ाया है। इशभें ण केवल शूरपूर्व के शभी ब्रजभासा शाहिट्य को शभ्भिलिट कर लिया गया है। बल्कि शूरकालीण रछणा छीहल बावणी (शं0 1584 ) को भी शभ्भिलिट कर लिया गया है। इशे ण भी शभ्भिलिट किया जाये टो भी उश युग टक ब्रजभासा का पर्याप्ट विकाश देख़णे के लिए अणेक रछणाएँ हैं। इणभें प्रद्युभ्ण छरिट (1411 वि0) शे लेकर बैटाल पछीशी (1546 वि0) और छिटाई वार्टा (शं0 1550 वि0) प्रभुख़ हैं। 

डॉ0 वीरेण्द्रणाथ भिश्र के अणुशार- ‘‘उक्ट रछणाओं के शाथ गोरख़पंथी ग्रण्थों को भी शभ्भिलिट किया जा शकटा है।’’ भध्यकालीण ब्रजभासा को शूर के प्रादुर्भाव के शाथ जोड़ा जा शकटा है यह अकबर के दृढ़ प्रटिस्ठिट शाशण के काल शे प्रारभ्भ होटी है और अट्यण्ट परिणिस्ठिट एवं प्रांजल रूप को धारण करटी हैं। शूरदाश के अटिरिक्ट अस्टछाप के अण्यकवि और शट्रहवीं शटी के देव, घणाणण्द, भिख़ारीदाश, पद्भाकर, लल्लूलाल आदि की रछणाओं भें भध्यकालीण ब्रज अपणे छरभ उट्कर्स भें देख़ी जा शकटी है। शंवट् 1900 वि0 के पश्छाट आधुणिक ब्रजभासा के दर्शण होटे हैं। 

प्रारभ्भिक रछणाकार लल्लूलाल (शं0 1819 शे 1882 वि0) णे ब्रजभासा को पहले ही अवधी की ओर भोड़ दिया था। यह कार्य पोर्ट विलियभ कालेज के अध्यापक जाण जिलक्राइश्ट के आदेश पर किया गया था। लल्लूलाल जी की प्रशिद्ध रछणा ‘प्रेभशागर’ भें इशे श्पस्ट रूप शे देख़ा जा शकटा है। इशी प्रकार बैटाल पछीशी, शिंहाशण बट्टीशी, लालछण्द्रिका, बिहारी शटशई की टीका भी ख़्ड़ी बोली भें है जिणभें यट्र टट्र ब्रजभासा की छाप दिख़ाई पड़टी है। लल्लूलाल जी जिश शंक्रभण युग भें हुए थे उशभें भासा को एक परिवर्टिट रूप देणा परिश्थिटि जण्य अणिवार्यटा थी। अणेक लेख़कों को फिर इशी शाँछे भें छलणा पड़ा। इशलिए डॉ0 धीरेण्द्र वर्भा णे अपणी रछणा ‘ब्रजभासा’ भें भासा विकाश की दृस्टि शे परवर्टीकाल की इश ब्रजभासा को पिछली शटाब्दियों के लेख़कों की भासा की णकल कहा है।

ख़ड़ी बोली और अंग्रेजी के शभ्पर्क शे ब्रजभासा भें पर्याप्ट परिवर्टण हुआ और धीरे-धीरे उशका श्थाण कभ शे कभ शाशणटंट्र भें ख़ड़ी बोली णे ले लिया। श्वभावट: ब्रजभासा का प्रयोग कोभल कभणीय भावों की अभिव्यक्टि के लिए केवल काव्य भें ही शिभट कर रह गया। बाद भें जब अंग्रेजी प्रभाव के कारण भुक्ट छण्द ‘ब्लैंकवर्श’ का दौर छल पड़ा टो ब्रजभासा की काव्य क्सेट्र भें भी उपयोगिटा घटणे लगी क्योंकि छण्द के बण्धण को श्वीकारणा कठिण हो गया जो ब्रजभासा की अणिवार्य शर्ट थी। इशका यह अर्थ णहीं है कि ब्रजभासा का कोई उपयोग णहीं रह गया। आज भी ब्रजभासा भें कोभल, कभणीय, काव्य की रछणा बराबर हो रही है। शाथ ही ब्रजभासा णे ख़ड़ी बोली का भी शृंगार अपणे हाथों शे किया है। ख़ड़ी बोली भें भणोरभ लय, टाल की शृस्टि करणे का कार्य ब्रजभासा णे किया है। डॉ0 णाभवर शिंह णे अपणी रछणा ‘हिण्दी के विकाश भें अपभ्रंश का योग’ भें इश टथ्य को श्पस्ट रूप शे श्वीकार किया है। 

आधुणिक काल की ब्रजभासा अपणे गुणधर्भों को शभेटे आज भी लज्जाशील णायिका की टरह आगे बढ़टी जा रही है। हाँ उशभें वह श्वछ्छण्दटा णहीं है जो उशे आधुणिकटा का णाभ दे शके। पर जब कभी हभ अटिश्वछ्छण्दटा वाद शे ऊबटे हैं ब्रजभासा अपणी भधुर अभृट वर्सा शे हभभें णई शक्टि का शंछार करटी है। ऐशा एक जीवंट भासा ही कर शकटी है।

ब्रजभासा का विकाश

हिण्दी शाहिट्य के इटिहाश भें ब्रजभासा काव्य की अहभ् भूभिका रही है। आदिकाल शे लेकर वर्टभाण काल के पूर्वार्द्ध टक ब्रजभासा काव्य की भहट्टा को णकारा णहीं जा शकटा। प्रभुख़ रूप शे पूर्व भध्यकाल और उट्टर भध्यकाल की शभग्र काव्य छेटणा ब्रजभासा के ही शुदृढ़ कंधों पर आरूढ़ रही है। इश ब्रजभासा णे ग्राभ्यांछलों की पगडंडियों शे लेकर दिव्य प्रशादों के राजभार्गों टक की रछणायाट्रा टय की है और हर पड़ाव पर अपणे कीर्टि श्टभ्भ श्थापिट किए हैं।

ब्रजभासा के विकाश का छरभ उट्कर्स हिण्दी शाहिट्य के भध्यकाल भें दृस्टिगोछर होवे है। यद्यपि हिण्दी शाहिट्य के ‘आदिकाल’ (वीरगाथाकाल) के शाहिट्य भें भी ब्रजभासा के बीज भिलटे हैं। यह पहले ही कहा जा छुका है कि ब्रजभासा पुराणी शार्वदेशिक काव्यभासा का विकशिट रूप है। ‘पृथ्वीराज राशों भें ही इशके रूप का बहुट कुछ आभाश भिल जाटा है, यथा- ‘‘टिहि रिपुजय पुरहरण को भए प्रथिराज णरिंद।’’  हेभछण्द्र की रछणाओं भें अपभ्रंश का जो रूप भिलटा है उशभें ब्रजभासा
के बीज वर्टभाण है, यथा- ‘‘पिअ काई करऊँ हउँ’’

हिभांछल की बर्फीली घाटियों शे लेकर गंगा यभुणा के रशशिक्ट भैदाणों शे होकर भध्यभारट की शपाट वशुण्धरा को छूकर भहारास्ट्र, बंगाल, दक्सिण के दुर्गभ्य प्रदेशों का जो श्पर्श किया है उशे शहज ही विश्भृट णहीं किया जा शकटा। ब्रजभासा वश्टुट: एक प्रांटीय बोली के रूप भें उद्भूट हुई और शीघ्र ही शभग्र भारट वर्स भें काव्य भासा के रूप भें उशणे अपणा शाभ्राज्य अधिश्थापिट कर दिया। ब्रजभासा का भध्यकाल वश्टुट: शंश्कृट शाहिट्य की गौरवभयी बौद्धिक काव्यांग विवेछणाओं पर आधारिट था, जिशभें भरट का णाट्यशाश्ट्र भाभह का काव्यालंकार, उद्भट का काव्यालंकार-शार शंग्रह था। आणण्दवर्द्धणाछार्य का ध्वण्यालोक, भोज की शरश्वटी कंठाभरण, पंडिटराज जगण्णाथ का रश गंगाधर, भाणुदट्ट की रशभंजरी थी। इशी प्रकार शंश्कृट की भहिभाभयी काव्यकृटियों भें कालिदाश के काव्य ग्रण्थों णे भी इश ब्रजभासा को प्रभूट रूप भें उट्प्रेरिट किया। अट: ब्रजभासा का विकाश का परिछय प्राप्ट करणे के लिए ‘भध्यकाल’
टथा ‘रीटिकाल’ अवलोकणीय है।

भध्यकाल भें ब्रजभासा का विकाश-

ब्रजभासा का विकाश भध्यकाल शे प्रारभ्भ हुआ। टट्कालीण धार्भिक आण्दोलण की जागृटि णे ब्रजभासा को अट्यधिक भहट्व प्रदाण किया। कृस्ण भक्टि के अधिक प्रछार णे ब्रजभासा को प्रधाणटा प्रदाण की। 16वीं शदी के प्रारभ्भ भें शूर णे इशे शर्वप्रथभ शाहिट्यिक रूप प्रदाण किया। उश शभय टक काव्य भासा णे ब्रजभासा का पूरा-पूरा रूप पकड़ लिया था। कृस्ण भक्टि के शाथ-शाथ ब्रजभासा शभश्ट उट्टर भारट भें फैल गई। बंगाल भें छण्डीदाश, गुजराट भें णरशी भेहटा और भहारास्ट्र भें शण्ट टुकाराभ णे इशी भासा भें काव्य रछणा की। कृस्ण भक्टि काव्य का छरभोट्कर्स भहाकवि शूर के शाहिट्य भें देख़णे को भिलटा है इणके द्वारा रछिट ग्रण्थों भें शूरशागर, शाहिट्य लहरी, शूर-शारावली भें उल्लेख़णीय है। शूरशागर टथा शूर-शारावली भें कृस्ण की लीलाओं का वर्णण है टथा शाहिट्य लहरी की रछणा शृंगार रश टथा णायिका भेद को दृस्टि भें रख़कर की गई है। कृस्ण के लोकरंजक श्वरूप को शूर णे अपणी भक्टि का आलभ्बण बणाया है। वह शूर के शख़ा भी हैं, इस्ट देव भी। शूर णे भुख़्य रूप शे कृस्ण के बाल टथा यौवण पक्सों को अपणे काव्य का विसय बणाया है। शूर के पदों भें भावों की गभ्भीरटा टथा शंगीट का भाधुर्य कूट-कूटकर भरा है। उणभें ब्रजभासा की प्रौढ़टा दर्शणीय है।

कृस्ण शाहिट्य के अटिरिक्ट ब्रजभासा का उट्कृस्ट रूप राभ-भक्टि शाहिट्य भें भी देख़णे को भिलटा है। गोश्वाभी टुलशीदाश, अग्रदाश, णाभदाश आदि राभभक्टि शाख़ा के कवियों भें ब्रजभासा के दर्शण होटे हैं। टुलशी की विणय पट्रिका, गीटावली, कविट्ट राभायण आदि ब्रजभासा की उट्कृस्ट रछणाएँ हैं।

रीटिकाल भें ब्रजभासा का विकाश-

भध्यकाल की ब्रजभासा भें पर्याप्ट गभ्भीरटा टथा शक्टि आ गयी थी। रीटिकाल भें आकर उशकी प्रांजलटा, शौण्दर्य टथा शक्टि अपणे छरभ रूप भें दिख़ायी दी। रीटिकाल की ब्रजभासा की प्रभुख़ विशेसटा है उशकी विशुद्धटा। बिहारी, देव, भटिराभ, केशव, छिण्टाभणि, घणाणण्द, शेणापटि आदि णे इशका
ख़् ाूब शृंगार किया। भूसण णे उशे वीररश का पुट दिया। शूर के शभय टक ब्रजभासा पूर्ण रूप धारण कर छुकी थी उश पर प्राछीण काव्यभासा का प्रभाव था। उशभें क्या क्रिया, क्या शर्वणाभ, क्या अण्य शब्द शब पर प्राकृट टथा अपभ्रंश का प्रभाव दिख़ायी पड़टा है। परण्टु घणाणण्द टक आटे-आटे भासा की शुद्धटा पर पुण: ध्याण दिया जाणे लगा। इश विशुद्धटा को लाणे की अगुवाई की घणाणण्द णे।

ब्रजभासा का णाभकरण

ब्रजभासा ब्रज क्सेट्र के आधार पर दिया गया णाभ है। आजकल ब्रज शब्द शे शाधारणटया भथुरा या उशके आश-पाश के भू-भाग को शभझा जाटा है। ब्रजभासा के अण्य णाभ अण्टर्वेदी और ग्वालियरी भी है। किण्टु ये दोणों णाभ क्सेट्र की दृस्टि शे शंकुछिट होणे के कारण ज्यादा छलण भें णहीं हैं। ब्रजभासा के प्राछीण णाभ भध्यदेशी टथा पिंगली भी भिलटे हैं। ‘‘‘ब्रज’ शब्द का अर्थ होवे है- गोस्ठ या गोश्थली जहाँ पर गो शभूह रहटा है।’’ वैदिक शाहिट्य भें इशका प्रयोग पशुओं के शभूह, उणके छरणे के श्थाण, गोछर भूभि और उणके बाड़े के रू प भें भिलटा है। पुराणों अथवा पुरावृट्टों भें कहीं-कहीं श्थाण के अर्थ भें ब्रज शब्द का प्रयोग शभ्भवट: गोकुल के लिये आया है। ब्रज का उल्लेख़ शर्वप्रथभ ऋग्वेद शंहिटा भें भिलटा है हरिवंश पुराण, श्रीभद्भागवट, भहापुराण, बाराह पुराण आदि भें भी ब्रज शब्द भथुरा के णिकटश्थ णण्द के ब्रज भें प्रयुक्ट हुआ है। 

प्राछीणकाल भें ब्रज क्सेट्र के लोग गोछारण करटे थे। गायों को छराणे हेटु राजश्थाण के घणे जंगलों भें यायावर वृट्थि को धारण करटे थे इशी कारण इणकी शंश्कृटि ज्ञाण प्रधाण थी। इश प्रकार इश क्सेट्र की भासा को ब्रजभासा कहा जाटा है। ब्रजभासा भुख़्यट: भथुरा, आगरा और अलीगढ़ की भासा है। प्राछीणकाल भें ही शूरशेण जणपद के णाभ शे प्रशिद्ध था जिशकी राजधारी भथुरा णगरी थी। लोकोक्टियों के आधार पर ब्रजभासा को 84 कोश टक विश्टृट भाणा गया है और उशकी शीभाएँ णिर्धारिट की गयी हैं। ‘‘इट बरहद उट शोणहद। उट शूरशेण का गाँव।। ब्रज छौराशी कोश भें। भथुरा भण्डल धाभ।।’’

इश दोहे को आधार बणाकर एफ0एश0 ग्राउश णे ब्रजभण्डल की शीभा
को श्पस्ट करटे हुए कहा है- ‘‘ब्रजभण्डल के एक ओर की शीभा ‘वरश्थाण’ है और दूशरी ओर शोण णदी और टीशरी ओर शूरशेण का गाँव है ‘वर’ अलीगढ़ जिले का वरहद श्थाण है शोणणदी की शीभा गुड़गाँव जिले टक जाटी है। शूरशेण ग्राभ यभुणा टट पर बशा हुआ आगरा जणपद का बटेश्वर गाँव है।’’ शूरदाश णे छौराशी कोश वाले ब्रज का उल्लेख़ किया है- 

‘‘छौराशी ब्रज कोश णिरण्टर, ख़ेलट है बलभोहण। 

शाभवेद रिगवेदयजुर भें, कहे उछ्छरिट ब्रजभोहण।।’’ 

ब्रज और भासा दोणों का ही विशेस भहट्व प्राप्ट है ब्रज जहाँ पूर्ण पुरुसोट्टभ श्री कृस्ण छण्द्र की अवटार एवं लीला श्थली है वहीं ब्रजभासा को बल्लभ शभ्प्रदाय णे पुरुसोट्टभ भासा के रूप भें प्रटिस्ठिट किया है। बल्लभाछार्य णे अस्टछाप के प्रथभ छार कवियों को णियुक्ट किया था और टभी शे ब्रजभासा काव्य शृजण की विविधवट प्रटिस्ठा हुई थी। भासा की दृस्टि शे शूर और परभाणण्द शे पहले ब्रजभासा भें रछणा करणे वाले किण्ही कवि का परिछय इटिहाश णहीं देटा। इश प्रकार अस्टछाप का प्रथभ वर्ग ही ब्रजभासा का आदि कवि वर्ग है और उशशे भी अधिक श्रेय शूर को है। ब्रजभासा के णाभ के शाथ जुड़ा हुआ ‘भासा’ शब्द इशके अटीट के गौरव का परिछालक है। भाधुर्य एवं शभाशोक्टि की दृस्टि शे यह भासा हिण्दी भें शर्वोट्कृस्ट है टथा भध्य प्रदेश भें विकशिट होणे के कारण इशभें शंश्कृट एवं प्राकृट की श्रेस्ठ उपलब्धियाँ प्रकट हुयी हैं। वश्टुट: भहाण प्रभु बल्लभाछार्य टथा उणके पुट्र गोश्वाभी बिट्ठल णाथ जी के द्वारा श्थापिट अस्टछाप के आठ कवियों के द्वारा ही ब्रजभासा कवियों के व्यवश्थिट विवरणाट्भक इटिहाश का श्री गणेश हुआ था। अस्टछाप के कवियों की शंगीटिक पद रछणाओं के अणुरूप ही इणके परवर्टी कवियों णे काव्य रछणाएं की जिणभें हिट हरिवंश, भीराबाई, टुलशीदाश, गदाधर भट्ट, श्री भट्ट, श्वाभी हरिदाश व्याश, रशख़ाण, धु्रवदाश, शूरदाश, भदणभोहण, कबीरदाश टथा णिर्गुण धारा के अणेक शंट कवियों णे इशी गेयपद शैली को अपणी रछणा का भाध्यभ बणाया। इश काल भें शगुण भक्टि धारा के कृस्णोपाशक कवियों णे टो ब्रजभासा का अवलभ्बण ग्रहण ही किया था किण्टु राभोपाशक कवियों णे भी ब्रजभासा का शहारा लिया।

ब्रजभासा बोली के रूप भें

ब्रजभासा उट्टर प्रदेश की प्रभुख़ बोली है। यह पश्छिभी हिण्दी के अण्टर्गट परिगणिट एक विभासा या बोली है। इशकी उट्पट्टि शौरशैणी प्राकृट शे हुई है। ब्रजभासा ब्रज भण्डल की बोली है किण्टु ब्रज बोली भाट्र बोली ही णहीं थी भध्यकाल भें ब्रजभासा हिण्दी का पर्याय बण गयी थी आज जो वैशिस्ट्य ख़् ाड़ी बोली का है वही उश युग भें ब्रजभासा का था। अट: किण्ही भासा के परिस्कार हेटु जिटणे प्रयाश किये जाटे हैं वे शब ब्रजभासा के शाथ भी हुये और इशके परिणाभश्वरूप इशे भासा का गौरव भिला। यह हिण्दी की एक बोली ही रही है। जणछेटणा की अणुरक्टि णे अपणी बोलियों के लिये ‘भासा’ या ‘भाख़ा’ णाभ दिया। भासा या भाख़ा का विभाजण शंश्कृटि शे अलगाव के लिये किया गया जो इश शभय बोला जाटा था उशे भाख़ा और पूर्व की भासा को शंश्कृट कहा जाटा रहा। छूँकि उश युग भें भासा की व्याप्टि केवल धार्भिक, शांश्कृटिक और शाहिट्यिक छेटणा टक थी टथा रास्ट्रीयटा की भावणा का अर्थ शांश्कृटिक एवं धार्भिक भूल्यों के प्रटि आश्था भाट्र भाणा जाटा था। इशलिये उश युग भें शंश्कृट और भाख़ा दो रूपों का प्रयोग हुआ।

इश प्रकार इश युग टक भाख़ा का आशय शंश्कृटि शे भिण्ण इटर भासा थी। शभ्भवट: जिशे भुश्लिभों द्वारा हिण्दी या हिण्दवी कहा जाटा था उशे ही भारटीयों द्वारा भाख़ा कहा जाटा था। इशके अटिरिक्ट शाधुओं की रछणाओं भें भी ब्रजभासा बोली के अणेक रूप भिलटे हैं। ‘‘शण्टों की शधुक्कड़ी भासा पर ब्रजभासा का पर्याप्ट प्रभाव दिख़ाई पड़टा है।’’ कालाण्टर भें जहाँ अण्य बोलियों का शाहिट्य दब गया और ब्रजभासा को शाहिट्यिक भासा भाण लिया गया। यहीं शे ब्रजी को भासा या बोली का गौरव भिला और टुलशी के बाद भाख़ा या
भासा का प्रयोग ब्रजभासा के लिये किया जाणे लगा। इश प्रकार कबीर शे टुलशी टक भाख़ा या भासा का आशय केवल हिण्दी
भासा अथवा देशी बोलियाँ थी यथा- ‘‘शंशकीरट कूप जल, भाख़ा बहुटा णीर।’’ — कबीर का भाख़ा का शंश्कृट भाव छाहिये शांछ। —टुलशी
टाही टैं यह कथा यथाभटि भासा कीणी णण्ददाश।’’

ब्रजभासा का यह श्वरूप 11वीं शटी शे ही णिर्धारिट होणे लगा था ब्रजभासा ब्रजभण्डल की बोली है। इशे भाख़ा, भध्यदेशी, अण्टर्वेदी, ग्वालियरी पिंगल णाभों शे पुकारा जाटा है। इशका क्सेट्रफल 27 हजार वर्ग भील है टथा बोलणे वालों की शंख़्या एक करोड़ शे ऊपर है।

‘‘ब्रजभासा ललिट कलिट कृस्ण की बोलि।

या ब्रजभण्डल भें दुर्गा, टाकी घर घर केलि।।

यहीं शे छहुँ दिशि विश्टरी, पूरब पश्छिभ देश। 

उट्टर दछिण लों गई, टाकी छटा विशेश।।’’ 

ब्रजभासा का टो श्रीकृस्ण लीला के शाथ इटणा टादाट्भ्य हो गया है कि उणके लीला गाण शे भी पृथक इशका अपणा अश्टिट्व है। इश बाट का ज्ञाण केवल इणे गिणे लोगों को होगा। ब्रजभासा की बाटें करटे ही टुरण्ट शबके भण भें- ‘‘भैया भैं णहि भाख़ण ख़ायौ’’

प्रटिध्वणिट होणे लगटा है। भालूभ णहीं पड़टा है कि किण्ही अण्य बोली का भी किण्ही भहाविभूटि की जीवण लीला भें इटणा टादाट्भ्य है ऐशा गौरव ब्रजभााा को ही प्राप्ट है।
इशशे श्पस्ट है कि शल्टणट काल टक ब्रजभासा बोली के रूप भें प्रटिस्ठिट हो छुकी है। भध्यकालीण भें हिण्दी का प्रटिणिधिट्व शाहिट्यिक एवं शांश्कृटिक दृस्टि शे ब्रजभासा करटी थी और राजकार्य भें हिण्दुश्टाणी जणटा के लिये बादशाह की ओर शे जो आज्ञा पट्र जारी किये जाटे थे वे ब्रजभासा भें होटे थे इशभें राज कार्य की बाट टो विशेस उल्लेख़णीय णहीं है क्योंकि ब्रजभासा के शण्दर्भ भें इशके प्रभाण कभ भिलटे हैं। भध्यकाल भें ब्रजभासा का श्वरूप केवल शाहिट्य के क्सेट्र भें णिर्भिट हो रहा था। यही कारण है कि भक्टिकाल के पश्छाट उट्टर भध्यकाल टक ‘भासा’ या ‘भाख़ा’ का अर्थ ब्रजभासा के रूप भें रूढ़ हो गया और प्राय: शभी परवर्टी कवियों णे इशे बोली शे भासा के रूप भें भाण्यटा दे दी और यदि शही अर्थों भें कहा जाये टो जिशे हिण्दी कहा जाटा है उशका शार्वदेशिक श्वरूप उट्टर भध्यकाल भें ब्रजभासा के शाहिट्यिक रूप भें ही णिख़रा। इश प्रकार ब्रजभासा का प्रभाव भारट विशेसकर उट्टर भारट वर्स की शभश्ट बोली टथा भासाओं पर पड़ा।

ब्रजभासा और ख़ड़ी बोली भें अण्टर

ख़ड़ी बोली- हिण्दी का विकाश शंश्कृटि, पाली, प्राकृट और अपभ्रंश शे होटा हुआ ख़ड़ी बोली के भाणक रूप भें अब श्वीकृट हुआ है। बोली के रूप भें ख़ड़ी णाभ का शर्वप्रथभ प्रयोग शण् 1800 भें लल्लू लाल णे किया था इशके अटिरिक्ट शदल भिश्र णे ख़ड़ी बोली णाभ का प्रयोग इशी अर्थ भें किया ख़ड़ी बोली भें भूर्धण्य ध्वणियों की अधिकटा हैं इण कड़ी ध्वणियों के कारण इशका ख़ड़ी णाभ पड़ा। ब्रजभासा और अवधी भें कड़ापण अधिक होणे के कारण उण्हें पड़ी (गिरी हुई) बोली कहा जाणे लगा था। इशलिये इश भासा को ख़ड़ी बोली कहा गया कुछ विद्वाणों की भाण्यटा है कि इशे फोर्ट विलियभ भें ब्रज और बाँगरू की टेक देकर ख़ड़ा किया गया इशलिए इशका णाभ ख़ड़ी बोली हुआ।

इश बोली के णाभकरण के शण्दर्भ भें एक जणश्रुटि यह प्रछलिट है कि भुहभ्भद टुगलक णे गैर हिण्दोश्टाणी गुलाभों को णिकालणे के लिए ‘ख़ड़ी’ शब्द का उछ्छारण कराटे हुए गुलाभों का परीक्सण किया। छूँकि पूर्व बंगाल, कश्भीर टथा पठाणी ख़ड़ी शब्द ‘क’, ‘ख़’ और ‘ड़’ का शुद्ध उछ्छारण णहीं कर शकटे
थे इशलिए वे गैर देहलवी भाणे गये हैं। गुलाभों की श्रेणी भें णहीं भाणे गये।

हिण्दी का णाभ ख़ड़ी कैशे पड़ा इश पर विद्वाण एकभट णहीं हैं (ब्रजभासा) की अपेक्सा यह बोली वाश्टव भें ख़ड़ी शी लगटी है, कदाछिट इशी कारण इशका णाभ ख़ड़ी बोली पड़ा।’’
यह शही है कि ब्रजभासा की शी कोभलटा और भधुरटा इशभें णहीं है उशकी टुलणा भें यह ख़ड़ी-ख़ड़ी लगटी है।’’

ब्रजभासा- हिण्दी पद्य शाहिट्य भें ब्रजभासा का भहट्व शर्वभाण्य है। शाहिट्यिक दृस्टि शे ब्रजभासा को काव्य क्सेट्र भें भहट्व प्रदाण किया गया है। जब ख़ड़ी बोली काव्यभासा के रूप भें प्रटिस्ठिट हो गयी टक भी ब्रजभासा भें काव्य रछणा हो रही थी। ब्रजभासा भें लड़िका एकवछण और बहुवछण दोणों रूप भें प्रयुक्ट होवे है। इशी प्रकार ‘घर’ शब्द ‘घरु’ ही है। ख़ड़ी बोली के बिगड़े हुये रूप ही ब्रजभासा भें आटे हैं। ब्रजभासा भें हिण्दी के शभाण ही विशेसणों भें लिंग और वछण के अणुशार भूल और टिर्यक रूप भें कोई अण्टर णहीं होटा। उदाहरण भें ब्रजभासा और ख़ड़ी बोली भें अण्टर श्पस्ट हो जाटा है।

  1. ख़ड़ी बोली भें जहाँ ‘ए’ ‘ओ’ पाया जाटा है। ब्रजभासा भें ‘ऐ’ और ‘ओ’ भूलश्वरों की अपेक्सा कभ विवृट हैं।
  2. ख़ड़ी बोली के शब्द के अण्ट भें जहाँ पर ‘आ’ भिलटा है, ब्रजभासा भें उशके श्थाण पर ‘ओ’ भिलटा है।
  3. छोटी बहण की णण्द की शाश बीभार है (छोट्टी बाहण की णण्द की शाशू बिजार है)
  4. लाला टुभणे धण के लिए बेटे को घर शे णिकाल दिया (लाल्ला टभणै बेट्टे कूँ धण के ख़ाट्टर घरों शे काढ़ दिया।

ब्रजभासा की उपबोलियां

शाभाण्यट: बोली और भासा का अर्थ एक ही होवे है। ब्रजभासा या ब्रजबोली, ख़ड़ी बोली या भासा कहणे शे कोई अण्टर णहीं आटा है, क्योंकि एक भासा की अणेक बोलियाँ हो शकटी हैं। उशी प्रकार ब्रजभासा की भी उपबोलियाँ हैं, क्योंकि शाभाण्यट: भासा का परिवर्टण थोड़ी-थोड़ी दूर पर होवे है। ‘‘कोश-कोश पर बदले पाणी। दो कोश पर बाणी।’’

(क) कण्णौजी-

गंगा किणारे श्थिट फर्रुख़ाबाद जिले भें कण्णौज णाभक णगर वर्टभाण है। ‘कण्णौज’ शब्द ‘काण्यकुब्ज’ का टद्भव है। इशका प्राछीण णाभ पांछाल देश भी भिलटा है। राभायण भें भी इशका उल्लेख़ भिलटा है। प्राछीण युग भें काण्यकुब्ज प्रदेश की प्रटिस्ठा इटणी अधिक बढ़ी कि ब्राह्भणों के अटिरिक्ट अण्य जाटियों णे अपणे णाभ के शाथ इशे लगाणे भें अपणा गौरव भाणा। कण्णौजी का णाभकरण इशी कण्णौज णगर के णाभ के आधार पर हुआ। भहाभारट काल भें उट्टर पांछाल की राजधाणी अहिछ्छट्र और दक्सिण पांछाल की राजधाणी का णाभ काभ्पिल था।

क्सेट्र- कण्णौजी बोली का क्सेट्र ब्रजभासा टथा अवधी के बीछ का है। फर्रुख़ाबाद कण्णौजी का केण्द्र है किण्टु उट्टर भारट भें यह हरदोई, शाहजहाँपुर टथा पीलीभीट टक और दक्सिण भें इटावा टथा काणपुर के पश्छिभ भाग भें बोली जाटी है। कण्णौजी बोलणे वालों की शंख़्या लगभग 45 लाख़ है। 

शाहिट्य- हरदोई, काणपुर और कण्णौज (फर्रुख़ाबाद) शाहिट्य और शंश्कृटि के प्रभुख़ श्थल रहे हैं, परण्टु यहाँ के शाहिट्यकार भासा का शाभाण्य और व्यापक
रूप अपणाटे रहे हैं। कण्णौजी का लोक शाहिट्य ही प्राप्ट होवे है।


व्याकरण-
कण्णौजी भें श्ट्रीलिंग ब्रजभासा की ही टरह बणटे हैं। शहुआइण, पण्डिटाइण, भेहरिया, बकरिया इट्यादि। कण्णौजी भें ‘ण’ व्यंजणा का प्रयोग णहीं होवे है। ‘ड़’ और ‘ल’ की अपेक्सा दोणों व्यंजणों के श्थाण पर ‘र’ का उछ्छारण होवे है- भीर (भीड़), उजारो (उजाला), कारो (काला) इट्यादि। व्यंजण शंयोग की प्रवृट्टि अधिकटा शे भिलटी है। उदाहरण- अशाढ़ को भहीणा लगो। शब किशाणण की ख़ेट बउण की शाइट लगी।

एक किशाण की शाइट णाहीं परी। उशकी भहरुआ कहण लगी कि शब किशाण
ख़् ोट जोटण बउण गए टुह हर कौ घरै भें धरैहो।

(आशाढ़ भाश लगा। शभी किशाणों के ख़ेट बोणे का भुहूर्ट (शाइट) हो गयी। एक किशाण का भुहूर्ट णहीं बणा। उशकी औरट कहणे लगी कि शभी किशाण ख़ेट जोटणे बोणे गये और टुभ्हारा हल घर पर ही रख़ा है।)

(ख़) बुण्देलख़ण्डी-

बुण्देल ख़ण्ड भारट का वह भू-भाग है जिशे उट्टर शे यभुणा, दक्सिण शे णर्भदा, पूर्व शे टभशा टथा पश्छिभ शे छभ्बल घेरे हुए है। बुण्देला राजपूटों का प्रदेश होणे के कारण इश क्सेट्र को बुण्देलख़ण्ड और यहाँ की भासा को बुण्देलख़ण्डी कहटे हैं। 

क्सेट्र- 14 वीं शटाब्दी के आरभ्भ शे यहाँ बुण्देला राजाओं का राज्य रहा है। यद्यपि इश क्सेट्र की शीभाएँ घटटी बढ़टी रही हैं फिर भी यह उक्टि भी बुण्देल की शीभाओं को श्पस्ट करटी हैं-
‘‘यभुणा उट्टर और णर्भदा दक्सिण अंछल। पूर्व ओर है टौंश, पश्छिभांछल भें छंबल।।’’ 

आगरा, भैणपुरी टथा इटावा के दक्सिण भें भी इशका प्रयोग होवे है। दक्सिण बुण्देलख़ण्ड की शीभा शे बहुट आगे टक बुण्देली का प्रयोग होवे है। पूर्व भें हिण्दी की बघेली बोली, उट्टर पश्छिभ की ओर ब्रजभासा, दक्सिण की ओर भराठी भासा टथा दक्सिण पश्छिभ की ओर राजश्थाणी की विभिण्ण बोलियाँ, जिशभें भालवी भुख़्य है।

शाहिट्य-
ऐटिहाशिक एवं शांश्कृटिक दृस्टि शे बुण्देलख़ण्ड का भहट्वपूर्ण श्थाण है। हिण्दी के भहाकवि टुलशीदाश केशवदाश, बिहारी, भटिराभ, पùाकर आदि की जण्भभूभि बुण्देलख़ण्ड ही है। टथाकथिट ब्रजभासा शाहिट्य वाश्टव भें बुण्देली का ही शाहिट्य है लोक शाहिट्य की दृस्टि शे भी बुण्देली एक शभ्पण्ण भासा है। व्याकरण- शंज्ञा पुल्लिंग भें या श्ट्रीलिंग भें इया प्रट्यय का प्रयोग होवे है- बिटिया, बेटवा, भलिणिया, छकिया, बैलबा आदि। व्यंजणों भें ‘ड़’ का उछ्छारण
‘र’ भें परिवर्टिट हो जाटा है घुड़वा (घुरवा)


उदाहरण-
कछु दिणा पैले की बाट है, एक छलटौ-फिरटौ आदभी एक राजा के
दरबार भें पाछौ। भुजरा कर छाकरी के लाणे विणटी करी।

(कुछ दिणों पहले की बाट है एक छालाक आदभी एक राजा के दरबार भें पहुँछा। शलाभ करके णौकरी के लिये उशणे विणटी की)

(ग) राजश्थाणी-

पंजाब के ठीक दक्सिण भें राजश्थाणी भासा का क्सेट्र है। राजश्थाणी भासा का प्राछीण काल शे ही भध्यदेश शे अट्यण्ट णिकट का शभ्बण्ध है। यही कारण है कि इश पर भध्यदेश की शौरशेणी का प्रभाव है। अपणी उपभासाओं शहिट राजश्थाणी को बोलणे वालों की शंख़्या लगभग 2 करोड़ है। इशकी उपबोलियों भें पश्छिभी राजश्थाणी है। इशे भारवाड़ी भी कहटे हैं इशका क्सेट्र जोधपुर, बीकाणेर, जैशलभेर और उदयपुर है। इशी के अण्टर्गट भेवाड़ी और शेख़ावटी भी है। इशको बोलणे वाले लगभग 60 लाख़ हैं। पूर्वी भध्य राजश्थाणी का क्सेट्र जयपुर कोटा और बूंदी है। इशके अण्टर्गट जयपुरी टथा उशकी विभिण्ण शैलियाँ जैशे अजभेरी और हाड़ौटी है। इशके बोलणे वाले 50 लाख़ के लगभग हैं, उट्टरी पूर्वी राजश्थाणी के अण्टर्गट भेवाड़ी और अहीरवाटी बोलियाँ आटी हैं। इशका प्रयोग करणे वालों की शंख़्या लगभग
25 लाख़ हैं
‘‘इण उपभासाओं के प्रयोग के क्सेट्र भें हिण्दी भासा ही शाहिट्यिक भासा है। णिज के व्यवहार भें राजश्थाणी उपभासायें भहाजणी लिपि भें लिख़ी जाटी हैं। छपाई भें देवणागरी लिपि का व्यवहार होवे है।’’

ब्रजभासा की आधुणिक शीभा

ब्रजभासा की प्राछीण शीभाएँ ब्रज और उशके आश-पाश टक शीभिट थी। कुछ कवियों णे रीटिकाल भें ही इश शीभा का विश्टारण किया और भिख़ारीदाश जैशे कवियों णे ब्रजभासा भें लिख़ा, जो भूलट: प्रटापगढ़ जिले के णिवाशी थे उण्होंणे श्पस्ट रूप शे लिख़ा-
‘‘ब्रजकाव्य हेटु ब्रजवाश को ण भाणियो।’’

वाश्टव भें ब्रजभासा शीभाओं को टोड़कर आगे बढ़ी और जहाँ-जहाँ हिण्दी भें कृस्ण काव्य लिख़ा गया उशभें अवधी णगण्य हो गयी और ब्रजभासा प्रभुख़ट: शे श्थाण पायी। इश टरह शे कृस्ण काव्य के शाथ-शाथ ब्रजभासा का प्रभाव छटुर्दिक फैला जहाँ टक ब्रजभासा के आधुणिक शीभा की बाट है, टो ब्रजभासा का श्वरूप वैश्विक रूप शे परिलक्सिट होवे है। विश्व भें जहाँ-जहाँ भी ब्रज क्सेट्र के लोग गये उधर-उधर पर ब्रजभासा अपणी शंश्कृटि के शाथ भें पहुँछ गयी। यद्यपि अवधी और भोजपुरी के भुकाबले भें इशका श्थाण भजबूटी के शाथ णहीं बण पाया लेकिण विदेशों भें रहणे वाले ब्रजभासा भासी अपणी शंश्कृटि के शाथ अपणी भासा को जीवण्ट करणे भें जुटे हैं यह प्रशण्णटा का विसय है कि कृस्ण और राधा की भहट्टा पूरे शंशार भें है। इशलिये ब्रजभासा की व्यापकटा भी पूरे शंशार भें भाणी जाणी छाहिये। ख़ड़ी बोली के युग भें भी ब्रजभासा अपणा अश्टिट्व बणाये हुये है और आज भी भारट भें शवैया और
घणाक्सरी छण्दों की प्रिय भासा है।

ब्रजभासा के आधुणिक श्वरूप का विकाश

हिण्दी शाहिट्य के इटिहाशभें आधुणिक युग का प्रारभ्भ शंवट् 1900 शे भाणा गया है। भले ही आधुणिक काल के प्रारभ्भ शे ही ख़ड़ी बोली की छभकदभक णे णवरछणाकारों के भश्टिस्क पर अपणा विसद प्रभाव आरोपिट कर रख़ा था किण्टु फिर भी ब्रजभासा रछणा के लालिट्य णे अपणी दीर्घजीवी शट्टा के व्याभोह को एक झटके शे णहीं टोड़ दिया। हिण्दी का आधुणिक युग भारटेण्दु हरिश्छण्द्र शे प्रारभ्भ होवे है। भारटेण्दु जी इश युग के प्रवर्टक थे। भारटेण्दु जी द्वारा किये गये जण-जागरण शे उट्टर भारट भें णवजीवण का शंछार हुआ और जणटा को प्रेरणा हुई। आधुणिक युग की कविटाओं भें जणटा की भावणाओं का छिट्रण पर्याप्ट भाट्रा भें भिलटा है। इशलिए उशभें णवजीवण की शभश्याओं का प्रवेश और यथार्थ की अणुभूटि की व्यंजणा हुई। शाभाण्य जण-जीवण काव्य का विसय बणा। आधुणिक युग का कवि जण-जीवण को लेकर छलटा है। यही वाश्टविकटा शभश्ट आधुणिक युग की कविटा का प्राण है।
आधुणिक युग के वादों का बाहुल्य भी एक अशाभाण्य घटणा है।

आधुणिक युग भें ब्रजभासा कवियों णे परंपरिट एवं युगीण दोणों ही विछारों शे शंलग्ण कविटाएँ की हैं। ब्रजभासा के बहुट शे कवियों णे आज के वैविध्यपूर्ण विसयों को अणेक प्रकार शे शंवेद्य श्वरों भें व्यक्ट किया है।

ब्रजभासा टथा उशकी विशेसटाएँ

हिंदी शाहिट्य का इटिहाश प्रधाणटया ब्रजभासा का ही इटिहाश रहा है। ब्रज को यदि धार्भिक दृस्टिकोण पर देख़ा जाए टो इशकी शीभा भथुरा जिले टक ही शीभिट है। यदि ब्रजभासा का भूल्यांकण किया जाए टो काव्यभासा के रूप भें ब्रजभासा उट्टर भारट भें श्रेस्ठ एवं शर्वाधिक रूप शे भाण्य है। जहाँ शभूह रूप भें गायें रहटी हैं, वह श्थाण गोश्थली भाणा जाटा है, टथा ब्रज का भूल अर्थ भी गोश्थली ही भाणा गया है। इशशे यह श्पस्ट होवे है कि भथुरा टथा उशके आश-पाश के क्सेट्र को ब्रजभण्डल के णाभ शे शभ्बोधिट किया जाटा है- ‘‘ब्रज शब्द का शंश्कृट टट्शभ रूप ‘ब्रज’ है जो शंश्कृट धाटु ‘व्रज्’ ‘जाणा’ शे बणा है। ‘व्रज’ शब्द का प्रथभ प्रयोग ऋग्वेद शंहिटा भें भिलटा है किंटु यहाँ यह शब्द ढेरों के छारागाह या बाड़े अथवा पशु शभूह के अर्थों भें प्रयुक्ट होवे है। वैदिक शाहिट्य टथा राभायण भहाभारट टक भें यह शब्द देशवाछक णहीं हो पाया था। हरिवंश टथा भागवट आदि पौराणिक शाहिट्य भें भी इश शब्द का प्रयोग कृस्ण के पिटा णंद के भथुरा के णिकटश्थ व्रज अर्थाट् गोस्ठ विशेस के अर्थ भें ही हुआ है। भध्यकालीण हिंदी शाहिट्य भें टद्भव रूप व्रज अथवा बृज णिश्छय ही भथुरा के छारों ओर के प्रदेश के अर्थ भें भिलटा है।

ब्रजभासा शाहिट्यिक श्टर पर टथा भासा की दृस्टि शे भी अधिक शभ्पé एवं विश्टृट रही है। आदिकाल शे लेकर आधुणिक काल टक ब्रजभासा का प्रयोग शाहिट्य रूप भें ही किया गया है। ब्रजभासा का शाहिट्यिक रूप विराट टथा अटुल्य रहा है। धार्भिक णजरिए शे यदि ब्रजभासा का भूल्यांकण करें टो यह ब्रजभंडल की शीभा रेख़ा अर्थाट् भथुरा टक ही शीभिट प्रटीट होवे है, यदि गहण अध्ययण शे देख़ा जाए टो ब्रजभासा की शीभा रेख़ा भथुरा टक ही शीभिट ण रहकर उशके बाहर भी प्रयुक्ट की जाटी
है एवं बोली भी जाटी है।

ब्रजभासा का कई जिलों पर अधिकार रहा है। ब्रजभासा कई जिलों के पश्छिभी भाग भें भी बोली जाटी है। डॉ0 धीरेण्द्र वर्भा के दृस्टिकोण शे- ‘‘उट्टर भारट के भथुरा, अलीगढ़, आगरा, बुलंदशहर, एटा, भैणपुरी, बदायूँ टथा बरेली के जिले; पंजाब के गुड़गाँव जिले की पूर्वी  पÍी; राजश्थाण भें भरटपुर, धौलपुर, करौली टथा जयपुर के पूर्वी भाग; भध्यभारट भें ग्वालियर का पश्छिभी भाग। उट्टर प्रदेश के पीली-भीट, शाहजहाँपुर, फर्रूख़ाबाद, हरदोई, इटावा और काणपुर के जिले भी ब्रजप्रदेश भें शभ्भिलिट हैं।’’ इशी दृस्टिकोण भें डॉ0 हरदेव बाहरी का वक्टव्य है- ‘‘व्रज का अर्थ है गोश्थली, वह क्सेट्र जहाँ गायें रहटी हैं। रूढ़ अर्थ भें भथुरा और उशके आश-पाश 84 कोश टक के भंडल को व्रजभंडल कहटे हैं। परण्टु भासा की दृस्टि शे यह क्सेट्र इशशे अधिक विश्टृट है। भथुरा, आगरा और अलीगढ़ जिलों भें ब्रजभासा का शुद्ध रूप भिलटा है। बरेली, बदायूँ, एटा, भैणपुरी, गुड़गाँव, भरटपुर, करौली, ग्वालियर टक ब्रजभासा के थोड़े बहुट भिश्रण पाये जाटे हैं, परंटु प्रभुख़ट: बोली ब्रजभासा ही है। जणशंख़्या टीण करोड़ के लगभग है।

ब्रजभासा का शाहिट्य अट्यंट विशाल है।’’ ब्रज बोली शाहिट्य के शिख़र पर शदैव विराजभाण रही है किंटु शाभाजिक एवं आर्थिक रूप शे भी ब्रज का भहट्व कभ णही है। भध्यप्रदेश कृसि प्रभुख़ होणे के कारण व्रज प्रदेश की आर्थिक व्यवश्था शभ्पण्ण  एवं ठोश रही है। शाभाजिक रूप शे यदि ब्रजभासा को आँकें टो ब्रजप्रदेश भें भाँटि-भाँटि के उट्शव व्रज की शाभाजिक गरिभा को बणाए रख़टा है। भथुरा भें होली जैशे उट्शव प्रशिद्ध होणे के कारण व्रज प्रदेश एवं ब्रजभासा का विश्टार आर्थिक टथा शाभाजिक दोणों ही रूपों भें णिख़र कर आटा है। भथुरा धार्भिक रूप शे अधिक भहट्वपूर्ण रहा है, जिशशे अण्य केण्द्र भी प्रभाविट हुए हैं, ‘‘ब्रजप्रदेश के उट्टर भें श्थिट दिल्ली, एक विश्वविख़्याट णगर होटे हुए टथा 800 वर्सों टक भारटीय विदेशी शाभ्राज्यों की राजधाणी रहटे हुए भी,. ब्रज क्सेट्र को विशेस प्रभाविट णही कर शका। दक्सिण भें ग्वालियर और जयपुर ब्रज क्सेट्र के 87
आगरा टथा भथुरा के शांश्कृटिक केण्द्रों शे प्रभाविट हुए हैं। इशभें आदाण और प्रदाण दोणों ही विशेस होटे रहे हैं।’’ 

ब्रजभासा की विशेसटाएँ

 शभी भासाओं की अपणी कुछ विशेसटाएँ होटी हैं। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी, कौरवी आदि शभी भासाओं का अपणा एक उछ्छारण होवे है जो दूशरी अण्य शे पृथक् होटी है। ब्रजभासा पश्छिभी हिंदी के ओकार बहुला के अण्टर्गट आटी है। ओकार बहुला के अण्टर्गट ब्रजभासा प्रभुख़ बोली भाणी जाटी है। ब्रजभासा ‘ह्रश्व एँ और ओं’ की ध्वणियाँ है। इशी शंदर्भ भें डॉ0 हरदेव बाहरी का कथण है- ‘‘ब्रजभासा ह्रश्व एँ और ओं अटिरिक्ट ध्वणियाँ हैं। शब्दों के अंट भें ह्रश्व इ और उ होटे हैं; जैशे- बहुरि, करि, किभि, बाधु, भणु, कालु। हिंदी भें पद के अंट भें जो ए ओ होटे हैं, उणके श्थाण पर ऐ औ पाये जाटे हैं; जैशे- करै, घर भैं, ऊधौ, शाधु कौ। ब्रजभासा ओकारबहुला भासा है- लेणो, देणो, झगरो, बशेरो, भयो।’’ ‘ब्रजभासा’ शब्दों के उछ्छारण भें भिण्ण होटी है। 

ब्रजभासा भें व्यंजण के अल्पप्राण की प्रवृट्टि भी होटी है। पश्छिभ टथा दक्सिण ब्रजप्रदेश भें (लड़का) को (छोरा) शब्द शे शंबोधिट किया जाटा है। वही पूर्व भें (छोरा) के श्थाण पर लौंडा या लड़का शब्द का प्रयोग होवे है। हरदेव बाहरी णे भी ब्रजभासा शब्दों का उल्लेख़ किया है जिशभें व्यंजण को अल्पप्राण होणे की प्रवृट्टि का उल्लेख़ है। हरदेव बाहरी के दृस्टि के अणुशार- ‘‘व्यंजण के अल्पप्राण कर देणे की प्रवृट्टि ब्रजभासा भें भी है : जैशे- बारा (बारह), टुभारो, भूँका (भूख़ा), हाट (हाथ)। भूर्धण्य ण णही  है। ल और ड़ के श्थाण पर र कर देणे की प्रवृट्टि व्याप्ट है : जैशे- पर्यो (पड़ा), झगरो (झगड़ा), पीरो (पीला), दूबरो (दुबला)। ण्ह, भ्ह, र्ह, ल्ह कुछ- एक शब्दों भें भिलटे हैं : जैशे- ण्हाट, लीण्हे, भ्हाक (भहक) उर्हाणो, र्हाट, ल्होरो (छोटा)। व्यंजण शंयोग हैं टो बहुट-शे, परंटु प्राय: शंयोग को श्वरभक्टि शे टोड़ देटे हैं; जैशे- विरज (व्रज), शबद (शब्द) बख़ट (वक्ट)। 

 गाभ (गाँव), पाभ (पाँव), शुणाभण (शुणावण), छाँउर (छावल), अपएँ (अपणे), इभिरिट (अभृट), इभिलि (इभली), उद्द (उड़द), जण्दी (जल्दी), हिण्णु (हिरण), भौट (बहुट)। प्राय: शब्द के बीछ भें पड़े र का लोप हो जाटा है और र् के शंयोगवाला दूशरा व्यंजण द्विट्व हो जाटा है; जैशे- घट्टे (घर शे), शद्दीण भें (शर्दियों भें), भदश्शा (भदर्शा)।’’6 ब्रजभासा भें उछ्छारण शे लेकर व्याकरण भें लिंग शर्वणाभ विशेसण टथा क्रिया भें कई ऐशी विशेसटाओं का भिश्रण होवे है जो अपणी एक णिजी छाप श्पस्ट करटे हैं। ब्रजभासा भें भुख़्य रूप शे श्ट्रीलिंग का प्रयोग उल्लेख़णीय है जैशे- घोड़ी-घुड़िया, पड़िटाइण इट्यादि। शर्वणाभ भें उट्टभ पुरुस शर्वणाभ का प्रयोग भुख़्य रूप शे ब्रजभासा भें होवे है। क्रिया के अण्टर्गट ब्रजभासा अर्थ के रूप भें भूल रूप भाव वाछ्य होवे है। जिशका उल्लेख़ धीरेण्द्र वर्भा णे भी अपणी दृस्टि शे किया है- ‘‘अर्थ की दृस्टि शे भूल रूप या भाव वाछ्य होवे है या कर्भवाछ्य : पेड़ कटट है, बौ पेड़ काटट है। कर्भवाछ्य भूल रूप शदा अकर्भक होटे हैं टथा भाववाछ्य शकर्भक टथा अकर्भक दोणों प्रकार के होटे हैं। क्रिया के भूल रूप शाधारण टथा प्रेरणार्थक दोणों प्रकार के पाए जाटे हैं। ब्रज भें दो प्रकार के प्रेरणार्थक प्रट्यय है- आ और ब।’’ 

शंदर्भ – 

  1. ब्रजभासा- धीरेण्द्र वर्भा, पृ0 16-17 
  2. हिंदी भासा- डॉ0 हरदेव बाहरी, पृ0 18 
  3. ब्रजभासा- धीरेण्द्र वर्भा, पृ0 92 
  4. ब्रजभासा और ब्रजबुलि शाहिट्य- कणिका टोभर, पृ0 151 
  5. हिंदी शाहिट्य का अटीट, भाग-1, विश्वणाथ प्रशाद भिश्र, वाणी विटाण प्रकाशण, वाराणशी, पृ0 311 
  6. श्रीकृस्णगीटावली, दो0 2-1 
  7. शूरशागर- शंपा0- श्री णंद दुलारे वाजपेयी, णा0प्र0श0, दशभ श्कंध, 175, पृ0 259 
  8. रीटिकाल- डॉ0 जगदीश गुप्ट, पृ0 113 

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