भारत में आरक्षण की आवश्यकता

By | February 16, 2021


आरक्षण हमारे दिन-प्रतिदिन के कार्य में सदैव प्रयोग होने वाला शब्द है
इसका प्रयोग विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाता है। आरक्षण के संबंध
में यह एक यर्थाथ तथ्य है। जिसके लिये यह शब्द प्रयोग किया जाता है। वह
इससे अवश्य ही लाभान्वित होता है। अक्सर हम नित्य रेलों तथा बसों में टिकटों का
आरक्षण एवं होटलों तथा क्लबों में सीटो के लिये आरक्षण, धर्मशालाओं में कमरों के
लिये आरक्षण इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी स्वरूप में सदैव आरक्षण शब्द
का प्रयोग करता है। किन्तु प्रस्तुत शोध अध्ययन में आरक्षण शब्दों को विशेष अर्थों में
प्रयोग किया गया है। जिसका अभिप्राय समाज के पिछड़ें वर्गों के उत्थान की नीति
से संबंधित है।

उपरोक्त उद्देश्य की भावनारूप आरक्षण शब्द का प्रयोग देश-विदेश में
अनेकानेक शब्दों के माध्यमों से किया जाता है। संरक्षात्मक, विभेदीकरण, रक्षात्मक,
भेदभाव सकारात्मक संरक्षात्मक, सामाजिक वरीयता शासकीय सरंक्षण इत्यादि विभिन्न
नामों से जाना पहचाना जाता है। परन्तु शब्द चाहे कोई भी क्यों ना हो भावना सबकी
भारत से अमेरिका अथवा अन्य देषों में समान है। लेकिन फिर भी आरक्षण तथा
सकारात्मक विभेदीकरण पोजिटिव डिस्क्रिमिनेषन शब्द ही ज्यादा लोकप्रिय है।
आरक्षण का तात्पर्य प्रतियोगिताओं के नियमों में कुछ शिथिलता रखते हुए
अविकसित एवं विषेषाधिकारहीन समुदाय या वर्ग के लोगों को सफलता के उचित
एवं बेहतर अवसर प्रदान करना है।

आरक्षण की व्यवस्था का उदाहरण अनेक देशों में देखा जा सकता है। जैसे
अमेरिका, पाकिस्तान (महिला व अल्पसंख्यक), साइप्रस, नाइजीरिया, लेबनान, व
मलेशिया आदि अनके राष्ट्र हैं जहां पर विधायिका तथा सभाओं एवं सेवाओं में था
किसी अन्य रूप में आरक्षण की व्यवस्था कायम है।
डी.सी. मैगवार के मतानुसार ‘‘आरक्षण ही एक ऐसा साधन है जो विभेदीकरण
के ज्वार की दिषा को भाटे में परिवर्तित कर सकता है ‘‘। यह कथन अमेरिका के
नीग्रो (अश्वेत) के संबंध में था।

भारत के संबंध में आरक्षण से अभिप्राय समाज के दलित, कमजोर, अन्य
पिछड़ों के लिये सामान्य चयन की न्यूनतम अर्हता में शिथिलता बरतकर सरकारी
सेवाओं में भर्ती या “ौक्षणिक संस्थानों में प्रवेश का उपबंध करना है। इसके
साथ-साथ ही अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जन जाति में भी सीटों को सुरक्षित
रखना सम्मिलित हे। आरक्षण नीति को प्रभावी बनाने में भारतीय संविधान को
संकलित एवं महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। संरक्षण प्रदान करने के सन्दर्भ में
यह अन्य संविधानों की तुलना में ज्यादा उपयोगी सिद्ध हुआ है। क्योंकि भारतीय
संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक उल्लेखित आरक्षण व्यवस्था में पिछड़े वर्गों के
लिये प्रदत्त संरक्षात्मक उपायों में अमेरिका जैसे पारंपरिक सर्वहितवादी समाज से
काफी आगे है।

आरक्षण नीति के अन्तर्गत कुछ विशेष वर्गों को सरकार द्वारा रियायतें स्वीकार
की जाती है। जिसके अन्तर्गत शिक्षा संस्थानों व सार्वजनिक सेवाओं में स्थानों का
आरक्षण आर्थिक सहायता, छात्रवृतियां इत्यादि है। यह कोई विशेषाधिकार नहीं है
अपितु शासकीय रियायत है। जिसका प्रधान उद्देश्य संबंधित वर्गों को कोई विशेष
लाभ देना नहीं है। अपितु धीरे-धीरे उनके आर्थिक, सामाजिक राजनीतिक स्तर को
ऊंचा उठाना है। जिससे इन समुदायों के जीवन स्तर में भी आधारभूत परिवर्तन आ
सके।

भारत में आरक्षण की आवश्यकता

राजनीतिक निर्णयों पर आधारित आरक्षण नीति को वास्तविक अभिव्यक्ति भारत
के संविधान में प्रदत्त कानूनी आदेशों, विधायी उपकरणों, कार्यपालिका के आदेशों
तथा न्यायिक निर्णयों से प्राप्त हुई है। प्रश्न यह है कि ऐसी कौन सी आवश्यकता थी
या कौन सी शक्तियां थी जिन्होंने आरक्षण के पक्ष में राजनीतिक निर्णय लेने को
बाध्य किया तथा वे कौन से कारण हैं जो आरक्षण को वैधता प्रदान करते हैं।
भारतीय समाज एक अनोखा समाज है जहां पर मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन चक्र
विधायी कानूनों आदेशों के साथ-साथ धार्मिक या शाश्वत नियमों से भी संचालित
होता है। हिन्दू समाज में अनेक कुरीतियां अभिशाप बनकर इसको खोखला करती
रही है। उन्ही कुछ रीतियों में अस्पृश्यता या छुआछूत की भावना का प्रबल होना रहा
है। देष में एक ऐसा वर्ग भी रहा है जो सदियों से असमानता एवं उत्पीड़न को सहन
करते आया है। यह वर्ग विदेशियों के साथ-साथ स्वदेषियों का गुलाम भी रहा है।

मनुष्यों की दुनिया में पषुवत व्यवहार किया जाता था। सभी संवर्ग हिन्दू पालतू
जानवरों को बड़े प्यार से स्पर्श करते थे। कुत्ते एवं बिल्ली के छू सकते थे यहां तक
की चीटियों को शक्कर अर्पित की जा सकती थी। किन्तु अपने ही स्वधर्मी इन दलित
भाईयों के स्पर्श से अपवित्र हो जाते थे। संवर्ग व्यक्ति इनकी छाया व स्पर्श मात्र से
दूषित हो जाते थे। दलितों को सामूहिक कुओं से पानी तक भरना मना था। वे
सार्वजनिक कुंओं से पानी नहीं पी सकते थे। मंदिरों में इनका प्रवेश पूर्णत: वर्जित
था। सरकारी नौकरियों में प्रतिष्ठित व्यवसायों में उन्हें नहीं लिया जाता था। दलित
लोगों सभी हीन व अमानवीय कृत्य करने पड़ते थे। खाने पहनने पर भी हिन्दू सवर्ण
वर्ग का पूर्ण नियंत्रण था।

बात केवल यहीं तक सीमित नहीं थी। दलित दूल्हे को घोड़े पर चढ़ना मना
था, जूते पहनकर गांवों में घूमना मना था यदि कोई ऐसी हिमाकत करता तो न
केवल उसकी पिटाई होती थी बल्कि उसे हजार तरह की यातनाएं भुगतनी पड़ती
थी। भोजन के लिये उन्हें मृत जानवरों के मांस पर निर्भर रहना पड़ता था। इस
प्रकार भारतीय समाज में असमानता का नंगा नाच जारी था।

इसी अनेक विषमताओं एवं अस्पृष्यता की भावना के कारण समाज का एक
बड़ा वर्ग सामाजिक मुख्य धारा से अलग-अलग पड़ गया था, जिसके फलस्वरूप
राष्ट्र के विकास में इस बहुसंख्यक वर्ग की उर्जा का उचित उपयोग नहीं हो पा रहा
था। यह के समुदाय एक गम्भीर समस्या थी। दूसरी तरफ राष्ट्र विदेिष्यों का गुलाम
था।

यह आवष्यक था कि देष की स्वतन्त्रता के साथ-साथ दलितों एवं पिछड़ों की
सामाजिक स्वतंत्रता को भी स्थापित किया जाए। देष की आजादी के पष्चात् यह
महसूस किया गया कि स्वतंत्रता का लाभ इन वर्गों को प्राप्त हो सके। क्योंकि जब
तक दलित लोग सामाजिक शोषण एवं अपमान के षिकार रहेंगे तब तक उनके लिए
स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं होगा वे तो कल भी गुलाम हो और ऐसी स्थिति में
पिछड़े लोगों के जीवन में पर्याप्त बदलाव लाना आवश्यक है।

इसी परिप्रेक्ष्य में श्री पी. यूडिन के कथनानुसार ‘‘ यदि सामाजिक आर्थिक
व्यवस्था में परिवर्तन होने लगता है और राजनीतिक व्यवस्था इन दोनों पर निर्भर
करती है।

प्रारम्भिक में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को संविधान के अन्तर्गत
भारतीय नागरिक के रूप में आरक्षण दिया गया। उन्हें यह आरक्षण राजनीतिक
निर्णयों के कारण प्राप्त हुआ आरक्षण के द्वारा उन्हें न केवल आवश्यक सुरक्षा की
प्राप्ति हुई राष्ट्रीय स्तर पर उनके जीवन में सुधार तथा राजनीतिक व्यवस्था में उनके
सामाजिक जीवन केा भी नियंत्रित करती है। राजनीति वास्तव में आर्थिक, सामाजिक
एवं कानूनी व्यवस्थाओं को नियंत्रित करती है। जो कि एक आवष्यक निरंतर चलने
वाली प्रक्रिया है जिसमें प्रतिदिन अनेक घटनायें जन्म लेती हैं।

इस सन्दर्भ में महान विचारक अरस्तू के मतानुसार ‘‘ राजनीति एक सामान्य
नियम के अनुसार (अन्तर्गत) समूहों की विविधता तथा क्षेत्रीय इकाई के तहत
परम्पराओं तथा इस इकाई के तहत परम्पराओं तथा आकांक्षाओं के हितों से जन्म
लेती है। राजनीति विभिन्न मूल्यों तथा हितों में सामंजस्य के माध्यम से एक व्यवस्था
सुनिश्चित करने का मार्ग तथा व्यवस्था की समस्या के समाधान का मार्ग है।

अनुसूचित जातियां तथा जनजातियां अपने हितों तथा आकांक्षाओं का
प्रतिनिधित्व करती है। वे चाहती हैं कि इनका समस्याओं, शिकायतों हितों, आकांक्षाओं
को कोई सुने तथा माने जिससे नीति निर्धारण सुरक्षित महसूस कर सके। यह भी
एक यथार्थ वास्तविकता है कि अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों का दमन मात्र
एक राजनीतिक अथवा सामाजिक घटना नहीं हैं बल्कि यह एक आरक्षण सामाजिक व
सांस्कृतिक प्रक्रिया है। उन्हें दिये गए आरक्षण सामाजिक व सांस्कृतिक दमन के
विरोध में एक प्रभावशाली कदम है।

राजनीतिक तथा समाज को एक दूसरे के समीप लाया है। यही महत्वपूर्ण
राजनीतिक तथा सामाजिक कार्य आरक्षण के द्वारा किया जा सकता है।

किसी भी समाज राजनीतिक ढांचा उस समाज की प्रकृति से प्रभावित होता है।
समाज की प्रकृति को समझने के लिये हमें सामाजिक संरचना को समझना होगा। भारतीय
सामाजिक संरचना को जाति प्रथा के रूप में अच्छी तरह से समझा जा सकता है जहां जाति
के अंतर्गत प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था सन्निहित है। कई वर्षों तक जाति व्यवस्था का विकास
समाज में सामाजिक आर्थिक असमानता को बनाए रखने के लिये होता रहा। यदि कोई
व्यक्ति किसी छोटी जाति में उत्पन्न होता था तो उसे बडी़ जातियों द्वारा परेशान किया
जाता था और उसे अन्य अनेक सुविधाओं से वंचित होना पडता था। दलितो की हालत
बदतर थी। छुआछूत के व्यवहार से उनकी दशा और भी खराब हो गई।

परंपरागत वर्णव्यवस्था के अंतर्गत चार वर्ण आते है: ब्राम्हण (पुजारी और शिक्षित
वर्ग), क्षत्रिय (योद्धा और शासक वर्ग), वैश्य (व्यापारी एवं वणिक वर्ग) और शुद्र (जो तुच्छ
और प्रदूषण युक्त कार्य करते थे)।

यहां हमें यह समझ लेना चाहिए कि वर्ण व्यवस्था, जातीय वास्तविकता के बजाए
ज्यादा सैद्धांतिक है। वास्तव में चार ही जातियो का वर्गीकरण वर्ण पर आधारित किया जा
सकता है। हालांकि ऐसा करना सामाजिक संरचना के अंतिम छोर पर आसान होता है, न
कि मध्य में दूसरे शब्दों में, वर्ण व्यवस्था जाति संबंधित है।

जाति एक स्थानीय समूह होता है जो किसी व्यवसाय विशेष से पाम्परिक रूप से
जुडा होता है। जन्म का सिद्धांत जातिगत समुदायों में सदस्यता का एकमात्र आधार है
अथार्त व्यवसाय का चुनाव स्वतंत्र न होकर किसी जाति में जन्म लेने के आधार पर निर्धारित
होता है। इसके अलावा अन्य जाति समुदायो के अपने खान पान एवं विवाह संबंधी नियम
होते है। समूह ही अपने सदस्यों के रहन सहन के नियम बनाता है। जो इनके नियम नहीं
मानते उन्हे जाति बिरादरी से निकाले जाने का भी अधिकार समुदाय के पास होता है।
आधुनिक विचार धाराओ एवं संस्थाओं की दृष्टि से जातिगत पहचान मजबूत हुई है।
स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व, इसके दौरान और बाद में यह राजनीतिक लामबन्दी का एक
हथियार बनने के कारण ऐसा संभव हुआ। 

19 वीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन
ने निम्न जातियो को उनकी खराब हालत के प्रति सचेष्ट किया और वे अपने अधिकारों के
प्रति जागरूक भी हुए जिनसे उन्हे सदियों से वंचित रखा गया था। परिणामतः उनमें से
अनेक अपनी दुर्दशा को भाग्य की देन मानने को तैयार नही थे। इस जागरूकता के
फलस्वरूप शासन में लोकतांत्रिक सिद्धांतो का लागू होना दल केन्द्रित राजनीति का उदय
तथा ब्रिटिश शासको द्वारा मुसलमानो सहित पिछड़ी जातियां एक ताकत बन चुकी थी।
उनकी मांगे एवं हित अधिक दिनो तक टाले नही जा सकते थे। उसी समय राष्ट्रवादी नते ाओ
ने भी उनकी दशा सुधारने का बीड़ा उठाया।

उपर्युक्त के सदंर्भ में, संविधान निर्माताओ ने
भी सकारात्मक रवैया अपनाते हएु इन्हे समाज में दूसरे के समान स्थान दिलाने का प्रयास
किया। उन्होने समझा कि राज्य की सहायता के बिना उनके ऐतिहासिक पिछडेपन को दूर
नहीं किया जा सकता। इसलिए संविधान में आरक्षण की नीति लाई गई। पिछडे वर्गो के
अंतर्गत निम्न तीन वर्ग आते है- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडी
जातियां (ओबीसी)


स्वतंत्रता के बाद जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू किया। राजनीति में इसकी
भूमिका अधिक बढ गई। सच्चाई यह है कि आसानी से पहचान में आने वाले सामाजिक
समूह के रूप में इसकी स्थिति ने राजनीतिक दलो को इनके वोट आरै समर्थन प्राप्त करने
के लिए जातियों को राजनीतिक लामबन्दी का विषय बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय
राजनीति में जाति के मुददे को दो कारको से विशेष ध्यान ।

आरक्षण नीति 

मूल आधार

पिछडे वर्गो के पिछडेपन को देखते हुए संविधान में उनके उत्थान के लिए कुछ विशेष
प्रावधान किए गए है। विशेष प्रावधान संरक्षणात्मक भेदभाव के रूप में है। आरक्षण की नीति
एक संरक्षणात्मक विभेदी करण है। आरक्षण नीति एवं इसके संवैधानिक संरक्षात्मक प्रावधान
जानने से पहले आइए, पिछडी जातियो के लिये संवैधानिक प्रावधानो को जाने। नीति
निर्देशक सिद्धांत के अध्याय के अंतर्गत धारा 38 और 46 में कहा गया है कि राज्य का यह
कर्तव्य है कि वह जन साधारण के सामान्य और पिछडी जातियों के लिये विशेष कल्याण
का ध्यान रखे। –

धारा 38 के अनुसार- (1) राज्य को चाहिए कि वह जनता की भलाई एवं कल्याण
के लिये उसके सामाजिक, आर्थिक स्तर की असमानता को कम करने का प्रयास करे। (2)
राज्य विशेष रूप से आर्थिक स्तर की असमानता को कम करने का प्रयास करे साथ ही
आर्थिक असमानता को दूर दराज के क्षेत्रो में रहने वाले विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले
विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले लोगो के लिए कम किया जा सके।
धारा 46 के अनुसार’’ राज्य का दायित्व है कि वह गरीब तबके के लोगो को शैक्षिक,
आर्थिक स्तर पर जागरूकता लाकर उनका संवर्धन करेगा। राज्य विशेषत: अनुसुचित जाति
एवं जनजातियो को शोषण से मुक्त करके न्यायिक संरक्षण प्रदान करेगा।’’
अनुसूचित जाति और जनजातियो के लिए आरक्षण
संविधान ने पिछडी जातियो की तीन तरह से पहचान की है। इस अनुभाग में हम
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियो के लिये सरंक्षात्मक प्रावधानो की चर्चा करेंगे।
संविधान ने अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों के बारे में तीन तरह के प्रावधान सुनिश्चित
किए है-

  1. सार्वजनिक एवं सरकारी सेवाओ में नौकरियो के लिये आरक्षण 
  2. शिक्षण संस्थाअेा में आरक्षण और 
  3. विधायी प्रतिनिधित्व में आरक्षण धारा 16 (अ) 320 (4) और 333 के अनुसार
    15 प्रतिशत और 7 प्रतिशत नौकरियो में आरक्षण सभी प्रकार की सरकारी सेवाओ में
    अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए होगा। धारा 35 में यह व्यवस्था है कि प्रशासनिक
    स्तर पर भी यह आरक्षण सुनिश्चित होगा। 

धारा 15(4) शिक्षण संस्थानो की सीटो से सबं दध है। इस धारा के अनुसार राज्य को
धारा 15 या धारा 29 के उपबंध में किसी तरह का संशोधन करके सामाजिक रूप से पिछडे
वर्गो के शैक्षिक रूप से पिछडे या अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये कुछ अधिक करने
का प्रावधान है। जैसा कि संघ एवं राज्य सरकार ने पहले से ही उन शैक्षिक संस्थाओ- जो
जनता के धन से संचालित है वहां 25 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर रखी है। इसलिए
उनकी योग्यता में भी शिथिलता रखी गई है। इससे उन्हे शिक्षा के क्षत्रे में अनेक अवसर
प्राप्त हो सकेंगे। धारा 330 और 332 के अंतर्गत लोकसभा एवं विधानसभा में सीटो
जनजातियों के लिये आरक्षित है। राज्यों की विधानसभा सीटो में कुल 540 अनुसूचित
जातियों के लिए तथा 282 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है। इसके अलावा
पंचायती राज संस्थाओ के लिए भी इसी प्रकार सींटे आरक्षित है।

अन्य पिछडी जातियोंं के लिये आरक्षण 

जैसा कि हमने पहले पढ़ा है कि अन्य पिछड़ी जातियों की पहचान करने तथा
सुनिश्चित करने का काम केन्द्र तथा राज्य सरकारो पर छोड़ दिया था।
ऐसो कई राज्यों में जहाँ पिछडे वर्गो का आंदोलन मजबूत था जैसे तमिलनाडू,
आंध्रप्रदेश, गुजरात, बिहार इत्यादि में राज्य सरकारो ने लोक सेवाओ के सभी सतरो पर
नौकरियो को तथा शिक्षण संस्थाओ में सीटो को आरक्षित कर दिया है।
केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय सेवाओ में आरक्षण प्रदान करने में अपेक्षाकृत अधिक लम्बा
समय लिया। केन्द्रीय सरकार ने 1953 में अनुच्छेद 340 के अंतर्गत केलकर आयोग नियुक्त
किया था। आयोग ने 1956 में अपनी रिर्पोट सौंपी परंतु सरकार ने इसकी सिफारिशो को
लागू नहीं किया। दूसरा आयोग जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1978 में नियुक्त किया गया।
इस आयोग को मण्डल आयोग कहा गया जिसने अपनी रिपाटेर् 1982 में सरकार को सौंप
दी। इसने 3943 जातियों की पिछडी जाति के रूप में पहचान की तथा सिफारिश की कि
सभी सरकारी और अर्द्ध सरकारी नौकरियों में तथा शिक्षण संस्थाओ में इन जातियो को 27
प्रतिशत आरक्षण पद्रान किया जाए।

13 अगस्त 1990 को वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिश के
अनुरूप एक कार्यालयी ज्ञापन जारी कर अन्य पिछडी जातियो के लिये आरक्षण लागू कर
दिया। इसके तुरंत बाद बडी मात्रा में विरोध प्रदर्शन हुए । सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं
दाखिल की गई तथा उच्च न्यायालय ने दइस कायर्वाही पर प्रश्न उठाए। सर्वोच्च न्यायालय
ने इस विषय पर नवम्बर 14992 मे सुनवाई की तथा केन्द्र सरकार को इस शर्त पर अन्य
पिछडी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की अनुमति दी कि अन्य पिछड़ी जातियो की
क्रीमी लेयर को इस आरक्षण से बाहर रखा जाए। केन्द्रीय सरकार द्वारा क्रीमी लेयर की
पहचान करने के लिये रामानंद पस्राद आयोग का गठन किया गया। इसका काम पूरा होने
के बाद सरकार ने 13 अगस्त 1990के आदेश को सितंबर 1993 से लागू किया।
इस प्रकार हम देख सकते है कि केन्द्रीय सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों को
आरक्षण का लाभ अेने के लिए 40 वर्ष का समय लिया। इतना ही समय सामाजिक और
शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए जाति को एक सही आधार स्वीकार करने
में लिया गया। हमें यहां यह ध्यान भी रखना होगा कि अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण
का लाभ केवल सरकारी नौकरियों में ही दिया गया है और उनके लिए लाके सभा तथा राज्य
विधान सभाओं में कोई स्थान आरक्षित नहीं किया गया है जैसा कि अनुसूचित जातियो और
अनुसूचित जनजातियो के लिए किया गया है।

महिलाओ के लिए आरक्षण का महत्व 

महिलाएं भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग है। लेकिन भारत में अशिक्षा,
गरीबी और पिछड़े सामाजिक मूल्यों के कारण महिलाओं की स्थिति सोचनीय है। प्रचलित
परिस्थितियों के दृष्टिगत महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकाल कर उन्नति के
रास्ते पर लाने के लिए महिलाओं के लिए आरक्षण शुरू किया गया। भारतीय लोकतंत्र में
प्रत्येक प्रतिनिधिक संस्था तथा राज्य की प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण
के लिए बहस जारी है। पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत महिलाओं के लिए पंचायत, बुलाक
एव जिला स्तर पर सीटो को आरक्षित कर दिया गया है। कुछ राजनीतिक दल राज्य
विधान सभाओं तथा संसदीय चुनावों में 30 प्रतिशत टिकटो पर महिला प्रत्याशियों को चुनाव
लडवाने की बहस चला रहे है। परंतु महिला आरक्षण विधेयक अभी तक संसद में लटका
पडा है।

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