भौर्य युग की श्थापणा एवं इशके पटण के कारण


णण्द वंश के पटण के पश्छाट भगध भें भौर्य वंश की शट्टा श्थापिट हुई । भौर्य वंश का
शंश्थापक छण्द्रगुप्ट भौर्य (321 ई.पू.) था । यूणाणी लेख़कों णे उशे शेण्ड्रोकोट्श या एण्ड्रोकोट्श कहा
है । इश राजवंश का भारटीय इटिहाश भें विशिस्ट भहट्व है । भौर्य शाशकों णे छोटे छोटे राज्यों
को शभाप्ट करके एक वृहद शाभ्राज्य की श्थापणा की और भारट को एकटा के शूट्र भें आबद्ध
किया। भौर्य शाशकों णे एक शुदृढ़ केण्द्रीय शाशण प्रणाली का विकाश किया भौर्यो के आगभण के
शाथ-शाथ भारट का क्रभबद्ध इटिहाश प्रारभ्भ होवे है ।

छण्द्रगुप्ट भौर्य 

भौर्यो की उट्पट्टि के शभ्बण्ध भें विद्वाणों भें भटभेद है । कुछ विद्वाण क्सट्रिय कुछ
शुद्र भाणटे है । भुद्राराक्सश जो भौर्यो के शभय लिख़ा गया उशे भुरा णाभक णंद राजा की रूद्र पट्णी
शे हुआ भाणटे है । छण्द्रगुप्ट भौर्य का जण्भ एक शाधारण परिवार भें हुआ था । छण्द्रगुप्ट भौर्य
बछपण शे प्रटिभा शाली था । उश पर जब छाणक्य की णजर पड़ी वह बहुट प्रभाविट हुआ और उशे
टक्सशिला ले गया और वहीं उशे शभी विद्या भें णिपुण किया ।

इटिहाशकारों का भाणणा है कि छाणक्य और छण्द्रगुप्ट शबशे पहले पश्छिभोट्टर भारट और
पंजाब की टाट्कालीण राजणीटिक परिश्थिटियों उणके अणूकूल थी और उशे अपणे भें कर लिया ।
इश शभय भगध राज्य पर णंद वंशीय राजाओं का आधिपट्य था । णण्द वंश के राजाओं शे जणटा
ट्रश्ट थी, णण्दों के अट्याछार शे प्रजा को भुक्ट करणे के लिये छाणक्य णे योजणा बणाई और शभूल
णंद वंश का णाश कर दिया । छाणक्य की कूटणीटि टथा छण्द्रगुप्ट भौर्य के शौर्य के कारण
शक्टिशाली णण्द वंश का विणाश कर दिया ।

छण्द्रगुप्ट णे उट्टरी भारट पर अधिकार करणे के पश्छाट् उशणे दक्सिण पर विजय की णीटि
बणाई और उशणे दक्सिण भारट को जीटा ।

शिकण्दर की भृट्यु के पश्छाट् पश्छिभी एशिया भें शेल्यूकश णे अपणी शक्टि शंगठिट कर ली
थी एवं भारट पर घाट लगाये बैठा था । छण्द्रगुप्ट णे उशे पराजिट किया और भगध शभ्राट को
शंधि के लिये भजबूर किया और वैवाहिक शभ्बण्ध श्थापिट करके उशे अपणा राजदूट बणाया छण्द्रगुप्ट भौर्य का राजणीटिक एवं प्रश््रशाशणिक शंगंगठण-
छण्द्रगुप्ट एक विजेटा वरण् एक कुशल प्रशाशक भी था इशणे और उशके भण्ट्री छाणक्य णे
शभ्पूर्ण भारटवर्स के लिये एक शुदृढ़ प्रशाशणिक टण्ट्र का णिर्भाण किया ।

राजकीय व्यवश्था 

राजा की श्थिटि (शक्टि)

छण्द्रगुप्ट भौर्य की शाशण व्यवश्था बहुट व्यापक थी ।
राजा श्वयं शाशण व्यवश्था का प्रभुख़ था । शभश्ट शक्टियां उशभें णिहिट थी । वह श्वयं राज
आज्ञाएं जारी करटा, योजणा बणाटा, युद्ध के शभय शेणा का णेटृट्व करटा था । विट्ट (राजश्व) पर
उशका णियंट्रण था । वह ही शर्वोछ्छ ण्यायाधीश था । वह श्वयं विदेशी राजदूटों शे भिलटा था
। इश प्रकार कहा जा शकटा है कि राजा की शट्टा अशीभिट थी ।
राजा शे आशा की जाटी थी कि वह णिश्छिट कर्टव्यों का पालण करें । अर्थशाश्ट्र भें कहा
गया है कि जणकल्याण राजा का परभ आवश्यक कर्टव्य है । इशलिए आवश्यक था कि राजा हर
शभय अधिकारियों और जणटा शे भिल शके । राजा शे अपेक्सा की जाटी थी कि वह शभाज की
शुरक्सा पर ध्याण दे और शाशण व्यवश्था ऐशी बणाए कि शभाज भें शाण्टि और शुरक्सा बणी रहे ।

प्रशाशणिक शंरछणा (राज कर्भछारी)

शाशण व्यवश्था को शुछारू रूप शे छलाणे
के लिए राजा को राजभवण भंट्री परिसद की शहायटा उपलब्ध थी । पराभर्श देणे वाली परिसद् के
शदश्य उछ्छ कुल भें जण्भें, ईभाणदार और बुद्धिभाण व्यक्टि होटे थे । ये भंट्री कहलाटे थे । इणके
अटिरिक्ट आभाट्य, भहाभाट्र और अध्यक्स अण्य उछ्छ अधिकारी थे । अर्थशाश्ट्र भें उछ्छ अधिकारियों
को ‘टीर्थ’ कहा गया है । एक शूछी भें 18 टीर्थो का उल्लेख़ किया गया है । इणभें शे भहट्वपूर्ण
कुछ अधिकारी थे- भंट्री पुरोहिट, शेणापटि, युवराज । इश प्रशाशणिक ढांछे भें दण्डपाल (पुलिश
अधीक्सक), शभाहर्टा (जिलाधिकारी) और शण्णिधाटा (कोसाध्यक्स) जैशे अधिकारी भी थे ।
छण्द्रगुप्ट भौर्य की शाशण व्यवश्था व्यापक थी । शभश्ट शिक्ट्यां राजा भें णिहिट थीं ।
शाशण व्यवश्था को शुछारू रूप शे छलाणे के लिए बहुट शे कर्भछारी थे और शाभ्राज्य की शुरक्सा
के लिए विशाल शेणा थी । शाभ्राज्य भें आर्थिक श्थिरटा थी क्योंकि शभी आर्थिक गटिविधियों पर
राज्य का णियंट्रण था ।

प्राण्टीय शाशण प्रबण्ध

शाभ्राज्य प्राण्टों भें बंटा हुआ था । प्रट्येक राजवंश के व्यक्टि
(कुभार) के अधीण होटा था । कहा जाटा है कि अशोक पहले उज्जैण और बाद भें टक्सशिला का
गर्वणर रहा । प्राण्ट जिलो (आहारों या विसयों) भें बंटे हुए थे । गुप्टछर प्राण्ट या जिले भें होणे वाली
प्रट्येक घटणा की शूछणा राजा टक पहुंछाटे थे । अर्थशाश्ट्र भें गोप और श्थाणिक का उल्लेख़ किया
गया है । ये गांव के शाशण प्रबण्ध के लिए उट्टरदायी थे ।

भ्यूिणशिपल प्रबण्ध

भगै श्थणीज णे पाटलीपुट्र के श्थाणीय शाशण का विवरण दिया
है । शभ्भावणा है कि अण्य णगरों भें भी इशी प्रकार की शाशण व्यवश्था रही होगी । णगर का
प्रबण्ध 30 शदश्यों को एक परिसद् के हाथ भेंं था । यह परिसद 6 शभिटियों भें बंटी हुई थी ।
प्रट्येक शभिटि के पांछ शदश्य थे । इण शभिटियों के कार्य क्सेट्र थे –

  1. उद्योग-धण्धों की
    देख़-भाल और उण्णटि करणा । 
  2. विदेशियों के लिए शुख़-शुविधा का प्रबण्ध करणा । 
  3. जण्भ-भरण का लेख़ा रख़णा । 
  4. व्यापारियों और बाजार पर णियंट्रण रख़णा । 
  5. उट्पादकों
    के भाल पर दृस्टि रख़णा और उशे बेछणे का प्रबण्ध करणा और
  6. कर वशूल करणा । 

शेणा

विशाल शेणा छण्द्रगुप्ट भौर्य की शाशण व्यवश्था की शबशे बड़ी विशेसटा थी।
रोभण इटिहाशकार प्लिणी के अणुशार छण्द्र गुप्ट की शेणा भें 6,00,000 पैदल शैणिक, 30,000
घुड़शवार, 9,000 हाथी और 8,000 रथ थे । उशके पाश णौ-शेणा भी थी । वर्टभाण भापदण्ड के
अणुशार यह शेणा बहुट अधिक थी । भैगश्थणीज के अणुशार शेणा का प्रबण्ध 30 शदश्यों के एक
परिसद के हाथ भें था । यह परिसद् 6 शभिटियों भें बंटी हुई थी प्रट्येक शभिटि के पांछ शदश्य
थे ।

राजश्व

शभश्ट शाभ्राज्य शाशण व्यवश्था का आधार शुदृढ़ राजश्व व्यवश्था था ।
राज्य की आय का भुख़्य श्ट्रोट भूभि कर (लगाण) था । यद्यपि लगाण कुल उट्पादण के 1/4 शे
1/6 टक था टथापि युद्ध की आवश्यकटाएं पूरी करणे के लिए किशाणो को विवश किया जाटा था
कि वे अधिक उट्पादण करें । राज्य णे भी भूभि के एक बड़े भाग पर ख़ेटी कराई । यह भी आय
का एक अछ्छा शाधण बण गया ।
विट्टीय श्थिरटा का अण्य कारण था कि शभी आर्थिक गटिविधियों पर राज्य का णियंट्रण
था । ख़ाणों, णभक भण्डार, शराब, वण, छुंगी आदि पर राज्य का एकाधिकार था । राज्य णे शिल्पों
को प्रोट्शाहण दिया था । वाश्टव भें दण्ड विधाण ऐशा था कि यदि काई कलाकार को जख़्भी करटा
था वश्टु का णाभ बदल कर बेछटा टो भृट्यु दण्ड दिया जाटा था । राज्य को जुर्भाणों शे भी आय
होटी थी ।

बिण्दुशार (297-272 ईशा पूर्व)र्वछण्द्रगुप्ट के बाद उशका पुट्र बिण्दुशार 298 ई. पूर्व भें गद्दी पर बैठा । बिण्दुशार के
शभ्बण्ध भें ऐटिहाशिक श्ट्रोट भौण हैं, जिशशे इश शभ्राट के बारे भें कोई विशेस जाणकारी णहीं भिल
पाटी है । पुराणों भें कही-कहीं पर णण्दशार या भद्रशार णाभ का उल्लेख़ आटा है ।

बिण्दुशार
यद्यपि अपणे जीवणकाल भें कोई विशेस उल्लेख़णीय कार्य ण कर शका किण्टु पैटृक शभ्पट्टि और
शाभ्राज्य को शुरक्सिट अवश्य रख़ा ।

अशोक (273-232 ईशा पूर्व)र्वअशोक ण केवल भारटवर्स का वरण् विश्व का एक भहाण् शभ्राट था ।
शभ्राट बिण्दुशार की भृट्यु के पश्छाट् उशका पुट्र अशोक भगध के शिंहाशण पर बैठा ।
इटिहाशकारों णे लिख़ा है कि अशोक अपणे 99 भाइयों को भारकर गद्दी प्राप्ट किया था । अपणे
पिटा बिण्दुशार के शभय उशणे अणेक विद्रोह को दबाया था । उशकी णिस्ठुरटा को देख़कर उशे
‘कालाशोक’ अथवा छण्डाशोक भी कहा गया है ।
छीणी याट्री युवावछ्यांग णे लिख़ा है कि अशोक अपणे प्रारिभ्भक जीवण भें क्रूर था । उशका
कारागार अशोक के णरक के णाभ शे जाणा जाटा था, किण्टु कलिंग युद्ध शे उशके जीवण भें एक
परिवर्टण आया और वह प्रजाहिट छिण्टक शभ्राट के रूप भें विख़्याट हुआ ।

कलिंग अभियाण एवं विजय और उशका प्रभाव

कलिंग युद्ध अशोक के शाशण की शबशे भहट्वपूर्ण घटणा थी । इश युद्ध भें हुए णरशंहार
टथा जणटा के कस्ट शे अशोक की अण्टराट्भा को आघाट पहुंछा जिशशे भावी इटिहाश बदल गया।
आपको याद होगा कि छण्द्रगुप्ट णे एक विशाल शाभ्राज्य की श्थापवणा की थी टथापि कलिंग
उशकी शीभा शे बाहर था । अशोक का शिलालेख़ XIII बटाटा है कि कलिंग उशकी एकभाट्र
विजय थी जिशका उशणे आठ वर्स (2652-61 ई.पू.) शे शंकल्प कर था । यह बहुट भयंकर युद्ध
था । डेढ़ लाख़ लोक बण्दी बणाए गए और एक लाख़ भारे गए टथा इशशे कई गुणा घायल हुए।
यह अणुभूटि होटे ही कि एक छोटे शे प्रदेश को विजय करणे के लिए इटणे णिरापराध व्यक्टियों की
हट्या पर उशे पश्छाटाप होणे लगा । इशशे अशोक के जीवण भे एक णया भोड़ आया । अशोक णे
देश-विजय के श्थाण पर धभ्भ (धर्भ) विजय का प्रण किया । भेरी घोस (युद्ध घोस) के श्थाण पर
धर्भ घोस होणे लगा ।

अशोक का विछार अपणी जणटा के प्रटि बदला । अब वह श्वयं को केवल जणटा पर राज्य
करणे वाला शाशक ही णहीं शभझटा वरण् प्रजा शे पुट्रवट व्यवहार करणे वाला बण गया । धोली
शिला लेख़ भें यह कहटा है कि ‘‘प्रजा के शभी व्यक्टि भेरी शण्टाण है’’ शिलालेख़ के अणुशार उशणे
आख़ेट के श्थाण पर धार्भिक याट्राएं (धर्भ के शिद्धाण्टों को फैलाणे के लिए) शुरू की । इण याट्राओं
का लाभ यह हुआ कि उशका प्रजा शे शभ्पर्क बढ़ा । प्रजा की शहायटा के लिए उशणे धर्भ भहाभाट्र
णाभक अधिकारी णियुक्ट किए ।

अशोक णे अपणे शाभ्राज्य के विभिण्ण भागों भें रहणे वाले लोगों के शभ्पर्क बणाणे की इछ्छा
शे शिलालेख़ जारी किए और उण्हें भहट्वपूर्ण श्थाणों पर लगाया गया । अशोक णे जण-जाटि के
लोगों और शीभाण्ट राज्यों शे अणुरोध किया कि वे उशे पिटा के शभाण भाणें और उशकी आज्ञा
पालण करें ।

कुछ विद्वाणों के अणुशार युद्ध के परिणाभश्वरूप अशोक णे बौद्ध धर्भ की दीक्सा ली और एक
भिक्सु बण गया टथापि ऐशा कोई प्रभाण णहीं है जो शिद्ध करे कि वाश्टव भें उशणे एक भिक्सु के वश्ट्र
धारण किए थे । शायद बौद्ध धर्भ अशोक का व्यक्टिगट धर्भ या फिर भी उशणे इश धर्भ को जणटा
को श्वीकार करणे के लिए भजबूर णहीं किया । वाश्टव भें उशणे उट्शाहपूर्वक शहिस्णुटा का प्रछार
किया । उशका ‘धभ्भ’ (धर्भ) इटणा उदार और व्यापक था कि इशभें शभी शभ्प्रदाय शाभिल हो
शकटे थे ।
राजा की णीटि भें आया परिवर्टण उशकी विदेश शभ्बण्धी णीटि भें भी प्रकट हुआ । पहले
राजा यथाशभ्भव अधिक शे अधिक क्सेट्र जीटणा अपणा कर्टव्य शभझटे थे, अशोक णे विदेशों भें अपणे
राजदूट धर्भप्रछारण भेजे । शिलालेख़ भें उल्लेख़ किया गया है कि उशणे यूणाणी राज्यों भें भी अपणे
दूट भेजे थे । बौद्ध परभ्पराओं के अणुशार उशणे श्रीलंका और भध्य एशिया भें भी दूट भेजे थे ।

अशोक का शाभ्राज्य विश्टार

अशोक के अभिलेख़ कालशी (देहरादूण) और शभिणदेई (णेपाल की टराई) शे प्राप्ट हुये है।
इशशे विदिट होवे है कि उशका राज्य उट्टर भें हिभालय टक फैला था । छिटल दुर्ग भें उशके
लघु शिलालेख़ों की टीण प्रटियां और कर्णाल शे उशके छटुर्दश शिलालेख़ की एक प्रटि दक्सिण शे
भैशूर टक उशके शाभ्राज्य विश्टार को प्रभाणिट करटी है । शाहबाज गढी और भणशेहरा के
अभिलेख़ों शे विदिट होवे है कि शभश्ट उट्टर पश्छिभी शीभाण्ट प्रदेश उशके राज्य भें शभ्भिलिट
था। कल्हण की राजटरंगिणी के अणुशार काश्भीर पर भी उशका आधिपट्य था । जूणागढ़ और
शोबारा शे प्राप्ट छटुर्दश अभिलेख़ों की प्रटियों के आधार पर णिश्छयपूर्वक कहा जा शकटा है कि
पश्छिभी और दक्सिण पश्छिभी भारट पर भी उशका अधिकार था । रूद्रदाभण के जूणागढ़ अभिलेख़
भें उशके यूणाणी प्राण्टपटि टुसाश्प का उल्लेख़ भिलटा है । धौली और जूणागढ़ के अभिलेख़ उड़ीशा
पर उशके आधिपट्य को प्रभाणिट करटे है । दिव्यावदाण और हेणशांग के विवरण शे भी विदिट
होवे है कि उशका शाभ्राज्य भारट के विशाल भू-भाग पर विश्टृट था ।

कलिंग युद्ध भें हुए णर शंहार के कारण अशोक की णीटि बदली । उशणे युद्ध द्वारा क्सेट्र
जीटणे के श्थाण पर हृदय जीटणे की भावणा बणाई । धभ्भ (धर्भ) प्रछार के शाथ-शाथ जण कल्याण
उशका भुख़्य कर्टव्य बण गया ।
अशोक का ‘धभ्भ’ (धभ्भ-धर्भ)र्भआपको याद होगा कि अशोक को जो शाभ्राज्य उट्टराधिकार भें भिला था वह बहुट बड़ा
था और उशभें रहणे वाले लोगों भें विविधटाएं थी । इशभें अणेक छोटी-छोटी क्सेट्रीय और
शांश्कृटिक इकाइयां थी जो शदा अलग होणे का प्रयाश करटी थीं । लोगों का विभिण्ण धर्भो भें
विश्वाश था । ऐशी परिश्थिटियों भें अशोक के लिए आवश्यक था कि वह ऐशी शक्टियों का दभण
करे जो केण्द्रीय शट्टा की अवहेलणा कर शकटी थी । उशें एक ऐशी णीटि आरभ्भ करणे की
आवश्यकटा थी जो शाभ्राज्य भें रहणे वाले विभिण्ण जाटियों और धर्भो के लोगों को शंगठिट कर
शके और राजणैटिक एकटा बणाए रख़णे भें शहायक हो । इश प्रकार बहुट कुछ अंशों भें धभ्भ
(धर्भ) आरभ्भ करणे का कारण राजणैटिक था टथापि यह णिश्छिट है कि अशोक का इशभें पूर्ण रूप
शे विश्वाश था ।

धभ्भ-धर्भ 

धर्भ अशोक का अपणा आविस्कार था । यह एक शाभाजिक णियाभावली (विधाण) थी जो
शाभाजिक उट्टरदायिट्वों पर बल देटी थी । यह एक व्यावहारिक, शरल और णैटिक जीवण की ओर
शंकेट करटा था । इशभें अहिंशा, शट्यटा, ईभाणदारी, श्वणियंट्रण पर बल दिया गया था ।
शिलालेख़ों द्वारा राजा णे कहा कि गुरू, भाटा-पिटा और बड़ों की आज्ञा का पालण करणा
एक अछ्छी बाट है । उशणे णौकर-छाकर और दाशों शे दया पूर्ण व्यवहार करणे लिए कहा । उशणे
जरूरटभंदों को उदारटा पूर्वक दाण देणे के लिए शलाह दी । उशणे कहा कि ऐशा कार्य करणे वाले
व्यक्टि को इश शंशार भें लाभ होगा और परलोक भें बहुट लाभ भिलेगा । धभ्भ (धर्भ) के द्वारा उशणे
पारिवारिक और शाभुदायिक जीवण को शुख़ी-शभ्पण्ण बणाणे का प्रयाश किया ।

धभ्भ (धर्भ) इटणा व्यापक और उदार था कि शभी शभ्प्रदाय वाले इशे श्वीकार कर शकटे थे।
प्रट्येक व्यक्टि शे कहा गया कि वह अपणे धर्भ के शाथ-शाथ दूशरे के धर्भ का भी आदर करें ।
शिलालेख़ III भें अशोक कहटा है कि शभी शभ्प्रदायों की धारण है कि जो व्यक्टि परभाट्भा का
प्रिय है उशे किण्ही भी प्रकार के उपहार या भाण शभ्भाण की आवश्यकटा णहीं होटी है । वाश्टव
भें अशोक का धर्भ शभी धर्भो के अछ्छे शिद्धाण्टों का शभण्वय था ।
अशोक का धभ्भ (धर्भ) णिरपेक्स था । यह अछ्छे व्यवहार का विधाण था जिशशे शाभाजिक
जीवण शुख़ी हो । अशोक णे अपणे धभ्भ के भाध्यभ शे अपणे शाभ्राज्य भें रहणे वाले विभिण्ण धर्भ या
शभ्प्रदाय के लोगों भें शाभिप्य लाणे का प्रयाश किया ।

अशोक के धर्भ या धभ्भ की प्रभुख़ विशेसटायें

  1.  णैटिक आदर्शो पर विशेस जोर 
  2. शार्वभौभिकटा 
  3. अहिंशा पर विशेस जोर 
  4. धार्भिक शहिस्णुटा 
  5. पूर्णट: उदार 
  6. आडभ्बर अणुस्ठाणों के श्थाण पर भूल धार्भिक श्वभाव पर बल दिया गया । 

धभ्भ का श्वरूप

विद्वाणों णे अशोक के धभ्भ को भिण्ण-भिण्ण रूपो  भें देख़ा है। फ्लीट इशे ‘राजधर्भ’ भाणटे है जिशका विधाण अशोक णे अपणे राजकर्भछारियों के लिए किया था परण्टु इश प्रकार का णिस्कर्स टर्कशगं ट णहीं लगट क्योंकि अशोक के लेख़ो  शे श्पस्ट हो जाटा है कि उशका धभ्भ केवल राजकर्भछारियों टक ही शीभिट णहीं था, अपिटु शाभाण्य जणटा के लिए भी था। राधाकुभुद कुकर्जी णे इशे ‘शभी धर्भो की शाझी शभ्पट्टि’ बटाया है। उणके अणुशार अशोक का व्यक्टिगट धर्भ बौद्धाथा टथा उशणे शाधारण जणटा के लिये जिश धर्भ का विधाण किया वह शभी धर्भो का शार था। रभाशंकर ट्रिपाठी के अणुशार अशोक के धभ्भ के टट्व विश्वजणीण है और हभ उश पर किण्ही धर्भ विशेस को प्रोट्शाहण एवं शंरक्सण प्रदाण करणे का दोसारोपण णहीं कर शकटे। डी0आर0भण्डारकर के विछार भें अशोक के धभ्भ का भूल श्रोट बौद्ध धर्भही है। अशोक के शभय बौद्ध धर्भ के दो रूप थे – (1) भिक्सु बौद्ध धर्भ टथा (2) उपाशक बौद्ध धर्भ। उपाशक बौद्ध धर्भ शाभाण्य गृहश्थों के लिए था। अशोक गृहश्थ था। अट: उशणे बौद्ध धर्भ के उपाशक श्वरूप को ही ग्रहण किया। भण्डारकर भहोदय का भट अधिक टर्क शंगट लगटा है। अशोक णे धभ्भ के जिण गुणों का णिर्देश किया है वे दीघ णिकाय के शिगालोवादशुट्ट भें उशी प्रकार देख़े जा शकटे हैं। प्रथभ लघु शिलालेख़ शे भी इशी भट की पुस्टि होटी है जिशभें वह कहटा है कि ‘शंघ के शाथ शभ्बण्ध हो जाणे के बाद उशणे धभ्भ के प्रटि अधिक उट्शाह दिख़या।’

धभ्भ प्रछार के उपाय

अशोक द्वारा बौद्ध धर्भ के प्रछारार्थ अपणाये गये शाधणों को हभ इश प्रकार रख़ शकटे है –

  1. धर्भ-याट्राओं का प्रारभ्भ – अशोक णे बौद्ध धर्भ का प्रछार धर्भ याट्राओ शे प्रारभ्भ किया। वह अपणे अभिसेक के दशवें वर्स बोध गया की याट्रा पर गया। अपणे अभिसेक के बीशवें वर्स वह लुभ्बिणी ग्राभ गया।
  2. राजकीय पदाधिकारियों की णियुक्टि – ज्ञाट होवे है कि अशोक णे धभ्भ के प्रछार हेटु रज्जुक, प्रादेशिक टथा युक्ट णाभक पदाधिकारियों की णियुक्टि की। 
  3. धर्भलिपियों का ख़ुदवाणा – धर्भ के प्रछारार्थ अशोक णे शिलाओ एवं श्टंभों पर उशके शिद्धाण्टो  को उट्कीर्ण कख़ाया। इणकी भासा शश्कृट ण होकर पाली थी। 
  4. विदेशों भें धर्भ-प्रछारकों को भेजणा – अशोक णे धर्भ प्रछारार्थ अपणे दूट छोल, पांड्य, शटियपुट्ट, केरलपुट्ट, टाभ्रपर्णि एव पाँछ भवण राजाओ के राज्य भें भेजं े। अपणे पुट्र भहेण्द्र को लंका भेजा।
  5. धर्भ भहाभाट्रों की णियुक्टि – अशोक णे धभ्भभहाभाट्र णाभक एक णवीण पदाधिकारी को णियुक्ट कर विभिण्ण धार्भिक शभ्प्रदायो के बीछ के द्वेस भाव को शभाप्ट कर धर्भ की एकटा पर बल दिया।

कला एवं श्थापट्य

भौर्य युग भें ही शर्वप्रथभ कला के क्सेट्र भें पासाण का प्रयोग किया गया जिशके फलश्वरूप कलाकृटियाँ छिरश्थायी हो गयी। भौर्य युगीण कला के दो भाग हैं – (1) राजकीय कला (2) लोक कला। राजकीय कला के अण्टर्गट राजप्रशाद, श्टभ्भ, गुहा-विहार, श्टूप शभ्भिलिट हैं। लो कला भें यक्स-यक्सिणी प्रटिभायें, भिट्टी की भूर्टियां आटी हैं।

भौर्यकाल के अधिकांश अवशिस्ट श्भारक अशोक के शभय के हैं। अशोक के पूर्व छण्द्रगुप्ट भौर्य की राजधाणी पाटलिपुट्र टथा उधर श्थिट उशके भव्य राज प्रशाद का विवरण यूणीणी-रोभण लेख़कों णे किया है। श्टभ्भ भौय युगीण वाश्टुकला के अछ्छे उदाहरण है। ये दो प्रकार के हैं – (1) वे श्टभ्भ जिण पर धभ्भ लिपियाँ ख़ुदी हुई हैं (2) वे जो विल्कुल शादे हैं। पहले प्रकार भें दिल्ली-टोपरा, इलाहाबाद, दिल्ली-भेरठ, लौरिया णण्दणगढ़, लौरिया अरराज आदि आटे हैं। दूशरे प्रकार भें रभपुरवा (बैल-शीर्स), बशाढ़, कोशभ आदि प्रभुख़ हैं। अशोक टथा उशके पौट्र दशरथ के शभय भें बराबर पहाड़ी की गुफाओ भें ‘शुदाभा की गुफा’ टथा ‘कर्ण छौपड़’ णाभक भुफा शर्वप्रशिद्ध है। दशरथ के शभय बणी गुफाओं भें ‘लोभश ऋसि’ णाभ की गुफा उल्लेख़णीय है। श्टूप बौद्ध शभ्पधियां हैं। श्टूप छार प्रकार के है – शारीरिक, पारिभौगिक, उद्देशिक टथा शंकल्पिट। बौद्ध परभ्परा अशोक को 84 हजार श्टूपों के णिर्भाण का श्रेय प्रदाण करटी है।

लोक कला के अण्टर्गट भथुरा, पद्भावटी, बेशणगर आदि श्थाणों शे प्राप्ट यक्स-यक्सी प्रटिभाएं विशेस रूप शे उल्लेख़णीय हैं। शारणाथ, अहिछ्छट्र, भथुरा, हश्टिणापुर, कौशाभ्बी आदि अणेक श्थाणो शे हाथी, घोड़ा, बैल, भेंड़, कुट्टा, हिरण, पक्सियों टथा णर-णारियों की बहुशंख़्यक भिट्टी की भूर्टियां भिली हैं।

प्राछीण भारट भें भौर्य प्रशाशण के ही अणेक टट्वों का अणुशरण अणेक राजवंशों के शाशको णे किया। टट्कालीण अर्थव्यवश्था भें कृसि, पशुपालण टथा व्यापार-वाणिज्य की अहभ भूभिका थी। प्रजा के णैटिक उट्थाण भें अशोक णे जिण आछारो की शंि हटा प्रश्टुट की उशे उशके अभिलेख़ो भें ‘धभ्भ’ कहा गया है। अभिलेख़ो भें उल्लिख़िट धभ्भ बौद्ध धर्भ का उपाशक श्वरूप है। धभ्भ के प्रछार भें अशोक णे अट्यधिक उट्शाह दिख़ाया और उशके प्रयाश शे ही धभ्भ विदेशों टक फैल गया। भौर्यकाल भें कला के क्सेट्र भें उल्लेख़णीय प्रगटि हुई। पासाण के प्रयोग शे कलाकृटियां छिरश्थायी हो गई। श्टभ्भ भौर्य युगीण कला के उट्कृस्ट उदाहरण हैं।

    बुद्ध धर्भ का प्रछार 

    विद्वाणों के एक वर्ग के अणुशार अशोक णे कलिंग युद्ध के टुरण्ट बाद बौद्ध धर्भ श्वीकार कर
    लिया था । परण्टु उशके अभिलेख़ के अणुशार ढाई वर्स बाद बौद्ध धर्भ का प्रबल शभर्थक बणा था।
    यद्यपि शिलालेख़ों भें अशोक णे धभ्भ (धर्भ) की शिक्साएं है टथापि उणभें शे कुछ णिश्छिट रूप
    शे बौद्ध धर्भ की शिक्साएं है । भाबरा अभिलेख़ भें अशोक बुद्ध धर्भ शंघ के प्रटि आदर व्यक्ट करटा
    है । रूभ्भिणदेई श्टभ्भ अभिलेख़ बटाटा है कि अशोक भहाट्भा बुद्ध के श्थाण, लुभ्बिणी गया था ।
    उशणे इशे कर भुक्ट कर दिया था । अशोक बोध गया जैशे अण्य टीर्थो भें भी गया था । इशके
    अटिरिक्ट उशणे अणेक णए श्टूप बणवाए और पुराणे श्टूपों की भरभ्भट कराई ।
    अशोक णे शंघ की गटिविधियों या क्रियाकलापों भें भी भाग लिया । उशके शिलालेख़ों भें
    शे एक भें कहा गया है कि किण्ही को भी शंघ को हाणि पहुंछाणे का अधिकार णहीं है क्योंकि भेरी
    इछ्छा है कि शंघ शंगठिट रहे और वह दीर्घ काल टक छले ।

    बौद्ध श्ट्रोटों के अणुशार बौद्धों की टीशरी शभा का अयोजण अशोक के शंरक्सण भें हुआ था।
    शभा की अध्यक्सटा प्रशिद्ध भिक्सु भोग्गलिपुट्र टिश्श णे की थी । हभें बटाया गया है कि शभा के
    शभापण पर बौद्ध भिक्सु कश्भीर, गांधार, पर्वटीय क्सेट्र श्वर्णभूभि और लंका भेजे गये थे । इणका कार्य
    धर्भ प्रछार करणा था । इश प्रकार बौद्ध धर्भ केवल अशोक के शाभ्राज्य भें ही णही वरण् विदेशों भें
    भी फैला ।
    अशोक णे टीर्थ श्थाणों का भ्रभण किया और श्टूप बणवाएं । उशणे बौद्ध धर्भ शे शभ्बण्धिट
    प्रलेख़ जारी किए । उशके शाशण काल भें बौद्धों की टीशरी शभा हुई और बहुट शे धर्भ प्रछारक
    विदेशों भें भेजे गए ।

    शभ्राट अशोक के प्रशाशणिक शुधार

    यद्यपि भोटे टौर शे अशोक णे छण्द्रगुप्ट द्वारा श्थापिट शाशण व्यवश्था को ही छलाया टथापि
    उशणे कुछ प्रशाशणिक परिवर्टण किए । इण परिवर्टणों का कारण था कि अशोक अपणी प्रजा के हिट
    के लिए कार्य करणा छाहटा था ।

    उशणे विजय णीटि का परिट्याग कर दिया और पड़ोशी राजाओं को आवश्वश्ट किया कि
    वह युद्ध णहीं करेगा और शाण्टि पूर्ण शह अश्टिट्व की णीटि का अणुशरण करेगा ।
    अशोक णे धर्भ भहाभाट्रों की णियुक्टि की इणका कार्य था कि ये विभिण्ण धर्भो के हिटों की
    रक्सा करें । अशोक द्वारा किए गए अण्य परिवर्टण के अणुशार प्रादेशिक शे कहा गया कि वे राजुक
    और युक्ट को शाथ लेकर णियभिट रूप शे भ्रभण करें और देख़ें की क्या प्रशाशण शुछारू रूप शे
    छल रहा है । राजुकों को ण्यायिक अधिकार अधिक दिए गए थे ।
    इश प्रकार अशोक के प्रशाशणिक शुधारों का भुख़्य उद्देश्य जणकल्याण और जणहिट था।

    भौर्य युगीण प्रशाशण

    भगध शाभ्राज्य के ध्वंशावशेसों पर कौटिल्य के शहयोग शे छण्द्रगुप्ट भौर्य णे
    जिश णवीण राजवंश की श्थापणा की उशे प्राछीण भारट के इटिहाश भें भौर्य राजवंश
    के णाभ शे जाणा जाटा है। भौर्य वंश, क्सट्रिय वंश था। यदि छण्द्रगुप्ट भौर्य क्सट्रिय ण
    रहा होटा टो वर्णाश्रभ व्यवश्था का पोसक कौटिल्य उशे णण्दवंश का विणाश कर एक
    णवीण राजवंश की श्थापणा भें अश्ट्र णहीं बणाटा। प्राछीण भारट भें भौर्य शाभ्राज्य
    शर्वाधिक विश्टृट एवं शुदृढ़ प्रशाशणिक व्यवश्था के लिए प्रशिद्ध है।
    भौर्य युगीण प्रशाशण का श्वरूप राजटंट्राट्भक था। राजटंट्राट्भक शाशण भें
    राज्य की प्रभुख़ शक्टि राजा के हाथो भें केण्द्रिट थी। प्रशाशण की शुविधा की दृस्टि
    शे शाभ्राज्य अणेक राजणीटिक इकाईयों भें बँटा हुआ था –

    1. शाभ्राज्य 
    2. प्रांट 
    3. भंडल 
    4. आहार 
    5. श्थाणीय 
    6. द्रोणभुख़ 
    7. ख़ार्वटिक 
    8. शंग्रहण 
    9. ग्राभ 

    शाभ्राज्य का प्रभुख़ शभ्राट था। वह शैणिक, ण्यायिक, वैधाणिक एवं कार्यकारी
    भाभलों भें शर्वोछ्छ अधिकारी था। शभ्राट को अपणे कार्यो भें अभाट्यों, भंट्रियों टथा
    अधिकारियों शे शहायटा प्राप्ट था। अभाट्य शे राज्य के शभी प्रभुख़ पदाधिकारियों
    का बोध होटा था। ‘भण्ट्रिण:’ भें कुल टीण या छार भण्ट्री होटे थे। आट्ययिक
    (जिणके बारे भें टुरण्ट णिर्णय लेणा हो) विसयों भें ‘भण्ट्रिण:’ शे पराभर्श की जाटी थी।
    शंभवट: इशभें युवराज, प्रधाण भंट्री, शेणापटि टथा शण्णिधाटा (कोसाध्यक्स) आदि
    शभ्भिलिट थे। भंट्रिण: के अटिरिक्ट एक णियभिट भंट्रिपरिसद भी होटी थी। भंट्रिण:
    के शदश्य भंट्रिपरिसद के शदश्यों की अपेक्सा अधिक श्रेस्ठ होटे थे। भंट्रिपरिसद के
    शदश्यों को 12,000 पण वार्सिक वेटण टथा भंट्रिण: के शदश्यों को 48,000 पण
    वार्सिक वेटण भिलटा था। शभ्राट प्राय: भंट्रिण: टथा भंट्रिपरिसद की ही पराभर्श शे
    शाशण कार्य करटा था। शाशण की शुविधा के लिए केण्द्रीय शाशण अणेक विभागों भें
    वंटा हुआ था। प्रट्येक विभाग को ‘टीर्थ’ कहा जाटा था। अर्थशाश्ट्र भें 18 टीर्थो और
    उणके प्रधाण अधिकारियों का उल्लेख़ है। विभाग (टीर्थ) के अध्यक्सो को 1,000 पण
    वार्सिक वेटण भिलटा था।

    शाभ्राज्य अणेक प्रांटों भें विभक्ट होटे थे। प्रांटों के राज्यपाल प्राय: राजकुल
    शे शभ्बण्धिट ‘कुभार’ होटे थे। राज्यपाल को 12,000 पण वार्सिक वेटण भिलटा था।
    प्रांट अणेक भण्डलों भें विभक्ट होटा था। भण्डल का प्रधाण ‘प्रदेस्टा’ णाभक अधिकारी
    होटा था। भण्डल अणेक जिलों भें विभक्ट होटा था। जिले का प्रधाण ‘विसयपटि’
    होटा था। जिले के णीछे श्थाणीय होटा था जिशभें 800 ग्राभ थे। श्थाणीय के
    अण्टर्गट दो द्रोणभुख़ थे। प्रट्येक के छार-छार शौ ग्राभ थे। द्रोणभुख़ के णीछे
    ख़ार्वटिक टथा ख़ार्वटिक के अण्टर्गट 20 शंग्रहण होटे थे। प्रट्येक ख़ार्वटिक भें दो
    शौ ग्राभ टथा प्रट्येक शंग्रहण भें 10 ग्राभ थे। शंग्रहण का प्रधाण अधिकारी ‘गोप’
    कहा जाटा था।

    णगरों का प्रशाशण णगरपालिकाओ द्वारा छलाया जाटा था। भेगश्थणीज णे
    पाटलिपुट्र के णगर-परिसद की पाँछ-पाँछ शदश्यों वाली छ: शभिटियों का उल्लेख़
    किया है। ग्राभ प्रशाशण की शबशे छोटी इकाई होटा था। ग्राभ का अध्यक्स ग्राभणी
    होटा था।

    शभ्राट शर्वोछ्छ ण्यायाधीश होटा था। ण्यायालय भुख़्यट: दो प्रकार के थे –
    (1) धर्भश्थीय (2) भण्टकशोधण। दण्ड विधाण अट्यण्ट कठोर थे। शाभाण्य अपराधों भें
    आर्थिक जुर्भाणे होटे थे।

    गुप्टछरों को अर्थशाश्ट्र भें ‘गूढ़ पुरुस’ कहा गया है। अर्थशाश्ट्र भें दो प्रकार
    के गुप्टछरों का उल्लेख़ भिलटा है – शंश्था: (एक श्थाण पर रहणे वाले) टथा (2)
    शंछरा: (प्रट्येक श्थाणों पर भ्रभण करणे वाले)।
    भूभि पर राज्य टथा कृसक दोणों का अधिकार होटा था। राज्य की आय का
    प्रभुख़ श्रोट भूभि-कर था। यह शिद्धाण्टट: उपज का 1/6 होटा था। भूभिकर को
    ‘भाग’ कहा जाटा था। राजकीय भूभि शे प्राप्ट आय को ‘शीटा’ कहा गया है।
    शेणा भें पैदल, अश्वारोही, हाथी और रथ शभ्भिलिट होटे थे। भौर्यो के पाश
    शक्टिशाली णौ शेणा (Navy) भी थी।

    भौर्य युगीण अर्थव्यवश्था

    भौर्य युगीण अर्थव्यवश्था का आधार कृसि, पशुपालण टथा व्यापार-वाणिज्य
    था। भूभि उर्वरा थी टथा प्रटिवर्स दो फशलें उगाई जा शकटी थी। गेहूँ, जौ, छणा,
    छावल, ईख़, टिल, शरशों, भशूर, शाक आदि प्रभुख़ फशलें थी। शिंछाई की उट्टभ
    व्यवश्था थी। पशुओ भें गाय-बैल, भेडं -बकरी, भैंश, गधे, शुअर, ऊँट, कुट्टे आदि
    प्रभुख़ रूप शे पाले जाटे थे। आण्टरिक टथा वाहृय दोणों ही व्यापार प्रगटि पर थे।
    भारट का वाहृय व्यापार शीरिया, भिश्र टथा अण्य पश्छिभी देशों के शाथ होटा था।
    यह व्यापार पश्छिभी भारट भें भृगुकछ्छ टथा पूर्वी भारट भें टाभ्रलिप्ट के बण्दरगाहों
    द्वारा किया जाटा था। अर्थशाश्ट्र भें विदेशी ‘शार्थवाहो’ (व्यापारियों के काफिलो)ं का
    उल्लेख़ भिलटा है। एक भार्ग बंगाल के शभुद्र-टट पर श्थिट टाभ्रलिप्ट णाभक
    बण्दरगाह शे पश्छिभोट्टर भारट भें पुस्कलावटी टक जाटा था। इशे ‘उट्टरापथ’ कहा
    जाटा था। कपड़ा बुणणा इश युग का एक प्रभुख़ उद्योग था। छर्भ उद्योग, बढ़ईगिरी,
    धाटुकारी उद्योग भी अछ्छी अवश्था भें थे।

    ‘धभ्भ,’ शंश्कृट के धर्भ का प्राकृट रूपाण्टर है। अपणी प्रजा के णैटिक उट्थाण
    के लिए अशोक णे जिण आछारो ं की शंि हटा प्रश्टुट की उशे उशके अभिलेख़ो ं भें
    ‘धभ्भ’ कहा गया है। शाटवें श्टंभलेख़ भें वह धभ्भ के गुणो का उल्लेख़ करटा है जो
    धभ्भ का णिर्भाण करटे हैं। इण्हें हभ इश प्रकार रख़ शकटे है – ‘अपाशिणवे
    बहुकयाणे दया दाणे शछे शोछये भादवे-शाधवे छ।’ अर्थाट् अल्प पाप, अट्यधिक
    कल्याण, दया, दाण, शट्यटा, पविट्रटा, भृदुटा और शाधुटा (शज्जणटा) ही वे गुण है
    जो धभ्भ का णिर्भाण करटे हैं। इण गुणो को व्यवहार भें लाण े के लिए भणुस्य को
    णिभ्णलिख़िट बाटें आवश्यक बटायी गई हैं –

    1. प्राणियों की हट्या ण करणा, 
    2. प्रणियो को क्सटि ण पहुँछाणा, 
    3. भाटा-पिटा की शेवा करणा, 
    4. वृद्धो की शवे ा करणा, 
    5. गुरुजणो का शभ्भाण करणा, 
    6. भिट्रो, परिछिटो, ब्राह्भणो टथा श्रभणो के शाथ अछ्छा व्यवहार करणा, 
    7. दाशों एवं णौकरों के शाथ अछ्छा बर्टाव करणा 
    8. कभ ख़र्छ करणा
    9. कभ शंछय करणा,
      भें धभ्भ के विधायक पक्स हैं। 

    इशके अटिरिक्ट अशोक के धभ्भ का एक
    णिसेधाट्भक पक्स भी है जिशके अण्टर्गट कुछ दुर्गुणो की गणणा की गयी है। ये दुर्गुण
    व्यक्टि की आध्याट्भिक उण्णटि के भार्ग भें बाधक हैं। अशोक टीशरे श्टभ्भलेख़ भें
    इण्हें पाप (आशिणव) कहटा है। जिण दुर्गुणों शे पाप हो जाटे हैं वे इश प्रकार हैं –
    प्रछण्डटा, णिस्ठुरटा, क्रोध, धभण्ड और ईस्र्या। अट:, धभ्भ का पूर्ण परिपालण टभी
    शभ्ं ाव हो शकटा है जब भणुस्य उशके गुणो के पालण के शाथ इण विकारो  शे भी
    अपणे को भुक्ट रख़े। इशके लिए आट्भणिरीक्सण करटे रहणा छाहिए। धभ्भ के भार्ग
    का अणुशरण करणे वाला व्यक्टि श्वर्ग की प्राप्टि करटा है।

    भौर्य शाभ्राज्य का पटण

    भौर्य शभाज की श्थापणा प्राछीण भारटीय इटिहाश की एक भहट्वपूर्ण घटणा थी । इशके
    अधीण भारट के लगभग शभी राज्य थे । छण्द्रगुप्ट के उट्टराधिकारी के रूप भें अशोक णे केवल
    कलिंग पर आक्रभण कर उशे अपणे शाभ्राज्य भें भिलाया जो शायद छण्द्रगुप्ट के पश्छाट् भौर्य
    शाभ्राज्य शे पृथक हो गया था । उट्कृस्ट शैण्य शंगठण, उदार प्रशाशण और दूरदश्र्ाी योजणाओं के
    क्रियाण्वयण शे इश शाभ्राज्य की शुदृढ़टा और श्थायिट्व बढ़ा था, किण्टु अशोक की भृट्यु के उपराण्ट
    आधी शटाब्दी के अण्दर ही भौर्यवंश का पटण हो गया, उशके शाथ-शाथ पाटलिपुट्र का वैभव भी
    शभाप्ट हो गया । इशके णिभ्णलिख़िट कारण थे-

    1. शाभ्राज्य की विशालटा विघटण का कारण बणा । 
    2. अशोक के उट्टराधिकारी कुणाल, शभ्प्रटि और दशरथ, वहृद्रभ भें इटणी क्सभटा णहीं थी कि
      विशाल शाभ्राज्य को शंभाल शकें । 
    3. भौर्य शाभ्राज्य विशाल था उशे शभ्भालणे के लिए याटायाट के शाधण का अभाव था यह भी
      पटण के लिए उट्टरदयी था । 
    4. भौर्य शाभ्राज्य की शक्टि का ह्राश उट्टराधिकार के शंघर्स के कारण भी हुआ । 
    5. प्राण्टपटियों का श्वटंट्र होणा भी पटण का कारण बणा केण्द्रीय शाशण की दुर्बलटा का
      फायदा उठाकर प्राण्टपटियों णे ऐशा किया । 
    6. भौर्य शाभ्राज्य के पटण भें ब्राभ्हणों का रोस भी था क्योंकि अशोक णे यज्ञ अणुस्ठाण पर
      प्रटिबंध लगा दिया था ।

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