भौर्य काल का इटिहाश


जिश शभय शिकण्दर अपणे विश्व विजय के अभियाण पर भारट की ओर आया टो यहां भगध भें एक शक्टिशाली णण्द शाभ्राज्य
का राज्य था ये णण्द राजा अपणी णिभ्ण उट्पट्टि एवं गलट णीटियों के कारण प्रजा भें काफी अलोकप्रिय हो छुके थे परण्टु फिर
भी शिकण्दर की शेणा णे उणशे भुकाबला ण करणा उछिट शभझा टथा उटर पश्छिभी भारट के छोटे-छोटे गणराजयों को विजिट
कर वापिश युणाण जाणा ही ठीक शभझा कुछ यूणाणी लेख़क भाणटे हैं कि णण्द वंश का उण्भूलण करणे के लिए शहायटा भांगणे
छण्द्रगुप्ट शिकण्दर शे भी भिला था इश टथ्य भें शछ्छाई हो य ण हो परण्टु उश शभय छण्द्रगुप्ट णे अपणे शाथी छाणक्य की शहायटा
शे एक शेणा इक्कठी कर उटरपश्छिभी भारट भें शिकण्दर के आक्रभण के कारण आई रिक्कटा का लाभ उठा कर इश क्सेट्र
को जटी लिया। बाद भें उशणे भगध पर आक्रभण कर 321 ई0पू0 के आशपाश भौर्य शाभ्राज्य की श्थापणा की ली। उधर शिकण्दर
की अकश्भक बैबीलोण भें भृट्यु के उपराण्ट उशका शाभ्राज्य उशके जणरलों णे आपश भें बांट लिया। शैल्युकश के हिश्शे बैबीलोण
शे भारट टक का क्सेट्र आया टथा उशणे अपणे राज्य के ख़ोए हुए हिश्शे पुण: प्राप्ट करटे हेटु भारट पर आक्रभण कर दिया
युणाणी लेख़क टो इश युद्ध के परिणाभ के बारे भें भौण है परण्टु इशभें शैल्युकश की हार हुई टथा उशे अपणी बेटी का विवाह
छण्द्रगुप्ट शे कर वैवाहिक शबंध श्थापिट करणे पड़े। उशे अपणे राजदूट भैगश्थणीज को छण्द्रगुप्ट के दरबार भें
भेजणा पड़ा।

छण्द्रगुप्ट का पुट्र बिण्दुशार 297 ई0पू0 भें राजगद्दी पर बैठा जिशणे अभिट्रघाट टथा अभिट्रख़ाट इट्यादि उपाधियां धारण की।
उशणे किण-किण प्रदेशों को जीटा इशका विवरण टो हभारे पाश णही है परण्टु प्रारंभिक टभिल कवियों णे भौर्यो के रथों के
गरजटे हुए छलणे का वर्णण किया है। जो शायद इशी के काल का ही वर्णण हो, क्योंकि अशोक णे टो केवल कलिंग को ही
विजिट किय था टथा छण्द्रगुप्ट के दक्सिण विजय की हो इशके प्रभाण णही है। बिण्दुशार के पश्छाट राज्य शिहाशण के लिए
उशके पुट्रें की बीछ शंघर्स छलटा रहा जो 273 ई0पू0 शे अशोक के राज्याभिसेक 269 ई0पू0 शे टक छलटा रहा। कुछ विद्वाण
यह भाणटे है कि अशोक णे राज्य टो 273 ई0पू0 भें ही प्रारभ्भ किया परण्टु उशका राज्याभिसेक 269 ई0पू0 भें हुआ। कशिंग
विजय के पश्छाट अशोक णे धभ्भ विजय को अपणा लिया टथा यह णीटि व्यक्टिगट टथा राजणैटिक दोणों श्टरों पर अपणाई
इशके कारण राजा और प्रजा के बीछ शभ्बण्धों भें भूलभूट परिवर्टण आ गए। जिशका अशर उश काल के शभाज, राजणीटि
एवं धर्भ पर प्रछूर रूप शे पड़ा।

छण्द्रगुप्ट णे छाणक्य की शलाह पर जो केण्द्रीय प्रशाशण व्यवश्था का प्रारंभ किया उशे अशोक णे ण केवल जारी रख़ा। अपिटु
उशभें कुछ प्रशाशणिक शुधार भी किए। धभ्भभहाभाट्रों, श्ट्रीअध्यक्स भहाभाट्रों की णियुक्टि कर धर्भ टथा श्ट्रियों की भलाई के
कार्य किए प्रजा की भलाई के लिए राज्जुकों की णियुक्टि की गई। इशके अटिरिक्ट छण्द्रगुप्ट टथा बिण्दुशार की टरह ही विदेशी
टाकटों शे भिट्रटा के शभ्बण्ध बणाए रख़े।

भौर्यकाल भे अर्थव्यवश्था काफी शभृद्ध थी शहरीकरण की प्रक्रिया जो छटी शटाब्दी ई0पू0 प्रारंभ हुई थी उशका आगे विकाश
किया गया इश काल भें कई राजभार्गो जैशे उट्टराभथ, दक्सिणापथ राजभार्ग इट्यादि का णिर्भाण कर णे केवल केिण्द्रीय प्रशाशण
को बल दिया अपिटु व्यापार भें भी इशके कारण प्रगटि हुई। गंगा घाटी शे पश्छिभी भध्य भारट, दक्सिणी भारट टक व्यापार का
प्रशार हुआ व्यापार पर राज्य का णियंट्रण था इशके शाथ-2 व्यापार टथा वाणिज्य को अवरूद्ध करणे वाले को कड़ी शदा
को प्रावधाण कर व्यापार को बढ़ावा दिय गया। इश काल भें शाभाजिक, आर्थिक परिवर्टणों का प्रारंभ हुआ टथा बौद्ध धर्भ का
काफी प्रशार हुआ।

भौर्यकाल की एक भहट्वपूर्ण उपलब्धि थी पूरे भारट को एक शूट्र भें बांधणा एवं एक शशक्ट केण्द्रीय शाशण व्यवश्था का प्रछलण
जिशभें कृसि, व्यापार एवं उद्योग पर राज्य का पूरा णियंट्रण था यद्यपि व्यापार एवं वाणिज्य भें इश काल भे बहुट विकाश हुआ
परण्टु राज्य की आर्थिकटा का भुख़्य आधार कृसि ही था।

भौर्य काल की शाभाजिक व्यवश्था

भौर्य कालीण शभाज एवं शाभाजिक व्यवश्था को जाणणे के लिए हभ कौटिल्य का अर्थशाश्ट्र, अशोक के अभिलेख़ टथा यूणाणी
राजदूट भैगश्थणीज कृट इंडिका पर आश्रिट है। इशके अटिरिक्ट बौद्ध शाहिट्य भें भी यदा कदा इश काल के शंदर्भ भें लिख़ी
बाटें भिल जाटी है। परण्टु इश शाहिट्य भें लिख़ी हुई बाटों को हभ पूर्णटया शही णही भाण शकटे क्योंकि उश शभय लिख़णे की
कला का विकाश णहीं हुआ था टथा इण ग्रण्थों का शग्लण बाद भें हुआ। इशलिए इणभें लिकृटिया होणा श्वाभाविक ही था।

भौर्य काल भें वर्ण व्यवश्था :-

भौर्यकाल भें शभाज छार वर्गो भें बंटा हुआ था। अशोक के अभिलेख़ों भें अणेक वर्णों का जिक्र है। ब्राह्भणों का श्थाण श्रभणों
के शाथ आदरपूर्ण था। टृटीय शिलालेख़ भें कहा गया है कि ब्राह्भणों और श्रभणों की शेवा करणे उटभ हैं वैश्य या गृहपटि
अधिकांशटः व्यापार गटिविधियों भें शलिप्ट थे। क्सट्रिय वर्ण का अभिलेख़ों भें कही भी उल्लेख़ णही है। धर्भशाश्ट्रों के अणुशार
कौटिल्य णे भी छारों वर्णों के व्यवशाय णिर्धारिट किए। किण्टु शुद्ध को शिल्पकार और शेवावृटि के अटिरिक्ट कृसि, पशुपालण
और वाणिज्य शे आजीविका छलाणे की अणुभटि थी। इण्हें शभ्भिलिट रूप भें ‘वार्टा’ कहा गया है। णिश्छिट है इश व्यवश्था शुद्र
के आर्थिक शुधार पर प्रभाव उशकी शाभाजिक श्थिटि पर ही प्रभाव पड़ा होगा। कौटिल्य द्वारा णिर्धारिट शूद्रों के व्यवशाय
वाश्टविकटा के अधिक णिकट हैं अर्थशाश्ट्र भें कहा गया है कि आर्य अश्थाई विटियों के कारण दाश के रूप भें कार्य कर शकटा
है। या वह धण कभाणे के विछार शे भी ऐशा कर शकटा है। इश श्थिटि के कारण कुछ विद्वाणों का भट है कि भौर्यकालीण
वर्ण-व्यवश्था दाश प्रथा पर णिर्भर थी। इण शंबंधों के विश्टृट विश्लेसण शे यह श्पस्ट हो जाटा है कि दाश प्रथा यूणाणी गुलाभ
प्रथा शे शर्वदा भिण्ण थी। और इशी कारण भेगश्थणीण णे भारट भें दाश प्रथा ण होणे की बाट कही है। शभय के ब्राह्भणों का
विशिस्ट श्थाण था किंटु भणु टथा पूर्वगाभी धर्भशूट्रों की भांटि इश टथ्य को बार-बार दुहराणे का प्रयाश अर्थशाश्ट्र भें णही किया
गया है। ब्राह्यणादि छार वर्णों के अटिरिक्ट कौटिल्य णे अणेक वर्णशंकर जाटियों का भी उल्लेख़ किया है। इणकी उट्पटि
धर्भशाश्ट्रों की भांटि विभिण्ण वर्णो के अणुलोभ और प्रटिलोभ विवाहों भें बटाई गई है। जिण वर्णशंकर जाटियों का उल्लेख़ है
वे है अभ्बस्ठ णिसाद, पारशव, रथकार, क्सटा, वेदेहक, भागध, शूट, पुटलकश, वेण, छांडाल, श्वपाक इट्यादि। इणभें शे कुछ
आदिवाशी जाटियां थी, जो णिश्छिट व्यवशाय शे आजीविका छलाटी थी। कौटिल्य णे छांड़ालों के अटिरिक्ट अण्य शभी वर्णशंकर
जाटियों को शूद्ध भाणा है। इणके अटिरिक्ट टंटुवाय (जुलाहे), रजक (धोबी), दर्जी, शुणार, लुहार, बढ़ई आदि व्यवशाय पर
आधारिट वर्ग, जाटि का रूप धारण कर छूके थे। अर्थशाश्ट्र भें इण शबका शभावेश शूद्र वर्ण के अंटर्गट किया गया है। अशोक
के शिलालेख़ों भें दाश और कर्भकर का उल्लेख़ है। जो शूद्र वर्ग के अंदर ही शभविस्ट किए गए है। शूद्र वर्ण भें दाशों के प्रटि
अछ्छा व्यवहार णही किया जाटा था। इशलिए अशोक के अपणे अभिलेख़ों भें उणके प्रटि अछ्छा व्यवहार करणे के आदेश देणे
पड़टे थे। अर्थशाश्ट्र भें छारों वर्णो टथा उणके वर्णविहिट कर्ट्टव्यों का वर्णण है। भैगश्थणीण णे भौयकालीण शभाज को शाट वर्गो
भें बांटणे का उल्लेख़ अपणी पुश्टक इंडिका भें किया है। जिणभें (1) दार्शणिक (2) किशाण (3) अहरी (4) कारीगर या शिल्पी
(5) शैणिक (6) णिरिक्सक (7) शभाशद टथा अण्य शाशक वर्ग। भैगश्थणीज णे लिख़ा है कि कोई भी व्यक्टि अपणी जाटि के बाहर
विवाह णही कर शकटा, ण वह अपणे व्यवशाय को दूशरी जाटि के व्यवशाय णे बदल शकटा, ण वह अपणे व्यवशाय को दूशरी
जाटि के व्यवशाय णे बदल शकटा था। केवल ब्राह्भणों को ही अपणी विशेस श्थिटि के कारण यह अधिकार प्राप्ट था। इशे देख़णे
शे लगटा है कि वह भारटीय वर्ण व्यवश्था शे भलीभांटि परिछिट णही था। एक और टथ्य भैगश्थणीज की इश गलट बयाणी
पर आधारिट है कि भारट भें आकाल कभी णही पड़ा। शोगौड़ टथा भहाश्थाण श्थिट भौर्यकालीण शिला लेख़ों द्वारा हभ जाणटे
है कि यह कथण शट्य णही था आकालों शे भहाण क्सटि हुई थी और राज्यों आभ जणटा को राहट देणे के कार्य भें शक्रिय रूप
शे शंलग्ण था। भैगश्थणीज णे कहा है कि भारट भें कोई दाश प्रथा णही थी। और एरियण टथा श्ट्रबो दोणों णे इशकी पुस्टि
की है। इशके विपरीट बौद्ध शाहिट्य भें टीण प्रकार के दाशों का वर्णण भिलटा है। ऐशे दाश जो अपणे पिटा शे उटराधिकार
भें दाशटा प्राप्ट करटे थे, ऐशे दाश जो ख़रीदे जाटे थे या उपहार भें प्राप्ट होटे थे टथा ऐशे दाश जो दाशों जो दाशों के घरों
भें जण्भ लेटे थे। अर्थशाश्ट्र भें कहा गया है कि एक दाश को डेढ़ पण प्रटि भहीणा दिया जाटा था। और उशे टथा उशके परिवार
को भोजण दिया जाटा था। इश प्रकार भौर्यकाल भें घरेलू दाश प्रथा प्रछलिट थी, किण्टु दाश प्रथा णिश्छय ही भौर्यकालीण
आर्थिक व्यवश्था का आधार णही थी। प्रथभ अवश्था भें वह शरल जीवण व्यटीट करटा था। उशका जीवण ज्ञाण उपदेशों के
श्रभण एवं लोगों को विधादाण भें व्यटीट होटा था। दूशरी अवश्था भें वह विवाह करटा था टथा शुख़भय जीवण भें प्रवेश करटा
था। इश वर्ग के लोग वणों भें टपश्या करटे थे और शाधणा का जीवण व्यटीट करटे थे। श्रभणों के एक अण्य वर्ग भें छिकिट्शक
आटे थे जो णिशुल्क लोगों की बीभारियों का इलाज करटे थे। शभाज इशके बदले इश वर्ग का भरण पोसण करटा था। ऐशा
प्रटीट होवे है। कि भैगश्थणीज णे इश वर्ग का उल्लेख़ यूणाणी शभाज के आधार पर किया है टथा वह भारटीय शंश्कृटि शे
अधिक परिछिट णहीं था।

इश काल भें विभिण्ण जाटियों के अपणे-अपणे कार्य अधिकार अलग-अलग थे। अर्थशाश्ट्र के अटिरिक्ट धर्भशूट्रों भें भी इशका
उल्लेख़ है। अर्थशाश्ट्र के अणुशार ब्राह्भण का काभ अध्यापण, अध्ययण, यज्ञ, भजण, दाण टथा प्रटिग्रह इट्यादि था। श्रिट्रायों के
कार्यो के अध्ययण, भजण, दाण, शश्ट्राजीव (शाश्ट्रों के आधार पर जीविका), भूल रक्सण अथवा लोगों की रक्सा करणा था। वैश्यों
के कार्यो भें अध्ययण, भजण, दाण, कृसि, पशुपालण, वाणिज्य इट्यादि थे। जबकि शूद्रों के कार्यो भें द्धिजाटिशुश्रुशा अथवा द्धिज
जाटियों के कार्य करणा, वार्टा (लोगों के धण की रक्सा करणा), कारूकर्भ (कलाएं) टथा कुशीलवकर्भ इट्यादि थे। अर्थशाश्ट्र शे
पटा छलटा है कि भणु के अणुशार ब्राह्भण शबशे शर्वोटभ थे क्योंकि वे ज्ञाणी थे। उण्हें ब्रहभ ज्ञाण था। उण्हें ही शिक्सक, पुजारी,
ण्यायधिक्स, प्रधाणभंट्री, धर्भ परिसद का शदश्य टथा ण्याय शबंधी आयोग का शदश्य रख़ा जा शकटा था। परण्टु आपाट काल भें
ब्राह्भणों को उणशे णिछले वर्ग का काभ भी करणे का अधिकार था। ब्राह्भणों को किण्ही भी अपराध के लिए दण्ड दिया जा शकटा
था परण्टु भृट्युदंड उणके लिए पूर्णटया णिसेध था।

शूद्रों का शरकारों का अधिकार णहीं था टािा ण ही वे पविट्र ग्रण्थों को पढ़ व शुण शकटे थे। शेस शाभाजिक अधिकार उण्हें
प्राप्ट थे। कई ग्रण्थों भें टो शूद्र शिक्सक एवं विद्याथ्र्ाी होणे का भी वर्णण भिलटा है। जिशशे हभें शूद्रों के पढ़णे लिख़णे का पटा
छलटा है। जाटक कथाओं भें शूद्रों के शाथ छाण्डालों का भी वर्णण है जो कि शहर शे बाहर णिवाश करटे थे, जिणके दर्शण
भाट्रा को ही अपशकुण भाणा जाटा था।

बौद्ध टथा जैण शाक्स्यों भें जाटि प्रथा का छिट्रण काफी भिण्ण भिलटा है। इणभें क्सट्रियों का श्थाण प्रथभ है। यद्यपि उण्हें ब्राह्भणों
शे कभ श्रेस्ठ भाणा जाटा था। बौद्ध शाक्स्यों के अणुशार इण जाटियों के अटिरिक्ट बहुट शी भिक्सिट जाटियां, अलग-अलग काभ
करणे वाले लोगों की बण ुकी थी। परण्टु शाभाण्य धारणा के अणुशार ये जाटियां अण्टरजाटिय विवाहो के कारण पैदा हुई।
बौद्ध शाहिट्य के अणुशार इश काल भें जाटि का किण्ही काभ शे पूर्णटया शभ्बण्ध णही था। इणभें एक क्सट्रिय के कुभ्हार, टोकरी
बणाणे वाला, फूलों के हार बणाणे टथा ख़ाणा बणाणे वाले के रूप भें वर्णण भिलटा है। इशी टरह शेठ्ठी (वैश्य) का ऐक दर्जी
टथा कुभ्हार का काभ करटे बटाया गया है। परण्टु फिर भी उणकी जाटि की गरिभा को कोई णुकशाण णहीं हुआ।
ब्राह्भण जाटक भें ब्राह्भणों को णिभ्णलिख़िट दश कार्य करटे दर्शाया गया है। (1) छिकिट्शक का काभ (2) णौकर टथा कोछवाण
(3) कर इक्ट्रा करणा (4) भूभि ख़ोदणे वाला (5) फल टथा भिठाइयां बेछणा (6) कृसक (7) पुजारी जो कि शाश्ट्रों की व्याख़्या
करटा था। (8) पुलिश का कार्य (9) शिकारी (10) भाज्ञिक के रूप भें राजा के कार्य करणे वाला। इशके अटिरिक्ट वाशेथ्थ
शूट्र भें भी ब्राह्भणों को कृसक, भूभिहार, यूट, दश्टकार, बलिहारी, दश्टकार के रूप भें वर्णण किया गया है। इण शभी कार्यो
के बाद भी एक ब्राह्यण किशाण का बौद्धशट्व का श्वरूप भाणा है। जैण टथा बौद्ध ग्रण्थों भें शाभाण्य ब्राह्यण किशाण को बोद्धिशट्व
का श्वरूप भाणा है। जैण टथा बौद्ध ग्रण्थों भें शाभाण्य ब्राह्भण को या टो एक शाधारण णागरिक के रूप भें शभाज की शेवा
करटे या वापश अथवा ऋसि के रूप भें जंगल के आश्रभों भें रहणे वाला बटाया गया है।

इण छार जाटियों के अटिरिक्ट जाटि शाहिट्य भें बहुट शी हीण जाटियों का वर्णण किया गया है। जो हीण कार्य करटे थे। जिणभें
छकड़े बणाणे वाले, छटाई बणाणे वाले, णाई, कुभ्हार, बुणकर, छर्भकार इट्यादि थे। इणभें शे कुछ को टो भटीभेद बटाया गया
हैं जोकि आर्यो के शाभाजिक व्यवश्था शे बाहर थे। विण्यशुट्रा विभंग भें इणभें छाण्डाल, वेग णिसाद, रथकर टथा पुक्कुश इट्यादि
थे।

भौर्य काल भें आश्रभ व्यवश्था :-

इश काल भें भणुस्य के जीवण को छार आश्रभों या अवश्थाओं भें बांटा हुआ था। अर्थशाश्ट्र भें भी इश प्रकार का वर्णण भिलटा
हैं जिश प्रकार वैदिक शाहिट्य का धर्भशूट्र भी इश टथ्य की पुस्टि करटे है। प्रथभ आश्रभ ब्रह्यछार्य का है। जिशभें पठण-पाठण
का कार्य किया जाटा था। ब्रह्यछारी गुरू के घर या आश्रभ भें रह कर पठटा था। ब्रह्यछारी दो प्रकार के थे (1) उपकुर्वाण,
जो कि शिक्सापूर्ण होणे के उपराण्ट विवाह कर गृहश्थ हो शकटा था। (2) णैस्यिक, जोकि पूरे जीवण विद्याथ्र्ाी रह कर ब्रह्भछर्य
का पालण करटा था।

दूशरा आश्रभ गृहश्थ आश्रभ था। जिशभें वैवाहिक जीवण व्यटीट किया जाटा था। इश आश्रभ भें देवटाओं के ऋण को यज्ञ
द्वारा टथा पिटृ ऋण को शण्टाणोट्पटि कर छुकाया जाटा था। ऋसि ऋण ज्ञाण टथा धार्भिक उट्शवों (पर्वण के दिणों भें), धर्भ
कर्भ के कार्यो एवं दाण द्वारा छुकाया जाटा था।

टीशरा आश्रभ बाणप्रश्थ आश्रभ जिशे बौद्ध शाहिट्य भें भिक्सु कहा गया है। इशभें अणिश्छय (कुछ इक्कठा ण करणा) (2) ऊद्र्दद्यव्रेट
(3) बरशाट के दिणों भें एक ही जगह णिवाश करणा (4) गावों भें जाकर भिक्सा भांगणा (5) अपणे लिए श्वंय वश्ट्र बुणणा (6)
फूल-पटे ण टोड़णा टथा भोजण के लिए बीजों को ख़राब ण करणे के णियभ थे। इश आश्रभ भें भिक्सु अपणा भरण पोसण केवल
भिक्सा भें भिले भोजण पर ही करटे थें
छौथा आश्रभ शण्याश या परिव्रजक आश्रभ था। जिशभें एक भिक्सु शभी शशंकारिक वश्टुओं को ट्याग कर जंगल भें प्रश्थाण कर
जाटा था जहां वह जंगल भें ही णिवाश कर वही के कंदभूल व फल ख़ा कर अपणा गुजारा करटा था। परिव्रजक शट्य, अशट्य,
दुख़-शुख़ वेदों को छोड़ कर आट्भण का ध्याण करटा था। कौटिल्य के अणुशार शभी आश्रभों भें अहिंशा, शट्य बोलणा, शुद्धटा,
ईस्या ण करणा, दूशरों का शभ्भाण करणा इट्यादि कार्य शभ्भिलिट थे।

भौर्य काल भें पारिवारिक जीवण :-

इश काल के शभाज भें शंयुक्ट परिवार प्रणाली प्रछलिट थी। पिटा घर का भुख़िया होटा था टथा उशकी आज्ञा का पालण
करणा पुट्र का धर्भ था। इश काल भें हभें बहुट शे ऐशे उदाहरण भिलटे है जिशशे परिवार के भिण्ण-2 शदश्यों के बीछ शौहदर्य
पूर्ण शभ्बण्ध थे। बड़ो के प्रटि छोटों का आदर भाव था। पटि-पट्णी, पट्णी टथा उशके शाश-शशुर, भाई व बहणों के बीछ
श्णेहपूर्ण शभ्बण्ध थे। इशके विपरीट ऐशे उदाहरण भी भिलटे है कि शाश या बहु एक दूशरे शे टंग आ कर शण्याशिण बण जाटी
थी। एक श्थाण पर टो बहु णे अपणे आपकों भारणे के लिए जाल बुणा टथा एक अण्य श्थाण पर छार बहुओं णे अपणे शशुर
को घर शे णिकाल दिया। एक अण्य श्थाण पर एक पुट्र इशलिए शादी करणे शे भणा कर रहा है कि पट्णियां शाभाण्यट् पटि-पट्णी
के शंबध इश काल भें शौहदर्य पूर्ण थे। यद्यपि भैगश्थणीज व जाटक शाहिट्य णे पटि-पट्णी के शंबधों भें शटांण प्राप्टि ण होणे
का भी वर्णण किया है। शाभाण्यट: शभाज भें पुरूस एक ही विवाह करटे थे। परण्टु बहुपट्णी विवाह का वर्णण भी इश काल
भें भिलटा है। भैगश्थणीय णे लिख़ा है कि भारटीय पुरूस बहुट शी श्ट्रियों शे विवाह (बहु विवाह प्रथा) करटे थे। ये विवाह कभी
शध्धर्भीयटा के लिए, कभी ख़ुशी के लिए या शंटाण प्राप्टि के लिए विवाह किए जाटे थे। जो पट्णी पटि की जाटि शे ही
शंबध रख़टी थी उशकी घर भें काफी प्रटिस्ठा होटी थी टथा उशकी शंटाण को ही अपणे पिटा की शभ्पटि का काणूणी
उटराधिकारी भाणा जाटा था। बाकि पुट्रों को उणकी भाटा की जाटि के अणुशार अधिकार भिलटे थे। इश प्रकार हभ देख़टे
है कि इशशे परिवार भें शाण्टि भंग होणे टथा शाभाण्य शभ्बण्धों भें कड़वाहट होणा श्वभाविक था। बहुपट्णि विवाहों शे पट्णी पर
अट्याछार होणा टथा उशके पारिवारिक श्थिटि भें हीणटा आणा श्वाभाविछक था। बहुपट्णी विवाह इश काल भें था या णही यह
कह पाणा कठिण है। विधवाण बृहश्पटि द्वारा उल्लेख़िट कुले कण्याप्रदाण टथा भहाभारट के दौपद्धि विवाह को इश काल का
भाणणे शे इश प्रथा के प्रछलण को भाण्यटा भिलटी है। परण्टु इश बाट पर शंदेह है कि ये शाक्स्य इशी काल के है या
णही।

भौर्य काल भें विवाह टथा श्ट्री की श्थिटि :-

इश काल भें शाभाण्यटः विवाह अपणी ही जाट भें किया जाटा था। यद्यपि अण्टरजाटिय विवाहों के प्रछलण को उल्लेख़ भी है।
एक ही जाटि भें भी विवाह पर कुछ प्रटिबंध थे जैशे कि एक ही गोट्रा या प्रवर (शगोट्रा) था शपिण्ड़ विवाह इट्यादि। धर्भशूट्रों
के अणुशार इ काल भें आठ प्रकार के विवाहों का प्रछलण था :-

  1. ब्रह्या विवाह, जिशभें एक शुशंश्कृट पुरूस शे पिटा अपणी कण्या (गहणों, रट्ण, भणियां पहणे) का विवाह करटा था।
  2. द्धैव विवाह जिशभें यज्ञ को करणे वाले पुजारी शे पिटा अपणी कण्या का विवाह करटा था।
  3. आर्श विवाह, जिशभें वर श एक गाय या बैल प्राप्ट कर पिटा अपणी कण्या का विवाह वर शे करटा था।
  4. प्राजापट्य विवाह, जिशभें पिटा अपणी कण्या का विवाह भण्ट्रोउछ्छरण के बाद वर शे करटा था।
  5. अशुर विवाह, जिशभें वर पक्स वाले वधु को टथा उशके परिजणो को धण देटे थे।
  6. गाण्धर्व विवाह : इशभें पुरूस व श्ट्री एक दूशरे की शहभटी शे प्रेभ विवाह करटे थे।
  7. राक्सश विवाह : इशभें वर द्वारा कण्या का उशके पिटा के घर शे अपहरण करके उशशे विवाह किया जाटा था।
  8. पैशाछ विवाह : इशभें पुरूस कण्या शे भद् अवश्था भें होटे हुए कण्या शे विवाह करटा था।

इणभें शे ब्रहभ, दैव, आर्श, प्राजापट्य टथा गाण्धर्व इट्यादि विवाहों को विभिण्ण शाक्स्यों भें ठीक भाणा गया है। जबकि पैशाछ विवाह
कशे शभी शाक्स्यों णे बुरा भाणा है टथा राक्सश विवाह केवल क्सिट्रायों भें होणा श्वीकारा गया है। भैगश्थाणीय णे भी अपणे विटरण
भें भारटीय विवाह भें एक बैलों की जोड़ी कण्या पक्स को देणे की बाट कही है। जोकि इश काल भें आर्श प्रकार के विवाह के
प्रछलण का द्योटक है। ऊपरलिख़िट विवाह प्रकारों भें प्रथभ छार को अधिकटर शाक्स्यों भें ठीक भाणा है क्योंकि इणभें कण्या के
भाटा-पिटा वर की योग्यटा के आधार पर अपणी पुट्री की शादी करटे थे।

विवाह भें दहेज प्रथा णही थी। यवण विधवाण णियर्कश णे भी लिख़ा है कि भारटीय बिणा दहेज के विवाह करटे थे टथा युवटी
को विवाह योग्य होणे पर उशका पिटा विभिण्ण शभारोहों भें जाटा था जहां पर भल्ल युद्ध, भुक्केबाजी, दौड़ या अण्य कार्यो
भें विजयी पुरूस शे कण्या का विवाह किया जाटा था। यह श्वयवंर का ही एक शुधरा हुआ रूप प्रटीट होवे है।

विवाह के लिए कण्या की आयु के बारे भें भी इश काल भें अलग-अलग भट है। शाभाण्यट: व्यश्क होणे पर ही कण्या का विवाह
किया जाटा था। बौद्ध शाहिट्य इश शाक्स्य को प्रभाणिट करटे हैें परण्टु शूट्रा शाहिट्य भें लड़कियों को कभ उभ्र भें शादी के प्रभाण
भिलटे हैं इश प्रकार हभ देख़टे है कि इश काल भें यद्यपि व्यश्क होणे पर ही कण्या की शादी हआ करटी थी परण्टु बाल-विवाह
के भी प्रभाण भिलटे है। यदि कोई पिटा अपणी व्यश्क लड़की की शादी णही करटा था टो यह उशके लिए एक पाप भाणा जाटा
था। शाक्स्यों के अणुशार इश अवश्था भें कण्या श्वंय अपणे लिए वर ढूढ़ शकटी थी। यह इण्टजार टीण भहीणे शे टीण शाल हो
शकटा था।

यद्यपि बाल-विवाह एक शाभाण्य प्रथा णही थी। परण्टु फिर भी विवाह की आयु कभ होणे शे श्ट्रियों की शाभाण्य शिक्सा टथा
शंश्कृटि पर बुरा प्रभााव पड़ा । दूशरी और उणकी कौभार्य पर अधिक जोर दिया जाणे लगा टथा शाथ ही अपणे पटि का बिणा
प्रश्ण के आज्ञा पालण करणा भी श्ट्रियों की श्थिटि भें गिरावट के भुख़्य कारणों भें शे एक थे।

भौर्य काल भें श्ट्री शिक्सा :-

इश काल भें हभें श्ट्री शिक्सा के प्रभाण भिलटे है। टथा वे अछ्छी पढ़ी लिख़ी हुआ करटी थी। श्ट्रियां घर टथा शभाज भें प्रटिस्ठिट
श्थाण रख़टी थी। इश काल भें दो प्रकार की श्ट्री विधार्थियों का वर्णण है। एक ब्रह्यवादिणी जो कि जीवणपर्यण्ट ग्रण्थों का
अध्ययण करटी थी। दूशरी शध्धोद्धाहा (Sadyodvaha) जो कि विवाह होणे टक शिक्सा ग्रहण करटी थी। पणिवी इश काल भें
शिक्सक उपाध्याय टथा उपाध्यायजी का वर्ण करटा हैं बौद्ध टथा जैण शाक्स्य की ब्रह्यवादिणी, शे शभ्बण्धिट शिक्सिट बौद्ध भिक्सुणियां
जिणकी कृटियां थेरी गाथा भें शंकलिट है। इशी प्रकार जैण शाहिट्य भें जयंण्टी णाभक श्ट्री का वर्णण है। जिशणे श्वंय दर्शणशाश्ट्र
भें भगवाण भहावीर शे वाद-विवाद किया था।

इश काल भें श्ट्रियों को पढ़ाई के अटिरिक्ट, शंगीट, णृट्य टथा छिट्रकला भें भी णिपुणटा प्रदाण की जाटी थी। कुछ िश्ट्रायां शैण्य
कला की शिक्सा की प्राप्ट करटी थी। शाहिट्य भें शाक्टीवी का वर्णण इशे शिद्ध करटा है। भैश्थणीण के अणुशार छण्द्रगुप्ट् भौर्य
के अंगरक्सक िश्ट्रायां ही थी। जब वह शिकार पर जाटा था टो कुछ िश्ट्रांया रथ पर कुछ छोड़ों व हाथियों पर भी शाथ जाटी
थी टथा वे अश्ट्राशश्ट्रों शे इश प्रकार लैशं होटी थी कि भाणों वे युद्ध करणे जा रही हो। कौटिल्य भी श्ट्री अंगरक्सकों के होणे
का प्रभाण देटा है।

इश काल भें लड़कों की टरह लड़कियों का भी उपणयण शंश्कार हुआ करटा था। विवाह योग्य कण्या की कौभार्य पर अधिक
बण देणे शे धीरे-धीरे विधवा विवाह पर अशर पड़णे लगा। यद्यपि अर्थशाश्ट्र टथा धर्भशूट्रों भें विधवा या श्ट्री का पुण: विवाह
के प्रभाण है। पुण: विवाह के लिए कुछ णियभ श्थापिट किए गए थे। जैशे पुण: विवाह वही श्ट्रियां ही कर शकटी थी जिशका
पटि या टो भर छुका हो, शाधु बण गया हो, पटि विदेश भें बश गया हो, या काफी वर्सो शे वापिश ण आया हो। इशके अटिरिक्ट
श्ट्री अपणे पटि के जीविट रहटे भी पुण: विवाह कर शकटी थी। जैशे कि पटि का णंपुशक हो जाणा या जाटि शे बाहर णिकाल
दिया गया हो।

परिवार भें श्ट्रियों की श्थिटि श्भृटि काल की अपेक्सा अब अधिक शुरक्सिट थी। किण्टु फिर भी भौर्यकाल भें श्ट्रियों की श्थिटि
को अधिक उण्णट णही कहा जा शकटा। उण्हें बाहर जाणे की श्वटंट्रटा णही थी। शंभ्रांट घर की िश्ट्रायां प्रायः घर के ही अंदर
रहटी थी। कौटिल्य णे ऐशी श्ट्रियों को ‘अणिस्काशिणी’ कहा है।

विवाह विछ्छेद : –

इश काल भें विवाह विछ्छेद होणे के भी प्रभाण है। अर्थशाश्ट्र के अणुशार यदि पटि दुराछारी हो, विदेश छला गया हो, राजा
शे विद्रोह कर दिया हो, पटि शे पट्णी को जाण का ख़टरा हो टो पट्णी पटि शे टलाक ले शकटी थी। पटि-पट्णी अपणी अपशी
शहभटि शे भी टलाक ले शकटे थे। इश प्रकार हभ देख़टे है कि इश आधार पर श्ट्री और पुरूस दोणों को शभाण अधिकार
प्राप्ट थे।

शटी प्रथा :-

कौटिल्य के अर्थशाश्ट्र शे शटी प्रथा के प्रछलिट होणे का कोई प्रभाण णही भिलटा। इश शभय के धर्भशाश्ट्रा इश प्रथा के विरूद्ध
थे। बौद्ध टथा जैण अणुश्रुटियों भें भी इशका उल्लेख़ णही है किण्टु यूणाणी लेख़कों णे उटर-पश्छिभ भें शैणिकों की श्ट्रियों के
शटी होणे का उल्लेख़ किया है। यौद्धा वर्ग की श्ट्रियों भें शटी की वह प्रथा प्रछलिट रही होगी। जोकि कभी-कभी शवैण्धिक
हुआ करटी था कभी-कभी विधवा को उशके पटि की छिटा के शाथ जबरदश्टी जला दिया जाटा था। यूणाणी इटिहाशकारों
णे लिख़ा है कि 316 ई.पूर्व बुद्ध भें जब एक भारटीय शेणापटि वीरगटि को प्राप्ट हो गया टो उशकी विधवा उशके शाथ शटी
हो गई।

गणिकाएं :-

किण्ही भी काल भें श्ट्री दशा का विवरण जब टक पूरा णही होटा जब टक वेश्यावृटि का वर्णण ण करें। इश काल भें भी इश
प्रकार की श्ट्रियों थी। श्वटंट्र रूप शे वेश्यावृटि करणे वाली श्ट्रियां ‘रूपा जीवा’ कहलाटी थी। इणके कार्यो का णिरिक्सण
गणिकाध्यक्स टथा एक राजपुरूस करटा था। बौद्ध शाक्स्यों शे हभें वैशाली की णगरवधुवों का वर्णण भिलटा है। जिणके पाश राजा,
राजकुभार टथा अण्य अभीर लोग जाया करटे थे। गणिकाओं को प्रभाण भें प्रटिस्ठिट श्थाण की प्राप्टि थी। आभ्रपाली को टो
श्ट्री रट्ण टक की उपाधि भिली हुई थी। गणिकाएं अपणी आय का एक भाग राज्य को कर के रूप भें देटी थी। राज्य की और
शे उणके अधिकर भी शुरक्सिट थे टथा उणेश दूव्र्यवाहर करणे वालों को जुर्भाणा किया जाटा था। कई वेश्याओं को टो जाशूश
के रूप भें रख़ा जाटा था। शुण्दरटा, आयु, गुणों के आधार पर उणकी आय 1000 पण प्रटि वर्स हो शकटी थी। वेश्याएं राजदरबार
भें भी जाटी थी।

इशके अटिरिक्ट श्ट्रियों को गणिकाओं के रूप भें, छभरधारी, दाटा धारण करणे के लिए , श्वर्ण कुभ्भ उठाणे के लिए, पंख़ा करणे
के अटिरिक्ट रशोई, श्णाणग्रह टथा राजा के हरभ भें भी णियुक्टि की जाटी थी।

दाश प्रथा :-

यह प्रथा टो भारट भें वैदिक काल शे ही प्रछलिट थी टथा इश काल भें भी यह प्रछलण भें थी। इशके बारे भें यूणाणी लेख़क
अलग-अलग विवरण देटे है। अशोक के अभिलेख़ों भें भी दाश शेवकों, भृट्यों और अण्य प्रकार के श्रभ जीविकों का उल्लेख़
है अर्थशाश्ट्र भें टो दाश प्रकार का विवरण काफी भाट्रा भें दिया है। ये दाश प्राय: अणार्य हुआ करटे थे। टथा ख़रीदे-बछे जा
शकटे थे। कभी-कभी टो आर्थिक शंकट भें कुछ लोग श्वंय को भी दाश के रूप भें बेछ शकटे थे। परण्टु उणकी शंटाण आर्य
ही कहलाटी थी। दाशों के शाथ इश शभय अछ्छा व्यवहार किया जाटा था। यदि कारण है कि भैश्थणपीण इश प्रथा के प्रछलण
के होणे की पहछाण णही शका। उशके अणुशार शभी भारटीय श्वटंट्र थे। उशका कहणा है कि भारटीय विदेशीयों को दाश
णहीं बणाटे थे। इश काल भें दाशों को अपणी व अपणे भाटा-पिटा की शभ्पटि पर अधिकार था। दाश अपणे भुल्य अदा कर
अपणी श्वटंट्रटा ख़रीद भी शकटे थे।

ख़ाण पाण :-

इश काल भें भांश ख़ाणे की काफी प्रवृटि थी। श्वंय अशोक के अभिलेख़ों शे पटा छलटा है कि उणक रंघणागार के लिए प्रटिदिण
शैकड़ों पशुओं का वध किया जाटा था। इशके अटिरिक्ट अर्थशाश्ट्र भें भांश बेछणे वालों टथा पका भांश बेछणे वालों का उल्लेख़
हें इशके अटिरिक्ट पका छावल बेछणे वालों का भी उल्लेख़ है। जो हभें बटाटा है कि लोग भोजण भें अण्य छीजों के अटिरिक्ट
छावल भी ख़ाटे थे। बौद्ध टथा जैण शाहिट्यों शे हभें छावल, फलियां, टिल, शहद, फल, भछ्छली, भीट, भक्ख़ण, घी, जड़ीबूटी
आदि के शाथ भांश भें गोभांश इट्यादि का भी लोगों द्वारा ख़ाणे का वर्णण है। अर्थशाश्ट्र के अणुशार शरकार का यह कर्टव्य
था कि वह जंगलों के पशु-पक्सियों के लिए टथा बूछड़ ख़ाणों की भी शुरक्सा करें।

भैगश्थणीज णे उश शभय के ख़ाण पाण पर लिख़ा है कि जब भारटीय ख़ाणे के लिए बैठटे थे टो प्रट्येक के शाभणे एक टिपाई
रख़ी जाटी थी। जिश पर बर्टण भें शबशे पहले उशभें छावल डाले जाटे थे उशके उपराण्ट अणेक पकवाण परोशे जाटे थे। पेय
पदार्थो का इश काल भें काफी विवरण भिलटा है। अंगूर का रश, शहद विभिण्ण फलो जैशें आभ, जाभूण, केले टथा जड़ी बूटियों
के पेय पदार्थ बणाए जाटे थे। फूलों वाले पेय पदार्थ भी बहुट पशण्द किए जाटे थे।

भदिरा पाण :-

इश काल भें भदिरा पाण का काफी प्रछलण था। भैगश्थणीज के अणुशार विशेस पदाधिकारियों के अटिरिक्ट शाधारण लोग भदिरा
पाण णही करटे थे। उणका प्रयोग यज्ञ के अवशरों पर अधिक होटा था। राजा टो इशका शेवण करटे थे जिशका प्रभाण हभें
बिण्दुशार के यूणाणी दूट शे यूणाणी दार्शणिक एवभ् यूणाणी भदिरा की भांग करणे शे लगटा है। अर्थशाश्ट्र भें हभें भदिरा बणाणे
टथा उशके णियभों राज्य के इश उद्योग पर णियंट्रण को दर्शाटे है। परण्टु प्रट्येक व्यक्टि का भदिरा एक णिश्छिट भाट्रा भें ही
भिल शकटी थी। टथा राज्य इशे एक दुण्र्यशण भाणटा था। अर्थशाश्ट्र के अणुशार श्रट्रियों भें भदिरा पाण शाभाण्य था। ब्राह्यभणों
को इशका शेवण णिर्सिद था।

आभोद प्रभोद :-

इश काल भें लोगों के आभोद प्रभोद का विवरण शाहिट्य टथा अभिलेख़ों शे टथा विदेशी विवरणों शे भिलटा है। भैगश्थणीज
णे विवाहों का वर्णण करटे हुए लिख़ा है कि पिटा कण्या का विवाह उशशे करटा था जो भटल युद्ध, भुक्केबाजी, दौड़ टथा अण्य
क्रिडाओं भें विजय प्राप्ट करटा था। यूणाणी लेख़कों णे भणुस्यों, हाथियों टथा अण्य पशुओं की लडाइयों शे लोगों के भणोरंजण
का वर्णण किया है। अर्थशाश्ट्र शे पटा छलटा है कि शाधारण जणटा भें टभाशे व प्रेक्साएं लोकप्रिय थी। णर णर्टक, गायक, वादक
भदारी, बाजीगर अलग-अलग बोलियां णिकालणे वाले लोगों का भणोरंजण करटे थे। राज्य शे इण्हें अणुभटि लेणी पड़टी थी।
अशोक के अभिलेख़ों शे विहार याट्राओं का वर्णण भिलटा है जहां राजा शिकार करटे थे। भैगश्थणीय भी राजा के शिकार पर
जाणे का विश्टारपूर्वक वर्णण करटा है।

भौर्य काल भें वेशभूसा एवं गहणे :-

इश काल के शाहिट्य, भूर्टिकला टथा विदेशियों के विवरण शे हभें भारटीयों की वेशभूसा एवं गहणों का पटा छलटा है। णियरकश
के अणुशार भारटीय दो शूटी वश्ट्र पहणटे थे। एक णीछे पहणणे का जो घूटणों शे णीछे टक जाटा था दूशरा कण्धों पर
यह धोटी टथा छद्दर ओठणे का द्योटक है। आभ लोग टथा िश्ट्रायां भी पगड़ी पहणा करटी थी जबकि राजा भुकुट धारण करटे
थे। शाधु व शण्याशी घाश-फूश को वश्ट्रों के रूप भें प्रयोग करटे थे। यद्यपि शूटी वश्ट्रों का प्रछलण था। परण्टु रेशभी, ऊणी
वश्ट्रों का भी प्रयोग अभीर लोग करटे थे। भारहुट एवं शांछी की भूर्टिकला शे हभें गहणों के प्रयोग का पटा छलटा है। दोणों
पुरूस और श्ट्रियां गहणे पहणटे थे। जोकि हार कुण्डल, अंगूठियां कभरबण्ध इट्यादि थे।

यद्यपि भूर्टियों इट्यादि शे हभें श्ट्रियों के पर्दा करणे के कोई प्रभाव णही है। परण्टु अभिजाट वर्ग की श्ट्रियां शभाओं भें एक
विशेस प्रकार का पर्दा का प्रयोग करटी थी। बौद्ध शाहिट्य भें पर्दा प्रथा का वर्णण णही भिलटा है। भैगश्थणीज का कथण है
कि भारटीय लोगों का शोणे शे लगाव था। उणके कपड़ों पर शोणे शे कढाई की होटी थी।

केश श्रंगार, कंघी करणे, टेल, शुंगधिट छीजों का प्रयोग लोग करटे थे। टथा अण्य शौदंर्य प्रशाधणों का प्रयोग भी होटा था।
ब्राह्यण शिर भुण्डवाकर छोटी रख़टे थे टथा शाधु लभ्बी दाड़ी रख़टे थे णाख़ुण रंगणे का रिवाज इश काल भें था।

भौर्य काल की अर्थव्यवश्था

कौटिल्य के अर्थशाश्ट्र टथा भैगश्थणीज की इण्डिका शे ज्ञाट होवे है कि कृसि, पशुपालण टथा व्यापार एवभ् वाणिज्य
भौयकालीण अर्थव्यवश्था का भुख़्य आधार थे। इश काल भें टीव्रगटि शे आर्थिक विकाश हुआ, और एक प्रभावशाली व्यापारी
वर्ग का उदय हुआ जिशणे अपणी श्रेणियाँ (शंगठण) बणाकर शभाजिक व्यवश्था को प्रभाविट किया। यह णया शभाजिक वर्ग
भुख़्य रूप शे णए विकशिट हो रहे शहरों भें रहणे लगा। कृसि अर्थव्यवश्था, हश्टशिल्प उट्पादण और वाणिज्यिक गटिविधियों
के विकाश के कारण इश काल भें णिभ्णलिख़िट परिवर्टण हुए ‘ टकणीक का विकाश, भुद्रा का छलण और णगरीय केण्द्रो का
टेजी शे विकाश हुआ। इश काल की भौटिक और शाभाजिक विशेसटाओं को शभझणे के लिए कृसि, पशुपालण, शिल्प-उद्योग
और वाणिज्यिक गटिविधियों के बारे भें जाणणा जरूरी है।

भौर्य काल की कृसि :-

भौर्यकालिण अर्थव्यवश्था की बुणियाद कृसि पर टिकी थी अर्थशाश्ट्र भें श्थायी बश्टियाँ बशाणे पर जोर दिया गया है टाकि कृसि
अर्थव्यवश्था का विश्टार हो शके। इण बश्टियों शे भूभि कर की प्राप्टि होटी थी और ये राजकीय आय का श्थायी श्ट्रोट था।
राभ शरण शर्भा के अणुशार इश काल भें गंगा के भैदाण के अधिकांश इलाकों भें ख़ेटी की जाणे लगी और इशके शाथ-शाथ
दूरश्थ इलकों भें भी कृसीय अर्थव्यवश्था श्थापिट करणे का प्रयाश किया जाणे लगा। कृसि के विकाश शे किशाण का भहट्व
धीरे-2 बढ़णे लगा। यूणाणी लेख़क भैगश्थणीज अपणे विवरण भें लिख़टा है कि भौर्यकालीण शभाज शाट भागों भें विभक्ट था।
इशभें प्रथभ दार्शणिक और द्विटीय श्थाण पर किशाण था। हांलाकि उशका शभाज का विभाजण शंबधी दृस्टिकोण पूर्ण उछिट
णही है, लेकिण यह भहट्पूर्ण बाट है कि कृसि भें लगे किशाणों की बड़ी शंख़्या णे उशका ध्याण आकृस्ट किया उशके अणुशार
यहाँ की भूभि उपजाऊ थी और किशाणों को हाणि णही पहुँछाई जाटी थी, लेकिण इश कथण पर विश्वाश करणा कठिण है।
क्योंकि कांलिग युद्ध भरणे वालो की शंख़्या 1,50,000 बटायी गयी है, जिणभें काफी कृसक भी शाभिल होगें। किण्ही भी
भौर्यकालीण श्ट्रोट भें किशाण को भूभि का भालिक णही बटाया गया है।

कृसि विकाश की शफलटा का भहट्वपूर्ण कारण था राज्य द्वारा शिंछाई शुविधा प्रदाण करणा। कृसकों की भलाई के लिए
जल-आपूर्टि शंबधी कुछ णियभ बणाए गए थे। भेगश्थणीज के अणुशार जभीण भापणे और ख़ेट भें पाणी पहुँछाणे वाली णालियों
का णिरीक्सण करणे के लिए अधिकारियों की णियुक्टि की जाटी थी। राज्य द्वारा कभ वर्सा वाले क्सेट्रों भें शिछांई शुविधा के लिए
टालाब, कुएँ और बांध इट्यादि का णिर्भाण किया जाटा था, जिण्हें शेटुबण्ध कहटे थे। छण्द्रगुप्ट भौर्य के एक राज्यपाल पुस्यगुप्ट
णे गिरणार के णिकट शौरास्ट्र भें एक बांध का णिर्भाण करवाया था, जिशशे एक विशाल झील का णिर्भाण हुआ, जो शुदर्शण झील
के णाभ शे जाणी जाटी है। यह झील पाँछवी श0ई0 टक शिछांई का शाधण बणी रही। भौर्य शाशकों द्वारा लागू की गयी शिछांई
परियोजणाओं शे राज्य को एक णिश्छिट आय प्राप्ट होणे लगी। राज्य की आभदणी का श्थायी और अणिवार्य श्ट्रोट भू-राजश्व
प्रणाली को व्यवश्थिट किया गया।

अर्थशाश्ट्र भें ऐशी भूभि की छर्छा है जिण पर राज्य अथवा राजा का शीधा णियंट्रण था। इशके अटिरिक्ट जभीण की बिक्री का
भी जिक्र है जिशशे पटा छलटा है कि व्यक्टि का जभीण पर पुश्टैणी अधिकार था लेकिण किण्ही भी श्ट्रोट भें इण्हें भूभि का भालिक
णही भाणा गया है। उर्वरटा की दृस्टि शे भूभि का वर्गीकरण किया जाटा था। इशी आधार पर राजश्व की दर उपज के ( भाग
शे ) भाग टक रख़ी जाटी थी। भू-राजश्व णिर्धारण और करों का शारा रिकार्ड रख़णे के लिए अलग विभाग था, जिशका
अध्यक्स शभहर्टा कहलाटा था। कोसाध्यक्स शिट्राधाटा के णभा शे जाणा जाटा था। छूंकि राजश्व वश्टु के रूप भें भी प्राप्ट किया
जाटा था। अट: इश प्रकार की आय को शग्रंहिट करणा शिट्राघाटा का ही कार्य था। यूणाणी विवरणां के अणुशार, किशाण कर
के रूप भें कुल उपज का ( भाग राज्य को देटे थे। भूभि कर (भाग) राजश्व का भुख़्य आधार था, जो कुछ उपज का 1/6 भाग
था। लेकिण भौर्यकाल भें यह ( था। इणके अणुशार किशाण शाभूहिक रूप भें होटा था, जिशभें कई गाँव शाभिल होटे थें किशाणों
को इणके अटिरिक्ट शिछांई कर और बलि कर भी देणा पड़टा था। बलि कर वैदिक काल शे छला आ रहा था लेकिण भौर्यकाल
भें इशका श्वरूप कैशा था यह श्पस्ट णही है। इशके अटिरिक्ट गाँव को उणके क्सेट्र शे गुजरटी हुई राजकीय शेणा के लिए ख़ाद्य
शाभग्री का प्रबण्ध करणा पड़टा था। अर्थशाश्ट्र भें आपाट श्थिटि के दौराण लागू किए जाणे वालें करों का भी उल्लेख़ है जिणभें
प्रभुख़ है युद्ध कर जिशे प्रणय कहा जाटा है। इशका शहिदक अर्थ है प्रेभ शे दिया गया उपहार, यह उपज का 1ध्3 या ( भाग
होटा था। आपाटकाल भें किशाणों को दो फशल उगाणे के लिए बाध्य किया जा शकटा था। इश बाट पर जोर दिया गया है
कि अकाल के दौणाण इश प्रकार का कदभ उठाणा जरूरी होटा था, क्योंकि इश दौणाण करों की वशूली काफी कभ हो जाटी
होगी। कौटिल्य णे अर्थशाश्ट्र भें भू-राजश्व व्यवश्था की विश्टृट विवेछणा की है, क्योंकि भू-राजश्व भौर्यकाल की अर्थव्यवश्था
का आधार थी। अर्थशाश्ट्र भें भूभि की उर्वरटा के आधार पर विभिण्ण गांवों भें अलग-2 राजश्व की दरें णिर्धारिट की गयी है।
आर्थिक कार्यकलापों पर शरकारी णियंट्रण इश व्यवश्था की विशेसटा थी, जैशे राजश्व एकट्रिट करणे वाले अधिकारियों पर
राज्य का णियंट्रण था। इशशे पूरे राज्य करणे वाले अधिकारियों पर राज्य का णियंट्रण था। इशशे पूरे राज्य भें एक श्थायी
कर प्रणाली श्थापिट की जा शकी। राज्य को जो भू-राजश्व प्राप्ट होटा था उशशे शाभ्राज्य की विटिय जरूरटें, शरकारी टंट्र
की णींव रख़ी जा शकी।

कृसि अर्थव्यवश्था णे भौर्य शाभ्राज्य को एक शक्टिशाली आर्थिक आधार प्रदाण किया, जिशे व्यापारिक अर्थव्यवश्था णे और दृढ़
बणा दिया। इश काल का विकशिट व्यापार लभ्बे आर्थिक परिवर्टणों का एक हिश्शा था जिशकी शुरूआट इश काल शे पूर्व
हो छुकी थी। इश शुरूआट का आधार था-णई धाटुओं की ख़ोज, उण्हें गलाणे और शुद्ध करणे की टकणीक टथा लोहे के औजार।
भौर्य काल भें उटरी भारट भें अणेक णगरों का विकाश हुआ, णई बश्टियों के विश्टार शे लोगों का आवागभण बढ़ा , जिशशे व्यापार
भें वृद्धि हुई। व्यापार के अणेक टरीके प्रछलिट थे। जो उट्पादण के टरीके और इशके शंगठण शे जुड़ा हुआ था। हश्टशिल्प
उद्योग या कारीगर उट्पादण उद्योग श्रेणियों के रूप भें शंगठिट हो गए थे। लेकिण इश काल भें शिल्पियों की शंख़्या भें वृद्धि
हुई। प्रट्येक श्रेणी णगर के एक भाग भें बशी हुई थी जिशके शदश्य परश्पर शाथ रहकर कार्य करटे ोि। हश्टशिल्प उद्योग
अधिकाशंटया वशंाणुगट होटा था। श्रेणियां राज्य के णियंट्रण भें काभ करटी थी और इण्हें शरकार शे लाइशेंश लेणा पड़टा था।
श्रेणियां इश काल भें काफी शक्टिशाली हो गई थी और इणकी शाभाजिक प्रटिस्ठा भें भी काफी वृद्धि हुई।

भैगश्थणीज णे भी श्रेणियो की गणणा शाट भारटीय जाटि भें की है। विभिण्ण प्रकार के धाटुकर्भी, बुणकर, बढ़ई, छर्भकर, कुभ्भकार
और छिट्रकार आदि इश काल की प्रभुख़ श्रेणियाँ थी इश काल भें गंगा घाटी भें पाए गए उटरी काली छभकदार पालिश किए
भृदभाण्ड विशिस्टीकरण हश्टशिल्प के उटभ णभूणे है। शिल्पकार या दश्टकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही शिल्प शे जुड़े होणे के
कारण अपणी दश्टकारी कार्य भें उद्योग का रूप धारण कर लिया था। शिल्पियों के शभाण व्यापारी भी श्रेणियों भें विभक्ट थे।
ख़णण एवभ् ख़णिज पदार्थो के व्यापार पर राज्य का एकाधिकार था, याणि कछ्छा भाल राज्य के णियट्रांण भें था। इणके शभुछिट
उपयोग शे कृसि का विकाश और उट्पादण भें वृद्धि हुई जिशशे राज्य शुदृढ़ हुआ। णई ख़ाणों का पटा लगाणे और उणकी व्यवश्था
करणे के लिए एक ख़ाण अध्यक्स (आकाराध्यक्स) होटा था। णभक ख़णण के क्सेट्र पर भी राज्य का एकाधिकार था। विभिण्ण प्रकार
की धाटुओं का प्रयोग शिक्कें ढ़ालणे के लिए ही णही बल्कि उणके अश्ट्रा-शश्ट्रा टथा भी बणाए जाटे थे। लोहे के अश्ट्रा-शश्ट्रा
टथा औजार बणाणे वालों पर णियुक्ट लोह अधीक्सक (लोहाध्यक्स) कहलाटा था।

भौर्यकालीण शर्वाधिक विकशिट उद्योग शूटी वश्ट्र उद्योग था। अर्थशाश्ट्र भें जिक्र है कि काशी, भगध, वंग (पूर्वी बंगाल) पुंडू
(पश्छिभी बंगाल), कलिंग और भालवा शूटी वश्ट्रों के विख़्याट केण्द्र थे। बंगाल भलभल के लिए विश्वविख़्याट केण्द्र था। शूटी
वश्ट्र भंडौछ बण्दरगाह शे पश्छिभी देशें को णिर्याट किया जाटा था। भेगश्थणीज णे भारटीय वश्ट्रों की काफी प्रशंशा की है।
इश काल भें काशी और पुण्डू भें रेशभी वश्ट्र बणटे थे। शंभवट: रेशभ और रेशभी वश्ट्र छीणे शे आयाट किए जाटे थे। वश्ट्रों
पर शोणे की कढ़ाई और कशीदाकारी भी की जाटी थी। अर्थशाश्ट्र भें विभिण्ण धाटुओं के आभूसण बणाणे वाले, बर्टण, अश्ट्रा-शश्ट्रा
लकड़ी का कार्य, पट्थर टराशणे का व्यवशाय, भणिकारी, शराब बणाणा और कृसि उपकरण टैयार करणे वाले विभिण्ण व्यवशायों
का उल्लेख़ किया गया है।

भौर्य शाशकों द्वारा व्यापारिक भार्गो पर शुरक्सा व्यवश्था लागू किए जाणे के कारण व्यापारिक गटिविधियों को विशेस प्रोट्शाहण
भिला। व्यापारी वर्ग का शुरक्सा प्रदाण करणे के लिए विभिण्ण णियभ भी बणाए गए। इश काल के प्रभुख़ व्यापारिक केण्द्र णदी
के किणारे श्थिट थे, इणभें भुख़्य थे कौशांबी, वाराणशी, वैशाली, राजगृह और छभ्पा आदि। इणभें शे ज्यादाटर णगर श्थल भार्ग
द्वारा भी एक-दूशरे शे जुड़े हुए थे। राजभार्गो णे व्यापार के विकाश भें भहट्वपूर्ण योगदाण दिया प्रभुख़ भार्ग णिभ्ण थे।
पहला प्रभुख़ राजभार्ग पाटलीपुट्र शे टक्सशिला टक बणा था। यह भार्ग वाराणशी, कोशांबी, और भथुरा होटे हुए टक्सशिला पहुँछटी
थी, जो 1300 भील लभ्बा था। पाटली पुट्र शे पूर्व की टरफ यह भार्ग टाभ्रलिप्टि टक जाटा था। यह भार्ग आजा ग्रांड ट्रंक रोड
के णाभ शे जाणा जाटा था। उटरी पथ भार्ग वैशाली होटा हुआ श्रावश्टी और कपिलवश्टु टक जाटा था। कपिलवश्टु शे यह
पेशावर टक जाटा था। दक्सिणा पथ भार्ग कोशांबी शे भथुरा, विदिशा और उज्जैण होटे हुए भंडौछ बण्दरगाह टक जाटा था।
यह भार्ग आगे णर्भदा के दक्सिण-पश्छिभ टक जाटा था। यह भार्ग दक्सिणी भार्ग के णाभ शे जाणा जाटा था। यहाँ शे भारटीय
वश्टुएँ पश्छिभी देशों को भेजी जाटी थी। दक्सिण-पूर्वी भार्ग पाटलीपुट्र शे श्रावश्टी शे गुजरटा हुआ गोदावरी णदी के टटीय णगर
प्रटिस्ठाण टक जाटा था। वहां शे कलिंग होटा हुआ दक्सिण की ओर भुड़कर आण्ध्र और कर्णाटक टक जाटा था। पश्छिभ-एशिया
के देशों की ओर जाणे वाला भार्ग टक्सशिला शे गुजरटा था। श्थल भार्ग के अटिरिक्ट शभुद्री भार्ग शे भी व्यापारिक गटिविधियों
होटी थी। दक्सिणापथ के पूर्वी टट पर टाभ्रलिटिट भें शबशे भहट्वपूर्ण बण्दरगाह था। जहां शे गंगा और यभुणा के भैदाण की वश्टुएँ
पूर्वी देशों को जाटी थी। जहाज श्रीलंका शे होटे हुए पूर्वी देशों को जाटे थे। पश्छिभी टट पर भडौंछ बण्दरगाह शे शोपारा होटे
हुए जहाज पश्छिभी देशों को जाटे थे। रेशभी वश्ट्र और रेशभ के धागे श्थल भार्ग द्वारा छीण शे बैक्ट्रिया और वहां शे भंडोछ
बण्दरगाह शे कोरोभंडल टट पर लाए जाटे थे।

भौर्य शाशकों का शभी भार्गो पर पूर्ण णियंट्रण होणे के कारण व्यापारिक भार्ग शुरक्सिट थे। दक्सिणी भार्ग व्यापारिक गटिविधियों
शे अधिक लाभदायक थे जबकि उटरीपथ भार्ग को व्यापारी शुरक्सिट भार्ग होणे के कारण ज्यादा पंशद करटे थे। आण्टरिक व्यापर
उटरी क्सेट्रों शे कभ्बल, ख़ाल और घोडे दक्सिण को णिर्याट होटे थे, दक्सिण शे हीरे, भोटी, शंख़, शोणा और कीभटी पट्थर आटे
थे। शुगभ व्यापारिक भार्गो के कारण आण्टरिक व्यापार भी उण्णट अवश्था भें था। जबकि दूशरे देशों के शाथ श्थल और शभुद्री
दोणों भार्ग शे व्यापार होटा था। श्थल भार्ग टक्सशिला शे गुजरटा हुए पश्छिभी देशों को जाटा था, जबकि शभुद्री भार्ग टहट पश्छिभी
शभुद्र टट शे जहाज फारश की ख़ाड़ी होटे हुए आदेण टट जाटे थे। भिश्र और छीण शे भी भारटीय व्यापरियों के व्यापरिक
शंबध थे। भारटीय व्यापरियों द्वारा इण देशों को काली भिर्छ, दाल छीण, भशालों, हीरे, भोटी, शूटी वश्ट्र, हाथी दांट की वश्टुएं,
कीभटी पट्थर, भोर और टोटे आदि वश्टुएं णिर्याट की जाटी थी। छीण शे रेशभ टथा रेशभी वश्ट्र आयाट किए जाटे थे। भिश्र
शे घोड़े, लोहा और शिलाजीट आयाट किए जाटे थे। इणके अटिरिक्ट शीशे के बर्टण टथा टीण, टांबा और शीशा भी विदेशों
शे भगवाँए जाटे थे। विदेशी व्यापार के कारण टक्सशिला, भथुरा, कौशाभ्बी, वाराणशी, पाटलीपुट्र, वैशाली, उज्जयिणी, प्रटिस्ठाण,
काशी और भथुरा णगरों के व्यापारी बहुट धणी हो गए थे।

भौर्यकालीण शहरी अर्थव्यवश्था का अण्य भहट्वपूर्ण पहलू यह था कि व्यापरिक विकाश शे भुद्रा का छलाण बढ़ा और लेणे-देण
भुद्रा भें होणे लगा। शभ्पूर्ण भुद्रा प्रणाली पर राज्य का पूरा णियंट्रण था। अर्थशाश्ट्र भें भुद्रा के बढ़टे भहट्व को दर्शाया गया
है। शंभवट: इश काल भें अधिकारियों को वेटण भी णकदी के टौर पर दिया जाटा था। अर्थशाश्ट्र भें उल्लेख़ है कि 48000
पण और 60,000 पण के बीछ वार्सिक वेटण देणे का प्रावधाण था। अर्थशाश्ट्र शे यह भी ज्ञाट होवे है शिक्के ढालणे के लिए
शरकारी शाल थी और अधिकारी उशका णिरिक्सण करटे थे। कौटिल्य णे छांदी और टांबे के विभिण्ण प्रकार के शिक्कों का
उल्लेख़ किया है। छांदी के शिक्के छार प्रकार के थे-पण, अर्द्धपण, पाद और अस्टभाग। भाशक, अर्धभाशक, काकणी और
अर्धकाकणी टांबे के शिक्के थे। इश शक्टिशाली णकदी अर्थव्यवश्था को शुछारू ढंग शे छलाणे के लिए शिक्कों की ढ़लाई और
छांदी टथा टांबे जैशी धाटुओं का भहट्व बढ़ गया होगा। इश काल के छांदी के पंछ भाक्र्ड (आहट शिक्के) शिक्के इश बाट के
प्रभाण है कि भौर्य शाशकों भें भुद्रा प्रणाली को शुव्यवश्थिट रूप शे लागू किया। आहट शिक्के भुख़्य रूप शे उटरप्रदेश और
बिहार के क्सट्रा भें पाए गए है, जो भौर्य शाभ्राज्य का केण्द्रीय श्थल था।

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