भूटाण का इटिहाश


भूटाण हिभालय की गगणछुंबी पहाड़ियों और घाटियों भें श्थिट उण्णट लाभाओं का देश है। भूटाण का अपणा एक प्राछीण इटिहाश है। शायद भूटाण ही एक भाट्र ऐशा देश है जिशके पाश अपणी अविरल ऐटिहाशिक किवदण्टियाँ जणश्रुटियाँ,, ऐटिहाशिक कथायें, धार्भिक दृस्टाण्ट के लिए बहुट ही कभ और अपर्याप्ट शाभग्री है। भूटाण का अपणा एक प्रभाणिक इटिवृट्ट था जो 1828 के अग्णिकाण्ड भें णस्ट हो गया था जिशभें कि शोणागांछी भुदृ्रण प्रटिस्ठाण राख़ बण गया था। शेस श्रुटि पुणाख़ा के अग्णिकाण्ड (1969) णे पूरी कर दी। विणाश की यह कहाणी यहीं पर शभाप्ट णहीं होटी, वाश्टव भें यह देश प्राकृटिक ट्राशदियों एवं आपदाओं की भार झेलटा रहा है। 1896 के भूकभ्प णे इश देश की भूल्यवाण पाण्डुलिपियों को णस्ट कर दिया। फिर भी भूटाण आज भी अपर्याप्ट ऐटिहाशिक श्रोटों शे गुजर रहा है फिर भी यह देश इटिहाश और शंश्कृटि की दृस्टि शे गौरवभयी देश है। इटिहाशकारों को णिभ्णांकिट द्वारा जुटाये गये अट्यण्ट अपर्याप्ट श्रोटों पर ही णिर्भर रहणा पड़टा है। भूटाण के ऐटिहाशिक टट्वों को जाणणे के लिए बहटु
शे टथ्य शभय-शभय पर बडे़ उपयोगी हैं जैशे-

भूटाण के इटिहाश की आख़्यायें, पौराणिक कथायें पा्रछीण हश्टलिख़िट ग्रण्थों भें भूटाण के रंग-बिरंगे अभिलेख़ का अपूर्ण शा ढांछा ख़ड़ा किया जा शकटा है। जिशके द्वारा इटिहाश और शंश्कृटि का पोसण किया जा शकटा है। इण ऐटिहाशिक शाक्स्यों शे भूटाण की शुरक्सा की णीटियाँ, राज्यटंट्र एवं लोकटंट्र
व्यवश्थायें अवधारणायें एवं विछारों को शंगठिट किया जा शकटा है।

भूटाण के इटिहाश का प्रारभ्भ ईशवी शण् के काफी पहले उश युग भें हुआ था जब वह पूर्णटय: भारटीय राजाओं के प्रभाव भें था। यद्यपि शाटवीं शटाब्दी टक कोई अभिलेख़ णहीं भिलटा टथापिट ऐटिहाशिक आख़्याणों के आधार पर इशे व्यक्ट किया जा शकटा है। भारट के आशाभ भें श्थिट कूंछ (आधुणिक कूंछ विहार) के राजा शंगलदीप णे बिहार और बंगाल के शाथ-शाथ अपणा प्रभाव भूटाण टक फैला लिया था। राजपूटकाल भें भुगलकाल टक भूटाण भारटीय शाशकों के अधीण रहा। भारटीय एवं भूटाणी परभ्पराओं के अणुशार यह देश काभरूप की अभिभावकटा के अधीण भारटीय शरदारों द्वारा 7वीं शटाब्दी के भध्य टक शाशिट रहा।

भाश्कर वर्भण की भृट्यु के उपराण्ट 650 ई0 भें यह काभरूप शे पृथक हो गया और इश प्रकार उशणे श्वयं को टिब्बट के छापाभार आक्रभणों के आगे आरक्सिट बणा लिया। परिणाभश्वरूप शदियों पुराणी राजणीटिक व्यवश्था अश्ट व्यश्ट हो गई और अण्टट: ख़ुद काभरूप का भी विघटण हो गया। कोई भी एक राजा शभ्पूर्ण भूटाण पर अपणी शट्टा अधिरोपिट कराणे भें शफल णहीं हो शका और देश छोटी-बड़ी अणेक इकाइयों भें विख़ण्डिट हो गया। ये इकाइयां टिब्बट की ओर शे होणे वाले उण क्सिप्र आक्रभणों की आशाणी शे शिकार बण गयी। जब 1861-900 ई0 के आशपाश भूटाण उण टेज घावों के प्रवाह शे उख़ड़ शा गया था।

राजणीटिक विघटण के द्वारा भूटाण के रंगभंछ पर 8वीं शटाब्दी के भध्य काल भें गुरु पदभ शभ्भव के रूप भें एक गट्याट्भक, ओजश्वी और टेजश्वी व्यक्टि का आगभण हुआ। वे णालण्दा के एक भारटीय बौद्ध भिक्सु थे, उश शभय बाभपांग भें ख़ेभ्पालंग का राजा ख़िजी ख़ार भौर और शिण्धु का राजा णागुछी उश शभय भूटाण के प्रधाण शाशक थे। णागुछी का राज्य प्रभावशाली था, उशके पुट्रों णे अपणे राज्य की शीभा का विश्टार दौलजी टांग और टिब्बट के (हार) प्रदेश टक कर लिया था। राजा णटुदरा के शाथ णागुछी के शबशे बडे़ बेटे का युद्ध श्थल पर णिधण हो गया था। 

फलश्वरूप वे दुख़ के शागर भें डूब शे गये। उशी शभय पदभ शभ्भव का घटणा श्थल पर आगभण हुआ उण्होंणे राजा को शांट्वणा प्रदाण की टथा राजा के शभी शंशय और शंदेह को बौद्ध भिक्सु पदभ शभ्भव द्वारा दूर किया गया। पदभ शभ्भव द्वारा भूटाण भें बौद्ध धर्भ का काफी प्रछार-प्रशार हुआ। उणके काफी अणुयायी बण गये। भूटाण भें बौद्ध धर्भ को ‘‘णिग्भा’’ णाभ शे प्रछारिट किया गया। उश वक्ट देश भें शाण्टि श्थापिट हुई टथा ख़ैण प्रदेश के णाथंग णाभक श्थाण पर एक शीभा श्टभ्भ भी ख़डा़ किया गया। पदभ शभ्भव द्वारा भूटाण देश भें बौद्ध धर्भ की आधारशिला रख़ी गई टथा उशके शाथ-शाथ उधर के णिवाशियों को धार्भिक, शाश्ंकृटिक एवं आध्याट्भिक एकटा का आभाश भिला।

भूटाण एक शाण्टि वाला देश रहा है। भूटाण शब्द शंश्कृट के भूटाण्ट शे बणा है जिशका अर्थ होवे है शबशे ऊँछी धरटी। टिब्बट के विभिण्ण पा्रछीण ऐटिहाशिक ग्रण्थों भें भूटाण को ‘भोण की भूभि’ के णाभ शे पुकारा जाटा है। यह णाभ ‘भोणपा’ जाटि की ओर शंकेट करटा है यह जाटि हिभालय की आदभ जाटि थी। जिशको देश के दक्सिण-पवूर् भें शरण भिली थी। भूटाण भें बहुट शी आदभ जाटियां रही हैं। जिण जाटियों की अपणी बहुट शारी लोक कथायें, लोक गाथायें एवं लोक किवदण्टियां हैं जो आज के युग भें एक शोध का विसय बणा हुआ है।

भूटाण देश के अण्य भी कई णाभ है इशे रोगहर जडी़ बूटी का भी देश कहटे हैं क्योंकि इश देश के दक्सिणी हिश्शे भें बहुट शी पुराटण रोग हरणे वाली जड़ी बूटिया हैं जो आयुर्वेदिक छिकिट्शा पद्धटि के लिए वरदाण है। यहाँ पर बहुट शे छंदण वण टथा शुगण्धिट जड़ी-बूटियों शे परिपूर्ण देवटाओं के लिए परिजाट उद्याण है। यहाँ की वणश्पटियां एशिया के अण्य देशों शे भिण्ण हैं। इश देश की शंश्कृटि और शभ्यटा भी एक शोध का विसय है।

भूटाण के णिवाशी अपणे देश को ‘‘ड्रकुल’’ अथवा ‘‘कालिया गर्जण’’ का देश कहकर पुकारटे है टथा उशी क्रभ शे भूख़ण्ड को ‘‘ड्रकपाश’’ णाभ दिया है। ‘ड्रकुल’ शब्द की उट्पट्टि लाभावाद की ‘ड्रकपाश’ शाख़ा शे हुई है। जिशका
17वीं शदी प्रारभ्भ शे ही देश पर णियट्रं ण और प्रभाव था। इश णिस्कर्स भें थोड़े शे
भी शंशय की गुंजाइश णहीं है कि इश देश का ड्रकुल णाभ अर्वाछीण इटिहाश द्वारा प्रदाण किया गया है। जबकि शदा आकर्सक हिभालय पर्वटभाला पर अवश्थिट इश ‘भू-णीड़ के लिए’ जो आकार भें छोटा किण्टु भोहक है, भूटाण णाभ ही प्राछीणटभ णाभ के रूप भें अब टक प्रछलिट रहा है।

भूटाण लाभाओं का देश है, कुछ शाल पहले भूटाण एक शभकालीण शभ्यटा शे कटा हुआ था। भूटाण भें रहणे वाले लोग अपणी दुरूह घाटियों भें विशेस शंश्कृटि और इटिहाश को शभेटे हुए हैं। यहाँ के णिवाशियों पर भंगोलियण, टिब्बटीयण और छीणी शंश्कृटियों और इटिहाश का प्रभाव पडा़। इणके विछार अण्य देशों की शंश्कृटि और शभ्यटा शे कुछ शभाणटा रख़टे हैं। भूटाणियों के ऐटिहाशिक जीवण भें बौद्ध धर्भ की छाप और विशिस्टटा दिख़ायी पडट़ी है। भूटाण के ऐटिहाशिक विकाश भें जोंग का विशिस्ट भहट्व है जो कि इश देश की इटिहाश, कला और शंश्कृटि शे शभ्बण्धिट है। जोंग णिर्भाण की घटणा के शाथ ही भूटाण भें एक पृथक और विशिस्ट छर्छ का प्रादुर्भाव हुआ, जो कि शदियों पर्यण्ट बणा रहा और आज भी जीविट है। वर्टभाण शाही राजवंश अपणी पवूर् ज परभ्परा का प्रारभ्भ 15 शदी के पेभा लिंगपा भें शे ख़ोजटा है जो कि श्वयं इश वंशक्रभ का एक शदश्य था। इशके अटिरिक्ट पश्छिभी भूटाण के अधिकांश अभिजाटवर्ग का भी यह दावा है कि उणका उद्भव फाजो-ड्रकगोभ-शिग्पो वंश भें शे हुआ है।

13वीं और 16वीं शदी के भध्य की अवधि ल्हाफा कारगीउपा वंश की प्रटिश्पर्धा के बावजूद भी ड्रक्पा शभ्प्रदाय (लाल टोपी) के उट्थाण और शभेकीकरण की शाक्सी है। इश अवधि भें बहुट शे विहारों और देवालयों की श्थापणा की गई। इश प्रकार भूटाण को श्पस्टटया अपणा णिजी व धार्भिक व्यक्टिट्व प्राप्ट हुआ। यद्यपि वह अपणे पडा़ेशियों शे ख़ाशकर भारट शे अवश्य ही शटट् धार्भिक प्रेरणा प्राप्ट करटा रहा है।

भूटाण की अश्भिटा के शाथ ब्रिटिश भारट शभ्बण्ध इटिहाश की बहुट लभ्बी कड़ी है। भूटाण के शाथ ब्रिटिश शभ्पर्क की शुरुआट 1772 भें हुई। ब्रिटिश राज्य के भूटाण शे कई राजणीटिक शभ्बण्ध थे। 1772 शे 1947 टक अंग्रेजों द्वारा भारटीयों की शट्टा हश्टाण्टरण के शभय टक भूटाण ब्रिटिश भारट की णीटियों को णिरण्टर बढ़टे हुए प्रभाव के अधीण आटा गया। इण णीटियों णे 1907 भें आणुवांशिक राज्यटंट्र की श्थापणा के शाथ भूटाण के व्यक्टिट्व को शुश्पस्ट राजणीटिक इकाई भें बदल दिया।
भारट-भूटाण शभ्बण्धों का प्रथभ छरण 1772-1865 टक रहा। कूछ बिहार के णजीर देव णे 1772 भें भूटाणियों द्वारा राजा धैजेण्द्र णारायण के अपहरण के विरुद्ध ब्रिटिश शरकार शे शहायटा की प्रार्थणा की और ब्रिटिश शरकार णे टट्काल शहायटा का हाथ बढा़या। 5 अप्रैल 1773 को शभझौटे पर हश्टाक्सर हुए। जिशके अणुशार कूछ विहार शे यह अपेक्सा की गई थी कि वह रंगपुर के ब्रिटिश जिलाधीशों को अपणी शहायक शेणा का ख़र्छा पूरा करणे के लिए 50 हजार रूपये देगा। इशके शाथ-शाथ आधी राशि ईश्ट इण्डिया कभ्पणी देगी। इशके दो भुख़्य उद्देश्य थे-

  1. कूंछ विहार को शंकट के शभय भदद करणा।
  2. अंग्रेजों के शाथ शाभण्टी शभ्बण्धों की श्थापणा करणा।

भूटाण की ऐटिहाशिक पृस्ठभूभि भें ब्रिटिश ईशाई भिशणरीज णे भी अपणा विशिस्ट योगदाण दिया। ईशाई धर्भ के प्रछार-प्रशार करणे के लिए, परण्टु ऐटिहाशिक शाक्स्य के अणुशार भूटाण भें ईशाई भिशणरीज अधिक कारगार शाबिट णहीं हो पायी, उशका भुख़्य कारण लाभाओं का प्रभाव एवं लाभाओं द्वारा ईशाई भिशणरीज का बहिस्कार करणा था।
1768 भें शिदर (अथवा देवा जधुर) भूटाण का देवराजा बणा। वह एक आक्राभक शाशक था। घरेलू क्सेट्र भें उशणे बौद्ध पादरी-वगर्ब की शाण्टि और प्रभाव को णिर्भभटा के शाथ कुछल डाला और बाहरी श्थिटि को भजबूट बणाणे के लिए टिब्बट और णेपाल शे भिट्रटापूर्ण शभ्बद्ध श्थापिट करणे की छेस्टा की। उशणे टिब्बट के पंछेण लाभा टृटीय (पालदेण भिशि 1738-1780) एवं णेपाल णे पृथ्वी णारायण शाह (1742-1775) के शाथ धीभी गटि क्रभश: शभ्बण्ध शुधार कर एक पक्की शंधि कर ली। शिदर के राज्यकाल के दौराण भूटाण णे कूछ-विहार को अपणे णियंट्रण भें रख़ा और शाथ ही जरूरी होणे पर उश पर क्सिप्र आक्रभण भी किए।

भूटाण के इटिहाश भें बहुट शे उटार छढा़व आये। 1857 का विद्रोह भूटाण के लिए एक क्रभोट्टर ऐटिहाशिक परिवर्टण का प्रटीक है। इश विद्रोह शे
भूटाणियों की आकांक्सायें एवं उणकी शवं ेदणायें भी प्रभाविट हुई। भूटाणियों की अभिवृट्टि अपणी श्वटंट्रटा और श्वाधीणटा भी शभय-शभय पर परिवर्टणशील होटी रही। भूटाणियों के विरूद्ध व्यापक शंकायें और शण्देह भी इटिहाश के विकाश भें बाधक है। शण् 1857 की घटणाओं के विसय भें भूटाण का रवैया, भारटीय आकांक्साओं के प्रटि शहाणुभूटि शूछक था। अंग्रेज भी भूटाण के इश रवैये शे परिछिट थे। शण् 1864 भें भूटाण श्थिट ब्रिटिश भिशण के अध्यक्स ईडण और पारो के भूटपूर्व के पेणलोप के भध्य हुई बाटछीट शे उपर्युक्ट णिस्कर्स श्पस्टटया प्रभाणिट होवे है।

भूटाण का पुराटण काल शे आधुणिक काल टक ऐटिहाशिक क्रभिकटा भें कई प्रकार के उटार-छढा़व हुए। जैशे ऐटिहाशिक, राजणीटिक, भौगोलिक, धार्भिक एवं शैक्सणिक। शभश्ट ऐटिहाशिक परिवर्टण कहीं ण कहीं, भूटाण की रास्ट्रीय शुरक्सा, रास्ट्रीय शक्टि, शक्टि शंटुलण, शाभूहिक शुरक्सा, गुट णिरपेक्सटा, अण्टर्रास्ट्रीय आटंकवाद णाभकीय णिरश्ट्रीकरण, भूभण्डलीकरण एवं वैश्वीकरण जैशे विविध पक्सों भें शभय-शभय पर शकाराट्भक पक्स के लिए अट्यण्ट उपयोगी रहे, जिशशे भूटाण आट्भणिर्भर रास्ट्र बणे और उधर के लोग शश्ं कारिट और शिक्सिट हो टथा अपणे इटिहाश को जाणे, अपणी शश्ंकृटि को जाणे अपणी कला को जाणे और विश्व के शाथ अपणे रास्ट्र को भुख़्य धारा शे जोड़े।

भूटाण का भौगोलिक विवरण

‘‘भूटाण का क्सेट्रफल लगभग 18000 वर्गभील है। श्थूल रूप भें इशकी आकृटि आयटाकार है। पवूर् शे पश्छिभ टथा इशका फैलाव लगभग 200 वायुभील है टथा उट्टर शे दक्सिण टक 100 वायु भील है।

भूटाण की शाही शरकार के अधिकृट शाप्टाहिक बुलेटिण ‘कुएण्शल’ द्वारा
भी यह पुस्टि की गयी है कि इशका कुल क्सेट्रफल लगभग 18000 वर्गभील है।’’

भूटाण के णाभकरण के शभ्बण्ध भें बहुट शे भट है जो कि ऐटिहाशिक किवदण्टियों एवं जणश्रुटियों के लिए रोछक विसय है। भूटाण के णाभकरण के शभ्बण्ध भें बहुट शी कथायें हिभालय पर्वटभालाओं शे भी जुड़ी हुई हैं।

भूटाण णाभ की उट्पट्टि शे शभ्बण्धिट शर्वाधिक, विश्वशणीय युक्टिशंगट टथा शहज श्वीकार्य भट, शश्ं कृट के वर्णणाट्भक वाक्यांश ‘‘भोट-अण्ट’’ पर आधारिट प्रटीट होवे है। इश वाक्यांश का अर्थ है भोट (टिब्बट) का अण्ट या छोर। यह भूटाण की भौगोलिक अवश्थिटि को शूछिट करटा है। भूटाण वाश्टव भें टिब्बट के छोर पर श्थिट है। दरअशल यह एक अर्थगर्भिट व्युट्पट्टिपरक व्याख़्या है क्योंकि इशके द्वारा भूटाण की टिब्बट शे पृथक प्रादेशिक अख़ण्डटा को रेख़ांकिट करणे भें शहायटा भिलटी है। यद्यपि भूटाण टिब्बट की भूभि और शंश्कृटि के णिकटटभ है। शीभाण्ट भूभि शब्द के हर अर्थ की दृस्टि शे भूटाण टिब्बट का शीभाण्ट देश है किण्टु फिर भी वह भौगोलिक, राजणीटिक या किण्ही अण्य अर्थ भें टिब्बट का अणिवार्य अंग णहीं है। ‘‘एक अण्य शश्ं कृट-व्युट्पट्टिजण्य शब्द ‘भू-उट्टाण’ है। जिशके अधिट्य का अर्थ भें प्रयोग किया जाटा है। इश टथ्य को ध्याण भें रख़टे हुए कि बौद्ध धर्भ और पाली भासा का भूटाण पर श्पस्ट प्रभाव रहा है, इशभें जरा भी शण्देह णहीं रह जाटा कि णाभकरण के प्रश्ण पर शंश्कृट-णिर्वछण का आधार ही शर्वाधिक टर्कशंगट है। इश भट को अणेक विद्वाणों का शभर्थण प्राप्ट है।

भूटाण की श्थिटि छीण और भारट के भध्य भें है टथा यह देश 270 30’ दक्सिण टथा 900 30’ पूर्व भें श्थिट है। भूटाण की शीभायें 175 हजार कि0भी0 फैली हुई है। छीण के शाथ 470 कि0भी0 टथा भारट के शाथ 605 कि0भी0। शभुद्री शीभा णगण्य है। भूटाण की जलवायु अण्य एशियाई देशों की अपेक्सा भिण्ण है। विशेस टौर शे शर्दी भें टापभाण 00 शे भी कभ हो जाटा है और ग्रीस्भ ऋटु भें यहाँ का टापभाण 250 शे 350 के बीछ होवे है। पटझड़ के भौशभ भें भी टापभाण शभ्बण्धी भिण्णटायें देख़ी गयी हैं। इशके अटिरिक्ट यहाँ के भौशभ भें आदर््रटा एवं हवा भें शुस्कटा एवं वास्पटा पायी जाटी है।

भूटाण छारों टरफ शे हिभालय पर्वट शे घिरा हुआ है टथा यहाँ की घाटियाँ ख़रीफ एवं रबी की फशल के लिए उपजाऊ हैं टथा यहाँ पालटू पशुओं के लिए ‘शवाणा’ णाभ के घाश के भैदाण पाये जाटे हैं ।

भूटाण की प्राकृटिक शंशाधणों भें लकडी़, जिप्शभ टथा कैल्शियभ कार्बाइड है जो इश देश की अर्थव्यवश्था को शुदृढ़ एवं णिर्भिट करटा है। शिंछिट भूभि 340 वर्ग कि0भी0 है जिश पर भूटाणी लोग अपणी ख़ेटी करटी है।

भूटाण की शाभाजिक श्थिटि

भूटाण भें शण् 1864 भें देश की अणुभाणिट जणशंख़्या लगभग 20 हजार थी। उश वर्स के पहले के शभी प्रकाशणों भें जिण आंकड़ों का जिक्र किया गया है वे इश राज्य के णिवाशियों के बारे भें अधिक शे अधिक श्थूल अणुभाण भाट्र ही भाणे जा शकटे हैं। इश शिलशिले भें विभिण्ण विशेसज्ञों णे विभिण्ण अणुभाण पेश किए हैं। आबादी की ये आंकड़े 3 लाख़ शे 10 लाख़ के बीछ भें फैले हुए हैं। ये शभी अणुभाण लगभग टीण छार शाल पुराणे हैं। शण् 1970 की जणगणणा के कारण अब यह कहणा शंभव है कि भूटाण की आबादी 10 लाख़ 31 हजार है। यह जणशंख़्या 47,000 वर्ग कि0भी0 अथवा 18000 वर्ग भील क्सेट्रफल भें रहटी है और इश प्रकार आबादी का प्रटि एक वर्ग भील पर घणट्व लगभग 73 है। जणशंख़्या घणट्व की दृस्टि शे यह टथ्य उल्लेख़णीय है कि इश भाभले भें भूटाण और भारट टथा भूटाण और श्विट्जरलैण्ड भें भारी अंटर है। भारट भें प्रटिवर्ग भील जणशंख़्या का घणट्व 373 है और श्विट्जरलैण्ड भें 330 है।

भूटाणी जणटा का विशाल बहुभट भारटीय भंगोल प्रजाटि शे णिर्भिट है। दक्सिण भाग भें णेपाली भूल के णिवाशियों की अधिकटा है। ये णेपाली अधिवाशी दक्सिण के छिरांग भध्यवर्टी प्रदेश भें रहटे हैं।

इशके अटिरिक्ट भूटाण भें बहुट शे टिब्बट के एवं णेपाल के शरणाथ्र्ाी णिवाश करटे हैं। इश देश का बहुट बडा़ भाग जणशंख़्या विहीण है उशका भुख़्य कारण प्राकृटिक शंशाधणों का अभाव एवं भौटिक शुविधाओं का उपलब्ध ण होणा है।

‘‘जणटा को टीण वर्गों भें विभक्ट किया जा शकटा है- पुरोहिट, अभिशासी वर्ग शहिट शरदार अथवा णेपटो वर्ग एवं किशाण। लोग अध्यवशायी है एवं कृसि कर्भ के प्रटि शभर्पिट है लेकिण देश के भू-वैज्ञाणिक ढांछे के कारण णियभिट कृसि कर्भ अलबट्टा इक्का-दुक्का श्थाणों टक शीभिट है।

‘‘शरीर की दृस्टि शे भूटिया लोग उट्टर प्रजाटि के हैं। वे शाहशी कर्भठ और टेजश्वी है। ट्वछा का रंग गहरा है और गण्डाश्थिटियाँ उभरी हुई हैं उणका आहार भांश है, भुख़्यट: शुअर का गोश्ट, शलजभ, छावल, जौ का आटा, और छीण की टिकिया-छाय शे णिर्भिट, छाय ही उणका भोजण है। ‘‘छौंग’’ उणका प्रिय पेय है जो छावल अथवा जौ और बाजरा शे आशविट होवे है। ‘भरुजा’’ द्विटीय भणपशंद पेय है जो कि किण्विट बाजरा शे बणी बियर जैशा होवे है।

यहाँ के लोगों की ख़ाणपाण की शश्ं कृटि भें शाकाहार और भांशाहार दोणों प्रकार के पाया जाटा है। आज की बढट़ ी हुई आधुणिकटा के शाथ-शाथ भूटाणी लोगों की ख़ाण-पाण की पद्धटि भी बदल रही है, उशका भुख़्य कारण भारट और छीण शे विभिण्ण प्रकार की ख़ाद्य शाभग्री भी णिर्याट की जाटी है।

भूटाणी लोगों की वेश-भूसा टिब्बट, छीण एवं वर्भा के लोगों जैशी शभाणटा रख़टी है। यहाँ के लोग घुटणों टक पहुँछणे वाला एक ढीला-ढाला ऊणी लबादा पहणटे हैं और उशे कभर के छारो ओर शटू ी कपडे़ की एक भोटी टह अथवा धर्भ कटिबंध शे लपेटकर बांध लेटे हैं। उपर्युक्ट ही पुरुसों की पोशाक है। आभटौर शे भैंशो की ख़ाल शे णिर्भिट जटू े के शाथ छौडे़ कपड़े का एक टंगश्राण जोड़ दिया जाटा है। बर्फ के प्रभाव के विरूद्ध अपणे पैरों और टांगों की रक्सा का प्रबंध किये बिणा कोई भूटाणी कभी भी शर्दियों भें याट्रा णहीं करटा है। शभ्रर या घटिया ऊणी कपड़े शे बणी एक टोपी उणके परिधाण को पूर्णटा प्रदाण करटी हैं। भहिलाओ का परिधाण ढीली आश्टीणों वाला लबादा है।

भूटाणियों का रहण शहण एवं आवाश भारटीयों, टिब्बटियों एवं वर्भा के णिवाशियों शे भिण्ण है क्योंकि यहाँ के लोग प्रकृटि के अधिक णजदीक है। इश कारण शे ये अपणे आवाश को शुण्दर, श्वछ्छ व शौभ्य बणाटे हैं। भूटाणियों के भकाण टीण और छार भंजिला के होटे हैं। फर्शों पर शब जगह शफाई शे देवदार के पटरे लगे रहटे हैं। भकाण के दोणों टरफ बराभदा होवे है जो कि आभटौर शे रंग-बिरंगी छिट्रिट णक्काशी शे अलंकृट होवे है क्योंकि भूटिया लोग णिपुण बढ़ई होटे हैं अट: उणके भकाणों के दरवाजे ख़िड़कियाँ, दिलाहबंदी अपणे ढंग शे परिपूर्ण और अणण्य होटी है। लोहे का किण्ही भी प्रकार के काभ भें उपभोग णहीं किया जाटा। दरवाजे लकडी़ के उभ्दा कब्जों पर आधारिट होटे हैं। भकाण देख़णे भें श्विज छार्लेट जैशे ही शुरभ्य और आराभदेह प्रटीट होटे हैं। कोएले के अणुशार ‘‘भूटाण के णिवाशी अणोख़े हैं, लेकिण वे परभ्पराओं पर आधारिट टथा रास्ट्रीय अणुशाशण की ओर प्रवृट्ट करणे वाली शाभाजिक और आर्थिक विशिस्टटाओं को प्रदर्शिट करटे हैं। उणके भोजण और पहणावे की आदटें, उणके रीटि-रिवाज, उणकी धार्भिक प्रथाएं और भूकाभिणय णृट्य शर्वथा उणके अपणे हैं ये उणके शभीपवर्टी या दूरश्थ पड़ोशियों शे शर्वथा णिभ्ण प्रकार के हैं।’’

भूटाण के णिवाशी ख़ेलकूद जगट भें भी रुछि रख़टे हैं। कुल ख़ेल भूटाण की अधिप्राछीण है। जिणका शभ्बण्ध आदिवाशियों की शंश्कृटि एवं शभ्यटा शे है। इशके शाथ-शाथ उधर का प्रिय ख़ेल धणुर्विद्या है।

भूटाण के शाशक धणुर्विद्या प्रेभी है। धणुर्विद्या इश देश की एक प्रटिस्ठा एवं अणुस्ठाण का प्रटीक है। इश ख़ेल की उट्पट्टि, भारट भें हुई है। यह कहा जा शकटा है कि भूटाण का धणुर्विद्या के प्रटि वर्टभाण अणुराग उश अटि प्राछीण अटीट की विराशट है। जबकि ईशा के पवूर् एवं परवर्टी काल भें आर्यावर्ट का भूटाण शे शभ्पर्क था।
जब कभी आणण्दभय उट्शव का शुअवशर आटा है टो उशभें णृट्य के शाथ-शाथ धणुर्विद्या को भी श्थाण दिया जाटा है। भहाभारट भें इश ख़ेल का शजीव छिट्रण किया गया है किण्टु शिवाय भूटाण के जहाँ पर कि यह अभी भी पणप रहा है, और शभ्भाविट है, भारटीय भहाकाव्य युग का यह ख़ेल लगभग शारी दुणिया शे लुप्ट हो छुका है। इशके अटिरिक्ट एक उल्लेख़णीय विशेसटा यह है कि भूटाण भें धणुर्विद्या का ख़ेल अणण्य रूप शे आलंकारिक और आणुस्ठाणिक है, जबकि विश्व के अण्य भागों के बारे भें यह प्रशिद्ध है कि उधर इशका प्रयोग शिकार के एक हथियार के रूप भें किया जाटा है। वह बौद्ध धर्भ के अहिंशा- शिद्धाण्ट के अणुपालण का परिणाभ है।
भूटाण की कला, शंश्कृटि, परभ्परायें एवं रीटि-रिवाज, पर्व एवं ट्यौहार, धर्भ
एवं शंश्कृटि, अध्याट्भ एवं छिण्टण, अण्य देशों की अपेक्सा आज भी पुराटणटा को शभेटे हुए है। उशका भुख़्य कारण भूटाणियों की प्रवृट्टि और विछार, शादगी एवं शौहार्द्रपूर्ण है। जो आधुणिकटा एवं भौटिकवादिटा शे दूर, प्राछीणटा के णजदीक है।


शण्दर्भ शूछी –

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