मनुस्मृति का रचनाकाल, संरचना एवं विषयवस्तु

By | February 15, 2021


वैदिक वाड़्मय में मानव जाति के आदि पिता प्रजापति के रूप में मनु का
उल्लेख मिलता है। इसमें मनु का अर्थ मनुष्य से किया गया है। मनु में पिता शब्द
जुड़ा हुआ है जिससे यह अनुमान किया गया है कि मनुष्य के पिता मनु हुये
जिन्होंने सृष्टि को उत्पन्न किया तथा मनुस्मृति की रचना की। शतपथ ब्राह्मण में
उल्लिखित इतिहास के अनुसार जल प्रलय के पश्चात् एकमात्र मनु ही सुरक्षित बचे
थे, शेष सभी प्राणी नष्ट हो गये थे। जल प्रलय का यह विवरण मनु को सृष्टि के
आदि मानव के रूप में मान्यता देता है।

ऋग्वेद के एक मंत्र में मनु को सूर्य का पुत्र कहा गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में सूर्यपुत्र मनु का आख्यान वर्णित है। ऋग्वेद में इन्हें प्रथम
यज्ञकर्ता कहा गया है। उन्होंने तैंतीस देवताओं के प्रति सर्वप्रथम यज्ञ किया।
भारतीय वाड़्मय में चौदह मनुओं एवं वैवस्वत मनु के पश्चात् होने वाले सात मनुओं
की चर्चा की गई है। मनुस्मृति श्रीमद्भागवद् महापुराण एवं विष्णुपुराण आदि ग्रंथों
में प्रथम सात मनुओं का उल्लेख है। यथा- पहले मनुस्वायम्भुव, दूसरे स्वरोचिषमनु,
तीसरे उत्तम मनु, चौथे तामस मनु, पांचवें रैवत मनु, छठे चाक्षुष मनु एवं सातवें
वैवस्वत मनु हैं।

अथर्ववेद में वैवस्वत मनु को पृथ्वी का शासक घोषित किया गया है।
ऐतरेय ब्राह्मण में एक संदर्भ वर्णित है ‘देवता और असुर परस्पर युद्ध करते थे।
असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। तब देवताओं ने कहा हमारे यहां
अराजकता के कारण असुर विजयी हुए हैं। हमें भी राजा की नियुक्ति करनी
चाहिए। इस पर सभी सहमत हो गये थे।’ इस कथानक से स्पष्ट है कि तत्कालीन
ऋषि समाज को भी अपनी सुरक्षा हेतु चरित्रवान शासक की आवश्यकता पड़ गई
थी। इसलिए राजा अथवा शासक का मनोनयन अपरिहार्य समझा गया।
महाभारत13 में ब्रह्मा द्वारा मनु को राजा बनाये जाने का उल्लेख मिलता है।
रामायण में मनु को प्रथम राजा माना गया है।

वेदों में मंत्रद्रष्टा के रूप में मनु का परिगणन हुआ है। ऋग्वेद के आठवें
मंडल के सत्ताइसवें इकतीसवें सूक्तों के मंत्रद्रष्टा वैवस्वत मनु ही हैं। इन सूक्तों
की विषयवस्तु मुख्यतया यज्ञ है। यह इस बात के द्योतक हैं कि मनु ने यज्ञ के
विषय में विस्तृत चिन्तन किया था। उनका यह चिन्तन न केवल पारलौकिक हितों
के लिए था वरन् सांसारिक समृद्धि के लिए भी था। इस दिशा में चिन्तन करके मनु
ने जो ज्ञान अर्जित किया वही धर्मशास्त्र के रूप में लोगों के सम्मुख आया।
तत्कालीन मानव समाज इस धर्मशास्त्र को आदर व श्रद्धा की दृष्टि से देखता था
जो ऋग्वेद की एक ऋचा से विदित होता है जिसमें प्रार्थना की है कि हम मनु के
पैतृक मार्ग से च्युत न हों। अन्यत्र एक ऋचा से स्पष्ट है कि मनु की विधि,
धार्मिक व्यवस्थायें व उनके द्वारा निर्देशित आचार न केवल आदर की दृष्टि से देखे
जाते थे अपितु समाज में लोग उनका अनुकरण भी करते थे।

मनु को जीवन प्रदायिनी औषधियों का अनुसंधानकर्ता माना गया है। जिस
औषधि की खोज मनु ने की थी और जिसका वरण उन्होंने स्वयं किया वह लोगों
का कष्ट निवारण करने वाली थी। इसलिए लोग उस औषधि को प्राप्त करने की
कामना करते थे।

मनु ने प्रथम शासक के रूप में विधि के आधार पर जिस समाज व्यवस्था का
निर्माण किया था वह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिक है। तैत्तिरीय संहिता एवं
ताण्ड्य ब्राह्मण में मनु वचनों को भेषज कहा है। इससे यह निर्विवाद सिद्ध है कि
मनु की व्यवस्थायें भेषज मानी जाती थी। वैदिक वाड़्मय की इन सूचनाओं से यह
भी प्रमाणित है कि मनु ने प्राचीनकाल में ऐसे धर्म शास्त्र की रचना की थी जिसे
सभी जीवन प्रदायिनी औषधि मानते थे।20 पराशर स्मृति के एक श्लोक में कहा गया
है कि सतयुग में मनुस्मृति, त्रेता में गौतम स्मृति, द्वापर में शंख स्मृति और कलियुग
में पराशर स्मृति ग्रंथ मान्य हैं। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि आदि मनु ने
किसी धर्मशास्त्र की रचना की थी। गौतम धर्मसूत्र में ‘त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यानि मनु’
कहकर मनु का समर्थन किया है।

मनु को अपने पूर्व के साहित्य का पर्याप्त ज्ञान था। उन्होंने तीन वेदों-
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के नाम लिए हैं और अथर्ववेद को अर्थवागिरसी श्रुति कहा
है। मनुस्मृति में आरण्यक, छ: वेदांगों, धर्मशास्त्रों की चर्चा आयी है। मनु ने अत्रि,
गौतम, भृगु, शौनक, वशिष्ठ, वैखानस आदि धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख किया है।
महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बतलाये हैं। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच,
उत्तम, इन्द्रिय निग्रह, तत्त्वज्ञान, विद्या, सत्य, अक्रोध। उनका कथन है कि मानव की
मध्यम तथा अधम स्थितियां गतियों को प्राप्त होती हैं। वे सब कर्म से उत्पन्न हुर्इ हैं।
मनु कहते हैं कि यदि अधर्म का फल कर्ता को नहीं मिलता है तो उसके
पुत्रों को मिलता है। यदि पुत्रों को नहीं मिलता है तो पौत्रों को अवश्य मिलता है
क्योंकि किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं होता।

आचार्य मनु ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ मानव धर्मशास्त्र में जहां राज व्यवस्था का
उल्लेख किया है वहां उन्होंने राजा को उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त का प्रतिपादन
किया है। वस्तुत: धर्म ही मानव धर्म शासन का मूलमंत्र है। अत: राजा को देवत्व
की स्थिति प्रदान करने का तात्पर्य है उसे सर्वमान्य बनाना। इस सिद्धान्त को
प्रामाणिक रूप देने के लिए आचार्य मनु ने यहां तक कहा है कि राजा आठ लोकों
के अन्य तत्त्वों से निर्मित हुआ जिनके फलस्वरूप उसमें दैवी गुण और शक्ति का
आविर्भाव हुआ। ईश्वर ने समग्र विश्व की रक्षा के निमित्त वायु, यम, वरुण, अग्नि,
इन्द्र तथा कुबेर के सर्वोत्तम अंशों से राजा की सृष्टि की। इस प्रकार राजा प्रधान
देवताओं के दिव्य गुणों का समन्वित रूप है। यहां तक कि वह साक्षात् ईश्वर का
अवतार है। राजा युग प्रवर्तक होता है अत: प्रजा को उसका अनुसरण करना
चाहिए।

राजकीय सत्ता पर नियंत्रण की दृष्टि से मनु का राजा लौकिक नियंत्रणों से
सर्वथा मुक्त है। राजा को दण्ड के रूप में अप्रतिहत, अक्षुण्ण व अंतिम सत्ता प्राप्त
है। इस सत्ता पर किसी का लौकिक नियंत्रण नहीं है और संभव भी नहीं है क्योंकि
लोक में कोर्इ भी व्यक्ति, कोई भी शक्ति, कोई भी संस्था इस सत्ता को चुनौती देने
में सक्षम नहीं है। दण्ड सारी प्रजा का शासनकर्ता है। दण्ड समस्त प्रजा का रक्षक
है। दण्ड सर्वोपरि शक्ति है। समस्त शक्तियों के निष्क्रिय रहने पर यह दण्ड ही
क्रियाशील रहता है। इस दण्ड की अनवरत क्रियाशीलता और अप्रतिहत सर्वोपरिता
एक अर्थ में धर्म से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वास्तव में दण्ड ही धर्म का सेतु है।
दण्ड ही मानवीय कमजोरियों पर नियंत्रण करने में समर्थ है और वास्तव में इस
दण्ड के कारण ही विश्व में सब लोग अपनी सम्पत्ति का उपयोग व सुख भोग करते
हैं। मनु ने दण्ड शक्ति के अभाव की दारूण स्थिति की कल्पना करते हुए कहा है
कि राजा दण्ड शक्ति के माध्यम से दण्ड के योग्य व्यक्तियों को प्रताड़ित नहीं
करता तो बलवान तो दुर्बलों को आक्रान्त कर सकते हैं।

मनुस्मृति

महाभारत के अनुसार वेदों के गहन विषयों से अनजान मनुष्यों के लिए
ब्रह्माजी ने अपने मानस पुत्र मनु को वेदों के सारभूत धर्म का उपदेश एक लाख
श्लोकों में दिया था। उनका वही उपदेश ‘मनुस्मृति’ के नाम से विख्यात है। हिन्दू
धर्म का यह प्राचीन एवं प्रधान धर्मशास्त्र है। अभिप्रेत अर्थ को देने वाला यह
धर्मशास्त्र बुद्धि में वृद्धि करने वाला; यश, आयु एवं मोक्ष प्रदान करने वाला है। इसे
मानव धर्मशास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है।

मनुस्मृति एक नीतिग्रंथ है। नीति के व्यापक अर्थ में यह मानव जीवन के
समस्त कार्य व्यवहार को अपने क्षेत्र में समाहित करती है। जीवन के समस्त अंगों में
सम्यक् कर्तव्यों का निर्वाह और दायित्वों का पालन व्यापक अर्थों में लौकिक दृष्टि
से धर्म के अर्थ को व्यक्त करती है। यही कारण है कि राजा के कर्तव्यों एवं
दायित्वों से सम्बन्धित प्रकरण को मनुस्मृति में राजधर्म की संज्ञा दी गई है। इसमें
धर्म के पारलौकिक महत्त्व को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट किया गया है और ऐसा
प्रतीत होता है कि मनुष्यों के सांसारिक प्रयोजन की सिद्धि ही नहीं करता वरन् धर्म
का अनुपालन पारलौकिक कल्याण के लिए एक विश्वसनीय पृष्ठभूमि तैयार कर देता
है। ‘मनुस्मृति’ ने परमात्मा में लीन हो जाने को सम्पूर्ण जीवों के लिए निवृत्ति और
परम सुख की अवस्था माना है।

मनुस्मृति सम्पूर्ण धर्मशास्त्र है। धर्मशास्त्र के रूप में इसकी मान्यता
जगविख्यात है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे
दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं। इसकी गणना विश्व के
चुनिन्दा उन ग्रंथों में की जाती है जिनसे मानव ने वैयक्तिक आचरण और समाज
रचना के लिए प्रेरणा प्राप्त की है। न केवल भारतवर्ष में अपितु विदेशों में भी इसके
आधार पर निर्णय होते रहे हैं। अत: धर्मशास्त्र के रूप में मनुस्मृति को विश्व की
अमूल्य निधि माना गया है। वस्तुत: इस ग्रंथ में चारों वर्णों, आश्रमों, संस्कारों तथा
सृष्टि उत्पत्ति विषय के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, सैन्य प्रबन्धन
आदि उन समस्त विषयों की विवेचना एवं तदनुसार परामर्श दिया गया है जो मानव
जीवन में घटने संभव हैं।

राजधर्म के अपने प्रकरण को आरंभ करते समय मनु ने राजधर्म को लौकिक
एवं पारलौकिक सफलताओं का साधन बतलाया है। इस ग्रंथ में राज्य की उत्पत्ति
के दैवी सिद्धान्त का स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है। उनके अनुसार लोक में
अराजकता व्याप्त होने पर और बलवानों के द्वारा प्रजा को प्रताड़ित किये जाने पर
सम्पूर्ण चराचर की रक्षा के लिए ईश्वर ने राजा की सृष्टि की है। मनुस्मृति ने धर्म
से नियंत्रित ही काम और अर्थ को पुरुषार्थ माना है। इसीलिए स्मृतियों को धर्मशास्त्र
कहा जाता है। यही कारण है कि मनुस्मृति काम और अर्थ के प्रतिपादन के
अवसर पर बड़े-बड़े धार्मिक निर्देशों-नियमों का निरूपण करती है। मनुस्मृति के
एक-एक शब्द में वेद के अर्थों का ही ग्रंथन हुआ है। इसीलिए सभी स्मृतियों में
मनुस्मृति प्रधान है।

मनुस्मृति का रचनाकाल

मनुस्मृति के रचनाकाल के सम्बन्ध में यद्यपि विद्वानों में मतैक्य नहीं है तथापि
कई विद्वानों के मत में यह ग्रंथ ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी से प्राचीन नहीं है। इस
विषय में किये गये अन्वेषणों के आधार काल निर्णय पर की गई विवेचना के अनुसार
मनुस्मृति की सबसे प्राचीन टीका मेधातिथी की है जिसका काल है नवीं शताब्दी।
याज्ञवल्क्य स्मृति के व्याख्याकार विश्वरूप ने मनुस्मृति के लगभग दो सौ श्लोक
उद्धृत किये हैं, वे सब बारह अध्यायों में से एक हैं। दोनों व्याख्याकारों ने वर्तमान
मनुस्मृति से ही उद्धरण लिए हैं। वेदान्त सूत्र के भाष्य में कुमारिल के तंत्रवार्तिक में
मनुस्मृति को सभी स्मृतियों में एवं गौतमधर्मसूत्र से भी प्राचीन कहा है।

‘मृच्छकटिक’ ने पापी ब्राह्मण के दण्ड के विषय में मनु का संदर्भ दिया है।
‘स्मृतिचन्द्रिका’ में उल्लिखित अंगिरा ने मनु के धर्मशास्त्र की चर्चा की है। अश्वघोष
की वज्रसूचिकोपनिषद् में मानव धर्म के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो वर्तमान मनुस्मृति
में पाये जाते हैं। वाल्मीकि रामायण में मनु का वचन उद्धृत किया गया है। इन
साक्ष्यों से स्पष्ट है कि द्वितीय शताब्दी के पश्चात् के लेखकों ने मनुस्मृति को
प्राचीन व प्रामाणिक ग्रंथ माना है। भारतवर्ष में ‘मनुस्मृति’ का सर्वप्रथम मुद्रण 1813
ई. में कलकत्ता में हुआ था।

मनुस्मृति की  शैली

मनु ने मनुष्य के धर्म को बताने के लिए धर्मशास्त्र में वर्ण धर्म, आश्रम धर्म,
गुणधर्म, निमित्तधर्म, साधारण धर्म का विधिपूर्वक प्रतिपादन किया है।
मनुस्मृति सरल एवं धाराप्रवाह शैली में प्रणीत है। इसका व्याकरण अधिकांश
में पाणिनी सम्मत है। इसके सिद्धान्त गौतम, बौधायन एवं आपस्तम्ब के धर्मसूत्रों से
बहुत कुछ मिलते हैं। भाषा एवं सिद्धान्तों में मनुस्मृति एवं कौटिलीय अर्थशास्त्र में
बहुत कुछ समानता है।

मनुस्मृति की संरचना एवं विषयवस्तु

मनुस्मृति भारतीय आचार संहिता का विश्वकोश है। इसके बारह अध्यायों में
लगभग 2694 श्लोक हैं जिनमें संस्कार, सृष्टि की उत्पत्ति, नित्य और नैमित्तिक कर्म,
आश्रम धर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि विषयों का उल्लेख है। विभिन्न
अध्यायों के वण्र्य विषय इस प्रकार हैं-

  1. प्रथम अध्याय जगत् की उत्पत्ति 
  2. द्वितीय अध्याय संस्कार की विधि, व्रतचर्या, उपचार 
  3. तृतीय अध्याय स्नान, विवाह लक्षण, महायज्ञ, श्राद्धकल्प 
  4. चतुर्थ अध्याय वृत्ति लक्षण, स्नातक व्रत 
  5. पंचम अध्याय भक्ष्याभक्ष्य विचार, शौच, अशुद्धि, स्त्रीधर्म 
  6. “ाष्ठम अध्याय गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, मोक्ष, संन्यास 
  7. सप्तम अध्याय राजधर्म और दण्ड 
  8. अष्टम अध्याय न्याय शासन 
  9. नवम् अध्याय स्त्रीपुंस धर्म 
  10. दशम् अध्याय चारों वर्णों के अधिकार एवं कर्तव्य 
  11. एकादश अध्याय दान स्तुति, प्रायश्चित्त आदि 
  12. द्वादश अध्याय कर्म विवेचन एवं ब्रह्म की प्राप्ति।

मनुस्मृति के नौ टीकाकार हैं; यथा- मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट,
सर्वज्ञ नारायण, राघवानन्द, नन्दन, रामचन्द्र, मणिराम एवं भारुचि। इनमें मेधातिथि
प्राचीन भाष्यकार माने जाते हैं। इनकी टीका मनुभाष्य के नाम से विख्यात है।
कुल्लूक भट्ट ने मनुस्मृति पर ‘मन्वर्थमुक्तावली टीका की रचना की है। यह बहुत
संक्षिप्त तथा सारगर्भित भाषा शैली में निहित है। भाष्यकार गोविन्दराज ने ‘मनुटीका’
लिखी है। सर्वज्ञनारायण ने मनुस्मृति पर मनवर्थ निबन्ध लिखा है। राघवानन्द
सरस्वती ने ‘मन्वर्थचन्द्रिका’ नामक टीका लिखी। इसी प्रकार नन्दन ने मनुस्मृति पर
नन्दिनी नामक टीका लिखी एवं रामचन्द्र ने दीपिका नाम से टीका लिखी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *