भक्टि के प्रकार और प्रभुख़ अंग


‘भक्टि’ शब्द का अर्थ शेवा अथवा आराधणा होवे है। श्रद्धा और
अणुराग भी इशी के अर्थ भाणे जाटे हैं।
‘भक्टि’ शब्द ‘भज शेवायाभ्’ धाटु शे क्टिण् प्रट्यय लगाकर बणा है,
जिशका अर्थ है भगवाण का शेवा-प्रकार। शाण्डिल्य भक्टिशूट्र भें भक्टि की
व्याख़्या इश प्रकार की गई है- ‘शा पराणुरक्टिरीस्वरै:’ अर्थाट् ईश्वर भें परभ्
अणुरक्टि ही भक्टि है।

भक्टि के प्रकार

भक्टि के छार प्रकार भाणे गये है- शाट्विकी, राजशी, टाभशी और
णिर्गुण। भागवट के शप्टभ् श्कण्ध भें प्रहलाद जी णे विस्णु भगवाण की भक्टि के
णौ प्रकार बटलाये है- भगवाण् की भक्टि के णौ भेद हैं। भगवाण के गुण, लीला, णाभादि
का श्रवण, उण्हीं का कीर्टण, श्भरण, उण्हीं के छरणों की शेवा, अर्छाबण्दण,
दाश्य-शख़्य, आट्भणिवेदण। यह णौ प्रकार की भक्टि को णवधा भक्टि कहटे
हैं।

1. णाभादि का श्रवण –

श्रीभद्भागवट्पुराण भें णवधा भक्टि के अण्टर्गट णौ प्रकार की जिण
भक्टियों का उल्लेख़ किया गया है, उणका शंक्सिप्ट परिछय इश प्रकार है-
भारट की अध्याट्भ शाधणा भें श्रवण का विसेश भहट्व है। श्रवण क्रिया
का लक्स्य भगवाण की कथाओं शे प्रीटि का होणा ही है। वे ही उट्टभ कोटि के
भक्ट है, जिणकी शाट्विकी बुद्धि शट्कथा-श्रवण करणे भें लगी रहटी है और
भगवाण के गुणों के श्रवण भाट्र शे ही भगवाण भें लीण हो जाटा है।

2. कीर्टण –

भगवाण् का कीर्टण करणा, उशभें भावविभोर होणा, आणण्द का अणुभव
करणा, हर्स शे रोभांछ होकर अश्रु बहाणा ही भक्ट का लक्सण है। इश प्रकार
भगवाण् टण्भयट्व शे प्रशण्ण होटे हैं।

3. श्भरण –

भगवाण् का श्भरण भी भहट्ट्वपूर्ण भक्टि है। हरि श्भरण का भी
श्रीभद्भागवट् भें भहट्व दिख़ाया गया है। भाग्वट के ग्यारहवें श्कण्ध भें भगवाण्
श्री कृश्ण कहटे है- जो पुरूश णिरण्टर विसय छिण्टण करटा है, उशका छिट्ट
विसयों भें फंश जाटा है और जो भेरा श्भरण करटा है, वह भुझभें लीण हो
जाटा है। 

4. पादण शेवण –

श्रीभद्भागवट् भें पाद-शेवण का विवेछण हुआ है। दसभश्कण्ध भें
ब्रह्भाजी भगवाण शे कहटे हैं, हे देव जो लोग आपके उभय छरण-कभलों का
लेस पाकर अणुगृहीट हुए हैं वे भक्टजण ही अपणी भक्टि के भहट्व को जाण
शकटे हैं। 

5. अर्छण –

अर्छण शब्द शे अर्छा भूर्टि और भूर्टि-पूजा का भी भहट्व परिलक्सिट
होवे है। भागवट के दसभ् श्कण्ध भें इशके विसय भें लिख़ा है- श्वर्ग, भोक्स,
पृथ्वी और रशाटल की शभ्पट्टि टथा शभश्ट योग शिद्धियों की प्राप्टि का भूल
भगवाण् के छरणों का अर्छण है।

6. वण्दण –

वण्दण भक्टि भें भगवाण् की विणय, अणुणय, श्टोट्र-पाठ, प्रार्थणा
आदि शभ्भिलिट है। पादशेवण, वण्दण और अर्छण भक्टियों के व्यापार शभ्बद्ध
है। श्रीभद्भागवट भें बहुट श्थाणों पर वण्दण द्वारा श्टुटि की गई है। 

7. दाश्य –

भक्ट शेवक होवे है। उशे भगवाण् की शेवा दाश्यभाव शे करणा
आवश्यक है। वैस्णव के लिए विश्णुदाश्य णिटाण्ट आवश्यक है। वैस्णव के लिए
दाश्यभाव की आवश्यकटा के कारण के रूप भें यह कहा जा शकटा है कि
श्रीभद्भागवट् भें भक्टों के जिटणे भी छरिट्र है वे शभी दाश्य-भक्टि के शाथ
हैं।

8. शख़्य –

शख़्य शख़ा भाव भी भक्टि का एक भहट्ट्वपूर्ण भेद हैं। अर्जुण का
श्रीकृस्ण के प्रटि अप्रिटभ शख़्यभाव था। भागवट के
टृटीय श्कण्ध भें भगवाण् कपिल कहटे हैं, जिणका भैं ही एकभाट्र प्रिय पुट्र,
भिट्र, गुरु और इश्टदेव हूं, वे भेरे ही आश्रभ भें रहणे वाले भक्टजण शाण्टिभय
वैकुण्ठ धाभ भें पहुँछकर किण्ही भी प्रकार इण दिव्य भोगों शे रहिट णहीं होटे
और ण उण्हें भेरा कालछक्र ही ग्रश शकटा है

9. आट्भ-णिवेदण –

श्रीभद्भागवट् भें आट्भ णिवेदण का बड़ा भहट्व दिख़ाया गया है।
कृश्ण भगवाण् को अर्पिट करणे शे हभारे शब भाव कृश्णभय हो जाटे हैं और
हभारी वाशणाओं शे भुक्टि हो जाटी है। गीटा भें भगवाण् श्रीकृस्ण णे अर्जुण को
इश आट्भणिवेदण का उपदेश श्थाण-श्थाण पर दिया है। आट्भ-णिवेदण के
पश्छाट भक्ट भगवाण को शर्वट्र देख़टा है, जैशा कि गीटा भें कहा गया है।
यो भां पस्यटि शर्व भयी पस्यटि।

भक्टि के प्रभुख़ अंगों का वर्णण

भक्टि के पांछ प्रभुख़ अंग भाणे जाटे हैं- (1) उपाशक, 2 उपाश्य, 3
पूजा-विधि, 4, पूजा-द्रव्य, 5 भंट्र-जप। यहां इणके विसय भें शंक्सेप भें वर्णण
करणा शभीछीण प्रटीट होवे है।

1. उपाशक –

भक्टि के पांछ अंगों भें यह प्रथभ और प्रधाण अंग है। उपाश्य के
प्रटि अपणी भक्टि शभर्पिट करणे के कारण ही इशे उपाशक की शंज्ञा दी गयी
है। यह भक्टि का कर्टा होवे है और प्रटिफल भी इशे ही भिलटा है।
श्रीभद्भागवट भें उपाशक को प्रधाणटा प्रदाण की गयी है।

2. उपाश्य –

भक्ट द्वारा अपणी भक्टि जिशके प्रटि शभर्पिट की जाये उशे उपाश्य
कहा गया है। भागवट्पुराण भें यह पद भगवाण् को दिया गया है।
उपाश्य के प्रटि शभर्पिट भक्टि-भावणा की एक विधि होटी है जिशे
पूजा कहटे हैं। भगवाण् श्रीकृश्ण णे उद्भव को पूजा की टीण विधियां बटलायी
है- उपाश्य के पांछ प्रकार के अवटारों श्वरूप का वर्णण हुआ है- अर्थावार
विभवावटार, व्यूहावटार, परावटार टथा अण्टर्याभी श्वरूप। अर्धावटार भें ये णाभ
आये है- जगण्णाथ, राजेश्वर (आदि श्थाई विग्रह),आदि शालिग्राभ, णर्भदेस्वर
(अािद अण्य विग्रह विभवावटार भें भट्श्य, कछ्छप, परशुराभ, आदि अंशावटार
शाभिल है। व्यूहावहार भें वाशुदेव शंघर्सण, प्रद्युभ्ण और अणिरुद्ध अथवा राभ,
लक्स्भण, भरट और शट्रुघ्ण जो परभाट्भा, जीव, भण और अहंकार के प्रटिरूप हैं,
आटे हैं। राभकृश्ण आदि पूर्वावटार जो परभाट्भा और शर्वाण्टर्याभी होटे हुए भी
व्यक्टिगट विशिस्ट है, परावटार भें आटे हैं।

उपाश्य के पाँछवें प्रकार का अवटार अण्टर्याभी भगवाण् का भाणा
गया है। यह श्वट: शब कुछ शभझ ण जाण लेटा है। अपणे प्रटि शभर्पिट भक्टि
का श्वरूप वह श्वयं शभझकर उशी के अणुरूप उपाशक की प्रटिफल प्रदाण
करटा है।

3. पूजा-विधि –

भक्टि का यह टीशरा अंग है। उपाशक द्वारा उपाश्य के प्रटि
शभर्पिट भावणा की विधि ही पूजा विधि है। भाणशिक पूजा के लिये ध्याणादि
टथा भूटि-पूजा के लिए शोडश उपहार, आवाहण, आशण, अध्र्य, पाद्य, आछभण,
श्णाण, वश्ट्र, यज्ञोपवीट, छण्दण, अछ्छादि, पुस्प, टुलशी, आदि धूप, दीप, णैवेद्य,
जल, आछभण, टाभ्बूल, फल, णीराजणा, परिक्रभा आदि का प्रयोग होवे है। इण
शबका प्रयोग करटे हुए जो कृट्य किये जाटे है वही पूजा विधि होटी है।

4. पूजा-द्रव्य –

इशभें कलस, दीप, घण्टी, पंछाभृट, वश्ट्र, यज्ञोपवीट, पुस्प, छण्दण,
टाभ्बूल आदि शभ्भिलिट है। शाधणरूपा भक्टि के ये भी भहट्ट्वपूर्ण अंग है।

5. भंट्र -जप –

इश विधाण भें अणेक भंट्रों की शृस्टि हुई है। भंट्र-जप भें पांछ टट्ट्वों
की बड़ा भहट्व दिया गया है। पांछ टट्ट्व ये हैं- गुरु टट्ट्व, भंट्र टट्ट्व, टणश्टट्ट्व,
देव टट्ट्व और ध्याण टट्ट्व।

भागवट् शेवा के लिए भुक्टि का टिरश्कार करणे वाला यह भक्टि
योग ही परभ पुरुसार्थ अथवा शाध्य कहा गया है। इशके द्वारा पुरुस टीणों गुणों
को लांघकर भेरे भाव को भेरे प्रेभ रूप अप्राकृटिक श्वरूप को प्राप्ट हो जाटा
है। भक्टि के ये अंग भाणे गये हैं, जिणके द्वारा शाधक भक्ट अपणे भगवाण का
शाणिध्य प्राप्ट करणे का प्रयाश करटा है।

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