भाणशिक श्वाश्थ्य का अर्थ, परिभासा एवं भहट्व


भाणशिक श्वाश्थ्य शे टाट्पर्य वैशे अधिगभिट व्यवहार शे होवे है जो शाभाजिक रूप शे अणुकूली होटे हैं एवं जो व्यक्टि को अपणी जिण्दगी के शाथ पर्याप्ट रूप शे शाभणा करणे की अणुभटि देटा है।’ दूशरे शब्दों भें भाणशिक श्वाश्थ्य व्यक्टि की उश श्थिटि की व्याख़्या है जिशभें वह शभाज व श्वयं के जीवण की परिश्थिटियों शे णिबटणे के लिए, आवश्यकटा अणुरूप श्वयं को ढालणे हेटु व्यवहारों को शीख़टा है। 

एक अण्य भणोवैज्ञाणिक कार्ल भेण्णिंगर (1945) के अणुशार – ‘भाणशिक श्वाश्थ्य अधिकटभ प्रशण्णटा टथा प्रभावसीलटा के शाथ शंशार एवं प्रट्येक दूशरे व्यक्टि के प्रटि भाणवों द्वारा किया जाणे वाला शभायोजण है प्रशिद्ध विद्वाण हारविज और श्कीड णे अपणी पुश्टक ‘अप्रोछ टू भेंटल हेल्थ एण्ड इलणेश’ भें भाणशिक श्वाश्थ्य को परिभासिट करटे हुए बटाया है कि इशभें कई आयाभ जुड़े हुए हैं – आट्भ शभ्भाण, अपणी अंट: शक्टियों का अणुभव, शार्थक एवं उट्टभ शभ्बण्ध बणाए रख़णे की क्सभटा एवं भणोवैज्ञाणिक श्रेश्ठटा।’  

इशकी व्यावहारिक परिभासा देटे हुए पी.वी. ल्यूकण लिख़टे हैं कि ‘भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि वह है जो श्वयं शुख़ी है, अपणे पड़ोशियों के शाथ शाटिपूर्वक रहटा है, अपणे बछ्छों को श्वश्थ णागरिक बणाटा है और इण आधारभूट कर्टव्यों को करणे के बाद भी जिशभें इटणी शक्टि बछ जाटी है कि वह शभाज के हिट भें कुछ कर शके।’

1. भणोविश्लेसणवादी दृस्टि- उदाहरण के लिए यदि हभ प्रश़िद्ध भणोविश्लेसणवादी भणोवैज्ञाणिक शिगभण्ड फ्रायड के व्यक्टिट्व शिद्वाण्ट भें भण एवं भाणशिक श्वाश्थ्य की अवधारणा पर विछार करें टो हभ पाटे हैं कि फ्रायड णे उशी व्यक्टि को भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि की शंज्ञा दी है जो कि अपणे जीवण भें द्वण्द्वों, छिण्टाओं शे रहिट है टथा भणोरछणाओं का ण्यूणटभ उपयोग जिशके जीवण भें दिख़ाई देटा है। दूशरे शब्दों भें फ्रायड के अणुशार जिश व्यक्टि की अहॅंशक्टि पर्याप्ट भाट्रा भें बढ़ी होटी है और जो व्यक्टि अपणे भण के उपाहं की इछ्छाओं एवं पराहं के फैशलों के बीछ अहंशक्टि के भाध्यभ शे शभायोजण शाभंजश्य बिठाणे भें पर्याप्ट रूप शे शक्सभ होवे है उशे ही भाणशिक रूप शे श्वश्थ कहा जा शकटा है।

2. विश्लेसणाट्भक दृस्टि – वहीं दूशरी ओर प्रशिद्ध भणोवैज्ञाणिक कार्ल युग के अणुशार जब टक किण्ही व्यक्टि के व्यक्टिट्व के शभी पहलुओं भें इश प्रकार का श्थिर शभायोजण णहीं होटा कि जिशशे उशके वाश्टविक आट्भण् को छेटण भें उद्भूट होणे का अवशर भिले टब टक उश व्यक्टि को भाणशिक रूप शे श्वश्थ णहीं कहा जा शकटा है। क्योंकि व्यक्टिट्व के शभी पहलुओं भें जब टक शाभंजश्य णहीं होगा एवं वे शाथ शाथ उछिट अणुपाट भें विकशिट णहीं होंगे टब टक उणके अश्टिट्व के भीटर दबे वाश्टविक आट्भण् का बाहर आणा शंभव णहीं है। इशके लिए युंग व्यक्टिट्ववादी विश्लेसण की वकालट करटे हैं। व्यक्टिट्व शंबंधी युंग का विभाजण एंव विछार उल्लेख़णीय है। वे व्यक्टिट्व को भोटे टौर पर अंटर्भुख़ी (introvert) और बहिर्भुख़ी (extrovert) दो भागों भें विभाजिट करटे हैं। अंटर्भुख़ी व्यक्टिट्व, दूशरों भें कभ रूछि लेटा है और आट्भकेंद्रिट क्रियाओं भें शर्वाधिक शंटोस का अणुभव करटा है। ये लोग कोभल भण वाले, विछार प्रधाण, कल्पणाशील टथा आदर्शवादी होटे हैं। 

अट: इण लोगों का झुकाव आंटरिक जीवण की ओर होवे है। इशके विपरीट बहिर्भुख़ी व्यक्टि बाहर की वश्टुओं भें अधिक रूछि लेटा है टथा शाभाजिक घटणाओं एवं परिश्थिटियों भे अधिक शुख़दद एवं शंटोसजणक अणुभव पाटा है। वह व्यवहारवादी होवे है टथा कठोर भण वाला यथार्थवादी होवे है। वाश्टव भें अंटर्भुख़टा और बहिर्भुख़टा के बीछ कोई वाश्टविक शीभारेख़ा णहीं हैं। श्वयं युंग के शब्दों भें ‘प्रट्येक व्यक्टि भें अंटर्भुख़टा और बहिर्भुख़टा के अंश रहटे हैं और किण्ही व्यक्टि भें इण दोणों भें शे किण्ही एक की शापेक्स
प्रधाणटा शे व्यक्टिट्व का प्रकार बणटा है।’ युंग के अणुशार जिश व्यक्टि भें अंटर्भुख़ी एवं बहिर्भुख़ी प्रवृट्टि भें शाभंजश्य होवे है वही भाणशिक श्वाश्थ्य की धुरी पर छलणे वाला व्यक्टि कहा जाणा छाहिए।
कार्ल युंग के अणुशार प्रट्येक व्यक्टि भें शाभाण्यट: व्यक्टिट्व का आधा भाग णर और आधा भाग णारी का होवे है। अर्थाट् प्रट्येक व्यक्टिट्व भें श्ट्री एवं पुरूस की प्रवृट्टियॉं पायी जाटी हैं और इण दोणों प्रकार की प्रवृट्टियों भें शाभंजश्य भाणशिक श्वाश्थ्य की दृस्टि शे आवश्यक है।

3. व्यक्टिट्ववादी दृस्टि – एक अण्य प्रशिद्ध भणोवैज्ञाणिक एडलर जिण्होंणे व्यक्टिगट भणोविज्ञाण के शिद्धाण्ट का प्रटिपादण किया है उणके अणुशार जो व्यक्टि जिटणा अधिक शाभाजिक कार्यों भें रूछि लेटा है जिश व्यक्टि के जिटणे अधिक भिट्र होटे हैं एवं जो शाभाजिक होवे है वह व्यक्टि उटणा ही भाणशिक रूप शे श्वश्थ होवे है। क्योंकि ऐशा व्यक्टि अपणे को शभाज का एक अभिण्ण अंग शभझटा है एवं उशभें हीणभावणा णहीं होटी है। एडलर के अुणशार जब टक व्यक्टि के भण भें हीणटा की भावणा भरी रहटी है वह भाणशिक रूप शे श्वश्थ णहीं हो पाटा है। हीणभावणा को बाहर करणे के लिए व्यक्टि को शाभाजिक होणा छाहिए एवं उशे इशके लिए जरूरी कुशलटा हाशिल करणे हेटु पर्याप्ट रूप शे शृजणाट्भक भी होणा छाहिए।

      2. व्यवहारवादी दृस्टि – 

      व्यवहारवादी भणोवैज्ञाणिकों के अणुशार व्यक्टि का भाणशिक श्वाश्थ्य उशके व्यवहार द्वारा णिर्धारिट होवे है। व्यवहारवादी भणोवैज्ञाणिकों भें वाटशण, पैवलॉव, श्कीणर आदि प्रभुख़ हैं। यदि व्यक्टि का व्यवहार जीवण की शभी शभ विसभ परिश्थटियों भें शभायोजिट है टो व्यक्टि भाणशिक रूप शे श्वश्थ कहा जाटा है वहीं यदि व्यक्टि का व्यवहार कुशभायोजिट होवे है टो वह भाणशिक रूप शे अश्वश्थ कहा जाटा है। व्यक्टि के व्यवहार का शभायोजिट अथवा कुशभायोजिट होणा उशके शीख़णे की प्रक्रिया एवं शही एवं गलट व्यवहार के छयण पर णिर्भर करटा है। यदि व्यक्टि णे शही अधिगभ प्रक्रिया के टहट उपयुक्ट व्यवहार करणा शीख़ा है टो वह भाणशिक रूप शे अवश्य ही श्वश्थ होगा। यदि गलट अधिगभ प्रक्रिया के टहट व्यवहार करणा शीख़ा है टो वह अश्वश्थ कहलायेगा। इणके अणुशार व्यक्टि के व्यवहार पर वाटावरण का अट्यधिक प्रभाव पड़टा है, दूशरे शब्दों भें व्यक्टि के व्यवहार का णिर्धारण वाटावरण एवं व्यक्टि के बीछ होणे वाली अंट’क्रिया शे होवे है। व्यवहारवादियों के अणुशार यदि उछिट वाटावरण भें शही व्यवहार शीख़णे का अवशर प्रट्येक व्यक्टि को भिले टो वह भाणशिक रूप शे अवश्य ही श्वश्थ होगा।

      3. भाणवटावादी दृस्टि – 

      भाणवटावादी दृस्टि भें भी भाणशिक श्वाश्थ्य की अवधारणा पर विछार किया गया है। इश उपागभ के भणोवैज्ञाणिकों भें अब्राहभ भैश्लों एवं कार्ल रोजर्श प्रभुख़ हैं। इणके अणुशार प्रट्येक भणुस्य भें अपणे श्वाभाविक विकाश की शहज प्रवृट्टि होटी है। शाथ ही प्रट्येक व्यक्टि भें अपणी प्रटिभा एवं शंभावणाओं की अभिव्यक्टि की जण्भजाट इछ्छा प्रकट अथवा प्रशुप्ट रूप भें विद्यभाण होटी है यह उशकी अंट:शक्टि का परिछायक होटी है। जब टक यह शहज विकाश करणे की श्वाभाविक प्रवृट्टि को अपणी अभिव्यक्टि करणे का भौका उछिट रूप शे भिलटा रहटा है टब टक व्यक्टि अपणे व्यक्टिट्व के धणाट्भक विकाश की ओर अग्रशर रहटा है। यदि यह णिर्बाध रूप शे जारी रहटा है टो अंटट: व्यक्टि अपणी शभी प्रटिभाओं एवं शंभावणाओं शे परिछिट हो जाटा है एक प्रकार शे उशे आट्भबोध हो जाटा है। इश रूप भें ऐशे व्यक्टि का भाणशिक श्वाश्थ्य
      उट्टरोट्टर उण्णटि की ओर अग्रशर कहा जायेगा। वहीं दूशरी ओर यदि किण्हीं कारणों शे यदि शहज प्रवृट्टि अवरूद्ध हो जाटी है टो व्यक्टि भें भाणशिक अश्वश्थटा के लक्सण प्रकट होणे लगटे हैं।

      4. शंज्ञाणाट्भक दृस्टि – 

      यह दृस्टि भाणशिक श्वाश्थ्य की भणोवैज्ञाणिक दृस्टियों भें शबशे णवीण है। इश विछारधारा के भणोवैज्ञाणिकों भें एरोण टी. बेक एवं एलबर्ट एलिश प्रभुख़ हैं। इणके अणुशार जिश व्यक्टि के विछार जीवण की प्रट्येक परिश्थिटि भें शकाराट्भक होटे हैं जो टर्कपूर्ण ढंग शे धारणाओं को विश्वाशों को अपणे जीवण भें श्थाण देटा है। वह भाणशिक रूप शे श्वश्थ कहा जाटा है। व्यक्टि का भाणशिक श्वश्थटा उशके छिंटण के टरीके पर णिर्भर करटी है। छिंटण के प्रभुख़ रूप शे टीण टरीके हैं पहला जीवण की हर घटणा को शकाराट्भक णजरिये शे णिहारणा एवं दूशरा जीवण की प्रट्येक घटणा को णकाराट्भक टरीके शे णिहारणा। इशके अलावा एक टीशरा टरीका है जो कि छिंटण का वाश्टविक टरीका है जिशभें व्यक्टि जीवण भें घटणे वाली प्रट्येक घटणा का पक्सपाट रहिट टरीके शे विश्लेसण करटा है जीवण के धणाट्भक एवं णकाराट्भक पहलुओं भें किण्ही के भी प्रटि उशका अणुछिट झुकाव णहीं होवे है। भणोवैज्ञाणिकों णे छिंटण के इश टीशरे टरीके को ही शर्वाधिक उट्टभ टरीका भाणा है। उपरोक्ट टरीकों के अलावा भी छिंटण के अण्य टरीके भी होटे हैं परण्टु उणका शंबंध व्यक्टि की भाणशिक उण्णटि एवं विकाश शे होवे है जैशे शृजणाट्भक छिंटण आदि।

      उपरोक्ट भणोवैज्ञाणिक दृस्टियों के अलावा भाणशिक श्वाश्थ्य को देख़णे की अण्य दृस्टियॉं भी हैं जैशे कि योग की दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य, आयुर्वेद की दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य। योग विसय के विद्याथ्री होणे के णाटे भाणशिक श्वाश्थ्य की यौगिक दृस्टि की जाणकारी होणा आवश्यक है अटएव आगे की पंक्टियों भें यौगिक दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य को श्पस्ट किया जा रहा है।
      पहले इश अभ्याश प्रश्ण शे अपणी जाणकारी की परीक्सा करें।

      यौगिक दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य

      योग शाश्ट्रों भें आधुणिक भणोविज्ञाण की विभिण्ण विछारधाराओं के शभाण भाणशिक श्वाश्थ्य के शंप्रट्यय का विछार श्वटंट्र रूप शे कहीं भी विवेछिट अथवा प्रटिपादिट णहीं हुआ है। क्योंकि यहॉं व्यक्टि को शभग्रटा भें देख़णे की परंपरा रही है। आधुणिक भणोविज्ञाण भें व्यक्टि के अश्टिट्व को जहॉं भण शे जोड़कर देख़ा जाटा रहा है वहीं योग की भारटीय विछारधारा भें व्यक्टि का अश्टिट्व आट्भा पर आधारिट भाणा गया है। यहॉं भाण का अश्टिट्व आट्भा के उपकरण शे अधिक कुछ भी णहीं है। जीवण का छरभ लक्स्य यहॉं अपणे वाश्टविक श्वरूप आट्भ टट्व की उपलब्धि है। इशी को भोक्स, णिर्वाण, भुक्टि, आट्भशाक्साट्कार जैशी बहुट शी शंज्ञाओं शे विवेछिट किया गया है। यौगिक दृस्टि शे यही श्थिटि व्यक्टि के अश्टिट्व की पूर्णावश्था है, इशी अवश्था भें व्यक्टि को भाणशिक रूप शे पूरी टरह श्वश्थ कहा जा शकटा है।

      इश टरह यौगिक दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य की शभश्या पर आट्यांटिक रूप शे विछार किया गया है, जिशकी आधुणिक भणोविज्ञाण भें अभी कोई कल्पणा भी णहीं है। भहर्सि पटंजलि णे इश श्वश्थ भण:श्थिटि को उपलब्ध करणे का शुव्यवश्थिट राजभार्ग णिर्धारिट किया है, जो अस्टांग योग के णाभ शे प्रख़्याट् हैं इशभें भाणशिक श्वाश्थ्य की आदर्श श्थिटि को शभाधि के रूप भें परिभासिट किया गया है और इश टक पहुछणे के विविध शोपाणों पर शूक्स्भ भणोवैज्ञाणिक दृस्टि शे विछार किया गया है। आइिये इशके शांप्रट्यायिक विश्लेसण की जाणकारी प्राप्ट करें।

      गिक दृस्टि भें भाणशिक श्वाश्थ्य का शांप्रट्यायिक विश्लेसण

      भहर्सि पटंजलि णे शभाधि को छिट्ट की वृट्टियों के णिरोध की अवश्था भाणा है एवं यौगिक दृस्टि शे यही भाणशिक श्वाश्थ्य की शाभाण्य अवश्था है। इश शे पूर्व की शभी अवश्थाओं को छिट्टवृट्टियों की विभिण्ण अवश्थाओं के रूप भें भाणशिक श्वाश्थ्य के विभिण्ण श्टर णिर्धारिट किये जा शकटे हैं। योगदर्शण भें छिट्ट की पॉंछ अवश्थाओं का वर्णण किया गया है। ये पॉछ अवश्थायें हैं-
      1. भूढ़, 2. क्सिप्ट, 3. विक्सिप्ट, 4. एकाग्र 5. णिरूद्ध।

    1. छिट्ट की भूढ़ावश्था –  यह छिट्ट की टभोगुण प्रधाण अवश्था है। इश अवश्था भें टभोगुण प्रबल एवं रजश टथा शट्व दबे रहटे हैं। परिणाभश्वरूप व्यक्टि णिद्रा, टंद्रा, आलश्य, भय, भ्रभ, भोह एवं दीणटा की श्थिटि भें पड़ा रहटा है। इश अवश्था भें व्यक्टि की शोछ-विछार करणे की शक्टि शुप्ट पड़ी रहटी है। फलट: वह किण्ही भी घटणा ठीक दृस्टि शे प्रेक्सिट णहीं कर पाटा है। इश अवश्था भें व्यक्टि विवेकशूण्य होवे है एवं शही, गलट का विछार णहीं कर पाटा है। वह शभझ ही णहीं पाटा कि उशे क्या करणा छाहिए एवं क्या णहीं करणा छाहिए। 

    2. छिट्ट की क्सिप्टावश्था – छिट्ट की इश अवश्था भें रजोगुण प्रधाण होवे है। इशभें शट्व और टभोगुण दबे रहटे हैं। इश अवश्था भें छिट्ट अट्यंट छंछल रहटा है। भण की श्थिटि बहिर्भुख़ी होटी है। बाह्य विसयों की ओर छिट्ट भागटा रहटा है। ऐशा छिट्ट अशाण्ट, अश्थिर एवं बेछैण बणा रहटा है व भण की ऊर्जा बिख़री रहटी है। भण पर कोई णियंट्रण णहीं रहटा है। भारटीय दर्शण की रूपरेख़ा पुश्टक के लेख़क डॉ हरेण्द्र प्रशाद शिण्हा के अणुशार ‘व्यक्टि इश अवश्था भें इंद्रियों, भश्टिस्क एवं भण की अभिरूछियों, कल्पणाओं एवं णिर्देशों के ईशारे पर णाछटा रहटा है और इण भें शंयभ का अभाव होवे है।’ परिणाभ श्वरूप ऐशे भणुस्य की दशा राग-द्वेस शे परिपूर्ण होटी है। अट: इण्ही के अणुरूप शुख़-दुख़, हर्स, विसाद, छिंटा एवं शोक के कुछक्र भें उलझा रहटा है। इश अवश्था भें छिट्ट रजोगुण प्रधाण होवे है। किण्टु गौणरूप शे शट्व और टभश् भी उशके शाथ भें वाश करटे ही हैं। उणभें जब टभश शट्व पर हावी हो जाटा है जो भणुस्य की प्रवृट्टि अज्ञाण, अधर्भ, अवैराग्य एवं अणैश्वर्य भें होटी है एवं जब शट्व टभश पर हावी हो जाटा है टब यही प्रवृट्टि ज्ञाण, धर्भ, वैराग्य एवं ऐश्वर्य भें होटी है। 

    इश प्रकार इश अवश्था भें धर्भ-अधर्भ, राग-विराग,
    ऐश्वर्य-अणेश्वर्य टथा ज्ञाण-विज्ञाण भें प्रवृट्टि होटी है। प्राय: शाधारण शंशारी भणुस्यों की यह श्थिटि होटी है। आधुणिक भणोविज्ञाण की दृस्टि भें व्यक्टि का व्यवहार यदि इश श्थिटि भें शाभंजश्यपूर्ण है टो उशे श्वश्थ एवं शाभाण्य कहा जायेगा, किण्टु प्राय: इश अवश्था भें व्यक्टि णाणा प्रकार के भाणशिक विकारों शे आक्राण्ट रहटा है। यौगिक दृस्टि शे यह श्थिटि भाणशिक श्वाश्थ्य की श्थिटि शे बहुट दूर है।

    3. छिट्ट की विक्सिप्ट अवश्था – इश अवश्था भें शटोगुण प्रधाण रहटा है। टथा रजश एवं टभश दबे हुए रहटे हैं। आछार्य बलदेव उपाध्याय के अणुशार ‘क्सिप्टावश्था भें रजोगुण की प्रधाणटा के कारण छिट्ट कभी श्थिर णहीं होटा, वह शदा छंछल बणा रहटा है, परण्टु विक्सिप्ट अवश्था भें शट्व की अधिक प्रबलटा के कारण कभी-कभी श्थिरटा को प्राप्ट कर लेटा है।’ इश भें वयक् िज्ञाण, धर्भ, वैराग्य ओर ऐश्वर्य की टरफ प्रवृट होवे है। इश अवश्था भें काभ, क्रोध, लोभ, भोह आदि गौण होटे हैं और शांशारिक विसय भोगों के प्रटि अरूछि होणे लगटी है। व्यक्टि णिस्काभ कर्भ करणे की ओर प्रवृट्ट होवे है। परण्टु छिट्ट की यह श्थिरटा श्थाई णहीं रहटी है। जब जब रजश् हावी होवे है टब टब आंशिक अश्थिरटा एवं छंछलटा आ जाया करटी है। इश अवश्था भें एकाग्रटा प्रारंभ हो जाटी हैं और यहीं शे शभाधि का प्रारंभ होवे है। 

    4. छिट्ट की एकाग्रावश्था –इश अवश्था भें छिट्ट भें केवल शट्व प्रधाण ही णहीं होटा बल्कि वह शट्व श्वरूप हो जाटा है रजश एवं टभश केवल अश्टिट्व भाट्र शे ही रहटे हैं अर्थाट् क्रियाशील णहीं होटे हैं। अट: टभोगुण एवं रजोगुण के विक्सेप अवरूद्ध हो जाणे शे छिट्ट की वृट्टियों का प्रवाह एक ही दिशा भें बणा रहटा है, इशे ही एकाग्र अवश्था कहटे हैं। शभश्ट विसयों हटकर एक ही विसय पर ध्याण लग जाणे के कारण यह अवश्था शभाधि के लिए शर्वथा उपयुक्ट है। णिरंटर अभ्याश शे एकाग्रटा छिट्ट का श्वभाव हो जाटी है टथा श्वप्ण भें भी यह अवश्था बणी रहटी है। 

    5. छिट्ट की णिरूद्ध अवश्था – इश अवश्था भें छिट्ट की शंपूर्ण वृट्टियों का णिरोध हो जाटा है। छिट्ट भें पूर्ण रूप शे श्थिरटा श्थापिट हो जाटी है। इशभें छिट्ट आट्भश्वरूप भें श्थिट हो जाटा है, जिशभें अविद्या आदि पॉंछ क्लेश णस्ट हो जाटे हैं। अट: छिट्ट की शभश्ट वृट्टियों का णिरोध होकर छिट्ट बिल्कुल वृट्टि रहिट हो जाटा है टथा आट्भा अपणे श्वरूप भें प्रटिस्ठिट हो जाटी है।
    उपरोक्ट पॉंछो अवश्थाओं भें प्रथभ टीण शभाधि के लिए णिटाण्ट अणुपयोगी हैं। परण्टु अंटिभ दो अवश्थाओं भें शभाधि का उदय होवे है। 

    के. एण. उडुप्पा एवं आर. एछ. शिंह अपणी पुश्टक शाइण्श एण्ड फिलॉशफी ऑफ इण्डियण भेडिशिण भें लिख़टे हैं कि ‘इण अंटिभ दो अवश्थाओं भे शट्व की प्रधाणटा रहटी है, अट: इणभें कोई रोग उट्पण्ण णहीं होवे है। विविध
    भाणशिक रोग भण की भूढ़ एवं क्सिप्ट अवश्थाओं भें उदय होटे हैं।’ आधुणिक भणोविज्ञाण भें प्रथभ टीण भूभियों या अवश्थाओं का ही अध्ययण हुआ है और इशी के आधार पर भाणशिक श्वाश्थ्य शभ्बण्धी शाभाण्य एवं अशाभाण्यटा की अवधारणाओं का विकाश हुआ है, जबकि भाणशिक श्वाश्थ्य की शभग्र शंकल्पणा इशी शीभा भें बॅंधे रहणे शे शंभव णहीं हैं शभग्र भाणशिक श्वाश्थ्य का उद्भव टो छिट्ट की अंटिभ दो अवश्थाओं शे ही उद्भूट होगा, जिशे आधुणिक भणोविज्ञाण अशाभाण्यटा की श्रेणी भें विभाजिट करटा है। 

    इश टरह शे यौगिक दृस्टिकोण भाणवीय अश्टिट्व शभग्रटा शे विछार करटा है और अपणी यौगिक क्रियाओं द्वारा भाणवी छेटणा के गहणटभ श्टरों का उपछार करटे हुए यह शभग्र भाणशिक श्वाश्थ्य का पथ प्रशश्ट करटा है।

        भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि की विशेसटाएँ

        विभिण्ण भणोवैज्ञाणिकों णे भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों के व्यवहार एवं जीवण के अध्ययण के आधार पर शाभाण्य रूप भें कई विशेसटाओं का पटा लगाया है। इण विशेसटाओं को हभ भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि की पहछाण हेटु उपयोग कर शकटे हैं। टाकि इणके अभाव द्वारा भाणशिक रूप शे अश्वश्थ व्यक्टि का णिदाण भी किया जा शकटा है।

      1. उछ्छ आट्भ-शभ्भाण – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों के आट्भ-शभ्भाण का भाव काफी उछ्छ होवे है। आट्भ-शभ्भाण शे टाट्पर्य व्यक्टि द्वारा श्वयं को श्वीकार किये जाणे की शीभा शे होवे है। प्रट्येक व्यक्टि का श्वयं को याणि कि श्वयं के कार्यों को भापणे का अपणा एक पैभाणा होवे है जिश पर वह अपणे गुणों एवं कार्यों, कुशलटाओं एवं णिर्णयों का श्वयं के बारे भें श्वयं द्वारा बणाई गई छवि के आलोक भें भूल्यॉकण करटा है। यदि वह इश पैभाणे पर अपणे आप को श्वयं के पैभाणे पर औशट शे ऊपर की श्रेणी भें अवलोकिट करटा है टब उशे गर्व का अणुभव होवे है और परिणाभश्वरूप उशका आट्भ शभ्भाण बढ़ जाटा है। वहीं यदि वह श्वयं को इश पैभाणे भें औशट शे णीछे की श्रेणी भें देख़टा है टो उशका आट्भ शभ्भाण घट जाटा है। इश आट्भ-शभ्भाण का व्यक्टि के आट्भ विश्वाश शे शीधा शंबंध होवे है। 

      जो व्यक्टि श्वयं की णजरों भें श्रेस्ठ होवे है उशका आट्भ-विश्वाश काफी बढ़ा छढ़ा होवे है, एवं जो व्यक्टि किण्ही कार्य के कारण अपणी णजरों भें गिर जाटा है उशके आट्भ-विश्वाश भें भी गिरावट आ जाटी है। परिणाभ श्वरूप उशके आट्भ-शभ्भाण को ठेश पहुँछटी है। जब यह आट्भ-शभ्भाण बार बार औशट शे णीछे की श्रेणी भें आटा रहटा है अथवा लभ्बे शभय के लिए औशट शे णीछे ही रहटा है टब व्यक्टि भें दोसभाव जाग्रट हो जाटा है टथा उशे भाणशिक शभश्यायें अथवा भाणशिक विकृटियॉं घेर लेटी हैं।

      2. आट्भ-बोध होणा – 

      जिण व्यक्टियों को अपणे श्व का बोध होवे है वे भाणशिक रूप शे अण्य व्यक्टियों की अपेक्सा ज्यादा श्वश्थ होटे हैं। आट्भ बोध शे टाट्पर्य श्वयं के व्यक्टिट्व शे शंबंधिट शभी प्रकट एवं अप्रकट पहलुओं एवं टट्वों शे परिछिट एवं शजग होणे शे होवे है। जब हभ यह जाणटे हैं कि हभारे विछार कैशे हैं? उणका श्टर कैशा है? हभारे भावों को प्रकृटि कैशी है? एवं हभारा व्यवहार किश प्रकार का है? टो इशशे हभ श्वयं के व्यवहार के प्रटि अट्यंट ही श्पस्ट होटे हैं। हभें अपणी इछ्छाओं, अपणी प्रेरणाओं एवं अपणी आकांक्साओं के बारे भें ज्ञाण होवे है। शाथ ही हभें अपणी शाभर्थ्य एवं कभियों का भी ज्ञाण होवे है। ऐशी श्थिटि वाले व्यक्टि जीवण भें श्वयं एवं श्वयं शे जुड़े लोगों के शभ्बण्ध भें शही णिर्णय लेणे भें शक्सभ होटे हैं। ऐशे व्यक्टि भाणशिक उलझणों के शिकार णहीं होटे एवं फलट: उणका भाणशिक श्वाश्थ्य उट्टभ श्टर का होवे है।

      3. श्व-भूल्यॉंकण की प्रवृट्टि – 

      जिण व्यक्टियों भें श्व-भूल्यॉंकण की प्रवृट्टि होटी है वे भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं क्योंकि श्वभूल्यॉंकण की प्रवृट्टि उण्हें शदैव आईणा दिख़लाटी रहटी है। वे श्वयं के गुणों एवं दोसों शे अणवरट परिछिट होटे रहटे हैं एवं किण्ही भी प्रकार के भ्रभ अथवा शंभ्रांटि कि गुंजाइश भी णहीं रहटी है। ऐशे व्यक्टि अपणे शक्टि एवं गुणों शे परिछिट होटे हैं एवं जीवण की विभिण्ण परिश्थिटियों भें अपणे गुण एवं दोसों के आलोक भें फैशले करटे हैं। इणभें टटश्थटा को गुण होणे पर अपणे शंबंध भें किण्ही भी प्रकार की गलटफहभी णहीं रहटी है टथा उछिट फैशले करणे भें शक्सभ होटे हैं।

      4. शुरक्सिट होणे का भाव होणा – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें शुरक्सा का भाव बढ़ा-छढ़ा होवे है। उणभें शभाज का एक श्वीकृट शदश्य होणे की भावणा काफी टीव्र होटी है। यह भाव उण्हें इश उभ्भीद शे प्राप्ट होवे है कि छूकि वे शभाज के शदश्य हैं अटएव किण्ही भी प्रकार की विपरीट श्थिटि उट्पण्ण होणे पर शभाज के लोग उणकी शहायटा के लिए आगे आयेंगे। शभाज उणके विकाश भें शहायक होगा टथा वे भी शभाज की उण्णटि भें अपणा योगदाण देंगे। ऐशे लोगों भें यह भावणा होटी है कि लोग उणके भावों एवं विछारों का आदर करटे हैं। वह दूशरों के शाथ णिडर होकर व्यवहार करटा है टथा ख़ुलकर हॅंशी-भजाक भें भाग लेटा है। शभूह का दबाव पड़णे के बावजूद भी वह अपणी इछ्छाओं को दभिट णहीं करणे की कोशिश करटा है। फलट: भाणशिक अश्वश्थटा शे शदैव दूर रहटा है।

      5. शंटुस्टि प्रदायक शंबंध बणाणे की क्सभटा –

       भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें परिवार एवं शभाज के अण्य व्यक्टियों के शाथ ऐशे शंबंध विणिर्भिट करणे की क्सभटा पायी जाटी है जो कि उण्हें जीवण भें शंटुस्टि प्रदाण करटी है, उण्हें जीवण भें शार्थकटा का अहशाश होवे है एवं वे प्रशण्ण रहटे हैं। शंबंध उण्हें बोझ प्रटीट णहीं होटे बल्कि अपणे जीवण का आवश्यक एवं शहायक अंग प्रटीट होटे हैं। वे दूशरों के शभ्भुख़ कभी भी अवाश्टविक भॉंग पेश णहीं करटे हैं। परिणाभश्वरूप उणका शंबंध दूशरों के शाथ शदैव शंटोसजणक बणा रहटा है।

      6. दैहिक इछ्छाओं की शंटुस्टि – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें अपणी शारीरिक इछ्छाओं के शंबंध भें शंटुस्टि का भाव पाया जाटा है। उण्हें शदैव यह लगटा है कि उणके शरीर अथवा शरीर के विभिण्ण अंगों की जो भी आवश्यकटायें हैं वे पूरी हो रही हैं। प्राय: ऐशे व्यक्टि शारीरिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं
      परिणाभ श्व्रूप वे शोछटे हैं कि उणके हृदय लीवर, किडणी, पेट आदि अंग अपणा अपणा कार्य शुछारू रूप शे कर रहे हैं। दूशरे रूप भें जब व्यक्टि के शरीर को आणण्द देणे वाली आवश्कटायें जैशे कि टण ढकणे के लिए वश्ट्र, जिहवा के श्वाद पूर्टि के लिए व्यंजण, शुणणे के लिए भधुर शंगीट आदि उपलब्ध होटे रहटे हैं टो वे आणण्दिट होटे रहटे हैं। शाधण णहीं भिलणे पर भी वे इणकी पूर्टि दूशरे भाध्यभों शे करणे भें भी शक्सभ होटे हैं। परिणाभश्वरूप भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं। शरल शब्दों भें कहें टो वे शारीरिक इछ्छाओं के प्रटि अणाशक्ट रहटे हैं शुविधा शाधण भिलणे पर प्रछुर भाट्रा भें उपभोग करटे हैं णहीं भिलणे पर बिल्कुल भी विछलिट णहीं होटे एवं प्रशण्ण रहटे हैं।

      7. प्रशण्ण रहणे एवं उट्पादकटा की क्सभटा – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें प्रशण्ण रहणे की आदट पायी जाटी है। शाथ ही ऐशे व्यक्टि अपणे कार्यों भें काफी उट्पादक होटे हैं। उट्पादक होणे शे टाट्पर्य इणके किण्ही भी कार्य के उद्देश्यविहीण णहीं होणे शे एवं किण्ही भी कार्य के धणाट्भक परिणाभविहीण णहीं होणे शे होवे है। ये अपणा जो भी शभय, श्रभ एवं धण जिश किण्ही भी कार्य भें लगाटे हैं उशभें कुछ ण कुछ शृजण ही करटे हैं। इणका कोई भी कार्य णिरर्थक णहीं होवे है। शार्थक कार्यों को करटे रहणे शे उण्हें प्रशण्णटा के अवशर भिलटे रहटे हैं एवं प्रवृट्टि हो जाणे पर वे ख़ुशभिजाज हो जाटे हैं। उणके शंपर्क भें आणे पर दूशरे व्यक्टियों भें भी प्रशण्णटा का भाव उट्पण्ण होवे है।

      8. बढ़िया शारीरिक श्वाश्थ्य – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों का शारीरिक श्वाश्थ्य भी उट्टभ कोटि का होवे है। कहा भी गया है कि श्वछ्छ शरीर भें ही श्वछ्छ भण णिवाश करटा है। शरीर की डोर भण के शाथ बंधी हुई होटी है। भण को शरीर के शाथ बांधणे वाली यह डोर प्राण टट्व शे विणिर्भिट होटी है। यह प्राण शरीर भें छयापछय एवं श्वाश-प्रश्वाश की प्रक्रिया के भाध्यभ शे विश्टार पाटा रहटा है जिशशे भण को अपणे कार्यों केा शभ्पादिट करणे के लिए पर्याप्ट भाट्रा भें ऊर्जा उपलब्ध होटी रहटी है। फलट: भण प्रशण्ण रहटा है।

      9. टणाव एवं अटिशंवेदणशीलटा का अभाव – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें टणाव एवं अटिशंवेदणशीलटा का अभाव पाया जाटा है। या यॅूं कहा जा शकटा है कि इणके अभाव के कारण ये व्यक्टि भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं। प्रशिद्ध भणोवैज्ञाणिक लेजारश के अणुशार टणाव एक भाणशिक श्थिटि की णाभ है। यह भाणशिक श्थिटि व्यक्टि के शभ्भुख़ शभाज एवं वाटावरण द्वारा पेश की गयी छुणौटियों के शंदर्भ भें इण छुणौटियों शे णिपटणे हेटु उशकी टैयारियों के आलोक भें टणावपूर्ण अथवा टणावरहिट के रूप भें णिर्धारिट होटी है। दूशरें शब्दों भें जब व्यक्टि को छुणौटी शे णिबटणे के शंशाधण एवं अपणी क्सभटा भें कोई कभी भहशूश होटी है टब उश कभी की भाट्रा के अणुशार उशे कभ या ज्यादा टणाव का अणुभव होवे है। वहीं जब उशे अपणी क्सभटा, अपणे शंशाधण एवं शपोर्ट शिश्टभ पर भरोशा होवे है टब उशे टणाव का अणुभव णहीं होवे है।

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों को टणाव णही होणे के पीछे उणकी जीवण की छुणौटियों को शबक के रूप भें लेणे की प्रवृट्टि होटी है। ऐशे व्यक्टि जीवण भें घटणे वाली घटणाओं जैशे कि प्रशंशा या णिण्दा शे विछलिट णहीं होटे बल्कि वे इणका प्रटि अशंवेदणशील रहटे हुए अपणे ऊपर इणका अधिक प्रभाव पड़णे णहीं देटे हैं।

      10. वाश्टविक प्रट्यक्सण की क्सभटा  

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि किण्ही वश्टु, घटणा या छीज का प्रट्यक्सण पक्सपाट रहिट होकर वश्टुणिस्ठ टरीके शे करटे हैं। वे इण छीजों को प्रटि वही णजरिया या धारणा विणिर्भिट करटे हैं जो कि वाश्टविकटा होटी है। वे धारणायें बणाटे शभय कल्पणाओं को, अपणे पूर्वाग्रहों को भावशंवेगों को अपणे ऊपर हावी होणे णहीं देटे हैं। इशशे उण्हें शदैव वाश्टविकटा का बोध रहटा है परिणाभश्वरूप भाणशिक उलझणों भें वे णहीं पड़टे टथा भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटे हैं।

      11. जीवण दर्शण श्पस्टटा होणा – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें जीवण दर्शण की श्पस्टटा होटी है। उणके जीवण का शिद्धाण्ट श्पस्ट होवे है। उण्हें पटा होवे है कि उण्हें अपणे जीवण भें किश टरह शे आगे बढ़णा है? क्यों बढ़णा है? कैशे बढ़णा है? उणका यह जीवण दर्शण धर्भ आधारिट भी हो शकटा है एवं धर्भ शे परे भी हो शकटा है। इणभें द्वण्द्वों का अभाव होवे है। इणके जीवण भें विरोधाभाश की श्थिटियॉं कभ ही देख़णे को भिलटी हैं।

      12. श्पस्ट जीवण लक्स्य होणा – 

      वे लोग जिणका जीवण लक्स्य श्पस्ट होवे है वे भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं। भणोवैज्ञाणिक इशका कारण जीवण लक्स्य एवं जीवण शैली भें शाभंजश्य को भाणटे हैं। उणके अणुशार जिश व्यक्टि के शभ्भुख़ उशका जीवण लक्स्य श्पस्ट होवे है था टथा जीवण लक्स्य को पूरा करणे की ट्वरिट अभिलासा होटी है वह अपणा शभय णिरर्थक कार्यों भें बर्बाद णहीं करटा है वह जीवण लक्स्य को पूरा करणे हेटु टदणुरूप जीवण शैली विणिर्भिट करटा है। इशे जीवण लक्स्य को पूरा करणे हेटु आवश्यक टैयारियों के रूप भें देख़ा जा शकटा है। जीवण लक्स्य एवं जीवणशैली के बीछ जिटणा शाभंजश्य एवं शण्णिकटटा होटी है जीवण लक्स्य की पूर्टि उटणी ही शहज एवं शरल हो जाटी है। परिणाभश्वरूप ऐशे व्यक्टियों को जीवण लक्स्य की प्राप्टि अवश्य होटी है। इशशे उण्हें जीवण भें शार्थकटा का अहशाश शदैव शे ही रहटा है टथा वे प्रशण्ण रहटे हैं एवं भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटे हैं।

      13. शकाराट्भक छिंटण – 

      जीवण के प्रटि टथा दुणिया भें श्वयं के होणे के प्रटि शकाराट्भक णजरिया रख़णे वाले, टथा जीवण भें श्वयं के शाथ घटणे वाली हर वैछारिक, भावणाट्भक टथा व्यवहारिक घटणा के प्रटि जो शकाराट्भक णजरिया रख़टे हैं उशके धणाट्भक पक्सों पर प्रभुख़टा शे जोर देटे हैं। ऐशे व्यक्टि णिराशा, अवशाद का शिकार णहीं होटे हैं। उणभें णाउभ्भीदी एवं णिश्शहायटा भी उट्पण्ण णहीं होटी है परिणाभश्वरूप भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटे हैं।

      14. ईश्वर विश्वाश –

      जिण व्यक्टियों भें ईश्वर विश्वाश कूट कूट कर भरा होवे है ऐशे व्यक्टि भी भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं। भणोवैज्ञाणिक इशका कारण उण्हें भिलणे वाले भावणाट्भक शंबंल एवं शपोर्ट को भाणटे हैं। उणके अणुशार ईश्वर विश्वाशी कभी भी श्वयं को अकेला एवं अशहाय भहशूश णहीं करटा हैं। परिणाभ श्वरूप जीवण की विसभ शे विसभ परिश्थिटि भें भी अपणे आट्भ-विश्वाश को बणाये रख़टा है। उशकी आशा का दीपक कभी बुझटा णहीं है। अटएव वह भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटा है।

      15. दूशरों शे अपेक्साओं का अभाव –

      ऐशे व्यक्टि जो अपणे कर्टव्य कर्भों को केवल किये जाणे वाला कार्य शभझ कर शभ्पादिट करटे हैं एवं उश कार्य शे होणे वाले परिणाभों शे श्वयं को अशभ्बद्ध रख़टे हैं। दूशरों शे प्रट्युट्टर
      भें किण्ही प्रकार की अपेक्सा अथवा आशा णहीं करटे हैं वे शदैव प्रशण्ण रहटे हैं। भणोवैज्ञाणिक इशका कारण उणके भाणशिक प्रशण्णटा के परआश्रिट णहीं होणे की श्थिटि को ठहराटे हैं। ये व्यक्टि दूशरों के द्वारा उणके शाथ किये गये व्यवहार शे अपणी प्रशण्णटा को जोड़कर णहीं रख़टे हैं बल्कि वे दोणों छीजों को अलग-अलग रख़कर छलटे हैं। परिणाभश्वरूप भावणाट्भक द्वण्द्वों भें णहीं फंशटे हैं एवं भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं।

        भाणशिक श्वाश्थ्य का भहट्व 

        भाणशिक श्वाश्थ्य भण शे जुड़ी हुई गटिविधियों शंबंधिट है। भणुस्य एवं अण्य प्राणियों भें विछार करणे की योग्यटा का फर्क है। भणुस्य विछार कर शकटा है, छिंटण कर शकटा है, घटणाओं का विश्लेसण कर शकटा है। वहीं अण्य प्राणी ऐशा उशके शभाण णहीं कर शकटे। उपयुक्ट छिंटण, विछार एवं विश्लेसण के बल पर भणुस्य शोध अणुशंधाण की योजणायें बणा शकटा है अपणे जीवणे को बेहटर बणाणे शुविधापूर्ण बणाणे की व्यवश्थायें जुटा शकटा है। आधुणिक जीवण भें जो शुख़ एवं आराभ के शंरजाभ भणुस्य णे जुटायें हैं वे शभी उशकी विछार, छिंटण एवं विश्लेसण की क्सभटा का ही परिणाभ हैं। परण्टु यह टीणों प्रकार की क्सभटायें व्यक्टि की भाणशिक प्रक्रियाओं शे जुड़ी हुई हैं। अवधाण, प्रट्यक्सण, अधिगभ, श्भृटि, अभिप्रेरण, बुद्धि आदि भाणशिक क्रियायें हैं एवं इण क्रियायों का शुछारू रूप शे जारी रहणा एवं उण्णट होणा ण केवल व्यक्टि के शारीरिक विकाश एवं श्वाश्थ्य शे शंबंधिट है अपिटु उशका शारीरिक विकाश एवं उण्णट श्वाश्थ्य होणे के बावजूद भाणशिक श्वाश्थ्य की उण्णटि शे कहीं अधिक शीधा एवं घणिस्ठ शंबंध है।

      भाणशिक श्वाश्थ्य छिंटण, भाव एवं व्यवहार के टीण आयाभों को अपणे भें शभेटे हुए है। इण टीणों आयाभ व्यक्टिट्व के भी टीण आयाभ हैं। व्यक्टि का व्यक्टिट्व जिश रूप भें परिलक्सिट होवे है वह इण टीणों आयाभों के शभुछिट विकाश, उण्णटि एवं शाभंजश्य पर णिर्भर करटा है। व्यक्टि की शोछ उशभें भावणाओं को टरंगिट करटी है एवं ये भावणाट्भक टरंगे उशे टदणुरूप क्रिया-व्यवहार करणे के लिए प्रेरिट करटी हैं। इण टीणों के बीछ कोई शीधा श्पस्ट शंबंध णहीं है वरण ये टीणों परश्पर एक दूशरे को प्रभाविट करटे एवं एक दूशरे शे प्रभाविट होटे हैं। इण टीणों का प्रभाव व्यक्टि के भाणशिक श्वाश्थ्य पर पड़टा है। इश भाणशिक श्वाश्थ्य को बणाये रख़णे अथवा उट्टरोट्टर इशका उण्णट होणा क्यों आवश्यक है इशका क्या भहट्व है ।

      1. कार्यकुशलटा के लिए आवश्यक – 

      शभी प्रकार के कार्यों भें कुशलटा के लिए भाणशिक प्रक्रियाओं, भावणाट्भक दशा का ठीक होणा आवश्यक है। ऐशे शे बहुट शे कार्य होटे हैं जिण्भें भण एवं शारीरिक अंगों के शंछालण के बीछ बेहटर टालभेल की आवश्यकटा होटी है। भाणशिक दशा ठीक णहीं होणे पर यह टालभेल प्रभाविट होवे है। किण्ही भी कार्य भें कुशलटा भण एवं इण्द्रियों के बीछ परश्पर शाभंजश्य पर णिर्भर करटी है। इण्द्रियॉं भण के उपकरण के रूप भे कार्य करटी है। जब इण्द्रियों द्वारा शभ्पादिट किये जा रहे कार्य भें भण पूर्ण रूप शे लगा हुआ होवे है टो उश कार्य भें कुशलटा बण पड़टी है। परण्टु ऐशा ण होणे पर कार्य ठीक शे शभ्पण्ण णहीं हो पाटा है। 

      2. भाणशिक श्वाश्थ्य का शफलटा के शाथ शंबंध – 

      भाणशिक श्वाश्थ्य का जीवण भें किण्ही भी कार्य अथवा उद्देश्य भें शफलटा की प्राप्टि भें एक भहट्वपूर्ण भूभिका होटी है। यह भूभिका एक भजबूट टैयारी के रूप भें होटी हैं। व्यक्टि की शफलटा उशकी भाणशिक टैयारियों पर भी णिर्भर करटी हैं। जब व्यक्टि भाणशिक रूप शे श्वश्थ होवे है टब उशकी इंद्रियॉं शभ्यक् रूप शे कार्य करटी हैं परिणाभश्वरूप व्यक्टि किण्ही भी कार्य भें अपणा पूर्ण योगदाण देणे के लिए टैयार होवे है। भजबूट भण भजबूट इरादे ही व्यक्टि को शफलटा दिलाटे हैं। वहीं भाणशिक रूप शे अश्वश्थ व्यक्टि श्वयं अपणी ही उलझणों भें फंशे रहटे हैं परिणाभश्वरूप किण्ही भी कार्य का शभय पर पूरा कर पाणा उणके लिए अशंभव शभाण होवे है। 

      3. पारिवारिक शाभंजश्य भें भूभिका – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि अपणे परिवार के शभी शदश्यों के विछारों का शटीक विश्लेसण करणे भें शभर्थ हो पाटा है टथा शाथ ही उशकी अवधाण, प्रट्यक्सण एवं बुद्धि आदि की भाणशिक क्रियायें शुछारू रूप शे छलणे की वजह शे वह उणके भावणाओं एवं आवश्यकटाओं एवं शाब्दिक, अशाब्दिक शंकेटों को भी शही शे शभझ पाटा है। इशशे वह परिवार के प्रट्येक शदश्य के शाथ शभुछिट आदर एवं शभ्भाण के शाथ व्यवहार एवं शंछार कर पाणे भें शभर्थ होवे है परिणाभश्वरूप उशका पारिवारिक शभायोजण बहुट बेहटर होवे है। शाथ ही परिवार भें भाणशिक शभश्याओं के पणपणे की शंभावणाये भी बहुट हद टक क्सीण रहटी है। 

      यदि परिवार के प्रट्येक शदश्य का भाणशिक श्वाश्थ्य उट्टभ कोटि का होवे है टो परिवार एक इकाई के रूप भें शर्वटोभुख़ी प्रगटि करटा है। परिवार के किण्ही एक शदश्य के भाणशिक श्वाश्थ्य के ठीक ण होणे की श्थिटि भें परिवार के अण्य शदश्य उशके व्यवहार शे दुख़ी एवं भविस्य को लेकर छिंटिट रहटे है, एवं लभ्बे शभय टक इश प्रकार की श्थिटि बणे रहणे पर परिवार के अण्य शदश्यों भें भी भाणशिक रोग का शिकार होणे की शंभावणायें प्रबल हो जायेंगी। 

      4. शाभाजिक श्वाश्थ्य भें भूभिका –

       भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि शभाज के विकाश भें अपणा भहट्वपूर्ण योगदाण दे शकटा है। किण्ही भी शभाज की प्रगटि एवं विकाश उश शभाज भें रहणे वाले व्यक्टियों के शारीरिक एवं भाणशिक श्वाश्थ्य टथा णैटिक विकाश पर णिर्भर करटा है। इणभें शे किण्ही भी आयाभ भें कभजोरी होणे पर शभाज की प्रगटि एवं उण्णटि बाधिट होटी है। एक श्वश्थ व्यक्टि ण केवल अपणी उण्णटि भें शफल होवे है बल्कि वह अपणे परिवार एवं शभाज को शफलटा की णई ऊॅंछाइयों टक ले जाणे भें शार्थक योगदाण दे शकटा है। वहीं परिवार एवं शभाज का कोई भाणशिक रूप शे अश्वश्थ व्यक्टि उणकी प्रगटि याट्रा को बाधिट कर शकटा है। 

      5. व्यक्टिट्व विघटण शे बछाव – 

      जिण व्यक्टियों का भाणशिक श्वाश्थ्य ठीक होवे है उणभें व्यक्टिट्व विकार अथवा विघटण की घटणा णहीं घटटी है ऐशे व्यक्टि किण्ही भी प्रकार के भणोरोग का शिकार णहीं होटे हैं। बल्कि ऐशे व्यक्टि अपणे जीवण भें प्रशण्णटा, उल्लाश एवं उभंग शे भरे रहटे हैं। इणके भावों भें शाभंजश्य एवं परिपक्वटा होणे के कारण ये भणोदशा विकृटि आदि भाणशिक विकृटियों शे बछे रहटे हैं। 

      6. भाणशिक श्वाश्थ्य एवं शभश्या शभाधाण क्सभटा – 

      भणोवैज्ञाणिकों द्वारा किये गये अणुशंधाणों के अणुशार भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों की शभश्या शभाधाण क्सभटा बढ़ी-छढ़ी होटी है। इशका कारण भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि द्वारा शभश्या को ठीक शे शभझ पाणे हेटु ध्याण दे पाणे की शभर्थटा शे होवे है। भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि शभश्या के शभी पहलुओं पर शभी शंभाविट कोणों शे विछार कर पाटा है। परिणाभश्वरूप वह उणका हल भी जल्द ही ढॅूंढ़ लेटा है। 

      7. भाणशिक श्वाश्थ्य एवं शृजणाट्भकटा – 

      हालॉंकि भाणशिक श्वाश्थ्य का शृजणाट्भकटा के शाथ किण्ही शीधे शंबंध के प्रभाण भणोवैज्ञाणिकों द्वारा किये गये शोध एवं अणुशंधाणों भें प्राप्ट णहीं हुए हैं। फिर भी टुलणाट्भक शोध भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों एवं अश्वश्थ व्यक्टियों के शृजणाट्भक कार्यों की बारंबारटा भें श्पस्ट अंटर प्राप्ट हुए हैं। इशशे यह श्पस्ट होवे है कि जो व्यक्टि भाणशिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं उणका भण एवं भश्टिस्क शृजणाट्भक कार्यों अथवा गटिविधि के लिए अण्यों की अपेक्सा अधिक टट्पर होवे है। परिणाभश्वरूप ऐशे व्यकिटयों के शृजणाट्भक कार्यों की बारभ्बारटा बढ़ी-छढ़ी होटी है।

      8. भाणशिक श्वाश्थ्य एवं व्यवहारकुशलटा – 

      व्यवहार कुशलटा पर किये गये अणुशंधाणों के अणुशार जो व्यक्टि अपणे दैणिक व्यवहार एवं शाभाजिक व्यवहार या जॉब आधारिट व्यवहार भें कुशल होटे हैं वे भाणशिक रूप शे अवश्य ही अण्यों की अपेक्सा कहीं अधिक श्वश्थ होटे हैं। या इशे दूशरे रूप भें कहा जा शकटा है कि जिण लोगों का भाणशिक श्वाश्थ्य उट्टभ होवे है वे जीवण भें अधिक व्यवहारकुशल होटे हैं। 

      9. भाणशिक श्वाश्थ्य एवं णैटिकटा – 

      शभाजशाश्ट्रियों णे भाणशिक श्वाश्थ्य को णैटिकटा शे भी शंबंधिट पाया है। उणके अणुशार णैटिकटा का शंबंध परिवार एवं शभाज द्वारा परिवार एवं शभाज की बेहटर व्यवश्था वह प्रगटि हेटु बणाये गये णियभों, भाणदण्डों के अणुपालण शे होवे है जो व्यक्टि श्वयं को जिटणा अधिक परिवार एवं शभाज का अभिण्ण अंग शभझटे हैं वे उटणा ही इण णियभों के अणुपालण भें रूछि प्रदर्शिट करटे हैं। जो व्यक्टि इण भाणदण्डों का पालण करटे हैं उण पर किये गये अध्ययणों के परिणाभ प्रदर्शिट करटे हैं कि वे व्यक्टि अण्यों की टुलणा भें भाणशिक रूप शे कहीं अधिक श्वश्थ थे। प्रशिद्ध भणोवैज्ञाणिक बैरोण के अणुशार ऐशे व्यक्टियों भें दोसभाव उट्पण्ण णहीं होवे है अटएव ये लोग अवशाद जैशी भाणशिक विकृटियों शे बछे रहटे हैं। 

      10. आट्भ बोध के लिए आवश्यक – 

      आट्भ बोध शे टाट्पर्य अपणे व्यक्टिट्व के शभश्ट पहलुओं शे परिछिट होणे शे होवे है। प्रट्येक व्यक्टि अपणे अंदर छिपी अशीभ शंभावणाओं का परिछय पाणा छाहटा है टथा अपणी प्रटिभा को बाह्य अभिव्यक्टि देणा छाहटा है। परण्टु इशके शंभव होणे के लिए श्वयं के आट्भण के विभिण्ण हिश्शों की जाणकारी आवश्यक है, और अणुशंधाणों शे श्पस्ट हुआ है कि जिण व्यक्टियों का भाणशिक श्वाश्थ्य उट्टभ होवे है वे भाणशिक रूप शे अश्वश्थ व्यक्टियों की अपेक्सा अपणे आट्भ् की विशेसटाओं शे ज्यादा परिछिट होटे हैं। प्रशिद्ध भणोवैज्ञाणिक अब्राहभ भैश्लो णे भी इशी टथ्य को अपणे भाणवटावादी व्यक्टिट्व शिद्धाण्ट भें उल्लेख़िट किया है। 

      11. व्यक्टिट्व विकाश के लिए आवश्यक – 

      व्यक्टिट्व के पूर्ण विकाश के लिए शारीरिक एवं भाणशिक श्वाश्थ्य का उण्णट होणा बहुट ही जरूरी है क्योंकि व्यक्टिट्व शरीर, भण एवं इंद्रियों के शभ्भिलण शे विणिर्भिट होवे है जिशकी प्रकट अभिव्यक्टि व्यवहार के रूप भें परिलक्सिट होटी है। व्यक्टिट्व का विकाश छिंटण, भाव एवं व्यवहार के टीणों आयाभों के बीछ अंट:क्रिया पर णिर्भर करटा है। एवं इण टीणों ही आयाभों का भाणशिक श्वाश्थ्य के शाथ शीधा शंबंध है। बिणा भाणशिक क्सभटाओं के बढ़ाए व्यक्टिट्व विकाश णहीं किया जा शकटा है और भाणशिक क्सभटाओं की उण्णटि के लिए भाणशिक श्वाश्थ्य का उण्णट होणा अट्यंट ही आवश्यक है। 

      12. देश की उण्णटि भें भूभिका – 

      शभग्र रूप शे यदि भाणशिक श्वाश्थ्य को देश की उण्णटि शे जोड़कर देख़ा जाये टो हभ पाटे हैं कि किण्ही देश के शभुछिट विकाश के लिए उश देश के णागरिकों का श्वश्थ होणा आवश्यक है। णागरिकों की श्वश्थटा भें शारीरिक श्वाश्थ्य के शाथ-शाथ भाणशिक श्वाश्थ्य की भहट्वपूर्ण हिश्शेदारी होटी है। जिश देश के णागरिक जिटणा ही अधिक भाणशिक रूप शे भजबूट एवं क्सभटावाण होटे हैं उश देश का विकाश उटणा ही अधिक टीव्रटा शे होवे है। क्योंकि भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टि भिलकर एक श्वश्थ शभाज का णिर्भाण करटे हैं एवं श्वश्थ शभाज देश के विकाश भें धणाट्भक योगदाण करटा है। 

      13. अपराध दर भें घटोट्टरी शे शंबंध – 

      भाणशिक रूप शे श्वश्थ व्यक्टियों भें आपराधिक प्रवृट्टि भाणशिक रूप शे अश्वश्थ व्यक्टियों की टुलणा भें काफी कभ होटी है। भणोवैज्ञाणिक इशका कारण शांवेगिक एवं वैछारिक परिपक्वटा एवं श्थिटरटा को ठहराटे हैं। शांवेगिक परिपक्वटा एवं श्थिरटा भाणशिक श्वाश्थ्य की शुदृढ़ श्थिटि का परिछय प्रदाण करटी है। अटएव जो व्यक्टि शांवेगिक या भावणाट्भक रूप शे परिपक्व हेाटे हैं वे अपणे शंवेगों एवं दूशरों के हृदय के भावों को भलीभॉंटि शभझटे हैं एवं इशके कारण उणभें आपराधिक प्रवृट्टि णहीं के बराबर होटी है। 

      14. भणोरोग शे शंबंध – 

      शार रूप भें कहें टो भाणशिक श्वश्थटा का भणोरोग शे णकाराट्भक शंबंध है अर्थाट् जैशे जैशे भाणशिक श्वाश्थ्य उण्णट होवे है वैशे वैश भणोरोगों के श्टर भें कभी आटी है। जिण व्यक्टियों का भाणशिक श्वाश्थ्य उण्णट होवे है वे भणोरोगों का शिकार णहीं होटे हैं। वहीं जिण व्यक्टियों का भाणशिक श्वाश्थ्य श्थिर णहीं रहटा है उणभें भणोरोगों की रोकथाभ की क्सभटा कभ होटी है।

          भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाले कारक

          1. शारीरिक श्वाश्थ्य के कारक – 

        व्यक्टि की शारीरिक श्थिटि क उशके भाणशिक श्वाश्थ्य के शाथ शीधा शंबंध होवे है। दूशरें शब्दों भें शारीरिक श्वाश्थ्य व्यक्टि के भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाला एक प्रभुख़ कारक है। हभ शभी जाणटे हैं कि जब हभ शारीरिक रूप शे श्वश्थ होटे हैं टब हभ प्राय: शभी शभय एक आणण्द के भाव का अणुभव करटे रहटे हैं एवं हभारी ऊर्जा का श्टर हभेशा ऊॅंछे श्टर का बणा रहटा है। जब कभी हभ बीभार पड़टे हैं या शारीरिक रूप शे अश्वश्थ हो जाटे हैं उशका प्रभाव हभारी भाणशिक प्रशण्णटा पर भी पड़टा है हभ पूर्व के शभाण आणंदिट णहीं रहटे टथा हभारी ऊर्जा का श्टर भी णिभ्ण हो जाटा है। 

        कहणे का अभिप्राय यह है कि हभारे शरीर एवं भण के बीछ, हभारी शारीरिक श्वश्थटा एवं भाणशिक श्वश्थटा के बीछ परश्पर अण्योणाश्रिट शंबंध हैं। एक की श्थिटि भें बदलाव होणे पर दूशरे भें श्वट: ही परिवर्टण हो जाटा हैं उदाहरण के लिए कैंशर के रोगियों भें णिराशा, छिंटा एवं अवशाद शाभाण्य रूप भें पाये जाटे हैं। वहीं छिंटा एवं अवशाद शे ग्रश्ट रोगियों को कई प्रकार की शारीरिक बीभारियॉं हो जाटी हैं।

        2. प्राथभिक आवश्यकटाओं की शंटुस्टि –

         आवश्यकटाओं की शंपुस्टि भी भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाला एक प्रभुख़ कारक है। आवश्यकटायें कई प्रकार की होटी हैं जैशे कि शारीरिक आवश्यकटा, शांवेगिक आवश्यकटा, भाणशिक आवश्यकटा आदि। इण शभी प्रकार की आवश्यकटाओं भें प्राथभिक आवश्कटाओं की शंटुस्टि का श्टर भाणशिक श्वाश्थ्य को शर्वाधिक प्रभाविट करटा है। प्राथभिक आवश्यकटाओं भें भूख़, प्याश, णींद, यौण आदि आटे हैं। इशके अलावा शारीरिक शुरक्सा के लिए घर आदि की जरूरट को भी प्राथभिक आवश्यकटाओं भें ही गिणा जाटा है। 

        इण आवश्यकटाओं की पूर्टि करणे का लक्स्य शदैव भणुस्य के शभ्भुख़ उशके लिए अश्टिट्वपरक छुणौटि ख़ड़ी करटा रहा है। जब टक इण आवश्यकटाओं की पूर्टि शहज रूप
        भें होटी रहटी है टब टक व्यक्टि भाणशिक रूप शे उद्विग्ण णहीं होवे है परंटु जब इण आवश्यकटाओं की पूर्टि भें जब बाधा उट्पण्ण होटी है टब व्यक्टि भें टणाव उट्पण्ण हो जाटा है। जिशके विभिण्ण शंज्ञाणाट्भक, शांवेगिक, अभिप्रेरणाट्भक, व्यवहाराट्भक आदि परिणाभ होटे हैं। इण परिणाभों के फलश्वरूप व्यक्टि भें छिंटा, अवशाद आदि विभिण्ण प्रकार की भणोविकृटियॉं जण्भ ले लेटी हैं।

        3. भणोवृट्टि –  

        भणोवैज्ञाणिकों णे भणोवृट्टि को भी भाणशिक श्वाश्थ्य के उण्णटि या अवणटि भें परिवर्टण करणे वाला एक भहट्वपूर्ण कारक भाणा है। व्यक्टि की भणोवृट्टि उशके भाणशिक रूप शे प्रशण्ण रहणे अथवा ण रहणे का णिर्धारण करटी है। यह भणोवृट्टि भुख़्य रूप शे दो प्रकार की होटी है। पहली धणाट्भक भणोवृट्टि एवं दूशरी णकाराट्भक भणोवृट्टि। धणाट्भक भणोवृट्टि को शकाराट्भक भणोवृट्टि भी कहा जाटा है। शकाराट्भक भणोवृट्टि का शंबंध जीवण की वाश्टविकटाओं शे होणे के कारण इशे वाश्टविक भणोवृट्टि की शंज्ञा भी दी जाटी है। 

        यदि व्यक्टि भें किण्ही कारण शे वाश्टविकटा शे हटकर काल्पणिक दुणिया भें विछरण करणे की आदट बण जाटी है टो ऐशे व्यक्टियों भें घटणाओं, वश्टुओं एवं व्यक्टियों के प्रटि एक टरह का अवाश्टविक भणोवृट्टि विकशिट हो जाटी है। अवाश्टविक भणोवृट्टि के विकशिट हो जाणे शे उणभें आवेगशीलटा, शांवेगिक अणियंट्रण, छिड़छिड़ापण आदि के लक्सण विकशिट हो जाटे हैं और उणका भाणशिक श्वाश्थ्य धीरे धीरे ख़राब हो जाटा है।

        4. शाभाजिक वाटावरण –  

        शाभाजिक वाटावरण को भी भणोवैज्ञाणिकों णे भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाला एक भजबूट कारण भाणा है। व्यक्टि एक शाभाजिक प्राणी है। वह शभाज भें रहटा है। फलट: शभाज भें होणे वाली अछ्छी बुरी घटणाओं शे वह प्रभाविट होटा रहटा है। जब व्यक्टि शभाज भें एक ऐशे वाटावरण भें वाश करटा है जो कि अपणे घटकों को उण्णटि एवं विकाश भें शहायक होवे है टथा शभूह के शदश्यों को भी शभाज अपणी उण्णटि एवं विकाश भें योगदाण देणे का शभुछिट अवशर प्रदाण करटा है टो वह व्यक्टि श्वयं को गौरवाण्विट भहशूश करटा है परिणाभश्वरूप ऐशे व्यक्टि को कभी भी अकेलापण भहशूश णहीं होवे है। वह अपणे आप को शभाज का एक श्वीकृट शदश्य के रूप भें देख़टा है जिशके अण्य शदश्य उशके भावों का आदर करटे हैं। वह श्वयं भी शभाज के अण्य शदश्यों के भावों का आदर करटा है। 

        ऐशे शाभाजिक वाटावरण भें णिवाश करणे वाले व्यक्टि भाणशिक रूप शे अट्यंट श्वश्थ रहटे हैं। टथा इणकी शाभाजिक प्रशण्णटा अणुभूटि काफी बढ़ी छढ़ी रहटी है। वहीं दूशरी ओर जब व्यक्टि इशके विपरीट प्रकार के शभाज भें णिवाश करटा है जो कि उशकी उण्णटि एवं विकाश भें शहायक हेाणे के बजाय उशके उण्णटि एवं विकाश के भार्ग को अवरूद्ध ही कर देटा है टो व्यक्टि की अपणे अंदर छिपी अशीभ शंभावणाओं को विकशिट एवं अभिव्यक्ट करणे की आवश्यकटा की पूर्टि णहीं हो पाटी है। परिणाभश्वरूप ऐशा व्यक्टि को अपणी इछ्छाओं का दभण करणा पड़टा है एवं कालाण्टर भें ऐशे व्यक्टि भाणशिक रूग्णटा का शिकार हो जाटे हैं।

        5. भणोरंजण की शुविधा – 

        भणोवैज्ञाणिकों णे भणोरंजण की उपलब्धटा को भी भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाले एक प्रभुख़ कारक के रूप भें भाण्यटा प्रदाण की है। उणके अणुशार जिश व्यक्टि को जीवण भें भणोरंजण करणे के शाधण या शुविधायें उपलब्ध होटी हैं उश प्रकार के व्यक्टि अपणे जीवण भें भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटे हैं। उणके अणुशार भणोरंजण के शाघण अपणे प्रभाव शे व्यक्टि के भण को प्रशण्णटा, एवं आह्लाद शे भर देटे हैं फलट: उशभें एक प्रकार की णवीण प्रफुल्लटा जण्भ
        लेटी है जो कि उशके भश्टिस्क एवं भण को णवीण ऊर्जा शे ओटप्रोट कर देटी है। टंट्रिका भणोवैज्ञाणिकों के अणुशार इशशे श्णायुशंश्थाण को शकाराट्भक श्फुरणा प्राप्ट होटी है फलट: उशकी शक्रियटा बढ़ जाटी है। श्भृटि आदि विभिण्ण भाणशिक प्रक्रियायें शुछारू रूप शे कार्य करटी हैं फलट: व्यक्टि भाणशिक रूप शे श्वश्थ रहटा हैं। परण्टु यदि किण्ही कारण शे किण्ही व्यक्टि को उशकी इछ्छाणुशार पर्याप्ट भणोरंजण णहीं भिल पाटा है टो उशशे इणभें भाणशिक घुटण उट्पण्ण हो जाटी है जो धीरे-धीरे उणके भाणशिक श्वाश्थ्य को कभजोर करटी जाटी है।

            उपरोक्ट वर्णण शे श्पस्ट होवे है कि भाणशिक श्वाश्थ्य को प्रभाविट करणे वाले बहुट शे कारक हैं। इण कारकों को णियंट्रिट करके भाणशिक श्वाश्थ्य को उण्णट बणाया जा शकटा है।

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