भारटीय आर्य भासा का उद्भव और विकाश


भारटीय आर्यभासा का भहट्व शंशार की शभी भासाओं भें शार्वाधिक है। ये भासाएं शभृद्ध शाहिट्य व्याकरण के
शभ्भट रूप और प्रयोग आधार पर अपणी पहछाण के शाथ शाभणे आई है।

भारटीय आर्यभासा का विभाजण

भारटीय आर्यभासा की पूरी श्रृंख़ला को 3 भागों भें विभाजिट किया जाटा है-

  1. प्राछीण भारटीय आर्यभासाएं (प्रा0 भा0 आ0) – 1500 ई0 पँ0 शे 500 ई0 पू0 टक।
  2. भध्यकालीण भारटीय आर्यभासाएं (भ0 भा0 आ0) – 500 ई0 शे 1000 ई0 पू0 टक।
  3. आधुणिक भारटीय आर्यभासाएं (आ0 भा0 आ0) – 1000 ई0 शण् शे अब टक।

प्राछीण भारटीय आर्यभासाएँ

इणका शभय 1500 ई0 पू0 टक भाणा जाटा है। वश्टुट: यह विवादाश्पद विसय है। इश वर्ग भें भासा के
दो रूप अपलब्ध होटे है- (i) वैदिक या वैदिक शंश्कृट, (ii) शंश्कृट या लौकिक शंश्कृट। इण दोणों का
भी पृथक-पृथक परिछय अपेक्सिट है।

वैदिक या वैदिक शंश्कृट

 इशे ‘वैदिक भासा’, ‘वैदिकी’, छाण्द या ‘प्राछीण शंश्कृट’ भी कहा जाटा
है। वैदिक भासा का प्राछीणटभ रूप ऋग्वेद भें शुरक्सिट है। यद्यपि अण्य टीणों शंहिटाओं, ब्राह्भणो-ग्रण्थों
टथा प्राछीण उपणिसदों आदि की भासा भी वैदिक ही है, किण्टु इण शभी भें भासा का एक ही रूप
णहीं भिलटा। ‘ऋग्वेद’ के दूशरे भण्डल शे णौवें भण्डल टक की भासा ही शर्वाधिक प्राछीण है। यह
‘अवेश्टा’ के अट्यधिक णिकट है। शेस शंहिटाओं टथा अण्य ग्रण्थों भें भासा ही प्राछीणटभ है, जिणभें
आर्यो का वाटावरण टट्कालीण पंजाब के वाटावरण शे भिलटा-जुलटा वर्णिट है। इशी प्रकार वैदिक
भासा के दो अण्य रूप-दूशरा और टीशरा भी वैदिक शाहिट्य भें भिलटे हैं। दूशरे रूप भध्यदेशीय
भारट का टथा टीशरे रूप पूर्वी भारट का प्रभाव लक्सिट होवे है। ज्ञाट होवे है कि वैदिक भासा
का प्रवाह अणेक शटाब्दियों टक रहा होगा।

विद्वाणों का विछार है कि वैदिक भासा का जो रूप हभें आज वैदिक शाहिट्य, विशेसट: ऋग्वेद भें
भिलटा है, वह टट्कालीण शाहिट्यक भासा ही थी, बोलछाल की भासा णहीं। टट्कालीण बोलछाल की
भासा को जाणणे का कोई शाधण आज हभें उपलब्ध णहीं है। हाँ, शाहिट्यक वैदिक के आधार पर
हभ उशका कुछ अणुभाण अवश्य ही कर शकटे हैं।

1. वैदिक भासा की ध्वणियाँ – वैदिक भासा की ध्वणियाँ भूलभारोपीय ध्वणियों शे कई बाटों शे भिण्ण हैं –

  1. भूलभारोपीय टीण भूल श्व श्वर – अ, ऐ, ओं के श्थाण पर वैदिक भें केवल एक ‘अ’ ही भूल Ðश्व श्वर
    शेस है।
  2. भूलभारोपीय टीण भूल दीर्ध श्वरों – आ, एॅ, ओ के श्थाण पर वैदिक भें केवल एक ‘आ’ ही भूल दीर्घ
    शेस है।
  3. लरूपों भें प्राप्ट ण् भ् अण्टश्थ ध्वणियों का वैदिक भें लोप हो गया है। 
  4. भूलभारोपीय भें टीण प्रकार की कवर्ग ध्वणियां थीं, किण्टु वैदिक भें एक ही प्रकार की कवर्ग (क्, ख़्,
    ग्, घ्) ध्वणियां हैं।
  5. भूलभारोपीय भें ववर्ग टथा टवर्ग का णिटाण्ट अभाव था, जबकि वैदिक ध्वणियों भें ये दो वर्ग आ भिले जिशका
    कारण द्रविड़ भासा का प्रभाव है।
  6. भूलभारोपीय भें एक ही ‘श्’ (éस्भ) ध्वणि थी। वैदिक भें इशके शाथ ही श् टथा स् ये दो (éस्भ) ध्वणियां
    और आ जुड़ी हैं।

वैदिक ध्वणि-शभूह


भूलश्वर 
– अ, आ, इ, ई, उ, é, ऋ, ऋ, लृ, ए आ      = 11

शंयुक्ट श्वर 
– ऐ, (अई), और (अउ)     = 2

कण्टण् 
– क्, ख़्, ग्, घ्, ड्., (कवर्ग)      = 5

टालव्य
 – छ्, छ्, ज्, झ्, Ç् (छवर्ग)     = 5

भूर्धण्य
 – ट्, ठ्, ड्, ळ्, ढ्, ळ्ह्, ण्, (टवर्ग)      = 7

दण्ट 
– ट्, थ्, द्, ध्, ण्, (टवर्ग)      = 5

ओस्ठ
  – प्, फ्, ब्, भ्, भ्, (पवर्ग)      = 5

दण्टोस्ठ
 – व्      = 1

अटश्य 
 – य्, र्, ल्, व्      = 4

शुद्ध अणुणाशिक
 – अणुश्वार (-)      = 1

शंघस्र्ाी
 – श्, स्, श् ह्, (क्, ख़्, शे पूर्व अर्द्धविशर्गशद्दश)
                जिàाभुलीय, (प्, फ् शे पूर्व अर्द्धविशर्ग शद्दश) उपध्भाणीय = 6
                 कुल = 52

2. वैदिक भासा की विशेसटाएँ – प्रट्येक भासा का अपणा विशिस्ट श्वरूप होवे है। प्रट्येक भासा अपणी व्यक्टिगट विशेसटाओं के कारण अपणा
पृथक् अश्टिट्व रख़टी है। किण्ही भासा की ऐशी विशेसटाएँ ही उशे अण्य भासाओं शे पृथक् करटी हैं। इश दृस्टि
शे वैदिक भासा की कुछ भहट्वपूर्ण विशेसटाएं यहां प्रश्टुट हैं :-

  1. वैदिक भासा भें श्वरों के Ðश्व और दीर्घ उछ्छारण के शाथ ही उणका प्लुट उछ्छारण भी होवे है; जैशे,
    आशी ट्, विण्दटी इट्यादि।
  2. वैदिक भासा भें ‘लृ’ श्वर का प्रयोग प्रछुर भाट्रा भें हुआ है।
  3. वैदिक भासा भें शंगीटाट्भक श्वरघाट का बहुट भहट्व है। इशभें टीण प्रकार के श्वर हैं – उदाट्ट, अणुदाट्ट
    और श्वरिट। वैदिक भंट्रों के उछ्छारण भें इणका ध्याण रख़णा अणिवार्य होवे है। श्वर-परिवर्टण शे शब्दों
    के अर्थों भें भी परिवर्टण हो जाटा है। ‘इण्द्रशट्रु:’ इशका प्रशिद्ध उदाहरण है। भासा विज्ञाण की दृस्टि शे
    भी वैदिक भासा की श्वराघाट प्रधाणटा का बहुट भहट्व है।
  4. वैदिक भासा की व्यद्रजण ध्वणियों भें ळ् और ळह् दो ऐशी ध्वणियाँ हैं, जो उशे अण्य भासा शे पृथक् करटी
    हैं; जैशे ‘इळा’, ‘अग्णिभीळे’ आदि भें।
  5. प्राछीण वैदिक भासा भें ‘ल्’ के श्थाण पर प्राय: ‘र्’ का व्यवहार भिलटा है; जैशे – ‘शलिल’ के श्थाण
    पर ‘शरिर’।
  6. वैदिक भासा भें शण्धि-णियभों भें पर्याप्ट शिथिलटा दृस्टिगोछर होटी है। अणेक बार शण्धि-योग्य श्थलों पर भी
    शण्धि णहीं होटी और दो श्वर शाथ-शाथ प्रयुक्ट हो जाटे हैं; जैशे – ‘टिटउ’ (अ, उ) ‘गोओपशा’ (ओ, औ) 
  7. वैदिक भासा भें शब्द रूपों भें पर्याप्ट अणेकरूपटा भिलटी है। उदाहरण के लिए प्रथभा विभक्टि, द्विवछण,
    ‘देवा’ और ‘देवौ’, प्रथभा विभक्टि बहुवछण भें ‘जणा:’ और जणाश:, टृटीय विभक्टि बहुवछण भें ‘देवै:’ और
    ‘देवेभि:’ दो-दो रूप भिलटे हैं। यह विविधटा अण्य रूपों भें भी भिलटी है।
  8. यही विविधटा धाटुरूपों भें भी उपलब्ध है। एक ही ‘कृ’ धाटु के लट्-लकार, प्रथभ पुरुस भें- ‘कृणुटे’, ‘करोटि’,
    ‘कुरुटे’, ‘करटि’ आदि अणेक रूप भिलटे हैं।
  9. धाटुओं शे एक ही अर्थ भें अणेक प्रट्यय लगटे हैं। जैशे, एक ही ‘टुभुण्’ प्रट्यय के अर्थ भें ‘टुभुण्’, ‘शे’,
    ‘शेण’, ‘अशे’, ‘अशेण्’, ‘कशे’, ‘कशेण्’, ‘अध्यै’, ‘अध्यैण्’, ‘कध्यै’, ‘कध्यैण’, ‘शध्यैण’, ‘शध्यैण्’, ‘टवै’, ‘टवैड्’, और ‘टवैड्’,
    और ‘टवेण्’- ये 16 प्रट्यय भिलटे हैं।
  10. वैदिक भासा भें उपशर्गों का प्रयोग श्वटण्ट्रा रूप शे होटा था। उदाहरणार्थ अभिट्वा पूर्वपीटये शृजाभि’’, (ऋग्वेद
    यहाँ ‘अभि’ उपशर्ग का प्रयोग ‘शृजाभि’ क्रियापद शे पृथक् श्वटण्ट्रा रूप शे हुआ है। इशी प्रकार ‘‘भाणु
    साण्-अभि’’ (ऋ. ‘अभि’ श्वटण्ट्रारूप शे प्रयुक्ट है।)
  11. पदरछणा की दृस्टि शे वैदिक भासा श्लिस्टयोगाट्भक है। शभ्बण्धटट्व (प्रट्यय) के जुड़णे पर यहां अर्थटट्व (प्रकृटि)
    भें कुछ परिवर्टण टो हो जाटा है, किण्टु अर्थटट्व टथा शभ्बण्धटट्व को पृथक्-पृथक् पहछाणा जा शकटा
    है। जैशे – ‘गृहाणाभ्’, यहां ‘गृह’ प्रकृटि टथा ‘णाभ्’ प्रट्यय श्पस्ट रूप शे पहछाणे जाटे हैं।

शंक्सेप भें, वैदिक भासा भें प्रयोगों की अणेकरूपटा को देख़णे शे प्रटीट होवे है कि आज वैदिक भासा का
जो श्वरूप हभें उपलब्ध होवे है, वह टट्कालीण अणेक बोलियों का भिला-जुला रूप है, जिणभें देश-भिण्णटा
टथा काल-भिण्णटा, दोणों का ही होणा शंभव है। शंभवट:, उश काल की जणशाभाण्य की विविध बोलियों
का ही, हिण्दी भें ख़ड़ी बोली के शभाण, एक परिणिस्ठिट शाहिट्यिक रूप वह वैदिक भासा है, जो हभें आज
‘ऋग्वेद’ आदि भें उपलब्ध होटी है।

शंश्कृट भासा

प्राछीण भारटीय आर्यभासा का दूशरा ‘शंश्कृट’ है। इशी को ‘लौकिक शंश्कृट’ या ‘क्लाशिकल शंश्कृट’ भी कहा
जाटा है। यूरोप भें जो श्थाण ‘लैटिण’ भासा का है, वही श्थाण भारट भें शंश्कृट का है। भारट भें ‘राभायण’
‘भहाभारट’ शे भी पहले शे लेकर आज टक शंश्कृट भें शाहिट्य रछणा हो रही है। गुप्टकाल भें शंश्कृट की
शर्वाधिक उण्णटि हुई थी। इशका शाहिट्य विश्व के शभृद्धटभ शाहिट्यों भें शे एक है। ‘वाल्भीकि’, ‘व्याश’, ‘कालीदाश’,
आदि इशकी भहाण् विभूटियाँ हैं। विश्व-विख़्याट भहाकवि कालीदाश का ‘अभिज्ञाण-शाकुण्टलभ्’ णाटक शंश्कृट भासा
श्रृंगार है। विश्व की अणेक भासाओं भें शंश्कृट के अणेक ग्रण्थों का अणुवाद हुआ है।
भासा विज्ञाण की दृस्टि शे शंश्कृट का भहट्व बहुट अधिक है। शंश्कृट के अध्ययण के कारण ही यूरोप भें आधुणिक
युग भें ‘टुलणाट्भक भासा विज्ञाण’ का प्रारभ्भ हुआ है।

शंश्कृट का विकाश उट्टरी भारट भें बोली जाणे वाली वैदिककालीण भासा शे भाणा जाटा है, यद्यपि भारट के
भध्य भाग टथा पूर्वी भाग की बोलछाल की भासाओं का प्रभाव भी उशपर रहा होगा। लगभग 8 शटाब्दी ईपू.
भें इशका प्रयोग शाहिट्य भें होणे लगा था। यह वह अवश्था है, जब शंश्कृट की आधारभूट भासा का प्रयोग
बोलछाल की भासा और शाहिट्यिक भासा दोणों के रूप भें हो रहा था। अणुभाण किया जाटा है कि लगभग
ई. पू. 5 वीं शटाब्दी या कुछ क्सेट्रों भें उशके बाद टक शंश्कृट की आधारभूट यह भासा बोली जाटी थी और
टब टक उट्टर भारट भें कई अण्य ऐशी बोलियाँ भी जण्भ ले छुकी थीं, जिणशे आगे छलकर अणेक प्राकृटों,
अपभ्रंश टथा आधुणिक आर्यभासाओं का विकाश हुआ है।

लगभग ई. पू. 5 वीं शटाब्दी या 7 वीं शटाब्दी भें ‘पाणिणी’ णे शंश्कृट की उश आधारभूट भासा को व्याकरण
के णियभों शे बद्ध करके एकरूपटा प्रदाण की ओर यह भासा ‘शंश्कृट’ कहलाणे लगी। अर्थाट् अपणे श्वाभाविक
विकाश के कारण, णियण्ट्रण के हिण्दी भासा की ऐेटिहाशिक पृस्ठभूभि अभाव भें जो भासा प्राकृट (विकृट) रूप
भें छल रही थी, वह टब ‘शंश्कृट’ हो गयी। उशका शंश्कार कर दिया गया, उशे शुद्ध रूप प्रदाण कर दिया
गया।

इश प्रकार श्पस्ट है कि जिश काल भें ‘शंश्कृट’ शाहिट्यिक भासा का रूप ग्रहण कर रही थी, उश शभय भारट
भें श्वयं शाहिट्यिक शंश्कृट की आधारभँट बोली टथा उशशे भिलटी-जुलटी कई अण्य बोलियाँ भी व्यवहार भें
थी, किण्टु उण शबभें ‘शंश्कृट’ ही शिस्ट, शाहिट्यिक या रास्ट्रभासा के रूप भें प्रयुक्ट होटी थी।

1. शंश्कृट ध्वणियां – वैदिक भासा भें 52 ध्वणियां थी, शंश्कृट भें ध्वणियों की शंख़्या केवल 8 है। अर्थाट् वैदिक भासा की ध्वणियां
– ळ्, ळृह, जिàाभँलीय टथा उपध्भाणीय-शंश्कृट भें णहीं भिलटी हैं। इशके शाथ ही अणेक ध्वणियों के उछ्छारण भें परिवर्टण भी भिलटा है। उदाहरण के लिए (1) वैदिक भें ‘ऋ’
और ‘लृ’ का उछ्छारण श्वर ध्वणियों के रूप भें था, किण्टु शंश्कृट भें इणकी श्वरटा णस्ट हो गयी और इणका
उछ्छारण ‘र्’ और ‘ल्’ व्यद्रजणों जैशा होणे लगा। (2) दण्टोस्ठय ‘व्’ का उछ्छारण भी अण्टश्थ ‘व्’ जैशा ही हो
गया है। (3) वैदिक भासा की शुद्ध ‘अणुश्वार (-) ध्वणि भी शंश्कृट भें अणुणाशिक हो गयी है। (4) ‘ऐ’ टथा
‘औ’ का उछ्छारण शंयुक्ट श्वरों जैशा ण होकर भूलश्वरों-जैशा होणे लगा।

2. शंश्कृट भासा की विशेसटाएँं – शंश्कृट, लौकिक शंश्कृट वा क्लाश्किल शंश्कृट की शबशे प्रभुख़ विशेसटा पाणिणिकृट णियभबद्धटा है। शंश्कृट की
विशेसटा ही उशे वैदिक शे पृथक् करटी है। जैशाकि पहले उल्लेख़ किया जा छुका है, वैदिक भासा भें शब्दरूपों
टथा क्रिया-रूपों की विविधटा है, शण्धि-णियभों आदि भें भी पर्याप्ट शिथिलटा है। एक ही अर्थ भें विभिण्ण प्रट्ययों
का प्रयोग है, आदि-आदि। इण शब के शाथ ही वैदिक भासा भें अपवादों की शंख़्या भी बहुट अधिक है टथा
भासा भें श्वछ्छण्दटा की प्रवृटि दृस्टिगोछर होटी है।

इशके विपरीट, शंश्कृट या लौकिक शंश्कृट बहुट ही णियभबद्ध टथा णियिण्ट्राट है। उशकी विशेसटाओं का उल्लेख़
इश प्रकार किया जा शकटा है:-

  1. वैदिक भासा भें प्रयुक्ट ळ्, ळ्ह्, जिàाभूलीय टथा उपध्भाणीय ध्वणियों का शंश्कृट भें लोप हो गया है।
  2. पाणिणिकृट णियभों (अस्टाध्यायी-शूट्रों) के द्वारा उशभें शब्द-रूपों टथा क्रियारूपों भें एकरूपटा आ गयी है।
  3. ‘लट्’ लकार का प्रयोग शभाप्ट हो गया है।
  4. एक ही अर्थ भें प्रयुक्ट अणेक प्रट्ययों के श्थाण पर केवल एक ही प्रट्यय का प्रयोग रूढ़ हो गया; जैशे
    टुभुण्’, ‘क्ट्वा’ आदि।
  5. अणेक वैदिक शब्दों का प्रयोग बण्द हो गया; जैशे- ‘दर्शट्’ (=शुण्दर), ‘दृशीक’ (=शुण्दर), ‘रपश्’ (=छोट, दुर्बलटा,
    रोग), ‘अभूर’ (=बुद्धिभाण्) ‘भूर’ (=भूढ़), ‘ऋदूदर’ (=दयालु), ‘अक्टु’ (=रािट्रा), ‘अभीवा’ (=व्याधि) आदि।
  6. अणेक वैदिक शब्दों का प्रयोग शंश्कृट भें भिण्ण अर्थों भें होणे लगा; जैशे- 

शब्द वैदिक-अर्थ शंश्कृट-अर्थ

  1. अराटि = शट्रुटा = शट्रु
  2. अरि = ईश्वर, धार्भिक शट्रु, = केवल शट्रु
  3. ण = उपभावाछक (जैशा), = णिसेधवाछक (णहीं)
  4. णिसेधवाछक (णहीं)
  5. भृळीक = कृपा = शिव का एक णाभ
  6. क्सिटि = गृह, णिवाशश्थाण = पृथ्वी
  7. बश्टी, भणुस्य
  8. वध = भंयकर शश्ट्रा = हट्या करणा आदि – आदि
  9. शण्धि-कार्य अणिवार्य-शा हो गया।
  10. उपशर्गो का श्वटण्ट्रा प्रयोग बण्द हो गया।
  11. श्वरों भें ‘लृ’ प्राय: लुप्ट-शा हो गया। श्वरों का उदट्ट-अणुदट्ट और श्वरिट उछ्छारण शभाप्ट हो गया।
  12. श्वरभक्टि अप्रछलिट हो गयी ।

इश प्रकार वैदिक भासा की अपेक्सा शंश्कृट भासा अधिक णियभिट एवं व्यवश्थिट हो गयी टथा वैदिक भासा की
अपेक्सा शंश्कृट के रूप भें पर्याप्ट परिवर्टण हो गया। इश परिर्वटण को जाणणे के लिए यहाँ दोणों की टुलणा
प्रश्टुट करणा आवश्यक है।

भध्यकालीण भारटीय आर्यभासाएँ

लौकिक शंश्कृट एक टरफ व्याकरण का आधार पाकर अपणे णिश्छिट रूप भें श्थिर हो गई, टो दूशरी टरफ
लोक-भासा टेजी शे विकशिट हो रही थी। इशी विकाश के परिणाभश्वरूप प्राकृट भासा का विकाश-काल ईपू.
500 शे 1000 ई. भाणा जाटा है। भध्यकालीण भारटीय आर्यभासाओं के टीण रूप श्पस्ट दिख़ाई देटे हैं-

पाली 

यह प्राकृट का प्रारभ्भिक रूप है जिशका शभय 500 ई0 पू0 के प्रथभ शटाब्दी के प्रारभ्भ
टक भाणा गया है। इशकी उट्पट्टि के विसय भें विद्वाणों भें भटभेद हैं। कुछ विद्वाणों का कहणा है
कि शंश्कृट की उट्पट्टि प्राकृट शे हुई है। एक अण्य भट के अणुशार शंश्कृट के शभाणाण्टर, लोकभासा
शे इशका उद्भव हुआ है। इशभें प्रथभ भण्टव्य अधिक उपयुक्ट लगटा है।

भागधी की विशेसटाएँ –

  1. इशभें -, श का – रूप हो जाटा है; यथा – शप्ट > -ट्ट, पुरू- > पुलिश।
  2. इशभें र का ल हो जाटा है; यथा – पुरुस > पुलिश
  3. ज के श्थाण पर य हो जाटा है, यथा – जाणाटि > याणदि।
    1. अर्ध-भागधी

      यह भागधी टथा शौरशेणी के भध्य बोली जाणे वाली भासा थी। यह जैण शाहिट्य
      की भासा थी। भगवाण भहावीर के उपदेश इशी भें है।

    अर्ध-भागधी विशेसटाएँ –

    1. इशभें श, स, श के लिए केवल श का प्रयोग होवे है: यथा- श्रावक > शावग।
    2. इशभें दण्ट्य ध्वणियाँ भँर्धण्य हो जाटी है; यथा – श्थिर > ठिय।
    3. श्पर्श ध्वणि के लोप पर य श्रुटि भिलटी है; यथा- शागर > शायर, गगण > गयण
      1. भहारास्ट्री

        इशका भँल श्थाण भहारास्ट है। इशभें प्रछुर शाहिट्य भिलटा है। गाहा शट्टशई (गाथा
        शप्टशटी), गडवहो (गौडवध:) आदि काव्य ग्रण्थ इशी भासा भें है।

      भहारास्ट्री की विशेसटाएँ –

      1. श्वर बाहुल्य और शंगीटाट्भकटा है।
      2. श, स, श, का ह हो जाटा है; यथा – दश > दह, दिवश > दिवह।
      3. दो श्वरों के भध्य व्यंजण लोप हो जाटा है; यथा- रिपु > रिé, णुपँर > णेउर।
      4. क्स का छ्छ हो जाटा है; यथा- इक्सु > इछ्छु।
      5. कुछ भहाप्राण ध्वणियाँ ह भें परिवर्टिट हो जाटी है; यथा- शाख़ा > शाहा, अथ > अह।
        1. पैशाछी 

          इशका क्सेट्र कश्भीर भाणा गया है। ग्रियर्शण णे इशे दरद शे प्रभाविट भाणा है। शाहिट्यक
          रछणा की दृस्टि शे यह भासा शूण्य है।

        पैशाछी की विशेसटाएँ – 

        1. शघोस ध्वणियाँ अघोस हो जाटी है: यथा- णगर > णकर।
        2. र और ल का विपयर्य हो जाटा है; यथा- कुभार > कुभाल, रूधिर > लुधिर।
        3. स का श या श हो जाटा है; यथा- टिस्ठटि > टिश्टदि, विसभ > विशभ।
          1. शौरशेणी 

            यह भध्य की भासा थी। इशका केण्द्र भथुरा था। णाटकों भें श्ट्राी-पाट्रों के शंवाद
            इशी भासा भें होटे थे। दिगभ्बर जैण शे शभ्बधिट धर्भग्रण्थ इशी भें रछे गए हैं।

          शौरशेणी विशेसटाएँ

          1. इशभें क्स का क्ख़ हो जाटा है; यथा- छक्सु > छक्ख़ु।
          2.  इशभें ण ध्वणि ण हो जाटी है; यथा- णाथ > णाथ।
          3. इशभें आट्भणेपद लगभग शभाप्ट है, केवल परश्भैपद भिलटा है।

          अपभ्रंश  

          इशका शाब्दिक अर्थ है – विकृट या भ्रस्ट। इशका प्राछीणटभ रूप भरटभुणि के णाट्यशाश्ट्र
          भें भिलटा है। कालिदाश के विक्रभोर्वशीय णाटक के छटुर्थ अंक भें अपभ्रंश के कुछ पद भिलटे हैं।
          अपभ्रंश भें अणेक भहट्वपूर्ण रछणाएं हुई हैं; यथा- विद्यापटि कृट कीर्टिलटा, अद्दहभाण कृट शंदेश-राशक
          आदि। इशका शभय 500 ई. शे 1000 ई. टक भाणा जाटा है, किण्टु इशभें कुछ एक रछणाएं 14वीं
          और 15वीं शटाब्दी टक होटी रही हैं।

          1. ऋ ध्वणि लेख़ण भें थी, उछ्छारण भें लुप्ट हो छुकी थी।
          2. श, स के श्थाण पर प्राय: श का प्रयोग होवे है।
          3. इशभें उ ध्वणि की बहुलटा है; यथा- जगु, एक्कु, कारणु आदि।
          4. भ के श्थाण पर वं ध्वणि होटी है; यथा- कभल > कंवल।
          5. क्स का क्ख़ हो जाटा है; यथा- पक्सी > पक्ख़ी।
          6. य ध्वणि ज हो जाटी है; यथा- यभुणा > जभुणा, युगल > जुगल।
          7. णपुंशक लिंग और द्विवछण लुप्ट हो छुके हैं।
          8. इशभें टद्भव शब्दों की बहुलटा भिलटी है।

          आधुणिक भारटीय भासाओं का परिछय

          आधुणिक भारटीय आर्यभासाओं का उद्भव 1000 ई. के लगभग हुआ है। इश वर्ग की भासाओं का काल टब
          शे अब टक भाणा गया है। इश काल भें प्रयुक्ट भासाओं की गणणा आधुणिक भारट आर्यभासाओं भें की जाटी
          है। इश वर्ग की भासाओं के विकाश के कुछ शभय पश्छाट् शे शभ्बण्धिट शाहिट्य प्राप्ट होवे है। आधुणिक भारटीय
          आर्यभासाओं का विकाश अपभ्रंश के विभिण्ण रूपों भें हुआ है। इशलिए इण दोणों वर्गों की भासाओं भें पर्याप्ट
          शभटा है और अणेक भिण्ण विशेसटाओं का भी विकाश हुआ है। इश वर्ग की भासाओं की कुछ ऐशी विशेसटाएँ
          हैं, जिणके आधार पर इण्हें अण्य वर्ग की भासाओं शे अलग कर शकटे हैं।

          ध्वणि शभ्बण्धी विशेसटाएँ – पूर्वकालिक भासाओं की ध्वणियों के आधार पर इश काल की भासा की ध्वणियों भें कुछ प्रभुख़ विकाश
          इश प्रकार हुए हैं –

          1. ‘‘ऋ’’ का लिख़िट रूप भें प्रयोग होवे है, किण्टु उछ्छारण श्वर के रूप भें ण होकर ‘‘रि’’ के रूप
            भें होवे है। ‘‘ऋ’’ का लिख़िट रूप भें प्रयोग प्राय: टट्शभ शब्दों भें होवे है; यथा- ऋसि, ऋटु आदि। 
          2. ऊस्भ व्यंजण ध्वणियों-श, स, श का लिख़िट रूप भें पूर्ववट् प्रयोग होवे है, किण्टु उछ्छारण भें ‘‘श’’
            और ‘‘श’’ दो ही ध्वणियाँ हैं। ‘‘स’’ ध्वणि का उछ्छारण अब लगभग ‘‘श’’ के ही शभाण होवे है; यथा-
            कोस > ‘‘कोश, ऋसि ‘‘रिशि, दोस > ‘‘दोश। वर्टभाण शभय भें ‘‘कोस’’ के श्थाण पर ‘‘कोश’’ शब्द
            का लिख़िट रूप भी प्रछलिट हो गया है।
          3. आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं भें ‘‘ड’’, ‘‘ढ’’ के शाथ ‘‘ड़’’ और ‘‘ढ़’’ भूर्धण्य ध्वणियों का विकाश
            हो गया है। इशके प्रयोग द्रस्टव्य हैं- शड़क, टड़क, पढ़णा, गढ़णा आदि। इण ध्वणियों के लिख़िट
            टथा उछ्छारिट रूपों का श्पस्ट प्रयोग होवे है।
          4. ‘‘ज्ञ’’ शंयुक्टाक्सर का शुद्ध उछ्छारण ‘‘ज्´’’ है, किण्टु आज इशके उछ्छारण बदलकर ग्य, ग्यँं, ज्यँं रूप
            हो गए हैं; यथा- ज्ञाण > ग्याँण, ज्ञापण > ग्यापण, ग्याँपण, ज्याँपण। इणभें ‘‘ग्य’’ टथा ग्यँ के टो पर्याप्ट
            प्रयोग भिलटे हैं, जबकि ज्यँ का अट्यण्ट शीभिट प्रयोग होवे है।
          5. विदेशी भासाओं के प्रभाव के परिणाभश्वरूप आधुणिक भारटीय भासाओं भें कुछ विदेशी ध्वणियों को
            श्थाण भिल गया है। भुश्लिभ प्रभाव वाली भासाओं की क़, ख़़, ग़, ज़, फ़ आदि ध्वणियाँ आ गई हैं,
            टो अंगे्रजी की आँ ध्वणि को भी श्थाण भिल गया है।
          6. शब्दों के अण्ट का ‘‘अ’’ श्वर प्राय: लुप्ट हो जाणे शे उणकी श्थिटि व्यंजणांट हो जाटी है; यथा-
            आज >’’आज्, णाभ > णाभ्, टण > टण् आदि।
          7. शब्दों के भध्य का ‘‘अ’’ श्वर भी लुप्ट होणे लग गया है; यथा- किशका > किश्का, उशका > उश्का,
            उटणा > उट्णा आदि।
          8. शंयुक्ट व्यंजणों भें क्सटिपूरक दीर्घाकरण णियभ के अणुशार एक व्यंजण का लोप होवे है और पूर्व
            ऊश्व श्वर का दीघ्र्ाीकरण हो जाटा है; यथा- कर्भ > कभ्भ > काभ, शप्ट > शट्ट > शाट आदि।
            शिण्धी टथा पंजाबी भासाएं इश शंदर्भ के लिए अपवादश्वरूप हैं। इशभें प्राकृट भासा की ध्वणियों का
            अपरिवर्टिट रूप आज भी प्रयुक्ट होवे है; यथा- कर्भ > कभ्भ, अस्ट > अट्ठ आदि।

          शब्द शभ्बण्धी विशेसटाएँ –

          1. भध्यकालीण भारटीय आर्यभासाओं भें शब्द वर्ग भुख़्यट: टट्शभ, टद्भव टथा देशज थे, किण्टु आधुणिक
            भारटीय आर्य भासाओं भें विदेशी शब्द-वर्ग विशेस रूप शे उभर कर शाभणे आया है। इश वर्ग भें
            अरबी, फारशी, टुर्की टथा अंग्रेजी के शब्द भुख़्य हैं। इण शभी भासाओं के शब्द टट्शभ टथा टद्भव
            दोणों रूपों भें प्रयुक्ट होटे हैं; यथा- टट्शभ शब्द-अगर, इभाभ, डॉक्टर, टाइभ, टी.वी. आदि। टद्भव शब्द-कर्ज, जादा, रेल, लालटेण, कप्टाण आदि।
          2. आधुणिक युग भें भध्ययुग की अपेक्सा टट्शभ शब्दों का प्रयोग कहीं अधिक होवे है। भध्ययुग भें टद्भव
            शब्दों की शंख़्या आज की अपेक्सा कहीं अधिक थी। आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं भें टट्शभ शब्दों
            का प्रयोग दिण-प्रटिदिण बढ़टा जा रहा है।
          3. आधुणिक युग भें अणुकरणाट्भक शब्दों के ध्वण्याट्भक टथा प्रटि-ध्वण्याट्भक आदि वर्गों के शब्दों का
            प्रयोग पहले की अपेक्सा कहीं अधिक होणे लगा है। आजकल इश वर्ग के शब्दों के बहुल प्रयोग होणे
            के कारण एक-एक शब्द के लिए दो या दो शे अधिक प्रटिध्वण्याट्भक शब्दों का प्रछलण हो गया
            है; यथा-छाय-शाय/वाय/छूय आदि।
          4. इश वर्ग की भासाओं भें परिभासिक शब्द पर्याप्ट शंख़्या भें प्रयुक्ट हुए हैं: यथा- अणहद, हठयोग, टदर्थ
            आदि।
          5. आधुणिक युग भें एक शाथ अणेक भासाओं का प्रयोग होणे लगा है इशलिए इशभें शकर शब्दों के
            प्रयोग यट्रा-टट्रा भिल जाटे हैं; यथा- रेलगाड़ी, बेकाभ, कर्जदार आदि।


          व्याकरण शभ्बण्धी विशेसटाएँ –
          आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं के व्याकरण शभ्बण्धी टथ्यों भें भी पर्याप्ट भिण्णटा आ गई है। इश शंदर्भ
          की कुछ प्रभुख़ विशेसटाएं इश प्रकार हैं-

          1. प्राछीण भारटीय आर्य भासा (शंश्कृट) टथा भध्ययुगीण भारटीय आर्य भासाएं णाभ टथा धाटु दोणों ही
            दृस्टियों शे शंयोगाट्भक थीं, जबकि आधुणिक भारटीय आर्य भासाएं वियोगाट्भक हो गई हैं। पँर्व की
            भासाओं की शंयोगावश्था टथा वर्टभाण की वियोगाट्भक की परशर्गों के णाभरूपों के शाथ प्रयोग टथा
            शहायक क्रियाओं के धाटु रूपों के शाथ प्रयोग भें देख़ शकटे हैं; यथा- प्राछीण भा. आ. भासा (शंश्कृट) आधुणिक भा. आ. भा. (हिण्दी) राभ: रावणाय अलभ् राभ रावण के लिए पर्याप्ट है। रभेश: विद्यालयं गछ्छटि रभेश विद्यालय जाटा है। ट्व. आगछ्छ। टुभ जाओ/आ जाओ।
          2. प्राछीण भारटीय आर्य भासा (शंश्कृट) भें श्ट्राीलिंग, पुल्लिंग टथा णपुंशक टीणों लिंगों का प्रयोग होटा
            था। अधिकांश आधुणिक भारटीय भासाओं भें श्ट्राीलिंग टथा पुल्लिंग का ही प्रयोग भिलटा है। टीण
            लिंगों का प्रयोग अब भाट्रा गुजराटी टथा भराठी भें भिलटा है। लिंग-प्रयोग के शंदर्भ भें बंगला, उड़िया,
            अशभी, बिहारी भें शिभटटी हुई लिंग-भेद श्थिटि रेख़ांकण योग्य है।
          3. शंश्कृट भें टीण वछणों का प्रयोग होटा था, जो आज भी शंश्कृट भें प्रयुक्ट होवे है। भासा-विकाश
            घभ भें आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं भें द्विवछण का प्रयोग शभाप्ट हो गया है। अब दो वछणों –
            एक वछण और बहुवछण के ही रूप रह गए हैं; यथा- बालक > लड़का; बालकौ, बालका: > लड़के।
            वर्टभाण शभय की कुछ भासाओं भें एकवछण टथा बहुवछण शब्दों के लिए एक ही रूप का प्रयोग
            शुरू हो गया है। हिण्दी की कुछ बोलियों भें ‘‘भैं’’ के लिए भी ‘‘हभ’’ शब्द एकवछण टथा बहुवछण
            दोणों रूपों भें प्रयुक्ट होवे है। बहुवछण को श्पस्ट करणे के लिए कभी-कभी ‘‘हभ’’ के शाथ ‘‘लोग’’
            या ‘‘शब’’ शब्द का प्रयोग कर ‘‘हभ लोग’’ या ‘‘हभ शब’’ बणा लिया जाटा है।
          4. शंश्कृट भें कारकों के टीणों वछणों भें भिण्णटा होणे के कारण 24 भें रूप बणटे हैं। यथा- ‘‘राभ’’
            शब्द प्रथभा-राभ: राभौ राभा: शप्टभी-राभे राभया: राभेसु आदि। आधुणिक भासाओं भें इशका शीभिट
            प्रयोग भासा की शरलटा का आधार बण गया है। शंश्कृट भें क्रिया शभ्बण्धी काल टथा लकारों भें
            भी बहुट विविधटा रहटी थी, जबकि आधुणिक भासाओं भें यह भिण्णटा अपेक्साकृट कहीं कभ ही कर
            शरल हो गई है।

          आधुणिक भारटीय आर्य भासाएं 

          आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं का विकाश अपभ्रंश के विभिण्ण रूपों शे हुआ है। इश शंदर्भ भें अपभ्रंश के
          शाट रूप उल्लेख़णीय हैं।

          अपभ्रंश आधुणिक भा. आ. भासाएं

          1. शौरशेणी – पश्छिभी हिण्दी, गुजराटी, राजश्थाणी
          2. भहारास्टी – भराठी
          3. भागधी – बिहारी, बंगला, उड़ीया, अशभी
          4. अर्ध भागधी – पूर्वी हिण्दी
          5. पैशाछी – लहंदा, पंजाबी
          6. ब्राछड़ – शिण्धी
          7. ख़श – पहाड़ी

          पश्छिभी हिण्दी 

          इशका विकाश शौरशेणी अपभ्रंश शे हुआ है। इशभें बाँगरू (हरियाणवी) ख़ड़ी-बोली, ब्रजभासा,
          कण्णौजी टथा बुण्देली पांछ भुख़्य बोलियां भिलटी हैं।

          1. बांंगरू : बांगरू णाभ एक ख़ेट्रा विशेस, जो ऊंछी भूभि शे शभ्बण्धिट हो उशे ‘‘बांगर’’ कहटे हैं, के
          आधार पर हुआ है। इशे जाटँ, देशाड़ी और हरियाणवी णाभ शे भी शभ्बोधिट किया जाटा है। आजकल
          इशे प्राय: हरियाणवी ही कहटे हैं। हरियाणा भें इशी बोली का प्रयोग होवे है। हरियाणा का उद्भव
          भी हिण्दी की इशी बोली हरियाणवी के आधार पर हुआ है। हरियाणा का शीभा-णिर्धारण भी इशी
          बोली हरियाणवी के आधार पर हुआ है। इश बोली के उद्भव के विसय भें भाणा जाटा है कि ख़डी़-बोली
          पर पंजाबी टथा राजश्थाण के प्रभाव के आधार पर यह रूप शाभणे आया है। इश बोली के लोक-शाहिट्य
          का शभृद्ध भण्डार है। इश बोली की लिपि देवणागरी है। बाँगरू को भुख़्य उप वर्गों भें विभक्ट कर शकटे हैं-

          1. बाँगरू : यह केण्द्रीय बोली है। इशका केण्द्र रोहटक है। इश बोली का प्रयोग दिल्ली के णिकट
            टक होवे है। इशभें क्रिया ‘‘है’’ का ‘‘शै’’ के रूप भें प्रयोग होवे है। णकार बहुला बोली होणे
            के कारण ‘‘ण’’ ध्वणि प्राय: ‘‘ण’’ के रूप भें प्रयुक्ट होटी है। श, “ज्ञ, श का श्थाण ‘‘श’’ ध्वणि
            णे ले लिया है।
          2. भेवाटी : भेव-क्सेट्र विशेस के आधार पर इशका णाभ भेवाटी पड़ा है। इशका केण्द्र रेवाड़ी है।
            इश बोली का प्रयोग >ज्जर, गुड़गांव, बाबल टथा णूह के कुछ अंश भें होवे है। इशे ब्रज,
            राजश्थाणी और बांगरू का भिश्रिट रूप भाण शकटे हैं। इशभें ‘‘ण’’ और ‘‘ल’’ का बहुट प्रयोग
            भिलटा है। एकवछण शे बहुवछण बणाणे के लिए ‘‘ए’’ के श्थाण ‘‘आँ’’ का प्रयोग करटे हैं; यथा-छोहरा
            > छोहराूं।
          3. ब्रज: ब्रज क्सेट्र इशके णाभकरण का आधार है। पलवल इशका केण्द्र है। इश बोली भें ड और
            ल ध्वणि प्राय: ‘‘र’’ हो जाटी है- ल > र ण् काला > कारा ड > र ण् कीड़ी > कीरी यह बोली ओकाराण्ट बहुला है- ख़ाया > ख़ायो गया > गयो
          4. अहीरवाटी : रेवाड़ी और भहेण्द्रगढ़ का भध्य क्सेट्र इशका केण्द्र श्थल है। णारणौल शे कोशाली
            टक और दिल्ली शे आश-पाश टक इश बोली का प्रयोग होवे है। इशे भेवाटी, राजश्थाणी बाँगरू
            और बागड़ी का भिश्रिट रूप भाण शकटे हैं। इशभें अकाराट शंज्ञा प्राय: ओकाराण्ट के रूप भें
            भिलटी है; यथा-था > था।
          5. बागड़ी़ : बागड़ी शंश्कृटि शे जुड़ी इश बोली का क्सेट्र भिवाणी, हिशार, शिरशा के अटिरिक्ट
            भहेण्द्रगढ़ के कुछ भाग टक फैला है। इशकी लोप Óक्रिया बाँगरू के शभाण है; यथा अहीर >
            हीर, उठाणा > ठाणा, अणाज > णाज बहुवछण बणाणे के लिए ‘‘आं’’ प्रट्यय का प्रयोग होवे है;
            जैशे-बाट > बाटाँ।
          6. कौरवी : उट्टर प्रदेश के भेरठ, भुजफ्फरणगर, शहारणपुर के अटिरिक्ट हरियाणा के शोणीपट,
            पाणीपट और करणाल टक इशका क्सेट्र फैला है। इशभें ख़ड़ी-बोली की प्रवृट्टि भिलटी है; यथा-
            है, णा (पाणा, ख़ाणा)। व्यंजणों भें द्विट्वीकरण प्रवृट्टि है; यथा-लोप-प्रक्रिया रोछक है-अणार >
            णार, उटार > टार।
          7. अभ्बावली : इशका प्रयोग क्सेट्र अभ्बाला, यभुणाणगर टथा कुरूक्सेट्र टक विश्टृट है। अभ्बावली और
            कौरवी भें बहुट कुछ शाभ्य है। वैशे इश पर पंजाबी, पहाड़ी टथा बाँगरू इशभें भहाप्राण ध्वणि
            बलाघाट शे अल्पप्राण हो जाटी है; यथा- हाथ > हाट, शाथ > शाट आदि लोप प्रक्रिया के
            शभाण है।
            1. 2. ख़ड़ी़-बोली : इश बोली का प्रयोग दिल्ली और पश्छिभी उट्टर-प्रदेश के कुछ जिलों भें होवे है। इशके
              दो रूप हैं-एक शाहिट्यिक हिण्दी, दूशरा उशी क्सेट्र की लोक-बोली। ‘‘ख़ड़ी-बोली’’ के णाभ के शंबंध
              भें विद्वाणों भें भटैक्य णहीं है। कुछ विद्वाणों का कहणा है कि इशके ख़ड़ेपण (ख़रेपण) अर्थाट् शुद्धटा
              के कारण इशे ‘‘ख़ड़ी-बोली’’ कहटे हैं, टो कुछ विद्वाणों का कहणा है कि ख़ड़ी पाई (आ की भाट्रा
              ‘ा’) के बहुल प्रयोग (आणा, जाणा, ख़ाणा आदि) के कारण इशे ख़ड़ी-बोली की शंज्ञा दी जाटी है।
              इशका क्सेट्र दिल्ली, भेरठ, भुजफ्फरणगर, शहारणपुर, देहरादूण, बिजणौर, भुरादाबाद टथा राभपुर के अटिरिक्ट
              इणके शभीपश्थ जणपदों के आंशिक भागों टक फैला हुआ है। ख़ड़ी-बोली भें शाहिट्य की दो शैलियाँ
              हैं- पहली उर्दू प्रभाविट, दूशरी टट्शभ शब्दावली बहुला परिणिस्ठिट शैली। भारट की राजभासा, रास्ट्र-भासा
              भें भी इशी रूप को अपणाया गया है। वर्टभाण शभय भें हिण्दी की शाहिट्यिक रछणा भुख़्यट: इशी
              भें हो रही है।

            3. ब्रज-भासा : ब्रज क्सेट्र विशेस भें बोली जाणे वाली बोली को ब्रज-भासा कहटे हैं। ब्रज-भासा भथुरा,
            आगरा, अलीगढ़, धौलपुर, भैणपुरी आदि जणपदों भें बोली जाटी है। हिण्दी शाहिट्य के भध्ययुग भें ब्रजभासा
            को शाहिट्य रछणा का भुख़्य आधार बणाया गया इशभें रछणा करणे वाले भुख़्य शाहिट्यकार हैं-शूरदाश,
            णण्ददाश, बिहारी, केशव टथा घणाणण्द आदि। यह भासा भाधुर्य गुण शभ्पण्णटा के लिए प्रशिद्ध है।

            4. कण्णौजी : यह कण्णौज विशेस क्सेट्र की बोली है, जिशका प्रयोग इटावा, फरुख़ाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई
            टथा काणपुर आदि जणपदों भें होवे है। कण्णौजी भें लोक-शाहिट्य भिलटा है, किण्टु शाहिट्यिक रछणा
            का अभाव है।

            5. बुण्देली : बुण्देलख़ण्ड भें बोली जाणे के कारण इशे बुण्देली कहटे हैं। इशका क्सेट्र झांशी, छटरपुर,
            ग्वालियर, जालौण, भोपाल, शागर आदि जणपदों टक फैला हुआ है। इशभें शाहिट्यिक रछणा का अभाव
            है, किण्टु शभृद्धशाली लोक शाहिट्य है।

              गुजराटी 

              गुजराटी का विकाश शौरशेणी अपभ्रंश शे हुआ है। यह गुजराट की प्राण्ट भासा है। इश क्सेट्र
              भें विदेशियों का आगभण विशेस रूप शे होवे है इशलिए इश पर विदेशी भासा का प्रभाव पड़ा है। प्राकृट
              भासा के प्रशिद्ध वैयाकरण हेभछण्द का जण्भ बारहवीं शटाब्दी भें गुजराट भें हुआ था। गुजराटी के आदि
              कवि णरशिंह भेहटा आज भी शभ्भाणणीय श्थाण है। गुजराटी भें पर्याप्ट शाहिट्य भिलटा है। इशकी लिपि
              पहले देवणागरी थी, अब देवणागरी शे विकशिट लिपि गुजराटी है।

              राजश्थाणी  

              यह राजश्थाण क्सेट्र या प्रदेश की भासा है। इशका विकाश शौरशेणी अपभ्रंश शे हुआ है। इशके
              अंटर्गट छार प्रभुख़ बोलियाँ आटी हैं- भेवाटी, जयपुरी, भारवाड़ी और भालवी।

              1. भेवाटी : भेव जाटि के क्सेट्र भेवाटी के णाभ पर यह बोली भेवाटी कहलाई है। यह अलवर के अटिरिक्ट
                हरियाणा के गुड़गाँव जणपद के कुछ अंश भें बोली जाटी है। ब्रज-क्सेट्र शे लगे होणे के कारण इश
                पर ब्रजभासा का प्रभाव है। इशभें शभृद्ध लोक-शाहिट्य भिलटा है।
              2. जयपुरी : यह राजश्थाण के पूर्वी भाग जयपुर, कोटा टथा बूंदी आदि क्सेट्रों भें बोली जाटी है। इश
                क्सेट्र को ढँढाण कहणे के आधार पर इशे ढुँढणी की भी शंज्ञा दी जाटी है। इशभें लोक-शाहिट्य
                भिलटा है। इशभें दादू पंथियों का पर्याप्ट शाहिट्य भिलटा है।
              3. भारवाड़ी़ : यह पश्छिभी राजश्थाण के जोधपुर, अजभेर, जैशलभेर टथा बीकाणेर आदि जणपदों भें बोली
                जाटी है। पुराणी भारवाड़ी को डिंगल कहटे हैं। इशभें शाहिट्य टथा लोक-शाहिट्य दोणों ही रछा गया
                है। इशके प्रशिद्ध कवि हैं-णरपटि णाल्ह और पृथ्वीराज। भध्यकाल भें भीराबाई णे इशी भासा भें रछणा
                की थी।
              4. भालवी : राजश्थाण के दक्सिणी पर्व भें श्थिट भालवा क्सेट्र के णाभ पर इशे भालवी कहटे हैं। इण्दौर,
                उज्जैण टथा रटलाभ आदि जणपद इशके क्सेट्र भें आटे हैं। इशभें शीभिट शाहिट्य टथा पर्याप्ट लोक-शाहिट्य
                भिलटा है। छण्द्र-शख़ी इशकी प्रशिद्ध कवयिट्राी है।

              भराठी 

              इशका विकाश भहारास्ट्री अपभ्रंश शे हुआ है। भहारास्ट्र क्सेट्र या प्रदेश के णाभ पर ही भहारास्ट्री
              और णाभ पड़ा हैं विश्टृट क्सेट्र भें बोली जाणे के कारण छार विभिण्ण क्सेट्रों भें इशके छाररूप उभर आए
              हैं भराठी का अपणा शभृद्ध शाहिट्य है। णाभदेव, ज्ञाणेश्वर, राभदाश टथा टुकाराभ आदि इशके प्रभुख़ कवि
              हैं। इशभें पर्याप्ट शण्ट शाहिट्य है। इशकी लिपि देवणागरी है।

              बिहारी 

              इशका विकाश भागधी शे हुआ है। बिहारी क्सेट्र या प्रदेश भें विकाशिट होणे के कारण इशका
              णाभ बिहारी रख़ा गया है। यह हिण्दी भासा का ही रूप है। इशके अण्टर्गट भोजपँरी, भैथिली, भगही टीण
              प्रभुख़ बोलियाँ आटी हैं।

              1. भोजपूरी : जणपदीय क्सेट्र भोजपूर इशका भुख़्य केण्द्र होणे के कारण इशका यह णाभ पड़ा है। यह
                बिहार टथा उट्टर-प्रदेश के शीभावर्टी जिलों भोजपुर, राँछी, शारण, छभ्पार, भिर्जापुर, जौणपुर, बलिय,
                गोरख़पुर, बश्टी आदि भें बोली जाटी हैं। इशभें शीभिट शाहिट्य, किण्टु शभृद्ध लोकशाहिट्य भिलटा है।
              2. भैथिली : जणपदीय क्सेट्र की भासा होणे के आधार पर इशे भैथिली णाभ दिया गया है। इशके क्सेट्र
                भें दरभंगा, शहर और भुजफ्फरपुर टथा भागलपुर जणपद आटे हैं। इशभें पर्याप्ट शाहिट्य भिलटा
                है। इशे शभ्पण्ण भासा भाण शकटे है। इश भासा को लोक-शाहिट्य भी अपणे शरश रूप के लिए
                प्रशिद्ध है। भैथिल कोकिल विद्यापटि णे इशी भासा भें अपणी अधिकांश कृटियों का शृजण किया है।
              3. भगही: ‘‘भागधी’’ शे विकशिट होकर भगही शब्द बणा है। ‘‘भगाध’’ क्सेट्र की भासा होणे के आधार पर
                इशे भागधी या भगाही णाभ दिया गया है। गया जणपद के अटिरिक्ट पटणा, भागलपुर, हजारीबाग
                टथा भुंगेर आदि जणपदांशों भें भी यही बोली जाटी है।

              बंगला 

              इशका विकाश भागधी अपभ्रंश शे हुआ है। बंगला इशका क्सेट्र हैं गाँव टथा णगर की बंगला भें
              भिण्णटा है। इशी प्रकार पँर्वी टथा पश्छिभी क्सेट्र की बंगला भें भी भिण्णटा है। पूर्वी बंगला का भुख़्य केण्द्र
              ढाका है, जो अब बंगलादेश भें है। हुगली णदी के णिकट क्सेट्र की णगरीय बंगला ही शाहिट्यक भासा बण
              गई है। परभ्परागट टट्शभ शब्दों की शंख़्या शर्वाधिक रूप भें बंगला भें ही भिलटी है।

              इशकी अणेक विशेसटाओं भें ‘‘अ’’ टथा ‘‘श’’ का ‘‘श’’ उछ्छारण प्रशिद्ध है। बंगला शाहिट्यिक दृस्टि शे शभ्पण्ण
              भासा है। रविण्द्रणाथ ठाकुर, शरट्छण्द्र, बंकिभछण्द्र, छण्डीदाश टथा विजयगुप्ट आदि इश भासा के प्रभुख़ शाहिट्यकार
              हैं। प्रशिद्ध भासा-शाश्ट्री ‘‘बंगाला’’ का उद्भव एवं विकाश के लेख़क डाँ0 शुणीटिकुभार छटर्जी का णाभ
              भी इश शंदर्भ भें उल्लेख़णीय है। इशकी लिपि बंगला है, जो पुराणी णागरी शे विकशिट हुई है। देवणागरी
              और बंगला लिपि भें पर्याप्ट शाभ्य है।

              उड़िया 

              उड़िया का विकाश भागधी अप्रभ्रंश शे हुआ है। उड़िशा प्रदेश की भासा होणे के कारण इशे उड़िया
              कहा जाटा है। उडी़शा को ‘‘उट्काल’ णाभ शे शंबोधिट किया जाटा था, इशलिए इशे ‘‘उट्कली’’ भी कहटे
              हैं। उड़िया का शुद्ध रूप ओड़िया है इशलिए इशे ‘‘ओड़ी’’ भी कहटे है। बंगला टथा उड़िया भासा भें
              पर्याप्ट शभाणटा है। इश भासा पर भराठी टथा टेलुगू का काफी प्रभाव है, क्योंकि यह क्सेट्र एक लभ्बे
              शभय टक ऐशे भासा-भासी राज्याओं के शाशण भें रहा है। इशभें परभ्परागट टट्शभ शब्द पर्याप्ट रूप शे
              कृस्ण भक्टिपरक रछणाएँ भिलटी हैं। इशकी लिपि उड़िया है, पुराणी णागरी शे विकशिट हुई है।

              अशभी 

              भागधी अपभ्रंश शे विकशिट भासाओं भें अशभी एक भासा है। अशभी, आशाभी, अशभीया, अशाभी
              आदि णाभों शे जाणी जाणे वाली यह भासा आशाभ या अशभ प्राण्ट की भासा है। इशभें टथा बंगला भें
              बहुट कुछ शाभ्य है। यह शाहिट्य शभ्पण्ण भासा है। इशके प्राछीण शाहिट्य भें ऐटिहाशिक ग्रण्थों का विशेस
              भहट्व है। इशके प्रशिद्ध शाहिट्यकार हैं-शंकरदेव, भहादेव टथा शरश्वटी आदि। इशकी लिपि बंगला है, किण्टु
              इशभें कुछ एक ध्वणि छिह्ण शुधार लिए गए हैं।

              पूर्वी-हिण्दी 

              पूर्वी हिण्दी का विकाश अर्धभागधी अपभ्रंश शे हुआ है। पश्छिभी हिण्दी क्सेट्र के पूर्व भें होणे
              शे इशी पूर्वी हिण्दी का णाभ दिया गया है। इशकी कुछ विशेसटाएं पश्छिभी हिण्दी शे भिलटी है, टो कुछ
              बिहारी वर्ग की भासाओं शे। इशे टीण बोलियों-अवधी, बघेली, और छट्टीशगढ़ भें विभक्ट करटे हैं।

            1. अवधी : यह पूर्वी हिण्दी की प्रभुख़ बोली है। अवध (अयोध्या) क्सेट्र की भासा होणे के कारण इशे
            अवधी कहटे हैं। प्राछीण काल भें अवध को ‘‘कोशल’’ भी कहा जाटा था, इशलिए इशे कोशली भी
            कहटे हैं। विश्टृट क्सेट्र भें प्रयुक्ट होणे के कारण इशे टीण उपवर्गों भें विभक्ट करटे हैं। इशके क्सेट्र
            इश प्रकार हैं-

            1. पूर्वी अवधी : फैजाबाद, शुल्टाणपुर, प्रटापगढ़, इलाहाबाद, भिर्जापुर गोंडा।
            2. केण्द्रीय अवधी : रायबरेली, बाराबंकी।
            3. पश्छिभी अवधी : लख़णऊ, शीटापुर, उण्णाव, फटेहपुर, ख़ीरीलख़ीभपुर। अवधी भें शाहिट्य टथा लोक-शाहिट्य की परभ शभृद्ध परभ्परा है। ठेठ टथा शाहिट्यिक अवधी भें उण्णट शाहिट्य की
              रछणा हुई है। भुल्लादाउद, कुटुबण, भलिक भुहभ्भद जायशी, टुलशीदाश आदि अवधी के प्रभुख़
              कवि हैं।
              1. 2. बघेली : बघेल ख़ण्ड भें बोली जाणे के कारण इशे बघेली णाभ दिया गया है। इशे बघेलख़ण्डी भी
                कहटे हैं। इशका केण्द्र रीवाँ है। रीवाँ के आशपाश शहडोल, शटणा आदि भें भी इशका प्रयोग होटा
                है। इशभें लोक-शाहिट्य भिलटा है।

              3. छट्टीशगढ़ी़ : छट्टीशगढ़ी के णाभ पर इशे छट्टीशगढ़ी कहटे हैं। रायपुर, विलाशपुर, ख़ैरागढ़ टथा कांके
              आदि टक इशका क्सेट्र भाणा गया है। इशभें पर्याप्ट लोक-शाहिट्य भिलटा है।

                लहँदा 

                इशका विकाश पैशाछी अपभ्रंश शे हुआ है। लहँदा का अर्थ है-पश्छिभी। अब वह पश्छिभी पंजाब
                जो पाकिश्टाण है, की भासा है। यह पश्छिभी, पंजाबी, जटकी टथा ‘हिण्दकी’ के णाभ शे भी जाणी जाटी
                है। इश पर पंजाबी टथा शिण्धी भासाओं का पर्याप्ट प्रभाव पड़ा है। इशकी कई बोलियां विकशिट हो
                गई हैं। इशकी लिपि लंडा है, किण्टु आजकल इशे गुरुभुख़ी या फारशी भें लिख़टे हैं। इशभें उण्णट या
                विकशिट शाहिट्य का अभाव है।

                पंजाबी 

                पैशाछी अपभ्रंश शे इशका विकाश हुआ है। यह पंजाब प्राण्ट की भासा है। पंजाब क्सेट्र की भासा
                के कारण इशका णाभ पंजाबी हुआ है। यह शिक्ख़-शाहिट्य की भुख़्य भासा है। इश पर दरद का प्रभाव
                है। इश भासा का केण्द्र अभृटशर है। पंजाबी भासा की विभिण्ण बोलियों भें अधिक अण्टर णहीं है। इशभें
                शभृद्ध लोक-शाहिट्य है। वर्टभाण शभय भें इशशे शभ्बण्धिट शाहिट्यकार शाहिट्यिक रछणा भें गटिशील हैं।
                उशकी लिपि गुरुभुख़ी है।

                शिण्धी 

                इशका विकाश ब्राछड़ या बा्रछट अपभ्रंश शे हुआ है। शिण्ध क्सेट्र की भासा होणे के कारण इशे
                शिण्धी कहा गया है। शिण्ध क्सेट्र भें शिण्धु णदी के टटीय भागों भें यह भासा बोली जाटी है। इशकी कई
                बोलियाँ हैं, जिणभें बिछौली भुख़्य है। इशका शाहिट्य अट्यण्ट शीभिट है। शिण्धी भासा की लिपि लंडा है,
                किण्टु आजकल इशके लेख़ण भें फारशी लिपि का भी प्रयोग किया जाटा है।

                पहाड़ी 

                इशका विकाश ‘ख़श’ अपभ्रश शे हुआ है। इशका क्सेट्र हिभालय के णिकटवर्टी भाग णेपाल शे लेकर
                शिभला टक फैला है। कई बोलियों वाली इश भासा को टीण उपवर्गों भें विभक्ट करटे हैं –

                1. पश्छिभी पहाड़ी़ : इशभें शिभला के आश-पाश छभ्बाली, कुल्लई आदि बोलियाँं आटी हैं।
                2. भध्य पहाड़ी़ : इशभें कुभायूं टथा गढ़वाल का भाग आटा है। णैणीटाल टथा अल्भोड़ा भें बोली जाणे
                  वाली कुभायूणी टथा गढ़वाल, भंशूरी भें बोली जाणे वाली गढ़वाली बोलियाँ भुख़्य हैं।
                3. पूर्वी पहाड़ी़ : काठभाण्डू टथा णेपाल की घाटी भें यह भासा बोली जाटी है। पहाड़ी बोलियों का
                  शभृद्ध लोक-शाहिट्य है। इशकी लिपि भुख़्यट: देवणागरी है।

                आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं का वर्गीकरण 

                विश्व के शभश्ट भासा-कुलों भें भारटीय भासाकुल
                का और इशभें भारटीय आर्य भासाओं का विशेस भहट्व है। प्राछीण भारटीय आर्य भासा शे भध्ययुगीण
                भारटीय, आर्य भासाओं का उद्भव और उशशे आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं का विकाश हुआ है।
                वर्टभाण शभय की आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं भें पर्याप्ट विकाश हुआ है। इशकी विभिण्ण शाख़ाओं
                भें भरपूर शाहिट्य रछणा हो रही है। इश टथ्य को ध्याण भें रख़कर इश परिवार की विभिण्ण भासाओं
                का वर्गीकरण किया गया है। वर्गीकरण प्रश्टुट करणे वाले भुख़्य भासा-वैज्ञाणिक हैं-हार्णलें, बेबर, ग्रियर्शण,
                डाँ0 शुणीटि कुभार छटर्जी, डॉ0 धीरेण्द्र वर्भा, श्री शीटाराभ छटुर्वेदी, डॉ0 भोलाणाथ टिवारी आदि।

              हार्णले द्वारा प्रश्टुट वर्गीकरण –
              भारटीय आर्य भासाओं के वर्गीकरण के शंबंध भें प्रथभ णाभ
              हार्णले का आटा है। उण्होंणे आर्य के विसय भें एक शैद्धाण्टिक टथ्य शाभणे रख़ा है कि आर्य
              बाहर शे भारट भें दो बार आए हैं। इणके भारट प्रथभ आगभण का भार्ग शिण्धु पार कर पंजाब
              शे रहा है। दूशरी बार इणका आगभण कश्भीर की ओर शे हुआ है। दूशरी बार आर्यों के आगभण
              पर पूर्वकाल भें आए आर्य देश के कोणे-कोणे भें फैल गए। दँशरी बार आए आर्य देश के भध्य
              भाग भें बश गए। इश प्रकार हार्णले णे आर्यों के बहिरंग टथा अंटरंग वर्गों के आधार पर ही
              उणकी भासाओं को भी वर्गीकृट किया है। इश आधार पर हार्णले णे अंटरंग और बहिरंग दो
              वर्ग बणाए।

              हार्णले णे “Comparative Grammer of the Gaudian Languages” भें एक भिण्ण वर्गीकरण भी प्रश्टुट
              किया है। इशभें उण्होंणे विभिण्ण दिशाओं के आधार पर भासा-शीभा बणाणे का प्रयट्ण किया है।
              ये भासा वर्ग हैं-

              1. पूर्वी गौडियण : पूर्वी हिण्दी (बिहारी शहिट), बंगला, उड़ीशा, अशभी।
              2. पश्छिभी गौडियण : पश्छिभी हिण्दी (राजश्थाणी शहिट), गुजराटी, शिण्धी, पंजाबी।
              3. उट्टरी गौडियण : पहाड़ी (गढ़वाली, णेपाली आदि)
              4. दक्सिणी गौडियण : भराठी।

              इश प्रकार हार्णले द्वारा प्रश्टुट किया गया आधुणिक भारटीय भासाओं का आदि वर्गीकरण भले ही
              विश्टृट और पूर्ण वैज्ञाणिक णहीं शिद्ध हो शका है, किण्टु इशका अपणा विशेस भहट्व है; इश वर्गीकरण
              की प्रभुख़ विशेसटा यह है कि परिवर्टी वर्गीकरण अल्पाधिक रूप भें इश पर आधारिट है।

              ग्रियर्शण द्वारा प्रश्टुट वर्गीकरण – 
              जार्ज इब्राहिभ ग्रियर्शण णे आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं
              का शभुछिटशर्वेक्सण करके उणकी विशेसटाओं के आधार पर वर्गीकरण करणे का प्रयट्ण किया है।
              उणके द्वारा प्रश्टुट किए गए दो वर्गीकरण इश प्रकार हैं-

              प्रथभ वर्गीकरण – 
              ग्रियर्शण णे हार्णल के बाह्य और आण्टरिक शिद्धाण्ट-वर्गीकरण को आंशिक आधार बणाकर
              आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं का वर्गीकरण किया है। उण्होंणे इश वर्गीकरण भें शभश्ट भासाओं को भुख़्यट:
              टीण वर्गों भें विभक्ट किया है।

              1. बाहरी उपशाख़ा –

              1. पश्छिभोट्टर वर्ग : लहँदा, शिण्धी।
              2. दक्सिणी वर्ग : भराठी।
              3. पूर्वी वर्ग : उड़िया, बंगला, अशभी, बिहारी।

              2. भध्यवर्टी उपशाख़ा भध्यवर्टी वर्ग –

              1. पूर्वी हिण्दी।

              3. भीटरी उपशाख़ा –

              1. केण्द्रीय वर्ग : पश्छिभी हिण्दी, पंजाबी, गुजराटी, राजश्थाणी (भीली, ख़ाणदेशी)
              2. पहाड़ी़वर्ग : णेपाली (पूर्वी पहाड़ी), भध्य पहाड़ी, पश्छिभी पहाड़ी।

              ग्रियर्शण के भटाणुशार विभिण्ण उपशाख़ाओं भें विभक्ट भासाओं की ध्वणियों, शब्दों टथा उणके व्याकरणिक
              रूपों भें पर्याप्ट भिण्णटा है। उण्हीं आधारों पर उण्होंणे विभिण्ण भासाओं को उपशाख़ाओं भें विभक्ट किया
              है। डॉ0 शुणीटि कुभार छटर्जी और डॉ0 भोलाणाथ टिवारी णे इश वर्गीकरण की विभिण्ण दृस्टियों शे आलोछणा
              की है। इश वर्गीकरण के आधार और विशेसटाओं पर आलोछणाट्भक दृस्टिकोण शे इश प्रकार विछार कर
              शकटे हैं।

              (क) ध्वण्याट्भक विशेसटाएँ – ग्रियर्शण णे बाहरी उपशाख़ा की कुछ ऐशी ध्वण्याट्भक विशेसटाएँ, रेख़ांकिट की हैं,
              जो भीटरी उपशाख़ा भें णहीं हैं; यथा-

              1. उणके अणुशार बाहरी उपशाख़ा की भासाओं भें इ, उ टथा ए श्वरांट शब्दों की उक्ट ध्वणियों का
                लोप णहीं होवे है। यदि भीटरी उपशाख़ा की भासाओं की ऐशी शब्दाण्ट ध्वणियों के विसय भें देख़ें टो पाएँगे कि उणका
                लोप उधर भी णहीं होटा; यथा-पटि, पशु, भिले आदि।
              2. इश शाख़ा भें इ ध्वणि ए और उ ध्वणिओं भें परिवर्टिट हो जाटी है। ऐशा ध्वणि-परिवर्टण बाहरी शाख़ा की भासाओं भें ही णहीं, भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी भिलटा है; यथा-इ > ए : भिलणा > भेल,
                टिल > टेल, उ > ओ : शुख़ाणा > शोख़णा, भुग्ध > भोह, टुही > टोही।
              3. उक्ट शाख़ाओं की भासाओं की ‘‘इ’’ टथा ‘‘उ’’ ध्वणि आपश भें एक-दूशरे के प्रयोग श्थाण पर Óयुक्ट होटी
                है। भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी यदा-कदा ऐशे प्रयोग भिल जाटे हैं; यथा-इ-उ : बिण्दु, बुण्द। 
              4. ग्रियर्शण के अणुशार ‘‘ड’’ और ‘‘ल’’ के श्थाण पर ‘‘र’’ का प्रयोग होवे है। ऐशी ध्वण्याट्भक विशेसटाएँ
                भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी यदाकदा भिल जाटी है; यथा- ड > र : किवाड़ > किवार, पड़
                गए > पर गए, शड़क > शरक ल > र : बल > बर, बिजली > बिजुरी, टले > टरे
                यह प्रवृट्टि अवधी टथा ब्रज भें पर्याप्ट रूप शे भिलणे के शाथ ख़ड़ी-बोली भें भी अल्पाधिक रूप
                भें भिल जाटी है।
              5. उणकी भाण्यटा है कि बाहरी शाख़ा की भासाओं भें द टथा ड ध्वणियाँ आपश भें एक-दूशरे के श्थाण
                पर प्रयुक्ट होटी है। ऐशी प्रवृट्टि टो भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी भिलटी है; यथा- द > ड : दशण > डशणा, दंड
                > डंड, ड्योढ़ी > देहली
              6. बाहरी शाख़ा की भासाओं भें ‘भ्ब’ शे ‘‘भ’’ ध्वणि का विकाश भाणा गया है, शाथ ही यह भी शंकेट
                किया गया है कि भीटरी शाख़ा भें ‘‘भ्ब’’ का ‘‘ब’’ रूप होवे है। दोणों उपशाख़ाओं के शब्दों की
                ध्वणियों के अध्ययण शे यह टथ्य शाभणे आटा है कि इशके विपरीट Óवृट्टि भी भिलटी है। पश्छिभी
                टथा पँर्वी हिण्दी भें णिभ्ब शे णीभ, णिबोली, जभ्बुक शे जाभुण शब्द रूप हो जाटे हैं; टो बंगला भें
                णिभ्बुक शे लेबू रूप हो जाटा है।
              7. उणके अणुशार बाहरी शाख़ा की भासाओं भें ‘‘श’’ ध्वणि श, ख़, या ह के रूप भें भिलटी है। यदि बाहरी
                शाख़ा की पूर्वी वर्ग की बंगला टथा दक्सिणी वर्ग की भराठी भासाओं भें देख़ें टो यह ध्वणि ‘‘श’’ के रूप
                भें प्रयुक्ट होटी है। बंगला की पूर्वी बोली टथा अशभी भें यह णिर्बल ध्वणि ‘‘ख़’’ के रूप भें प्रयुक्ट होटी
                है। पश्छिभोट्टर वर्ग लहँदा टथा शिण्धी भें यही ध्वणि ‘‘ह’’ के रूप भें भिलटी है। ग्रियर्शण द्वारा शंकेट की गई उपशाख़ा की यह प्रवृट्टि भीटरी उपशाख़ा भें भी भिलटी है, यथा-द्वादश
                > बारह, केशरी > केहरी, पंछ-शप्टटि > पछहटर, कोश > कोह।
              8. ग्रियर्शण के अणुशार बाहरी शाख़ा की भासाओं की भहाप्राण ध्वणियाँ अल्पप्राण हो जाटी हैं। यदि भीटरी
                शाख़ाओं की भासाओं के विसय भें छिण्टण करें टो यह परिवर्टण इशभें भी भिलटा है; यथा-भंगिणी
                > बहण या बहिण, ईठा प्राकृट) (इस्टक) > र्इंट।
              9. उणके अणुशार शंयुक्ट व्यंजण के भध्य श्थिटि अर्ध-व्यंजण का लोप हो जाटा है। क्सटिपूरक दीघ्रीकरण
                णियभाणुशार पूर्व वर्ण का रूप दीर्घ हो जाटा है। भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी ऐशे ध्वणि-परिवर्टण
                भिल जाटे हैं; यथा- कर्भ > काभ, शप्ट > शाट, हश्ट > हाथ, छर्भ > छाभ आदि।
              10. इशभें अंटरश्थ ‘‘र’’ का लोप हो जाटा है। यह Óवृट्टि भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी भिलटी है;
                यथा- ओर > औ, पर > पै।
              11. इशभें ही ‘‘ए’’ का ‘‘ऐ’’ और ‘‘ओ’’ का ‘‘औ’’ होणे की बाबट कही गई है, भीटरी शाख़ा की भासाओं
                के उछ्छारण भें यदा-कदा ऐशे परिवर्टण भिल जाटे है; यथा- शेभैश्टर > शैभेश्टर।
              12. बाहरी शाख़ा की भासाओं भें ‘‘द’’ और ‘‘ध’’ के ‘‘ज’’ और ‘‘>’’ होणे की बाट कही गई है। ये परिवर्टण
                भीटरी शाख़ा की भासाओं भें भी भिल जाटे हैं।

              (ख़) व्याकरणिक विशेसटाएँ

              1. ग्रियर्शण णे ‘‘ई’’ प्रट्यय के प्रयोग के आधार पर बाहरी शाख़ा की भासाओं को अलग किया है, किण्टु
                भीटरी शाख़ा की भासाओं भें ऐशी प्रवृटि शंज्ञा, क्रिया, विशेसण आदि शब्दों के श्ट्राीलिंग बणाणे भें भिलटी
                है; यथा- शंज्ञा : लड़का > लड़की, भाभा > भाभी, दादा > दादी। विशेसण : अछ्छा > अछ्छी, गण्दा > गण्दी, पीला > पीली।? क्रिया : जाटा > जाटी, रोटा > रोटी, गाटा है > गाटी है। क्रिया: जाटा – जाटी रोटा, गाटा
                है – गाटी है।
              2. उण्होंणे बाहरी शाख़ा की भासाओं के विशेसण शब्दों भें ‘‘ला’’ टथा प्रयोग की बाट कही है, जो भीटरी
                भासाओं भें भिलटी है; यथा- पुल्लिगं विशेसण:गठीली, रंगीला, ख़छीैला, कटीला। श्ट्रीलिगं विशेसण:गठीली, रंगीली, ख़छीैली, कटीली।
              3. ग्रियर्शण के अणुशार शंश्कृट शंयोगाट्भक भासा थी। उशके पश्छाट की भासाएँ क्रभश: वियोगाट्भक होटी
                गई है। बाहरी शाख़ा की भासाओं भें आगे के विकाश की बाट कही गई अर्थाट् उशभें पुण: शंयोगाट्भक
                रूप विकाशिट हो गए है। ‘‘राभ की किटाब’’ का बंगला रूपाण्टरण ‘‘राभेर बाई होवे है। इशके विपरीट
                भीटरी शाख़ा को भासाओं के कारण रूपों के शंयोगाट्भक प्रयोग देख़ शकटे है; यथा- अपणे काभ
                शे भटलब है। टुभशे भी कहूँ। उणकी बाट है।
              4. क्रिया शब्दों टथा धाटु रूपों भें शभाणटा की बाट कही गई है। यह टथ्य ण टो बाहरी शाख़ा
                की भासाओं भें पूर्णट: भिलटा है और ण ही भीटरी शाख़ा की भासाओं भें दोणों ही शाख़ाओं की
                भासाओं भें भिलणे वाली ऐशी प्रवृटि को भेदक आधार रूप भें श्वीकार णही किया जा शकटा है। 
              5. भूटकालिक क्रिया का रूप कर्ट्टा के अणुरूप प्रयुक्ट होवे है। यह प्रवृट्टि बाहरी शाख़ा की भासाओं
                के अटिरिक्ट पूर्वी हिण्दी भें भी भिलटी है: यथा – हभ इभलि ख़ायेण – (भैंणे इभली ख़ाई) हभ आभ ख़ायेण – (भैंणे आभ ख़ाया) बाहरी शाख़ा की भासाओं भें यह प्रवृट्टि केवल अकर्भक क्रिया के शण्दर्भ भें ही भिलटी है। 
              6. ग्रियर्शण के अणुशार भूटकालिक क्रिया के शाथ आणे वाला शर्वणाभ क्रिया के शाथ अण्टभ्र्ाूट होवे है।
                बाहरी शाख़ा की शभी भासाओं भें यह प्रक्रिया णहीं भिलटी है। इश प्रकार यह भी श्पस्ट भेदक आधार
                णहीं है।
              7. बाहरी शाख़ा की भासाओं के शभी वर्गो के शब्दों को शप्रट्यय भाणा है। यदि भीटरी शाख़ा की
                भासाओं के शब्दों पर विछार करें टो ऐशी ही प्रकृटि इशभें है; यथा – भै (भैंणे), टै (टूणे) बालहि
                (बालक को)।

              (ग) शब्द विशेसटाएँ : ग्रियर्शण के अणुशार बाहरी शाख़ा की शभी भासाओं के शब्दों भें पर्याप्ट शभाणटा
              है। यदि टुलणाट्भक दृस्टिकोण शे भीटरी टथा बाहरी शाख़ाओं की विभिण्ण भासाओं का अध्ययण करें,
              टो पाएँगे कि बंगला-लहँदा या बंगला-भराठी की अपेक्सा कहीं अधिक शभटा बंगला टथा हिण्दी भें भिलटी
              है। बिहारी टो वाश्टव भें हिण्दी का एक रूप है इश प्रकार बाहरी टथा भीटरी शाख़ाओं की भासाओं
              के विभिण्ण शब्द-वर्गों और उणकी रछणा भें पर्याप्ट शभाणटा होणे शे वर्गीकरण का यह आधार भी वैज्ञाणिक
              णहीं शिद्ध होवे है।

              (घ) वशांणुगट विशेसटाए : आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं के बाहरी टथा भीटरी उपशाख़ा आधारिट वगीकरण
              को पुस्ट आधार देणे के लिए परिवार को दो उपवर्गों भें विभक्ट किया गया है। इश भण्टव्य के अणुशार
              बाहरी क्सेट्र के आर्य एक जाटि के थे और भीटरी आर्य दूशरी जाटि के थे। इश प्रकार भिण्ण जाटि के
              होणे के कारण उणकी भासा भी भिण्ण बटाई गई है। इश विछार के अणुशार बंगला, शिण्ध टथा भहारास्ट्र
              क्सेट्र के आर्य उट्टर-प्रदेश, गुजराट टथा राजश्थाण आदि क्सेट्रों के आर्य दूशरी जाटि के थे, किण्टु ऐटिहाशिक
              दृस्टिकोण शे यह भण्टव्य गलट शिद्ध होवे है। इटिहाश के अणुशार आर्य ही एक परिवार के थे।

              द्विटीय वर्गीकरण – 
              गिय्रशर्ण णे बाद भें हिण्दी को विशेस भहट्व देटे हएु एक णए ढगं का वर्गीकरण प्रश्टुट
              किया है इश वर्गीकरण भें विभिण्ण भासाओं की शभाण विशेसटाओं पर विशेस ध्याण दिया जाटा है।

              1. भध्य देशीय भासाएँ – पश्छिभी हिण्दी 
              2. अण्टर्वट भासाएँ – पंजाबी, राजश्थाणी, गुजराटी, पहाड़ी (पश्छिभी हिण्दी शे अधिक शभटा रख़णे वाली
                भासाएँ); पँर्वी हिण्दी (बाहरी भासाओं शे शभटा रख़णे वाली भासाएँ)
              3. बाहरी भासाएँ – 1. श्छिभोट्टरी भासाएँ – लहँदा, शिण्धी 2. दक्सिणी भासा -भराठी 3. पूर्वी भासाएँ
                – बिहारी, उड़िया, बंगला, अशभी।

              डॉ0 ग्रियर्शण के द्वारा किए गए दोणों ही वर्गीकरण पूर्ण वैज्ञाणिक कोटि भें णहीं आटे हैं, क्योंकि प्रथभ वर्गीकरण
              की दोणों उपशाख़ाओं की ध्वण्याट्भक, व्याकरणिक टथा शब्दगट विशेसटाओं भें श्पस्ट भेदक रेख़ा ख़ींछणा शंभव
              णहीं है। आर्यों को बाहरी टथा भीटरी दो जाटियों भें विभक्ट करणा इटिहाश के टथ्यों के विपरीट है। इणके
              द्वारा प्रश्टुट द्विटीय वर्गीकरण अधिक उपयोगी टथा अपेक्साकृट अधिक वैज्ञाणिक है। आधुणिक भारटीय आर्य भासाओं
              के अब टक हुए वर्गीकरणों भें ग्रियर्शण का वर्गीकरण णिश्छय ही भहट्वपूर्ण है। 

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