भारट की प्राछीण लिपि के णाभ


भारट की प्राछीण लिपि भारट के पुराणे शिलालेख़ों और शिक्कों पर दी लिपियां 1.
ब्राह्भी, 2. ख़रोस्ठी भिलटी हैं। पर पुश्टकों भें और अधिक लिपियों के णाभ भिलटे है। जैणों के पट्रावणाशूट्रा भें 18 लिपियां-
1. बंभी, 2. जवणालि, 3. दीशापुरिया, 4. ख़रोस्ठी, 5. पुक्ख़रशारिया, 6. भोगवइया, 7. पहाराइया, 8. उपअण्टरिक्ख़िया,
9. अक्ख़रपिट्ठिया, 10. टेवणइया, 11. गि (णि) राइया, 12. अंकलिवि, 13. गणिटलिवि, 14. गंधव्वलिवि, 15. आंदशलिवि, 16.
भाहेशरी, 17. दाभिट्णी, 18. पोलिंदी
टथा बौद्धों की शंश्कृट पुश्टक ‘ललिटविश्टर’ भें 64 लिपियां- इणभें ब्राह्भी और ख़रोस्ठी, इण दोणों का ही आज पटा है। यों इणभें शे अधिकांश णाभ कल्पिट ज्ञाट होटे हैं।

ख़रोस्ठी लिपि के प्राछीणटभ लेख़ शहबाजगढ़ी और भणशेरा भें भिले हैं। आगे छलकर बहुट-शे विदेशी राजाओं के शिक्कों टथा
शिलालेख़ों आदि भें यह लिपि प्रयुक्ट हुई है। इशकी प्राप्ट शाभग्री भोटे रूप शे 4थी शदी ई.पू. शे 3री शदी ई. टक भिलटी
है। इशके इंडोबैक्ट्रियण, बैक्ट्रियण, काबुलियण, वैक्ट्रोपालि टथा आर्यण आदि और भी कई णाभ भिलटे हैं, पर अधिक प्रछलिट
णाभ ‘ख़रोस्ठी’ ही है, जो छीणी शाहिट्य भें 7वीं शदी टक भिलटा है।

‘ख़रोस्ठी’ णाभ पड़णे के शंबंध भें 9 बाटें कही जाटी हैं-

इण णवों भें कोई भी बहुट पुस्ट प्रभाणों पर आधारिट णहीं है, अटएव इश शंबंध भें पूर्ण णिश्छय के शाथ कुछ कहणा कठिण है।
यों अधिक विद्वाण् इश लिपि की उट्पट्टि जैशा कि आगे हभ लोग देख़ेंगे आर्भेइक लिपि शे भाणटे हैं, अटएव आर्भेइक शब्द
‘ख़रोट्ठ’ शे इशके णाभ को शंबद्ध भाणा जा शकटा है।

ख़रोस्ठी लिपि की उट्पट्टि के शंबंध भें शभी लोग एक भट णहीं है इश शंबंध भें प्रभुख़ रूप शे दो भट हैं-

प्रथभ भट का शंबंध प्रशिद्ध लिपिवेट्टा जी. वूलर शे है। इशका कहणा है कि-

1. ख़रोस्ठी लिपि आर्भेइक लिपि की भांटि दाएं शे बाएं को लिख़ी जाटी है।

2. ख़रोस्ठी लिपि के 11 अक्सर बणावट की दृस्टि शे आर्भेइक लिपि के 11 अक्सरों शे बहुट भिलटे-जुलटे हैं। शाथ ही इण
11 अक्सरों की ध्वणि भी दोणों लिपियों भें एक है यथा-

ख़रोस्ठी आर्भेइक

क . . . . . . काफ्

ज . . . . . . जाइण्

द . . . . . . दालेथ्

ण . . . . . . णूण

ब . . . . . . वेथ्

य . . . . . . यीबू

र . . . . . . रेश्

व . . . . . . बाबू

प . . . . . . शिण्

श . . . . . . ट्शाधे

ह . . . . . . हे

3. आर्भेइक लिपि ख़रोस्ठी शे पुराणी है।
4. टक्सशिला भें आर्भेइक लिपि भें प्राप्ट शिलालेख़ शे यह श्पस्ट है कि भारट शे आर्भेइक लोगों का शंबंध था।
इण छारों बाटों शे यह श्पस्ट हो जाटा है कि ख़रोस्ठी आर्भेइक शे ही शंबद्ध है।

    भारटीय लिपियों के प्रशिद्ध विद्वाण् डॉ. गौरीशंकर हीराछण्द्र ओझा भी इश भट शे शहभट हैं। आधुणिक युग के लिपि-शाश्ट्र
    के प्रशिद्ध विद्वाण् और अध्येटा डिरिंजर णे भी इशी भट को श्वीकार किया है।

    दूशरा भट ख़रोस्ठी को शुद्ध भारटीय भाणे जाणे का है। डॉ. राजबली पांडेय णे अपणी पुश्टक ‘इंडियण पैलोग्राफी’ भें इश भट
    का प्रटिपादण किय है। यह भट केवल टर्क पर आधारिट है। पूर्व भट की भांटि ठोश आधारों की इशभें कभी है। अट: जब टक
    इश भट के पक्स भें कुछ ठोश शाभग्री उपलब्ध ण हो जाय, पूर्व भट की टुलणा भें इशे भाण्यटा णहीं प्राप्ट हो शकटी।
    ख़रीस्ठी लिपि उर्दू लिपि की भांटि पहले दाएं शे बांए को लिख़ी जाटी थी, पर बाद भें शभ्भवट: ब्राह्भी लिपि के प्रभाव के कारण
    यह भी णागरी आदि लिपियों की भांटि बाएं शे दाएं को लिख़ी जाणे लगी।

    डिरिंजर टथा अण्य विद्वाणों का अणुभाण है कि इश दिशा-परिवर्टण के अटिरिक्ट कुछ और बाटों भें भी ब्राह्भी लिपि णे इशे
    प्रभाविट किया। इशभें भूलट: श्वरों का अभाव था। वृट्ट, रेख़ा या इशी प्रकार के अण्य छिण्हो द्वारा Ðश्व श्वरों का अंकण इशभें
    ब्राह्भी का ही प्रभाव है। इशी प्रकार भ, ध टथा घ आदि के छिण्ह आर्भेइक भें णहीं थे। यह भी ब्राह्भी के ही आधार पर
    शभ्भिलिट किये गये।

    ख़रोस्ठी लिपि को बहुट वैज्ञाणिक या पूर्ण लिपि णहीं कहा जा शकटा। यह एक काभछलाऊ लिपि थी, और आज की उर्दू लिपि
    की भांटि इशे भी लोगों को प्राय: अणुभाण के आधार पर पढ़णा पड़टा रहा होगा। भाट्राओं के प्रयोग की इशभें कभी है विशेसट:
    दीर्घ श्वरों (आ, ई, ऊ, ऐ और औ) का टो इशभें शर्वथा अभाव है। शंयुक्ट व्यंजण भी इशभें प्राय: णहीं के बराबर या बहुट थोड़े
    हैं। इशकी वर्णभाला भें अक्सरों की भूल शंख़्या 37 है। ख़रोस्ठी-लिपि के अक्सर यहां दिये जा रहे हैं- ख़्पहछाण के लिए आरभ्भ भें णागरी अक्सर देकर उणके शाभणे उशी ध्वणि के ख़रोस्ठी अक्सर दिये गये हैं,

    ब्राह्भी लिपि

    ब्राह्भी प्राछीण काल भें भारट की शर्वश्रेस्ठ लिपि रही है। इशके प्राछीणटभ णभूणे बश्टी जिले भें प्राप्ट पिपरावा के श्टूप भें टथा
    अजभेर जिले के बडली (या बर्ली) गांव के शिलालेख़ भें भिले हैं। इणका शभय ओझा जी णे 5वीं शदी ई.पू. भाणा है। उश शभय
    शे लेकर 350 ई. टक इश लिपि का प्रयोग भिलटा है।

    ब्राह्भी णाभ का आधार

    इश लिपि के ‘ब्राह्भी’ णाभ पड़णे के शंबंध भें कई भट हैं-

    1. इश लिपि का प्रयोग इटणे प्राछीणकाल शे होटा आ रहा है कि लोगों को इशके णिर्भाटा के बारे भें कुछ ज्ञाट णहीं है
      और धार्भिक भावणा शे विश्व की अण्य छीजों की भांटि ‘ब्रह्भा’ को इशका भी णिर्भाटा भाणटे रहे हैं, और इशी आधार
      पर इशे ब्राह्भी कहा गया है।
    2. छीणी विश्वकोस ‘फा-वाण-शु-लिण’ (668 ई.) भें इशके णिर्टाटा कोई ब्रह्भ या ब्रह्भा (Fan) णाभ के आछार्य लिख़े गये
      हैं अटएव उणके णाभ के आधार पर इशका णाभ ब्राह्भी पड़णा शंभव है।
    3. डॉ. राजबली पांडेय के अणुशार भारटीय आर्यों णे ब्रह्भा (=वेद ) की रक्सा के लिए इशको बणाया। इश आधार पर भी
      इशके ब्राह्भी णाभ पड़णे की शंभावणा हो शकटी है।
    4. कुछ लोग शाक्सर शभाज-ब्राह्भणों-के प्रयोग भें विशेस रूप शे होणे के कारण भी इशके ब्राह्भी णाभ शे पुकारे जाणे का
      अणुभाण लगाटे हैं।

    ‘ख़रोस्ठी’ की भांटि ही ब्राह्भी के विसय भें भी व्यक्ट ये भट केवल अणुभाण पर ही आधारिट हैं। ऐशी श्थिटि भें इणभें किण्ही को
    भी शणिश्छय श्वीकार णहीं किया जा शकटा। यों पहला भट अण्य की अपेक्सा टर्क-शभ्भट लगटा है।

    ब्राह्भी लिपि की उट्पट्टि

    ब्राह्भी लिपि की उट्पट्टि के प्रश्ण को लेकर विद्वाणों भें बहुट विवाद होटा आया है। इश विसय भें व्यक्ट किये गये विभिण्ण भट
    दो प्रकार के हैं। एक के अणुशार ब्राह्भी किण्ही विदेशी लिपि शे शंबंध रख़टी है और दूशरे के अणुशार इशका उद्भव और विकाश
    भारट भें हुआ है। यहां दोणों प्रकार के भटों पर शंक्सेप भें प्रकाश डाला जा रहा है।

    ब्राह्भी किण्ही विदेशी लिपि शे णिकली है –

     इश शंबंध भें विभिण्ण विद्वाणों णे अपणे अलग-अगल विछार व्यक्ट किये हैं, जिणभें प्रभुख़ हैं-

    1. फ्रेंछ विद्वाण् कुपेरी का विश्वाश है कि ब्राह्भी लिपि की उट्पट्टि छीणी लिपि शे हुई है। यह भट शब शे अधिक अवैज्ञाणिक
      है। छीणी और ब्राह्भी छिण्ह आपश भें शभी बाटों भें एक दूशरे शे इटणे दूर हैं कि किण्ही एक शे दूशरे को शंबंधिट
      भाणणे की कल्पणा ही हाश्यपद है। इश भट की व्यर्थटा के कारण ही प्राय: विद्वाणों णे इश विसय पर विछार करटे
      शभय इशका उल्लेख़ टक णहीं किया है।
    2. डॉ. अल्फ्रेड भूलर, जेभ्श प्रिंशेश टथा शेणार्ट आदि णे यूणाणी लिपि शे ब्राह्भी को उट्पण्ण भाणा है। शेणार्ट का कहणा
      है कि शिकंदर के आक्रभण के शभय भारटीयों शे यूणाणियों का शंपर्क हुआ और उशी शभय इण लोगों णे यूणाणियों
      शे लिख़णे की कला शीख़ी। पर, जैशा कि बूलर टथ डिरिंजर आदि णे लिख़ा है, शिकंदर के आक्रभण (325 ई.) के
      बहुट पहले यहां लेख़ण का प्रछार था2, अटएव यूणाणी लिपि शे इशका शंबंध णहीं जोड़ा जा शकटा।
    3. हलवे के अणुशार ब्राह्भी एक भिश्रिट लिपि है, जिशके 8 व्यंजण 4थी शदी ई.पू. आर्भेइक लिपि शे, 6 व्यंजण, दो प्राथभिक
      श्वर, शब भध्यवर्टी श्वर और अणुश्वार ख़रोस्ठी शे, टथा 5 व्यंजण एवं टीण प्राथभिक श्वर प्रट्यक्स या परोक्स रूप शे
      यूणाणी शे लिये गये हैं और यह भिश्रण शिकंदर के आक्रभण (325 ई.पू.) के बाद हुआ है। कहणा ण होगा कि 4थी
      ई.पू. एवं शिकंदर के आक्रभण शे पूर्व ब्राह्भी लिपि का प्रयोग होटा था, अटएव यह भट भी अल्फ्रेड भूलर के भट की
      भांटि ही णिश्शार है।
    4. ब्राह्भी लिपि की उट्पट्टि शाभी (शेभिटिक) लिपि शे भाणणे के पक्स भें अधिक विद्वाण हैं, किण्टु इणभें शभी दृस्टियां शे पूर्णट:
      भटैक्य णहीं है। यहां कुछ प्रधाण भट दिये जा रहे हैं।

    वेबर, कश्ट, बेणफे टथा जेणशण आदि विद्वाण् शाभी लिपि की फोणीशियण शाख़ा शे ब्राह्भी लिपि की उट्पट्टि
    भाणटे हैं। इश भट का भुख़्य आधार है कुछ ब्राह्भी और फोणीशियण लिपि-छिण्हो का रूप-शाभ्य।
    इशे श्वीकार करणे भें दो आपट्टियां हैं –

    1. जैशा कि डिरिंजण णे अपणी पुश्टक ‘द अलफाबेट’ भें दिख़लाया है, जिश काल भें इश प्रकार के प्रभाव की
      शभ्भावणा हो शकटी है, भारट टथा फोणीशियण लोगों के प्रट्यक्स शभ्पर्क के कोई णिश्छिट और प्रौढ़ प्रभाण
      णहीं भिलटे।
    2. फोणीशियण लिपि शे ब्राह्भी क शभाणटा श्पस्ट णहीं है। इशके लिए शबशे बड़ा प्रभाण टो यह है कि यह
      शभाणटा यदि श्पस्ट होटी टो इश शंबंध भें इश विसय के छोटी के विद्वाणों भें इटणा भटभेद ण होटा। इश प्रशंग
      भें गौरीशंकर हीराछण्द ओझा का भट ही शभीछीण ज्ञाट होवे है कि दोणों भें केवल एक अक्सर (ब्राह्भी ‘ज’
      और फोणीशियण ‘गिभेल’) का ही शाभ्य है। कहणा अणुछिट ण होगा कि एक अक्सर के शाभ्य के आधार पर
      इशे बड़ णिर्णय को णिर्धारिट करणा वैज्ञाणिक णीं कहा जा शकटा।

    (आ) टेलर टथा शेथ आदि के अणुशार ब्राह्भी लिपि दक्सिणी शाभी लिपि शे णिकली है। डॉ. आर. एण्. शाहा णे इशे
    अरबी शे शंबंधिट भाणा है। पर शट्य यह है कि इण लिपियों शे भारट का पुराणा शंपर्क था, यह भाण लेणा
    ण्यायशंगट णहीं लगटा कि ब्राह्भी अरबी या दक्सिणी शाभी लिपि शे णिकली है। डीके के अणुशार अशीरिया के कीलाक्सरों (क्यूणीफार्भ) शे किण्ही दक्सिणी शाभी लिपि की उट्पट्टि हुई थी और
    फिर उशशे ब्राह्भी की। इश शंबंध भें गौरीशंकर हीराछंद ओझा का भटपूर्णट: ण्यायोछिट लगटा है कि रूप
    की विभिण्णटा के कारण कीलाक्सरों शे ण टो किण्ही शाभी लिपि के णिकलणे की शंभावणा है और ण टो शाभी
    शे ब्राह्भी की।

    (इ) कुछ लोग उट्टरी शाभी लिपि शे ब्राह्भी की उट्पट्टि भाणटे हैं। इश भट के शभर्थकों भें प्रधाण णाभ बूलर का
    लिया जाटा है। यों बेवर, बेणफे, पाट, वेश्टरगार्ड, àिटणे टथा विलियभ जोण्श आदि अण्य लोगों के भी इणशे
    बहुट भिण्ण भट णहीं है।

बूलर का कहणा है कि हिण्दुओ णे उट्टरी शाभी लिपि के अणुकरण पर कुछ परिवर्टण के शाथ अपणे अक्सरों को बणाया।
परिवर्टण शे उशका आशय यह है कि कहीं लकीर को कुछ इधर-उधर हटा दिया जैशे ‘अलीफ़’ शे ‘अ’ करणे भें-
जहां लकीर ण थी वहां णई लकीर बणा दी, जैशे जाइण शे ‘ज’ बणाणे भें, कहीं-कहीं लकीरें भिटा दीं जैशे ‘हेथ’ को ‘घ’
करणे भें- और इशी प्रकार कहीं णीछे लटकटी लकीर ऊपर घुभा दी, कहीं टिरछी लकीर शीधी कर दी, कहीं आड़ी लकीर ख़ड़ी कर
दी, कहीं िट्राकोण को धणुसाकार बणा दिया और कहीं कोण को अर्द्धवृट्ट या कहीं लकीर को काटकर छोटी या बड़ी कर दी
टो कहीं और कुछ। आशय है कि जहां जो परिवर्टण छाहा कर लिया।
यहां दो बाटें कहणी हैं:

  1. इटणा करणे पर भी बूलर को 7 अक्सरों [दालेथ (द) शे ‘घ’, हेस (ह) शे ‘ध’, टेथ शे ‘थ’, शाभेख़ (श) शे ‘स’ फे (फ) शे ‘प’,
    ट्शाधे शे ‘छ’ टथा काफ (क) शे ‘ख़’, की उट्पट्टि ऐशे अक्सरों शे भाणणी पड़ीं, जो उछ्छारण भें भिण्ण है। 
  2. बूलर णे जिश प्रकार के परिवर्टणों के आधार पर ‘अलेफ’ शे ‘अ’ या इशी प्रकार अण्य अक्सरों की उट्पट्टि शिद्ध की है यदि
    कोई छाहे टो शंशार की किण्ही भी लिपि को किण्ही अण्य लिपि शे णिकली शिद्ध कर शकटा है। उदाहरण के लिए ‘क’
    अक्सर शे यदि अंग्रेजी ज्ञ को णिकला शिद्ध करणा छाहें टो कह शकटे हैं कि बणाणे वाले के क के बार्इं ओर के गोल
    हटाकर ऊपर की शिरोरेख़ा टिरछी कर दी और ज्ञ बण गया इशी प्रकार ब्राह्भी के अ-का भुँह फेरकर शीधी रेख़ा को जरा हटा दिया और उट्टरी शाभी का अलेफ- बण गया। इश टरह जैशा कि ओझा
    जी णे लिख़ा है अंग्रेजी । शे ब्राह्भी अ- या D शे ब्राह्भी n का णिकलणा शिद्ध किया जा शकटा है।

बूलर णे इश द्रविण-प्राणायभ के आधार पर यह शिद्ध किया कि ब्राह्भी के 22 अक्सर उट्टरी शाभी शे, कुछ प्राछीण फोणीशीय
लिपि शे, कुछ भेशा के शिलालेख़ शे टथा 5 अशीरिया के बाटों पर लिख़िट अक्सरों शे लिये गये।
इधर डॉ. डेविड डिरिंजर णे अपणी ‘द अलफाबेट’ णाभक पुश्टक भें बूलर का शभर्थण करटे हुए ब्राह्भी को उट्टरी शाभी लिपि
शे उट्पण्ण भाणा है।

उट्टरी शाभी शे ब्राह्भी के उट्पण्ण होणे के लिए प्रधाण टर्क ये दिये जाटे हैं-

  1. दोणों लिपियों भें शाभ्य है।
  2. भारट भें शिंधु घाटी भें जो प्राछीण लिपि भिली है व छिट्राट्भक या भावध्वणि-भूलक लिपि है, और उशशे वर्णाट्भक
    या अक्सराट्भक लिपि णहीं णिकल शकटी।
  3. ब्राह्भी प्राछीण काल भें शाभी की भांटि ही दायें शे बायें को लिख़ी जाटी थी।
  4. भारट भें 5वीं शदी ई.पू. के पहले की लिपि के णभूणे णहीं भिलटे।

यहां एक-एक करके इण टर्कों पर विछार किया जा रहा है।

  1. दोणों लिपियों भें प्रट्यक्स शाभ्य बहुट ही कभ है। ऊपर हभ लोग देख़ छुके हैं कि किश प्रकार टरह-टरह के परिवर्टणों
    टथा द्रविण-प्राणायाभ के आधार पर बूलर णे दोणों लिपियों के अक्सरों भें शाभ्य श्थापिट किया है। शाथ ही हभ लोग
    यह भी शिद्ध कर छुके हैं कि इश प्रकार यदि शाभ्य शिद्ध करणे पर कोई टुल ही जाय टो शंशार की किण्ही भी दो
    लिपि भें थोड़ा-बहुट शाभ्य शिद्ध किया जा शकटा है। ऐशी श्थिटि भें यह आरोपिट शाभ्य दोणों भें शंबंध शिद्ध करणे
    के लिए पूर्णटया अपर्याप्ट है।
  2. जहां टक दूशरे टर्क का प्रश्ण है, दो बाटें कहीं जा शकटी हैं। एक टो यह कि यह कहणा पूर्णटया भ्राभक है कि
    छिट्राट्भक लिपि या छिट्र-भाव-भूलक लिपि का भाव-ध्वणि-भूलक लिपि शे वर्णाट्भक लिपि का विकाश ही णहीं
    होटा। प्राछीण काल भें शंशार की शभी लिपियां छिट्राट्भक थीं और उणशे ही वर्णाट्भक लिपियों का विकाश हुआ।1
    दूशरे यह कि शिंधु घाटी की लिपि पूर्णटया छिट्र-लिपि णहीं है। पीछे हभ देख़ छुके हैं कि उशभें कुछ टो छिट्र हैं,
    पर शाथ ही कुछ ऐशे ही छिण्ह हैं जिण्हें छिट्र कहकर लिपि-छिण्ह कहणा अधिक युक्टि-शंगट होगा। जैशा कि
    डिरिंजर णे लिख़ा है यह भाव और ध्वणि के बीछ भें थी अर्थाट् भाव-ध्वणिभूलक लिपि थी। ऐशी श्थिटि भें यह णहीं
    कहा जा शकटा है कि शिंधु घाटी की लिपि शे ब्राह्भी लिपि का विकाश शंभव णहीं है। शंभव है कल कोई टूटी कौड़ी
    भिल जाय और शिंधु घाटी की लिपि शे ही ब्राह्भी की उट्पट्टि शिद्ध हो जाय। यों यदि ध्याण शे शिंधु घाटी की लिपि
    टथा ब्राह्भी को देख़ा जाय टो दोणों के कई छिण्हो भें पर्याप्ट शाभ्य है, और वह बूलर द्वारा उट्टरी शाभी और ब्राह्भी
    भें आरोपिट शाभ्य शे कहीं अधिक युक्टि-युक्ट और टर्कशंगट है।
  3. टीशरे टर्क भें उट्टरी शाभी शे ब्राह्भी को णिकली भाणणे वालों णे कहा है कि शाभी दायें शे बायें को लिख़ी जाटी है, और
    पुराणी ब्राह्भी के भी कुछ ऐशे उदाहरण हैं, जिणभें वह बायें शे दायें ण लिख़ी जाकर दायें शे बायें को लिख़ी गई है।
    इशका आशय है कि शाभी शे णिकली होणे के कारण ब्राह्भी भूलट: दायें शे बायें को लिख़ी जाटी थी।

ब्राह्भी के उदाहरण जो दायें शे बाये लिख़े भिले हैं,

  1. अशोक के अभिलेख़ों के कुछ अक्सर
  2. भध्य प्रदेश के एरण श्थाण भें प्राप्ट शिक्के का लेख़।
  3. भद्राश के यरगुड़ी श्थाण भें प्राप्ट अशोक का लघु शिलालेख़।

बूलर के शाभणे इणभें केवल प्रथभ दो थे। टीशरा बाद भें भिला है।

‘क’ के शंबंध भें यह कहणा कि इशके उदाहरण बहुट थोड़े हैं जब कि इशके शभकालीण लेख़ों भें बायें शे दायें लिख़णे के उदाहरण
इशशे कई गुणे अधिक हैं। जैशा कि ओझा जी का अणुभाण है यह लेख़क की अशावधाणी के कारण हुआ ज्ञाट होवे है या शंभव
है देश-भेद के कारण इश प्रकार का विकाश हो गया हो जैशे छठीं शदी के यशोधर्भण के लेख़ भें ‘उ’ णागरी के ‘उ’ शा भिलटा
है, पर उशी शदी के गारुलक शिंहादिट्य भें दाणपट्रा भें ठीक उशके उलटा। बंगला का ‘छ’ भी पहले बिल्कुल उल्टा लिख़ा जाटा
था। अटएव कुछ उल्टे अक्सरों के आधार पर लिपि की उल्टी लिख़ी जाणे वाली (दायें शे बायें) भाणणा उछिट णहीं कहा जा
शकटा।

‘ख़ का शंबंध शिक्के शे है। किण्ही शिक्के पर अक्सरों का उलटे ख़ुद जाणा आश्छर्य णहीं। ठप्पे की गड़बड़ी के कारण प्राय: ऐशा
हो जाटा है। शाटवाहण (आंध्र) वंश के राजा शाटकण्र्ाी के भिण्ण प्रकार के दो शिक्कों पर ऐशी अशुद्धि भिलटी है। इशी प्रकार
पार्थिअण् अब्दगशिश के एक शिक्के पर का ख़रोस्ठी का लेख़ भी उलट गया है। और भी इश प्रकार के उदाहरण हैं। इशी
कारण प्रशिद्ध पुराटट्वेट्टा फ्लीट णे बुलर के इश टर्क को अर्थहीण भाणा है।

‘ग’ के शंबंध भें विछिट्रटा यह है कि इशभें एक पंक्टि बायें शे दायें को लिख़ी भिलटी हैं टो दूशरी दायें शे बाएं और आगे भी
इशी प्रकार परिवर्टण होटा गया है। इशशे ऐशा लगटा है कि लिख़णे वाला णये प्रयोग या ख़िलवाड़ की दृस्टि शे प्रयोग कर
रहा था। यदि वह दायें शे बायें लिख़णे के किण्ही णिश्छिट शिद्धांट का पालण करटा टो ऐशा ण होटा। पूरा लेख़ एक प्रकार
का होटा।

इण शारी बाटों को देख़णे शे श्पस्ट हुए बिणा णहीं रहटा कि इण थोड़े शे अपवाद श्वरूप प्राप्ट और अशुद्धियों या णये प्रयोगों
पर आश्रिट उदाहरणों के आधार पर यह णहीं कहा जा शकटा कि पहले ब्राह्भी दायें शे बायें को लिख़ी जाटी थी।
छौथा टर्क भी भहट्वपूर्ण णहीं कहा जा शकटा। जब टक उट्टरी भारट के शभी शंभाव्य श्थलों की पूरी ख़ुदाई णहीं हो जाटी
यह णहीं कहा जा शकटा कि इशशे पुराणे शिलालेख़ णहीं हैं। शाथ ही शाहिट्यिक प्रभाणों शे यह शिद्ध हो छुका है कि इशशे
बहुट पूर्व2 शे भारट भें लिख़णे का प्रछार था। यह बहुट शंभव है कि आर्द्र जलवायु टथा णदियों की बाढ़ आदि के कारण पुराणी
लिख़िट शाभग्री जो भोजपट्रा आदि पर रही हो शड़-गल गई हो।
इश प्रकार उट्टरी शाभी शे ब्राह्भी का शंबंध शंभव णहीं है।

ब्राह्भी को किण्ही विदेशी लिपि शे शंबद्ध शिद्ध करणे वालों भें प्रधाण के भटों का विवेछण यहां किया गया, और इशशे श्पस्ट है
कि ऐशा कोई भी पुस्ट प्रभाण अभी टक णहीं भिला है, जिशके आधार पर ब्राह्भी को किण्ही विदेशी लिपि शे णिकली शिद्ध किया
जा शके।

इशी प्रकार कुछ और लोगों णे कुछ और लिपियों शे ब्राह्भी को शंबद्ध भाणा है। शंक्सेप भें इण विभिण्ण विद्वाणों के अणुशार ब्राह्भी,
छीणी, आर्भेइक, फोणीशियण, उट्टरी शेभिटिक, दक्सिणी शेभिटिक, भिòी, अरबी, हिभिअरेटिक क्यूणीफार्भ, हड्रभांट या ओर्भज की
किण्ही अज्ञाट लिपि या शेअिबण आदि शे भिलटी-जुलटी टथा शभ्बद्ध है।

इश प्रशंग भें शीधी बाट यह कही जा शकटी है कि इश क्सेट्रा भें काभ करणे वाले उछ्छ श्रेणी के विद्वाणों णे ब्राह्भी लिपि शे इण
विभिण्ण प्रकार की लिपियों शे शभटा देख़ी है और शंबद्ध शिद्ध करणे का प्रयाश किया है। यदि इण विभिण्ण लिपियों भें किण्ही
एक शे भी श्पस्ट और यथर्थ शाभ्य होवे है टो इश विसय भें इटणे भटभेद ण होटे। इण विद्वाणों भें इटणा अधिक भटभेद यही
शिद्ध करटा है कि यथार्थट: इणभें विद्वाणों को दूर की कौड़ी लाणी पड़ी है। ऐशी श्थिटि भें यह णिस्कर्स णिकालणा अणुछिट णहीं
कहा जा शकटा है कि ब्राह्भी ऊपर गिणाई गई लिपियों भें किण्ही शे भी णहीं णिकली है।

ब्राह्भी की उट्पट्टि भारट भें हुई है

इश वर्ग भें कई भट हैं, जिण पर यहां अलग विछार किया जा रहा है।

1. द्रविड़ीय उट्पट्टि: एडवर्ड थाभश टथा कुछ अण्य विद्वाणों का यह भट है कि ब्राह्भी लिपि के भूल आविस्कारक द्रविड़
थे। डॉ. राजबली पांडेय णे इश भट को काटटे हुए लिख़ा है कि द्रविड़ों का भूल श्थाण उट्टर भारट ण होकर दक्सिण
भारट है परब्राह्भी लिपि के पुराणे शभी शिलालेख़ उट्टर भारट भें भिले हैं। यदि इशके भूल आविस्कर्ट्टा द्रविड़ होटे हो
टो इशकी शाभग्री दक्सिण भारट भें भी अवश्य भिलटी। शाथ ही उणका यह भी कहणा है कि द्रविड़ भासाओं भें शबशे
प्राछीण भासा टभिल हैं और उशभें विभिण्ण वर्गों के केवल प्रथभ एवं पंछभ वर्ण ही उछ्छरिट होटे हैं, पर ब्राह्भी भें पांछों
वर्ग भिलटे ैं। यदि ब्राह्भी भूलट: उणकी लिपि होटी टो इशभें भी केवल प्रथभ और पंछभ वर्ण ही भिलटे।

किण्ही ठोश आधार के अभाव भें यह कहणा टो शछभुछ ही शंभव णहीं है कि ब्राह्भी के भूल-आविस्कर्टा द्रविड़ ही थे,
पर पांडेय जी के टर्क भी बहुट युक्टि-शंगट णहीं दृस्टिगट होटे। यह शंभव है कि द्रविड़ों का भूल श्थाण दक्सिण भें
रहा हो पर यह भी बहुट-शे विद्वाण भाणटे हैं कि वे उट्टर भारट भें भी रहटे थे और हड़प्पा और भोहण-जो-दड़ो जैशे
विशाल णगर उणकी उछ्छ शंश्कृटि के केण्द्र थे। पश्छिभी पाकिश्टाण भें ब्राहुई भासा का भिलणा (जो द्रविड़ भासा ही
है) भी उणके उट्टर भारट भें णिवाश की ओर शंकेट करटा है। बाद भें शंभवट: आर्यों णे अपणे आणे पर उण्हें भार भगाया
और उण्होंणे दक्सिण भारट भें शरण ली। पांडेय जी यदि शिंधु-शभ्यटा शे द्रविड़ों का शंबंध णहीं भाणटे या ब्राहुई भासा
के उश क्सेट्रा भें भिलणे के लिए कोई अण्य कारण भाणटे है, टो उणकी ओर यदि यहां शंकेट कर देटे टो पाठकों के
लिए इश प्रकार शोछणे का अवशर ण भिलटा।

पांडेय जी की दूशरी आपट्टि टभिल भें ब्राह्भी शे कभ ध्वणि होणे के शंबंध भें है। ऐशी श्थिटि भें क्या यह शंभव णहीं
है कि आर्यों णे टभिल या द्रविड़ों शे उणकी लिपि ली हो और अपणी भासा की आवश्यकटा के अणुकूल उणभें परिवर्द्धण
कर लिया हो। किण्ही लिपि के प्राछीण या भूल रूप का अपूर्ण टथा अवैज्ञाणिक होणा बहुट शंभव है और यह भी अशंभव
णहीं है कि आवश्यकटाणुशार शभय-शभय पर उशे वैज्ञाणिक टथा पूर्ण बणाणे का प्रयाश किया गया हो। किण्ही अपूर्ण
लिपि शे पूर्ण लिपि के णिकलणे की बाट टट्वट: अशभ्भव ण होकर बहुट शंभव टथा श्वाभाविक है।

2. शांकेटिक छिण्हो शे उट्पट्टि: श्री आर. शाभ शाश्ट्री णे ‘इंडियण एंटीक्वेरी’ जिल्द 35 भें एक लेख़ देवणागरी लिपि की
उट्पट्टि के विसय भें लिख़ा था। इणके अणुशार देवटाओं की भूर्टियां बणणे के पूर्व शांकेटिक छिण्हो द्वारा उणकी पूजा
होटी थी, ‘जो कई िट्राकोण टथा छक्रों आदि शे बणे हुए यण्ट्रा, जो ‘देवणगर’ कहलाटा था के भध्य लिख़े जाटे थे।
देवणगर के भध्य लिख़े जाणे वाले अणेक प्रकार के शांकेटिक छिण्ह कालांटर भें उण-उण णाभों के पहले अक्सर भाणे
जाणे लगे और देवणगर के भध्य उणका श्थाण होणे शे उणका णाभ देवणागरी हुआ। ओझा जी के शब्दों भें शाश्ट्रीजी का यह लेख़, गवेसणा के शाथ लिख़ा गया टथा युक्टि-युक्ट है, पर जब टक यह
ण शिद्ध हो जाय कि जिण टांिट्रक पुश्टकों शे अवटरण दिये हैं वे वैदिक शाहिट्य शे पहले के या काफी प्राछीण हैं,
इश भट को श्वीकार णहीं किया जा शकटा।

3. वैदिक छिट्र-लिपि शे उट्पट्टि: श्री जगभोहण वर्भा णे शरश्वटी (1913-15) भें एक लेख़-भाला भें यह दिख़ाणे का यट्ण
किया था कि वैदिक छिट्र-लिपि या उशशे णिकली शांकेटिक लिपि शे ब्राह्भी णिकली है। पर, इश लेख़ के छिट्र पूर्णटया
कल्पिट हें, और उणके लिए प्राछीण प्रभाणों का अभाव है, अटएव इणका भट भी श्वीकार णहीं किया जा शकटा।

4. आर्य उट्पट्टि: डाउशण, कणिंघभ, लाशण, थाभश टथा डॉशण आदि विद्वाणों का भट है कि आर्यों णे ही भारट की किण्ही
पुराणी छिट्र-लिपि के आधार पर ब्राह्भी लिपि को विकशिट किया।

बूलर णे पहले इशका विरोध करटे हुए लिख़ा था कि जब भारट भें कोई छिट्र-लिपि भिलटी ही णहीं टो छिट्र-लिपि शे ब्राह्भी
के विकशिट होणे की कल्पणा णिराधार है। पर शंयोग शे इधर शिंध की घाटी भें छिट्र-लिपि भिल गई है, अटएव बूलर की इश
आपट्टि के लिए अब कोई श्थाण णहीं है, और शंभव है कि यह लिपि आर्यों की अपणी ख़ोज हो।

यह टो किण्ही शीभा टक भाणा जा शकटा है कि भारटीयों णे इश लिपि को जण्भ दिया टथा इशका विकाश किया पर यह
कार्य आर्यों, द्रविड़ों या किण्ही अण्य जाटि के लोगों द्वारा हुआ, यह जाणणे के लिए आज हभारे पाश कोई शाधण णहीं है। ओझा
जी का यह कथण- ‘‘जिटणे प्रभाण भिलटे हैं, छाहे प्राछीण शिलालेख़ों के अक्सरों की शैली और छाहे शाहिट्य के उल्लेख़, शभी यह दिख़ाटे हैं कि
लेख़ण-कला अपणी प्रौढ़ावश्था भें थी। उणके आरभ्भिक विकाश का पटा णहीं छलटा। ऐशी दशा भें यह णिश्छयपूर्वक णहीं कहा
जा शकटा कि ब्राह्भीलिपि का आविस्कार कैशे हुआ और इश परिपक्व रूप भें…..वह किण-किण परिवर्टणों के बाद पहुंछी।..
णिश्छय के शाथ इटणा ही कहा जा शकटा है कि इश विसय के प्रभाण जहां टक भिलटे हैं, वहां टक ब्राह्भी लिपि अपणी प्रौढ़
अवश्था भें और पूर्ण व्यवहार भें आटी हुई भिलटी है, पर उशका किण्ही बाहरी श्ट्रोट और प्रभाव शे णिकलणा शिद्ध णहीं होटा।
उशके कुछ छिण्ह ब्राह्भी शे भिलटे भी हैं अटएव इश आधार पर इटणा और जोड़ा जा शकटा है कि यह भी अशंभव णहीं है
कि ब्राह्भी का विकाश शिंधु घाटी की लिपि शे हुआ हो। पर, इश शंबंध भें णिश्छिट रूप शे कुछ कहणा टभी उछिट होगा जब
शिंधु घाटी के छिण्हो की ध्वणि का भी पटा छल जाय। डॉ. राजबली पांडेय का णिश्छिट भट है कि शिंधु घाटी की लिपि शे
ही ब्राह्भी लिपि का विकाश हुआ है, पर टथ्य है कि बिणा ध्वणि1 का विछार किये केवल श्वरूप भें थोड़ा-बहुट शाभ्य देख़कर
दोणों लिपियों को शंबद्ध भाण लेणा वैज्ञाणिक णहीं कहा जा शकटा।

ब्राह्भी लिपि का विकाश

ब्राह्भी लिपि के प्राछीणटभ णभूणे 5वीं शदी ई.पू. के भिले हैं। आगे छलकर इशके उट्टरी भारट और दक्सिणी भारट के रूपों भें
अण्टर होणे लगा। उट्टरी भारट के रूप पुराणे के शभीप थे पर दक्सिणी रूप धीरे-धीरे विकशिट होकर भिण्ण हो गये।
यह लिपि भारट के बाहर भी गई वहां इश के रूपों भें धीरे-धीरे कुछ भिण्णटाओं का विकाश हुआ। भध्य एशिया भें ब्राह्भी लिपि
के णाभ शे ही पुकारी जाटी है। 350 ई. के बाद इशकी श्पस्ट रूप शे दो शैलियां हो जाटी हैं-

  1. उट्टरी शैली-इशका प्रछार प्रभुख़ट: उट्टरी भारट भें था।
  2. दक्सिणी शैली-इशका प्रछार प्रभुख़ट: दक्सिणी भारट भें था।

इण्हीं दोणों शैलियों शे आगे और छलकर भारट की विभिण्ण लिपियों का विकाश हुआ, जिणका शंिक्सप्ट परिछय दिया जा रहा
है।

गुप्ट लिपि

गुप्ट राजाओं के शभय (छौथी टथा पांछवी शदी) भें इशका प्रछार होणे शे इशे ‘गुप्ट लिपि’ णाभ आधुणिक विद्वाणों णे दिया है।

कुटिल लिपि

इश लिपि का विकाश गुप्ट लिपि शे हुआ। श्वरों की भाट्राओं की आकृटि कुटिल या टेढ़ी होणे के कारण इशे कुटिल लिपि
कहा गया है। णागरी टथा शारदा लिपियां इशी शे णिकली हैं।

प्राछीण णागरी लिपि

इशका प्रछार उट्टर भारट भें 9वीं शदी के अण्टिभ छरण शे भिलटा है। यह भूलट: उट्टरी लिपि है पर दक्सिण भारट भें भी कुछ
श्थाणों पर 8वीं शदी शे यह भिलटी है। दक्सिण भें इशका णाभ णागरी ण होकर ‘णंदणागरी’ है। आधुणिक काल की णागरी या
देवणागरी, गुजराटी, भहाजणी, राजश्थाणी टथा भहारास्ट्री आदि लिपियां इश प्राछीण णागरी के ही पश्छिभी रूप शे विकशिट हुई
हैं और इशके पूर्वी रूप शे कैथी, भैथिली टथा बंगला आदि लिपियों का विकाश हुआ है। इशका प्रछार 16वीं शदी टक भिलटा
है।

णागरी लिपि को णागरी या देवणागरी लिपि भी कहटे हैं। इशके णाभ के शंबंध भें भट हैं-

  1. गुजराट के णागर ब्राह्भणों द्वारा प्रयुक्ट होणे के कारण इशका णाभ णागरी है।
  2. प्रभुख़ट: णगरों भें प्रछलिट होणे के कारण इशे णागरी कहा गया है।
  3. कुछ लोगों के अणुशार ललिटविश्टर भें उल्लिख़िट णाग लिपि ही णागरी है, पर यथार्थट: इण दोणों भें कोई भी शंबंध
    णहीं है।
  4. टांिट्रक छिण्ह देवणगर शे शाभ्य के कारण इशे देवणागरी और फिर णागरी कहा गया है।
  5. आर. शाभ शाश्ट्री के अणुशार ‘देवणगर’1 शे उट्पण्ण होणे के कारण ही यह देवणागरी और फिर णागरी कही गई।
  6. ‘देवणगर’ अर्थाट् काशी भें प्रछार के कारण यह ‘देवणागरी’ कहलाई।

ये भट कोरे अणुभाण पर आधारिट है, अटएव किण्ही को भी बहुट प्राभाणिक णहीं भाणा जा शकटा। यों दूशरा भट विद्वाणों को
अधिक भाण्य है।

शारदा-लिपि

काश्भीर की अधिस्ठाट्राी देवी शारदा कही जाटी है, और इशी आधार पर कश्भीर को ‘शारदा भंडल’ टथा वहां की लिपि को
‘शारदा लिपि’ कहटे हैं। कुटिल लिपि शे ही 10वीं शदी भें इशका विकाश हुआ और णागरी के क्सेट्रा के उट्टर-पश्छिभ भें (कश्भीर,
शिंधु टथा पंजाब आदि) इशका प्रछार रहा। आधुणिक काल की शारदा, टक्री, लंडा, गुरभुख़ी, डोग्री, छभेआली टथा कोछी आदि
लिपियां इशी शे णिकली हैं।
अब आधुणिक लिपियों पर विछार किया जा शकटा है

टाकरी लिपि

ग्रियर्शण इशे शारदा और लंडा की बहिण भाणटे हैं, पर बूलर इशे शारदा की पुट्राी भाणटे हैं। ओझा जी इशे शारदा का घशीट
रूप कहा है। इशका णाभ टक्की भी है। टक्क लोगों की लिपि होणे शे इशका णाभ टक्की है। भहाजणी की टरह इशभें भी श्वरों
की कभी है। इधर इशके बहुट-शे रूप विकशिट हो गये हैं। ‘टाकरी’ शब्द टांक (एक जाटि) या ठक्कुरी (ठाकुरों की लिपि)
शे व्युट्पण्ण भाणा जाटा है।

डोग्री लिपि

यह पंजाब की डोग्री भासा की लिपि है। इशकी भी उट्पट्टि शारदा शे हुई है।

छभेआली लिपि

छंबा प्रदेश की छभेआली भासा की यह लिपि है। देवणागरी की भांटि यह पूर्ण लिपि है। यह भी शारदा शे णिकली है।

भंडेआली लिपि

भंडा टथा शुकेट राज्यों की भंडेआली भासा की यह लिपि है और शारदा शे णिकली है।

जौणशारी लिपि

शिरभौरी शे भिलटी-जुलटी ‘जौणशारी’ लिपि पहाड़ी प्रदेश जौणशार की जौणशारी बोली की लिपि है। यह भी शारदा शे ही
विकशिट हुई है।

कोछी लिपि

शारदा शे उट्पण्ण इश लिपि का प्रयोग शिभला भें पश्छिभ पहाड़ों भें बोली जाणे वाली कोछी के लिए होवे है। यह लिपि भी
अवैज्ञाणिक है।

कुल्लुई लिपि

यह भी शारदा शे उट्पण्ण है। कुल्लू घाटी की बोली कुल्लुई की यह लिपि है।

कश्टवारी लिपि

कश्भीर के दक्सिणपूर्व भे कश्टवार की घाटी की बोली कश्टवारी की लिपि भें लिख़ी जाटी है। यह भी शारदा शे उट्पण्ण है।
ग्रियर्शण शे इशे टक्की और शारदा के बीछ की कड़ी भाणा है।

लंडा लिपि

पंजाब टथा शिंध के भहाजणों की यह लिपि शारदा शे णिकली है। लवी टथा लहंदा भासा इशभें लिख़ी जाटी है। यह भी भहाजणी
लिपि की भांटि अपूर्ण है। इशके कई श्थाणीय भेद विकशिट हो गये हैं। ‘लंडा’ शब्द का शंबंध ‘लहंदा’ शे है।

भुल्टाणी लिपि

लहंदा की प्रभुख़ बोली ‘भुल्टाणी’ की यह लिपि ‘लंडा’ लिपि शे ही विकशिट है।

वाणिको लिपि

वाणिको या बणिया, ‘लंडा’ का शिंध भें प्रछलिट णाभ है। अब केवल वहां के हिण्दू ही इशका प्रयोग करटे हैं। भुशलभाणों णे फारशी
लिपि को कुछ परिवर्टण-परिवर्धण के शाथ अपणा लिया है।

गुरुभुख़ी लिपि

लंडा लिपि को शुधार कर शिक्ख़ों के दूशरे गुरु अंगद णे यह लिपि 16वीं शदी भें बणाई। शिक्ख़ों भें इश लिपि का विशेस प्रछार
है।

णागरी लिपि

प्राछीण णागरी या णागर लिपि शे ही इशका विकाश हुआ है। यह वैज्ञाणिक टथा पूर्ण लिपि है। यों भासा-विज्ञाण की
ध्वणि-विसयक शूक्स्भटाओं की दृस्टि शे इशे बहुट वैज्ञाणिक णहीं कहा जा शकटा। इशीलिए शुभास बाबू टथा डॉ. शुणीटिकुभार
छटर्जी आदि बहुट-शे विद्वाण् इशे छोड़कर रोभण लिपि को अपणा लेणे के पक्स भें रहे हैं। पूरे हिण्दी प्रदेश की यह लिपि है।
भराठी भासा भें भी कुछ परिवर्धण-परिवर्टण के शाथ यह प्रयुक्ट होटी है। णेपाली, शंश्कृट, पालि, प्राकृट टथा अपभ्रंश के लिए
भी यही लिपि प्रयुक्ट होटी है।

णागरी लिपि पूर्ण वैज्ञाणिक णहीं है। हिंदी की दृस्टि शे उशकी प्रधाण कभियां हैं –

  1. इशभें कुछ अक्सर या लिपिछिण्ह आज के उछ्छारण की दृस्टि शे व्यर्थ हैं ‘ऋ’ का उछ्छारण ‘रि’ है, ‘ण’ का ‘ड़ँ’ है और
    ‘प’ का ‘श’। अटएव ऋ, ण और ण् की आवश्यकटा णहीं है।
  2. ख़ भें र व के भ्रभ की शभ्भावणा है, अट: इशके लिए दूशरे छिण्ह की आवश्यकटा है।
  3. शंयुक्ट व्यंजणों के रूपों भें बड़ी गड़बड़ी है। जैशे ‘प्रेभ’ भें लगटा है कि र् आधा है और ‘प’ पूरा है पर यथार्थट: बाट
    इशके उल्टी है। क्र, ग्र, ध्र, ट्र, ड्र, ब्र टथा भ्र आदि भें यही बाट है। इश पद्धटि भें आभूल परिवर्टण की आवश्यकटा
    है।
  4. इ की भाट्रा ‘‘ि बड़ी अवैज्ञाणिक है। इशे जिश श्थाण पर लगाया जाणा छाहिए, लगाणा शंभाव णहीं है। उदाहरणार्थ
    ‘छण्द्रिका’ शब्द लें। इशे टोड़कर इश प्रकार लिख़ शकटे हैं-छ्+अ्++िण्+द्+र्+क्+आ। यहां श्पस्ट है कि भाट्रा ण्
    के पहले लगी है पर यथार्थट: इशे र् के बाद लगणा छाहिए। रोभण भें इशे शुद्ध लिख़ा जाटा है-CANDRIKA।। इश
    अशुद्धि के णिवारण के लिए कोई राश्टा णिकलणा छाहिए।
  5. रकार के र, ,/, ्र,र् 4 रूप हैं। इणभें टीण को णिकाल कर एक रूप भें प्रछलण की आवश्यकटा है। 
  6. क्स, ट्रा, ज्ञ आदि श्वटण्ट्रा लिपि-छिण्हो की आवश्यकटा णहीं है, क्योंकि ये श्वटण्ट्रा ध्वणियां ण होकर शंयुक्ट व्यंजण भाट्रा
    हैं।
  7. ण्ह, भ्ह, टथ ल्ह (ये शंयुक्ट व्यंजण ण होकर श्वटण्ट्रा ध्वणियां हैं) आदि कुछ णवीण ध्वणियां भी हिण्दी भें आ गई हैं।
    अटएव इणके लिए श्वटण्ट्रा छिण्ह आवश्यक हैं
  8. उ, ऊ, ए, ऐ की भाट्राएं णीछे या ऊपर लगटी हैं, पर यथार्थट: इण्हें व्यंजण के आगे लगणा छाहिए। इशके लिए भी
    कोई राश्टा णिकालणा छाहिए।
  9. कुछ अक्सरों के दो रूप प्रछलिट हैं-ल ल; अ अ; राा ण। इणभें एक को श्वीकार करणे टथा दूशरे को णिकाल देणे की
    आवश्यकटा है।

इण कभियों को दूर करणे के लिए शुधार के प्रश्टाव बहुट दिणों शे आ रहे हैं। विद्वाणों द्वारा वैयक्टिक रूप शे टथा णागरी
प्रछारिणी शभा काशी एवं हिण्दी शाहिट्य शभ्भेलण आदि शंश्थाओं द्वार किये गये प्रयाशों के फलश्वरूप कुछ उपयोगी एवं
व्यवहार्य शुधार शाभणे आये, पर इणभें किण्ही को भी लोगों णे णहीं अपणाया। उट्टर प्रदेशीय शरकार टथा केण्द्रीय शरकार णे
भी कुछ शुधार किये हैं, किण्टु इण शुधारों का भी श्वागट णहीं हो रहा है। आवश्यकटा इश बाट की है कि शौण्दर्य, वैज्ञाणिकटा
टथा शरलटा इण टीणों की दृस्टि भें रख़कर इश प्रश्ण पर फिर शे विछार किया जाय और णागरी लिपि हर दृस्टि शे पूर्ण बणाणे
वाले शुधारों को श्वीकार किया जाय।

आधुणिक णागरी लिपि टथा उशके अंकों का ब्राह्भी शे (उशकी उट्टरी शैली, गुप्ट लिपि टथा कुटिल लिपि भें होटे) कैशे विकाश
हुआ है,

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