महर्षि पतंजलि के जीवन का परिचय

By | February 16, 2021


‘‘प्राय: भारत के प्राचीन लेखको ने अपने जीवन परिचय का उल्लेख बहुत ही कम
किया है। कहीं-कहीं ढुंढ़ने से इन प्राचीन लेखको की जीवनी की झलक एक आध सूत्र
में मिलती है, उनकी जीवनी का पूरा लेखा जोखा असंभव है। महर्षि पतंजलि की जीवनी
का ब्यौरा भी हमें परिष्कृत रूप में इस प्रकार मिलता है प्राचीन काल के पतंजलि मुनि
का महाभाष्य का रचयिता होना भी एक विचित्र घटना के रूप में दिखलाया गया है।

महर्षि पतंजलि के जीवन का परिचय
महर्षि पतंजलि 
जिसके अनुसार पतंजलि मुनि को शेषनाग का अवतार मानकर काशी में एक बावड़ी पर
पाणिनि मुनि के समझ सर्परूप में प्रकट होना बतलाया गया है इसके पश्चात सर्प के
आदेशानुसार एक चादर की आड़ लगा दी गयी। उसके अंदर से शेषनाग पतंजलि मुनि
अपने हजारों मुखों से एक साथ सब प्रश्नकर्ताओं को उत्तर देने लगे। इस प्रकार सारा
महाभाष्य तैयार हो गया। किन्तु सर्प की इस आज्ञा के कि कोई पुरुष चादर उठाकर
अंदर न देखे, एक व्यक्ति द्वारा उल्लंघन किए जाने पर शेषनाग की फुंकार से ब्राह्मणों
के सारे कागज जल गये। ब्राह्मणों की दु:खी अवस्था को देखकर एक यक्ष ने, जो वृक्ष
पर बैठा पत्तों पर भाष्य को लिखता जाता था, वे पत्ते उनके पास फेंक दिए। इसलिए
कुछ स्थानों पर महाभाष्य में असंगति सी पायी जाती है।’’

‘‘योग दर्शन के सूत्रकार पतंजलि मुनि की जीवनी का ठीक-ठीक पता नहीं
चलता, किन्तु यह बात नि:संदेह सिद्ध है कि पतंजलि मुनि भगवान कपिल के पश्चात्
ओर अन्य चारों दर्शनकारों महर्षि (गौतम-न्यायदर्शन), कणाद् (वैशेषिक दर्शन) जैमिनी
(पूर्व मीमांसा) बादरायण (उत्तर मीमांसा) से बहुत पूर्व हुए हे।’’

‘‘पतंजलि योगसूत्र के रचनाकार पतंजलि है, जो हिन्दूओं के छ: दर्शन (न्याय,
वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत) में से एक है।  लिखे तीन (3) मुख्य ग्रंथ मिलते हैं पातंजल योगसूत्र, अष्टाध्यायी परभाष्य और परग्रंथ।
कुछ विद्वानों का मत है कि ये तीनों ग्रंथ एक ही व्यक्ति ने लिखे है। अन्य की धारणा है
कि ये विभिन्न व्यक्तियों की कृतियाँ हैं। पतंजलि ने पाणिनी के अष्टाध्यायी पर अपनी
टीका लिखी जिसे महाभाष्य का नाम दिया। महाभाष्य (समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना,
आलोचना)। इसका काल कोई 200 ई. पू. माना जाता है।’’

महर्षि पतंजलि के जीवन संबंधी कुछ दंत कथाएँ हैं, जो इस प्रकार है –
‘‘महर्षि पतंजलि मुनि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में विद्यमान थे। इनका
जन्म गोनारद्य (गोनिया) में हुआ था, परन्तु ये काशी में नागकूप पर बस गये थे। ये
व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे। काशीवासी आज भी श्रावण कृष्ण 5, पंचमी
(नागपंचमी) को छोटे गुरु का, बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग कहकर नाग के चित्र
बाँटते हैं, क्योंकि पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है।’’

महर्षि पतंजलि मुनि के जन्म के संबंध में Hindu World Vol II (लेखक
बेंजामिनन वॉकर) में भी दो दन्त कथाएँ बताई गई है जो कि निम्न हे –
‘‘पहली दन्तकथा के अनुसार पतंजलि शेषनाग का अवतार है क्योकि वह पाणिनी
की हथेली पर एक छोटे साँप के रुप में उतरा था, इसलिए उसका नाम पतंजलि
(पत याने गिरा अंजली याने हथेली में) पड़ा। दूसरी कथा के अनुसार वह अपनी माँ की
गुहिका से गिर पड़े इसलिए इनका नाम पतंजलि पड़ा, पतंजलि को गोनिका पुत्र भी
कहा जाता है उनकी माँ का नाम गोनिका था, इसलिए इनका नाम ‘गोनिका पुत्र‘
पड़ा।’’

उपरोक्त अध्ययन से ज्ञात होता है कि इनका जन्म 200 ई. पू. रहा होगा तथा
इनका जन्म स्थान भी काशी है और इनके द्वारा पतंजलि योग सूत्र पाणिनी महाभाष्य
ओर परग्रंथ (चरक-संहिता) लिखा गया था।


महर्षि पतंजलि मुनि का योगदान

‘‘महर्षि पतंजलि मुनि केवल योगसूत्रों के एडिटर ही नहीं थे, वरन् महान
चिकित्सक भी थे, इसलिए इन्हें ही ‘चरक संहिता’ का प्रणेता माना जाता है।
‘योगसूत्र‘ पतंजलि का महान अवदान है। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट
आचार्य थे-अर्भक विंदास अनेक धातुयोग ओर लोहशास्त्र इनकी देन हे। पतंजलि ‘संभवत
पुष्यमित्र शुंग (195-142 ई.पू.) के शासन काल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के
साथ मन का भी चिकित्सक कहा है।’’

‘‘योगेन चित्तस्य पदेन वांचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।

योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलि प्रांजलिरानतोऽस्मि।।

अर्थात् चित्त श ुद्धि के लिये योग (योगसूत्र), वाणी शुद्धि के लिए व्याकरण
(महाभाष्य) और शरीर श ुद्धि के लिए वैद्यकशास्त्र (चरक-संहिता) देने वाले मुनि श्रेष्ठ
पतंजलि को प्रणाम।

ई.पू. द्वितीय शताब्दी में ‘महाभाष्य’ के रचियता पतंजलि काशी-मण्डल के ही
निवासी थे। मुनित्रय की परंपरा में ये अंतिम मुनि थे।

पाणिनी के पश्चात् पतंजलि सर्वश्रेष्ठ स्थान के अधिकारी पुरुष है। उन्होंने पाणिनी
व्याकरण के महाभाष्य की रचना कर उसे स्थिरता प्रदान की। वे आलौकिक प्रतिभा के
धनी थे। व्याकरण के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों पर भी इनका समान रुप से अधिकार था।
व्याकरण शास्त्र में उनकी बात को अंतिम प्रमाण समझा जाता है। उन्होंने अपने समय के
जनजीवन का पर्याप्त निरीक्षण किया था। अत: महाभाष्य व्याकरण ग्रंथ होने के
साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोष भी है।’’ पतंजलि योग दर्शन के जन्मदाता नहीं संपादक थे
योग शिक्षा का प्राचीन समय से चला आना बताया गया है जिसका वर्णन
श्रुति व स्मृति में पाया जाता है।

महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी कहा है-हिरण्यगर्भ से पुराना योग का कोई वक्ता नहीं। महर्षि
याज्ञवल्क्य के अनुसार महर्षि पतंजलि ने योग को शारीरिक व मानसिक अनुशासन प्राप्त
करने वाले व्यवस्थित मार्ग के रूप में पतंजलि योग सूत्र की रचना की।

Benjanun Walker ने भी अपनी पुस्तक Encyclopediesurvey of Hinduism में
इस तथ्य के बारे में लिखते हुए योग शिक्षा की पूर्व परम्परा व ज्ञान का विद्यमान होना
बताया है।

कुछ तथ्यों का नवीन संकलन भी पतंजलि योग सूत्र में पाया जाता है। योग
सांख्य द्वारा प्रतिपादित 25 तत्वों को स्वीकार करते हुए परम तत्व या परमात्मा की प्राप्ति
अर्थात् कैवल्य की प्राप्ति का मार्ग बताया हे।

पतंजलि योग सूत्र में पतंजलि ने न केवल योग की विभिन्न प्रक्रियाओं का
संकलन ही किया बल्कि योग से संबंधित विभिन्न विचार धाराओं को एकत्रित कर उनका
सम्पादन किया अपितु उस सारी सामग्री को सांख्य तत्व दर्शन से समन्वित करके भी
प्रमाणित किया और उसे वह रूप दिया जिसे हम आज पतंजलि योग सूत्र के रूप में
पाते हे।

वाचस्पति और विज्ञानभिक्षु ने भी इस संदर्भ में कहा है -‘‘पतंजलि योग दर्शन का जन्मदाता नहीं बल्कि संपादक था पातंजल सूत्रों के
विश्लेषणात्मक अध्ययन से भी इस धारणा की पुष्टि होती है कि इनमें कोई मौलिक
स्थापना नही है किन्तु एक उच्चस्तरीय और प्रणालीबद्ध संकलन ही है जिसके साथ
समुचित मौलिक विवेचन जुड़े हुए है। पहले तीन अध्यायों में परिभाषा और वर्गीकरण के
रूप में वैज्ञानिक विवेचन मिलता है जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह सामग्री पहले से
ही विद्यमान थी, पतंजलि ने उसे केवल वैज्ञानिक ओर प्रणालीबद्ध रूप दिया।’’

संदर्भ –

  1. श्री स्वामी ओमानन्दतीर्थ, पातंजल योगप्रदीप, पेज नं. 136
  2. श्री स्वामी ओमानन्दतीर्थ, पातंजल योगप्रदीप, पेज नं. 135
  3. Website-http://hi.wikipedia.org/wiki/iratfy
  4. Website-http://hi.wikipedia.org/wiki/iratfy
  5. Benjamin Walker , Hindu World Vol. II, Pg no. 195
  6. C.D.sharma –a criticalsurvey of Indian Philosophy, Pg. no. 162
  7. Website-http://hi.wikipedia.org/wiki/iratfy
  8.  Website-http://hi.wikipedia.org/wiki/iratfy

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