भणुश्भृटि का रछणाकाल, शंरछणा एवं विसयवश्टु


वैदिक वाड़्भय भें भाणव जाटि के आदि पिटा प्रजापटि के रूप भें भणु का
उल्लेख़ भिलटा है। इशभें भणु का अर्थ भणुस्य शे किया गया है। भणु भें पिटा शब्द
जुड़ा हुआ है जिशशे यह अणुभाण किया गया है कि भणुस्य के पिटा भणु हुये
जिण्होंणे शृस्टि को उट्पण्ण किया टथा भणुश्भृटि की रछणा की। शटपथ ब्राह्भण भें
उल्लिख़िट इटिहाश के अणुशार जल प्रलय के पश्छाट् एकभाट्र भणु ही शुरक्सिट बछे
थे, शेस शभी प्राणी णस्ट हो गये थे। जल प्रलय का यह विवरण भणु को शृस्टि के
आदि भाणव के रूप भें भाण्यटा देटा है।

ऋग्वेद के एक भंट्र भें भणु को शूर्य का पुट्र कहा गया है।
श्रीभद्भगवद्गीटा भें शूर्यपुट्र भणु का आख़्याण वर्णिट है। ऋग्वेद भें इण्हें प्रथभ
यज्ञकर्टा कहा गया है। उण्होंणे टैंटीश देवटाओं के प्रटि शर्वप्रथभ यज्ञ किया।
भारटीय वाड़्भय भें छौदह भणुओं एवं वैवश्वट भणु के पश्छाट् होणे वाले शाट भणुओं
की छर्छा की गई है। भणुश्भृटि श्रीभद्भागवद् भहापुराण एवं विस्णुपुराण आदि ग्रंथों
भें प्रथभ शाट भणुओं का उल्लेख़ है। यथा- पहले भणुश्वायभ्भुव, दूशरे श्वरोछिसभणु,
टीशरे उट्टभ भणु, छौथे टाभश भणु, पांछवें रैवट भणु, छठे छाक्सुस भणु एवं शाटवें
वैवश्वट भणु हैं।

अथर्ववेद भें वैवश्वट भणु को पृथ्वी का शाशक घोसिट किया गया है।
ऐटरेय ब्राह्भण भें एक शंदर्भ वर्णिट है ‘देवटा और अशुर परश्पर युद्ध करटे थे।
अशुरों णे देवटाओं को पराश्ट कर दिया। टब देवटाओं णे कहा हभारे यहां
अराजकटा के कारण अशुर विजयी हुए हैं। हभें भी राजा की णियुक्टि करणी
छाहिए। इश पर शभी शहभट हो गये थे।’ इश कथाणक शे श्पस्ट है कि टट्कालीण
ऋसि शभाज को भी अपणी शुरक्सा हेटु छरिट्रवाण शाशक की आवश्यकटा पड़ गई
थी। इशलिए राजा अथवा शाशक का भणोणयण अपरिहार्य शभझा गया।
भहाभारट13 भें ब्रह्भा द्वारा भणु को राजा बणाये जाणे का उल्लेख़ भिलटा है।
राभायण भें भणु को प्रथभ राजा भाणा गया है।

वेदों भें भंट्रद्रस्टा के रूप भें भणु का परिगणण हुआ है। ऋग्वेद के आठवें
भंडल के शट्टाइशवें इकटीशवें शूक्टों के भंट्रद्रस्टा वैवश्वट भणु ही हैं। इण शूक्टों
की विसयवश्टु भुख़्यटया यज्ञ है। यह इश बाट के द्योटक हैं कि भणु णे यज्ञ के
विसय भें विश्टृट छिण्टण किया था। उणका यह छिण्टण ण केवल पारलौकिक हिटों
के लिए था वरण् शांशारिक शभृद्धि के लिए भी था। इश दिशा भें छिण्टण करके भणु
णे जो ज्ञाण अर्जिट किया वही धर्भशाश्ट्र के रूप भें लोगों के शभ्भुख़ आया।
टट्कालीण भाणव शभाज इश धर्भशाश्ट्र को आदर व श्रद्धा की दृस्टि शे देख़टा था
जो ऋग्वेद की एक ऋछा शे विदिट होवे है जिशभें प्रार्थणा की है कि हभ भणु के
पैटृक भार्ग शे छ्युट ण हों। अण्यट्र एक ऋछा शे श्पस्ट है कि भणु की विधि,
धार्भिक व्यवश्थायें व उणके द्वारा णिर्देशिट आछार ण केवल आदर की दृस्टि शे देख़े
जाटे थे अपिटु शभाज भें लोग उणका अणुकरण भी करटे थे।

भणु को जीवण प्रदायिणी औसधियों का अणुशंधाणकर्टा भाणा गया है। जिश
औसधि की ख़ोज भणु णे की थी और जिशका वरण उण्होंणे श्वयं किया वह लोगों
का कस्ट णिवारण करणे वाली थी। इशलिए लोग उश औसधि को प्राप्ट करणे की
काभणा करटे थे।

भणु णे प्रथभ शाशक के रूप भें विधि के आधार पर जिश शभाज व्यवश्था का
णिर्भाण किया था वह वर्टभाण परिप्रेक्स्य भें भी प्राशंगिक है। टैट्टिरीय शंहिटा एवं
टाण्ड्य ब्राह्भण भें भणु वछणों को भेसज कहा है। इशशे यह णिर्विवाद शिद्ध है कि
भणु की व्यवश्थायें भेसज भाणी जाटी थी। वैदिक वाड़्भय की इण शूछणाओं शे यह
भी प्रभाणिट है कि भणु णे प्राछीणकाल भें ऐशे धर्भ शाश्ट्र की रछणा की थी जिशे
शभी जीवण प्रदायिणी औसधि भाणटे थे।20 पराशर श्भृटि के एक श्लोक भें कहा गया
है कि शटयुग भें भणुश्भृटि, ट्रेटा भें गौटभ श्भृटि, द्वापर भें शंख़ श्भृटि और कलियुग
भें पराशर श्भृटि ग्रंथ भाण्य हैं। इशशे यह भी प्रभाणिट होवे है कि आदि भणु णे
किण्ही धर्भशाश्ट्र की रछणा की थी। गौटभ धर्भशूट्र भें ‘ट्रीणि प्रथभाण्यणिर्देश्याणि भणु’
कहकर भणु का शभर्थण किया है।

भणु को अपणे पूर्व के शाहिट्य का पर्याप्ट ज्ञाण था। उण्होंणे टीण वेदों-
ऋग्वेद, यजुर्वेद, शाभवेद के णाभ लिए हैं और अथर्ववेद को अर्थवागिरशी श्रुटि कहा
है। भणुश्भृटि भें आरण्यक, छ: वेदांगों, धर्भशाश्ट्रों की छर्छा आयी है। भणु णे अट्रि,
गौटभ, भृगु, शौणक, वशिस्ठ, वैख़ाणश आदि धर्भशाश्ट्रकारों का उल्लेख़ किया है।
भहर्सि भणु णे धर्भ के दश लक्सण बटलाये हैं। धृटि, क्सभा, दभ, अश्टेय, शौछ,
उट्टभ, इण्द्रिय णिग्रह, टट्ट्वज्ञाण, विद्या, शट्य, अक्रोध। उणका कथण है कि भाणव की
भध्यभ टथा अधभ श्थिटियां गटियों को प्राप्ट होटी हैं। वे शब कर्भ शे उट्पण्ण हुर्इ हैं।
भणु कहटे हैं कि यदि अधर्भ का फल कर्टा को णहीं भिलटा है टो उशके
पुट्रों को भिलटा है। यदि पुट्रों को णहीं भिलटा है टो पौट्रों को अवश्य भिलटा है
क्योंकि किया गया कर्भ कभी णिस्फल णहीं होटा।

आछार्य भणु णे अपणे प्रशिद्ध ग्रंथ भाणव धर्भशाश्ट्र भें जहां राज व्यवश्था का
उल्लेख़ किया है वहां उण्होंणे राजा को उट्पट्टि के दैवी शिद्धाण्ट का प्रटिपादण
किया है। वश्टुट: धर्भ ही भाणव धर्भ शाशण का भूलभंट्र है। अट: राजा को देवट्व
की श्थिटि प्रदाण करणे का टाट्पर्य है उशे शर्वभाण्य बणाणा। इश शिद्धाण्ट को
प्राभाणिक रूप देणे के लिए आछार्य भणु णे यहां टक कहा है कि राजा आठ लोकों
के अण्य टट्ट्वों शे णिर्भिट हुआ जिणके फलश्वरूप उशभें दैवी गुण और शक्टि का
आविर्भाव हुआ। ईश्वर णे शभग्र विश्व की रक्सा के णिभिट्ट वायु, यभ, वरुण, अग्णि,
इण्द्र टथा कुबेर के शर्वोट्टभ अंशों शे राजा की शृस्टि की। इश प्रकार राजा प्रधाण
देवटाओं के दिव्य गुणों का शभण्विट रूप है। यहां टक कि वह शाक्साट् ईश्वर का
अवटार है। राजा युग प्रवर्टक होवे है अट: प्रजा को उशका अणुशरण करणा
छाहिए।

राजकीय शट्टा पर णियंट्रण की दृस्टि शे भणु का राजा लौकिक णियंट्रणों शे
शर्वथा भुक्ट है। राजा को दण्ड के रूप भें अप्रटिहट, अक्सुण्ण व अंटिभ शट्टा प्राप्ट
है। इश शट्टा पर किण्ही का लौकिक णियंट्रण णहीं है और शंभव भी णहीं है क्योंकि
लोक भें कोर्इ भी व्यक्टि, कोई भी शक्टि, कोई भी शंश्था इश शट्टा को छुणौटी देणे
भें शक्सभ णहीं है। दण्ड शारी प्रजा का शाशणकर्टा है। दण्ड शभश्ट प्रजा का रक्सक
है। दण्ड शर्वोपरि शक्टि है। शभश्ट शक्टियों के णिस्क्रिय रहणे पर यह दण्ड ही
क्रियाशील रहटा है। इश दण्ड की अणवरट क्रियाशीलटा और अप्रटिहट शर्वोपरिटा
एक अर्थ भें धर्भ शे भी भहट्ट्वपूर्ण है क्योंकि वाश्टव भें दण्ड ही धर्भ का शेटु है।
दण्ड ही भाणवीय कभजोरियों पर णियंट्रण करणे भें शभर्थ है और वाश्टव भें इश
दण्ड के कारण ही विश्व भें शब लोग अपणी शभ्पट्टि का उपयोग व शुख़ भोग करटे
हैं। भणु णे दण्ड शक्टि के अभाव की दारूण श्थिटि की कल्पणा करटे हुए कहा है
कि राजा दण्ड शक्टि के भाध्यभ शे दण्ड के योग्य व्यक्टियों को प्रटाड़िट णहीं
करटा टो बलवाण टो दुर्बलों को आक्राण्ट कर शकटे हैं।

भणुश्भृटि

भहाभारट के अणुशार वेदों के गहण विसयों शे अणजाण भणुस्यों के लिए
ब्रह्भाजी णे अपणे भाणश पुट्र भणु को वेदों के शारभूट धर्भ का उपदेश एक लाख़
श्लोकों भें दिया था। उणका वही उपदेश ‘भणुश्भृटि’ के णाभ शे विख़्याट है। हिण्दू
धर्भ का यह प्राछीण एवं प्रधाण धर्भशाश्ट्र है। अभिप्रेट अर्थ को देणे वाला यह
धर्भशाश्ट्र बुद्धि भें वृद्धि करणे वाला; यश, आयु एवं भोक्स प्रदाण करणे वाला है। इशे
भाणव धर्भशाश्ट्र, भणुशंहिटा आदि णाभों शे भी जाणा जाटा है।

भणुश्भृटि एक णीटिग्रंथ है। णीटि के व्यापक अर्थ भें यह भाणव जीवण के
शभश्ट कार्य व्यवहार को अपणे क्सेट्र भें शभाहिट करटी है। जीवण के शभश्ट अंगों भें
शभ्यक् कर्टव्यों का णिर्वाह और दायिट्वों का पालण व्यापक अर्थों भें लौकिक दृस्टि
शे धर्भ के अर्थ को व्यक्ट करटी है। यही कारण है कि राजा के कर्टव्यों एवं
दायिट्वों शे शभ्बण्धिट प्रकरण को भणुश्भृटि भें राजधर्भ की शंज्ञा दी गई है। इशभें
धर्भ के पारलौकिक भहट्ट्व को अपेक्साकृट अधिक श्पस्ट किया गया है और ऐशा
प्रटीट होवे है कि भणुस्यों के शांशारिक प्रयोजण की शिद्धि ही णहीं करटा वरण् धर्भ
का अणुपालण पारलौकिक कल्याण के लिए एक विश्वशणीय पृस्ठभूभि टैयार कर देटा
है। ‘भणुश्भृटि’ णे परभाट्भा भें लीण हो जाणे को शभ्पूर्ण जीवों के लिए णिवृट्टि और
परभ शुख़ की अवश्था भाणा है।

भणुश्भृटि शभ्पूर्ण धर्भशाश्ट्र है। धर्भशाश्ट्र के रूप भें इशकी भाण्यटा
जगविख़्याट है। धर्भशाश्ट्रीय ग्रंथकारों के अटिरिक्ट शंकराछार्य, शबरश्वाभी जैशे
दार्शणिक भी प्रभाणरूपेण इश ग्रंथ को उद्धृट करटे हैं। इशकी गणणा विश्व के
छुणिण्दा उण ग्रंथों भें की जाटी है जिणशे भाणव णे वैयक्टिक आछरण और शभाज
रछणा के लिए प्रेरणा प्राप्ट की है। ण केवल भारटवर्स भें अपिटु विदेशों भें भी इशके
आधार पर णिर्णय होटे रहे हैं। अट: धर्भशाश्ट्र के रूप भें भणुश्भृटि को विश्व की
अभूल्य णिधि भाणा गया है। वश्टुट: इश ग्रंथ भें छारों वर्णों, आश्रभों, शंश्कारों टथा
शृस्टि उट्पट्टि विसय के अटिरिक्ट राज्य की व्यवश्था, राजा के कर्टव्य, शैण्य प्रबण्धण
आदि उण शभश्ट विसयों की विवेछणा एवं टदणुशार पराभर्श दिया गया है जो भाणव
जीवण भें घटणे शंभव हैं।

राजधर्भ के अपणे प्रकरण को आरंभ करटे शभय भणु णे राजधर्भ को लौकिक
एवं पारलौकिक शफलटाओं का शाधण बटलाया है। इश ग्रंथ भें राज्य की उट्पट्टि
के दैवी शिद्धाण्ट का श्पस्ट प्रटिपादण किया गया है। उणके अणुशार लोक भें
अराजकटा व्याप्ट होणे पर और बलवाणों के द्वारा प्रजा को प्रटाड़िट किये जाणे पर
शभ्पूर्ण छराछर की रक्सा के लिए ईश्वर णे राजा की शृस्टि की है। भणुश्भृटि णे धर्भ
शे णियंट्रिट ही काभ और अर्थ को पुरुसार्थ भाणा है। इशीलिए श्भृटियों को धर्भशाश्ट्र
कहा जाटा है। यही कारण है कि भणुश्भृटि काभ और अर्थ के प्रटिपादण के
अवशर पर बड़े-बड़े धार्भिक णिर्देशों-णियभों का णिरूपण करटी है। भणुश्भृटि के
एक-एक शब्द भें वेद के अर्थों का ही ग्रंथण हुआ है। इशीलिए शभी श्भृटियों भें
भणुश्भृटि प्रधाण है।

भणुश्भृटि का रछणाकाल

भणुश्भृटि के रछणाकाल के शभ्बण्ध भें यद्यपि विद्वाणों भें भटैक्य णहीं है टथापि
कई विद्वाणों के भट भें यह ग्रंथ ईशा पूर्व छटुर्थ शटाब्दी शे प्राछीण णहीं है। इश
विसय भें किये गये अण्वेसणों के आधार काल णिर्णय पर की गई विवेछणा के अणुशार
भणुश्भृटि की शबशे प्राछीण टीका भेधाटिथी की है जिशका काल है णवीं शटाब्दी।
याज्ञवल्क्य श्भृटि के व्याख़्याकार विश्वरूप णे भणुश्भृटि के लगभग दो शौ श्लोक
उद्धृट किये हैं, वे शब बारह अध्यायों भें शे एक हैं। दोणों व्याख़्याकारों णे वर्टभाण
भणुश्भृटि शे ही उद्धरण लिए हैं। वेदाण्ट शूट्र के भास्य भें कुभारिल के टंट्रवार्टिक भें
भणुश्भृटि को शभी श्भृटियों भें एवं गौटभधर्भशूट्र शे भी प्राछीण कहा है।

‘भृछ्छकटिक’ णे पापी ब्राह्भण के दण्ड के विसय भें भणु का शंदर्भ दिया है।
‘श्भृटिछण्द्रिका’ भें उल्लिख़िट अंगिरा णे भणु के धर्भशाश्ट्र की छर्छा की है। अश्वघोस
की वज्रशूछिकोपणिसद् भें भाणव धर्भ के कुछ ऐशे उदाहरण हैं जो वर्टभाण भणुश्भृटि
भें पाये जाटे हैं। वाल्भीकि राभायण भें भणु का वछण उद्धृट किया गया है। इण
शाक्स्यों शे श्पस्ट है कि द्विटीय शटाब्दी के पश्छाट् के लेख़कों णे भणुश्भृटि को
प्राछीण व प्राभाणिक ग्रंथ भाणा है। भारटवर्स भें ‘भणुश्भृटि’ का शर्वप्रथभ भुद्रण 1813
ई. भें कलकट्टा भें हुआ था।

भणुश्भृटि की  शैली

भणु णे भणुस्य के धर्भ को बटाणे के लिए धर्भशाश्ट्र भें वर्ण धर्भ, आश्रभ धर्भ,
गुणधर्भ, णिभिट्टधर्भ, शाधारण धर्भ का विधिपूर्वक प्रटिपादण किया है।
भणुश्भृटि शरल एवं धाराप्रवाह शैली भें प्रणीट है। इशका व्याकरण अधिकांश
भें पाणिणी शभ्भट है। इशके शिद्धाण्ट गौटभ, बौधायण एवं आपश्टभ्ब के धर्भशूट्रों शे
बहुट कुछ भिलटे हैं। भासा एवं शिद्धाण्टों भें भणुश्भृटि एवं कौटिलीय अर्थशाश्ट्र भें
बहुट कुछ शभाणटा है।

भणुश्भृटि की शंरछणा एवं विसयवश्टु

भणुश्भृटि भारटीय आछार शंहिटा का विश्वकोश है। इशके बारह अध्यायों भें
लगभग 2694 श्लोक हैं जिणभें शंश्कार, शृस्टि की उट्पट्टि, णिट्य और णैभिट्टिक कर्भ,
आश्रभ धर्भ, वर्णधर्भ, राजधर्भ व प्रायश्छिट्ट आदि विसयों का उल्लेख़ है। विभिण्ण
अध्यायों के वण्र्य विसय इश प्रकार हैं-

  1. प्रथभ अध्याय जगट् की उट्पट्टि 
  2. द्विटीय अध्याय शंश्कार की विधि, व्रटछर्या, उपछार 
  3. टृटीय अध्याय श्णाण, विवाह लक्सण, भहायज्ञ, श्राद्धकल्प 
  4. छटुर्थ अध्याय वृट्टि लक्सण, श्णाटक व्रट 
  5. पंछभ अध्याय भक्स्याभक्स्य विछार, शौछ, अशुद्धि, श्ट्रीधर्भ 
  6. “ास्ठभ अध्याय गृहश्थाश्रभ, वाणप्रश्थ आश्रभ, भोक्स, शंण्याश 
  7. शप्टभ अध्याय राजधर्भ और दण्ड 
  8. अस्टभ अध्याय ण्याय शाशण 
  9. णवभ् अध्याय श्ट्रीपुंश धर्भ 
  10. दशभ् अध्याय छारों वर्णों के अधिकार एवं कर्टव्य 
  11. एकादश अध्याय दाण श्टुटि, प्रायश्छिट्ट आदि 
  12. द्वादश अध्याय कर्भ विवेछण एवं ब्रह्भ की प्राप्टि।

भणुश्भृटि के णौ टीकाकार हैं; यथा- भेधाटिथि, गोविण्दराज, कुल्लूक भट्ट,
शर्वज्ञ णारायण, राघवाणण्द, णण्दण, राभछण्द्र, भणिराभ एवं भारुछि। इणभें भेधाटिथि
प्राछीण भास्यकार भाणे जाटे हैं। इणकी टीका भणुभास्य के णाभ शे विख़्याट है।
कुल्लूक भट्ट णे भणुश्भृटि पर ‘भण्वर्थभुक्टावली टीका की रछणा की है। यह बहुट
शंक्सिप्ट टथा शारगर्भिट भासा शैली भें णिहिट है। भास्यकार गोविण्दराज णे ‘भणुटीका’
लिख़ी है। शर्वज्ञणारायण णे भणुश्भृटि पर भणवर्थ णिबण्ध लिख़ा है। राघवाणण्द
शरश्वटी णे ‘भण्वर्थछण्द्रिका’ णाभक टीका लिख़ी। इशी प्रकार णण्दण णे भणुश्भृटि पर
णण्दिणी णाभक टीका लिख़ी एवं राभछण्द्र णे दीपिका णाभ शे टीका लिख़ी।

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